Monday, July 31, 2006

पहाड़ का सीना चीरता हौसला

http://web.archive.org/web/20140419215401/http://hindini.com/fursatiya/archives/164

पहाड़ का सीना चीरता हौसला

[अक्सर लोग साधनों का रोना रोकर तमाम कामों के पूरे न होने का रोना रोते हैं। लेकिन कुछ सिरफिरे ऐसे भी होते हैं जो काम करने के पीछे जुट जाते हैं फिर कुछ नहीं सोचते सिवाय काम के। ऐसे लोगों के हौसले के लिये ही दुष्यन्त कुमार लिखा है:-
कौन कहता है आसमान में छेद नहीं हो सकता,
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों।
(उपरोक्त शेर स्मृति के आधार पर लिखा था। राकेश खंडेलवाल जी ने गलती बतायी टिप्पणी लिखकर। राकेशजी के प्रति आभार प्रकट करते हुये सही शेर लिखा जा रहा है।)
कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों।
कल ऐसी ही एक शख्सियत बिहार के गया जिले के दशरथ मांझी के बारे में दैनिक हिंदुस्तान में प्रदीप सौरभ का लेख पढ़कर लगा कि इसे यहां पोस्ट किया जाये। सो यह लेख दशरथ माँझी के हौसले को सलाम करते हुये पोस्ट कर रहा हूँ।]
दशरथ मांझी अक्खड़ और फक्कड़ हैं। कबीरपंथी जो ठहरे। कबीर की ही तरह उनका पोथी से कभी वास्ता नहीं पड़ा।प्रेम के ढाई आखर जरूर पढ़े हैं। प्रेम भी ऐसा कि दीवानगी की हद पार कर जाये। इसी दीवानगी में उन्होंने पहाड़ का सीना छलनी कर दिया।
यह कहानी है बिहार के गया जिले के एक अति पिछड़े गांव गहलौर में रहने वाले दशरथ मांझी की। उनकी पत्नी को पानी लाने के लिये रोज गहलौर पहाड़ पार करना पड़ता था। तीन किलोमीटर की यह यात्रा काफी दुखदायी है। एक सुबह उनकी पत्नी पानी के लिये घर से निकलीं। वापसी में उसके सिर पर घड़ा न देखकर मांझी ने पूछा कि घड़ा कहाँ है? पूछने पर बताया कि पहाड़ पार करते समय पैर फिसल गया। चोट तो आई ही,पानी भरा मटका भी गिर कर टूट गया। बस उसी दिन दशरथ ने पहाड़ का मानमर्दन करने का संकल्प कर लिया।
यह बात १९६० की है।
दशरथ अकेले ही पहाड़ कटाकर रास्ता बनाने में लग गये। हाथ में छेनी-हथौड़ी लिये वे बाइस साल पहाड़ काटते रहे। रात-दिन,आंधी पानी की चिंन्ता किये बिना मांझी नामुमकिन को मुमकिन करने में जुटे रहे।
अंतत: पहाड़ को झुकना ही पड़ा। गहलौर पर्वत का मानमर्दन हो गया। अपने गांव से अमेठी तक २७ फुट ऊंचाई में पहाड़ काटकर ३६५ फीट लंबा और ३० फीट चौडा़ रास्ता बना दिया। पहाड़ काटकर रास्ता बनाए जाने से करीब ८० किलोमीटर लंबा रास्ता लगभग ३ किलोमीटर में सिमट गया।
इस अजूबे का बाद दुनिया उन्हें ‘माउन्टेन कटर’ के नाम से पुकारने लगी। सड़क तो बन गई लेकिन इस काम को पूरा होने के पहले उनकी पत्नी का देहांत हो गया। मांझी अपनी पत्नी को इस सड़क पर चलते हुये देख नहीं पाये। अस्सी वर्षीय मांझी तमाम अनकहे दुखों के साथ अपनी विधवा बेटी लौंगा व विकलांग बेटे भगीरथ के साथ रहते हैं।दुख है कि उनको घेरे रहता है,लेकिन वे जूझते रहते हैं। उनका दर्शन है कि आम आदमी को वो सब बुनियादी हक मिलें , जिनका वह हकदार है।
जुनूनी इतने हैं कि सड़क निर्माण के बाद वे गया से पैदल राष्ट्रपति से मिलने दिल्ली पहुंच गये। लेकिन राष्ट्रपति से उनकी भेंट नहीं हो सकी। इस बात का उन्हें आज भी मलाल है। मांझी की जद्दोजहद अभी खत्म नहीं हुई है। वे अपनी बनायी सड़क को पक्का करवाना चाहते हैं।
इसके लिये वे पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव से भी मिले। आश्वासन भी मिला,लेकिन कुछ हुआ नहीं। बीते सप्ताह वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से भी जनता दरबार में मिले। मांझी को देखकर नीतीश कुमार इतना प्रभावित हुये कि उन्होंने मांझी को अपनी ही कुर्सी पर बैठा दिया। आश्वासन और आदेश भी दिये ,सड़क को पक्का कराने के। देखना है कि आगे क्या होगा? करजनी गाँव में सरकार से मिली पांच एकड़ जमीन पर वे एक बड़ा अस्पताल बनवाना चाहते हैं। वे पर्यावरण के प्रति भी काफी सजग हैं। हमेशा वृक्षारोपण और साफ सफाई के कार्यक्रम को प्रोत्साहन देते हैं। गांव और आसपास के लोगों के लिये अब वे दशरथ मांजी नहीं हैं। वे अब दशरथ बाबा हो गये हैं।

