Wednesday, October 31, 2012

गुलाबी जाड़े की एक सुबह

http://web.archive.org/web/20140420082914/http://hindini.com/fursatiya/archives/3556

गुलाबी जाड़े की एक सुबह

सुबह उठकर चाय मुंह धो लिये हैं। चाय मंगा लिये हैं। एक के बाद दूसरी भी। पीते हुये ब्लॉग-स्लॉग भी देखते जा रहे हैं। फ़ेसबुक भी खुला है। कोई नमस्ते-वमस्ते करता है तो हमने भी जैसे को तैसा कर देते हैं। बीच-बीच में देखते जाते हैं कि कोई नया लाइक आया क्या फ़ेसबुक पर। उधर टीवी भी चल रहा है। खबरें आती जा रही हैं। जा भी रही हैं। कुछ ढीठ खबरें बार-बार आ-जा रही हैं। थेथर कहीं की। जिद्दी, बेहया, धुन की पक्की।
पता चला कि गुजरात के मुख्यमंत्रीजी ने थरूर जी की पत्नीजी पर कोई बयान जारी किया था। शायद ट्विट किया। उस पर उन्होंने प्रति ट्विट किया। नहीं, नहीं बयान ही जारी किया। ट्विट तो थरूरजी करते हैं। मीडिया वाले ताड़े हुये थे। बयान और ट्विट का प्रसार बढ़ा। बात स्त्री की गरिमा से जुड़ गयी। प्रेम भी आ गया बीच में। पैसा भी। प्रेम और पैसे का तुलनात्मक अध्ययन होने लगा।
आजकल पैसा तो बेचारा हर कहीं दौड़ाया जाता है। यहां भी लगा दिया गया है ड्यूटी पर। देख रहे हैं कि रुपये और पैसे पर काम का बोझ बहुत बढ़ गया है। हर जगह उसको मौजूद रहना पड़ता है। घपले में, घोटाले में, चुनाव में , वजीफ़े में,रेल में , जेल में। जिसको देखो पैसे रुपये को ठेल देता है जिम्मेदारी निबाहने को। पैसे के मुकाबले नैतिकता, सच्चरित्रता, सद्भाव, सद्गुण जैसे अल्पसंख्यकों को आराम हैं। कोई पूछता नहीं सो वे पड़े आराम कुर्सी तोड़ते रहते हैं।
उधर केजरीवाल जी के फ़र्रुखाबाद जाने की बात पर भी बयानबाजी हो रही है। कोई कह रहा है उनका मुंह काला करेंगे। दूसरे ने बयान जारी किया कि लाठियों से जबाब देंगे। इससे अंदाजा लगता है कि मुकाबले में लोग बराबरी की बात पर जोर नहीं देते। द्रव( पेंट) का मुकाबला ठोस(लाठी) से। कुछ भी हो मुकाबला होना चाहिये। शायद यह जब तोप मुकाबिल हो तो तलवार निकालो से प्रेरित है। वैसे आर्थिक लिहाज से मामला लगभग बराबरी का ही पड़ेगा। जित्ते का पेंट आयेगा लगभग उत्ते की ही लाठी पडेगी। जित्ते स्वयं सेवक पेंट पोतने के लिये चाहिये उत्ता ही खर्चा लाठी वाले पहलवानों पर खर्च हो जायेगा। यह स्वयंसेवकों के बीच बढ़ती आर्थिक समझ का परिचायक है।
पता चला कि आज ही सरदार बल्लभ भाई पटेल का जन्मदिन है। उनके योगदान के बारे में सभी जानते हैं। हमें कहीं पढ़ी हुई एक बात याद आती है कि वे रेडियो पर रात के समाचार सोकर सोने चले जाते थे। सुना है कि हैदराबाद में कब्जे का आदेश देकर वे सोने चले गये थे। मतलब उनके मन में अपने निर्णय पर कोई दुविधा नहीं थी। उनको हमारी विनम्र श्रद्धांजलि।
