Thursday, March 25, 2010

….बगीचे के फ़ूल और पक्षियों की आवाजें

http://web.archive.org/web/20140419215011/http://hindini.com/fursatiya/archives/1320

….बगीचे के फ़ूल और पक्षियों की आवाजें

कुछ दिन पहले हमारी श्रीमतीजी ने अपने बगीचे की कुछ फ़ोटुयें खींची। आइये आपको भी दिखाते हैं! नीचे लगाई हैं! देखिये एक-एक कर करके। आराम से। हड़बड़ाइये नहीं! फ़ोटुयें भाग नहीं रही हैं। सिर्फ़ सरक रही हैं आगे की तरफ़ लेकिन आप जिसको चाहेंगे वह रुक भी जायेंगी। बड़ी अनुशासित च आज्ञाकारी फोटूयें हैं!
लेकिन देखने के पहले फ़ोटुओं के ऊपर लगे बायीं तरफ़ के माइक को बंद कर दें। हमको अभी पता नहीं है कि स्लाइड शो में इसे कैसे बंद किया जाता है। :)
जब हम सन 2001 में इस घर में आये थे तो जिसे अभी बगीचा कहते हैं वहां कंक्रीट का मलवा था। घर नया जीर्णोद्धारित हुआ था और अपने यहां की मकान बनाने की परम्परा के अनुसार ठेकेदार पुराने मकान का मलवा तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा की मासूम भावना से ओतप्रोत होकर यहीं दफ़न कर गया था। मलवा बेचारा अकेलापन न महसूस करे इसलिये उसका साथ देने के लिये गाजर घास उग आई थी। कुछ दिन बाद नीचे की मेन पाईप लाइन भी भावुक होकर फ़ट गयी और एक बच्चा तालाब का सा सीन बन गया जिसे देखते हुये हमारे घरवाले महीनों हमें धिक्कारते रहे कि कौन बात के अफ़सर जब एक पाइपलाइन न ठीक करवा सके। काबिल कविगण तालाब को गूगल अर्थ पर देखकर अहा ग्राम्य जीवन भी क्या घराने की दस-पन्द्रह कवितायें खैंच सकते थे।
पाइप लाइन ठीक होने के दौरान हमने देखा कि ये कैसे रिपेयर होती हैं। आदमी अपनी ऊंचाई से भी ड्योढ़े के गढ्ढे में घुसा पाइप कमर तक पानी में घुसा लाइन ठीक कर रहा है। जिस अंदाज में आपरेशन करने वाला डॉक्टर औजार मांगता है वैसे ही मिस्त्री द्वारा ऊपर के साथी से छेनी, रिंच, हथौड़ी मांगी जाती देखी। ये अनुभव बाद में बहुत बार हुये। एकाध बार तो देखा कि कमर तक धंसे पानी में अपने साथी को वहीं छोड़कर लोग गोडाउन सामान लेने के लिये भागते। वहां गोडाउन कीपर चाय पीने के निकल गया होता। चाय की दुकान से पता चलता कि अब्भी-अब्भी गये हैं भैया उधर की तरफ़। वहां से फ़नफ़नाते हुये वापस लौटने पर देखा जाता कि भैया सहित बाकी सब लोग साथी हाथ बढ़ाना वाले अंदाज में जुटे हैं।
खैर ऊ अब छोड़िये। त हम आपको सुना रहे थे बगीचा कथा। तो भैया इस घर में आने के बाद फ़िर हमें लगाया गया बगीचा संवारने में। बहुत दिन तक कोई माली न मिला। लगातार उलाहने के चलते एकाध बार खुदै घास उखाड़ने लगे। घास तो जो उखड़ी सो उखड़ी एक दिन हमारा कन्धा ही उखड़ गया। उखड़ने से जरा कुछ गड़बड़ सा लगता है सो बाद में उसे डिस्लोकेट हो गया कहने लगे।
हमारे कन्धे के साथ काफ़ी दिन से यह समस्या है। जब मन आता है उखड़ जाता है। कन्धे का जो बाल और साकेट ज्वाइंट होता है उनमें आपस में जब मन आये तब कुट्टी हो जाती है। बाल जब मन आये साकेट का बहिष्कार करके बाहर निकल आता है और कन्धा बाकी शरीर से समर्थन वापस लेकर झोला जैसा लटक जाता है। फ़िर कन्धे को मनुहार करके वापस अपने आसन पर बैठाया जाता है। कन्धे के उखड़ने पर दर्द जो होता है सो होता है लेकिन वापस बैठने पर जो आनन्द का अनुभव होता है शायद उसी को बड़े-बड़े विद्वानों ने अनिर्वचनीय आनन्द कहा होगा।
