Thursday, September 29, 2005

नयी दुनिया में

[जिस तरह से कालीचरण,भोला और रविकामदार जी हमारी यायावरी से प्रभावित व कुछ आतंकित हुये उससे लगा कि इस लेखमाला की एक प्रति प्रधानमंत्री जी के कार्यालय में भेज दूं। जब भी विदेश दौरे पर जायें इसे साथ में लेते जायें। जहां विकसित देशों से बातचीत में कहीं 'अर्दभ' में फंसे, यह लेख पढ़ दें। विकसित देश फौरन 'हीनभावना मोड' में आ जायेंगे। जैसी कि आशा थी ,जीतेन्दर ने इसे अलग से ब्लाग बनाकर लिखने का सुझाव उछाला। उनके सुझाव पर जवाब सुरक्षित है- इसी पोस्ट में। सुनीलजी कुछ डायरी में लिखा है कुछ दिमाग में। खिचड़ी मिलती रहेगी। रवि भाई लेख लिखने शुरु किये हैं,देखें कितने होते हैं। आशीष आओ तुमको अपने संग भी थोड़ी सैर कराते हैं, कुछ किस्से कालेज के सुनाते हैं।]

हां तो हम थे कानपुर में। 28 सितम्बर,1983 को हमें चलना था इलाहाबाद के लिये वापस। हम चले भी और सकुशल पहुंच भी गये। जहां से चले थे वहीं पहुंच गये। पूरे तीन महीने 2 दिन के बाद। यात्रा की कहानी सुनाने के पहले जरूरी है यात्रा की तैयारी के किस्सों के बारे में बताना। उसके लिये चलना पड़ेगा मोनेरेको। मोनेरेको जहां हमने चार साल जम कर मौज-मस्ती की । मजबूरन कुछ पढ़ाई भी करनी पड़ी। यह मजबूरी, आवश्यकता कम, न्यूटन के जड़त्व के नियम के अनुपालन के कारण अधिक थी।

हमारे तमाम दोस्त कालेज की तरफ जाने वाली सड़कों पर जगह जगह मिलते गये। हम वापस लौट आये थे। तमाम अनुभवों के साथ। पर एक अनुभव से हम वंचित रह गये थे इस साल। इस साल हम नये साथियों का स्वागत नहीं कर पाये थे। एक बैच की रैगिंग छूट गयी थी । हमारे बच्चे अपने बच्चों के बाप बन गये थे और हम खुशी में शरीक भी न हो पाये। सड़क नापते रहे। अब समझ में आ रहा है कारण राजेश की शुरुआती कविताओं के भटकाव का तथा बलियाटिक के शाश्वत दुख का। इनके ‘पाटी-पूजन कार्यक्रम’ में कहीं चूक जरूर हुई।

जिनकी रैगिंग छूट गयी उसके लिये वो रोयें। हमारे अनुभव कम थोड़ी हैं रैगिंग के। हमने भी कुछ कम मौज नहीं ली। कुछ किस्से अभी भी याद हैं। ये कुछ किस्से इतने हैं कि शुरु होते हैं तो खत्म होके ही नहीं देते। अभी भी हमारे मित्र नवीन शर्मा से कालेज हास्टल की बात करो तो घंटों बतियाने के बाद तड़फ के कहते हैं -यार याद मत दिलाओ वो दिन। मन ,’नास्टल्जिया’ जाता है। तो कुछ किस्सों में से कुछ दोहराने की कोशिश करता हूं ताकि सनद रहे।

मोनेरेको
मोनेरेको
इंटर के तुरंत बाद हम करना चाहते थे बी.एस.सी.। गुरुजी ने एक दिन पूछा कम्पटीशन की भी तैयारी कर रहे हो कि नहीं बोर्ड की परीक्षा के साथ? कैसी चल रही है तैयारी? तब तक हमें यह तो पता था कि लोग इंजीनियरिंग/मेडिकल कम्पटीशन की तैयारी करते हैं लेकिन ज्यादा जानकारी नहीं थी तथा हम बी.एस.सी. के प्रति आकर्षित थे। जब गुरुजी ने ज्ञान-चक्षु खोले तब हम जगे तथा कम्पटीशन के फार्म भरे। इंटर के तुरंत बाद हमारा मोनेरेको में तथा रुड़की में चयन हो गया । रुड़की में बहुत नीचे नंबर था। लेकिन मोनेरेको में जो रैंक थी उसके हिसाब से किसी भी रीजनल इंजीनियरिंग कालेज में,किसी भी ब्रांच में दाखिला मिल सकता था। हमने यांत्रिक इंजीनियरिंग का पल्ला पकड़ा और पहुंच गये एक नयी दुनिया में।
हमारे तमाम दोस्तों ने अपनी ब्रांच बदली बाद में। कोई सिविल से इलेक्ट्रिकल में गया कोई इलेक्ट्रिकल से कम्प्यूटर में लेकिन हमने जिसको एक बार पकड़ा उसे छोड़के के नया पकड़ने की कभी नहीं सोची चाहे वो ब्रांच हो या ब्लाग या बीबी। सुन रहे हो जीतेन्दर बाबू! क्या नया ब्लाग बनाना जिसकी उमर केवल बीस-पचीस पोस्ट हो? चाहे मुफ्त में बनता हो लेकिन सिर्फ नयेपन के लिये नया ब्लाग बनाना और बीस-पचीस पोस्ट बाद बंद कर देना मुझे तो ब्लाग-हत्या लगता है।

हम पहली बार अपने मां-बाप से दूर हुये थे। लेकिन हास्टल में उनकी कोई कमी नहीं थी। वहां सीनियर अपने को जूनियर का बाप कहते थे। इस नयी दुनिया में हमारे तमाम कुंवारे बाप थे। चंद कुंवारी मायें थी। देखा जाये तो कालेज याहू का कोई चैट रूम था जहां गिनती की फीमेल तथा हर जीव में फीमेल की संभावनायें तलाशते सैकड़ों मेल थे

प्रसंगवश बता दूं कि हिंदी के आदिचिट्ठाकार आलोक के पिताजी हमारे ही गुरुकुल के हैं तथा जूनियर-सीनियर के बीच बाप-बेटे के रिश्ते के नाते हमारे लकड़दादा के लकड़दादा के लकड़दादा लगते होंगे।