पता तो यह भी चला है कि पंजाब से आया गेहूं राज्स्थान के किसी रेलवे स्टेशन पर सड़ रहा है। कारण जाने क्या रहे हों लेकिन यह पक्का है कि उचित जगह तक अनाज पहुंचाने वाले लोगों ने अपने काम में कोताही भले न बरती है हो लेकिन उनमें आपस में तालमेल नहीं है। सबने अपने-अपने हिस्से की कार्यवाही जरूर की होगी। सबने जो किया होगा वह नियम के तहत ही किया होगा। लेकिन अंतत: गेहूं अपनी नियति को ही प्राप्त हुआ। सड़ गया।
ऊपर वाली घटना में मीडिया भी गेहूं सड़ने के बाद ही पहुंचा। क्या पता वह गेहूं के सड़ने का ही इंतजार कर रहा हो। प्लेटफ़ार्म पर सड़ता हुआ गेहूं मीडिया के लिये ज्यादा आकर्षक होता है।
इस बीच गरदन इधर-उधर हिलाने पर देखा तो पता चला दरवज्जे के पल्ली तरफ़ धूप खिली हुई है। दरवज्जा आधा खुला है। धूप देखकर मन खिल गया। हम यहीं से महसूस कर रहे हैं कि धूप पक्का गुनगुनी है। गुनगुनी धूप जाड़े में खिलती है। इस तरह के जाड़े को गुलाबी जाड़ा कहते हैं। इसमें जाड़ा और धूप दोनों का साथ खुशनुमा होता है। नये जोड़े की संगत सरीखा। मधुर, अभिनव, अनिर्वचनीय।
ये जो कवि लोग अनिर्वचनीय लिखते हैं वे पक्का शुरु अपने स्कूल के दिनों में होमवर्क पूरा नहीं करते होंगे। जहां जरा ज्यादा काम पड़ा बोले -हमसे न होगा। कवि को बिम्ब न मिला मजेदार तो बोले-अनिर्वचनीय। उनसे अच्छे तो आजकल के जनप्रतिनिधि जो हर तरह के बिम्ब पेश कर सकते हैं। सौंन्दर्य और प्रेम का मूल्यांकन करके कीमत लगा लेते हैं।
जब जाड़ा जबर पड़ता है तो धूप पीली पड़ जाती है। कुम्हला जाती है। उसके हाल एक गरीब की घरैतिन सरीखे हो जाते हैं। जाड़ा उसके खिसियाये हुये मर्द सरीखा लगता है। जिसकी दिहाड़ी पूरी नहीं हुई। जबर जाड़े में धूप के हाल वैसे ही दिखते हैं जैसे कि किसी खौरियाये हुये गरीब की स्त्री अपने पति को घर में घुसते देखकर सहम जाती है।
लेकिन ये सारे बिम्ब रुढिवादी हैं भाई। धूप और जाड़ा तो न जाने कब से साथ रहते आयें हैं। ऐसा भी होता होगा कि थरथराता हुआ जाड़ा गुनगुनी धूप के संपर्क में आने पर मुलायम पड़ जाता होगा। धूप और खुशनुमा हो जाती होगी। जाड़ा थोड़ा कम जबर हो जाता होगा। जोड़ा खबसूरत दिखने लगता होगा। मनभावन। सुन्दर। अनिर्वचनीय। :)
गुलाबी जाड़े की सुबह के बहाने सोच रहे थे कि कोई कविता बना देंगे लेकिन घड़ी बता रही है बच्चा दफ़्तर जाने का समय हो गया। उठ, चल, निकल, फ़ूट ले।

