Monday, October 28, 2013

लोकतंत्र का वीरगाथा काल

http://web.archive.org/web/20140419155452/http://hindini.com/fursatiya/archives/5062

लोकतंत्र का वीरगाथा काल

लोकतंत्रपुराने समय में जब राजा लोग युद्ध के लिये निकलते थे तो तमाम तरह के ताम-झाम के साथ निकलते थे। मेरा मतलब प्रयाण करते थे। रानियां बख्तरबंद पहनाती थीं। पंडित मंत्रोच्चार करते थे। चारण और भाट उनकी तारीफ़ के किस्से चिल्लाते हुये गाते थे। अपने-अपने राजाओं को सूर्य के समान तेजस्वी, सागर के समान विशाल हृदय वाला, चंद्रमा के समान शीतल टाइप बताते थे। जो भाट जित्ती कुशलता से अपने अन्नदाता की तारीफ़ कर सके वो उत्ता बड़ा कवि माना जाता था। जिसके दरबार में जित्ता बड़ा कवि होता था वो राजा उत्ता शूरवीर कहलाता था। राजाओं की वीरता उनके दरबारी कवियों की काबिलियत पर निर्भर करती थी।
युद्ध में एक राजा हार जाता होगा। मारा जाता होगा। एक राजा के हारने का मतलब एक चारण कवि के सूर्य का अस्त हो जाना, एक समुद्र का सूख जाना, एक चन्द्रमा पर ग्रहण लग जाना होता था। हारे हुये राजा का कवि अपना पोथी-पत्रा उठाकर प्रतिद्वंदी कवि के अंडर में काम करने लगता होगा। कभी जिस राजा का अलग-अलग तरीके से संहार करवाया होगा अपने मरे हुये राजा से अब उसी राजा की वीरता का श्रंगार करने लगता होगा।
आज जमाना आधुनिक हो गया है। युद्ध की जगह चुनाव होने लगे हैं। तलवारों की जगह जबाने चलती हैं। हाथियों के चिंघाड़ लाउडस्पीकरों के हल्ले में बदल गयी है। घोड़ों की जगह प्रचारक हिनहिनाने लगे हैं। चुनाव युद्ध की तैयारियां होने लगी हैं।
पहले राजाओं के पास अपने खास हथियार होते थे जिन्हे वे अपनी कड़ी मेहनत और घोर तपस्या से अर्जित करते थे। आज जमाना बहुत आगे जा चुका है। आज के शूरवीरों को अपने लिये हथियार अर्जित करने के लिये मेहनत नहीं करनी पड़ती। एक बहादुर दूसरे की कमियों को अपने हथियार की तरह प्रयोग करता है। एक की नीचता दूसरे की महानता बन जाती है। एक का घपला दूसरे के लिये उपलब्धि बन जाता है। एक का भ्रष्टाचार दूसरे का हथियार।
जब एक की कमजोरी दूसरे की ताकत बन जाती है तो काहे के लिये अपनी ताकत के लिये पसीना बहाना। दूसरे की कमियां खोजो, बड़े मियां बन जाओ।
पुराने जमाने में राजा लोग जब लड़ते थे तो तलवारें टकरातीं थीं। चिंगारियां निकलती थीं। खून बहता था। लोग घायल होते थे। अब जमाना आधुनिक हो गया है। भाले, तलवार की जगह घपले, दंगे, भाईभतीजावाद, वंशवाद के आरोपों से हमले होते हैं। एक के एक घपले का जबाब अगले के पचीस घपले हैं। छोटे दंगे का जबाब बड़ा दंगा है। छोटी नीचता का जबाब बड़ी नीचता है। एक रंगी चिरकुटई के जबाब में अगले की बहुरंगी हरकते हैं। मामला फ़ुल हाईटेक हो गया है।
चुनाव आने वाले हैं। प्रचार युद्ध शुरु हो चुका है। प्रचारक अपने-अपने हथियार तेज कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर नये-नये खाते बन रहे हैं। पुरानी खबरों/सूचनाओं को अपने-अपने हिसाब से रंग-रोगन करके दूसरे पक्ष पर हमले शुरु हो गये हैं।
अपने यहां संसदीय लोकतंत्र है। प्रधानमंत्री बहुमत पाये दल के लोग चुनते हैं। कौन जीतेगा यह तय नही। वोटिंग में अभी देरी है। लेकिन प्रधानमंत्री चुन लिये गये हैं। जिस दल ने नहीं चुने उसका उसके प्रधानमंत्री प्रतिद्वंदी दल ने चुन के दे दिया है। ले बे, ये है तेरा प्रधानमंत्री। चल युद्ध शुरु करें।
युद्द भूमि भी पहले की तरह संकुचित नहीं रही। पूरे देश में पसरा है लड़ाई का मैदान। जहां- जहां वोटर है, वहां -वहां युद्ध का मैदान है। चारण भाट सोशल मीडिया पर मुस्तैद हो गये हैं। टीवी चैनल पर डट गये हैं। अखबार में कलम कस के आ गये हैं। हमले शुरु हो गये हैं। हमले और बचाव का फ़ीता कट गया है।
सोशल मीडिया पर तैनात अनगिनत स्वत:स्फ़ूर्त और भाड़े के प्रचारक किसी भी सूचना या बयान को अपने नेता खिलाफ़ पाते हैं तो वे उस पर टूट पड़ते हैं। सूचना और बयानबाज के चिथड़े-चिथड़े कर डालते हैं। अपने नेता की शान के खिलाफ़ बोलता हुआ हर व्यक्ति उनके लिये पांडवों के कुत्ते सरीखा है जिसका मुंह वे एकलव्य की तरह अपने बयान बाणों से बंद कर देते हैं।
चुनाव युद्द में कूदे नेताओं के तूरीण में इधर एक नया हथियार जुड़ा है। मसखरी का हथियार। पहले राजा लोग अपनी वीरता पर भरोसा रखते थे। वह भरोसा अब मसखरेपन पर शिफ़्ट हो गया है। चुनाव मैदान में उतरा नेता स्टैंड अप कामेडियन में बदलता जा रहा है। चुनाव लाफ़्टर चैलेंज में बदलता जा रहा है। एक-दूसरे की खिल्ली उड़ाते हुये नेता एक-दूसरे के लिये मसखरी का मसाला मुहैया करा रहे हैं। नेता अपने चारण का काम हल्का कर रहे हैं। खुद के भाट बन रहे हैं।
यहां नेता कैसा भी हो, उसके कसीदे ही काढ़े जाने हैं। दोनों तरफ़ से अपने नायक की संभावित विजय की गाथायें भी लिखी जा चुकी हैं। मजे की बात है कि दोनों विजयगाथाओं को लिखने का ठेका एक ही भाट कंपनी को मिला है। एडवांस में लिखी जा रही विजयगाथा का भुगतान भी एडवांस में हो चुका है।
यह लोकतंत्र का वीरगाथा काल है।
इस पोस्ट को मेरी आवाज में सुनें:

रिकार्ड किया: 31.10.13
रिकार्ड लगाया: 31.10.13
समयावधि:5.55 मिनट
आवाज : अनूप शुक्ल

7 responses to “लोकतंत्र का वीरगाथा काल”

  1. आशीष श्रीवास्तव
    ” कौन जीतेगा यह तय नही। वोटिंग में अभी देरी है। लेकिन प्रधानमंत्री चुन लिये गये हैं। जिस दल ने नहीं चुने उसका उसके प्रधानमंत्री प्रतिद्वंदी दल ने चुन के दे दिया है। ले बे, ये है तेरा प्रधानमंत्री। ”
    हा हा हा !
    आशीष श्रीवास्तव की हालिया प्रविष्टी..आत्म चेतन मशीन – संभावना, तकनीक और खतरे(Self-aware machine : Possibilities, Technology and associated dangers)
    1. कंसग्रेस
      हा हा हा …. बेहतरीन
  2. arvind mishra
    प्रेम गाथा काल कब था ?
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..चिनहट का चना सचमुच लोहे का चना बन गया था :-) (सेवा संस्मरण -8)
  3. प्रवीण पाण्डेय
    आज जब टीवी के रूप में संजय आँखों देखा प्रसारण भी सुना रहे हैं, युद्ध का आनन्द शतवर्धन हो गया है।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..टाटा स्काई प्लस एचडी
  4. समीर लाल "भूतपूर्व स्टार टिपिण्णीकार"
    सन्नाट!! :)
    समीर लाल “भूतपूर्व स्टार टिपिण्णीकार” की हालिया प्रविष्टी..कुछ वाँ की.. तो कुछ याँ की…
  5. Mohd. Saleem Khan
    वाह वाह फुर्सतिआ जी क्या बात है अल्लाह करे ज़ोर ए क़लम और ज़यादा
    Mohd. Saleem Khan की हालिया प्रविष्टी..Fasih Akmal, Shahjahanpuri ka majmooa e Kalam “Sukhan Sarai”(Post – 4)
  6. नीलम त्रिवेदी
    वाह! बहुत अच्छा व्यंग्य है आधुनिक राजनीतिक माहौल पर. बहुत सटीक और सुन्दर. चुभती हुयी कटीला भाषा मजेदार है! बहुत अच्छा!

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Wednesday, October 23, 2013

पडोसियों का दोस्ताना रवैया

http://web.archive.org/web/20140420081723/http://hindini.com/fursatiya/archives/5007