नये आने वाले जूनियर उस सद्यजात बालक की तरह थे जिनके गाल कोई भी आता-जाता नोंच जाता है। बिना कुछ किये केवल कैलेंडर बदल जाने के कारण बने बाप ,अपने बच्चों को अथाह प्यार करते थे। संस्कारवान बनाने में महीनों लगा देते। तमाम नये-नये गुर सिखाते। मुझे लगता है कि आज जो कुछ दुनिया में नया-नया पापुलर हो रहा है वह हमारे कालेज की रैगिंग की नकल करके किया गया है। लक्ष्य पिक्चर में जो ऋतिक रोशन फौज में ट्रेनिंग के दौरान भागा-भागी करता है, ‘क्राउलिंग’ करता है वे सब हमारे कालेज की किसी ‘मास रैगिंग ‘ के हिस्से है। बाबा रामदेव जितने आसन सिखाते हैं वे सारी कलाबाजियां किसी न किसी ‘बौद्धिक’ में हम कर चुके हैं। पता नहीं बाबा जी ‘मुर्गासन’, जो हमारे यहां सबसे प्रचलित आसन था, से क्यों परहेज करते हैं!
जिस तरह आज भी भ्रष्टाचार को लोग अपरिहार्य मानते हुये भी बुरी चीज मानने से ऊपर नहीं उठ पाये हैं वैसे ही रैगिंग को भी अनिवार्य बुराई मानते थे। हर बुरी माने जाने वाली चीज रात में ही करनी चाहिये इस रूढ़िवादी विचार से बंधे लोग रैगिंग करने के लिये रात का ही समय चुनते। वैसे रैगिंग के लिये रात का समय चुनने के पीछे कुछ लोग बताते हैं कि बाप लोग दूरदर्शी थे तथा मानते थे कि उनको कुछ बच्चों समेत एक दिन अमेरिका जाना है जहां समय में १२ घंटे का अंतर है।भविष्य के हिसाब से ‘बायलाजिकल कंडीशनिंग’ के लिये रात भर जाग-जगाकर प्रेम-पूर्वक रैगिंग करते थे।

आज से बीस साल पहले देश में छुआछूत का काफी बोलबाला था। सीनियर लोग ब्राम्हणों की तरह रहते तथा जूनियर को अछूत मानकर छूते नहीं थे। सारा प्रेम-प्रदर्शन दूर से होता। रिमोट संचालित थी रैगिंग।अब जब से समाज में छुआछूत की भावना कम हुयी है यहअस्पृश्यता का भाव तिरोहित हो गया है। सीनियर लोग बच्चों से आम मां-बाप की तरह मारपीट करने लगे हैं।

आज ही अखबार में पढ़ा कि किसी कालेज में रैगिंग के दौरान जूनियर की पिटाई की गयी जिससे उसके खून निकलने लगा। रोज तमाम किस्से सुनने में आते हैं।कारण तमाम हो सकते हैं लेकिन सबसे बड़ा कारण मुझे समझ में आता है समय तथा जगह का अभाव।

रैगिंग के प्रति तमाम दुष्प्रचार के चलते इसे बंद करने के तमाम प्रयास होते हैं। इन प्रयासों के चलते बाप लोगों में बच्चों के प्रति अपने प्रेम प्रदर्शन की भावना बढ़ जाती है तथा जहां मिलता है मौका वे सारा प्यार छलका देना चाहते हैं अपने जूनियर बच्चों में। जूनियर को वे चिरविरहणी कामातुर नायिका की तरह दबोच लेते हैं जो कि नायक के प्रति प्रेम प्रदर्शन में उसे घायल करके ही सुकून पाती है।

यह भी पाया गया कि सबसे बीहड़ रैगिंग करने वाले आमतौर वे सीनियर होते हैं जिनको खुद की रैगिंग कराते समय बुखार चढ़ आता था। अपनी रैगिंग के समय फूल की तरह कुम्हला जाने वाले लोग साल बीतते-बीतते जूनियर्स के स्वागत के लिये भटकटैया की तरह तत्पर हो जाते।

संसार समर में जूझने के लिये तमाम कौशल जरूरी होते हैं। नंगई तथा मजबूत फेफड़े इसके लिये जरूरी हथियार होते हैं। नंगई की कला तो को अंधेरे के कपड़े पहनकर दिगम्बर बनकर कुछ दिन में ही सीख जाते लेकिन गाली-गलौज सीखने में कुछ मेहनत करनी पड़ती।

धाराप्रवाह, बहुआयामी गालियां देने में सक्षम बालक काफी काबिल माना जाता। जिस तरह से अंग्रेजी बोलने में सक्षम जाहिल-से-जाहिल शख्स को लोग बिना किसी शक के बहुत काबिल मानलेते हैं वैसे की उर्वर गालियों का सृजन करने सकने वाले को पैदाइसी नेतृत्व गुण संपन्न मान लिया जाता।

इस लिहाज से हमारे तमाम साथी भयंकर नेतृत्व क्षमता से युक्त थे।एक सांस में पचीस तीस बहुआयामी गालियां निकाल देते।वातावरण में भविष्य के प्रति आश्वस्ति के बीज बिखेरते रहते।इधर देख रहा हूं कि बालकों में नेतृत्व क्षमता में भयंकर गिरावट आयी है। मेरा मन डूब सा गया यह सुनकर कि एक बालक से जब धुंआधार गालियां बकने को कहा गया तो शरमाते हुये उसने बका- दुराचारी,भ्रष्टाचारी,अनाचारी। यह कहकर बालक चुप हो गया।

मैं सोचने लगा-हम कौन थे क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी।बीस साल पहले तक बड़े-बड़े विद्वानों,मां-बहन तथा तमाम उत्पादक अंगों को दिन-रात याद करने वालों के वंशज दुराचारियों,भ्रष्टाचारियों की संगति में आ बैठे हैं।गालियों के सामाजिक महत्व के बारे में कोई नहीं है इन्हें बताने वाला?