[यहां पर प्रस्तुत है हिंदी दैनिक हिंदुस्तान के संवाददाता
विजय कुमार से हुई दशरथ मांझी से बातचीत के अंश]
पर्वत को काटकर रास्ता बनाने का विचार कैसे आया?
मेरी पत्नी(फगुनी देवी) रोज सुबह गांवसे गहलौर पर्वत पारकर पानी लाने के लिये अमेठी जाती थी। एक दिन वह खाली हाथ उदास मन से घर लौटी। मैंने पूछा तो बताया कि पहाड़ पार करते समय पैर फिसल गया। चोट तो आई ही पानी भरा मटका भी गिर कर टूट गया। बस मैंने उसी समय गहलौर पर्वत को चीर रास्ता बनाने का संकल्प कर लिया।
पहाड़ को काटने की दृढ़ इच्छाशक्ति और ताकत कहाँ से आई?
लोगों ने मुझे सनकी करार दिया। कभी-कभी तो मुझे भी लगता कि मैं यह क्या कर रहा हूँ? क्या इतने बड़े पर्वत को काटकर रास्ता बना पाऊंगा? फिर मेरे मन में विचार आया ,यह पर्वत तो सतयुग,द्वापर और त्रेता युग में भी था।उस समय तो देवता भी यहाँ रहते थे।उन्हें भी इस रास्ते से आने-जाने में कष्ट होता होगा,लेकिन किसी ने तब ध्यान नहीं दिया। तभी तो कलयुग में मेरी पत्नी को कष्ट उठाना पड़ रहा है।मैंने सोचा, जो काम देवताओं को करना था ,क्यों न मैं ही कर दूँ। इसके बाद न जाने कहाँ से शक्ति आ गई मुझमें । न दिन कभी दिन लगा और न रात कभी रात। बस काटता चला गया पहाड़ को।
आपने इतना बडा़ काम किया पर इसका क्या लाभ मिला आपको?
मैंने तो कभी सोचा भी नहीं कि जो काम कर रहा हूं,उसके लिए समाज को मेरा सम्मान करना चाहिये। मेरे जीवन का एकमात्र मकसद है ‘आम आदमी को वे सभी सुविधायें दिलाना ,जिसका वह हकदार है।’पहले की सरकार ने मुझ करजनी गांव में पांच एकड़ जमीन दी,लेकिन उस पर मुझे आज तक कब्जा नहीं मिल पाया। बस यही चाहता हूँ कि आसपास के लोगों को इलाज की बेहतर सुविधा मिल जाये। इसलिये मैंने मुख्यमंत्री से करजनी गांव की जमीन पर बड़ा अस्पताल बनवाने का अनुरोध किया है।
मुख्यमंत्री ने आपको अपनी कुर्सी पर बैठा दिया। कैसा लग रहा है?
मैं तो जनता दरबार में फरियादी बन कर आया था। सरकार से कुछ मांगने ।मेरा इससे बड़ा सम्मान और क्या होगा कि बिहार के मुख्यमंत्री अपनी कुर्सी मुझे सौंप दी। अब आप लोग (मीडियाकर्मी) मुझसे सवाल कर रहे हैं। मेरी तस्वीर ले रहे हैं। मुझे तो बड़ा अच्छा लग रहा है।
दशरथ मांझी ने जो काम किया उसकी कीमत सरकारी अनुसार करीब २० -२२ लाख होती है। अगर यह काम कोई ठेकेदार
करता तो कुछ महीनों में डायनामाइट वगैरह लगा के कर देता। लेकिन दशरथ मांझी अकेले जुटे रहे तथा बाईस साल में काम खत्म करके ही दम लिया। उनके हौसले को सलाम करते हुये यह लगता है कि ये कैसा समाज है जो एक अकेले आदमी को पहाड़ से जूझते देखता रहता है और उसे पागल ,खब्ती,सिरफिरा कहते हुये प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हतोत्साहित करता है। असफल होने पर पागलपन को पुख्‍़ता मानकर ठिठोली करता है तथा सफल हो जाने पर माला पहनाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है। इसके पीछे दशरथ मांझी के छोटी जाति का होना,नेतृत्व क्षमता का अभाव आदि कारण रहे होंगे लेकिन लोगों की निरपेक्ष भाव से टकटकी लगाकर दूर से तमाशा देखने की प्रवृत्ति सबसे बड़ा कारक है इस उदासीनता का।जीवन के हर क्षेत्र में सामूहिकता की भावना का अभाव हमारे समाज का बहुत निराशा जनक पहलू है।
ऐसे में दशरथ मांझी जैसे जुनूनी लोगों के लिये मुझे मुझे अपने एक मित्र के मुंह से सुनी पंक्तियां याद आती हैं:-
जो बीच भंवर में इठलाया करते हैं,
बांधा करते हैं, तट, पर नांव नहीं।
संघर्षों के,पीडा़ओं के पथ के राही
सुख का जिनके घर रहा पढ़ाव नहीं।।
जो सुमन,बीहड़ों में, वन में खिलते हैं,
वे माली के मोहताज नहीं होते।
जो दीप उम्र भर जलते हैं ,
वे दीवाली के मोहताज नहीं होते।।

33 responses to “पहाड़ का सीना चीरता हौसला”