मेरी पसंद

जितना खिड़की से दिखता है
बस उतना ही सावन मेरा है।
निर्वसना नीम खड़ी बाहर
जब धारोधार नहाती है
यह देह न जाने कब,कैसे
पत्ती-पत्ती बिछ जाती है।
मन से जितना छू लेती हूं
बस उतना ही घन मेरा है।
श्रंगार किये गहने पहने
जिस दिन से घर में उतरी हूं
पायल बजती ही रहती है
कमरों-कमरों में बिखरी हूं।
कमरे से चौके तक फ़ैला,
बस इतना ही आंगन मेरा है।
जगमग पैरों से बूटों को
हर रात खोलना मजबूरी
बिन बोले देह सौंप देना
मन से हो कितनी भी दूरी।
हैं जहां नहीं नीले निशान
बस उतना ही तन मेरा है।
जितना खिड़की से दिखता है
बस उतना ही सावन मेरा है।
अवध बिहारी श्रीवास्तव, कानपुर

21 responses to “गुलाबी जाड़े की एक सुबह”

  1. संतोष त्रिवेदी
    यह पढ़कर गुलाबी जाड़े में कुनमुनाहट आ गई !
    …गरीब की स्त्री और अमीर की स्त्री के संचारी भाव भी बदल जाते हैं क्या…?
    संतोष त्रिवेदी की हालिया प्रविष्टी..चींटी और हाथी !
  2. shivang Tripathi
    Beautifully written mausaji…typical morning routine in our lives….i loved it
  3. sonal rastogi
    मौसम का खुमार है
    कविता जोरदार है
    मुद्दे जितने समेटे
    सारे धारदार है :-)
    sonal rastogi की हालिया प्रविष्टी..मैं कंघी
  4. ajit gupta
    हमें भी बिम्‍ब नहीं मिल रहे तो हम भी लिखे दे रहे हैं अनिर्वचनीय। अच्‍छा व्‍यंग्‍य है।
    ajit gupta की हालिया प्रविष्टी..दुनिया के किसी भी आश्‍चर्य से कम नहीं – अजन्‍ता और एलोरा की गुफाएं
  5. sanjay jha
    थोरी-थोरी तपिश पोस्ट से देते रहें…………….
    प्रणाम.
  6. प्रतिभा सक्सेना
    कविता के भाव मन को झकझोर जाते हैं – बहुत गहन संवेदना से पूर्ण !
  7. देवांशु निगम
    जाड़े के बहाने आपने तो खबरों की खबर ले डाली :) :)
    गुनगुना जाड़ा + ठंडी धूप = गुलाबी जाड़ा [ इति सिद्धम्] :) :)
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..हैप्पी बड्डे टू मी !!!!
  8. सतीश पंचम
    बिंब भागकर पेड़ पर चढ़ गया है, कह रहा था पकड़ो तो जानें…..पता नहीं इतना जलवाकर क्या करेगा :)
    मस्त पोस्ट आहे….मस्तम मस्त :)
    सतीश पंचम की हालिया प्रविष्टी.."मस्ताभिलेख" उत्खननम्
  9. pawan mishra
    अर्मापुर जाकर जाडा और भी गुलाबी हो जाता है एकदम्म गाढा गुलाबी
    pawan mishra की हालिया प्रविष्टी..यह जाडे की धूप है या "तुम".
  10. shikha varshney
    आहा ..मीठी मीठी …धूप ..
  11. kajalkumar
    आज तो बहुत तरह की बात हो गई सुबह ही सुबह
    kajalkumar की हालिया प्रविष्टी..कार्टून:- मंत्रि‍मंडल से नि‍काले जाने पर दुखी हूँ
  12. VD Ojha
    सर जी प्रणाम पढ़कर आनंद प्राप्ति हो गयी निम्न प्रसंग अविस्मरनीय हैं |
    …………पैसे के मुकाबले नैतिकता, सच्चरित्रता, सद्भाव, सद्गुण जैसे अल्पसंख्यकों को आराम हैं। कोई पूछता नहीं सो वे पड़े आराम कुर्सी तोड़ते रहते हैं।……………..
    …………………मतलब उनके मन में अपने निर्णय पर कोई दुविधा नहीं थी। उनको हमारी विनम्र श्रद्धांजलि।……………उसके हाल एक गरीब की घरैतिन सरीखे हो जाते हैं। जाड़ा उसके खिसियाये हुये मर्द सरीखा लगता है। जिसकी दिहाड़ी पूरी नहीं हुई। जबर जाड़े में धूप के हाल वैसे ही दिखते हैं जैसे कि किसी खौरियाये हुये गरीब की स्त्री अपने पति को घर में घुसते देखकर सहम जाती है।……………….
  13. Indian Citizen
    इस बार तो कविता पूरा शो चुरा ले गई… :D
  14. प्रवीण पाण्डेय
    एक दिन में कितना कुछ हो जाता है, पर सोने के पहले लगता है कि कितना कुछ छूट भी गया।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..एक बड़ा था पेड़ नीम का
  15. देवेन्द्र पाण्डेय
    मेरी पसंद में कविता इतनी अच्छी लगा दिये हैं कि आप जो अच्छा-अच्छा लिखे कुछ याद ही नहीं रहा।
  16. वीरेन्द्र कुमार भटनागर
    गुलाबी जाड़े की गुनगुनी धूप सरीखा आपका लेख॰ स्ञी के अंतर्मन में उमड़ती वेदना को अभिव्यक्ति देती सुन्दर कविता॰ क्या बात है !, क्या बात है !, क्या…………… !
  17. राजेश उत्‍साही
    लो जी आपने तो बात ही बात में सब खबरें ही बता दीं।
  18. Abhishek
    एक साथ कई काम कर लेते हैं आप :) वो भी सुबह सुबह ! :)
    Abhishek की हालिया प्रविष्टी..वो लोग ही कुछ और होते हैं – III
  19. Alpana
    बताईये रूपये और पैसे पर भी बोझ होने लगा!
    अब ऐसे नज़रिए तो आप ही के हो सकते हैं .
    बहुत खूब !
    ……………….
    दीपोत्सव पर्व पर हार्दिक बधाई और शुभकामनायें
    Alpana की हालिया प्रविष्टी..बुरा न मानो …दीवाली है !
  20. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] गुलाबी जाड़े की एक सुबह [...]
  21. anchor
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Monday, October 29, 2012