लेकिन बुरी मानी जाने वाली वस्तु का भी क्या सामाजिक महत्व हो सकता है? मुझे तो लगता है होता है।पता नहीं आप क्या सोचते हैं।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

8 responses to “नयी दुनिया में”

  1. eswami
    बहुत सही जा रही है संस्मरण मेल.
    सच रैगिँग मे मारपीट आदी की खबरेँ सुन कर मन बहुत खिन्न होता है और इसके खिलाफ बने नीयम सख्त ही होने चाहिए.
    मौज मजे के लिए की हुई रैगिँग का रूप और मजा अलग होता है – हमारा एक सीनीयर रैगिँग करते समय इतनी मौज लेता था की जूनियर्स अड जाते थे पहले उसे बुलाओ फिर जितनी चाहे रैगिँग लो!
  2. Vinay
    “लेकिन बुरी मानी जाने वाली वस्तु का भी क्या सामाजिक महत्व हो सकता है? मुझे तो लगता है होता है।”
    सोचने लायक मुद्दा है. आपके स्पष्टीकरण का इन्तज़ार रहेगा. महत्व तो बेशक होता है, क्योंकि अच्छा या बुरा, असर तो होता ही है. पर हर बुरी “माने जानी वाली” वस्तु का सकारात्मक सामाजिक महत्व हो, ऐसा मुझे नहीं लगता.
    बहरहाल, एक और शानदार लेख के लिए बधाई और शुक्रिया.
  3. आशीष
    रैगिँग कुछ बुराइँया जरूर है, लेकिन उसका मजा कुछ और है. जो बाप बच्चो को जितना सताता है, उतनी ही मदद करता है, मार्गदर्शन करता है.
    १२ वी से निकलने के बाद कालेज की दुनिया काफी अलग होती है, इस दुनिया से परिचय कराती है रैगिँग.
    रैगींग किताबी दुनिया से बाहर निकाल कर यथार्थ की दुनिया मे लाती है, हर बच्चा यहीं पर कालेज के तरीके या दुनियादारी सीखता है.
    आशीष
  4. देबाशीष
    रैगिंग के शारीरिक उत्पीड़न के पक्ष ने ही इसे बदनाम किया है। मेरे कॉलेज के समय में भी दो ऐसे किस्से हुए कि लोगों का कान के पर्दे फटे और आँख भेंगी हो गई। एक बार का वाकया याद है, कॉलेज के पास ही एक स्टेडियम था, हम जूनियर भेड़ों की नाई पंक्तिबद्ध हो कर जा रहे थे। जब पहुचें तो सीनीयरों का एक समूह बारी बारी आकर बिना कुछ सवाल किये बस तमाचे जड़ चला गया। आँखे थर्ड बटन पर टंगी थी तो चेहरा तक न देख पाये। रेगिंग का यह वाकया अभी तक ज़ायका बिगाड़ देता है।
  5. फ़ुरसतिया » गालियों का सामाजिक महत्व
    [...] स यूं ही गालियों का सामाजिक महत्व पिछली पोस्ट में मैंने लिखा:- “लेकिन बुरी म� [...]
  6. anitakumar
    रैगिंग का कोई व्यक्तिगत अनुभव तो नहीं है पर जो कुछ समाचार पत्रों में पढ़ा उससे तो रैगिंग के नाम से ही उबकाई आती है। लेकिन यहां पढ़ कर लगता है कि हां रैगिंग अगर आत्मियता से की जाये तो जिन्दगी की शाला में प्रवेश पाने जैसा है
  7. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] पर कविता 14.सैर कर दुनिया की गाफिल 15.नयी दुनिया में 16.हम तो बांस हैं-जितना काटोगे,उतना [...]
  8. : गालियों का सामाजिक महत्व
    [...] पिछली पोस्ट में मैंने लिखा:- [...]

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Sunday, September 25, 2005

सैर कर दुनिया की गाफिल

http://web.archive.org/web/20110926104422/http://hindini.com/fursatiya/archives/53
जिज्ञासु यायावर
अरे यायावर रहेगा याद
आज २५ सितम्बर है। हर साल आता है। पुराने कागज देख रहा था तो पता चला हमारे लिये यह तारीख कुछ ज्यादा ही खास है। जो पुराना कागज मिला वो एक अखबार की कतरन थी। आज से २२ साल पहले के अखबार की कतरन का मजनून कुछ यूं था:-


जिज्ञासु यायावर का कानपुर आगमन


समाचार की कतरन
कानपुर ,२५ सितम्बर। मोतीलाल नेहरू रीजनल इंजीनियरिंग कालेज इलाहाबाद के दो छात्र विनय कुमार अवस्थी (लखीमपुरखीरी) एवं अनूप कुमार शुक्ल (कानपुर) जो साइकिल द्वारा १ जुलाई को भारत भ्रमण पर निकले थे, आज प्रात: झांसी से कानपुर पहुंचे। इन छात्रों का ‘गांधीनगर’ में जोरदार स्वागत किया गया। अभी तक इन्होंने ६९०० किमी की दूरी तय की है। बिहार,पश्चिम बंगाल,उड़ीसा, महाराष्ट्र ,गोवा, मध्य प्रदेश की यात्रा पूरी करके वे अब कानपुर से लखनऊ के लिये २८ सितंबर को प्रात: ७ बजे प्रस्थान करेंगे। ये छात्र प्रतिदिन लगभग १२० किमी की दूरी २० किमी प्रतिघंटा की चाल से तय करते हैं। इनकी इस साइकिल यात्रा का मुख्य उद्देश्य विभिन्न प्रान्तों की भिन्नता का अध्ययन एवं विभन्न वर्ग के व्यक्तियों से साक्षात्कार करना है।
ये अखबार की कतरन और ऊपर की फोटो देखकर २२ साल पहले की यादें ताजा हों गयीं।स्मृतियां हल्ला मचाने लगाने कि हमें भी बाहर निकालो। अतुल जब उधर हाईवे पर गाड़ी दौड़ा रहे हैं रविरतलामी प्यार की पींगे बढ़ा रहे हैं तो हमारी साइकिल ने क्या किसी की भैंस खोली है जिसकी कहानी न बतायी जाये?
इस फोटो तथा समाचार में तब का जिक्र है जब मैं अपने मित्र विनय अवस्थी के साथ साइकिल से भारत दर्शन करके कानपुर वापस लौटा। तीन माह सड़क पर रहकर हम घाट-घाट का पानी पी चुके थे। आज भी जिस उमर में तमाम बाप अपने लड़के को कानपुर से इलाहाबाद भेजने के लिये बाकायदा ट्रेन में सीट दिलाने / बिठाने जाते हैं ,जिस दिन लड़के का फोन न आये तो व्याकुल हो जाते हैं ,इस उमर में हम इलाहाबाद से चलकर इलाहाबाद के नीचे का भारत साइकिल से नाप चुके थे। पूरे तीन महीने घर से एकतरफा संवाद था। केवल हमारे पोस्टकार्ड आते थे घर। इधर से कोई सूचना-संवाद नहीं। लेकिन हम सैर करने में मस्त थे।
तमाम स्मृतियां हैं जो समय के साथ धुंधली हो रहीं हैं। विवरण कम होते जा रहे हैं लेकिन फिर भी लगता जैसे यह कल की बात हो।इसीलिये सोचा गया कि कुछ लिख लिया जाये। अपनी सोच के अलावा लिखाने के लिये उकसाने वाले तमाम लोग हैं। चिट्ठाजगत से ठेलुहा नरेश हैं,विनय जैन हैं तथा हमारे स्वामीजी तो हइयै हैं जिनको बताया विचार तो अगला वाक्य टाईप करने के पहले नयी कैटेगरी बना चुके थे।
यात्रा की शुरुआत हमारे ‘मोनेरेको’ से हुयी थी। ‘मोनेरेको’ मतलब मोतीलाल नेहरू रीजनल इंजीनियरिंग कालेज,इलाहाबाद जहां हमने अपनी जिंदगी के शायद सबसे बेहतरीन,खुशनुमा,बिंदास,बेपरवाह चार साल गुजारे । बेहतरीन दोस्त पाये। वहीं से हमने यह भारत दर्शन साइकिल यात्रा शुरु की। स्कूल में पढ़ी राहुल सांकृत्यायन की अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा याद करते हुये:-
सैर कर दुनिया की गाफिल,जिंदगानी फिर कहां,
जिंदगानी गर कुछ रही ,तो नौजवानी फिर कहां।

