Monday, March 30, 2015

नंबरों की सब्सिडी

पिछले हफ़्ते बिहार के एक स्कूल में मैट्रिक के इम्तहान में नकल की खबरें चर्चा में रहीं।  नकल , शिक्षा व्यवस्था , समाज में बढ़ती नकल प्रवृत्ति पर बहुत बातें हुयीं। जब भारत विश्वकप के सेमी फ़ाइनल में पहुंच गया है उसके जश्न में डूबने की बजाय परीक्षा में नकल का हल्ला मचाना देश विरोधी हरकत नहीं तो क्या है ?

नकल किसी इम्तहान में  में पास होने की सहज सामाजिक इच्छा का अपरिहार्य परिणाम है। लेकिन कुछ बच्चे मिशनरी नकलची होते हैं। 'मिशनरी नकलची' आते हुये प्रश्न का उत्तर भी तब तक नहीं लिखता जब तक उसकी पुर्ची न मिल जाए। ज्ञान के झांसे में वह पुर्ची का अपमान नहीं करता। वहीं कुछ पढ़ाकू विद्यार्थी नकल न करते हुये भी नकल दस्तों से उसी तरह डरे रहते हैं जैसे कुछ बेगुनाह लोग दहेज कानून और हरिजन एक्ट से सहमे रहते हैं।


नकल को एक बुराई के रूप में देखने वालों को समझना चाहिये कि नकल करके पास होने से कौन किसी को नौकरी मिल जाती है। बस देश का शिक्षा प्रतिशत बढ़ता है। नकल करने वाले खुद बुरे बनकर देश की इज्जत बचाते हैं। नौकरी न मिलने पर , नकल करके पास हुये बच्चों में बिना नकल पास हुये बच्चों के मुकाबले आक्रोश कम होता है। नकल देश के औसत आक्रोश को घटाती है।नकल करने वाले बच्चे वास्तव में अपने उन तमाम गुरुओं की इज्जत बजाते हैं जो बच्चों को पढ़ाने के लिये समय ही नहीं निकाल पाते।

अपने देश की तमाम नीतियां इधर-उधर की नकल करके बनती हैं, रिपोर्ट कापी पेस्ट होती हैं। ऐसे में नकल करने वाले बच्चों पर हंसना उचित नहीं लगता।नकल करने वाले बच्चे किताबें नहीं खरीदते। गेस पेपर्स और पुर्ची से काम चलाते हैं। वे कागज की बर्बादी बचाने वाले पर्यावरण प्रेमी होते हैं।फ़िल्म ’गजनी’ में नायक अपने पूरे शरीर को ’नकल- पर्ची’ की तरह इस्तेमाल करता है। बच्चे गजनी के हीरो जैसा बनने की कोशिश में बदनाम हो जाते हैं।

अगर सरकार  सही में नकल रोकना चाहती है तो वह विद्यार्थी के खाते में 33% नम्बर सब्सिडी के रूप में सीधे भेज दे तो इम्तहान में नकल का प्रतिशत धड़ाम से नीचे आ जाएगा।नकल रोकने के लिए शिक्षा मंत्री को ब्यान देना चाहिए-"नंबरों के अभाव कोई बच्चा फेल नहीं होगा।जरूरत पड़ी तो नम्बरों का आयात किया जाएगा।" नकल रोकने का एक विकल्प यह हो सकता है कि बच्चों को जो भी आता है वह उनसे लिखा लिया जाए इसके बाद लिखे के हिसाब से प्रश्न बनवाकर नम्बर मिलें।



Saturday, March 21, 2015

लात खाती शिक्षा नीति


1983 में हम साइकिल से भारत दर्शन के सिलसिले में बिहार भी गए। एक अध्यापक से बिहार की शिक्षा व्यवस्था , नकल की समस्या आदि पर बात हो रही थी। नकल की बात पर उनका कहना था-


" हमको यह चिंता नहीं है कि यहां नकल होती है। हमारी फ़िकर यह है कि अगर ऐसे ही नकल होती रही तो अगली पीढ़ी को नकल कौन करायेगा"

दो दिन से बिहार के स्कूल में जोखिम उठाकर नकल कराने वाले फ़ोटो देखकर लगा कि उनका शक निर्मूल था। अगली पीढ़ी को नकल कराने की व्यवस्था जारी है।