पडोसियों का दोस्ताना रवैया

नवाज शरीफ़नवाज शरीफ़ साहब जब पड़ोस के हाकिम-ए-सदर बने थे तो कसम खाये थे- “पड़ोसी से दोस्ताना रिश्ते रखेंगे।”
घटनायें गवाह हैं कि अगला अपनी बात पर कायम है। बर्बाद हुआ जा रहा है बेचारा लेकिन दोस्ताना रवैये में रत्ती भर कमी नहीं आने दी उसने। भूख से तो खैर लोग मरते ही रहते हैं ,बीच-बीच में वहां हजारों की तादाद में मरे लोग खून-खराबे में। उफ़ तक नहीं की पट्ठे ने। शिकन तक नहीं आयी चेहरे पर। भीख मांग रहा है खाने के लिये दूसरे से। लेकिन मजाल है जो पड़ोसी से दोस्ताना रवैये में कमी आ जाये। जब से बना है वजीर बरसाये जा रहा है गोलियां। दागे जा रहा है गोले। भेजे जा रहा है घुसपैठिये। जा बेट्टा, जान दे देना, लेकिन पडोसी के यहां हलचल मचाने में चूक न जाना। जान कीमती है लेकिन जबान के आगे कुछ नहीं। हिन्दुस्तान के साथ दोस्ताना रवैया हर हाल में निभाना है। प्राण जायें पर वचन न जायें।
पडोसियों से पड़ोसपना निभाने के हर समाज के तरीके होते हैं। हिन्दुस्तान, पाकिस्तान साझा विरासत वाले हैं। अपने यहां रसोई में जब कोई अच्छी चीज बनती है तो एकाध कटोरी सबसे प्यारे पड़ोसी को भी भेजी जाती है। घर के लोगों को खिलाने से पहले। इसलिये कि पड़ोसी भी चख ले क्या बना है अपने यहां। तारीफ़ करे पाककला की। पड़ोसियों का प्रेम कटोरियों की मार्फ़त परवान चढ़ता रहता है।
पाकिस्तान भी अपना सबसे प्यारा पडोसी है। उसके यहां आतंकवादी बड़ी खूबसूरती से बनते हैं। हुकूमत पर हावी रहते हैं। लगाकर ओसामा से , दाउद , हाफ़ीज और न जाने कित्ते नामचीन लजीज पकवान पड़ोसी की आतंकवादी देग में खदबताते रहे सालों। जब भी कभी प्रेम उमड़ा एकाध कटोरी भेज दिया। दोस्ताना रिश्ता निभाने की हुड़क ने जब भी जोर मारा, भेज दिये सौ-पचास आतंकवादी – “जाओ बे भाईचारा निभा के आओ। जान कुर्बान कर देना लेकिन भाईचारा निभाने में कमी मती आने देना।”
बेचारे भागे चले आते हैं। बम गोलियां बरसाते। उनके दोस्ताना रवैया बनाने के रास्ते में जो भी आता है उसको निपटा देते हैं। कभी-कभी खुद भी हलाक हो जाते हैं। लेकिन मजाल है जो कभी कमी आये बिरादराना रवैये में।
पाकिस्तान के हाल फ़टेहाल नबाबों की तरह हैं। तन पर नहीं लत्ता, पान खायें अलबत्ता। खाने को है नहीं घर में। मांग के खाते हैं। लेकिन ऐंठ बिगड़े नबाबों वाली ही है। दोस्ताना रवैया अपनाने के चक्कर में फ़ौज गोलीबारी करती रहती है हफ़्तों। एक गोली की कीमत 200 रुपये भी रख लें। रात भर की फ़ायरिंग में एक जगह से 5 हजार गोलियां भी चलाये तो 10 लाख फ़ुंक गये । एक ठिकाने से। पचीस जगह से फ़ायरिंग हुई पिछले दिन। 2.5 करोड़ स्वाहा कर दिये एक दिन में। हफ़्ते भर की दोस्ती निभाने में निकल गये पन्द्रह बीस करोड़। तोप का एक गोला गिरी हाल में लाख का पड़ता है। अगर तोप के गोले चले तो मामला अरबों तक निकल गया। इत्ते में हजारों के खाने का इंतजाम हो सकता है लेकिन पेट की चिन्ता किसको है भाई! गोली चलाओ, पड़ोसी धर्म निभाओ।
पड़ोसी धर्म बराबरी से निभता है। कभी-कभी अपने यहां से भी कुछ जाता होगा। हो सकता है उत्ता न जाता हो कम जाता हो। उधर से दस बार आता हो तो अपने यहां से एक बार जाता हो। सौ सुनार की एक लुहार वाले अन्दाज में। लेकिन आता है तो कुछ जाता भी होगा।
आने-जाने को तो कलाकार, खिलाड़ी भी आते-जाते रहते हैं एक दूसरे के इधर। लेकिन नवाज साहब उसको दोस्ताना रवैये में नहीं मानते शायद इसीलिये उसके लिये मेहनत नहीं करते। उसके लिये पैसे भी नहीं मिलते उनको अमेरिका से। अमेरिका गोला-बारूद बेचता है। उसकी दुकान धड़ाम-भड़ाम वाले सामान की खपत से चलती है। मजा आता होता अगले को जब दोस्ताना रवैया निभता होगा इधर। कभी-कभी जब माहौल ज्यादा दोस्ताना हो जाता है तब कहता भी है – “अरे भाई आराम से निभाओ दोस्ती। सब भाईचारा एक दिन में ही दिखा दोगे क्या? ये ले जाओ नया हथियार है। तुमको शूट करेगा। अच्छे से निभाओ दोस्ती।”
हथियार बेचने वाले देश, मोहल्ले के स्मैक बेचने वाले ठेकदार सरीखे होते हैं। वह मोहल्ले के लड़को को मुफ़्त में सुट्टा लगाने की लत लगाता है। एक बार लत लग जाने पर बच्चे चाहें चोरी करें, सामान बेंचे लेकिन नशे के लिये स्मैक जरूर खरीदते हैं। बिना नशा अंतड़ियां ऐंठने लगती है उनकी।
हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और दुनिया के तमाम गरीब देश ऐसे ही बच्चों की तरह हैं जिनको आपस में लड़ने की लत लगा दी है हथियार बेचने वाले ठेकेदार ने। देश की आबादी भले भूखी मरती रहे लेकिन पड़ोसी से गोलाबारी जरूरी है उनके लिये। मजे की बात है इनके हाल उन बिल्लियों की तरह हैं जो अपने झगड़े के निपटारे के लिये भी उसी बंदर के पास जाते हैं जो उनकी रोटी खाता रहता है।
यह लिखते हुये टेलिविजन पर खबर आ रही है कि कल फ़िर फ़ायरिंग हुई है। घायल बी.एस.एफ़. के जवान का बयान आ रहा है कि कैसे घायल हुआ वह। ऐसे न जाने कितने जवान घायल/शहीद हुये होंगे अब तक। उनके बच्चे अनाथ हो गये होंगे। परिवार तबाह। वे कोसते होंगे एक-दूसरे देश की हुकूमतों को।
अब उन बेचारों को क्या पता कि पडोसियों की दोस्ती में यह सब तो होता ही है। दोस्ती का निभाना बड़ी चीज है। लोगों की जानों की कीमत की परवाह करें तब तो निभ चुका भाईचारा।

मेरी (ना)पसंद

चलो यार फ़िर गोली बरसायें,
पड़ोसी से भाईचारा निभायें।
ये नवाज शरीफ़ का नारा है,
फ़िर बना वजीर बेचारा है।
तन पर उनके है नहीं लत्ता,
शौक पान का है अलबत्ता।
मांग के खाते हैं बेचारे ये,
फ़ौज की चाबी से अकड़े ये।
जरा ढील की तो फ़िर जायेंगे,
अबकी तो भाग भी न पायेंगे।
जनता मरती भूख-प्यास से,
फ़ायरिंग में क्या जाता पास से।
आयेगा सब जी अमरीका से,
बिल्ली की लड़ाई में बंदर से।
कुछ मरे कुछ घायल हो जायें,
चलो यार फ़िर गोली बरसाये।
-कट्टा कानपुरी

5 responses to “पडोसियों का दोस्ताना रवैया”

  1. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] पडोसियों का दोस्ताना रवैया [...]
  2. Alpana
    वाह!वाह!
    क्या खूब हिसाब लगाया है ,
    इस पोस्ट को अगर दोस्त मुल्क वाले पढ़ लें तो आप को आर्थिक मामलो का सलाहकार अवश्य रख लेंगे .
    इतना ध्यान तो खुद उनके किसी अधिकारी ने नहीं रखा होगा .
    बाकी कट्टा कानपुरी ने भी खूब सही लिखा है.
    आयेगा सब जी अमरीका से,
    बिल्ली की लड़ाई में बंदर से।
    Alpana की हालिया प्रविष्टी..मुक्त – उन्मुक्त
  3. प्रवीण पाण्डेय
    शान्ति से एलर्जी हैं श्रीमानों को, जन्म के कारणों पर अभिमान करना कैसे बन्द कर दें भला?
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..हल्की साइकिलें
  4. arvind mishra
    क्या बात है बॉस-अन्तराष्ट्रीय व्यंग की चिल्गोजियाँ :-)
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..चिनहट का चना सचमुच लोहे का चना बन गया था :-) (सेवा संस्मरण -8)
  5. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    हँसा-हँसा के मार ही डालेंगे…!!!
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..दशहरे के दिशाशूल