एक बार अपने बच्चे को पिता के अधिकार का उपयोग करने की सात्विक भावना के वशीभूत होकर चपतियाने के लिये मैंने हाथ आगे किया तो पता अंतिम परिणति अनिर्वचनीय आनन्द की प्राप्ति में हुई। तबसे मैंने पुत्र-प्रताड़ना की भावना को अपने और बालक के स्वास्थ्य के हित में मानकर सदा के लिये तिलांजलि दे दी। बाद में फ़िर बच्चों की प्रताड़ना के लिये हमने हिंसा का सहारा लेना छोड़ दिया। पिता-पुत्र प्रेम संबंध की आवश्यक कड़ी, मार-पिटाई , की कमी को समय-समय पर डांट-फ़टकार कर पूरा किया जाता।
बहरहाल बात बगीचे की हो रही थी। तो धीरे-धीरे करते-करते इसका विकास हुआ। न जाने कितने माली आये इसके परिष्कार करने के लिये। मिटटी और पौधे को एक आंख से देखने वाले मेहनती लोग पसीना चुआ-चुआकर और पैसे लेकर आये और चले गये। हरेक का बागवानी का ज्ञान दूसरे से एकदम अलहदा। जुदा। हरेक के साथ सब कुछ बदल जाता- पौधा, बीज, खाद, मिट्टी और तरकीब तक। बगीचा बेचारा अचल संपत्ति होने के चलते जैसा का तैसा बना रहा। लोग एक दिन से लेकर महीने भर तक में माली है से माली था में बदलते गये। कई बार तो जो माली था वही माली है बने और उकता फ़िर से माली था बन गये। एकाध बार तो मन किया कि बाजार जाकर बागवानी कैसे करें किताब ले आये जाकर और घास छीलने लगें। लेकिन … अब छोड़िये लेकिन के बारे में क्या बतायें- लम्बी कहानी है।
फ़िलहाल हमारे बगीचे की देखभाल दिलीप करते हैं। वे भी कई बार जहाज के पंछी की तरह थे, हैं, थे, हैं का झूला झूल चुके हैं। कुछ दिन करते हैं फ़िर बेहतर काम की तलाश में कहीं चले जाते हैं। जहां जाते हैं वहां से फ़िर बेहतर काम की तलाश में फ़िर दूसरी जगह चले जाते हैं फ़िर और बेहतर काम की तलाश में लौट आते हैं। अब यह अलग बात है कि इस बीच बेहतर कुछ नहीं होता सिवाय दो सौ, तीन सौ बढ़ने के अलावा।
कभी-कभी मन की उड़ान इनको भी कुछ नया करने को उकसाती है। ये सोचते हैं नर्सरी खोलेंगे, फ़ूल बेचेंगे , बीज बनायेंगे। लेकिन कुछ ऐसा हो जाता है कि जगह बदल-बदलकर वही काम करते रहते हैं। हालत कहीं से बेहतर नहीं होते। हमारे यहां तो ये लोग एकाध घंटा ही शाम को या सुबह काम करते हैं लेकिन जहां काम करते हैं वहां माली के लिये जो पैसे न्यूनतम वेतन सरकार द्वारा घोषित है वो कभी नहीं पाते। जिनकी मेहनत से खिले फ़ूल देखकर लोगों के मन खिल जाते हैं उनके चेहरे अक्सर मुर्झाये ही रहते हैं।
खैर, फ़िर लौटा जाये बगीचे की ओर। मैं इस तरफ़ से काम भर का उदासीन हूं। फ़ूल पौधे खिलें तो अच्छा लगता है। न खिलें तो इत्ता बुरा नहीं लगता कि मेहनत करके माली, पेड़,पौधे का इंतजाम मुझे झमेला ही लगता है। लेकिन श्रीमतीजी को इस मामले में बहुत रुचि है और इस मामले में उनकी लगन देखकर बाधा, विविध बहु विघ्न घबराते नहीं घराने की है। इसीलिये हमारे घर में हमेशा कोई न कोई फ़ूल, फ़ल, सब्जी खिलती, उगती, निकलती रहती हैं।
बगीचे में खिले फ़ूल मेरे कई लेखों में बिना पूछे जबरियन घुस आते रहे। गेंदा देखकर लगता है कि किसी मां का लाड़ला, घामड़ बेटा है जिसको उसकी अम्मा कजरौटा लगाकर राजा बेटा बनाकर बगीचे में भेज देती हैं। बाकी फ़ूलों में से बहुत के नाम भी नहीं पता। दो दिन पहले दिलीप ने बताया कि एक डॉग फ़्लॉवर भी होता है जो कुत्ते जैसी कुछ हरकते करता है। उसने दिखाने की कोशिश भी की लेकिन फ़िर बीचै में मामला छोड़ दिया।
ये फ़ोटुयें तो बहुत दिन हुये खैंची गयीं थीं। सोचा आपको भी दिखायें। आज सुबह बाग में टहलते हुये ये नीचे वाला वीडियो भी बना लिया। इसमें फ़ूल तो हैं हीं। साथ में पक्षियों की आवाजें भी हैं। मोर, कौवा, चिड़ियां और हमारी चाय की चुस्की भी। देखिये, सुनिये और बताइये कैसा लगा? :)

