Wednesday, July 27, 2005

बारिश में भीगते हायकू का छाता

पानी बरसा,
छत टपक गई
अरे बाप रे!

मिट्टी थी जो,
कीचड़ बन गई,
अरे बाप रे!

सड़कें जाम,
स्कूल बंद हुये,
मज़ा आ गया!

पानी भी क्या,
हचक के बरसा
सब हैरान!

बाढ़ आ गई,
सब कुछ चौपट,
अब क्या होगा!

सांप-नेवला,
एक पेड़ के नीचे
वाह रे भैया!

बाजार बंद,
बोहनी के भी लाले
आगे क्या होगा!

सब्जी कड़की
सब सामान सुने
दाम उछालें!

चूल्हा सिसका,
कैसे आग जलेगी
लकड़ी गीली!

नेता जी बोले,
जहाज मंगा लेव
दौरा कर लें!

साहब बोला,
ये तो होता ही है,
छान पकौड़ी!

फाइल बोली,
चल भाग जा सूखे
मेरी बारी है!

लैला चहकी,
किधर हो मजनू
लव हो जाये!

ये जी मुस्काई,
आज जान सकी मैं,
बड़े वैसे हो!

टूटी छत है,
खुली व्यवस्था सी
कोई भी आये!

दरारें बोली,
मेरे पानी भइया
धीरे निकलो!

छाता चहका,
सुन मेरी छतरी
पूरी बिक जा!

गौमाता बोली,
राहें चौराहे सूने
चलों बैठ लें!

देहली बोली,
मेरी जान मुंबई
फिर फंस ली!

नदी बावरी,
तट को खा गयी
बड़ी बुरी है!

बूँद बैठकी
में हल ये निकला
काम शुरु हो!

जर्जर छज्जा,
घोटाले के बाद के
ग्राफ सा गिरा!

बीमारी बोली
सब जान निकालो
मौका बढिया!

मोर नाचता
बड़ा बेशर्म,बना
अमेरिका है!

बरखा रानी!
बहुत बरस लीं
अब तो बक्सो!

बदरी बोली
सुन मेरे बदरे
अब तो छोड़ो!

काफी हो गया
फुरसतिया बोले
पोस्ट कर दे!



15 responses to “बारिश में भीगते हायकू का छाता”

  1. इहाँ मालवा मे पानी नाहीं है
    त्राहि-त्राहि मची है
    अगले साल क्या पियेंगे ?
  2. बहुत अच्छे!
  3. झूमता रहा
    मना मयूर क्यों
    बरसात में
    काले बादल
    कितने मनमौजी
    बरसे कहाँ
  4. एक हायकू और……
    एकाकी बैठे
    पानी की टपटप
    सुनते हम…
  5. ये मेरी ओर से
    पानी मिलाने
    का काम बरखा का
    ग्वाले खुश।
    खुले गटर
    कमर भर पानी
    हड्डी संभालो।
    सिली माचिस
    फूल गये किवाड़
    वर्षा है आई।
  6. Achhe hain saare haiku lekin itne saare ek hi din kaiku
  7. [...] ��ी रहती हैं-चाहे वो फिर फुरसतिया के हायकू हों अनूप भार्गव की नज़्म या फिर सा [...]
  8. [...] इसके बाद मैंने अपने बारिश के मौसम के बारे में लिखे अपने हायकू सुनाना शुरू किया और सारे नहीं सुना पाये कि पब्लिक हक्का-बक्का से रह गये| हमने तुरंत मौके की नजाकत को देखते हुये हायकू-कतरन समेट लिया और कविता का पूरा थान फैला दिया| कविता पढ़ी:- आओ बैठे कुछ देर पास में, कुछ कह लें,सुन लें बात-बात में| [...]
  9. [...] पहले तो मेरा मन हुआ कि बरसात में कुछ हायकू की बौछार कर दी जाये- पानी बरसा, छत टपक गई अरे बाप रे! [...]
  10. [...] ये भी पढें: बारिश में भीगते हायकू का छाता [...]
  11. anitakumar
    देहली बोली,
    मेरी जान मुंबई
    फिर फंस ली!
    :) मुंबई को फ़ंसने में भी मजा आता है, न फ़ंसे तो बच्चों को पानी में चलने का मजा, स्कूलों से अचानक मिली छुट्टी का मजा कैसे मिले। हम तो कहत है बरसो रे हाय बैरी बदरवा बरसो रे, जोर से बरसो, रोज बरसो, ताकि हम रोज पकौड़ी का मजा ले सके मसालेदार चाय के साथ्। बारिश में भीगने का अपना ही एक मजा है। जिस दिन बारिश होती है हम तो जानबूझ कर छाता भूल जाते हैं ।
  12. [...] 1. त्रिवेणी: एक विधा 2. गुलजार की कविता,त्रिवेणी 3.बारिश में भीगते हायकू का छाता [...]
  13. [...] 1.तुलसी संगति साधु की 2.बदरा-बदरी के पिछउलेस 3.एक ब्लागर मीट रेलवे प्लेटफार्म पर 4.घर बिगाड़ा सालों ने 5.बारिश में भीगते हायकू का छाता [...]
  14. very nice. keep on writting.

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Sunday, July 24, 2005

घर बिगाड़ा सालों ने


हवा देश की प्रगति की तरह ठहरी थी। मौसम न अच्छा था न बुरा-बस था। तब तक फोन की घंटी बजी। पता लगा कि हमें पास में एक मित्र की बहन की ससुराल जाना है। वहां उसकी बहन को उसकी ससुराल वाले तंग करते हैं। मित्र भी पहुंचने वाले थे। लेकिन जब तक वे पहुंचे तब तक कन्या की रक्षा का दायित्व मेरे ऊपर सौंप दिया गया था।


मैंनें अपने चहेरे पर स्थायी रूप से कब्जा जमाये लापरवाह अंदाज को अतिक्रमण की तरह उखाड़ फेंका। कुछ जिम्मेदारी चेहरे पर तथा पता बताने के लिये एक साथी को कार में भरकर चल दिया तथा दस मिनट में उस बंद फाटक इस पार पहुंच गया जिसके उस पार एक कन्या अपनी ससुराल में परेशान थी।

तब तक लड़की की माता तथा भाई भी वहीं पहुंच गये थे। घंटी बजाने पर लड़की के ससुर बाहर आये तथा उन्होंने अपनी समधन तथा लड़की के भाई को अंदर बुलाने से मना कर दिया।लेकिन हमें ‘सादर सा’ अंदर बुला लिया। दरवाजे पर ताला फिर लगा दिया।


हम अंदर घुस गये। लगा ,हालात जितनी जिम्मेदारी हम चेहरे पर लादे हैं ,उससे कुछ ज्यादा ही गंभीर हैं। लिहाजा हमने अपने चेहरे और आवाज में गंभीरता भी लपेट ली। बाहर जाकर गेट के उस पार खड़े लड़की के घर वालों से कहा -आप चिंता मत करो। बाहर कार में बैठो । मैं सब देख लूंगा। लड़की की मां बाहर कार में बैठ गयीं। भाई पुलिस का सहयोग लेने के लिये चला गया। हम वीरोचित गंभीरता तथा जिम्मेदारी चेहरे पर चस्पा करके अंदर सोफे में धंस गये।


मैं कुछ पूँछूँ उससे पहले ही लड़की के ससुर ने लड़की की मां तथा भाई को अंदर आने न देने का कारण बताया ।कारण सिर्फ इतना था कि एक बार उनका लड़का जब अपनी ससुराल गया था तो उसे चार घंटे बाहर इन्तजार करना पड़ा था। समानता के समर्थक होने के नाते वे चाहते थे कि उनको भी कम से कम उतनी देर तो इंतजार कराया जाये जितनी देर उनके लड़के को करना पड़ा। उनकी बात को तर्कपूर्ण न मानने का बहाना मुझे तुरंत कुछ नहीं सूझा।


हम कुछ इधर-उधर की बातों में भटकें तभी मुझे आया याद कि हम ऐसे काम के लिये आये हैं जिसमें मुझसे जिम्मेदारी तथा समझदारी की अपेक्षा की जाती है। हमने तुरंत लड़की से मिलने की इच्छा जाहिर की। इच्छा तुरंत पूरी की गयी। सहमी सी लड़की मेरे बगल में आकर बैठ गयी। मैं अचानक एक निर्लिप्त शख्स से लड़की के भाई में तब्दील हो गया। मैंने अपना हाथ लड़की के सर पर रखा। वह किसी उस पुल की तरह थरथरा रही थी जिस पर से अभी-अभी कोई रेलगाड़ी गुजरी हो। समय के साथ यह थरथराहट कम होती गयी। वह धीरे-धीरे सहज होने का प्रयास कर रही थी। लेकिन बोल अभी भी नहीं पा रही थी। कमरे में हमारे अलावा लड़की का पति, ननद, सास,ससुर तथा लड़की की हाल में ही पैदा हुई लड़की थी। घर के बाहर लड़की की मां ताला लगे गेट के उस पार अंदर आने को छटपटा रहीं थीं। मैं फिर बाहर गया कहने -आप चिंता न करें। बिटिया सकुशल हैं। मैं अंदर हूं ।वे कुछ आश्वस्त सी हुईं।


दुबारा अंदर आकर मैंने माहौल को हल्का करने का प्रयास किया तथा कुछ हल्की-फुल्की बातें शुरु की। सास से पूंछा-क्या बात है क्या आप लोग सास-बहू के सीरियल ज्यादा देखतीं हैं?