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Tuesday, October 22, 2013

अरे चांद अब दिख भी जाओ

http://web.archive.org/web/20140420082340/http://hindini.com/fursatiya/archives/5009

अरे चांद अब दिख भी जाओ

करवा चौथ१आज करवा चौथ का दिन है। घर-घर चांद उपासे हैं। अपने चांद की सलामती के लिये दिन भर भूखे रहेंगे। चांद की सलामती के लिये चांद अब चांद को देखकर ही व्रत तोडेंगे। पानी तक न पिया जायेगा।
खूब खिला है बाजार। करवाचौथ के पहले से चांद श्रंगार में जुटे हुये हैं। मेंहदी रच रही है। फ़ेसियल हो रहा है। पूरे मन से तन सज रहे हैं। धन हवा हो रहा है। हजार-हजार की मेंहदी लगी है मोहल्लों में, मॉल में। सुन्दरता की नुमाइश हो रही है। सब तरफ़ वातावरण “मधुर यह सुन्दर देश हमारा” सरीखा बना हुआ।
लोग अपने कैमरों से फ़ोटो खींच-खींच कर सोशल मीडिया पर सटा रहे हैं। कोई झुककर पूजा करते हुये वाले पोज को प्रोफ़ाइल पिक्चर बनाये हुये है। तीन दिन से झुकी हुई कमर को लोग लाइक कर रहे हैं। करते जा रहे हैं। बेरहम लोग। कमर है कि पत्थर भाई। इसको लाइक मत करो पोज बदलवाओ। अब तरस भी खाओ। सीधे खड़े होकर जरा मुस्कराओ। त्यौहार है, त्यौहार की तरह मनाओ। जरा चहको, खिलखिलाओ।
अपनी पत्नी को पूजा में सहयोग करने के चांद भी निकल चुके हैं। दफ़्तर जाने वाले जल्दी आ जायेंगे। प्रवासी चांद गाड़ियां पकड़कर लौट रहे हैं। वेटिंग/आर.ए.सी. की बाधायें फ़लांगते हुये घर में घुस रहे हैं। घर घुसुये चांद और शराफ़त से अपने चांद को संभाल रहे हैं। अदायें दिखाते हुये चांद को संभालते हुये चांद और शरीफ़ टाइप लग रहे हैं।
कुछ पति बड़े ऐंठते हुये पूजा में सहयोग करते हैं। कुछ शान से चरण स्पर्श भी कराते हैं पत्नियों से। कुछ छुई-मुई बन जाते हैं। जो इसे बेकार प्रथा मानते हैं वे पत्नी पर झल्लाते हैं। व्रत को फ़िजूल बताते हैं। मोहब्बत से हड़काये जाते हैं। शर्माते हैं। मुस्काते हैं। फ़िर सर झुकाकर पत्नी के लिये नाश्ता बनाते हैं।
करवाचौथ की कमेंट्री करता हुआ कवि कहता है:
चांद चहकते हैं घर-घर में,
एक टंगा है आसमान में।

करवा चौथ२सजी हथेली पर मेंहदी है,
अकड़ा गया, हाथ सजने में।

पूजा के लिये है झुकी सुंदरी,
ऐंठी फोटो की कमर सुबह से।
फ़ेसियल यार बहुत मंहगा है,
छोड़ो, मुस्काओ खिल जायेंगे।
चांद उपासे हैं चांद के लिये,
चांद उड़ाता माल सुबह से।
अरे यार कुछ तो चहको जी,
भूखे हैं तेरे लिये सुबह से।
मुझे आज तक यह समझ में नहीं आया कि दूर दिखते चांद को देखकर घर के चांद व्रत क्यों तोड़ते हैं? वो कंकरीला, पथरीला चांद जिसमें सांस लेने की हवा तक नहीं। आबादी के नाम पर सिर्फ़ एक बुढिया चरखा कातती रहती है। वो चांद इत्ता जरूरी कैसे हो गया कि उसको देखकर ही व्रत तोड़ा जायेगा? क्या इसलिये कि दूर का चांद सुहाना लगता है?
शक्ल-सूरत के अलावा भी चांद की हरकतें अपन को कभी जमीं नहीं। देखिये कभी कहा भी था अपन ने।
चांद की आवारगी है बढ़ रही प्रतिदिन
किसी दिन पकड़ा गया तो क्या होगा?

हर गोरी के मुखड़े पे तम्बू तान देता है
कोई मजनू थपड़िया देगा तो क्या होगा?
लहरों को उठाता है, वापस पटकता है
सागर कहीं तऊआ गया तो क्या होगा?
लेकिन विडम्बना ही तो है कि जिस चांद की हरकतें ऐसी नागवार गुजरती हों उसका ही इंतजार पलक पांवड़े बिछाकर किया जाये। घरैतिन जब दिन भर की भूखी हो तब लगता है कि जल्दी व्रत का बवाल कटे। चांद दिखे और अपने चांद के चेहरे पर चांदनी खिले। चांद को फ़ोन लगाकर कहने का मन होता है:
अरे चांद अब दिख भी जाओ
ज्यादा नखरे मत दिखलाओ।

भूखी है प्यारी श्रीमती हमारी,
खुश-खुश दिखती है बेचारी।
भूख से चेहरा मुर्झाया सा है,
फ़ूल खिला ज्यों सूख गया है।
आज जरा जल्दी आ जाओ,
बाकी दिन तुम मौज मनाओ।
तुम तो चांद बहुत दूर मे हो,
कंकड़-पत्थर के बने धरे हो।
मेरे चांद को मत तड़पाओ,
मेरी आफ़त मत बढ़वाओ ।
तुझे ट्रीट हम अलग से देंगे,
ढेरों कवितायें तुम पर लिख देंगे।
बस आज यार जल्दी आ जाओ
अरे चांद अब दिख भी जाओ।
बहुत हुई लफ़्फ़ाजी। अब चलें देखा जाये। चांद निकला आया हो शायद। कहा है जब मन से तो मानेगा ही। जायेगा कहां?
अनूप शुक्ल