यह घटना शिक्षा व्यवस्था की खामी कहकर प्रचारित की गयी। शिक्षा व्यवस्था की खामी से अधिक यह घटना भारतीय राजनीति में बढ़ते भ्रष्टाचार की कहानी है।

प्रदेश शिक्षा विभाग के अधिकारी जो लाखों रूपये खर्च करके अपनी पोस्टिंग कराते हैं। उनको अपना खर्च निकालना होता है।अगली पोस्टिंग के लिये पैसे का इंतजाम करना होता है।

एक शिक्षा अधिकारी निर्धारित पैसा खर्च करके पोस्टिंग कराकर आये। खर्च की वसूली उन्होंने तेजी से शुरू की।शिकायत हुई। बुलाया गया। पांच लाख और खर्च करना पड़ा अधिकारी को। अधिकारी के लिए सन्देश था- "कमाई करो उससे कोई एतराज नहीं। लेकिन शिकायत नहीं आनी चाहिए।"

प्राइवेट स्कूल बनवाने वाले को अपना खर्च निकालना होता है। मान्यता दिलाने में हुआ खर्च निकालना होता है। इसके लिए आसान तरीका यह होता है कि वह अपने स्कूल को परीक्षा केंद्र बनवाये। वहां बच्चों को पास कराने की गारंटी के साथ फ़ार्म बनवाये।

बच्चों को भी पास होने का प्रमाण पत्र चाहिए होता है।दो,चार ,दस हजार में जुगाड़ हो जाए तो क्या बुरा?

अधिकारी,स्कूल प्रबंधक और किसी तरह पास होने की इच्छा रखने वाले बच्चों का साझा प्रयास का उत्कृष्ट नमूना है यह दृश्य जिसमें दूसरी,तीसरी मंजिल पर चढ़कर खिड़कियों से नकल पर्ची सप्लाई हो रही थी।

इस घटना के बाद कुछ होमगार्ड सस्पेंड हुए। वे बेचारे अस्थाई कर्मचारी होते हैं। पैसा देकर ड्यूटी पाते हैं। कुछ पैसा पाकर नकल में असहयोग नहीं कर रहे थे।बहाली के लिए पैसे का इंतजाम करना पड़ेगा उनको।जितने दिन बहाली नहीं होगी उतने दिन कोई दूसरा काम धंधा करेंगे।बहाल होने पर नुकसान की भरपाई करेंगे।

स्कूल के प्रबन्धक का खर्च बढ़ जाएगा। अगले कुछ साल उसके स्कूल को परीक्षा केंद्र नहीं बनाया जाएगा। जिस अधिकारी ने उस स्कूल को परीक्षा केंद्र बनाया वह अपनी सेटिंग कर रहा होगा। संपर्कों के रसूख से या फिर पैसे से।

यह घटना बिहार की है। लेकिन अपने देश के तमाम प्रादेशिक बोर्डों की हालत उन्नीस बीस ऐसी ही है। सब जगह पैसा पीटने की होड़ है। बेसिक शिक्षा में अध्यापकों के तबादले पोस्टिंग की इतनी महीन और खुली व्यवस्था है कि बड़े बड़े अर्थशास्त्री शर्मा जाएँ।

इस घटना का बिहार बोर्ड से पढ़े बच्चों की काबिलियत से कोई सम्बन्ध नहीं है। सच तो यह है कि बिहार और यू पी बोर्ड से देश के सबसे प्रतिभाशाली बच्चे भी निकलते हैं। किसी बोर्ड का प्रतिभा से कोई लेना देना नहीं।
बरबस श्रीलाल शुक्ल जी का राग दरबारी में लिखा वाक्य याद आ रहा है-"हमारे देश की शिक्षा नीति रास्ते में पड़ी कुतिया है जिसे कोई भी लात लगा देता है।"

बिहार की इस घटना के बाद देश की शिक्षा नीति दो दिन से लात खा रही है।

Tuesday, March 17, 2015

आ चल के तुझे मैं ले के चलूँ

कामता प्रसाद
आज दोपहर को कामता प्रसाद मिले पुलिया पर।उनके पास से गाने की आवाज आ रही थी। हमने पूछा-'रेडियो चल रहा है?बिना कुछ बोले हमारे मोबाईल की तरफ ऊँगली से इशारा करते हुए बताया कि गाना मोबाइल में बज रहा है।मोबाइल उनकी जेब में धरा था।