लिहाजा कुछ कहानी वहां की भी। अगली पोस्ट में।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

10 responses to “सैर कर दुनिया की गाफिल”

  1. भोला नाथ उपाध्याय
    लगता है अगले कुछ दिन रोमांचक एवं जिज्ञासु होंगे |
  2. आशीष
    बेसब्री से इंतजार है अगली किश्तो का. काफी आनंद आता है यायावरी की जिन्दगी मे.
    मेरे आदर्श पुरूष ही रहे है राहुल सांकृत्यायन जीनका सारा जीवन ही यायावरी मे बिता था.
    मेरी अब तक की जिन्दगी भी यायावरी मे बिती है, लगभग सारा भारत घुमा है
    कश्मीर से कन्याकुमारी तक,गुजरात से सिक्कीम तक.
    नौकरी(business analyst) भी ऐसी मिली है, कि यायावरी जारी है. ब्रिटेन/जर्मनी/फ्रान्स/अमरीका/जापान तक घुम लिया है…. कामना यह ही है, परतन्त्रता की बेडिया पडने(शादी) से पहले जितना घुम सको घुम लो….
    :-)
    आशीष
  3. जीतू
    सही है गुरु, हम भी उत्सुक है, आपकी यायावरी की गाथा सुनने को। बेहतर होता इसे इसके लिये एक अलग से ब्लाग बनाया जाता, ताकि सारी गाथा, एक साथ पढने का मजा ही कुछ और आता। ये मेरा सुझाव है, इसे आदेश मानने की गलती ना की जाय।
  4. kali
    bhadiya hai guru. Dhanya hue aap jo aapne duniya main aaye to kuch kar dikhaye. Hum abhi apni tandiri cycle per ghar se office jaane main katra rahe hain, aap to 3/4 desh ghoom aaye. Jai ho !
    Sahi main kafi inspire aur depress ek saath kar diye yeh khabar suna ke.
  5. Sunil
    क्या उन दिनों की डायरी लिखी कोई या फिर यादों से ही बनेगी यह कहानी ? पढ़ने की बहुत उत्सुक्ता रहेगी. सुनील
  6. रवि
    वाह अनूप भाई!
    मेरी जिन्दगी में भी कोई पेंचो-खम कम नहीं!
    सारा इन्डिया घूम मारा और खबर अब !!!
    इसका तो उपन्यास बनना चाहिए
    रवि
  7. भोला नाथ उपाध्याय
    काली जी का कथन कि “inspire aur depress ek saath kar diye” बहुत सटीक है मेरे लिये | आप लोगों को शायद मालूम हो न हो, फुरसतिया भाई साहब मेरे बडे भैया के मित्र एव्ं boss हैं | ऐसे में मेरे लिये काफी उन्चाई पर हैं अतः बडी मुश्किल से हिम्मत जुटाया था कि अबकी दुर्गा पूजा में मिल के आऊंगा |किन्तु यह खबर सुनकर फिर काम्प्लेक्स घेर लिया है | अबकी ज्यादा हिम्मत जुटानी पडेगी, मिलने की खातिर|
  8. Ravi Kamdar
    कया बात हे. मुझे लगता हे आपको मिलकर आपका सन्मान करू. खेर आगे कि गाथा सुनने के लिये दिल बेकरार हे. अरे आगे वाली मतलब पुरी दास्तन्. मे भी रवि जी के साथ सेहमत्त हु. इसका उपन्यास बनना चाहिये. सोचता हु आपके अनुभवो का interview लेके मेरे engineering college मित्रो को पढाउ.
  9. फ़ुरसतिया » चलो चलें भारत दर्शन करने
    [...] �� चलें भारत दर्शन करने कल रात मेरी साइकिल सपने में आई और मुझे फटकारते हुये बो [...]
  10. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] वाया बबुरी 13.नैपकिन पेपर पर कविता 14.सैर कर दुनिया की गाफिल 15.नयी दुनिया में 16.हम तो बांस हैं-जितना [...]

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Saturday, September 24, 2005

नैपकिन पेपर पर कविता

http://web.archive.org/web/20110101210508/http://hindini.com/fursatiya/archives/52