7 responses to “अरे चांद अब दिख भी जाओ”

  1. आशीष श्रीवास्तव
    ना हमने व्रत रखा है ना रखने दिया है। ये बात और है कि शाम के भोजन के लिये दो तीन व्यंजन ज्यादा बनाये जा सकते है!
  2. Puja Upadhyay
    आज के दिन तो चाँद को धमकी देने और थप्पड़ मारने की बात मत कीजिये. कहीं गुस्सा हुआ बैठा तो शाम को देर से दिखेगा. बीवी का पारा चढ़ेगा. आज उसके भाव बढे हैं :)
    Puja Upadhyay की हालिया प्रविष्टी..इतवारी डायरी: सुख
  3. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    थोड़ी मक्खनबाजी उन बादलों की भी कर लीजिए जो ऐन वक्त पर चाँद को ढंक लेने की फिराक में रहते हैं और व्रतधारिका को समझाना पड़ता है कि चाँद छुपा बादल में… देखा हुआ समझा जाय।
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..दशहरे के दिशाशूल
  4. प्रवीण पाण्डेय
    आज । ो सभी पति सहयोग की भावना से ग्रसित हैं।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..कितनी पहचानें
  5. sharmila ghosh
    अरे वाह… बहुत सुन्दर पोस्ट है दादा . शुभकामनाएँ .
  6. HindiThoughts.Com
    :) बहुत खूब
    HindiThoughts.Com की हालिया प्रविष्टी..Poem on Moon in Hindi
  7. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    […] अरे चांद अब दिख भी जाओ […]

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Monday, October 21, 2013

खजाने के दावेदार

http://web.archive.org/web/20140420081423/http://hindini.com/fursatiya/archives/4998

खजाने के दावेदार

खजानाउन्नाव में खजाना खुद रहा है। कई दावेदार अब तक दावा ठोंक चुके हैं। सपना देखने वाले बाबा जी हैं, खुदाई करने वाली सरकार है, राजाओं के वंशज हैं, आसपास के लोग हैं। सबके अपने तर्क हैं। सब जायज हैं। महीने भर खुदाई होनी है। वारिस बढते जा रहे हैं। ऐसा ही रहा तो कुछ दिन में वारिसों के मुकाबले ऐसे लोग गिनना ज्यादा आसान होगा जिन्होंने दावा नहीं ठोंका।
इस बीच खबर आई है कि पाकिस्तानी फ़ौज ने कल घुसपैठ के लिये जान लगा दी। 25 जगह से घुसने की कोशिश की। सेना के जवानों ने घुसपैठियों पर गोली बरसाने के साथ-साथ चिल्लाते हुये कहा- अबे काहे जान आफ़त में डालते हो। तू नया फ़ौजी है क्या? सुना नहीं क्या हमारा नारा-
दूध मांगोगे खीर देंगे,
कश्मीर मांगोगे चीर देंगे।
इस पर पाकिस्तानी फ़ौजी बोला। अरे भाई कश्मीर के लिये नहीं हम खजाने में अपने हिस्से के लिये आये हैं। आजादी के पहले का गड़ा है। हमारा भी हक बनता है उसमें।
पता चला है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने अमेरिका के राष्ट्रपति को फोन करके इस मामले में हस्तक्षेप करने की बात कही है। उनकी बातचीत के अंश यहां पेश हैं:
पाकिस्तान: सर जी, तीन दिन हुये खुदाई शुरु हुये। आपने अभी तक कोई बयान नहीं दिया। ऐसे कैसे चलेगा?
अमेरिका: हम क्या बयान दें भाई। ये भारत का अपना आन्तरिक मसला है। जहां मन आये खोदते रहें।
पाकिस्तान: अरे सरजी, आपका दखल देना बहुत जरूरी है। आपने दखल न दिया तो आपका हिस्सा तो जायेगा ही। हमारा भी दाब लेगें हिन्दुस्तान वाले।
अमेरिका: हमारा कैसे हिस्सा भाई? हिन्दुस्तान कोई अरब मुल्क तो है नहीं। वहां हमारा हिस्सा जो है वो हमें मिलता ही है।
पाकिस्तान: अरे भाई आपके पूर्वज बरतानिया वाले हिन्दुस्तान से भागते समय अपना माल वहीं छोड़ आये थे। वही वे अब खोद रहे हैं। जब आपके पूर्वजों ने लूटा तो हक तो आपका ही बनता है न!
अमेरिका: बात तो ठीक है लेकिन दावा कैसे ठोंक सकते हैं भाई अपन?
पाकिस्तान: अरे आप कहिये कि अगर आपके पूर्वज न होते तो खजाना राजा लोग खल्लास कर देते। उनकी लूट के चलते ही अब तक बचा रहा। इसलिये आपका हक तो बनता है।
अमेरिका: सही है। इस बारे में सोचते हैं।
पाकिस्तान: अरे सोचते रहे तब तो आपका हिस्सा गोल हो जायेगा। इधर आपके हाल भी खस्ता ही हैं। डेट्रायेट दीवालिया हो गया। अमेरिका का शटडाउन होने-होने को हो रहा था। ऐसे ही गफ़लत में रहे तो आपके हाल हमारे नबाबों सरीखे हो जायेंगे।
अमेरिका: लेकिन आप हमको क्यों दखल करने को कह रहे हैं?
पाकिस्तान: अरे आपके हाल देखकर बड़ा तरस आ रहा है मुझे। बड़ा खराब लग रहा है यह देखकर कि जिससे मांगकर हम खाते हैं उसके हाल ऐसे हो जायें कि शटर गिराने की नौबत आ जाये। सच में तीन रूमाल भीग गये आपके हाल देखकर। आप कुछ करिये वर्ना आप और हम कहीं के न रहेंगे। खजाने में अपना हिस्सा मांगिये।
अमेरिका: सही कहते हैं आप। हम अभी फ़ोन लगाते हैं भारत।
इस बीच फ़ोन की घंटी बजी। हमें लगा कि अमेरिका से हैं। तो थोड़ा जीभ घुमाकर टेढ़ा हेल्लो बोले। उधर से अर्दली बोला साहब आज आफ़िस नहीं आयेंगे क्या?
अर्दली की आवाज से सपना टूट गया। सोचते हैं कि सबको बतायें। लेकिन यह भी सोच रहे हैं किसको बतायें? कौन भरोसा करेगा हमारे सपने का? हम कोई शोभन सरकार थोड़ी हैं।