पता चला कामता प्रसाद फैक्ट्री से अगस्त 12 में रिटायर हुए।लेबर के पद से। दस हजार के करीब पेंशन मिलती है। दो लड़के और एक लड़की है। लड़की और बड़े लड़के की शादी हो चुकी है।

मूलत:इलाहाबाद के रहने वाले कामता प्रसाद अब जबलपुर में ही बस गए हैं। दो लड़के और एक लड़क...ी है। लड़की और बड़े लड़के की शादी हो चुकी है। एक लड़का इलेक्टिशियन है। दूसरा वीडियो गेम और कैरम की दूकान चलाता है। 10 रूपये/घण्टा किराए पर कैरम खिलाता है।

पूछने पर बताया कामता प्रसाद ने कि घर में बैठे-बैठे बोर हो गये तो टहलने निकल आये। वजन के बारे में बताया कि पहले तो और ज्यादा था। अब कम हो गया है।

हमने कहा- "बोर हो जाते हो तो फैक्ट्री क्यों नहीं आ जाते काम करने।" इस पर वो बोले-"फैक्ट्री में प्राइवेट लेबर आते हैं। हमारे लिए क्या काम है वहां? "

बतियाकर फैक्ट्री के जाते समय मोबाइल में गाना बज रहा था- "आ चल के तुझे मैं ले के चलूँ एक ऐसे गगन के तले।"

कहां गायब थे

ये महिला शायद सूरज भाई को हड़का रही है- 'कहां गायब थे जब यहाँ धुआंधार पानी बरस रहा था?'
 

सूरज की हिम्मत नहीं पड़ी कुछ कहने की। चुपचाप चमकते रहे। और कोई मौका होता तो शायद कह देते-'हम तो तुम्हारे सर पर ही हैं। देखो लिखा है-Sunflame झोले में।'

Sunday, March 15, 2015

गुनगुनी सी धूप छू खिल उठे आपका मन

जितना झटका हमारे दोस्तों को लगा हमारे हायकू टेस्टिंग से उससे कुछ ज्यादा ही झटका लगा हमें। उसी झटके में कुछ हायकू और बरामद हुये। आगे कुछ लिखूं तब तक इनका मुजाहिरा कर लिया जाये। यह स्प्रिंगबोर्ड भी है लोगों के लिये- देखें कितना उछल पाते हैं!


सर्द मौसम
कविता भी सिकुड़ी
हायकू बनी।

अंधेरा छाया
कोहरे की चादर
सबने ओढ़ी।

सूर्य ने छेड़ा
हंसी,खिलखिलाई
ओस की बूंद।

पीली सरसों
मस्त लहलहाती
धूप सेंकती।

बर्फ पथ से
सूर्य रथ गुजरा
चमचमाता।

कहो कैसे हो?
चाय ने ठिठुरते
होंठ से पूछा।

धन्य सा हुआ
तुमको पाकर ही
होंठ फड़का।

गद्दे का मन
रजाई जानती है
नर्म गर्म वे।

ईद के चांद
स्वेटर मेरे प्यारे
पास आओ न!