सुनते ही सास झपट पड़ीं-आप तो इस तरह की बातें करेंगे ही। आप तो लड़की वालों की ही तरफदारी करेंगे। हमने तुरंत अपनी सारी ताकत अपने को गुटनिरपेक्ष साबित करने में झोंक दी। आवाज में बला की गंभीरता ठेलते हुये कहा- न हम लड़की की तरफ से आयें न लड़के की तरफ से। हम सिर्फ आयें हैं। हम सिर्फ लड़के-लड़की की भलाई चाहते हैं। इसी घराने के कुछ और डायलाग मारकर हम गुटनिरपेक्ष की मान्यता पाने में सफल हुये।


हमने अधिकारपूर्वक लड़की की तेजतर्रार ननद को लगभग डांटते हुये चाय का आदेश दे दिया।फिर लड़की की तरफ मुखातिब हुये। पूछा -तुम्हें यहां क्या तकलीफ है? क्यों घर जाना चाहती हो? उसने लगभग हकलाते हुये कहा-मुझे यहाँ कोई तकलीफ नहीं हैं। पर मैं अपने पति से ‘एडजस्ट’ नहीं कर पा रहीं हूं। मैं कुछ दिन के लिये अपने घर जाना चाहती हूं। मैंने -पूछा – क्यों ‘एडजस्ट’ नहीं कर पा रही हो? वह बोली- मैं बहुत कोशिश के बावजूद अपने को पति के अनुरूप नहीं बना पा रहीं हूं। अपने में सुधार नहीं कर पा रही हूं।


यह सुनते उस घर के सारे लोग लगभग झपट पड़े । क्या तकलीफ है इसे यहां ? कोई काम नहीं करना पड़ता है। बच्ची को दूध पिलाने के अलावा कोई काम नहीं करना पड़ता। लड़की ने फिर कहा-मुझे कोई तकलीफ नहीं है। पर मैं एडजस्ट नहीं कर पा रही हूं। कुछ दिन के लिये घर जाना चाहती हूं।


सास ने लड़के को ताना मारा- देख लो ! बहुत मजनूं बने घूमते हो। बहुत चाहते हो अपनी बीबी को। यह तुम्हारे साथ रहना तक नहीं चाहती। सुन लो असलियत।

पति अपनी पत्नी को बहुत चाहता है यह रहस्योद्‌घाटन होते ही हमने बातचीत की दिशा में बदलाव किया। लड़के से बातचीत शुरु की। पता चला कि लड़की तो बहुत मासूम है। सारा कसूर लड़की की मां का है जो फोन पर लड़की को ऊटपटांग सलाह देती रहती हैं। बातचीत में थोड़ा गणित ठेलते हुये उसने बताया – मैं बहुत कोशिश करके अपने संबंध को १० प्वांइट तक ले जाने की कोशिश करता हूं तभी इसकी मम्मी(मेरी सास) कोई ऊलजलूल हरकत करके संबंध को शून्य पर ले आती हैं। मुझे नये सिरे से मेहनत करनी पड़ती है। मैं सोच ही रहा था कि यहां मेहनत से जी नहीं चुराना चाहिये की सलाह ठीक रहेगी कि नहीं तबतक लड़का थोड़ा और खुल गया। अपनी आधुनिकता तथा खुलेपन का परचम लहराते हुये वह बोला- इसकी मम्मी का दखल हमारे संबंधों में इतना अधिक है कि यह तक वे तय करती हैं कि हम कब यौन संबंध स्थापित करें कब न करें।


तमाम ऊलजलूल किस्से सुनाता रहा लड़का अपने जीवन में अपनी ससुराल वालों के अनावश्यक हस्तक्षेप के । उसके घर वाले भी लगातार आरोप लगाते रहे। सब लोग इतना चिल्ला रहे थे कि मुझे लगा यदि इस ध्वनिऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में रूपान्तरित किया जा सके तो शायद इनकी साल भर की बिजली समस्या हल हो जाये।


कोई बेवकूफी की बात सुनकर बिना कोई जवाब दिये या सगूफा छोड़े चुप रहने का बिल्कुल अभ्यास नहीं है मेरा। फिर भी जिम्मेदारी का अहसास मुझे चुप किये था।इस बीच तमाम दुनियावी डायलाग बोलकर तथा लड़की के पक्ष में कुछ भी न बोलकर मैं एक गुटनिरपेक्ष समझदार के रूप में स्थापित हो चुका था।


देखते-देखते चार घंटे बीत चुके थे। तथा मैं यह समझाने में सफल हो चुका था कि यह उचित नहीं कि लड़की की मां बाहर इंतजार करे। पसीज कर लड़के वाले उदार हो गये। लड़की की मां तथा उनके साथ कुछ अन्य हितैषी अंदर आ गये थे। मेरी पत्नी लगातार मुझे मोबाइल फोन पर हिदायत दे रहीं थीं – किसी भी हालत में लड़की को अकेले मत छोड़ना तथा हर हाल में लड़की को वहां से मायके लाना है। पत्नी की तत्परता से प्रभावित होने के बावजूद हम वहां से कुछ जवाब देने की हालत में नहीं थे। उनको हमने एस.एम.एस. किया -हमको पता है कि हमें क्या करना है। तुम निश्चिंत रहो।


इधर आरोपों का सिलसिला नये सिरे सेचल पड़ा सारी बातें मुझे नये सिरे से सुननी पड़ीं। लड़के वाले थके होने के बावजूद कोसने में कंजूसी नहीं कर रहे थे। बल्कि उम्र के कारण शायद लड़की की मां की सुनने की ताकत कम हो गयी होगी यह मानकर उनकी आवाज की ऊँचाई और तल्खी में इजाफा हो गया था।घंटों चली इस एक तरफा बहस का कोई नतीजा तो खैर क्या निकलना था। पर लड़के वालों की सक्रियता तथा लड़की वालों की मजबूरी के चलते कुछ स्थापनायें हो चुकी थीं:-


१.लड़की को कोई तकलीफ नहीं है ससुराल में । हमारे सामने ही जो खुशहाली ठूंसी जा रही थी सहमी सी लड़की में उससे यह बात पुष्ट होती थी।

२.लड़की में कोई कमी नहीं है। सिर्फ वह बहुत सीधी है तथा बेवकूफ भी है इसीलिये अपने मायके वालों के बहकावे में आ जाती है।

३.सारी कमी लड़की के घर वालों खासतौर पर मां की है जो जब-तब लड़की को ऊट-पटांग सलाह देती रहती हैं।

४. लड़का अपनी बीबी को बहुत चाहता है। इसलिये किसी भी कीमत पर अपनी बीबी को फिलहाल मायके नहीं भेजना चाहता।

५.लड़की चूंकि दुबली पतली है तथा लड़का तंदुरस्त लिहाजा कभी प्यार में कुछ झटके लग गयें होंगे उन्हें किसी भी तरह इस रूप में नहीं लिया जाना चाहिये कि लड़का लड़की को मारता है।

६.(बकौल लड़की के सास-ससुर)अगर लड़की को जाना ही है तो तलाक के कागज में दस्तखत करके जाना होगा।ताकि वे(मायके वाले) बाद में उन्हें ब्लैक मेल न कर सकें।


मैं काफी देर तक लड़के के भाई का इंतजार करता रहा। लड़की के भाई के ‘एक्शन’ का इंतजार था।लड़के वालों का अड़ियल रुख देखकर इस बात पर मैंने राजी कर लिया था कि ठीक है अगर लड़के वाले किसी भी हालत में लड़की को भेजने को राजी नहीं है तो कम से कम यह करें कि लड़की -लड़का मेरे घर शाम को आयें तब मैं उन दोनों के बीच की गलतफहमियां दूर करने का प्रयास करूंगा। यह तय करके तथा शाम को वापस फिर आने की बात कहकर मैं घर चला आया। हमारे आने तक माहौल बोझिल तो था लेकिन आरोपों का सिलसिला कुछ थम गया था। शायद लड़के वाले थक गये थे, चिल्लाते-चिल्लाते।


शाम के पहले ही अचानक बुलाये जाने पर जब मैं दुबारा घटनास्थल पर पहुंचा तब नजारा बदला हुआ था। शांत हो चुके लड़के के बाप दुबारा परशुराम बन गये थे। तथा पूरे कमरे में नाच-नाचकर हाथ को फरसे की तरह हिलाते हुये चीख रहे थे कि यहां पुलिस बुलाकर हमारी बेइज्जती करा दी।पता चला कि दो पुलिस वाले लड़की के भाई की शिकायत पर आये थे पर भाई खुद नहीं आ पाया था।पुलिस वालों को तो, कोई समस्या नहीं है ,कहकर वापस कर दिया गया था। लेकिन समस्या पैदा हो गयी थी।


हमने सोचा कहें- कि पुलिस तो आपके दरवाजे उतनी देर भी नहीं रुकी जितनी देर लाल बत्ती होने पर आप पुलिस वाले के बगल में चौराहे पर खड़े होते हैं।पर समझदारी के टैंक ने हमारी सोच को कुचल दिया।

बहरहाल उन्होंने भी अपना पक्ष मजबूत करने के लिये स्थानीय महिला नेता को पति समेत बुला लिया था। महिला नेता ने आते ही सबको नमस्कार करके घोषणा की कि मैं सिर्फ लड़की से बात करूंगी।वे लड़की को लेकर साथ वाले में कमरे में चली गयीं। इधर मंचपर नेता पति का नेता का कब्जा हो गया।


तमाम तरह की अंगूठियों के गिरफ्त में फंसे हाथ नचाते हुये उन्होंने बताया कि शादी के बाद लड़की परायी हो जाती है ।कि लड़की के घर वालों का उसकी ससुराल में हस्तक्षेप से मामला बिगड़ जाता है। चूँकि यह बाते सामान्य समझ की हैं लिहाजा कोई खास तवज्जो नहीं दे पाये लोग। ताव में आकर उन्होंने यह बात दुबारा कही तथा इस बार एक कहावत भी साथ में लपेट दी:-

दीवार बिगाड़ी आलों ने,
घर बिगाड़ा सालों ने। 


लड़के के पिता के आफिस वाले भी उनके समर्थन में आ गये थे।सभी लोग लगभग यह स्थापित कर चुके थे कि अलग होने में अंतत: नुकसान लड़की का ही होता है। लड़के के पिता दिल के बहुत अच्छे हैं। आदि-इत्यादि।


