Friday, November 30, 2012

सावधानी संरक्षण सिद्धांत

http://web.archive.org/web/20140420082819/http://hindini.com/fursatiya/archives/3652

सावधानी संरक्षण सिद्धांत


सावधानी
आज सुबह चाय बड़ी सावधानी से पी। प्लेट की चाय कप से लगकर कपड़े में न गिर जाये इसलिये प्लेट कप के नीचे ही धरे रहे। चाय लाने वाले की ने असावधानी चाय पीने वाले को सावधान बना दिया।
सोचते हैं कि इस बात को ’सावधानी संरक्षण सिद्धांत’ के कपड़े पहना दिये जायें।
1.दुनिया में सावधानी और असावधानी की कुल मात्रा स्थिर होती है। सावधानी और असावधानी को न तो पैदा किया जा सकता है न नष्ट। बस उनका आपस में रूप परिवर्तन किया जा सकता है।
2.किसी काम में उपलब्ध असावधानी के अवसर उस काम के पहले बरती गयी सावधानी के समानुपाती होते हैं। अगर पहले सावधान रहे तो बाद में असावधान रहने के मौके मिल सकते हैं। पहले से लापरवाही बरती तो आगे सावधान रहना पड़ेगा।
चाय वाले उदाहरण से समझा जाये तो चाय लाने वाले ने लाने में असावधानी बरती इसलिये पीते समय सावधान रहना पड़ा। अगर वो लाने में सावधानी बरतता तो पीते समय थोड़ा लापरवाह रहा जा सकता था।
सावधानी आमदनी की तरह है। लापरवाही खर्चे की भांति। जित्ती ज्यादा सावधानी जमा होगी उत्ता ज्यादा लापरवाह रहने की सुविधा मिलेगी।
बाप-दादे सावधानी से कमाते हैं। औलादें बेफ़िक्र होकर खर्चते हैं। बेफ़िक्र बुजुर्गों की संतानों को जीने के लिये सावधान रहना पड़ता है।
जिम्मेदारी से पढ़ने वाले इम्तहान में बिन्दास रहते हैं। इम्तहान के पहले असावधान रहने वालो को परीक्षा भवन में सावधान रहना पड़ता है- कौन जेब में कौन सवाल की पुर्जी है। पकड़ गये तो बचेंगे कि साल बेकार जायेगा।
स्कूल, पेशा, पार्टी चुनने में सावधानी बरतने वाले आगे बेफ़्रिक्र रहते हैं। अपना आका चुनने में चौकस रहने वाले आगे मस्त रहते हैं। भगवान भी जिनका पावरफ़ुल रहता है उनके यहां ’किरपा’ भी बढिया क्वालिटी की बरसती है। नेता सावधानी से चुनिये, इसके बाद सब लफ़ड़ों से लापरवाह हो जाइये।
अभी देखिये दो संपादक लोग जेल गये। अगर वे बातचीत में सावधानी बरतते तो बेफ़िक्र रहकर अपना काम कर रहे थे। उनकी असावधानी ने अगले को सावधानी बरतने के लिये मजबूर कर दिया।
मुंबई की लड़कियों ने लापरवाही से कमेंट किया और लाइक भी। वहां की पुलिस को मजबूरन सावधान होना पड़ा। अब चूंकि पुलिस गुंडों से निपटने में अमूमन लापरवाह रहती है इसलिये भले लोगों से निपटने में उसको चौकस होना ही पड़ता है।
अमेरिकी बैंक लोन बांटने में गैरजिम्मेदार रहे। बाद में उनको इत्ती सावधानी बरतनी पड़ी कि पसीने आ गये उनके।
पता चला है कि पृथ्वी पर बढ़ते अत्याचार और धर्म की हानि का हवाला देकर भगवान ने एक बार फ़िर से अवतार लेने की अनुमति मांगी थी। लेकिन उनकी अर्जी लंबित पड़ी है। जांच बैठ गयी है इस बात के लिये कि उनके चेले जगह-जगह जमीन पर कब्जा करके कमाई करने में लगे हैं। अपराधियों से चढ़ावा लेने की भी बात पता चली है। पहले अवतार के समय की असावधानी भगवान को भारी पड़ रही है।
लोग कहते हैं ’सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’ इसका मतलब यह है कि सावधानी कम करो, ज्यादा करो लेकिन उसको हटाओ मती। जहां वो हटी तो उसकी जगह पर दुर्घटना कब्जा कर लेगी। जगह की कीमतें हरेक के लिये बढ़ी हैं भाई।
कुछ लोग तो इसकी व्याख्या करते हुये बताते हैं -सावधानी हटाने से दुर्घटना घट जाती है मतलब कम हो जाती है।
इत्ता टाइप करने के बाद देख रहे हैं कि घड़ी हमको सावधान कर रही है। चलो उठो दफ़्तर तुम्हारा इंतजार कर रहा है। :)