  1. जीतू
    दशरथ मांझी को शत शत नमन, आज उन्होने साबित कर दिखाया है कि आसामान मे भी छेद हो सकता है, बस जरुरत है लगनशीलता, धैर्य और साहस की।
    सरकारी आश्वासन तो सिर्फ़ आश्वासन ही होते है। दशरथ मांझी जी के कार्यों को तो दुनिया की नजर मे लाना चाहिए, दशरथ भाई जैसे लोग हमारे ब्रान्ड एम्बैसडर होने चाहिए। सचमुच भारतवर्ष को उन पर नाज होना चाहिए।
  2. प्रेमलता पांडे
    सच्चे सपूत ऐसे होते हैं।
  3. प्रत्यक्षा
    वाकई ! क्या जीवट और क्या लगन .असंभव शब्द शायद सचमुच कुछ लोगों के श्ब्दकोष में नहीं होता है
  4. नितिन बागला
    इनके ऊपर शायद दूरदर्शन भी एक फ़िल्म/Documentry बना चुका है.
  5. आशीष
    दशरथ बाबा को मेरा नमन। हमे जरूरत ऐसे ही लोगो की !
  6. सागर  चन्द नाहर
    धन्य है दशरथ बाबा…………
    कई वर्षों पहले मनोहर कहानियाँ में भी दशरथ बाबा की कहानी प्रकाशित हुई थी।
  7. Tarun
    दृढ़ इच्छाशक्ति ho to aise jisne आसामान मे भी छेद kar diya. impossible ka matlab hi shayad yehi hai I-am-possible.
  8. मनीष
    दशरथ जी के बारे में कुछ वर्ष पहले टी.वी. के माध्यम से जाना था। । इस जीवट शख्श की नमनीय गाथा सुनाने के लिए शुक्रिया !
  9. सृजन शिल्पी
    कुछ वर्ष पहले उनके ऊपर जनसत्ता में संपादकीय अग्रलेख छपा था, संभवत: प्रियदर्शन ने लिखी थी वह टिप्पणी। मैंने काफी समय तक सहेज कर रखी थी उसकी कटिंग्स, परंतु अब खो गई है।
    एकाकी प्रयास से पहाड़ों का सीना चीर देने वाले, अकेले बड़े-बड़े वनों का वृक्षारोपण करने वाले जीवटयुक्त व्यक्तियों की कमी नहीं है हमारे यहाँ। धुन के पक्के, किसी की परवाह नहीं करने वाले ऐसे ही दुस्साहसी लोगों के बल पर अजूबे लगने वाले काम संपन्न हो पाते हैं। विडंबना यह है कि सरकार और समाज से ऐसे व्यक्तियों को उचित सम्मान नहीं मिल पाता।
  10. Anunad
    दसरथ मांझी का धैर्य हमें कभी भी अधीर न होने की सीख दे गया|
  11. eshadow
    दशरथ मांझी जी को दूर देश से मेरा भी शत् शत् नमन्।
    और आपको बहुत बहुत धन्यवाद, उन्हे हमारे ख्यालों में लाने के लिये।
  12. राकेश खंडेलवाल
    मान्यवर
    अग्रिम क्षमायाचना सहित निवेदन है कि डुष्यन्त कुमार की गज़ल का शेर
    दुरुस्त कर लें. सन्दर्भ के लिये उनकी पुस्तक देखें” साये में धूप ” जिसमें यह गज़ल शामिल है.आपका लेख बहुत अच्छा लगा
  13. अन्तर्मन
    मैंने इनके बारे में तो कभी नहीं सुन था…पर वाक़ई बहुत ही क़ाबिले तारीफ़ काम है…हद होती है इच्छा-शक्ति की!
    वैसे इस शेर का मैने तो वर्ज़न सुना है..वो फ़ुरसतिया जी वाला ही है। खन्डेल्वाल जी वाला वर्ज़न तो मैंने पहली बर सुना..
  14. प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह
    दशरथ मांझी जी वह नाम है जिसने अपने आप को त्रेतायुग के दसरथ के समकक्ष (उनसे भी आगे)लाकर खडा कर दिया। उन दशरथ ने आने प्राणो को वचनो से तुच्‍छ समझा तथा आज के दशरथ ने संकल्‍प की पूजा की तथा साधनाभाव की चिंता करते हुये कर्म मे रत रहे। दृढ इच्‍छा शक्ति का जो प्रमाण दशरथ मांझी जी ने दिया वह हम युवाओं के लिये सफलता सूत्र है। इच्‍छाशक्ति के आगे साधनाभव कभी भी आडे नही आती है। उन्‍हे तथा उनके आत्‍मविश्वास का शतशत नमन तथा उनकी अर्द्धागिनी जो उनके लिये प्रेरणा स्‍त्रोत थी उनको श्रद्धाजंली। मेरी जानकारी के अनुसार विद्योतमा और रत्‍नावली न होती तो हम कालीदास और तुलसीदास को न जानते इन्‍होने अपनी किसी भी कृति मे प्रेरणास्‍त्रोत पत्नियो का जिक्र नक नही किया। दशरथ मांझी जी पुन: नमन की उन्‍होने अपनी पत्‍नी को नही भूले।
  15. राजीव
    अनूप जी,
    सबसे पहले आपका धन्यवाद। कम से कम मुझे तो दशरथ जी के बारे में नहीं मालूम था और आपके लेख नें ही मुझे यह जानकारी दी। इसके बाद मुझे उनके बारे में और जानने की उत्सुकता हुई और मैंने संजाल पर भी खोजा और पाया कि उनके बारे में यदा कदा और कुछ समाचार पत्रों व अन्य लोगों ने भी लिखा है। एक स्थान पर उनका चित्र भी मिला, एक लेख ने तो उनकी तुलना शाहजहाँ से भी कर दी – ताजमहल के निर्माण संकल्प के कारण – परंतु मेरे अपने विचार में तो दशरथ जी का स्थान स्वयं किये गये अनवरत श्रम के कारण और भी ऊपर होना चाहिये। इस सन्दर्भ में मुझे दो और व्यक्ति याद आते हैं –
    1 – मार्क इंग्लिस, जिनका नाम भी हाल में प्रकाश में आया था और इसी वर्ष मई में उन्होंने एवेरेस्ट की चोटी पर पहुंचने में सफलता प्राप्त की थी – ग़ौरतलब यह कि श्री मार्क के दोनों ही पैर नहीं हैं और उन्होंने titanium के कृत्रिम पैरों और अपने अदम्य साहस के बल पर यह अजूबा कर दिखाया।