रात हो चुकी है। नींद मेरे ऊपर डोरे डाल रही है। मैं जाग रहा हूं यह सोचते हुये कि अब दीपक जी चाय बनाते हुये चिट्ठे का मजनून सोच रहे होंगे । विनय जैन जा चुके हैं चाय बनाने । स्वामीजी के पास कोई काम ही नहीं है लिहाजा वे बहुत व्यस्त हैं। मेरे मन में विचार उठ रहा है कि लिखूं या सो जाऊं?’लिखूं’ या ‘सो जाऊं’ के विचार कैटरीना और रीटा तूफानों की भांति मेरे मन को अमरीका बनाये हुये मथ रहे हैं।सारे ख्याल तूफान प्रभावित क्षेत्र से अमेरिकी नागरिकों की तरह पलायन कर चुके हैं। सारा आपदा प्रबंधन आपदाग्रस्त हुआ पडा़ है ।मेरा मानस पटल चिट्ठा विश्व के इंडिया कहिन हिस्से की तरह सूना पड़ा किसी विचार पौध के सर उठाने की राह देख रहा है।
बहुत दिन से विचार कर रहा था कि गालियों के सामाजिक महत्व के बारे में कुछ लिखा जाये। संयोग कुछ ऐसा हुआ कि जहां इस विचार ने सर उठाके अंगड़ाई लेने की कोशिश की वहीं तमाम छुटभैये पवित्रता वादी स्वयंसेवक टाईप विचार-पुत्र जिनको गाली-गलौज से सख्त नफरत हैं इससे प्रेम पूर्वक कहते हैं:-
“अबे ओय धत्तन! दादा उतको मत। नहीं त माले-माले दूतों ते तांद दंदी तल देंगे। थाले यहां दाली बतता है! पता नहीं ति बहू-बेतियां भी पलती हैं इथे?”
हमने तमाम तरह से समझाने का प्रयास किया कि हम गालियों के सामाजिक महत्व के बारे में लिखना चाहते हैं। इसका मतलब यह थोड़ी कि हम गालियां लिखना चाहते हैं। लेकिन वह न माना तो नहिंयै माना। उसने अपनी समझदानी ताले में बंद करके चाभी किसी गधे के सिर पर टांग दी थी जो अंतत: गायब ही हो गयी होगी।
वह आगे भी हकलाते/तुतलाते हुये बोला:-
हम थब थमधते हैं। तौनौ बेतूफ नहीं है।तुम फूत लो यहां थे पतली दली थे। नहीं तो तहूं लामू भइया आ दये तो थाली इथ्माल्तनेथ निताल देंगे।थतिया थली बिस्तला दोल तल देंदे । पतरा तल देंगें मालते-मालते ।अइसा थुलेंगे कि मालते-मालते एलगिन मिल बना के थोलेंगे। वइथे भी आद उनता मूद बहुत आफ है। तैपेलवा तुथ लिथिस है दांदुली ते थिलाफ ।
जूतों से चांद गंजी होने से बचाने के लालच में वो बेचारा मासूम विचार हमेशा दब जाता है तथा अगली बार उचकने से पहले के समय तक के लिये देबाशीष की तरह जन्मदिन मनाकर नौ-दो-ग्यारह हो जाता है।
जहां जन्मदिन की बात चली हम कान सहित खड़े हो गये। लगा कि भोपाल की तरफ से आवाज आ रही है- आपने तो फुरसतिया को जच्चा-बच्चा केंद्र बना दिया है। दे सोहर पर सोहर गा रहे हैं। ये कोई तरीका भला !
हमने कहा कि भाई अपनी दुकान पर मना रहे हैं जन्मदिन तुम्हें काहे तकलीफ हो रही है? जवाब मिला- अरे तकलीफ की बात हम नहीं कर रहे हैं लेकिन फिर भी जब हो-हल्ला होता है तो डिस्टर्बेन्स तो होता है न। बधाई के बहाने टिप्पणी लिखवाते हो हमे सब पता है। हम बोले तो तुम भी लिखवाओ न!
बताया गया -उसके लिये लिखना नहीं पड़ेगा। उतना कष्ट कौन उठाये।हम तुम्हारे भले के लिये बता रहे हैं। तीन बार जीतेन्द्र के बारे में लिखा चुका ।बाकी बहुत लोगों के बारे में कुछ नहीं ये क्या मजाक है?आडिट हो गया तो बाकी लोगों की उपेक्षा का आरोप लगेगा जवाब नहीं देते बनेगा।
हमसे सही जवाब नहीं देते बना। कारण दो थे। एक तो नींद ने जोरदार हमला बोल दिया था। हमें कुर्सी से उठाकर बिस्तर पर पटक दिया। दूसरे एक जनहितकारी समुदाय की कविता पैदा हो गयी इस आपा-धापी में। सो वह कविता सोचा जा रहा है सब साथियों को पढा़ दी जाये। सुख-दुख सदैव बांटे जाने चाहिये साथियों में। कविता अनुभूति कार्यशाला के लिये लिखी गयी। हमसे हमारी पसंदीदा कविता पूछी गयी। हमने बतायी-पुष्प की अभिलाषा। हमने सोचा कि इतने में बात खतम हो जायेगी लेकिन हमसे कहा गया कि उसी तरह की कोई कविता लिखो। सच माना जाये हमें अपने कवि न होने जितना अफसोस हुआ उतना शायद भारतीय क्रिकेट टीम को फाइनल दर फाइनल हारते नहीं हुआ होगा।
लेकिन खाली अफसोस से तो कविता नहीं लिखी जाती । कविता लिखने के लिये तो साहस चाहिये ।हमने जुटाया साहस तथा लिखी कविता।अगर सच माना जाये तो कविता एक मींटिंग में ऊंघने से बचने के लिये समोसा के साथ मिले नैपकिन पेपर पर बगल के बगल में बैठे साथी से पेन मांग कर लिखी गयी। कविता पेश है शीर्षक है अभिलाषा:-

अभिलाषा

चाहतें बहुत सी उठतीं हैं
इस मन के दृश्य पटल पर ,
कुछ तुरत लोप हो जातीं हैं
कुछ बैठी रहतीं हैं जमकर।

जो जमीं चाहते रहतीं हैं
वे बारम्बार उचकतीं हैं,
कब बहुरेंगे उनके दिन भी
उचक-उचककर कहतीं हैं।
कुछ खुद की खुशी चाहतीं हैं
कुछ कहतीं हैं जग आबाद रहे,
सबको पूरा करना मुश्किल
पहले किसको यह कौन कहे।
चाहों के इस विपुल कोश से
मैं वही चाहतें चुनता हूं ,
जिनके पूरा हो जाने से
जग सारा पुलकित होता है।
चाहता यही हूं मैं प्रभुवर
संभव हो तो ऐसा करना,
जीवन सबका खुशहाल रहे
दुनिया चहके जैसे झरना।
पूनम की पुलक चांदनी सा
जीवन में सबके उल्लास रहे,
उल्लास रहे, परिहास रहे
हर पल-क्षण सहज सुवास रहे।
हे जग-उपवन के माली जी!
हैं खिले यहां पर पुष्प अनेक,
सबको महकाने की चाहत में
मैं पुष्प रोपता हूं और एक।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

5 responses to “नैपकिन पेपर पर कविता”