36 responses to “….बगीचे के फ़ूल और पक्षियों की आवाजें”

  1. anitakumar
    Anup ji your house looks lovely…the flowers are beautiful…kandhe ka dhyaan rakhiyegaa
  2. venuskesari
    एकाध बार तो मन किया कि बाजार जाकर बागवानी कैसे करें किताब ले आये जाकर और घास छीलने लगें।
    दम्बूक पकडने वाले हाँथ में खुरपी :)
    सोच में जो फोटो बन रही है उ इन सब से जियादा मजेदार है
    एक हाँथ में दम्बूक अऊर एक हाँथ में खुरपी :):):)
    बढ़िया है …हे हे हे
  3. समीर लाल
    बढ़िया लगा आपके सथ बगीचा घूमना और चाय सुड़कना!!

    आपके लिए विशेष संदेश:
    हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!
    लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.
    अनेक शुभकामनाएँ.
  4. अभय तिवारी
    कमेन्ट बाद में.. पहले इस संगीत की दादागिरी बन्द कीजिये। लगता है कि किसी टीनएजर के कमरे में घुस आए हैं।
  5. अभय तिवारी
    लिखा बहुत अच्छा है, फूल-पत्ती, चिरैया की आवाज़ें भी बहुत मनभावन है.. लेकिन इस सब प्रदर्शन का मतलब क्या है..? क्या चाहते क्या हैं आप? लोग आप का बाग़-बग़ीचा देखकर ईर्ष्या में आत्महत्या कर लें?
  6. प्रवीण पाण्डेय
    सच में इतनी सुन्दरता लाने के लिये बहुत परिश्रम करना पड़ता है ।
  7. Shiv Kumar Mishra
    बहुत बढ़िया पोस्ट. लेखन पर नया क्या कहें? वही..मस्त लेखन.
    बगीचे और फूलों की फोटो देखकर किसी का भी मन खुश हो जाए. ईर्ष्या करने वाले का भी…..:-)
  8. रंजना.
    आह…एकदम सच्ची मुच्ची में दिल गार्डेन गार्डेन हो गया….
    लेकिन पूरी पोस्ट से गुजरते समय बड़ी असुविधा भी हुई,कि खाली पढ़े कि खाली देखें…
    दोनों में से किसीका भी रस ऐसा नहीं कि छोड़ा जा सके…
    लाजवाब पोस्ट…आनंद रस पान कराने हेतु बहुत बहुत आभार…
  9. वन्दना अवस्थी दुबे
    ” अपने यहां की मकान बनाने की परम्परा के अनुसार ठेकेदार पुराने मकान का मलवा तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा की मासूम भावना से ओतप्रोत होकर यहीं दफ़न कर गया था।”
    “काबिल कविगण तालाब को गूगल अर्थ पर देखकर अहा ग्राम्य जीवन भी क्या घराने की दस-पन्द्रह कवितायें खैंच सकते थे”
    “गेंदा देखकर लगता है कि किसी मां का लाड़ला, घामड़ बेटा है जिसको उसकी अम्मा कजरौटा लगाकर राजा बेटा बनाकर बगीचे में भेज देती हैं। ”
    बहुत शानदार. प्रकृति का मानवीकरण तो आपकी विशेषता है. वीडियो और तस्वीरें बहुत अच्छी हैं. दिलीप जी की फोटो लगा के अच्छा किया.
  10. Dr.Manoj Mishra
    बहुत खूबसूरत,जितनी तारीफ करें कम है.
  11. प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI
    लगता है ज्ञान जी की आत्मा आपके शरीर में प्रवेश कर गयी है ….चलिए अब नए अनुभव पढने को मिलेंगे ही और लोगों को आपकी मौज से मुक्ति !!
    वैसे चाय थोड़ा और ज्यादा सुडुक कर पिया ना करिए !
  12. Abhishek
    एक तो खुबसूरत उपर से अनुशासित च आज्ञाकारी. खैर उ छोडिये बगीचा कथा सुनाते-सुनाते आप कित्ती तो अच्छी बाते बता गए. और अगली बार कानपुर आया तो इसी ‘पार्क’ में चाय पीयेंगे :)
  13. kshama
    SUNDAR TASVEEREN! bAAGWAANEE MERABHI PASANDEEDA SHAGUL HAI!
  14. जि‍तेन्‍द्र भगत
    सोचा था पार्क में टहल आऊँ पर यहॉं आकर लगा जैसे पार्क ही घुम आया:)
    हॉं, गाना बड़ा खतरनाक था,
    स्‍लाइड शो उतना ही मोहक।
  15. Laxmi N. Gupta
    अनूप जी,
    आपका बगीचा बहुत सुन्दर लगा और लेखन हमेशा की तरह लाजवाब है। बधाई।
  16. aradhana "mukti"
    आप भी धन्य हैं. कभी हँसाते चले जाते हैं-
    -”घर नया जीर्णोद्धारित हुआ था और अपने यहां की मकान बनाने की परम्परा के अनुसार ठेकेदार पुराने मकान का मलवा तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा की मासूम भावना से ओतप्रोत होकर यहीं दफ़न कर गया था। मलवा बेचारा अकेलापन न महसूस करे इसलिये उसका साथ देने के लिये गाजर घास उग आई थी। कुछ दिन बाद नीचे की मेन पाईप लाइन भी भावुक होकर फ़ट गयी और एक बच्चा तालाब का सा सीन बन गया”
    -कन्धे के उखड़ने पर दर्द जो होता है सो होता है लेकिन वापस बैठने पर जो आनन्द का अनुभव होता है शायद उसी को बड़े-बड़े विद्वानों ने अनिर्वचनीय आनन्द कहा होगा।
    …तो कहीं रुला देते हैं–
    -जिनकी मेहनत से खिले फ़ूल देखकर लोगों के मन खिल जाते हैं उनके चेहरे अक्सर मुर्झाये ही रहते हैं।
    …फिर हँसा देते हैं–
    -गेंदा देखकर लगता है कि किसी मां का लाड़ला, घामड़ बेटा है जिसको उसकी अम्मा कजरौटा लगाकर राजा बेटा बनाकर बगीचे में भेज देती हैं।
    (पूरा कजरौटा ही लगा देती है मां-हमारे यहाँ कजरौटा काजल रखने वाले बरतन को कहते हैं)
    और सुनिये—ये आपके स्लाइड शो का पों पों बन्द नहीं हुआ. हमें अपने लैप्पी की जबान बन्द करनी पड़ी और जब आपके बगीचे की चिड़िया, कौए आदि की आवाज़ सुनने के लालच में लैप्पी की आवाज़ फिर ऑन की तो फिर स्लाइड शो का पोंपों…ओफ़्फ़ोह बड़ी मसक्कत करके तो पोस्ट पढ़ी और वीडियो भी देखा, पर अफ़सोस वीडियो की आवाज़ नहीं सुन सके. किसी एक्सपर्ट से पूछकर स्लाइड शो का मुँह बन्द करना सीख लीजिये…