    2- प्रो. स्टीफेन हाकिंग, जिन्होनें अपनी शारीरिक अक्षमता जिसके चलते उनका मस्तिष्क उनके अंगों का संचालन ही नहीं कर सकता, मात्र कुछ उंगलियों को छोड़ कर। ऐसी अक्षमता के चलते उन्होंने विज्ञान के क्षेत्र कई आयाम स्थापित किये हैं, और इसके पीछे भी उनकी दृढ़ मन: शक्ति और साहस ही है।
    मेरे अपने विचार से तो श्री दशरथ द्वारा किया गया कार्य इन महानुभावों की उपलब्धियों के समकक्ष ही है। अदम्य साहस और दृढ़ इच्छा शक्ति, इन तीनों में ही कूट-कूट कर भरी है। यदि हम कल्पना भी करें तो जानेंगे कि अखिरकार 20-22 वर्ष तक अनवरत अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये मेहनत और संघर्ष करते रहना कोई साधारण कार्य नहीं है, और वह भी तब जब कि समाज का अपेक्षित सहयोग न मिला हो और आप अकेले ही इस प्रयास मैं रत हों। उपरोक्त सभी महानुभाव भिन्न कार्य क्षेत्रों में होते हुए भी समानांतर रूप से सराहनीय हैं और सभी के लिये प्रेरणा के स्रोत। मैं भी श्री दशरथ जी को शत्-शत् नमन करता हूँ।
    यह भी विडम्बना है और इस बात का मलाल भी होता है कि कुछ तो मीडिआ (यद्यपि चुनिन्दा समाचार पत्रों ने उनके बारे में समाचार और लेख प्रकाशित किये हैं) और बाकी अपने राजनीतिज्ञों की उदासीनता के कारण श्री दशरथ को वह यश, प्रशस्ति और सम्मान कदाचित न मिल पाया जिसके कि वे अधिकारी हैं। यदि इस प्रकार की कोई उपलब्धता किसी पश्चिमी देश के नागरिक ने प्राप्त की होती तो वहाँ की सरकार, जन समुदाय, मीडिआ सभी ने उनकी प्रशंसा और महानता का ऐसा गुणगान किया होता कि उसके सुर हमारे यहाँ भी स्पष्ट सुने जाते और यहाँ के जन-मानस के पटल पर भी ऐसे महान व्यक्ति की महिमामंडित छवि अंकित होती, उदाहरण के रूप में, माइकेल शूमाकर को उनकी उपलब्धियों के लिये हमारे निम्न मध्यमवर्गीय से ले कर उच्च वर्ग का तक का एक बड़ा अंश जानता है – शायद अधिक भी। परंतु श्री दशरथ मांझी के बारे में बहुत कम लोग – या शायद मैं ही अनभिज्ञ था!
  16. मेरा पन्ना » बुलन्द हौसले वाले पर्वतपुरुष को भावभीनी श्रद्धांजलि
    [...] आप सभी को याद होगा कि स्वर्गीय दशरथ मांझी जी ने गया जिले में तीस फीट ऊँची और बीस फीट चौड़ी तथा करीब डेढ़ किलोमीटर लंबी गहलौर पहाड़ी को अकेले अपने दम पर काटकर रास्ता बनाया था। इस बारे मे विस्तृत लेख यहाँ पर देखा जा सकता है। [...]
  17. shubham jain
    DHASRAT BABA- the IRON MAN we all Indians salute you for your unbeilavble work.
    India need people like Dhasrat baba
  18. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] 1.कन्हैयालाल नंदन- मेरे बंबई वाले मामा 2.कन्हैयालाल नंदन की कवितायें 3.बुझाने के लिये पागल हवायें रोज़ आती हैं 4.अथ कम्पू ब्लागर भेंटवार्ता 5.थोड़ा कहा बहुत समझना 6.एक पत्रकार दो अखबार 7.देखा मैंने उसे कानपुर पथ पर- 8.अनुगूंज २१-कुछ चुटकुले 9.एक मीट ब्लागर और संभावित ब्लागर की 10.उखड़े खम्भे 11.ग़ज़ल क्या है… 12.ग़ज़ल का इतिहास 13.अनन्य उर्फ छोटू उर्फ हर्ष-जन्मदिन मुबारक 14.पहाड़ का सीना चीरता हौसला [...]
  19. sunil
    दशरथ मांझी की हौसला
  20. sheelendr chauhan
    “उड़ान परो से नहीं होसलो से होती है ” दशरथ मांझी के होसले को नमन |
  21. Vikas
    दशरथ मांझी मेरा शत-शत नमन, मैं तहे दिल से उनको प्रणाम करता हूँ. मेरे मन में उनका स्थान सबसे अधिक प्रेरणा देने वालों में है.
  22. Anonymous
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    i read बुक ऑफ़ दसरथ मांझी.
    1. Anonymous
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      I AM STUDENT.
      I READ IN BOOK OF DASHRATH MANJHI.
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  23. ROHIT KUMAR
    HI…………I AM रोहित कुमार.
  24. ROHIT KUMAR
    HI…………I AM रोहित कुमार.
    दसरथ मांझी इन बिर्थ DAY 1934
  25. sanjay kumar
    दशरथ मांझी मेरा शत-शत नमन, मैं तहे दिल से उनको प्रणाम करता हूँ. मेरे मन में उनका स्थान सबसे अधिक प्रेरणा
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    वे दीवाली के मोहताज नहीं होते…दशरथ मांझी के हौंसले को सलाम.
  30. Phoolchand Nishad
    ऐसे महापुरुष को नमन
  31. Dipak Prakash Shitole
    Real hero
  32. Vipin Sharma
    ऐसे महापुरुष को नमन