इस बीच लड़की का भाई पुलिस की नयी खेप लेकर आ गया था। साथ में महिला पुलिस भी थी। जिस तरह उन लोगों ने नेताजी से दुआ-सलाम की उससे हमें लगा कि हम विरोधियों से घिर गये हैं-हारी लड़ाई लड़ रहे हैं।


महिला पुलिस अंदर चली गयी लड़की से बात करने । नेताजी को कुछ याद आ गया काम वे चले गये।हम इंतजार करने लगे-बुझे मन से। बहुमत (जाहिर है लड़के वालों का)लड़की वालों को समझाने में जुट गया कि लड़की की भलाई इसी में है कि उसे फिलहाल वापस ले जाने की जिद समेत यहीं छोड़ दिया जाये।


काफी इंतजार के बाद महिला नेता मय महिला पुलिस अधिकारी तथा लड़की के बाहर आयीं तथा उन्होंने जो कहा उससे मुझे पहली बार लगा कि नेता भी समझदारी की बात कर सकते हैं। उनका मानना था कि चाहें जितना चाहते हों ससुराल वाले,चाहें कोई तकलीफ न हो उसे यहां लेकिन अगर वह मायके जाना चाहती है तो उसे रोकने का कोई कारण नहीं बनता।


इस पर लड़का बिफर गया -ये नहीं जायेगी। लड़के की बहन भी कुछ तीखा बोली। मां ने भी अपनी कुछ भडास निकाली।


इसके बाद जो हुआ वह मेरी आंखों के सामने अभी भी नाच रहा है तथा कानों में अभी भी गूंज रहा है। लगभग सामान्य सी दिखने वाली महिला पुलिस अधिकारी ने कड़ककर लड़के को फटकारा -क्यों नहीं जायेगी वह मायके? क्या वह तुम्हारी लौंडी है या जरखरीद गुलाम? सलीका सीखो बीबी को अपना बना के रखने का । उससे पहले तमीज सीखो बात करने की। लड़के की बहन जो अपनी कान्वेन्टी अंग्रेजी से अपनी बेवकूफियां छितरा रही थी उसने अंग्रेजी में हड़काते हुये कहा- विहैव योरसेल्फ एंड लर्न हाऊ टु टाक इन फ्रन्ट आफ अदर्स ।अपनी भाभी से इतनी बदतमीजी से बात करती हो शर्म नहीं आती। शादी के बाद तुम्हारे घर वालों की ही तरह ससुराल वाले वाले मिले तो सारी स्मार्टनेस हवा हो जायेगी। लड़के की मां को झिड़कते हुये कहा-जब हमारे सामने अपनी बहू से ऐसा बर्ताव कर रहे हैं आप लोग तो अकेले में कैसा करते होंगें? एक घंटे में मुझे आपलोंगो से बात करने में इतना ‘सफोकेशन’ हो रहा है तो वह लड़की कैसा महसूस करती होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
कुछ देर बाद हम लड़की को अपने साथ लेकर घर की तरफ बढ़ रहे थे।लड़की ने बहुत देर बाद अपने चुटकी काटी तथा सहमते हुये भाई से पूँछा कि क्या सच में मैं घर चल रही हूं। भाई ,जिसने पिता की मौत के बाद बहन को बाप की तरह पाला था , ने उसे सीने से चिपटा लिया ।


मैं सोच रहा था कि जिस समाज में दिनभर की जद्दोजहद के बावजूद अपनी बहन को विदा कराने के लिये लड़की के भाई को पुलिस बुलानी पड़े तथा यह धमकी देनी पड़े कि यदि बहन को विदा न किया तो जान दे दूंगा उस देश में महिलाओं की स्थिति क्या होगी। यह तो तब है जबकि जब लड़की खूबसूरत, पढ़ी-लिखी( एम.ए. अंग्रेजी में फर्स्ट क्लास पास) है तथा शादी के दौरान तथा बाद में दहेज या पैसे की कोई बात नहीं थी।
आप क्यों चुप हैं, क्या विचार है आपका?

6 responses to “घर बिगाड़ा सालों ने

  1. शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन का सेट-अप – ससुराल और माईका दोनो दो दूसरे शहरों मे हों और आप सपत्नीक तीसरे शहर मे, आजीविका के बहाने. ;-) 
  2. बिल्कुल सही कहा स्वमीजी आपने.
  3. मुझे तो शुक्ला जी सारिका जी के गुरू की बात सही लग रही है। अधिक से अधिक अँतरराज्यीय ‌और अँतर्जातीय सँबध , जो समाज की बनायी मान्यताऐं और दीवारे ढहा दें।
  4. antarrajiy agar India ke hi hon aur antarjatiy bhi India se to yeh problem to tab bhi rahegi abhi tak to swamiji ka idea sahi hai,
    agar hum dusre shabdi me bole to – ek sasural north pole, dusra south pole aur aap rahe GMT me aajivika kamane Sath me jo phone aap use kar rahe hon contact banaye rakhne ke liye usper laga ho koi accha sa anti virus program.
  5. यह पता लगा पाना मुश्किल है कि गड़बड़ किस तरफ़ है, या शायद व्यर्थ ही हो। मियाँ बीवी राज़ी तो क्या करेगा काज़ी? पर लड़कियों की अभी तक ऐसी हालत नहीं है कि हर समय अपना मुँह खोल सकें। लड़के का ही फ़र्ज़ है कि मौके की नज़ाकत को समझे। आख़िर लड़की जिनके साथ बचपन से रही है, उन्ही से सलाह मशवरा करना बेहतर समझेगी न। साफ़ है कि लड़का, लड़की को विश्वास नहीं दिला पाया है कि वह उसका शुभचिन्तक है। लड़के को ही आगे बढ़ के जताना ही पड़ेगा कि हाँ, आप मेरी जीवन सङ्गिनी हैं, और इसलिए मैं आपकी परेशानियों सुलझाने के लिए कदम पहले उठाऊँगा, और बाद में अपने माता, पिता, बहन की चिन्ता करूँगा। एक बार इस बात का अहसास लड़की को हो जाए तो वह लड़के के परिवार को अपने से भी बढ़ कर अपना मान के चलेगी, बल्कि यह कोशिश करेगी कि उन्हें कोई दिक्कत न आए, भले ही पति को आ जाए। इसके बजाय अग़र लड़का अग़र हर मौके पर माँ और बहन के पल्लू में छिप कर उन्हें ही आगे कर दे तो लड़की को भला अपनापन कैसे लगेगा।
    आपने सही कहा है, पढ़ लिख लेने से समानता नहीं आ जाती। महिलाओं की हालत का सुधार अग़र किसी चीज़ से हुआ है तो उनकी आर्थिक स्वतन्त्रता से हुआ है।
    दाद लेकिन मैं इस बात की देता हूँ कि आपने इस विषय पर लिखा। हममें से अधिकतर लोग शायद लिखते हैं ज़िन्दगी की असलियतों से भागने के लिए, उनका सामना करने के लिए नहीं।
  6. [...] मैं जब भी कुछ लिखने की सोचता हूं तो पिछली पोस्ट याद आती है। लगता है कि कुछ छूट � [...]

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Wednesday, July 20, 2005

एक ब्लागर मीट रेलवे प्लेटफार्म पर

वेंकट-सारिका
वेंकट-सारिका
सबेरे जब हम आफिस पहुंचे तो मेज पर काम बहुत था। लिहाजा हम राउन्ड पर निकल गये। लौटा तो बताया गया कि जीतेन्द्र चौधरी का फोन आया था। हमने तमाम गैरजरूरी काम भी निपटा
लिये तब फोन करने की हिम्मत जुटा पाये।जो हमेशा सिर्फ एक मेल की दूरी पर रहता है वह चन्द मील दूर था। घंटी गयी तो जीतेन्द्र बजे। हाल-चाल का दर्द बांटा गया।हमने कहा-देख लो भइये,तुम्हारा लिखा साइट तक नहीं झेल पायी। शटर गिरा है मेरा पन्ना का। और लिखो-ब्राम्हण कहता है सालअच्छा है। जब हिंदी न जानने वाले इतना त्रस्त हो गये कि साइट जब्त कर ली तब हिंदी भाषियों का क्या हाल होगा!इसीलिये कहा गया है-अतिसर्वत्र वर्जयेत।पर जीतेन्द्र अविचिलित थे। बोले -सालों को वापस जाकर देखूंगा। मैंने पूंछा भी कि सालों को वहां देखोगे तो यहां किसको देखोगे? क्या वहां और सालों का जुगाड़ करोगे? कार्यक्रम पूछने पर बताया गया कि तमाम जगह जाना है। गोविंदनगर, रतनलालनगर, रामबाग वगैरह। बताने के अन्दाज से लग रहा था कि जैसे कोई बस स्टैंड वाला बसों के आवागमन की घोषणा कर कर रहा हो ।


बहरहाल जीतेन्द्र के तमाम बेतरतीब कार्यक्रमों ने हमें बचा लिया उनसे मुलाकात से। बोले शायद कल मिलेंगे। हमें लगा- चलो आज तो बचे। फिर भी एहतियातन हमने अपने पीए को बता दिया कि अगर हमारी अनुपस्थिति में जीतेन्द्र आयें तो जब तक हम आयें तबतक उनसे निरंतर का उनके हिस्से का अनुवाद का काम करा लें। जीतेन्द्र की तरफ से कम से एक दिन के लिये हम निश्चिन्त हो गये।

शाम को चार बजे फोन की घंटी बजी। सुरीली आवाज बोली-अनूपजी,नमस्ते। हमने कहा-नमस्ते क्या हाल हैं? पूछा गया-आपने पहचान लिया। हम सोच में डूबते-उतराते हुये बोले-पहचानने के नजदीक पहुंच रहा था कि इस सवाल से क्रमभंग हो गया।