शर्ट खिली सी
कोट से चिपक के
इतराती है।

चंचल जल
ठंडी हवा ने छुआ
जमा बेचारा।

ठंडी हवा ने
तहलका मचाया
जमा है पारा।

स्वर्ग वहीं है
ठंडी के मौसम में
जहां गर्मी है।

अंगीठी जला
डाल कुछ लकड़ी
भून लें आलू।

आओ सर्दी जी
सबको ठिठुराओ
धूप से भिड़ो।

धूप जी देखो
ये ज्यादा न सतायें
रक्षा करना।

गुनगुनी सी
धूप छू खिल उठे
आपका मन।

Thursday, March 12, 2015

किधर गये ओ ‪सूरज‬ भाई

सुबह हुई न दिये दिखाई,
किधर गये ओ ‪#‎सूरज‬ भाई।


धरती को बादल ने धोया,
फ़सलें भींग गई मुरझाईं।

किरणें किधर खेलती भैया,
कहीं इधर नजर न आईं।

राजनीति में गदर कटा है,
ये कित्ती और गिरेगी भाई।

जनता हक्की-बक्की तकती,
लगती है वो बेचारी बौराई।

ये किरणें आई खिलखिल करती,
मन करता है बस करें पिटाई।

चाय ले आओ फ़ौरन दो ठो,
देखो आये हैं #सूरज भाई।

-कट्टा कानपुरी

Monday, March 09, 2015

फ़ेंस फ़ांदता सांड

सबेरे उठे तो पता चला कि सांड भाई घर के बाहर पेड़ के नीचे बैठे जुगाली कर रहे हैं।जानवरों को रोकने के लिए घर के चारो तरफ तार की फेंसिंग है लेकिन सांड जी लगता है हाई जम्प के ख़िलाड़ी रहे हैं पिछले जन्म में। तार फांद के आ जाते हैं अंदर। जहां से फांदकर अंदर आते थे वहां तार के ऊपर एस्बेस्टस की चादर के टुकड़े बन्धवाये गए। फेंसिंग के ऊपर एस्बेस्टस की चादर के लम्बे टुकड़े ऐसे लगते हैं जैसे लोग माथे पर फटका बांधकर परिक्रमाएं करते हैं।

लेकिन सांड भी समझदार है। अब वह चादर की बगल से कूदकर अं...दर आ जाता है। कोई देख लेता है तो भगा देता है। भगाये जाने पर सांड़ चुपचाप बाहर चला जाता है। एतराज नहीं करता। इससे लगता है कि सांड़ मूलत: शरीफ जीव है। आता भले फेन्स फलांगकर है लेकिन जाता मेन गेट से है। इससे यह भी पता चलता है कि सांड़ 'फेन्स जम्पिंग' मजबूरी में करता है। अगर गेट खुला थे तो वह सामने से ही आये। लेकिन गेट बन्द होने के कारण उसको फांदकर आना पड़ता है।

सांड अंदर आकर जो सामने दिखता है उसको तसल्ली से चरता है। भगाए जाने पर चुपचाप भाग जाता है। बुरा नहीं मानता। जब भी सांड चारदीवारी में घुसता है, घर से फोन पर मुझे बताया जाता है। देखो -"आज फिर सांड घुस गया।खेत चर गया।" कुछ ऐसे जैसे भारत पर आतंकी हमला होने पर अमेरिका और सुरक्षा एजेंसियों से शिकायत की जाती है।मैं फिर से फेंसिंग ठीक करने के लिए फोन करता हूँ। दो चार दिन में फेन्स ठीक हो जाती है। लेकिन पता लगता है कि सांड फिर किसी दूसरे कोने से घर की चाहरदीवारी के अंदर दाखिल हो जाता है। आराम से हरियाली चरता है। जब घर वाले देखते हैं और भगाते हैं तो चुपचाप चला जाता है।

अब कुत्ते बिल्ली हों तो उसको मारकर भगा दो। दूर फिंकवा दो। लेकिन सांड इतना इज्जतदार जानवर होता है कि उसके साथ कुत्ते बिल्ली सरीखा व्यवहार नहीँ किया जा सकता न। यह कुछ ऐसे जैसे कि चोर उचक्कों की तो पुलिस हड्डी पसली एक कर देती है लेकिन खूंखार आतंकवादियों के साथ तो वैसा ही सुलूक नहीँ किया जा सकता न। उनसे ख़ास तरह से निपटना पड़ता है।

मुझे अपनी घर की फेंसिंग अपने देश की क़ानून व्यवस्था सरीखी लगती है। ढीली ढाली। कई जगह से छेद वाली। अपराधी आतंकवादी इससे ज्यादा डरते नहीँ। कूद फांदकर इसके अंदर बाहर आते जाते हैं। पकड़े जाने पर भी उनको कोई ख़ास डर नहीं लगता। उनको इत्मीनान रहता है कि जब भी किसी की नजर उन पर पड़ेगी तो वह उनको इज्जत से बाहर कर देगा। थोडा हल्ला गुल्ला शोर शराबा होगा। इसके बाद फिर सब जैसे का तैसा हो जाएगा।