  17. aradhana "mukti"
    वैसे आपका बगीचा सचमुच बहुत सुन्दर लग रहा है. मुझे घर की याद आ गई. मेरे पिताजी भी बागवानी के बड़े शौकीन थे. खुद ही डहेलिया, गुलदाउदी, बेला, रातरानी, मालती, गेंदा, गुड़हल और कई रंग के गुलाब इधर-उधर से लाकर लगाते थे. कभी-कभी तो किसी स्कूल में पहुँचकर बेहिचक वहाँ के माली से फूल का पौधा माँग लेते थे. जितने तरह के फूल, उतनी ही तरह के कैक्टस भी लगा रखे थे उन्होंने…मैं तीन साल से घर नहीं गई. उनके जाने के बाद सारे फूल खत्म हो गये.
  18. हिमांशु
    हमने तो बस आपकी लिखावट देखी ! मानवीकृत गेंदा लुभा गया – “गेंदा देखकर लगता है कि किसी मां का लाड़ला, घामड़ बेटा है जिसको उसकी अम्मा कजरौटा लगाकर राजा बेटा बनाकर बगीचे में भेज देती हैं।”
    सच में बड़े खूबसूरत फूल हैं आपके बगीचे में ।
  19. Tweets that mention ….बगीचे के फ़ूल और पक्षियों की आवाजें -- Topsy.com
    [...] This post was mentioned on Twitter by anup shukla. anup shukla said: http://hindini.com/fursatiya/archives/1320 [...]
  20. satish saxena
    बढ़िया नर्सरी में रहते हो अनूप भाई ….अन्दर या बाहर …?
    ;-)
  21. हरि शर्मा
    बगीचा बहुत सुन्दर है. मुझे इस मामले मे न्यून से भी कम जानकारी है लेकिन सुन्दर फूल मन को मोहते ही है. इस सबके पीछे आपके अनियमित रहे मालियो के प्रयास तो सराहनीय है ही. भौजी के अथक प्रयास भी अत्यन्त सराहनीय है.
    http://koideewanakahatahai.blogspot.com/
  22. Dharmendra Lakhwani
    Badiya post.
    Aapke blog par kabhi ‘dum bani rahe’ post padhi thi kai din se talash kar raha hu lekin mil nahin rahi hai. Agar uska link de sake to badi meharbani.
    Dhanyawad.
  23. dr anurag
    ईष्या तू न गयी मेरे मन से……एक ठो बगीचे का हमारा भी अरमान है .पर जमीन के इन भावो में .बगीचे का सपना देखना….खुदा भी टोक देता है “.पुत्र इतनी अय्याशी ठीक नहीं “..खैर पाइप ओर मिस्त्री की बाबत इन दिनों हमसे पूछिए …..पर ऐसी बाते करेगे तो जज्बाती हो जायेगे .ओर जज्बाती होना .थोडा गलत समझा जाता है इन दिनों….खैर ये हिन्दनी भी ईष्या करवाता है हमको….
  24. dhiru singh
    जलन मह्सूस हो रही है आपसे . मैने भी एक बगीचा तैयार करने की कोशिश की लेकिन रिश्तेदार बन्दरो ने जड तक उखाड कर रख दी . अब तो घास भी काफ़ी बडी हो गई है . मशीन से भी नही कटती …… गाय छोड देते है घास खाने को . और हमारे अलावा वहा कोई फ़ूल नही दिखता आजकल
  25. संगीता पुरी
    इतनी गर्मी में इतनी हरियाली .. रंग बिरंगा चहचहाता वातावरण .. मन खुश हो गया .. आपलोगों की मेहनत दर्शा रही है .. विवरण भी हमेशा की तरह बहुत बढिया रहा !!
  26. sanjay bengani
    लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना मेरा कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहा हूँ.
    चाय हमारे लिए सोमरस है और फूल भगवान की मुस्कान. दोनो के लिए आपका धन्यवाद.
  27. शरद कोकास
    जितनी सुन्दर तस्वीरें हैं उतना ही सुन्दर वर्णन है ।
  28. pankaj upadhyay
    मेरे पापा को फ़ूल पौधो का बहुत शौक है… आपकी ये पोस्ट काफ़ी दिन पहले से ही पढी थी बस टिपिया नही पाया.. ओफ़िस वाले अभी भी IE6 चलाते है और उसमे आपका ब्लाग नही खुलता है…
    बहुत ही बढिया पोस्ट और मास्साब से सहमत… इसे ही ब्लागिग कहते है साहब..
  29. सैयद | Syed
    बगीचा तो बहुत सुन्दर बनाया है आपने…
    आजकल हमारे हाथ को भी उखड़ने का मन हो गया है :)
  30. शरद कोकास
    अनूप जी आपकी यह पोस्ट इतनी अच्छी लगी कि हम इसे दोबारा पढ़ रहे हैं ।
  31. Alpana Verma
    बहुत ही सुन्दर मनभावन बगीचा hai.
    phoolon ke chitr bhi behad akarshak hain.
  32. Alpana Verma
    Kya Ye white guldaudi ke phool ka chitr main le sakti hun???
  33. kulveer
    do falang par maujud khoobsoorti net per dekhne main badi shram aayi,
    namskar sirji, bahut yaad aaati hai par kya karen 7 baje lautne ke baad ghar se pair bahar hi nahi nikalte.
    bagiche ki kahani pad kar bahut maja aaya
  34. विज्ञान शंकर
    मैं तो सोच भी नहीं सकता कि आरमापुर के बंगले इतने शानदार हैं। बगीचा और उसके फूल देखकर मन जुड़ा गया। परिश्रम की कल्पना कर सकता हूं। श्रीमतिजी साथ में देखती हैं, पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं, अनेक साधुवाद। रचना केलिए बधाई। फोटोग्राफी के लिए श्रीमति शुक्ल को बधाई। वीडिओ भी शानदार बन गया । कभी-कभार फुरसतिया पर पहुंचता था, अब नियमित आना होगा। —-विज्ञान शंकर
  35. Anonymous
    क्या बात है फुरसतिया जी इन दिनो मेरा मन भी बागवानी करने का हो रहा है पर पानी की कमी,समय की कमी ये सब हमे रोक देती है लेकिन आपका बगीचा देख कर अब रोके नही रुका जा रहा है
  36. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] ….बगीचे के फ़ूल और पक्षियों की आवाजें [...]