क्षणिक सस्पेन्स का पटाक्षेप करते हुये बताया गया-मैं सारिका सक्सेना बोल रहीं हूं। नये सिरे से नमस्कार-खुशी का आदान -प्रदान हुआ। पता चला -रात की गाड़ी से वो कोलकता जा रहे हैं। तय हुआ शाम को स्टेशन में मिला जाये। घरों में तो लोग करते ही रहते हैं ब्लागर मीट। एक मुलाकात स्टेशन पर हो जाये।

हमने जीतेन्द्र को फिर खोजा। अटके थे गोविंदनगर में। पूछा चलोगे ब्लागर मीट को ऐतिहासिक बनाने। उनकी आवाज का भूगोल बिगड़ा हुआ था। बोले -यार ,इतना थका हूं कुछ पूछो मत। हम भी बोले -तुम बताओ मत हम समझ गये।

बहरहाल शाम को घर से जब मैं चला स्टेशन की ओर तो रात के आठ बज चुके थे। शब्दांजलि तथा अनकही बातें की सारिका से मिलने की उत्सुकता थी। कुछ देर भी हो गयी थी निकलने में। आगे की सवारियां मुझे ब्लागर की तरह लग रहीं थी जो मुझसे पहले मुलाकात करके विवरण छापना चाहता हो।फिर मुझे लगा-हर कनपुरिया अतुल की तरह फुर्तीला नहीं हो सकता ।
आगे की सवारियां मुझे ब्लागर की तरह लग रहीं थी जो मुझसे पहले मुलाकात करके विवरण छापना चाहता हो।फिर मुझे लगा-हर कनपुरिया अतुल की तरह फुर्तीला नहीं हो सकता ।
स्टेशन पहुंचकर हमने प्लेटफार्म नंबर एक पर गोरे ,गोल-मटोल चेहरे की तलाश में अपनी गरदन तथा आंखों को लगा दिया। दस मिनट बाद दोनों सर्च इंजन मुंह लटकाके बोले-सारी ,जो बताया आपने वो हम नहीं खोज पाये। मैंनेसोचा -मौका अच्छा है। सारी खूबसूरत महिलाओं से पूछ लिया जाये-माफ कीजियेगा आप सारिका सक्सेना तो नहीं हैं जो अमेरिका से आयी हैं। फिर हमें लगा कि वे तो माफ कर देंगी पर हम कैसे माफ करेंगे अपने को? राजधानी एक्सप्रेस छूटने में मात्र एक घंटा बचा था।

तो पीसीओ की शरण में जाना तय किया गया। पता चला कि आज गाड़ी प्लेटफार्म एक की जगह छह पर आनी थी । वहीं वे लोग मौजूद थे। हम पहुंचे । मुलाकात हुयी। सारिका अपने पति वेंकट,भाई सुधांशु तथा बिटिया कांति के साथ प्लेटफार्म नं छह पर मौजूद थी। बिटिया हमें देखते ही निद्रागति को प्राप्त हुयी। तमाम जरूरी-गैरजरूरी सूचनाओं के आदान-प्रदान से वार्ता-चक्र शुरु हुआ।

सारिका,कान्ति,वेंकट तथा अनूप
सारिका,कान्ति,वेंकट तथा अनूप
वेंकट आई.आई.टी.मुम्बई से मेकेनिकल इंजीनियर स्नातक हैं । फिलहाल डेट्रायट,अमेरिका में है। बिना दान-दहेज के शादी किया यह जोड़ा हमें अनायास बहुत प्यारालगा। वेंकट हमें कोकाकोला पिलाने लगे। सारिका से भी ब्लागिंग के बारे में बाते होने लगीं। बताया कि पहले मैं बहुत बोर होती थी जब वेंकट अपने काम में जुटे रहते थे कम्प्यूटर पर। फिर इनके प्रोत्साहन से बेव डिजाइनिंग सीखना शुरु किया तथा ब्लागिंग और फिर शब्दांजलि पत्रिका शुरु की। अब तो हाल यह है कि समय कहाँ सरक जाता है ,पता ही नहीं लगता।


मैंने वेंकट से पूछा -तुम तेलगू ब्लाग के बारे में हमें रिपोर्टिंग किया करो भाई। तो पता चला कि तेलगू बस काम भर की ही जानते हैं वे। उतने से काम बनेगा नहीं। सारिका के ब्लाग पढ़ते हैं कि नहीं के जवाब में बताया गया-पढ़ता हूं पर गति धीमी रहती है।

सारिका ने फिर कुछ ब्लागर्स की तारीफ शुरु की। अतुल की सबसे ज्यादा तारीफ कर रहीं थी कि वे बहुत अच्छा लिखते हैं। इसके अलावा प्रत्यक्षा , रविरतलामी तथा निरंतर की टीम से प्रभावित थीं। ईस्वामी के बारे में पूछा-ये स्वामीजी कौन हैं। हमने बताया-यह तो शायद स्वामीजी भी नहीं जानते होंगे पर लिख-पढ़ - बोल लेते हैं उससे लगता है कि मानव योनि में अवतार लिया है।

निरंतर की बात चली तो फिर मजबूरन देवाशीष ,पंकज,रमणकौल,रविरतलामी तथा जीतेन्द्रकी नये सिरे से तारीफ करनी पड़ी। जल्दी-जल्दी सबका नाम जाप किया गया। पर मुझे यह बहुत खल रहा था कि बताओ बात हम कर रहे हैं तारीफ अतुल की जा रही है जो कि आजकल ब्लागर कम पशुरोग विशेषज्ञ ज्यादा हो गये हैं
मुझे यह बहुत खल रहा था कि बताओ बात हम कर रहे हैं तारीफ अतुल की जा रही है जो कि आजकल ब्लागर कम पशुरोग विशेषज्ञ ज्यादा हो गये हैं
तथा भैंस के दर्द पर शोधरत हैं।

पर हम कोकाकोला का घूंट पी कर रह गये। प्रत्यक्षा की जब ज्यादा ही तारीफ की सारिका ने तो मैंने बहाने से बुराई करनी चाही कि प्रत्यक्षा की कहानियों का खास पैटर्न है कि लगभग हर कहानी में औरत दुखी है । वह अपना संक्षिप्त सुख का समय बिता करे लंबे दुख वियोग के पाले में आ जाती है । उसका चरित्र उदात्त भले ही दिखाया जाये पर मिलता दुख ही है। मेरी कोशिश सफल नहीं हुई क्योंकि सारिका कहने लगी कि पर उनकी कहानियों में पुरुष का पक्ष भी रखा गया है। फिर झेलना तो नारी को ही ज्यादा पड़ता है। हमने आगे कुछ नहीं कहा-चुपचाप दूसरों की सारी तारीफ झेल गये।

एक दूसरे की रचना-प्रकियाओं पर भी बात हुयी। पहले मैं भी कागज में लिखता था लेकिन धीरे-धीरे मामला पेपरलेस होता
गया। शुरुआत दोनों लोगों ने ही अभिव्यक्ति में रविरतलामी का लेख पढ़कर की। मतलब यह कि अगर किसी को हमारे ब्लाग से कोई तकलीफ हो तो रवि रतलामी को कोस सकता है।

मैंने कहा कि तुम्हारी कुछ कविताओं की जिन लाईनों की मैं तारीफ करना चाहता था दूसरे लोग पहले ही उनकी तारीफ कर चुके हैं। थे । इसलिये नहीं की तारीफ। सारिका ने कहा तो कुछ नहीं इस पर लेकिन लगा कि कहना चाहती थीं कि ज़रा जल्दी विचार बनाकर तारीफ किया करें।मुझे बताया गया कि मेरा दीवारों का प्रेमालाप बहुत पसंद किया लोगों ने । तो मैंने बताया - निहायत चलताऊ अन्दाज में शुरु किया गया वह लेख बस यूं ही लिख गया था। अनूप भार्गव की कविताओं से लंबाई मिल गयी। बहरहाल मेरा यह विचार भी बना कि ज्यादा सोच-विचार के लिखने से लेख अच्छा हो जायेगा यह भ्रम रखना फिजूल है। इस बात पर साथी लोग विचार करें खासकर इंद्र अवस्थी जो अभी तक बचपने में ही अटके हैं।
अगर किसी को हमारे ब्लाग से कोई तकलीफ हो तो रवि रतलामी को कोस सकता है।


मां-बेटी
मां-बेटी
बातें और तमाम सारी हुईं । सारिका -वेंकट परिणय के बारे में भी जानकारी मिली। दोनों के गुरुजी ने एक-दूसरे के अनुरुप देखकर इनकी शादी कराई। बिना किसी ताम-झाम दान-दहेज के।
विभिन्न रुचि-स्वभाव रखने के बावजूद खुशहाल मियां-बीबी को देखकर लगा कि देश को ऐसे आदर्श गुरुओं की जरूरत हैं जो ताम-झाम,दान-दहेज के बिना शादी कराकर समाज को नयी गति दें।बातचीत में कबसमय सरक गया पता ही नहीं चला।राजधानी एक्सप्रेस प्लेटफार्म पर आ खड़ी हुई। सामान लेकर हम पास के ही केबिन में लपके। हालांकि कुली था फिर भी हमने सबसे हल्का झोलापकड़लिया।

डिब्बे के पास सारिका के भाई ने कहा-लाइये मैं पकड़ लेता हूं। मैंने कहा अब क्या यार,गाड़ी तक ही पहुंचा देता हूं। सारिका बोली -आप लिखेंगे कि सारिका ने मुझसे झोला उठवाया। मैंने कहा -नहीं ऐसा कुछ नहीं । यह सब भी कोई लिखने की बातें हैं? इसीलिये इस बारे में कुछ नहीं लिखा गया।