डूबे जी की कार्टून लीला शुरु

http://web.archive.org/web/20140420081219/http://hindini.com/fursatiya/archives/3535

डूबे जी की कार्टून लीला शुरु

और कल डूबे जी की कार्टूनलीला का विमोचन हो गया। कार्टूनिस्ट इरफ़ान (जनसत्ता), पत्रकार राजीव मित्तल (लखनऊ) ,चित्रकार सुरेश श्रीवास्तव और अन्य की उपस्थिति में रानीदुर्गावती संग्रहालय कला वीथिका में कार्टूनलीला परिवार एवम सव्यसाची कला ग्रुप जबलपुर के संयुक्त तत्वावधान कार्टूनलीला के पहले अंक का विमोचन हुआ। पत्रिका का यह पहला अंक व्यंग्य शिल्पी हरिशंकर परसाई को समर्पित है। राजेश दुबे के अनुरोध पर इरफ़ान पर दिल्ली से जबलपुर आये। वरिष्ठ पत्रकार राजीव मित्तल ने ’डूबेजी’ का पहला कार्टून नई दुनिया में छापा था। उन्होंने अपने अनुभव सुनाये।
इरफ़ान ने कार्टून की दुनिया में आ रहे बदलाव की बात की। पहले लोग कार्टून को सहज भाव से लेते थे। नेता बुरा नहीं मानते थे। बल्कि कार्टून बनाने का आग्रह करते थे। आज माहौल बदल गया है। कार्टूनिस्ट का खतरा बढ़ गया है। कार्टून अखबारों से गायब होते जा रहे हैं। ऐसे माहौल में कार्टूनलीला जैसी पत्रिका की जरूरत बढ़ जाती है। इरफ़ान का कहना है किसी की फ़ोटो पर कुछ कैप्शन सटा देना कार्टून नहीं होता। कार्टून बनाने के लिये कुछ और सूझ, कला, नयेपन, चुटीलेपन की जरूरत के साथ अपने समय और समाज की समझ भी जरूरी होती है।
आज के दैनिक भास्कर में इरफ़ान को कहते हुये बताया गया है- एक अच्छा कार्टूनिस्ट बनने के लिये सबसे पहले आदमी को खुद पर हंसना सीखना चाहिये। वरना चंद लकीरें मिलकर एक कार्टून तो बन जायेगा लेकिन उसमें जान नहीं रहेगी। जान आयेगी, पढ़ने, जानने और समझने से। एक बेहतर कार्टूनिस्ट वह है जिसे खुद पर हंसने की कला आती है। यह भी जानकारी हुयी कि इरफ़ान 2005 में ’बेस्ट कार्टूनिस्ट ऑफ़ एशिया’ घोषित हुये थे।
इरफ़ान इंडिया अगेन्स्ट करप्शन और केजरीवाल के समर्थन में होने के बावजूद कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी के बनाये कार्टून बनाने के तरीके को सही नहीं मानते। उनका मानना है कार्टून बनाने के नाम पर देश के प्रतीकों की खिल्ली उड़ाते हुये कार्टून बनाना भीड़ में कपड़े उतारकर खड़े हो जाने जैसा है। बिग बॉस में असीम त्रिवेदी के अच्छे बच्चे सरीखे व्यवहार पर सलमान खान ने असीम से चुटकी ली थी कि यहां उनकी अभिव्यक्ति मंद क्यों है? वे किसी के झगड़े के बीच में बोलते नहीं हैं। अच्छा बच्चा बने रहना चाहते हैं। उधर असीम के बिग बास से जबरियन निकाले जाने की खबरे भीं चल रही हैं।