Post Comment

Post Comment

Saturday, March 20, 2010

…कविता का मसौदा और विश्व गौरैया दिवस

http://web.archive.org/web/20140419215407/http://hindini.com/fursatiya/archives/1306

…कविता का मसौदा और विश्व गौरैया दिवस


मैं पिछले कई दिन से कविताई के मूड में हूं। कविताई के मूड में मतलब कविता लिखने के मूड में। सब मसाला भी सोच रखा है और हर पल लगता है कि बस अब हुआ तब हुआ। कविता निकाल ही देनी चाहिये। अब और देरी ठीक नहीं। वैसे भी अगर कोई पोस्ट(लेख)लिखने का मसौदा मन में हो तो उसको स्थगित करना तो समझ में आता है लेकिन किसी कविता का मजनून तैयार हो इसके बाद भी उसे न लिखना तो घोर गैरजिम्मेदाराना हरकत है न!
वैसे भी कवितायें तो राजधानी एक्सप्रेस की तरह होती हैं। उनको रोका नहीं जाता। प्राकृतिक जरूरत के दबाब की तरह होती है कवितायें। लिखने को ऐसा लिख गया मैं लेकिन ऐसा है नहीं मेरे साथ। भतेरी कवितायें मजनून मजमून के रूप में मेरे मानस पटल (कवि के लिये ऐसा लिखना बहुत जरूरी होता है भाई :) ) उभरीं। कुछ दिन तक छाईं रहीं और बाद में इधर-उधर हो लीं। अनलिखी कविताओं के मजनून ऐसे लगते हैं कि बस यह तो अल्टीमेट है गुरु! बस प्रस्फ़ुटित होने भर की देरी है और बस छा जाना है इसको!
एक गजल के चार-पांच शेर तो मैंने सड़क पर मोटरसाइकिल रोक कर मोबाइल पर लिखकर रखे। एक दोस्त को भेज भी दिये तुरंत ताकि सनद रहे कि हम कित्ते घणे रचनात्मक क्षणों से पंजे लड़ाते हुये मोटर साइकिल चला रहे हैं। वो तो अच्छा हुआ मेरे मोबाइल की बैटरी ने समाज का सहयोग किया और उसी समय चुक गयी वर्ना क्या अचरज कि इस पैरा की जगह आपको उस गजल का लिंक मिल गया होता अब तक। यह अलग बात है कि आप बिना उसे क्लिक किये आगे निकल लिये होते और अनजाने में एक कालजयी रचना के उपेक्षा के बवाल में नामजद हो जाते। :)
बहरहाल, अभी जो मसौदा है मन में उसे आपके साथ शेयर करता हूं। मैं लगभग तय ही कर चुका हूं कि इस मजमून पर कविता लिखे बिना मानूंगा नहीं चाहे धरती इधर से उधर हो जाये। वो तो ऐसे भी होती ही रहती है। आज बराबरी से होगी। दिन और रात बराबर होते हैं न आज के दिन।
मजमून कुछ यूं है कि कवि आयेगा और बिना किसी भूमिका के शुरु हो जायेगा। कविता में वह एक पारिवारिक सीन खींचेगा। उस सीन में मां है, पत्नी है, बच्चे हैं और पति भी है जिसने जबरियन कवि की भूमिका पर भी कब्जा कर रखा है। कवि कल्पनालोक में है जहां विचरण का कोई किराया तो पड़ता नहीं है। लिहाजा वो इधर से उधर, उधर से और उधर, और उधर से और और उधर मतलब कि न जाने कि किधर-किधर दौड़ा-भागा कर रहा है। उसकी दौड़ा-भागी देखकर लगता है कि बच्चों को अगर ब्राउनियन मोशन के बारे में बताना हो तो बताया जा सकता है कि बालकों ब्राउनियन मोशन में गैस में निलंबित छोटे कण उसी तरह से इधर-उधर न जाने किधर-किधर भागते रहते हैं जिस तरह किसी कोई कवि कल्पना लोक में अपनी कल्पनाओं की गठरिया लिये इधर-उधर डांय-डांय घूमता रहता है।
बहरहाल बात कविता की हो रही है तो उसी पर टिका जाये। तो इस घणी पारिवारिक कविता में शुरुआत पत्नी से होती है जिसकी एकमात्र शिकायत है कि पिछले बीस-बाइस सालों वो पति को स्मार्ट नहीं बना पायी। पति उसे खिझाने के लिये जानबूझकर नेचुरल बना रहता है। हमेशा डाई देर से करता है। कपड़ों की मैंचिंग अभिरुचि नहीं सीख पाया है। जैसा मिला था वैसा ही बना हुआ है अभी तक। ये नहीं कि उन भाई साहब की तरह हमेशा चिट बना रहे।
बस जहां कविता यहां से शुरु हुई फ़िर न पूछों भैया। फ़िर तो आइडियों की भगदड़ मच जाती है। कित्ते आइडिये घायल हो जाते हैं, कित्ते अपना लोक सुधार कर परलोक की यात्रा पर निकल लेते हैं। पत्नी की शिकायत के बाद बच्चे मोर्चा संभालते हैं। वे मम्मी-पापा दोनों को आड़े हाथों लेते हैं कि वे बच्चों को हमेशा ऐसा-वैसा न जाने कैसा-कैसा कहते रहते हैं। पत्नी बच्चों को उलाहना देती है कि वे न ठीक से खाते हैं न ठीक से कोई काम करते हैं। पढ़ने की तो खैर बात ही छोड़ दो। बच्चे आक्रमण ही धांसू बढिया बचाव है की नीति के अनुसार अपनी मां पर हावी होने की कोशिश करते हैं -आप एकदम टिपिकल मम्मी हो। हमेशा डांटती रहती हो।
पति इस बीच मौका निकाल कर मुस्कराते हुये राहत की पचीस-तीस सांसे खींच लेता है ताकि अगले हमले का मुकाबला करने में आक्सीजन की कमी न महसूस हो।
चूंकि मामला पारिवारिक है इसलिये अम्माजी की भी कोई बात कवि जरूर कहेगा। कवि अम्मा जी से मौके के अनुसार बयान दिलवाता है। उनका लड़का बहुत शैतान है, गैरजिम्मेदार और न जाने कैसा-कैसा है लेकिन उसके जैसा लड़का और कोई नहीं है।
इतना पारिवारिक सीन खींचने में पचीस तीस लाइनें निकल जायेंगी। अगर कवि को लगेगा लाइने कम हैं तो वो बड़ी लाइनों को काट-काटकर उनसे छोटी-छोटी दो-तीन चार छोटी लाइनें निकाल लेगा। अगर उसको लगा लाइनें ज्यादा हो गयीं तो वो उनको जोड़-जाड़कर तीन-चार लाइनों को एक में नत्थी कर देगा। इसके बाद कवि बेचैन हो जायेगा कि कविता को खत्म कैसे किया जाये। कवि की सबसे बड़ी परेशानियों में एक यह ही होती है कि वह कविता खत्म कैसे करे। है कि नहीं!