ट्रेन चल दी। हम कानपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नम्बर छह पर हुयी ब्लागर मीट की तमाम यादें सहेजे लौटे। जो याद रहीं वे यहां लिख दीं। रास्ते भर हमें अगले दिन जीतेन्द्र से संभावित मुलाकात का 'पिलान' बनाते रहे।

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Saturday, July 16, 2005

बदरा-बदरी के पिछउलेस


लू के थपेड़ों से आहत ,बिजली के वियोग में विरहाकुल ,सूखा-राहत घोटाले की खबर वाले अखबार को अंपायर डेविड शेफर्ड के ‘चउआ’ वाले अंदाज में लहराकर पसीना सुखाते हुये कविवर चकाचक बनारसीकी नज़र अचानक आसमान की तरफ गई तथा उनका मन-मयूर नृत्य करने लगा। लुगाई पूछिस – का हो रउआ ! केकरा के देखके चमकत बाटी? चकाचक बनारसी बोले-
बदरा-बदरी के पिछउलेस,
सावन आयल का!
खटिया चौथी टांग उठइलेस,
सावन आयल का!
(बादल ने बदली का पीछा किया ,खटिया ने अपना चौथा पैर उठा लिया लगता है सावन आ गया)बादल और बदली चूंकि दोनों काले थे अत: इस बात का कोई खतरानहीं रह गया था कि बदली चिट्ठा लिखेगी ये मुआकलुआ मुझे छेड़ रहा था। वो छेड़ने लगा ,ये छिड़ने लगी। गर्मी बिछड़ने लगी।झमाझम बारिश होने लगी।बादल जब बरसते-बरसते हांफने लगा तो काम पर लगा दिया बरखा रानी को:-
बरखा रानी जरा जम के बरसो!
पानी बहुत देर तक सुकूनदेह विदेशी पूंजी सा खुशनुमा अहसासदेता रहा। फिर उसने छत पर व्यवस्था की दरारें टटोल लीं। उनके माध्यम से घर में दाखिल हो गया। सारा देशी ताम-झाम अस्तव्यस्त कर दिया। अपने घर में ही हम अपने रहने की जगह तलाशने लगे। उधर सन्नी देओल कह रहे थे-बनना है तो बनो अंदर से स्ट्रांग, पहनो लक्स कोजी बनियान । पता नहीं कमजोर अर्थव्यवस्था वाले देश अपनी-अपनी अर्थव्यवस्था को लक्स-कोजी बनियान क्यों नहीं पहना देते।
शहर में जब भी पानी बरसता है सड़कें भर जातीं हैं। मिट्टी पहले ही मौजूद रहती है। दोनों के संयोग से जो दिव्य पदार्थ बनता है वह कीचड़ के नाम से जाना जाता है। पहले सड़कों के किनारे नालियां पायीं जाती थीं। अब वे सारी नालियां हड़प्पा संस्कृति का अंग हो गयीं हैं। फुटपाथ तथा सड़क का सीधा संबंध स्थापित हो गया है। कुछ वैसे ही जैसे ‘एमवे’ पदार्थ की बिक्री में उत्पादनकर्ता तथा उपभोक्ता की हाटलाइन जुड़ी होती है। लगभग सारी सड़कें बरसात के ऐन पहले अपना मेकअप बजरी -तारकोल से करती हैं। बरसात बीतते -बीतते यह मेकअप भी पुछ जाता है। नेताजी वैसे भी कहते हैं कि सड़के हेमामालिनी के गाल जैसी बनवायेंगे।ये बारिश का मौसम कुछ शूटिंग टाइप का होता है जिसमें सड़कें हीरोइनों की तरह मेकअप करती हैं। शूटिंग खतम-मेकअप हजम।असल में सड़कें भी स्वाभाविक रहना चाहती हैं। बारिश का आगमन उनके लिये अतिथि का आगमन होता है। तब दिखाने के लिये बजरी का मेकअप करती हैं। बरसात गयी, बजरी की बात गयी। मेहनतकश सड़क के चेहरे पर गढ्ढे उभर आते हैं।
सड़क तथा गढ्ढों का बहुत पुराना याराना लगता है। अटलबिहारीजी कहा करते हैं-यहां पता नहीं चल पाता कि सड़क पर गड्डा है या गढ्ढे में सड़क है।कुछ इलाकों में तो पानी इतना भर जाता है कि थोड़ा प्रयास करके साल भर की जरूरत भर का पानी इकट्ठा किया जा सकता है। तरणताल बनाने की सोची जा सकती है। अब सरकार से कोई उम्मीद करना तो ठीक नहीं लिहाजा जनता जागरूक हो रही है। जागरूक जनता प्रयास करती है कि शहर को जो पानी वरूण देवता ने इनायत किया वह कहीं गलती से बच गयी नालियों में न चला जाये। इसके लिये लोग यथा संभव प्रयास करते हैं कि नालों तक पानी को ले जाने वाली नालियों का समय रहते संहार कर दिया जाये। इस सद्प्रयास के चलते ऐन नालियों के ऊपर निर्माण कराना पड़ता है उन्हें। पहचान बनी रहे इसलिये निर्माण में नालियों की ईंटोका प्रयोग करने के बाद ही ईंट के भट्टे का पता पूछते हैं। नालिंयों के संहार के बावजूद कुछ राणा सांगा टाइप नालियां बची रहती हैं जो सैकड़ों झटके खाने के बावजूद आजादी का झण्डा फहराती रहती हैं। ऐसी सिरफिरी नालियों का मुंह बंद करने के लिये मलबे तथा मोमियां (पालीथीन) की खुराक उनको नियमित दी जाती है। मोमिया चूंकि सड़क पर घूमती गाय भी खाती हैं आनन्दातिरेक से ,लिहाजा नालियां भी संकोच नहीं करतीं इस प्रसाद को ग्रहण करने में। जैसे ही वे इसे ग्रहण करती हैं उनका मुंह बंद हो जाता है।
ऐसा नहीं कि बारिश में सबकुछ बंद ही हो जाता है। कुछ जगहें हैं जो हर मौसम में बाहें खोले आपको अपने पहलू में समा लेने को आतुर होती हैं।जब सड़क के किनारे की नालियां पानी तक को अपने दिल में जगह देने से इंकार कर रही होती हैं तो इन्ही निष्ठुर नालियों से चंद कदम दूर कुछ जगहें अपना दिल हाथियों तक के लिये खोल के रखती हैं। इन दरिया दिल जगहों को लोग मेनहोल के नाम से जानते हैं। पहले इनके मुंह बंद रहा करते थे। अब अर्थव्यवस्था की देखादेखी ये भी मुक्त हो गये हैं। लोहे के गोल ढक्कनों से इन मेनहोलों की मुक्ति दिलाने वालों में ,दम मारो दम का नारा लगाने वाले बेदम टाइप ,हिप्पी समुदाय के लोगों का खासा योगदान है। बंधन के प्रतीक इन लोहे के ढक्कनों को ये लोग कौड़ियों के भाव बेच देते हैं तथा पायी गयी कौड़ियों को पाप का धन समझकर तुरंत ठिकाने लगाने के लिये जिस कालकूट का सेवन करती है उसे दुनिया स्मैक के नाम से जानती है। भारत की पुलिस अगर किसी चीज से डरती है तो इन क्रान्तिकारी स्मैकियों से। ये ऐसे मेहमान हैं जिनका रखरखाव करने में पुलिस बेहद बिखर जाती है।
यह बारिश का मौसम ही कुछ ऐसा है लोगों को बेईमान बना देता है। ‘आने वाला फिर कोई तूफान है’ सुनकर ऐसा लगता है कि तूफान शायद विश्व बैंक की कोईसहायता राशि है जिसके आगमन पर स्वागत गीत गाया जा रहा है। मन की बेईमानी की इंतहा हो जाती है जब लोग पत्नी में माशूका की देखने लगते हैं। सारे पेड़ कट जाने के बावजूद बालिकायें झूला-गीत गुनगुनाने लगती हैं। हमारे एक मित्र जो बोलने तक में शरमाते हैं अपने को वर्षा की बूंदों से सुरक्षित करके बच्चों को समेट के(खुद के कान बंद करके ) गुनगुनाने लगते हैं:-
“…मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन
वो कागज की कस्ती ,बारिश का पानी।”
हम बोले -काहे भइया अंदर बैठ के रो रहे हो। वैसे ही पानी घर में घुस रहा है तुम नयननीर से बाढ़ की आशंका काहे बढ़ा रहे हो ? बाहर बारिश में भीगते हुये गाओ। वे बोले -यार ,मन तो बहुत कर रहा है पर सबेरे आफिस जाना है।छुट्टियां खतम हो चुकी हैं। कहीं ज्यादा भीग गया तो कल आफिस जाने में लफड़ा होगा।
पर लफड़ा कहां नहीं है? गंगा बैराज जो बना था पानी की उपलब्धता तथा बाढ़ को रोकने के लिये वह ढहने का मूड बना रहा है। पतित पावनी गंगा लगता है अब भरोसे लायक नहीं रहीं। पांच करोड़ रुपये का घपला नहीं सह पायीं। थोड़ी मिट्टी कम पड़ी तो इसका मतलब यह थोड़ी कि अपनी धारा ‘ रिवर्स स्वीप ‘ की तरह मोड़ दो और सारे घाटों तथा कटरी के गांव डुबो दो। जब गारन्टी पीरियड में यह हाल है मैया तो आगे क्या गुल खिलाओगी? बाढ़ में बहा दिया ,गर्मी में सुखा दोगी। आपको यह व्यवहार शोभा नहीं देता । करना न पड़ गया सस्पेंड बिचारे मुख्य अभियंता को महजपांच करोड़ रुपये के लिये।इतना जरा सा घपला नहीं हजम कर पायीं। बहुत कमजोर है आपका हाजमा। आपको तो स्ट्रांग बनना पड़ेगा।अगर आपको भी बनना है तो अंदर से बनो स्ट्रांग,पहनो लक्स कोजी अंडरवियर -बनियान।

3 responses to “बदरा-बदरी के पिछउलेस”

  1. sanjay vidrohi
    फ़ुरसत से आपको पढा… मजा आ गया..
    -सँजय विद्रोहि
  2. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] बाल गिरते क्यों हैं? [...]
  3. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] बाल गिरते क्यों हैं? [...]