हमने अभी सांड अपने घर से बाहर किया है। सांड सर झुकाये चुपचाप बाहर चला गया।हम जगह जगह से ढीली अपनी फेन्स देख रहे हैं।यह तय कर रहे हैं कि कहाँ कहां से कसवानी है। कहाँ- कहाँ एस्बेस्टस की सीट लगवानी है।

लौटते में गेट से अखबार उठाकर लाते हैं।खबर में किसी मसर्रत की रिहाई पर सियासी तूफ़ान मचा है। लगता है उसको भी जेल से ऐसे ही बाहर किया गया होगा जैसे हमने अभी सांड को बाहर निकाला। बाहर सांड के डंकारने की आवाज आ रही है।मसर्रत भी कहीं हल्ला मचा रहा होगा।

हम अपनी फेन्स ऊँची करवाने के लिए फोन करने जा रहे हैं। इस सांड के बच्चे को घुसने नहीं देना है घर में।
हमारे घर में घुसकर हरियाली चरने वाला निठल्ला कभी शरीफ नहीं हो सकता।इसका कुछ इलाज करना ही होगा।   :)

Saturday, March 07, 2015

खेल कभी खत्म नहीं होते

ट्रेन शहर के बाहर रुक गयी। रोज रूकती है। जबलपुर से चली एक्सप्रेस ट्रेन कानपुर पहुंचते-पहुंचते पैसेंजर बन जाती हैं। हर स्टेशन पर रूकती है। रोजी-रोटी के लिए शहर आने वाले लोग लोग जहां जगह मिलती है चढ़ लेते हैं। ट्रेन सबको ले आती है शहर। किसी को न नहीं कहती। टिकट-बेटिकट में भेदभाव नहीं करती। बहुत भली है ट्रेन।

शहर के पहले इंडस्ट्रियल एरिया के पहले बहुत लोगों को उतरना होता है।स्टेशन तो है नहीं। सिग्नल ...की समस्या भी नहीं। मजबूरन लोगों को चेन पुलिंग करना पड़ता है। स्टेशन जाकर वापस आयेंगे तो देर हो जायेगी कारखाने पहुंचने ने। बहुत समय बर्बाद होगा। देश का विकास प्रभावित होगा। सड़क पर जाम लगेगा सो अलग। ट्रेन की चेन पुलिंग होती है। वह रुक जाती है। ट्रेन को पता है कि उसकी चेन खिंचने वाली है। वह पहले से ही आहिस्ते सी हो जाती है ताकि चेन खिंचने पर झटका न लगे। कुछ ऐसे जैसे कि शहर में पढ़ाई,काम काज के लिए रोज निकलती महिलाओं को अंदाज सा हो जाता है कि किस मोड़, गली चौराहे पर उनको छेड़ा जाना है। वे पहले से सावधान सी हो जाती हैं। चुपचाप छिड़ती हुई निकलती जाती हैं। रोज होने वाली घटनाओं की आदत सी हो जाती है। जिस दिन वह नहीं होती है ,कुछ अधूरापन सा लगता है।

ट्रेन रुकते ही अपन ऊंट की तरह गर्दन उचकाकर बाहर का नजारा देखने लगते हैं। सामने फूस, छप्पर, मिट्टी की गठबन्धन सरकार से घर के बाहर दो बच्चे मिटटी की आड़ी टेड़ी पिच पर कुछ खेल रहे हैं। सीमेंट के पलस्तर के बेडौल से टुकड़े को लड़का किसी खाने में फेंकता है फिर पैर से उचक-उचककर दूसरे खाने में सरकाते हुए ले जाता है। कुछ देर बाद लड़की भी ऐसा ही कहती है। उछलकर घर फांदती है।घर बसाती है। कड़क्को के नाम से याद है मुझे यह।बच्चे न जाने किस नाम से खेल रहे हैं इसे।