  1. आशीष
    फुरसतिया जी,
    आपके चिठ्ठे पर निदं का असर तो साफ दिखाइ दे रहा है, आपने सुनील जी को दिपक जी बना दिया. :-)
    आशीष
  2. अनुनाद
    पण्डित जी , इ आपके नीदिये का प्रभाव है कि हास्य-गुणी “लेखवा” का विवाह शान्त रस वाली ( रस-शान्त नहीं ) “कवितवा” से करा दिये | गुण-वुण ठीक से नहीं बैठाये | वात्स्यायन जी का कहा भी भूल गये का ?
  3. आशीष
    अइयो, गलती से मिस्टेक हो गयी ! अब लग रहा है “नींद” मुझे आ रही थ :-)
    आशीष
  4. kali
    वाह ! बहुत सही लिखे रहे. काफी कुछ तो समझ आ गया, बाकी का ३-४ बार में समझ आ जाएगा. कविता बहुत बढिया रही. लिखते रहो, प्रभु समोसा-नैपकिन की ईच्छापूर्ति करते रहेंगे. टाँग खिँचाई का मौका दिया ईसी बहाने पंडित जी ने भोपाल को याद तो किया.

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Wednesday, September 21, 2005

राजेश कुमार सिंह -सिकरी वाया बबुरी

http://web.archive.org/web/20110901181722/http://hindini.com/fursatiya/archives/51


[परिचयों की कड़ी में अगली कड़ी है राजेश कुमार सिंह राजेश का आज जन्मदिन है। आप उनको शुभकामनायें दे सकते हैं तथा उपहार के रूप में राजेश द्वारा आयोजित तेहरवीं अनुगूंज में अपना लेख लिख सकते हैं। विषय है -संगति की गति। ]
अतुल के लेख पर रमण ने सवाल किया था:-
क्या बात है! सभी दिग्गज चिट्ठाकारों का एक साथ जन्म-दिन। सितम्बर में ऐसी क्या बात है भाई कि चिट्ठाकार जनता है? और अभी तो आधा ही गया है। और कौन कौन महारथी हैं आने वाले?
राजेश कुमार सिंह
तो रमणजी सूचनार्थ निवेदित है कि एक और महारथी ने सितम्बर में ही अवतार लिया था वो हैं राजेश कुमार सिंह। राजेश के बारे में बताने लायक बातें पहले ही बताई जा चुकी हैं। कुछ और बचा नहीं है बताने लायक।
लेकिन राजेश का आज जन्मदिन है। वो घर से दूर हैं । लिहाजा शुभकामनाओं पर तो उनका हक तो बनता ही है। अब जब शुभकामनायें दी जायेंगी तो कुछ कहना भी जरूरी है लिहाजा कुछ बातें अपने राजन के बारे में।
राजेश से मुलाकात हमारी हुई मोतीलाल नेहरू रीजनल इंजीनियरिंग कालेज,इलाहाबाद में। समय इफरात था वहां । समय का जितना उन्मुक्त उपयोग उन दिनों किया गया शायद फिर कभी नहीं हुआ होगा। इधर-घूमना,उधर गपियाना और जब कुछ समझ में न आये तो पढ़ भी लेना।
जैसा कि लिखा जा चुका है:-
अपनों के बीच मुखर, समूह में मौन रहने वाले राजेश जब किसी कवि की कविता का पाठ करते थे तो सन्नाटा छा जाता था। शुरुआती पसंदीदा कवि श्रीकांत वर्मा रहे। लेखकों में प्रियंवद पर जान छिड़कते रहे। फिलहाल यह पसंद प्रियंवद से सरककर प्रियंवदा (ऊषा) पर आ ठिठकी है।
‘प्रियंवद’ राजेश के पसंदीदा कथाकार रहे काफी दिन। राजेश कभी कभी कविता पाठ करते थे। गजराज की चाल से कविता पढ़ने के लिये माइक की तरफ जाते। श्रीकांत वर्मा की कविता पढ़कर लौटते तो लगता तोप चला के आ रहे हैं। दूसरों की कवितायें पढ़ते-पढ़ते कब यह बालक खुद लिखने के चक्कर में पढ़ गया यह आज भी खोज का विषय है।
राजेश कभी कभी कविता पाठ करते थे। गजराज की चाल से कविता पढ़ने के लिये माइक की तरफ जाते। श्रीकांत वर्मा की कविता पढ़कर लौटते तो लगता तोप चला के आ रहे हैं।
अभी हाल-फिलहाल तक राजेश अतुकान्त और काफी गूढ़ कवितायें लिखते थे। उतनी अपील नहीं करतीं थी। मेरा मानना है कि कविता पढ़ने के बाद याद न रह जाये तो कविता दमदार नहीं है। यह अच्छी बात रही कि राजेश ने चिट्ठाकारी की शुरुआत समझ में आने वाली कविताओं से की। ‘हम जहां हैं वहीं से आगे बढ़ेंगे’ तो मेरी अभी तक की पढ़ी सबसे अच्छी कविताओं में है।
वैसे राजेश की खुशमिजाज पत्नीश्री, सागरिका से जब मैंने राजेश की कविताओं के बारे में कल राय पूछी तो बताया गया:-