32 responses to “सावधानी संरक्षण सिद्धांत”

  1. Anonymous
    हमेशा से मन में ये आस रही है की इस देश में कोई अरविन्द केजरीवाल जैसा लीडर पैदा हो और लो हो गया.
  2. संगीता पुरी
    बहुत सावधानी से पढ ली …
  3. ranjan
    Lovely :-)
  4. sonal
    :-)
  5. sonal
    badhiyaa
    sonal की हालिया प्रविष्टी..मेरे शहर में
  6. प्रवीण पाण्डेय
    सावधानी घटी, दुर्घटना घटी..
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..शिक्षा – एक वार्तालाप
  7. ajit gupta
    बहुत सशक्‍त व्‍यंग्‍य। सावधानी और असावधानी का दमदार वर्णन। वैसे हमारे यहाँ एक सज्‍जन हैं, उन्‍होंने पुलिस को एक पत्र लिखा कि आपका यह उद्घोष त्रुटिपूर्ण है – सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। उसने लिखा कि सावधानी हटने पर दुर्घटना घट (कम) कैसे सकती है? अब बताएं, यह भी सावधानी और असावधानी का उदाहरण है।
    ajit gupta की हालिया प्रविष्टी..केरियर, बॉस और विदेश के कारण विस्‍मृत पिता और परिवार
  8. संतोष त्रिवेदी
    बड़े काम का है यह सिद्धांत ….अगर लिखने में सावधानी बरती जाय तो लापरवाही से टिपियाया जा सकता है :-)
  9. mahendra mishra
    बहुत रोचक पोस्ट … सावधानी हटी तो दुर्घटना घटी …
  10. दीपक बाबा
    @चलो उठो दफ़्तर तुम्हारा इंतजार कर रहा है।
    जनाब वाकई फुर्सत में रहते है , मतलब इ कि दफ्तर जाने से पहले ही सावधानी पूर्वक इस विषय पर सोचा जा रहा है, न केवल सोचा जा रहा अपितु पोस्ट भी ठेल दिए, उसके बाद भी तुर्रा ये कि दफ्तर जाना है.
    शुक्र है आज सन्डे नहीं, नहीं तो “सावधानी संरक्षण सिद्धांत’” लघु पुस्तक के रूप में मिलता. :)
    जय हो भक्तों की.
  11. arvind mishra
    ब्लागिंग में इतने विचार पूर्ण आलेख लिखने की क्या जरुरत पद गयी ?;-)
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..भाग दरिद्दर!
  12. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    सावधानी बरतना एक आदत है। जिन्हें लग गयी वे जिन्दगी भर बरतते रहते हैं और जिन्हें नहीं लगी वे बिन्दास लापरवाही से जिन्दगी जिये जाते हैं। दोनों के आउटपुट में थोड़ा अन्तर भले ही हो लेकिन संतुष्टि का भाव शायद दूसरे वाले के पास ज्यादा होता है। पहला उदाहरण आप बताइए, दूसरा उदाहरण अपने बड़े भाई श्री मिश्र जी हैं। :)
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..अपनी फ़िक्र पहले…
  13. Yashwant Mathur