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Friday, July 28, 2006

अनन्य उर्फ छोटू उर्फ हर्ष-जन्मदिन मुबारक

http://web.archive.org/web/20110101203155/http://hindini.com/fursatiya/archives/163

अनन्य उर्फ छोटू उर्फ हर्ष-जन्मदिन मुबारक

[आज प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह जी का जन्मदिन है। उनके बारे में लेख लिखने की सोच रहा था। हरिशंकर परसाई जी ने अपने समकालीनों पर लेख लिखे हैं।इसमें कई नामवर महापुरुष ,साहित्यकार है,नामवरजी भी हैं तथा पान-चाय वाले भी हैं।हमने सोचा कि हम भी अपने समकालीन पर कुछ लिखें। नामवर जी के बारे में तो हमें टोपना है कभी हो जायेगा। तो हमें अपने सबसे नजदीकी समकालीन लगे अपने साहबजादे अनन्य,संयोग से जिनका आज जन्मदिन है।हमारे घर में हमारे ये अकेले समर्थक हैं ब्लागिंग के। इनके समर्थन का वीटो न हो अब तक हम कई बार चिट्ठाकारी बंद कर चुके होते। फिलहाल नामवर सिंह जी को जन्मदिन (जन्म २८ जुलाई,१९२७)की मंगलकामनायें देते हुये अपने घर के 'नामवर' अनन्य (जन्म २८ जुलाई,१९९६)के बारे में यह लेख ।]
कल हम घर से निकले ही थे कि बारिश होने लगी।
सर मुढ़ाते ही ओले पड़ने के बाद घुटी चांद वाले ने क्या किया उसका विवरण नहीं मिलता लेकिन हम बारिश होने के बावजूद चलते ही रहे। बारिश की बूंदे हेलमेट पर गिरकर दम तोड़ दे रहीं थी। इस दुख में सारे कपड़े और सड़क भीग रहे थे। हम रात के साढ़े आठ बजे अर्मापुर से नवीन मार्केट ‘भजे’ जा रहे थे।
हुआ कुछ यों कि कल हमारी ‘घरैतिन’ घर में मौजूद कुछ पैसों से नाराज हो गयीं तथा उनको ठिकाने लगाने के लिये सरे शाम उनको पर्श में ठूंसकर ‘पैसों की कत्लगाह’ नवीन मार्केट चल दीं।बहाना था हमारे छोटे साहबजादे के जन्मदिन का।
हम जब शाम को घर पहुंचे तो रामराज्य था। हम खुशी-खुशी निरंतर की बेगारी में जुट गये। जब से इसका काउंटडाउन होने लगा है,हमारा जी हलकान है। संपादक साहूकार की तरह रोज सामग्री का तकादा करता है।
कुछ देर बाद फोन की घंटी बजी। पता चला कि खरीदार लोग पैसे घर में छोड़ गये थे। जो ले गये थे वह ए.टी.एम. कवर था। अभी भारत जैसे देश में इतना तकनीकी विकास नहीं हुआ कि बैंकें ए.टी.एम. कवर डालने के बाद पैसे दे दें।हमारे सामने चारा डाला गया कि मैं धन-रसद लेकर तुरंत पहुचूँ तथा अच्छे पति,पिता का ओहदा पा लूं। लेकिन हमने लालच में फंसने की बजाय निरंतर की बेगारी करना बेहतर समझा। कहा कि -सामान वहीं छोड़ दो ,सबेरे मंगा लेंगे।
अनन्य
अनन्य
जब काफिला घर पहुंचा तो सूरदास के ‘बालवर्णन’ की तर्ज पर ‘मूर्खता वर्णन’ हुआ कि कैसे पैसे तथा ए.टी.एम. घर में ही छूट गया। लोग अपने को एक-दूसरे से बड़ा बेवकूफ साबित करने में लगे थे। हम ‘नट्टू भाई’ की तरह सोच रहे थे कि सबसे बड़े बेवकूफ हमीं हैं जो यह सब सुन रहा है। और हुआ भी यही। मूर्खता-वर्णन के बाद नायिका ने घड़ी की तरफ निगाह डालते हुये मेरे ऊपर नैनकटारी चलाते हुये हवाओं से कहा-अभी तो दुकान खुली होगी। कोई चला जाये तो मिल जायेगें कपड़े। यह कोई चला जाये वाली अदा हमारी ‘इनकी’ खास अदा है। कमरे में एक व्यक्ति भी हो तो भी कहा जायेगा-कोई हमें पानी पिला दे,कोई ये काम कर दे,वो काम कर दे। बहरहाल, दुकान को फोनियाया गया और लब्बो-लुआब यह कि हम भरी रात अपने मोटर साइकिल पर सवार होकर चल दिये।
हम भीगते पानी में सड़क पर फटफटिया दौडा़ते चले जा रहे थे। देखादेखी दिमाग के घोड़े भी दौड़ने लगे।अतीत, वर्तमान तथा भविष्य के अंतहीन मैदानों में -सरपट।
ये जो हमारे छोटे साहब जादे हैं वो दुनिया के हर साहबजादे की तरह ‘टेलरमेड’ आइटम हैं। जब पैदा हुये दस साल पहले तो फैक्ट्री का सबेरे का हूटर बज रहा था। हमें लगा कि खुदाबंद ने सबेरे-सबेरे सामान डिलीवर कर दिया और इन्होंने दुनिया में भी अपना कार्ड, सबेरे-सबेरे ०७३०बजे, २८ जुलाई सन १९९६ को ,शाहजहांपुर में पंच किया। जब तक हम ‘नाम समुद्र’ में डूबकर इनके लिये नाम तय करें तब तक हमारे बड़े बेटे ने काम चलाने के लिये इनको कामचलाऊ नाम दे दिया-छोटू। अब बाद में स्कूल जाते समय परमानेंट नाम भले अनन्य तय किया गया लेकिन दुनिया में इनके अस्थाई नाम का ही बोलबाला है। अब हालत यह है कि इनका स्थायी नाम ‘अनन्य’ खूबसूरत, बडा़ अच्छा, मीनिंगफुल होते हुये भी इन्हीं के अस्थायी नाम छोटू से ‘पिट’ जाता है। जैसे भारत में कुछ सालों के लिये अस्थाई तौर पर लागू नासपीटी अंग्रेजी भारतीय भाषाओं को रोज पीटती रहती है।