एक वक्ता ने राजेश दुबे के बारे में बोलते हुये कहा- वे दूसरे को धकिया कर आगे होने की प्रवृत्ति और ईर्ष्या भाव से मुक्त हैं।
 
राजेश दुबे ने अपनी बात बहुत विनम्रता से रखी। बताया कि कार्टून पत्रिका निकालने का उनका सपना उनके इष्ट-मित्रों के सहयोग से पूरा हुआ। अब इस सपने को और आगे ले जाने की आशा भी उन्होंने जताई। एक शरीफ़ पति की तरह अपनी जीवन संगिनी श्रीमती सीमा दुबे के सहयोग/संबल का भी उल्लेख किया।

गिरीश बिल्लौरे (सव्यसाची कला ग्रुप )भी इस कार्यक्रम के सह आयोजक थे। उन्होंने भी राजेश जी की खूब तारीफ़ की। ’कार्टून लीला’ की पहली प्रति 501 रुपये में खरीदी। चित्र प्रदर्शनी ढिढौरी में करने की घोषणा जिसमें हाईस्कूल में पढ़ने वाली एक बच्ची के चित्र शामिल किये जायेंगे। सर्जन पिता की इस बेटी की एक चित्र प्रदर्शनी इसी हाल में 23 नवंबर में होने वाली है।

और लोगों ने भी अपनी-अपनी बातें कहीं। कम समय में। बेहद आत्मीय, अनौपचारिक माहौल , घरेलू टाइप माहौल में कार्टून लीला शुरु हुई। पत्रिका की कीमत तीस रुपये है। 120 रुपये देकर 8989535140 पर संपर्क करके आप भी पत्रिका परिवार के सदस्य बन सकते हैं। पत्रिका की अपनी साइट भी है।
पत्रिका में विभिन्न कार्टूनिस्टों के बनाये कार्टून शामिल किये गये हैं। आपके आइडिये पर कार्टून बनाने की भी जानकारी है। अगर आपको कोई आइडिया आता है जिस पर कार्टून बनाया जा सकता है तो आप उसे cartoonleela@gmail.com पर भेज दीजिये। आपके आइडिये पर आइडिया आपका कार्टून हमारा की योजना के तहत कार्टून बनाया जायेगा जिसमें कार्टूनिस्ट के साथ आपका भी नाम होगा। इस योजना के खतरे हैं कि आगे जब कभी जेल जाने हिसाब बनेगा तो यह तय करना भी एक काम होगा कि असल लफ़ड़ेबाज कौन है- कार्टूनिस्ट या आइडियाबाज।