लेकिन नहीं भाई साहब यहीं तो गड़बड़ है आपकी समझ में। आपकी समझ को गड़बड़ कहें तो शायद आप बुरा मान जाओ और एकाध पोस्ट लिखकर अपने ब्लॉग पर फ़नफ़नाते रहें कई दिनों तक। इसलिये पहले वाले वाक्य में आपकी समझ की जगह हमारी समझ पढ़ लें! बकिया जैसा का तैसा रहने दीजिये।
हां तो हम कह रहे थे कि यही तो गड़बड़ है हमारी समझ में! कवि ने यहां अंत पहले ही सोच रखा है। इसीलिये तो वह कविता लिखने की सोच रहा है। वह कवि कवि नहीं होता जिसने कविता की शुरुआत से पहिले उसका अंत नहीं सोचा होता है। कवि हमेशा कविता तब ही शुरु करता है जब वह उसका अंत सोच चुका होता है। इससे अलग रूटीन पर चलने वाले कवि के कविता प्रयासों के बारे में हम कुछ नहीं कहना चाहते। न आप सुनना चाहते होगें।
हां तो कवि इस पारिवारिक कविता का अंत कुछ यूं सोचे बैठा है। बातचीत और घरेलू मसखरी के दौरान कविनुमा पति आरोप-प्रत्यारोप की रस्म निभाने के लिये पत्नी से भी कुछ मौज लेता है और कुछ उसकी कुछ भी कमियां गिनाने लगता है। इस वीरता पूर्ण काम की शुरुआत में ही वह पत्नी को देखकर लटपटा जाता है और कुछ अटपटे शब्द बोल जाता है। बस्स! सब खिलखिलाने लगते हैं। हंसी-ठहाके का दौर चल निकलता है और छा जाता है।
यहीं कविजी अपनी कामना का बिरवा कविता में रोप देते हैं और कहते हैं- ये हंसते,खिलखिलाते क्षण छा जायें सारे जीवन के वितान में। यह अटपटापन हमेशा बना रहे जीवन में। आदि-इत्यादि! वगैरह-वगैरह!
इसी तरह के और कुछ खुशनुमा बातें ठेलकर कवि महोदय कोई घरेलू सा शीर्षक देकर उन श्रोताओं/पाठकों के सामने पटक देंगे जिसे वे पेश करना कहते हैं। अगर ऐन मौके पर स्मृति पट भड़भड़ा उठे तो कहो कवि किसी का शेर भी ठेल दें जिसका कविता से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं हो! जैसे कि यही वाला देख लीजिये:
अपनी खुशी के साथ मेरा गम भी निबाह दो,
इतना हंसो कि आंख से आंसू छलक पड़ें।
अब देखिये है न ज्यादती वाली बात! किसी को हंसते देख लिया तो अपनी गम-गठरिया लाद दी उसके ऊपर-भैया इसऊ को लादे चलो नेक!
इसी मजनून कच्चे माल से दूसरे लोग दूसरी तरह की कवितायें निकाल सकते हैं। करुणा सम्प्रदाय के लोग हंसते खिलखिलाते सीन के बाद एक लुटे-पिटे व्यक्ति का सीन लगा कर समाज में विसंगति का ऐसा जोरदार सीन खैंच देंगे कि हंसते-खिलखिलाते लोग अपराध बोध में गले तक डूब जायें।
हर रकम का कवि अपने यहां उपलब्ध प्रोसेसिंग प्रक्रिया के हिसाब से इस कच्चे माल का उपयोग करेगा। कवितायें ऐसे ही प्रस्फ़ुटित होती हैं।
आपका भी मन कर रहा है क्या कोई कविता लिखने का? लिख डालिये। मौका भी , मजनून है और दस्तूर तो हैइऐ!

मेरी पसंद

आज प्रथम विश्व गौरैया दिवस है। इस मौके पर गौरैया के बारे में कुछ लिखने की सोच रहा था लेकिन लिख नहीं पाया। ले-देकर एक ठो कविता याद आई जिसे मैंने जब लिखा था तब यह भी अकल नहीं थी कि गौरैया आम तौर पर आंगन में आती थीं ,पिंजड़े में नहीं रहती थी। महिलाओं की स्थिति की बारे में सोचते हुये ऐसे ही लिखी गयी लाइने फ़िर से ऐसे ही पेश कर रहा हूं। जब यह कविता लिखी गयी थी तबसे महिलाओं की हालत बहुत बदली है लेकिन उनका बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी वैसा ही है जैसा इसे लिखते समय था।
मैं ,
अक्सर,
एक गौरैया के बारे में सोचता हूं,
वह कहाँ रहती है -कुछ पता नहीं।
खैर, कहीं सोच लें,
किसी पिजरें में-
या किसी घोसले में,
कुछ फर्क नहीं पड़ता।
गौरैया ,
अपनी बच्ची के साथ,
दूर-दूर तक फैले आसमान को,
टुकुर-टुकुर ताकती है।
कभी-कभी,
पिंजरे की तीली,
फैलाती,खींचती -
खटखटाती है ।
दाना-पानी के बाद,
चुपचाप सो जाती है -
तनाव ,चिन्ता ,खीझ से मुक्त,
सिर्फ एक थकन भरी नींद।
जब कभी मुनियाँ चिंचिंयाती है,
गौरैया -
उसे अपने आंचल में समेट लेती है,
प्यार से ,दुलार से।
कभी-कभी मुनिया गौरैया से कहती होगी -
अम्मा ये दरवाजा खुला है,
आओ इससे बाहर निकल चलें,
खुले आसमान में जी भर उड़ें।
इस पर गौरैया उसे,
झपटकर डपट देती होगी-
खबरदार, जो ऐसा फिर कभी सोचा,
ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।
अनूप शुक्ल
Ads by SmartSaver+ 8Ad Options