अब यह भी क्या बताना कि अपना हर काम अपने अंदाज़ में करने के आदी हमारे छोटू ने कौन बनेगा करोड़पति के पहले करोड़पति हर्ष वर्धन नवाटे के नाम के खुद अपना नाम हर्ष रख लिया। लेकिन ‘हर्ष’ नाम को तरजीह सिर्फ उतनी ही मिली जितनी कि हिंदी की जगह देवनागरी को मिलती है। फिल्मों के बेहद शौकीन अनन्य को ऋतिक रोशन बेहद पसंद हैं। और जब ये किसी को चाहते हैं तो हचक के चाहते हैं। ये ऋतिक के पास रहने के लिये उसके घर बरतन मांजने तक को तैयार हैं। आज जब हमने कहा कि रात को ऋतिक का फोन आया था कि सबेरे से बरतन मांजने को भेजो तो बोले-कह दीजिये आज हम बर्थ डे के लिये छुट्टी पर हैं।
ऋतिक के बाद इनके दूसरे हीरो हैं सचिन तेंदुलकर। जहां नाटे उस्ताद पवेलियन गये ये टीवी बंद कर देते हैं। तेंदुलकर के खेलते रहने पर टीवी बंद कराने की औकात केवल बिजली महारानी की ही है।आजकल धोनी पर भी काफी फिदा रहते हैं।
घर में भी आने वालों में सबसे पसंद हमारे सुपुत्र उसको करते हैं जो इनको निरंतर बिना आउट किये लगातार बालिंग करता रहे तथा गरिमापूर्ण ढंग से हारता रहे।
कैफ की नकल करते हुये प्रभावपूर्ण फील्डिंग का नजारा करने के लिये जमीन पर गिरने की प्रक्रिया में अक्सर राणा सांगा के वंशज बन जाते हैं।अक्सर कई चोटें का सुराग तब लगता है जब वे ठीक होने के अल्ले-पल्ले पहुंच जातीं हैं। टीवी के बेहद लती होने की हद तक शौकीन होते जा रहे छोटू जुमे के दिन सब काम छोड़कर ‘लाफ्टर चैलेंज’ को कृतार्थ करते हैं। दोस्त बनाने के मामले में तथा उनसे मिलने,खेलने के बहाने तलाशने का जो अंदाज है उससे हमें लगता है कि ये बड़े आराम से -‘दोस्तों से मुलाकात के कुछ तरीके’ टाइप की बेस्ट सेलर लिख सकते हैं।
शायद यह दोस्त पसंदगी ही है जिसके कारण कि अनन्य लगातार कई बार अपने विद्यालय में ‘फुल अटेंडेंस’ का प्रमाणपत्र पा चुके हैं।
कपडों के मामले में चूजी होते जा रहे हमारे सुपुत्र अपने सबसे चाहने वाले दोस्त के घर से गुजरते हुये भी वहां जाने का लालच त्याग देते हैं अगर कपड़े कायदे के नहीं पहने होते हैं। घंटो की तैयारी के बाद भी मम्मी की साड़ी,ब्लाउज मैंचिंग पर अक्सर फाइनल रेफरी का काम हमारे ‘अनन्य’ के अधिकार क्षेत्र में ही है।
बालक की जन्मकुंडली के अनुसार बालक सिंह राशि का है। नेतृत्व की क्षमता से युक्त। सबसे मजे की बात यह लिखी थी अंग्रेजी की जन्मकुंडली में कि इसको भाषण की कला पर असाधारण अधिकार होगा तथा बोलने के लिये ‘पोडियम’ के सहारे की जरूरत नहीं होगी।
अनन्य
अनन्य
जब हमारे महारथी तक मौका पड़ने पर अपनी बात कहने से चूक जाते हैं तो बालक की भाषण कला के बारे में अभी से क्या कहें लेकिन पोडियम की जरूरत नहीं होगी यह बात हमें लगता है कहीं सच न साबित हो जाये क्योंकि हमारे साहबजादे खाने-पीने के मामले में जरा चूजी टाइप हैं। केवल चिप्स,मैगी,बर्गर,पिज्जा जैसे सारतत्व ग्रहण करने तथा सारे पौष्टिक तत्व को थोथा समझकर उड़ा देने के हिमायती हैं। लिहाजा दुबले-पतले इतने हैं कि पोडियम की ऊंचाई तक पहुंचने में समय लगेगा ।शायद वह भी बोलने के लिये हटाना न पड़े ,ताकि लोग वक्ता को देख भी लें।। बावजूद अपने सींकिया बदन के ये अक्सर सलमान खान टाइप अदा में हाथ की मछलियां फुलाते हुये कई बार देखे गये हैं।
कुछ डायलाग इनकी तर्क बुद्धि का नमूना हैं। इनके मुंह से अक्सर सुना डायलाग-’जो कहता है वही होता है ‘(जो जैसा होता है वैसा दूसरों के बारे में सोचता है) बिना कापीराइट के कई बार प्रयोग किया है। ऐसे ही एक बार हमने किसी बात पर कुछ गलत जानकारी दी। पकड़ गये तो हमें बताया गया-पापा,आपने झूठ बोला ,आपको पाप पड़ेगा। पाप की बात पर हमने घबराने का मुजाहिरा किया तथा बताया कि पाप की कितनी भयानक सजा मिलती है। सजा के भयावह विवरण से ऊबकर हमें माफ कर दिया गया। कहा गया कि आप को पाप नहीं पड़ेगा। हमने कहा -लेकिन तुम तो कह रहे थे कि झूठ बोलने पर पाप पड़ता है।तो हमें बताया गया कि वे हमें ऐसे ही डराया जा रहा था। हमने कहा कि इसका मतलब तुमने हमसे झूठ बोला। तो बताया कि हां,झूठ बोला। हमने डराते हुये कहा कि इसका मतलब तुमको पाप पड़ेगा। इस पर आत्मविश्वास के साथ बताया गया- हमको पाप नहीं पड़ेगा ,क्योंकि बच्चों को पाप नहीं पड़ता।