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Friday, July 08, 2005

तुलसी संगति साधु की



नारदजी को इस बार ज्यादा नहीं झेलना पड़ा।ज्योंही वे स्वर्ग के प्रवेश द्वार पर पहुंचे, दरबान से लपककर मुख्यद्वार खोला। दरवाजा जिस तरह चरमराता हुआ खुला उससे बहरे भी अनुमान लगा सकते थे कि हाल-फिलहाल यह दरवाजा बहुत दिनों से नहीं खुला। मतलब पिछले काफी समय से यहां कोई आया नहीं था। नारदजी बड़ी फुर्ती से विष्णुजी के चैम्बर की तरफ बढ़े । दरवाजे में खड़े द्वारपाल ने एअर इंडिया के महाराजा की तरह झुकते हुये सलाम किया । नारदजी सलाम का जवाब देने के पहले दरबान को बगलिया कर अंदर प्रविष्ट हो गये थे।कुर्सी पर बैठने से पहले उन्होंने विष्णुजी से ‘मे आई कम इन सर’ कहा तथा चेहरे पर ‘सिंसियरिटी’ चिपका ली।विष्णुजी नारदजी से मुखातिब हुये।
पृथ्वीलोक की बढ़ती दुर्दशा का हौलनाक वर्णन करने लगे नारदजी। विष्णुजी भी अपने संस्मरण ठेलने लगे। एक बारगी तो लगा कि दो प्रवासी चिट्ठाकार सप्ताहांत में देश की दुर्दशा पर विचार कर रहे हो-’प्लीज्ड टु डिसकस द पैथेटिक कंडीशन आफ मदरलैंड’ टाइप।
अचानक विष्णुजी बोले-नारदजी ,ऐसी हालत किसलिये हुयी पृथ्वी की? क्या उसके सुधार के कोई उपाय नहीं हैं। नारदजी ने पहले तो खुद को शातिर सरकारी कर्मचारी की तरह बचाते हुये कहा -इसमें मेरा कोई दोष नहीं है। पर जहां तक मेरी समझ में आता है तो कारण समझ में यही आता है कि पृथ्वी पर पाप बहुत बढ़ गया है। अब आप अपनी अलाली त्यागकर अगला अवतार लें। दुष्टों तथा पाप का नाश करें। विष्णुजी अचकचा गये -यार ये संहार करने पर पता नही किस देश में कौन सी दफा लग जाये! उसके बारें तो सोचना पड़ेगा। हां ,ये बताओ कि कोई ‘शार्टकट’है जिससे पाप नष्ट हो जायें- पृथ्वी पर मेरे बिना जाये । क्या इसकी आउटसोर्सिंग हो सकती है?
इंद्र-प्रभा
इंद्र-प्रभा
नारदजी आंखे मूंदकर काफी देर तक कुछ बोले नहीं। सोचने की आड़ में हल्की झपकी लेकर बोले-महाराज,मैं किसी को बताता नहीं पर आप पूछ रहें है तो बताता हूं कि अपराध/पाप को नष्ट करने का सबसे मुफीद उपाय है सत्संगति।
साधु पुरुष के साथ पल मात्र रहने से करोड़ों पाप नष्ट हो जाते हैं। कहा गया है:-