अचानक घर से एक महिला निकलती है।बच्चे को कुछ पैसे देती है।बच्चा किसी फास्ट बॉलर वाले अंदाज में लहराता हुआ टेड़ा मेढ़ा होते हुए अगल-बगल की झोपड़ियों के जंगल में गुम जाता है। कुछ देर में हाथ में पालीथीन में कुछ लिए हुए प्रकट होता है। शायद चीनी है।महिला घर झोपडी में घुस जाती है। बच्चे फिर खेलने लगते हैं। कुछ देर बाद एक और छोटा बच्चा घर से निकलता है। लड़खड़ाते हुए चलना सीख रहा है अभी। डगमग डगमग। हिलडुल हिलडुल चलता हुआ।कुछ चहकता हुआ सा। कृष्ण जी की इसी चहकन पर सूरदास जी ने लिखा है:

"किलकत कान्ह घुटुरुवन आवत
मनिमय कनक नन्द आँगन के
बिम्ब पकरिबै धावत।"

लेकिन यह बच्चा कान्हा नहीं है। न इसका आँगन मनिमय है।झोपड़ी के पास एक गड्ढे में कई दिनों से जमा पानी में ही यह अपना बिम्ब देख सकता है।लेकिन उधर जाते ही खेलते हुए बच्चे उसको बरज देते हैं। उनको पता है कि इसकी लीलावर्णन के लिए कोई सूरदास भी नहीं आयेगे।

घर से एक बड़ी होती लड़की निकलती है। वह कुछ देर इधर-उधर समझदारी वाले अंदाज में देखती है। छोटे बच्चे को गोद में उठाकर थोड़ी देर पुचकारती है। फिर उसको लेकर अंदर चली जाती है। खेलते हुए बच्चे इस सबसे बेखबर खेलते रहते हैं।

ट्रेन चल देती है। खरामा-खरामा।एक बच्चा साइकिल पर सिलिंडर लादे जाता दीखता है। कुछ लोग एक जगह इकट्टा जमीन पर झुके कुछ आड़ी तिरछी रेखाओं पर गिट्टियां रखे कोई खेल खेल रहे हैं। एक आदमी बीड़ी पीते हुए अपनी चाल चलता है। बगल का आदमी उसके हाथ से बीड़ी लेकर एक दो सुट्टा मारकर बीड़ी वापस कर देता है। दूसरी तरफ की चाल का इन्तजार है शायद सबको। पास ही कुछ लड़कियां एक हैण्डपम्प पर पानी भरने के लिए इकट्ठा हैं। एक लड़का उचक-उचककर हैंडपंप चला रहा है। पानी बाहर आ रहा है।

बड़े होने पर तमाम लोगों को लगता है कि बचपन में जो खेल वो खेलते थे वो अब खत्म हो गए। उनको कोई नहीं खेलता अब। लेकिन ऐसा शायद होता नहीं है। कोई खेल कभी खत्म नहीं होते। वे सिर्फ एक के बचपन से दूसरे के बचपन में, एक के जीवन से दूसरे के जीवन में चले जाते हैं।किसी के द्वारा खेलना बन्द कर देंने पर खेल उसकी जिंदगी से भले दूर हो जाएँ लेकिन वे खेल किसी दूसरी जिंदगी में चलने लगते हैं। हमेशा चलते रहते हैं। खेल कभी खत्म नहीं होते।

रेल लाइन के किनारे एक आदमी एक औरत के साथ खड़ा रेल को देखते हुए मंजन कर रहा है। दोनों एक साथ मुंह में ब्रश घुमा रहे हैं। मुंह और होंठ के आसपास मंजन का झाग इकट्ठा हो रहा है। शायद ट्रेन को पूरा देखकर दोनों उसे रेलवे लाइन के ही पास थूक दें। क्या पता दोनों आपस में शर्त लगाते हुए थूकें कि देखें कौन ज्यादा दूर थूकता है।

धूप अभी पूरी निकली नहीं है। एक चारपाई पर गेंहू धुले हुए फैले हैं। चादर पर फैले गीले गेंहू को दुलारते हुए सी एक महिला गेंहू के ढेर को बराबर से फैला रही है।सबकी ऊंचाई बराबर कर रही है। ताकि सब दानों को बराबर धूप मिल सके।यह नहीं कि नीचे के दानों तक धूप ही न पहुंचे और ऊपर वाले मजा मारते रहें। गेंहूँ के दाने धूप के इन्तजार में चारपाई पर अलसाये से लेटे इन दानों को पता भी नहीं होगा कि उनसे कुछ मील की दूरी अनगिनत दाने बालियों में बंद मौसम के लाठीचार्ज खेतों में घायल,औंधे पड़े हैं। यह भी पता नहीं कि बालियों के दाने जिएंगे या बालियों में ही दम तोड़ देंगे।टेलीविजन पर कोई खबर भी नहीं आती उनकी तो। टेलीविजन तो भारत वेस्ट इंडीज के मैच में व्यस्त है।