खतरे को भांपकर घटना स्थल से जिस कलाकारी से गायब होते हैं वह विरली है। किसी के गुस्से का अंदाजा लगता ही ये महाशय ‘वामन-कदम’ से कमरा लांघ कर ऐसे गायब गायब होते हैं जैसे अपने देश के मध्यवर्ग से कर्मनिष्ठा ,देश के प्रति लगाव आदि। खतरा टलते है दूसरे कमरे से अपने चेहरे की मोहनी,कातिलाना मुस्कान में आज्ञाकारिता का ऐसा लेप लगाकर ‘भये प्रकट कृपाला’ होते हैं कि आप ‘दीनदयाला’ होने के सिवा कुछ नहीं कर सकते।
हमारे छोटू को खाने-पीने की कुछ चीजें बहुत प्रिय हैं।लेकिन अपनी प्रिय से प्रिय चीजें भी ये कभी अकेले नहीं खा सकते। साथ के सब लोगों को बांटकर ही खाते हैं। रेजगारी के लिये दीवानगी की हद तक लगाव रखने वाले अनन्य अपना गुल्लक भरते रहते हैं। लाखों की जरूरत होने पर अपना चंद रुपयों का गुल्लक बैलेंस अक्सर हाजिर कर देते हैं।
लोगों ने तो अपने उम्र के तीसरे दशक में बचपन के अनुभव बताने शुरू किये। हमारे छोटू तो दो साल की उमर से अनेको किस्से यह कहकर सुना चुके हैं-जब हम छोटे थे…।
घर वालों से लगाव,संवेदनशीलता तथा परदुख कातरता जैसे गुण जिस मात्रा में हमारे छोटू के अंदर हैं उससे लगता है कि इनसे हम गंडा बंधवा लें। खुद बीमार होने पर कोई गारंटी नहीं कि ये तकलीफ का पता लगने पर आपका सर न सहलाने लगें।जो भी सदस्य बाहर है बार-बार उसकी कुशल-क्षेम बार-बार पूछना इनकी आदत में शामिल है।
यह भी विरला गुण है कि जिस बड़े भाई से अभी पिटे हैं घर में अगर इनके लिये कुछ आ रहा है तो कहेंगे दादा का हिस्सा? अबयह बात अलग है कि ज्यादा पिटने पर कहें- आप अभी दादा को मेरे सामने पीटिये। जोर से मारिये नाटक मत करिये।
एक बार किसी शैतानी पर अपने पापा से पिट गये।बाकी लोग मिजाज पुर्सी करने लगे।
इनकी मम्मी बोली-पापा,गन्दे हैं। तुम मेरे पास आओ।
बोले-नहीं आपके पास नहीं आऊंगा। आपकी शिकायत पर ही पापा ने हमें पीटा।
दादी बोली-बेटा , ये दोनों गंदे हैं । तुम मेरे पास आओ।
बोले-नहीं। आपके पास भी नहीं आऊंगा। जब मम्मी की शिकायत पर पापा हमें पीट रहे थे तो आप कोने में खड़ी मुंह छिपाकर हंस रही थीं।
दादी बोली- हम कहां ,कैसे हंस रहे थे।
ये मुंह छिपाकर हंसने की एक्टिंग करते हुये बोले -ऐसे। बताते-बताते सबके साथ यह भी हंसने लगे।
अपना जन्मदिन मनाने के लिये दीवानगी की हद तक उत्साहित अनन्य ने यह व्यवस्था दी कि चाहे कुछ हो जाये उनका जन्मदिन जरूर मनाया जाये। महीने के अंत में पैदा होने वाले बच्चों के सामने माता-पिता अक्सर आर्थिक रोना रोकर उनके रंग में भंग डालने का प्रयास करते पाये जाते हैं। हम इस बार ऐसा कुछ प्रयास कर पायें इसके पहले ही एक दिन बड़े बच्चे का द्वारा समोसे की फरमाइश करने पर डायलाग मारा गया- दादा,पहले हमारा बर्थडे हो जाने दो। इसके बाद जब पैसे बचे तो समोसे मंगा लेना।
इस सावधानी पर कौन न मर जाये।
अनन्य-सौमित्र
सोचते-सोचते हम दुकान पहुंच गये। जो ड्रेस पसंद करके रखी गई थी लेकर चलने लगे। याद आया कि दबे स्वर में कहा गया था कि वहां जीन्स भी थी जो छोटू पर बहुत सूट करेगी(फिजूलखर्ची के हमारे उपदेश की आशंका को ध्यान में रखते हुये दबा स्वर दफन कर दिया गया)।हमने जीन्स देखी तथा अचानक हम प्रेमचंद के ‘बड़े भाई साहब’ बन गये जो तमाम उपदेश देते-देते कनकौवा लूट के भाग लेते हैं। हमने जीन्स भी खरीद ली तथा वीरतापूर्वक घर का रुख किया। हमारी शहंशाही देखकर दुकानदार ने पूछा – आपके लिये भी कपड़े दिखायें? हमने कहा-यार,हम तो मैनीक्वीन हैं। जो कपड़े घरवाले पसंद करते हैं वही पहनने के अधिकारी हैं। कैसे खरीद लें।
लौटते में भीगते हुये जब घर पहुंचे तब पता चला कि हमारे सुपुत्र हमें भीगने के लिये सारी तथा भीगते हुये उपहार लाने के लिये धन्यवाद बोलने की हिदायद देकर सोने की तैयारी कर चुके थे। हमारे आने पर खुद यह जिम्मेदारी निभाई।
फिलहाल तो केक कटने की तैयारी चल रही है घर में। हमारे साहबजादे दस साल के जो हो गये आज!
पुनश्च: अभी पता चला कि हमारे एक और नामवर समकालीन ,अबे कस्बाई मन वाले साथी ,भारत भूषण तिवारी का भी आज जन्मदिन है। भारत भूषणजी को उनके जन्मदिवस पर हार्दिक बधाई एवं मंगलकामनायें।
अनन्य
अनन्य अपनी पेंटिंग के साथ