4 responses to “खजाने के दावेदार”

  1. संतोष त्रिवेदी
    फिर एक धोबीपाट:-)
  2. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    यह घोड़े का क्या कनेक्शन है?
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..दशहरे के दिशाशूल
  3. प्रवीण पाण्डेय
    थोड़ी खुदाई से जीडीपी बढ़ी जा रही है तो काहे की लड़ाई और काहे की शरमाई।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..कितनी पहचानें
  4. suman
    सटीक व्यंग्य :)

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Sunday, October 20, 2013

एक फ़ेसबुकिये की डायरी

http://web.archive.org/web/20140420082204/http://hindini.com/fursatiya/archives/4979

एक फ़ेसबुकिये की डायरी

फ़ेसबुकआजकल फ़ेसबुक का जमाना है। लोग कुछ भी करते हैं उसका स्टेटस FB पर डालते हैं। समोसा खा रहे है। बोर हो रहे हैं। अच्छा लग रहा है। झुंझला रहे हैं। ब्लॉक/अनफ़्रेंड कर दिया। ऐसा फ़ील कर रहे हैं। वैसा महसूस हो रहा है। कुछ हो रहा है। कुछ-कुछ हो रहा है। कुछ भी किया जाये अगर उसको फ़ेसबुक पर न डाला जाये तो लगता है वो काम हुआ ही नहीं। फ़ेसबुक स्टेटस बिन सब सून।
हालांकि फ़ेसबुक पर लोग सब कुछ कह लेते हैं लेकिन फ़िर भी बहुत कुछ रह जाता है जिसे शराफ़त के मारे लोग साझा नहीं करते। ऐसे लोग अपने मन के भाव अपनी डायरी में लिखते हैं। ऐसी ही कुछ डायरियां हाथ लगीं। उनको देखकर लगा कि कितना कुछ छूट जाता है फ़ेसबुक आने से। उन डायरियों में से कुछ के अंश यहां प्रस्तुत हैं:
  1. आज फ़िर उसने अपनी प्रोफ़ाइल पिक बदली। बेवकूफ़ को पता नहीं कि प्रोफ़ाइल बदलने से शक्ल नहीं बदल जाती। मन नहीं था लेकिन लाइक करनी पड़ी। गिल्टी फ़ील हो रहा है। फ़ेसबुक के चलते कित्ता झूठ बोलना पड़ता है।
  2. उसने नयी फ़ोटो लगायी है। हवा में उड़ते हुये बाल देखकर मन किया कि लिखें- ये बाल नहीं तेरे सर से बची-खुची अकल निकलकर बाहर भाग रही है। लेकिन फ़िर लिखा नहीं। उसको ये खुशफ़हमी हो जाती कि उसके पास भी अकल है। किसी को क्यों धोखे में रखना। आंख मूंदकर फोटो लाइक कर दिया।
  3. उसने आज किसी को ब्लॉक करने की उद्घोषणा नहीं की। मन किया पूछूं कि तबियत तो ठीक है। लेकिन फ़िर नहीं पूछा। किसी के पर्सनल मैटर में क्या दखल देना। जित्ती देर में कमेंट लिखेंगे उत्ते में दस ठो लाइक कर लेंगे।
  4. पिछले दस दिन से एक ही आई.डी. से फ़ेसबुकिंग करते-करते बोर हो रहे हैं। खराब लग रहा है। सोचा था आज पक्का नई आई.डी. बनायेंगे। लेकिन नहीं बनाई। ये क्या हो रहा मुझे। गूगलिंग करना पड़ेगी कि ऐसी मन:स्थिति को क्या कहते हैं। कुछ इम्प्रेसिव कहते होंगे तो उसको अपना स्टेटस बना लेंगे। -फ़ीलिंग डिटरमाइन्ड।
  5. ब्लॉग
  6. देख रही हूं आजकल वो मुईं उसका स्टेटस सबसे पहले लाइक करती है। घोटाले के पीछे SAG की तरह उसके स्टेटस से चिपकी रहती है। पूछना पड़ेगा उससे चक्कर क्या है? आजकल चैट भी नहीं करता। लगता है नई आई.डी. से चैट करनी पड़ेगी। ये भी औरों की ही तरह है।
  7. आज उसने फ़िर कुत्ते के साथ अपना फ़ोटू लगाया है। मन तो किया मेनका गांधी को लिख दें कि देखिये आपके रहते जानवरों के साथ कित्ता तो अन्याय हो रहा है। लेकिन फ़िर छोड़ दिया। कमेंट किया-(कुत्ते का) फ़ोटो बहुत अच्छा लग रहा है। ब्रैकेट के अंदर वाली बात मन में कही। ही ही ही ही :) :) :)