एक घड़ी ,आधी घड़ी, आधी में पुनि आधि,
तुलसी संगति साधु की हरै कोटि अपराध।

साधुओं के बारे में सुनते ही विष्णुजी का चेहरा लटक गया। लगा कि पेरिस का कोई बासिंदा ओलम्पिक की मेजबानी न मिलने की वजह से चेहरे पर मुहर्रम धारण कर बैठा हो। बोले -यार ,यहां साधु कहां खाली हैं?सबरे तो लगे हैं राममंदिर बनवाने में। पता नहीं कब मंदिर बनेगा ,कब वे खाली होंगे। जो हालात हैं उससे तो मुझे मुगलेआज़म फिल्म का डायलाग याद आता है-अनारकली! सलीम तुझे मरने नहीं देगा ,हम तुम्हें जीने नहीं देंगे। कुछ और ‘टू मिनट्स नूडल टाइप’ उपाय बताओ।
इस पर नारदजी ने कहा -महाराज मैं आपकी पृथ्वी से पाप नाश के लिये किये गये प्रयासों से अविभूत हूं। अपनी शेषशैया पर लेटे-लेटे आपने जो मेहनत की वह वर्णनातीत है।कहा जाता है कि संतसमागम सुनने से भी उतना ही लाभ होता है जितना करने से। यह संयोग ही है कि हाल ही में भारतवर्ष में गंगा नदी के तट पर स्थित कानपुर नगर में दो सत्पुरुओं का मिलन हुआ। यह मेरा तथा आपका भी सौभाग्य हैठेलुहा औरफुरसतिया नाम से जाने जाने वाले इन महापुरुषों की भेंटवार्ता का विवरण मेरे पास उपलब्ध है।मैं आपके कमर दर्द को भुलाने तथा पृथ्वी पर पाप नाश के लिये पृथ्वीलोक पर ही हुये इस अनूठे संतसमागम का आंखों देखा हाल सुनाता हूं ।
विष्णुजी ध्यान से सुनने का उपक्रम करते हुये बोले- यार नारद,हो सके तो इनमें से किसी संत का ही लिखा वर्णन सुनाओ, तुम्हारा लिखा सुनने से कुछ बोरियत सी होती है।
सो नारद जी ने हमको फोनियाये तथा अनुरोधियाये -भैया जरा जल्दी संत समागम विवरण भेज दो। ये भगवानजी,बिना सुने हमें जीने नहीं देंगे।
मौसम भयंकर गर्मी का चल रहा था लिहाजा हम नारदजी के अनुरोध पर फौरन पसीज गये।पसीजने पर हमने जो विवरण भेजा उन्हें उसकी एक प्रति हमारे पास रह गयी जिसे कि यहां जस का तस प्रस्तुत किया जा रहा है:-
अनूप-इंद्र-प्रभा-सुमन
अनूप-इंद्र-प्रभा-सुमन
अतुल-रमणकौल-स्वामी समागम सूचना से हमारी पहली हिंदी ब्लागर मुलाकात की योजना पर पानी फिर गया। मन किया कि अवस्थी को अपने पास से टिकट खरीद कर दे दें कि चले जाओ अब क्या बचा है यहां पर?दो दिन पहले आ जाते तो हमको गौरव मिलता पहली ब्लागर मीट का। पर ये बताकर आये हुये अतिथि थे। कैसे भगा देते! और क्या हमारे भगाने से ये भाग जाते?
बहरहाल जो हुआ उसपर रोने से कुछ फायदा नहीं। लिहाजा हम मजबूरन खुशी के सागर में कूद गये,तैरने की कोशिश की पर बाद में डूब गये।
अवस्थी सपरिवार आये। मेरे घर के पास ही उनके मामा रहते हैं। वो साहित्यिक रुचि के हैं। जब कोई नहीं पढ़ता मेरा चिट्ठा तो मैं उनको पढ़ा देता हूँ। बड़े भले पाठक हैं। भरोसेमंद। कहां मिलते हैं ऐसे पाठक आजकल जो आपका सारा लिखा हंसते-हंसते झेल जायें। वैसे अच्छे श्रोता होने के पीछे कारण यह भी है कि ये बहुत अच्छे वक्ता भी हैं ।ढेरों कवितायें-किस्से सुनाते रहते हैं। स्वरचित तथा पररचित। बिना बदनाम हुये सुनाने के लिये सुनने की आदत बहुत ज़रूरी होती है।
चूंकि मुलाकात दो साल बाद हुयी थी उसमें भी पत्नियों की आपस में पहली भेंट थी लिहाजा दोनो एक दूसरे को बढ़-बढ़कर खिंचाई करने में जुटना पड़ा। सारे हथियार चुक जाने के बाद जब मामला टाई सा होता लगा तब तक कैसेट बजने लगा-
“दो सितारों का मिलन है जमीं पे आज की रात “
आओ तुमको एक गीत सुनाते हैं
आओ तुमको एक गीत सुनाते हैं
खानपान के बाद फिर गाना-बजाना हुआ। मुझे छोड़कर सभी लोगों पर तानसेन की आत्मा आ गयी। गाने कुछ कम लगे तो लंदन फोन किया गया अमरनाथ उपाध्याय को कि तुम्हारी भाभियां तुम्हारा बहुहूटित गाना ‘राही मनवा दुख की चिन्ता क्यों सताती है’ सुनना चाहती हैं।सुना डालो खुद फोन करके।हम काट रहे हैं इधर से।
उपाध्याय पर फोन मिलाते-मिलाते समझदारी के कीटाणु प्रवेश कर गये थे। आमतौर पर वे अपना गाना जबरियन सुनाने के लिये जाने जाते हैं। श्रोताओं की मांग पर गाकर वे अपनी वर्षों की बनी-बनाई छवि नहीं तोड़ना चाहते थे। लिहाजा वे गाने से साफ मुकर गये।अपना शराफत का ग्राफ उचका लिया।
हमने सबसे कम अशांति फैलाई।केवल एक कविता सुनाई। फिर हमें लगा कि हम अनजाने में सस्ते में निपट गये। रात के तीन बज गये थे गाते-बजाते-बतियाते-गपियाते ।पर हमने सोचा कि जो सुरीले लरजते गाने हमें झेलाये गये उनका बदला चुकाना जरुरी है ।लिहाजा मैंने प्रमोद तिवारी की कविता -‘आओ तुमको एक गीत सुनाते हैं’ का कैसेट चला दिया। कालान्तर में सबलोग निद्रागति को प्राप्त हुये। मेरा बदला पूरा हो गया।
कौन कितने पानी में है
कौन कितने पानी में है
सबेरे जब हम उठे बालकगण ठुनके कि हम लोग तो स्वीमिंग पूल जायेंगे।आमतौर पर अकेले में दुर्वासा सा व्यवहार करने वाले पिता भी दूसरों के सामने बहुत उदार हो जाते हैं फिर हम तो पैदाइसी उदार ठहरे ।बच्चों को ले जाकर ठेल दिया स्वीमिंग पूल में। बच्चे तैरने लगे। हम गपियाने लगे। कल जो बाते रह गयीं थी वहीं से शुरु किया गया। सारे चिट्ठाकारों को कृतार्थ किया गया। सबके बारे में ठेलुहई का फ्लेवर लगाकर कमेंट किये गये। अब क्या कमेंट किये गये यह लिखा जायेगा तो डर है कि संबंधित लोग समझने की कोशिश करेंगे। जहां यह प्रयास किया जायेगा वहीं भभ्भड़ मच जायेगा लिहाजा दिल की तमाम हसरतों को कुचलते हुये सारे कमेंट्स को सेंसरियाया जा रहा है(यह दिन भी देखना बदा था!) ।
हम स्वीमिंगपूल के किनारे बैठे बालकगणों को ब्लाग पर टिप्पणियों की तरह उछलते देखरहे थे।देश-दुनिया की हांकरहे थे। लौटकर हम नास्ता टूंग ही पाये थे कि अपने परिवार से बहुत कम समय की मोहलत मांगकर आयेगोविंद उपाध्याय नमूदार हुये।
गोविंद,इंद्र तथा अनूप
गोविंद,इंद्र तथा अनूप
गोविंदजी आजकल मेरे बचपन के मीत टाइप लंबी सस्मरणनुमा कहानी लिखने में लगे हैं। आधी हकीकत -आधा फसाना। उसी की पहली किस्त मुझे देने आये थे।चिट्ठे या निरंतर में लिखने के लिये। अभी तक उसे टाइप नहीं किया जा सका है।
जाहिर है कि इंद्र-गोविंद एक दूसरे से मिलकर बहुत खुश हुये। पर यह खुशी बहुत देर तक कायम न रह सकी। उपाध्यायजी मुझको लेख देकर दो मिनट में वापस जाने वाले थे लेकिन जब हमारे यहां से गये तो समय आधे घंटे से ज्यादा सरक चुका था।
मामाजी
मामाजी
खान-पान के बाद आराम करते हुये हम फिर नये दौर के वार्ताक्रम में पहुँचे।मिलन स्थल अवस्थी के मामा का घर। लेटे-अधलेटे गपियाना शुरु हुआ विषय सारे दुनिया जहां की बातें।
अचानक हमें लगा कि कुछ तकनीकी वार्तालाप भी किया जाये।तो हमने पूछा जरा बताओ ये ‘पुलकोट’ का जुगाड़ कैसे करते हैं ब्लाग में।हमने यह भी बताया किदेवाशीष बता चुके हैं लेकिन हम कर नहीं पाये। अवस्थी उवाचे-तुम जरूर समझ गये होगे इसीलिये कर नहीं पाये।पुरानी आदतें छोड़ो समझने की। करने की आदत डालो। फिर अवस्थी ‘सोर्स’ तलाशते रहे लेकिन देर हुयी कुछ हुआ नहीं तो मुझे डर लगा कि कहीं इनको भी समझ में न आ जाये-फिर कर ही न पायें। पर कुछ देर बाद ‘लैपटाप’ पर नगाड़ा सा बजा तो हमें लगा गया हमारा ‘लैपटाप’। पर दूसरे ही क्षण हम खुश हुये।’लैपटाप’ अवस्थी का था तथा ‘पुलकोट’ की गुत्थी सुलझ गयी थी।
देवांशु-अनन्य
देवांशु-अनन्य
फुरसतिया पर तो हमने कर लिया पर हिंदिनी पर करते-करते हमारे स्वामीजी लगता है साल बिता देंगे। पता नहीं ये ज्ञानी लोग अपना सारा ज्ञान कब उड़ेलेंगे किसी सार्वजनिक स्थान पर। अगर अतुल अपना फोटो चिपकाने का तरीका खुलासा किये रहे होते तो ये फोटो एक जगह मिलते। इधर-उधर मारे-मारे न फिरते -भारत की ‘अनेकता में एकता’ की तरह।ज्ञानीजन की ज्यादा बुराई करते हुये भी डर लगता है। अभी दस ठो लिंक थमा देंगे अंग्रेजी के ‘ट्राई दिस’ करके। अंग्रेजी वैसे भी बड़ी कड़ी भाषा है -बकौल हमारे एक वरिष्ठ अधिकारी,तीन बार पढ़ो तब कहीं कुछ समझ में आती है।
तकनीकी खुराफात के बाद हमें फिर लगा कि यार हम पहली मीट करते करते रह कैसे गये। पहले सोचा गया कि जांच के लिये उच्च स्तरीय कमेटी का गठन किया जाये। पर यह सोच हमें निम्नस्तरीय लगी लिहाजा खारिज कर दी गयी। फिर लगा कि हम कुछ और नया कर लें जो पहली बार हुआ हो। तय हुआ कि हिंदी-अंग्रेजी ब्लागर मीट की जाये। जहां हमने यह प्रस्ताव किया अवस्थी सहम से गये। कांपते हुये पूँछा- तो क्या तुम अब अंग्रेजी में भी ब्लाग लिखोगे?
हमने आश्वस्त किया -घबराओ नहीं हम इतने निष्ठुर नहीं कि अपनी वह अंग्रेजी सुहृदय लोगों को झेलायें जो हम खुद झेलते हुये डरते हैं।
फिर हमने खुलासा किया कि पड़ोस में हमारे साथी रहते हैं। दोनों मियां- बीबी अंग्रेजी में ब्लाग लिखते हैं। मुलाकात करते हैं तो पहली अंतर्राष्ट्रीय हिंदी-अंग्रेजी ब्लागर मीट हो जायेगी।सच्चे मन से जो चाहा जाता है वह होकर रहता है यह फिर सच साबित हुआ जब दस मिनट के भीतर हम हिंदी-अंग्रेजी के अंतर्राष्ट्रीय ब्लागर चाय-पानी करते हुये समोसे टूंग रहे थे।
पहिला हिंदी-अंग्रेजी ब्लागर मीट
पहिला हिंदी-अंग्रेजी ब्लागर मीट
इस बीच ठेलुहे मैया मोरी चंद्र खिलौना लैंहों के अंदाज में कहने लगे कि वह सुरसा की मूर्ति दिखाओ जिसकी नाक में तुम उंगली करते थे।हम थोड़ा नखरे के बाद मान गये। गये घटनास्थल । मूर्ति मुस्करा सी रही थी । गोया कह रही हो -तुम आये इतै न कितै दिन खोये?
सुरसा
सुरसा की मूर्ति
अब अवस्थी को कुछ-कुछ होने लगा। बोले -यार,चलते हैं किसी कैफे में बैठ के थोड़ा इंटेलेक्चुअल से हो जायें। हमने कहा -एक कैफे के मालिक ने तुम्हें देखकर अपने दुकान बंद कर ली थी । फिर कैफे जाने का मन बना रहे हो? ठेलुहे बोले,चलो यार बिना कैफे गुजारा नहीं। सो हम पहुंचे कैफे -०५१२ । जी हां कैफे का नाम है- ०५१२ जो कि कानपुर का एस.टी. कोड है।
करीब एक घंटा वहां बैठने के बाद हमने चाय-पान किया। ऊलजलूल बतियाये। फिर हमने अपने मित्र चतुर्वेदीजी को भी बुला लिया इस शिखर वार्ता में शरीक होने के लिये। वे पास ही रहते हैं। आने में कुछ देर हो गयी। हम बाहर आ गये। बेयरे को पैसे -टिप देकर।बाहर हम आती-जाती सर्र से निकल जाती गाड़ियों को बेवजह ताकते रहे। तब तक बेयरे ने अंदर से बाहर आकर अवस्थी को उनका कैमरा थमाया कि साहब ,इसे आप शायद गलती से छोड़ आये हैं। साथ में लेते जाइये।हमें लगा कि यह तो एक पोस्ट भर का मसाला हो गया ।शीर्षक भी तय हो गया -भारत में ईमानदारी अभी भी जिंदा है। हम अपनी योजना को तुरंत अंजाम देने के इरादे से काम भर की बेचैनी से दायें-बायें ‘कैफे’ तलाशने लगे। तब तक सड़क पर चतुर्वेदीजी अवतरित हुये। चूंकि चतुर्वेदीजी देरी से आये थे। हमसे बुजुर्ग भी हैं। लिजाहा उनको सजा सुनाई गयी कि वो किसी दूसरे रेस्टोरेंट में चाय पिलायें। हम दो थे ,वे अकेले थे।लिहाजा बहुमत जीता तथा थोड़ी देर में हम हीरपैलेस के सामने क्वालिटी रेस्तरां के मीनू को सरसरी निगाह से देख रहे थे।
चतुर्वेदीजी
चतुर्वेदीजी
फिर वार्ता का दौर चला। कुछ बात चली तो अचानक रिंगमास्टर की याद सताने लगी।हम मोबाइल तथा नंबर टटोलते पाये गये। अगले ही पल पूना से देवाशीष की आवाज आ रही थी -क्या हो रहा है ,अनूप भाई? हम बोले जो नहीं होना चाहिये वह हो रहा है। मैंने मजाक में कहा था यह पर यह सच साबित हुआ जब देखा गया कि हमारे मोबाइल से जो नंबर हमने मिलाया उस पर अवस्थी बतियाने में जुटे थे।
बहरहाल उठते-उठते रात काफी हो गयी थी ।जब हम घर पंहुचे तो चिट्ठाकारी जगत में नये आयाम जुड़ चुके थे। हिंदी-अंग्रेजी ब्लागर-(परिवार)कथाकार-पाठक-संयोजक मीट संपन्न हो चुकी थी। बहुत संक्षेप में कही गयी कहानी । थोड़ा कहा बहुत समझना। फिर मिलने की कोशिश करना।
इतना बता कर नारदजी जब सांस लेने को रुके तो विष्णुजी के चेहरे पर ये दिल मांगे मोर का इस्तहार सा चिपका था। पर नारदजी ने किसी काइयां संचालक की तरह बोले-आगे की कहानी नान-कामर्शियल ब्रेक के बाद!
अफवाह यह भी है कि विष्णुजी नारदजी को अकेले में ले जाकर पूंछते पाये गये-हिंदी में चिट्ठा कैसे लिखते हैं?