    कल 01/12/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!
  14. sanjay jha
    कैसे बैलेंस करूं………..एक को सम्हालता हूँ ………… दूसरा …………. सामने आ जाता है……….
    प्रणाम.
  15. sanjay @ mo sam kaun.....?
    दूरदर्शन पर सड़क दुर्घटनाओं से बचाव के लिये हैलमेट के प्रयोग पर कभी एक विज्ञापन आता था, – ’सावधानी? व्हाट सावधानी मैन?’ वाला। कभी दफ़्तर न जाना हो और फ़ुरसतिया जी को फ़ुरसत हो तो खोजकर बताईयेगा, सच में मेहनत वसूल वाला विज्ञापन है।
    अब कितना भी सावधान रहने की कोशिश करें, आपको पढ़ते ही चेहरे पर मुस्कान आ ही जाती है और फ़िर दुर्घटना घट जाती है.
    sanjay @ mo sam kaun…..? की हालिया प्रविष्टी..ये बात तो सही है…
  16. mukesh sinha
    कल वर्ल्ड एड्स डे था.. तो सच में लगा सावधानी हटी दुर्घटना घटी………..
    पोस्ट की रोचकता का जबाब नहीं………..
  17. देवेन्द्र पाण्डेय
    हमपहले लापरवाही से पढ़ रहे थे लेकिन इत्ते अच्छे-अच्छे जीवन सूत्र आते गये कि सावधान होकर मन से पढ़ने लगे। जीनव धन्य हो गया।.. आभार आपका।
  18. देवेन्द्र पाण्डेय
    हम पहले लापरवाही से पढ़ रहे थे लेकिन इत्ते अच्छे-अच्छे जीवन सूत्र आते गये कि सावधान होकर मन से पढ़ने लगे। जीनव धन्य हो गया।.. आभार आपका।
  19. देवेन्द्र पाण्डेय
    हांय! असावधानी से दू बार कमेंट हो गया!! एक मिटार दें..इसको भी।
  20. Sarita Chaurasia
    आख़िरकार कुदरत ने हमारी माटी से एक ऐसे बन्दे को उभारा, जिसमे भगत सिंह , महात्मा गाँधी , सरदार वल्लभ भाई पटेल और लाल बहादुर शास्त्री का अक्श दिखता है. ईश्वर अरविन्द केजरीवाल को उम्रदराज करे क्योंकि इस समाप्त प्राय देश की वो एकमात्र आशा हैं. अमेरिका जैसा ताकतवर देश उनका दुश्मन है जिसके तमाम एजेंट भारत में बिखरे हुए हैं.
  21. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] सावधानी संरक्षण सिद्धांत [...]

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Tuesday, November 27, 2012

लिटरेचर इज ब्रिलियेंट इल्लिटरेसी

http://web.archive.org/web/20140420081554/http://hindini.com/fursatiya/archives/3641

लिटरेचर इज ब्रिलियेंट इल्लिटरेसी

फ़िराक़ गोरखपुरी
फ़िराक़ गोरखपुरी
दो पोस्टें हाथ से लिखी। हाशिये का लिखा पढ़ने में गर्दनें अकड़ गयीं। अकड़ी गर्दन खतरनाक होती है। इसलिये ’हस्तब्लॉगिंग’ फ़िर कभी। वैसे सोचा यह भी था कि अच्छी स्याही वाला पेन लायेंगे। लिखते-लिखते लव हो जाने वाला। फ़िर गाढ़ी ’इंकब्लॉगिंग’ करेंगे ताकि साफ़ दिखे। लेकिन तब तक कम्प्यूटर ठीक हो गया इसलिये ऐसे ही।

जब तक कम्प्यूटर गड़बड़ाया था तब तक हाथ से लिखकर उसको स्कैन करके इधर-उधर से पोस्ट करते रहे। हमारे पास एक ठो टेबलेट भी है। उसमें हिंदी का कीबोर्ड तो विद्वानों की सलाह से उतारकर जमा लिये लेकिन हिंदी लिखने में सब करम हो गये। सब जुगत लगाने के बाद निराश होने की सोच ही रहे थे कि तार की मरम्मत हो गयी। हमने निराशा से कहा- फ़िलहाल तो आप पधारें। फ़िर कभी मुलाकात होगी- सी यू लेटर। 