  8. आजकल जिसे देखो, कविता लिखने में लगा है। कितना तो क्रूर हो गये हैं लोग। शब्दों के साथ अत्याचार देखकर मन दुखी हो जाता है। कुछ शब्दों से बात हुई। बेचारे कह रहे थे -पता होता कि हमारे साथ इत्ता बेरहम सलूक होगा तो हम डिक्शनरी से भाग जाते। फ़ीलिंग ……….(खाली जगह रीता से पूछ कर भरूंगी। उसको ये सब अच्छा आता है कि कब कैसे फ़ील होना चाहिये। )
  9. तीन दिन से दुष्ट ने हेल्लो नहीं बोला। सोचता है मैं पहले बोलूं। माई फ़ुट। मेरे पांच हजार दोस्त हैं तीन हजार तीस फ़ालोवर। उस बेवकूफ़ के तीन सौ इक्वावन दोस्त। गुस्सा आ गया। उसके स्टेटस पर (जिसको पहले लाइक किया था) जाकर स्टेटस को सैकड़ों बार डिसलाइक/लाइक किया। स्टेटस को झिंझोड़ कर रख दिया। कूल फ़ील हुआ। फ़िर स्टेटस लगाया- भुट्टा चबा रहे हैं, ठंड़ा पीते हुये। :)
  10. कुछ भाई लोग तो ज्ञान की बातें इत्ती बेवकूफ़ी से करते हैं कि मन करता है एक उन्नाव के डौंडिया गांव में खुदाई के लिये लगी एक ठो जेसीबी इनके दिमाग में भी लगा दें। सारी अकल का मलबा निकाल के दिमाग को खाली कर दें। लेकिन फ़िर लगता है कूड़ा कूड़ेदान में ही रहे तो अच्छा। जमीन पर काहे को फ़ैलाया जाये।
  11. आज मंडे की भी छुट्टी थी। छुट्टी मतलब संडे समझकर मैंने टीना को संडे वाली आई.डी. से हेल्लो बोल दिया। वो घंटे भर तक मुंह फ़ुलाये रही। तरह-तरह के बेवकूफ़ी के आइकान भेज कर उसको मनाना पड़ा। ये लड़कियां भी कित्ती चूजी होती हैं यार। मन तो किया कि स्टेटस लगाऊं -टाकिंग टू फ़ूल, फ़ीलिंग इर्रीटेटेड लेकिन फ़िर लगा वो समझ जायेगी तो स्टेटस लगाया- एन्ज्वाइंग संडे, फ़ीलिंग ग्रेट
  12. दोस्त बता रहा था कि वो आजकल बहुत व्यस्त है। दो आई.डी. बनाई है उसने। दोनों प्रधानमंत्रियों की तरफ़ से फ़ेसबुक पर जंग लड़ता है। एक आई.डी. किसी के खिलाफ़ स्टेटस लिखता है। दूसरी से उसके खिलाफ़ तर्क। घंटे दो घंटे एक स्टेटस पर कुश्ती लड़ने के बाद अगला स्टेटस लगा देता है। बता रहा था प्रधानमंत्री कोई बने उसका चमचाइनचीफ़ बनना पक्का है। राज्यमंत्री के दर्जे की आशा है। मन किया उसको कहें ’शेखचिल्ली कहीं के’ लेकिन ’ग्रेट’ कहके बॉय कह दिया। स्टेटस सटाया- फ़ीलिंग रिलैक्ड
  13. भाईसाहब ने बहुत दिन से कोई स्टेटस अपडेट नहीं किया। आज एक लड़के को फ़ुसलाकर लगभग जबरियन समोसा खिला रहे हैं। पक्का दस मिनट के अंदर स्टेटस लगायेंगे- आज एक भूखे को भोजन कराया। संतुष्ट महसूस कर रहा हूं। मैं सोच रहा हूं कि मैं कमेंट करूंगा – क्या अजब पाखंड है। लेकिन मुझे पता है कि मैं किसी को हर्ट नहीं कर सकता। फ़ाइनली दिल पर पत्थर रखकर लिखूंगा- मानवता की सच्ची सेवा।
  14. आज शाम एक फ़्रेंड का फ़ोन आया। कहा आज किसी से फ़ेसबुक ब्रेकअप नहीं हुआ। तबियत घबरा रही है। फ़ीलिंग लो। मैंने कहा तो मैं क्या करूं? तो उसने कहा यार तू ही मुझसे लवर बनकर बात कर ले। आई.डी./पासवर्ड भेजा है तेरी मेल में। मैंने कहा -मुझे इस सब झमेले में नहीं पड़ना। उसने फ़िर दोस्ती की कसम दी तो मुझे दया आ गयी। मैंने कहा अच्छा चल लाग इन करते हैं। मेरी किस्मत अच्छी लाइट चली थी। मैंने उसको एस.एम.एस. किया। उसका जबाब आया -कोई नहीं मैंने खुद दो ब्राउजर से चैट करके ब्रेक अप कर लिया। तूझे हिचकिचा हो रही थी। अच्छे से हो भी नहीं पाता तेरे से। नाऊ फ़ीलिंग रिलैक्स्ड। मैंने स्टेटस लगाया- कैसे-कैसे फ़ेस हैं फ़ेसबुक के, फ़ीलिंग सरप्राइज्ड।
ऐसी न जाने कितनी बातें डायरी में लिखी हुई हैं। सबको यहां लिखना ठीक नहीं है। नमूने बता दिये। आप अन्दाजा लगाइये कि और क्या-क्या लिखा होगा डायरियों में।
आप भी फ़ेसबुक डायरी लिखते हों तो शेयर करिये अपने विचार। कोई हिचकिचाहट हो तो अनाम नाम से मुझे भेज दीजिये। हम छाप देंगे।