178 responses to “तुलसी संगति साधु की”

  1. Atul
    जय हो गुरूदेव
    इस सफल सम्मेलन और हिंदी-अंग्रेजी ब्लागर-(परिवार)कथाकार-पाठक-संयोजक मीट पर बधाई।
    कुछ लाईने तो बस ऐसी है कि आफिस में होने की वजह से कुलकर नही हँस पा रहा।जैसे बच्चो का ब्लाग टिप्पणी की तरह उछलना,अकेले में दुर्वासा सा व्यवहार करने वाले पिता तस्वीरो का समागम और नारद विष्णु का आगाज। वैसे आप जांच के लिये उच्च स्तरीय कमेटी का गठन करने में सकुचाईये नही, हमरे पास तो वीडियो भी है जो आजकल भारत मे तहलके करने के काम आ रहा है। वह क्या कि रमण भाई निरंतर टीम के बारे मे कुछ कह रहे थे और हमने रिकार्ड कर लिया, अब एक तो उनका इसे आफ द रिकार्ड रखने का अनुरोध दूसरा अभी वीडियो को ब्लाग पर ठोकने का यँत्र बनाने का आलस्य इसे सार्वजनिक करने से रोके है। वैसे आप बिना भभ्भड़ की चिंता किये लिहाजा दिल की तमाम हसरतों को मत कुचलए और सारे कमेंट्स को अनसेंसरियाया दीजिए। हमे यकीन है सबको पसँद आयेंगी। अगर कोई कुछ कहेगा तो “हम हूँ ना!”
  2. eswami
    गुरुवर्,
    “पीले वासंती चाँद” के समय से सुरसा की मूरत देखने का मन था सही किया फोटो चेप दिया. आपका बचपन वाला पहला प्यार देख लिए – आप एडमिट नही करो वो अलग बात है. (वैसे सुरसा मूरत के नैन नक्श बहुत तीखे हैं – हा हा!).
    अब दिल की दिल मे क्या रखनी, अँदर का भम्भड पब्लिक किया जाए – अब चेप भी दिया जाए जो लिख के तैयार रखे हो आप, बडी अदा से मनुहार करवा रहे हो, हमारी ही खिँचाई करने के लिए – सही है! देखें जीतू और भार्गव के बाद किसका नंबर है.
    पुल्ल्-कोट का काम बकाया है शायद पँकज भाई/देबाशीष भाई ने निरँतर के लिए कोई स्क्रिप्ट लिखी हो वही मार कर पेल दूँ या आपको कोड ब्लाक भेजूँगा. टोटल आलस चल रहा है इधर! वर्ड-प्रेस के इस इन्स्टालेशन को तो बडी बदतमीजी से कस्टमाईज किए हूँ.
    मीट पर बधाई!
  3. रमण कौल
    मन प्रसन्न हुआ अनूप भाई आप का मिलन देख कर। रिकॉर्ड बनाने के मामले में बेशक आप “ऑल्सो रैन” रहे हों, पर विवरण देने में तो बाज़ी मार ले गए। खैर इस विभाग में तो अपन को उम्मीद भी नहीं थी जीतने की। बहुत ही बढ़िया लिखे हैं। बाकी, जनता की इस माँग में हम भी अपनी आवाज़ जोड़ रहे हैं कि सम्पूर्ण वार्तालाप को सार्वजनिक किया जाए। हम भी अतुल को बन्धन मुक्त कर रहे हैं कि जो छापना है छापो, देखी जाएगी। मैं अपनी अगली भारत यात्रा की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा हूँ, हर शहर में नए दोस्त जो मिल गए हैं।
  4. kali
    बढिया विवरण छापे रहे. करवा लिजिए मनुहार,आपकी ही है आज सरकार.
  5. इधर उधर की » वर्डप्रेस वाले चाट खा रहे हैं
    [...] हैं
    26 जुलाई, 2005
    हमारे चिट्ठाकार मिलनों के बाद बात हो रही है, ब्ल� [...]
  6. des Pardes » Wordpress powered by Indian cuisine
    [...] cuisine
    July 26th, 2005
    We have recently had quite a few blogger meets in Hindi blogdom. Last week came the news of the big WordPress geeks meeting face to face [...]
  7. अक्षरग्राम  » Blog Archive   » लो भाई बनारसी भी आ गये मैदान में
    [...] ��हे नहीं? हम बोले लिखो। वे बोले बताओचिट्ठा कैसे लिखते हैं। बताया गया तो इन्हो� [...]
  8. आलोक कुमार
    वाह ऐसा लगा कि खुद वहीं पहुँच गया हूँ। इतने साहित्यिक लोग एक साथ, मिट्टी में या पानी में कुछ बात होगी ज़रूर।
    अफवाह यह भी है कि विष्णुजी नारदजी को अकेले में ले जाकर पूंछते पाये गये-हिंदी में चिट्ठा कैसे लिखते हैं?
    हँसी रोके नहीं रुक रही।
    वैसे पुलकोट होता क्या है? गुस्ताख़ी माफ़, मगर पल्ले नहीं पड़ा।
  9. पंकज नरुला
    आलोक बाबू
    पुलकोट – यानि pullquote। आप निरंतर के लेखों में देख सकते हैं कि कुछेक अंश अलग से बड़े कर के लिखे गए हैं। यही पुलकोट होता है।
    पंकज
  10. अक्षरग्राम  » Blog Archive   » बड़े भाई साहब को जन्मदिन मुबारक हो!
    [...] ��र रखो मुझे। पर पुलकोट को खीँचते भी दिख गये। अनूप भाई को मेरे रोजनामचा पर [...]
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  14. फ़ुरसतिया » छीरसागर में एक दिन
    [...] अच्छा ! मैंने भी कुछ सुना है ब्लाग के बारे में। नारद से पूछा भी था कि कैसे लिखते हैं ब्लाग लेकिन नारद ने आज तक बताया नहीं। पूरा कोकाकोला का फार्मूला बना रखा है ब्लाग लेखन विद्या को। वैसे महात्मा जी ने लिखा क्या था? कोई कविता-सविता लिखी थी क्या? हमारे तमाम भक्त अक्सर शिकायत करते हैं कि फलाने की कविता पढ़कर सरदर्द हो गया। ढिमाके ने कुछ ऐसा लिखा कि समझ में ही नहीं आया। इसी तरह की कोई चीज तो नहीं लिखी उन्होंने? [...]
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  16. फ़ुरसतिया » अजीब इत्तफाक है…
    [...] हमने आगे कहा- अगर तुम पढ़ते हो तो टिप्पणी काहे नहीं करते? हमारे काबिल दोस्त का जवाब भी वही था जो विष्णु जी का था- हिंदी में ब्लाग कैसे लिखते हैं? यह हाल तब हैं जब हमारा दोस्त नियमित कम्प्यूटर इस्तेमाल करता है तथा मैं उसको उसका ब्लाग बना कर पोस्ट लिखना बता चुका हूँ। बहरहाल ,हम ज्यादा कोस नहीं पाये मनोज को क्योंकि मनोज ने हमारे लेखन की तारीफ करना शुरू कर दी। [...]
  17. हिन्दी ब्लॉगमंडल और बाबा भारती at इधर उधर की
    [...] हिन्दी ब्लॉगरों का समाज भी इसी विश्वास के बल पर चलता है। हम लोग एक दूसरे का लेखन नियमित रूप से पढ़ कर एक दूसरे को जानने-पहचानने से लगते हैं। यही कारण है कि लोग बेखटके एक दूसरे से मिलते हैं, कभी फिलाडेल्फिया में तो कभी कानपुर में, कभी बोलोनिया में तो कभी पुणे में, कभी हैदराबाद में तो कभी न्यू जर्सी में। मुझे गर्व है कि मैं ऐसे पहले चिट्ठाकार मिलन का हिस्सेदार था। इस के अतिरिक्त मैंने अनेकों चिट्ठाकारों से फोन के द्वारा बात की है — भारत, अमरीका, कैनाडा, कुवैत। अगला हिन्दी में लिखने की ज़हमत लेता है, यही अपने लिए उस के नेक इरादों का सबूत है। [...]
  18. वर्डप्रेस वाले चाट खा रहे हैं
    [...] चिट्ठाकार मिलनों के बाद बात हो रही है, ब्लॉग [...]
  19. : …लीजिये साहब गांधीजी के यहां घंटी जा रही है
    [...] कुछ सुना है ब्लाग के बारे में। नारद से पूछा भी था कि कैसे लिखते हैं ब्लाग लेकिन नारद ने [...]
  20. : ये पीला वासन्तिया चांद
    [...] की ढाल उतर के थाना बजरिया के पास एक सुरसा की मूर्ति थी। मुंह खोले बडी नाक वाली। स्कूल से [...]
  21. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] ब्लाग चोरी से बचने के कुछ सुगम उपाय [...]
  22. Manisha Panwar
    मुझे अच्छा लगा
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