कम्प्यूटर का ऐसा हुआ कि हमारे लैपटॉप का तार गड़बड़ा गया था। बिजली की सप्लाई लैप्पी तक पहुंच ही नहीं रही थी। लैपटॉप का कोई आधार कार्ड तो बना नहीं है जो बिजली सीधे खाते में पहुंच जाये- सब्सिडी की तरह। पता किया तो बोले भाई कि नया मॉडम लेना ही पड़ेगा। दाम बताइन पांच सौ से पच्चीस सौ। पांच सौ वाले की कौनौ गारण्टी नहीं। पच्चीस वाले की साल भर।

कल फ़िर तार मय मॉडम के संभाल के दुकान-दुकान टहले। आखिर में एक बिजली वाले ने बिजली का तार जोड़ दिया हिसाब से। बीस रुपये में। हम खुश। अब समझ नहीं आ रहा है कि बचत कित्ते की बतायें- 480 की 2480 की। लेते तो वैसे शायद सस्ता वाला ही लेकिन बचत सोचते हैं 2480 वाली ही बतायें। CAG वालों की तरह।
कल फ़िर एहसास हुआ कि रिपेयरिंग का महत्व कम नहीं है। एफ़.डी.आई.(FDI) वाले आयेंगे तो नये सामान खरीदने पर ही जोर देंगे। रिपेयर वाले कम हो जायेंगे। इसलिये सोचते हैं FDI के खिलाफ़ हो जायें। :)

कल फ़िराक गोरखपुरी के दो इंटरव्यू सुने। क्या अंदाज है बुजुर्गवार का। सिगरेट सुलगाते हुये मस्ती से बतियाते हुये। बोले- लिटरेचर इज ब्रिलियेंट इल्लिटरेसी। साहित्य में जबरियन कठिन शब्द लिखना मक्खी मारने जैसा है। साहित्य की भाषा ऐसी होनी चाहिये कि तरकारी बेचने वाला भी समझ सके। एक प्रोफ़ेसर के बारे में बताते हुये बोले- उनको सिर्फ़ यह डर रहता था कि कहीं उनकी बात लड़के समझ न जायें। :) 

आप भी देखिये उनकी बातचीत के दो टेप- फ़िराक कद्रदानों के बीच।


फ़िराक कहते हैं -सजावटी भाषा बीमारी होती है। सहज बोली के हिमायती फ़िराक साहब तुलसी के प्रशंसक थे। फ़िराक साहब के बारे में हमारा लिखा एक और पढिये -यहां

कल किरकिट में इंडिया का पूरा पाकिस्तान हो गया। अभी मैच शुरु नहीं हुये थे कि विज्ञापन आने शुरु हो गये थे मीडिया में – क्या भारत इंग्लैंड की पुंगी बजायेगा। पहले मैच में भारत ने उनको हराया। पुंगी बजायी। अगलें में शायद अंग्रेज टीम ने कहा -लाओ हम भी ट्राई करते हैं। हमसे लेकर हमारी ही पुंगी बजा दी। जित्ता क्रिकेट का जुनून रहता है हमारे यहां उससे लगता है कि गांधी जी बेकार ही देश भर में टहलते रहे देश की आजादी के लिये अलख जगाने में। एक अच्छी क्रिकेट टीम बनाते और रगड़ देते इंगलैंड को। फ़ूट लेता इंगलैड न जाने कब का। मैन ऑफ़ द मैच को प्रधानमंत्री बना देते। कप्तान को राष्ट्रपति। चयनकर्ताओं को लोकपाल बना देते। बेचारे अन्ना हजारे चैन से रहते। केजरीवाल की अनुप्रास अलंकार (आम आदमी) वाली पार्टी बनने से बच जाती। लेकिन सब मनचाहा होता कहां हैं। :)