33 responses to “एक फ़ेसबुकिये की डायरी”

  1. विवेक रस्तोगी
    क्यों डायरी इधर लिखवाकर बबाल बुला रहे हैं, feeling irritated :(
    देखो ये फ़ुरसतिया जी कितने फ़ुरसती हैं जो FB पर डायरी भी लिखते हैं, इधर किताब पढ़ने का समय नहीं मिल पा रहा है, FB पर स्टेटस सटाने में, लाईक और टिप्पणी मॆं ही समय निकल जाता है, वैसे जो स्टेटस समझ नहीं आता उधर लाईक कर देते हैं, या फ़िर समझ नहीं आता कि अब इसमें टिप्पणी क्या की जाये, नहीं तो ब्लॉगिंग जैसे पढ़कर निकल लेते, अगर ब्लॉगर में भी लाईक वाला ऑप्शन होता तो लाईक ज्यादा आते टिप्पणियाँ कम :D
    विवेक रस्तोगी की हालिया प्रविष्टी..साइड अपर के लोचे और स्लीपर में ठंड को रोकने का इंतजाम
  2. देवेन्द्र बेचैन आत्मा
    आप जितना भी उकसाइये हम अच्छा-अच्छा ही लिखेंगे। इस पोस्ट को पढ़कर डायरी में जो लिखने का मन हुआ वह नहीं लिखेंगे नहीं तो आप मिटार सकते हैं । :) ..बहुत अच्छी पोस्ट।
  3. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    भाई साहब, आपसे तो बहुत बचकर रहना पड़ेगा। कौन जाने किस बात को कैसा बनाकर छाप दें।
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..दशहरे के दिशाशूल
  4. HindiThoughts.Com
    खतरनाक पोस्ट
    HindiThoughts.Com की हालिया प्रविष्टी..Poem on Mind in Hindi
  5. Dr. Monica Sharrma
    ज़बरदस्त ….
    Dr. Monica Sharrma की हालिया प्रविष्टी..चेतनासंपन्न बन अपनी शक्ति साधे स्त्री
  6. amrendra nath tripathi
    क्या खूब लिखा है! मजा आ गया पढ़कर! :)
  7. Mahfooz Ali
    मैं कितना हंस रहा हूँ यह मैं बता आपको बता नहीं सकता … मन कर रहा है कि इस पोस्ट में से ताने लेकर डेली फेसबुक पर स्टेटस अपडेट करूँ …. अब यह तो करना ही पड़ेगा … आ आ आ आ ….. मम्मी …. ऒऒऒऒऒ …. बचाओ …. मेरे पेट में हँसते हँसते दर्द हो रहा है ….
  8. देवांशु निगम
    फेसबुक के इमोशन का मतबल अब समझ आया :) :)
    नाम बता दीजिए किसकी डायरी है, मौज आ जायेगी :) :)
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..The “Talented” Culprit Since 1992
  9. mahendra mishra
    खूब रही आपकी फेसबुक डायरी … आनंदम
  10. संतोष त्रिवेदी
    फेसबुक में अनफ्रेंड या ब्लाक करना बहुत संवेदनशील मसला लगता है,दोनों पक्षों के लिए।
    ऐसा लगता है जैसे बिरादरी से हुक्का-पानी बंद हो जाता है !हम नए तरह का समाज बना रहे हैं जिसमें यह सब करके आत्म-संतुष्टि पा रहे हैं ।
  11. sushma
    ): पढ़ लिए,
  12. वाणी गीत
    कुछ सवालों के जवाब मालूम थे , आपने कन्फर्म कर दिये :)
    वाणी गीत की हालिया प्रविष्टी..गिरा अनयन नयन बिनु बानी…. शब्दों के चितेरे तुलसीदास
  13. सोमेश सक्सेना
    कभी ‘कट्टा कानपुरी’ की डायरी हाथ लगे तो उसे भी शेयर जरुर कीजियेगा. उनकी ‘रचना प्रक्रिया’ उर्फ़ दिमागी खुराफ़ात को समझने का मौका मिलेगा… :) :P
  14. आशुतोष कुमार
    मास्टरपीस !
  15. संतोष त्रिवेदी
    डिक्शनरी से भाग जाते…..गजब।
  16. leena
    badhiya .. subah subah muskrane ki vajah bani ye diary..
  17. sanjay jha
    हंसी बंद हो तो हाथ चले ‘टिपण्णी’ के लिए…………
    प्रणाम.
  18. Anonymous
    और कुछ चाहे हो या न हो , फेस बुक आदमी की शिनाख्त करने में बहुत मदद करती है । उसके शब्द ही उसकी शख्सियत की गवाही देते हैं । उसकी गहराई और उथलापन दोनों का साथ-साथ पता चल जाता है ।
  19. प्रियंकर
    धन्य हो प्रभो ! ऐसे ही बिंदास झाड़े रहो कलट्टरगंज .
    और अइसे ही अंतर्यामी किस्म का मन-पाठ और परआत्माप्रवेश करते रहो और उसे हम तक पहुंचाते रहो . शानदार !
    प्रियंकर की हालिया प्रविष्टी..बड़की भौजी / कैलाश गौतम
  20. meenakshi tiwari
    हा हा हा … हँसते हँसते लोट-पॉट हो गये हम तो ,
    मज़ा आ गया … फेसबुक समझ आ गया ….
  21. meenakshi tiwari
    हा हा हा … हँसते हँसते लोट-पॉट हो गये हम तो ,
    मज़ा आ गया … फेसबुक समझ आ गया ….
  22. Anonymous
    क्लासिक नमूने है … मजा आ गया …
  23. सतीश चन्द्र सत्यार्थी
    हाहाहा.. बढ़िया है.. कूड़ा कूड़ेदान में और फेसबुकिया फेसबुक पर.. ;)
    सतीश चन्द्र सत्यार्थी की हालिया प्रविष्टी..फेसबुक पर इंटेलेक्चुअल कैसे दिखें
  24. : फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] एक फ़ेसबुकिये की डायरी [...]
  25. प्रवीण पाण्डेय
    हा हा, ये डायरी तो हिट हो जायेगी।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..कितनी पहचानें
  26. Alpana
    :)) बहुत खूब!
    आनंद आ गया पढ़कर .
    Alpana की हालिया प्रविष्टी..मुक्त – उन्मुक्त
  27. Dr. Shilpi Yadav
    आज पहली बार मैंने सुमन दीदी के बताने पर आपका ब्लॉग पढ़ा . बहुत ही सहज शब्दों में अपने मानव मन की भावनाएं इतने रोचक ढंग से लिखी है की बस यही कह सकती हु वाह वाह क्या बात है
    वैसे मुझे ऐसा लगता है की ऐसा फेसबुक ही नहीं वास्तविक जीवन में भी होता है (भावनाओ और विचारो का झूठा प्रदर्शन)
  28. arvind dikshit
    वाह बहुत मजेदार ..बधाई
  29. sandeep sharma
    बेहतरीन लिखा है आपने.. कुछ ऐसी शख्सियतों को मैं भी जानता हूँ..:)
  30. visit this site
    Is there a website which makes it easy to follow blogs and podcasts? I don’t experience an iPod, does that thing? .
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    I’m searching to learn a great deal of towards the internet based surfing town as I can. Can everybody recommend their most favorite blogs and forums, tweet grips, or sites you ought to learn most detailed? The ones that are most requested? Many thanks! .
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  33. Our site
    I am demanding my mommy. She doesn’t inevitably want to make profits off them, her role is to use her blog (when famous) and employ it as recommendations to likely help her grab a newspaper writing. She is known for a title for starters recognized as “Answers to Life’s Circumstances”. Precisely where can she article blog sites and also transform into favorite? She uploaded it pretty much on WordPress but there are 3 million people young and old writing weblogs hers gets to be wasted inside the merge. Any advice? .

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