हाल में राजेश दुबे और जबलपुर के एक अन्य कार्टूनिस्ट मोहन खत्री के कार्टून और स्केच लगाये गये थे। मोहन खत्री जी ने अपने कार्टून बनाने के तरीके पर विस्तार से जानकारी दी। कार्टून वे कम्प्यूटर पर माउस और कोरल ड्रा की सहायता से बना लेते हैं। रंग माइक्रोसाफ़्ट के पेंट-ब्रश करते हैं। कार्टूनों में आम आदमी के रूप में अपनी फ़ोटो लगाते हैं। वे दिखते भी आम आदमी की तरह से हैं। उनकी फोटो खींचते हुये हमने उनकी नाक पर रखा चश्मा जरा ऊपर उठाकर रखने की कोशिश की तो वे बोले कि नाक पर चश्मा रखना उनका अपना इश्टाइल है। इससे वे ज्यादा आम दिखते हैं। हमने फ़िर उनकी वैसी ही फोटो खैंची। उनके रंग संयोजन मोहक हैं।

 जबलपुर में ही गुप्तेश्वर में रहते हैं। कुछ दिन तक नई दुनिया में कार्टून बनाते रहे। फ़िलहाल स्वतंत्र कार्टूनिस्ट हैं।
राजेश दुबे के परसाई जी पर बनाये गये स्केच बहुत अच्छे हैं। वहीं एक स्केच देखते हुये एक बुजुर्गवार को बातचीत के दौरान मैंने जानकारी दी कि ये स्केच परसाईजी के लेखों में आये वाक्यों को लेकर बनाये गये हैं। इस वे बोले – क्या कार्टूनिस्ट बेवकूफ़ है? उनको शायद लग रहा होगा कि हम उनकी तारीफ़ में अडंगा लगा रहे हैं। हमने जब उनको और जानकारी दी और वहां एकाध लोगों ने मेरी बात का समर्थन किया तब वे मुझसे सहमत हुये।

कार्यक्रम का संचालन राजेश पाठक जी ने किया। प्रांजल भाषा और मोहक आवाज वाले राजेश की उपस्थिति जबलपुर के हर कार्यक्रम में इनवर्टेड कॉमा सरीखी रहती है। संचालन (शुरुआत से आखिर तक) तक का जिम्मा उनका ही रहता है।

कार्टूनिस्ट राजेश दुबे की खूबसूरत प्रेरणा और संबल श्रीमती सीमा दुबे जी के दर्शन भी वहां हुये। पिछली मुलाकात में उनके बनाये नाश्ते की तारीफ़ से खुश होकर उन्होंने आगे खाना पर आने का निमंत्रण दिया है।

15 responses to “डूबे जी की कार्टून लीला शुरु”