भाई साहब हम अभी तक इस पचड़े में नहीं पड़े कि इनकी कवितायें पढ़ने की आफत मोल लें। जब मैंने बताया कि नहीं राजन अब समझ में आने वाली कवितायें लिखने लगे हैं तो उन्होंने कहा-आप कहते हैं तो मान लेते हैं लेकिन मुझे ऐसा लगता नहीं।
राजेश आपके बारे में वो विवरण बता सकते हैं जो आप कभी का भूल चुके होंगे। आप से जुड़े उन लोगों के बारे में पूछ सकते हैं जिनके बारे में आप सोचने को बाध्य होंगे-हां याद तो आ रहा है कुछ-कुछ।
राजेश आपके बारे में वो विवरण बता सकते हैं जो आप कभी का भूल चुके होंगे। आप से जुड़े उन लोगों के बारे में पूछ सकते हैं जिनके बारे में आप सोचने को बाध्य होंगे-हां याद तो आ रहा है कुछ-कुछ। सालों बाद मिलने पर राजेश के पहले सवालों में यह यह तकादा हो सकता है -आपने मेरी तीन मेलों का जवाब नहीं दिया। अगर आपको राजेश ने कुछ मेल लिखीं हैं तो यह आपके हित में है कि आप उन्हें सहेज के रखें क्योंकि किसी दिन राजेश कह सकते हैं- प्रियवर मेरे पास सितम्बर २००३ से लेकर जनवरी २००४ तक की आपकी लिखी मेले तो हैं लेकिन जो मैंने आपको लिखीं वे नहीं मिल रही हैं। अगर आपके पास हों तो मुझे भेज दें।
अब झेंले प्रियवर अपने मेल डिलीट न करने के आलस्य का खामियाजा। अगर किसी बात पर इनकी बेवकूफी का अहसास कराने की कोशिश की जायेगी तो जवाब आयेगा:-
गुरुवर आपने ही किसी पोस्ट में लिखा है:-
पढ़ सको तो मेरे मन की भाषा पढ़ो,
मौन रहने से अच्छा है झुंझला पढ़ो।
मतलब कायदे से गुस्सा होने का आपका अधिकार भी केवल झुंझलाने तक सीमित कर दिया गया।
पुराने जमाने में राजा लोग जहां कुछ दिन रहते थे एक घर बसा लेते थे।अब इतने बहादुर तो नहीं हैं आज के ठाकुर लेकिन आदत का मुजाहरा ब्लागिंग में करने से चूके नहीं। कल्पवृक्ष के बाद छाया को लाये और अब अभिप्राय। फिर भी इस मामले में राजेश जीतेन्द्र के सामने कहीं नहीं ठहरते जो कहीं भी,जगह हो या विचार, अगर एक घंटे टिक जाते हैं तो उस पर एक ब्लाग बना डालते हैं। जिसके लिये स्वामीजी कहते हैं:-
प्रभु मेरे,
क्यों ना पूरे इंटरनेट पर बिखेर दो अपने लेख – ८-१० और अकाउन्ट बना डालो २ मिनट तो लगते हैं -एक सलीकेदार बरगद से १०० कुकुरमुत्ते भले – है ना! बुरा नही मान रहा – मैं तो बहुत खुश हो रिया हूं – ब्लाग्स की खेती हो री है.
राजेश टिप्पणी लिखने तथा अपनी राय व्यक्त करने में भले संकोच करते हों लेकिन पढ़ने में कोई कोताही नहीं बरतते। मेरे फुरसतिया पर लिखते रहने का एक कारण यह भी रहा कि वहां कुछ लोग नियमित आते रहे जिनमें इन्डोनेशिया से राजेश भी हैं।
अपने पसंदीदा लेखक का सबकुछ पढ़ने का राजेश को जुनून है। एक बार शाहजहांपुर आये तो मेरे घर की रद्दी में डूब गये। पूरे दिन पुरानी किताबों में न जाने किन-किन रचनाओं की खोज करते रहे।
बहुत मुश्किल होता है बीस साल की यादों से कुछ यादों को छांटना।स्मृतियां एक-दूसरे को धकियाती हैं।
बहुत मुश्किल होता है बीस साल की यादों से कुछ यादों को छांटना।स्मृतियां एक-दूसरे को धकियाती हैं। तमाम पुराने पत्र राजेश के हैं मेरे पास। पता है- राजेश कुमार सिंह ,सिकरी वाया बबुरी। हम लोग जब बनारस में पढ़ते थे तो राजेश के गांव भी गये एकाध बार।
राजेश को जन्मदिन के अवसर पर अनेकानेक मंगलकामनायें।उपहार में उन्हीं की कविता से बढ़िया उपहार मुझे कुछ दूसरा नजर नहीं आता।
मेरी पसंद
हम जहाँ हैं,
वहीं से, आगे बढ़ेंगे।
हैं अगर यदि भीड़ में भी, हम खड़े तो,
है यकीं कि, हम नहीं,
पीछें हटेंगे।
देश के, बंजर समय के, बाँझपन में,
या कि, अपनी लालसाओं के,
अंधेरे सघन वन मे,
पंथ, खुद अपना चुनेंगे।
या, अगर हैं हम,
परिस्थितियों की तलहटी में,
तो, वहीं से,
बादलों के रूप में, ऊपर उठेंगे।