27 responses to “…कविता का मसौदा और विश्व गौरैया दिवस”

  1. Dr.Manoj Mishra
    कभी-कभी मुनिया गौरैया से कहती होगी -
    अम्मा ये दरवाजा खुला है,
    आओ इससे बाहर निकल चलें,
    खुले आसमान में जी भर उड़ें।
    इस पर गौरैया उसे,
    झपटकर डपट देती होगी-
    खबरदार, जो ऐसा फिर कभी सोचा,
    ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।…..
    बेहतरीन भावाभिव्यक्ति.
  2. गिरिजेश राव
    भतेरी और मजनून जान बूझ कर प्रयोग किए हैं या …?
    पढाई जारी है।
  3. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    इतना धाँसू …? बाप रे बाप।
    कविता! तेरी महिमा अपरम्पार है।
  4. गिरिजेश राव
    @ जैसा मिला था वैसा ही बना हुआ है अभी तक। – बहुत अड़ियल है।
    @ कवि की सबसे बड़ी परेशानियों में एक यह ही होती है कि वह कविता खत्म कैसे करे। – आप को कैसे पता चला?:)
    @वह कवि कवि नहीं होता जिसने कविता की शुरुआत से पहिले उसका अंत नहीं सोचा होता है। कवि हमेशा कविता तब ही शुरु करता है जब वह उसका अंत सोच चुका होता है। – उपर से विरोधाभास
    @करुणा सम्प्रदाय के लोग हंसते खिलखिलाते सीन के बाद एक लुटे-पिटे व्यक्ति का सीन लगा कर समाज में विसंगति का ऐसा जोरदार सीन खैंच देंगे कि हंसते-खिलखिलाते लोग अपराध बोध में गले तक डूब जायें। – करुणा सम्प्रदाय, प्रगतिवादी और बाद के ढेर सारे बकवादी ..हा हा हा
    @ जब यह कविता लिखी गयी थी तबसे महिलाओं की हालत बहुत बदली है लेकिन उनका बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी वैसा ही है जैसा इसे लिखते समय था। – asymptotic curve कभी लक्ष्य रेखा को स्पर्श नहीं करता लेकिन बस उठते ही जाता है। यह चहकन और उड़न पसरती रहे।…
    हाँ, गौरैया पिंजरे में नहीं रहती।
  5. कृष्ण मुरारी प्रसाद
    संवेदनशील …प्रस्तुति…..
    ………………………
    विश्व गौरैया दिवस– गौरैया…तुम मत आना..
    http://laddoospeaks.blogspot.com/2010/03/blog-post_20.html
  6. दिनेशराय द्विवेदी
    भैया अपुन का जब भी कविता करने का मन करता है एक छिन को भी नहीं रुकते, तुरंत कर डालते हैं। कविता तो वह नवाँ आवेग है जिस को रोक दो तो प्रज्ञापराध हो जाता है।
  7. विवेक सिंह
    जब आपकी कविता देखी तो जोश में हमने भी लिख मारी एक ।
  8. काजल कुमार
    :)
  9. विनोद कुमार पांडेय
    बढ़िया मूड में बढ़िया रचना..धन्यवाद..
  10. sushila puri
    अनूप जी ! मान गई आज आपको !!!!!!! आज से गुरु आप ……, गौरय्या का प्रतीक लेकर आपने हम स्त्रियों का जो इतिहास रचा है वह नमन करने योग्य है . मै तो चकित हूँ इस बात पर की कविता लिखने के पहले जो आपने इतनी लंबी भूमिका लिखी ,उसको लिखने के लिए धीरज कहाँ से लाते हैं ??? कवियों की धज्जियाँ उड़ाते हुये अंततः खुद भी कवि हो गए न ?
  11. anitakumar
    यह अलग बात है कि आप बिना उसे क्लिक किये आगे निकल लिये होते और अनजाने में एक कालजयी रचना के उपेक्षा के बवाल में नामजद हो जाते। :)
    हा हा
    आज विश्व गौरैया दिवस है? हमें तो पता ही नहीं था नहीं तो एक दो कविता तो हम भी ठेल देते, गौरैया भी क्या याद करती…मस्त पोस्ट
  12. aradhana "mukti"
    हमेशा की तरह बहुतै धाँसू. कुछ लाइनें जो मुझे बहुत पसन्द आयीं–
    -प्राकृतिक जरूरत के दबाब की तरह होती है कवितायें।
    -किसी को हंसते देख लिया तो अपनी गम-गठरिया लाद दी उसके ऊपर-भैया इसऊ को लादे चलो नेक!
    -करुणा सम्प्रदाय के लोग हंसते खिलखिलाते सीन के बाद एक लुटे-पिटे व्यक्ति का सीन लगा कर समाज में विसंगति का ऐसा जोरदार सीन खैंच देंगे कि हंसते-खिलखिलाते लोग अपराध बोध में गले तक डूब जायें।
    और गौरैया की कविता में से–
    -खबरदार, जो ऐसा फिर कभी सोचा,
    ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।
    और हाँ, गिरिजेश जी की बात सही है, गौरैया कभी पिंजरे में नहीं रहती. ज़रूरत ही नहीं पड़ती. पिंजरे में उन पक्षियों को रखा जाता है, जिनके उड़ जाने का डर हो और गौरैया तो हमेशा घर के आस-पास रहती है. गौरैया और कबूतर दो ऐसे पक्षी हैं, जो हमेशा मनुष्यों के साथ ही रहते हैं.
    सबसे अच्छी लाइन मुझे मेरे लिये लगी–प्राकृतिक जरूरत के दबाब की तरह होती है कवितायें। मुझे कविता वैसे ही लगती है, जैसे भूख लगती है. जब आती है, तो बस लिख देती हूँ, तुरंत, ज्यों का त्यों, कोई काँट-छाँट किये बिना. मुझे बगीचे से ज्यादा जंगल पसन्द हैं.