  1. संजय बेंगाणी
    कार्टून बनाना अब मजाक नहीं रहा. दशकों पहले बने कार्टून आज के कार्टूनों को नाराज कर देते है. लोकतंत्र की दुहाई देने वाले जेल में ठूँस देते है. ऐसे में वीर साहसी लोगों को बधाई, शुभकामनाएं.
    संजय बेंगाणी की हालिया प्रविष्टी..नदी नालों के उपासक हम
    1. वीरेन्द्र कुमार भटनागर
      “दशकों पहले बने कार्टून आज के कार्टूनों को नाराज ……………” . आपकी यमक अलंकारिक टिप्पणी प्रशंसनीय है।
  2. Kajal Kumar
    कार्टून बनाना वाक़ई अब बहुत ख़तरनाक होता जा रहा है, पता नहीं कौन कब बि‍दक जाए.
    Kajal Kumar की हालिया प्रविष्टी..कार्टून:- मंत्रि‍मंडल से नि‍काले जाने पर दुखी हूँ
  3. manuprakashtyagi
    गजब की रचना badhi
  4. देवांशु निगम
    दुबे जी को बहुत बहुत बधाई !!! :) :) :)
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..हैप्पी बड्डे टू मी !!!!
  5. देवेन्द्र पाण्डेय
    जो लोग पहिले दुबे जी हलके में ले रहे थे वे अब गंभीरता से पढ़ रहे होंगे। आपने तो पोस्ट लिखने का स्थाई जुगाड़ कर लिया है! अभी ठीक से पढ़ा नहीं है तभिये यह खयाल आ गया तो लिख दिया। जिन्हें खतरा है वे सभी एकजुट रहें तो खतरा टल जायेगा। ….दुबे जी को बहुत बधाई।
  6. यशवन्त माथुर
    बहुत बढ़िया रिपोर्ट दी है सर!
    आदरणीय दुबे जी का यह प्रयास सफलता की नयी ऊंचाइयों को छूए,यही शुभकामना है।
    सादर
    यशवन्त माथुर की हालिया प्रविष्टी..दर्द
  7. shikha varshney
    @एक अच्छा कार्टूनिस्ट बनने के लिये सबसे पहले आदमी को खुद पर हंसना सीखना चाहिये।
    यह एक अच्छा इंसान बनने के लिए भी उतना ही जरुरी है :)
    दुबे जी को अनेकों शुभकामनाएं .
  8. Indian Citizen
    इस बार बड़ी गंभीर पोस्ट रही. और अच्छी अधिक इसलिये लगी क्योंकि कई विख्यात व्यक्तित्वों के बारे में ऐसी जानकारियां मिलीं जो पहले ज्ञात न थीं. आपका धन्यवाद…
    Indian Citizen की हालिया प्रविष्टी..और अब फैजाबाद में हिंसा
  9. वीरेन्द्र कुमार भटनागर
    आपके द्वारा प्रस्तुत नवजात पञिका ” कार्टूनलीला ” के विमोचन का ” आँखों देखा हाल ” बहुत रोचक और ज्ञानवर्धक है। दुबे जी ने वास्तव में साहसिक और सराहनीय कार्य किया है । उनको बधाई और शुभकामनायें। आपको भी बधाई।
  10. प्रवीण पाण्डेय
    चुभती चीज को चुनना और उसे और गहरेपन से भर देना खतरनाक भी हो सकता है।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..डिजिटल जीवनशैली
  11. aradhana
    हमें बहुत अच्छा लगा कि एक व्यक्ति बने-बनाए ढर्रे से बाहर निकला और उसने इतना अधिक साहसिक कदम उठाया. मेरी ओर से डूबे जी को पत्रिका की सफलता के लिए शुभकामनाएँ पहुँचा दीजियेगा.
    अब एक मज़ाक की बात— मोहन खत्री जी तो आम आदमी लग रहे हैं, पर आप एकदम ‘सरकारी शरीफ आदमी’ लग रहे हैं. डूबे जी से कहिये एकाध आपके भी बना दें. आपका कार्टून बहुत अच्छा बनेगा :) और कोट किया जाएगा ‘सरकारी शरीफ आदमी’ हे हे हे !
    aradhana की हालिया प्रविष्टी..Embedding Images from Instagram
  12. विष्‍णु बैरागी
    दिन प्रति दिन अधिकाधिक प्रतिकूल होते जा रहे इस समय में इसे दुबेजी का साहस कहें या पत्‍थर फेंक कर माथा मॉंडने की मूर्खता? लेकिन चाहे जो हो, अब शुरुआत तो हो ही गई। बहुत बडे शून्‍य को भरने की इस प्रशंसनीय को सलाम और शुभ-कामनाऍं। मँहगाई के इस जमाने में वार्षिक शुल्‍क बहुत कम रखा है। कार्टूनलीला का बैंक खता नम्‍बर भी दे देते तो रकम सीधे जमा कराई जा सकती थी। इतनी अच्‍छी खबर देनेवाली इस पोस्‍ट के ि‍लए धन्‍यवाद। कार्टूनलीला प्राप्‍त करने के लिए फौरन ही एसएमएस कर रहा हूँ।
    विष्‍णु बैरागी की हालिया प्रविष्टी..इंकार, इंकार में अन्तर
  13. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] डूबे जी की कार्टून लीला शुरु [...]
  14. गिरीश बिल्लोरे
    जय हो
    गिरीश बिल्लोरे की हालिया प्रविष्टी..हिंदुस्तानी मुसलमानों में दहेज का चलन : फ़िरदौस खान

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