-राजेश कुमार सिंह

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

19 responses to “राजेश कुमार सिंह -सिकरी वाया बबुरी”

  1. जीतू
    धोने मे कोई कसर नही छोड़े हो, बेचारा राजेश तो झेल गया होगा, सोच रहा होगा, कहाँ फ़ंसे, अब फ़ुरसतिया के फ़च्चर मे फ़ंसोगे तो ऐसे ही मौज ली जायेगी.
    राजेश भाई को जन्मदिन की बहुत बहुत बधाईयाँ. ईश्वर करे आपकी सारी मनोकामनाये पूरी हो.
  2. पंकज नरुला
    राजेश जी को जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई। वैसे फुरसतिया, ठलुआ और राजेश जी के कॉलेज के जमाने के याराने के बारे में राजेश जी ने एक इमेल में बताया था। का बात है। तो आप लोगों में से सबसे पहले ब्लॉग रोग किसे लगा था।
  3. sarika
    जन्मदिन की बहुत शुभकामनायें!!
  4. रमण कौल
    राजेश जी को जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई।
  5. Atul
    राजेश जी को जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई।
  6. Vinay
    राजेश, जन्मदिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
  7. Rajesh Kumar Singh
    प्रियवर,
    रमण भाई की बात पर मैंने भी गौर किया है। मेरी समझ में तो यही आया , कि हालाँकि हमारे जन्मदिन के सितम्बर में ही पड़ने के जवाबदेह हम नहीं , लेकिन , पितृपक्ष की घटनाएँ , चूँकि शुभ नहीं मानी जाती हैं , शायद , इसीलिये , हमारा जन्मदिन भी सितम्बर में ही पड़ा है।
    जीतेन्द्र जी , टाँगखिचाई भी संगति की ही गति है ! सिंह को गजराज बनना पड़ गया । पर क्या करें , जन्मदिन पर परिचय लिखवाने की आइडिया भी तो आप की ही है !
    पंकज जी , मेरे लिये एक खुशी की बात और है, कि , आजकल , हम और अनूप जी क्लासफेलो हो गये हैं। क्लास लगती है , “अनुशाला” पर । यकीन न मानें , तो “अनुशाला” पर आ कर देख लें । “ब्लाग” को बेलाग करने का श्रेय तो शुक्ला जी के ही पास है ।
    अतुल जी , बधाई तो स्वीकार करने के लिये हम बाध्य हैं । पर चाहिये तो उपहार भी !
    सारिका जी , आप का भी धन्यवाद और आप की कविता पंक्ति “मित्र तुम कितने भले हो” लिखने का भी, जिसका उपयोग मैंने अतुल जी के लेख की सराहना के लिये कर लिया था , बिना आप के नाम का जिक्र किये और बिना आप की सहमति प्राप्त किये। किसी महिला चिठ्ठाकार की , “अनुगूँज” के लिये कोई प्रविष्टि नहीं। क्या आप से उम्मीद रखूँ , बतौर वर्षगाँठ का उपहार ।
    अब , अनूप , आप से भी आखिरकार एक बात , कि , अगर आप अपना रेडिफ वाला “पासवर्ड” लिख दें , तो चिठ्ठियाँ , हम खुद छाँट लेगें ।
    बाकी , एक बार फिर , जीतेन्द्र , पंकज , सारिका , रमण और अतुल का हार्दिक धन्यवाद ।
    -राजेश
    (सुमात्रा)
  8. आशीष
    राजेश जी को जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई।
    आशीष
  9. kali
    happy birthday to you. Fursatiya ji sahi trick laye ho apne blog per jamawada baithe ke samuhik dhulai karne ka. Sabke janamdin apne ghar manao. Kharcha mehnat kuch nahi bhadiya taang khicho aap bhi hanso , birthday boy /girl bhi daant nipore. Jai ho gurudev
  10. प्रत्यक्षा
    हमारी भी बधाई स्वीकार करें
    प्रत्यक्षा
  11. Pratik
    राजेश जी, मेरी तरफ़ से भी जन्‍मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ।
  12. अनुनाद
    राजेश भाई ,
    जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ |
  13. Rajesh Kumar Singh
    विनय , आशीष , काली…… जी , प्रत्यक्षा जी, और प्रतीक !
    आप सब का हार्दिक धन्यवाद ।
    आज, दूसरे दिन भी वर्षगाँठ मना रहा हूँ , आज पहली बार । कल की बधाईयाँ , तो प्रवासी भारतीयों की ओर से थीं । आज के बधाई संग्रह में , देश से आये संदेश ज्यादा हैं । लिहाजा बात थोड़ा हट कर है।
    विनय जी , कल हमारी और आप की पोस्ट में सिर्फ १ मिनट का अन्तर है। इसलिये , कल आप का धन्यवाद ज्ञापित नहीं कर सका । वैसे , आप का URL मुझे मिल नहीं रहा है। अगर किसी के पास हो, तो कृपया अवश्‍य भेजें ।
    आशीष जी , आप की बधाई को हमने आपके नाम के साथ पढ़ा , यानी आशीष मान कर ।
    “मरना तो सबको है , जी के भी देख लें ” हमने आप का संदेश कुछ यूँ पढ़ा प्रत्यक्षा जी ।धन्यवाद ।
    प्रतीक जी, आपने अपने ब्लाग पर इन्डोनेशिया के बारे में एक पोस्ट लिखी है । काफी पहले ,मई में शायद। मैंने , आज-कल में वह पढ़ी ।
    तो , आप सभी लोगों को इन्डोनेशिया के बारे में कुछ और बताते हैं ,जिसकी वजह से , शायद अगर आप में से कभी कोई इन्डोनेशिया आये , तो सम्भवतः मुझे याद कर ले। यहाँ अंग्रेजी में , जिस तरह Good Morning , Good Night , Good Afternoon कहते हैं , वैसे ही यहाँ , इन शब्दों के लिये “सलामत पागी” (पागी यानी सुबह) , “सलामत मालम” (मालम यानी रात) और “सलामत सोरे” ( सोरे मतलब अपराह्न) कहते हैं।
    अब आप सभी टिप्पणी कर्ता यह बतायें , कि अगर Happy Birthday को यहाँ , “सलामत उलांग ताहुन” कहते हैं , तो “उलांग” और “ताहुन” के क्या अर्थ होते हैं , यहाँ ?
    और हाँ , काली…. जी , लिखते यहाँ बिलकुल वैसे ही हैं , जैसे आपने लिखा है। यानी , वर्णमाला अंग्रेजी की ही इस्तेमाल करते हैं । (यानी आप का दावा “I Am God” बिल्कुल सही है।)
    अन्त में सभी से आग्रह है , कि कुछ लिखें अनुगूँज के लिये जल्द से जल्द , “संगति की गति” पर । गद्य न सही , पद्य ही लिखें ; समयाभाव की समस्या का यह भी एक हल है।
    अनुनाद जी , आप की बधाई , बस अभी-अभी मिली है । चाहें तो, समय देख सकते हैं। आप का धन्यवाद , इस गणराज्य के शब्दों में “त्रिमा कसीह” ( यानी Thanks / धन्यवाद।)
    पुनः सभी को धन्यवाद।
    -राजेश
    (सुमात्रा)
  14. indra awasthi
    हमसे भी लो बधाई ताकि यहाँ भी सनद रहे
  15. indra awasthi
    हमसे भी लो बधाई ताकि यहाँ भी सनद रहे
  16. Shashi Singh
    भैया राजेशजी के भोजपुरिया खरहारा से मय दुनिया के खुशी के प्यार के छंईटा में भरके जन्मदिन के ढेर शुभकामना.
    शशि सिंह
  17. Rajesh Kumar Singh
    शशि जी,
    शीश नवा के , आप का , धन्यवाद स्वीकार किया । क्यों कि , पूरे चिठ्ठाजगत में , अभी तक , कोई भोजपुरी में पोस्ट लिखी गयी है , तो वह आप के ब्लाग पर ।
    धन्यवाद भी , साधुवाद भी।
    -राजेश
    (सुमात्रा)
  18. anitakumar
    राजेश जी से इसी पोस्ट पर पहली बार मिलना हो रहा है वो भी उनके जन्मदिन। जन्म दिन की बहुत बहुत शुभकामनाएं । अनूप जी ने तो जो आप के बारे में कहा सो कहा बाकि तो आप को आप की टिप्पणियों से जान पा रहे हैं और सोच रहे हैं कि ये फ़ुरसतिया ब्रांड जो यहां भी दिख रहा है वो सितंबर महीने में अवतरित होने का कमाल है या इलाहाबाद के इंजिनियरिंग कॉलेज का, जो भी आप के बारे में जानना और आप को जानना अच्छा लगा।
    अनिता
  19. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] की गति 11.आओ बैठें ,कुछ देर साथ में 12.राजेश कुमार सिंह -सिकरी वाया बबुरी 13.नैपकिन पेपर पर कविता 14.सैर कर दुनिया [...]

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