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

24 responses to “अनन्य उर्फ छोटू उर्फ हर्ष-जन्मदिन मुबारक”

  1. अतुल
    अन्नय उर्फ छोटू भईया को ढेर सी बधाईयाँ। वायदा यह रहा कि अगली कानपुर ट्रिप पर इनको हम जी भर कर बालिंग करेंगे। लेकिन बाँके से बालिंग की उम्मीद बिल्कुल न रखें क्योंकि वे बेसबाल स्टाईल में गेंद फेंकते हैं।
  2. आशीष
    अनन्य को जन्मदिन की हार्दिक बधाई !
  3. भारत भूषण तिवारी
    अनन्य को जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!
    संयोगवश आज मेरा भी जन्मदिन है. २८ साल पहले जिस मनहूस दिन चीन में भीषण भूकम्प में साढे छह लाख लोग मारे गये थे, उसी दिन धरती पर हमारा पदार्पण हुआ
  4. जीतू
    छोटू को…सॉरी अनन्य को चाचा चौधरी की तरफ़ से ढेर सारी शुभकानाएं। जिन्दगी मे बचपन ही एक ऐसा समय होता है जब हर फरमाइश पूरी होती है।इसलिए पूरी तरह से इन्ज्वाय करो।
    पापा को परेशान मत करना, नही तो कंही तुम्हारे ऊपर कविताएं लिख दी तो तुमको तो सुना के ही रहेंगे।समझ गए ना।
  5. ratna
    छोटू जी को जन्म दिन की बधाई । ईश्वर करे उसे जीवन की हर खुशी उमर भर मिलती रहे।
  6. सागर चन्द नाहर
    अनन्य को एक और नये चाचा की तरफ़ से जन्मदिन की हार्दिक बधाई !
  7. अनूप भार्गव
    अनन्य को ढेर सारा प्यार और शुभकामनाएं
  8. eshadow
    अनन्य को ढेर सारा प्यार, आशीर्वाद, शुभकामनायें पृथ्वी के दूसरे कोने में बैठे हुए एक और चाचा की तरफ से। फरसतिया जी आप गा रहे होंगे “मेरा नाम करेगा रौशन जनग में मेरा राजदुलारा” और अनन्य गायेंगे “पापा कहते हैं बडा नाम करेगा”।
  9. eshadow
    और हां माननीय भारतभूषण जी तथा नामवर जी को भी बधाइयां।
  10. राजीव
    चिरंजीवी अनन्य, और परिवार के अन्य सदस्यों को अनन्य के जन्मदिवस की वर्षगाँठ पर बहुत-बहुत बधाई। हमारी कामना है कि अपनी वाकपटुता, सम्वेदनशीलता व अन्य सद्गुणों के विकास के साथ वह जन्मकुंडली के फलादेश को सत्य सिद्ध करे।
    और अब इस लेख की बात। कुछ उपमायें और वर्णन बहुत आनन्दकारी लगे –
    - ‘पैसों की कत्लगाह’ a.k.a. नवीन मार्केट (क्या सटीक नामकरण है!)
    - मेरे ऊपर नैनकटारी चलाते हुये हवाओं से कहा – हवायें न हुयीं, कलिदास के मेघ हो गये – बहुत खूब
    - हम तो मैनीक्वीन हैं – यह उपमा तो निश्चय ही रोचक है
  11. अन्तर्मन
    अनन्य को हमारी ओर से जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाइयाँ! वाह भाई क्या लेख लिख मारा है..!
  12. नितिन बागला
    छोटू को जन्मदिन की शुभकामनाएं…..
    वैसे मेरा अनुभव ये कहता है कि दुनिया भर के छोटू, छुट्ट्न, छुटका या छोट्या…..ऐसे ही होते हैं….
    :)
  13. प्रेमलता पांडे
    जन्मदिन पर छोटू को आशीर्वाद और बड़ों को बधाई।
    -प्रेमलता
  14. Manish
    अनन्य को जन्मदिन की शुभकामनाएं !
  15. SHUAIB
    हमरी तरफ से बहुत बहुत मुबारकबादियाँ
  16. Raman Kaul
    बधाई हो अनन्य। अब तो बेटा बड़े हो गए, चिट्ठाकारी कब शुरू कर रहे हो? :-)
  17. Tarun
    छोटू अनन्य को जन्मदिन की हार्दिक बधाई, बर्थडे में ये है तो शादी के वक्त तो लगता है किताब ही पढ़नी पड़ेगी, वाह जनाब अनुपजी।
  18. indra awasthi
    chakachak lekh!
    Chhotu ko bahut sari badhaiyan!
  19. फुरसतिया » बेटे भी संवेदनशील होते हैं
    [...] एक दिन अपने छोटे बेटे अनन्य को उसका होमवर्क कराते हुये हमने उसका लिखा हुआ एक पेज देखा। उसके स्कूल में विषय मिला होगा -माता-पिता का हमारे जीवन में स्थान। उसका लिखा पढ़ते हुए मुझे लगा कि बेटे भी संवेदनशील होते हैं। आप भी बांचिये इसे। शायद आपको भी लगे कि बच्चे चाहे वे बेटियां हों या बेटे ,संवेदनशील होते हैं। [...]
  20. anita kumar
    छोटू जी को जन्म दिन की हार्दिक शुभ कामनाएं। हां तो पार्टी में क्या क्या खाया गया वो तो बताया ही नहीं, जो गिफ़्ट मिले वो दादा के साथ बांटे कि नहीं।
  21. कस्सम से इससे कम न हो पायेगा
    [...] कपड़ों के बारे में तो हम कहते भी हैं कि भैया हम तो मैनीक्वीन हैं। जो पहनाया जाता है पहन लेते [...]
  22. ई कोई नया फ़ैशन है का जी?
    [...] में बच्चे को स्कूल की बस में बैठा कर आये। बच्चा कोट [...]
  23. AMAR

    तो… अनन्य के ‘ टेलर ‘ ने दुकान क्यों बन्द कर दी ?
    पिट गये क्या ?

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