मनचाहा होता अगर तो दफ़्तर का समय क्यों हो गया होता और हम अपनी बात शुरु करते ही खतम करने के लिये मजबूर क्यों होते।

खैर चलिये। आप मजे करिये। तब तक हम आते हैं जरा दफ़्तर तक टहलकर। काम निपटाकर। :)

11 responses to “लिटरेचर इज ब्रिलियेंट इल्लिटरेसी”

  1. देवेन्द्र पाण्डेय
    सुन नहीं पाया फिर कभी..आभार।
  2. Batkahi Editor
    ये दोनों वीडिओ रिकार्डिग्स धरोहर की तरह हैं. आकाशवाणी के खजाने से – अगर इनमें बची हों – ऐसी चीजें बाहर आनी चाहिए.
    Batkahi Editor की हालिया प्रविष्टी..फिजा डरावनी है लेकिन शहर है अमन का!
  3. sushma
    शुक्रिया फिराक साहिब को सुनवाने के लिए…
    sushma की हालिया प्रविष्टी..पतझड़
  4. सतीश पंचम
    बहुत ही मार्के की बात कहे हैं फिराक़ जी, एकदम मन मोह लिया इस विडियो ने। एकदम जुदा अंदाज की बतकही रही।
    सतीश पंचम की हालिया प्रविष्टी..अमां कायदे से पेश आओ….
  5. shikha varshney
    अरे गज़ब गज़ब , वाकई अंदाज खूब है – फिलहाल तो इसने दिल ले लिया ” लिटरेचर इज ब्रिलियेंट इल्लिटरेसी। साहित्य में जबरियन कठिन शब्द लिखना मक्खी मारने जैसा है। साहित्य की भाषा ऐसी होनी चाहिये कि तरकारी बेचने वाला भी समझ सके। एक प्रोफ़ेसर के बारे में बताते हुये बोले- उनको सिर्फ़ यह डर रहता था कि कहीं उनकी बात लड़के समझ न जायें”। :).
  6. सतीश पंचम
    @ साहित्य की भाषा ऐसी होनी चाहिये कि तरकारी बेचने वाला भी समझ सके।
    अभी कल परसों ही तो डीडी भारती पर आगरा बाजार सीरियल की एक कड़ी देख रहा था जिसमें ककड़ी वाला एक शायर से कहता है कि तनिक मेरी ककड़ियों पर शेर कह दो और शायर अपने गुमान में चूर ककड़ियों पर शेर कहने से मना कर देता है, तंज भी कस जाता है कि कहो तो मीर से लिखा लायें.
    आगे की कड़ी नहीं देख पाया। लेकिन ये तरकारी वाली पंक्तियां मुझे बरबस आगरा बाजार का वो सीन याद दिला गईं।
    सतीश पंचम की हालिया प्रविष्टी..अमां कायदे से पेश आओ….
  7. प्रवीण पाण्डेय
    हृदय में उतरने वाली भाषा हो पर गरिमा भी बनी रहे, लोकप्रियता की राह भाषा चली तो लोकतन्त्र सा हाल हो जायेगा।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..शिक्षा – रिक्त आकाश
  8. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    अभी तो दफ़्तर छोड़ते-छोड़ते सरसराकर बाँच गये। मजा आ गया जिसको लेकर घर जा रहे हैं। वहाँ दुबारा खोलकर फिराक साहब को सुनेंगे। कंप्यूटर बन्द ही कर रहे थे तो सोचे आपको बता ही दें। ढिंचक पोस्ट है।
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..अपनी फ़िक्र पहले…
  9. rashmi ravija
    फिराक साहब की बात से लोग कितना इत्तफाक़ रखते हैं,पता नहीं पर हमारा कॉन्फिडेंस लेवल तो थोडा बढ़ ही गया वरना इसी कॉम्लेक्स से ग्रस्त रहते हैं कि हम तो बड़ा सीधा -साधा सरल सा लिखते हैं .
  10. rajeshwari
    शानदार!
  11. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] लिटरेचर इज ब्रिलियेंट इल्लिटरेसी [...]

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