  13. वन्दना अवस्थी दुबे
    अच्छा! कविता लिखने के लिये इतना माहौल बनाना पड़ता है? समझ में आ गई पूरी प्रक्रिया.
    मैने पहले भी कहा है, आज फिर दोहरा रही हूं कि आप बहुत-बहुत अच्छी कवितायें लिखते हैं . नियमित कविता लिखा करें, लेकिन क्या करें, बड़ए लोग छोटी-छोटी बातों पर ध्यान कहां देते हैं?
    कभी-कभी मुनिया गौरैया से कहती होगी -
    अम्मा ये दरवाजा खुला है,
    आओ इससे बाहर निकल चलें,
    खुले आसमान में जी भर उड़ें।
    इस पर गौरैया उसे,
    झपटकर डपट देती होगी-
    खबरदार, जो ऐसा फिर कभी सोचा,
    ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।
    क्या कहूं? उस बेअक्ली की उम्र में जब इतनी सुन्दर-सार्थक कविता लिखी है तो आज के लिये क्या कहूं?
  14. dr anurag
    कवितायें तो राजधानी एक्सप्रेस की तरह होती हैं। उनको रोका नहीं जाता।
    ताकि सनद रहे कि हम कित्ते घणे रचनात्मक क्षणों से पंजे लड़ाते हुये मोटर साइकिल चला रहे हैं
    कोई कवि कल्पना लोक में अपनी कल्पनाओं की गठरिया लिये इधर-उधर डांय-डांय घूमता रहता है।
    फ़िलहाल तो इन पंक्तियों को बांच कर सोच रहा हूँ ……के ये कवि नुमा प्राणी कित्ती खतरनाक चीज़ लगता है …..
  15. Abhishek
    ब्राउनियन मोशन का बढ़िया प्रयोग :)
  16. pankaj upadhyay
    वाह ऐसे कवि तो क्रान्ति ला दे… सरकार सोचते तो हम भी है कि सबेरे सबेरे एक खादी का झोला टागकर निकल जाय कही दूर..और ऐसे ही लाईन्स लिखते रहेगे…लेकिन डर जाते है कि जब वापस आना होगा तब सब कुछ यही रहेगा या ये भी कही दूर जा चुका होगा…. सो बस लाईने आती है और सीने मे दफ़न हो जाती है…
    वैसे आप लिखते दिल खोलकर है..कोई ऎ वे पढना चाहे तो सिर्फ़ nice बोलकर निकल ले..दुबारा आ रहा हू.. पहली बार चुपचाप चला गया था… nice नही बोलना चाह रहा था :P
  17. Manoj Kumar
    @ प्राकृतिक जरूरत के दबाब की तरह होती है कवितायें।
    कविता के ऊपर टिप्पणी दूँ या कविता के ऊपर (पहले) जो गद्य लिखा है उस पर। इसी ऊहापोह में हूँ। वैसे कवि लोगों की आदत होती है कि वे कविता सुनाने के पहले काफी लंबा खींच लेते हैं। इस लिहाज से आप कवि तो हैं ही पर वो “प्राकृतिक जरूरत के दबाब” के हिसाब से नहीं। दवाब बन जाए तो देरी … अच्छी बात नहीं। हां वह गद्य भी कवितामय ही है।
    सरलता और सहजता का अद्भुत सम्मिश्रण बरबस मन को आकृष्ट करता है। गौरैयों के जीवन से जुड़ी इस कविता में आस्था और आशावादिता से भरपूर स्वर मुखरित हुए हैं। आपका यह प्रस्तुत करने का अलग और नया अंदाज काफ़ी रोचक है। मानवीय संवेदना की आंच में सिंधी हुई इस तरह की कविताएं हमें मानवीय रिश्ते की गर्माहट प्रदान करती है।
  18. Gyan Dutt Pandey
    अपना कविता का हाजमा ज्यादा पुष्ट नहीं है। पर आठ दस छटांक कविताई का मूड खरीदने की सोच रहा हूं। कहें तो बचपना ही सही!
  19. समीर लाल
    आपकी यह कविता शुरु से प्रभावित करती आई है.
    विश्व गौरेया दिवस की शुभकामनाएँ.
  20. amrendra nath tripathi
    बड़ी देर से आया , गौरैया तो उड़ गयी !
    अगर तस्तरी भी उड़े ( सन्दर्भ;उड़नतस्तरी ) तो गौरैया बिना उड़े कैसे रह सकती है !
    कोई कैद उसे नहीं सुहाती !
    सुन्दर प्रविष्टि , आभार !
  21. शरद कोकास
    मुनिया गौरय्या और अम्मा गौरय्या के बिम्ब मे आपने स्त्री की ममता ,उसकी सोच महत्वाकान्क्षा और उसकी विवशता चित्रित किया है । यह बहुत सुन्दर चित्र है ।
    मोटर्साइकल पर आपकी रचना प्रक्रिया के विषय में पढकर आनन्द आया । हम लोगों के साथ भी ऐसी स्थिति कई बार आती है ।
  22. अजित वडनेरकर
    राजधानी एक्सप्रेस वाली नहीं, एक ठो, बल्कि दस ठौ गगनविहारी एक्सप्रेस वाली कविताई हो जाए…
    गगनविहारी मनकी समझे कि ना…
  23. Saagar
    सबको लपेट लिया… हें, हें, हें, हें !
    मस्त लिखा है… सुन्दर अभिव्यक्ति बधाई :)
    अखबार में एक दिन एक सूक्ति पढ़ी थी “मजाक, सिरिअस बातों को कहने का तरीका है” आपकी पोस्ट पढ़कर याद आया…
  24. bhootnath
    waah…waah….kyaa baat hai bhyi…….laajawaab……!!
  25. shefali
    ye bhi khoob rahee…..
  26. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] …कविता का मसौदा और विश्व गौरैया दिवस [...]
  27. Padm Singh पद्म सिंह
    कुल मिला कर अद्भुद है ….मने गजब
    Padm Singh पद्म सिंह की हालिया प्रविष्टी..मगर यूं नहीं

Post Comment

Post Comment

Google Analytics Alternative