अब ट्रेन फटाफट चलकर स्टेशन पहुंच गयी है। सामान उठाकर अपने आसपास के यात्रियों को थोड़ा निहारते हुए आहिस्ते आहिस्ते चलते अपन पटरी फांदते हुए स्टेशन से बाहर आते हैं। पटरी पार करते हुए याद आता है रेलवे ने बायोडिस्पोजेबल शौचालय पर खूब रकम अलॉट की है।आने वाले दिनों में शायद पटरी पार करते हुए बीच में गन्दगी कम दिखे।

पीछे ट्रेन बाकी बचे यात्रियों को अपने साथ लेकर चली जा रही। पूरे वात्सल्य के साथ। बड़ी भली होती हैं ट्रेने। हमको आलोक धन्वा की कविता याद आ रही है:

हर भले आदमी की एक रेल होती है
जो उसके माँ के घर की ओर जाती है
सीटी बजाती हुई
धुंआ उडाती हुई।



Thursday, March 05, 2015

रोशनी हमेशा अंधेरे पर भारी पड़ती है



ज्योति सिंह जो कि निर्भया के नाम से जानी गयी 1989 में पैदा हुई। दिसम्बर 2012 में दिल्ली में एक जघन्यतम हादसे का शिकार होकर मौत से जूझती हुई फ़िर् नहीं रही।

24 साल की लड़की के साथ हुये इस हादसे पर एक डाक्यूमेंट्री बनी। उसमें इस मामले में एक अपराधी के बयान की चर्चा सोशल मीडिया और समाचार संसार में होती रही। BBC की आलोचना भी की लोगों ने कि इस दुर्घटना को भुनाने के लिये उसने फ़िल्म बनाई।

मैंने फ़िल्म देखी। फ़िल्म देखकर कई बार रोना आया। अपराधी ने जो बातें कहीं हैं उस फ़िल्म से उससे कई गुना गर्हित बयान उसके वकील ने टीवी चैनल पर दिये हैं। अपराधियों में से अधिकतर तो अनपढ़, वंचित पृष्ठभूमि के लोग थे। वकील तो पढ़े-लिखे होते हैं। अपराधी के वकील का बयान था- "अगर मेरे परिवार की कोई लडकी ऐसा करेगी तो उसको जला देने में उसे कोई संकोच नहीं होगा।"

लड़की के बारे में फ़िल्म में बताया गया है। उसके पिता उसको जज बनाना चाहते थे। लेकिन वह डॉक्टर बनना चाहती थी। पिता से उसने कहा कि डॉक्टर से बड़ा कोई पेशा नहीं होता। पढ़ाई में पैसे की कमी बात आई तो उसने कहा- आप जो पैसे मेरी शादी में खर्च करना चाहते हों उससे मेरी पढ़ाई करा दें। उसके माता- पिता मान गये। वह पढ़ने लगी।

ज्योति की अंग्रेजी अच्छी थी। खर्च के लिये पैसे की कमी को वह पार्ट टाइम जाब करके पूरा करती थी। रात को कॉल सेंटर में काम करती थी। सिर्फ़ 4-5 घंटे सोती थी। वह कहती थी- "एक लड़की कुछ भी कर सकती है।"
एक बार एक 10-12 साल का लड़का ज्योति का पर्स छीन कर भाग रहा था। उसको पकड़कर पुलिस वाले ने पीटा। उसने उस लड़के को पुलिस वाले से छुड़वाया। उससे पूछा -’तुम यह क्यों करते हो?’ लड़के ने कहा- ’तुम लोगों जैसे कपड़े पहनने का मन होता है। खाने का मन होता है।’

ज्योति ने उससे वायदा कराया कि वह दुबारा चोरी नहीं करेगा। इसके बाद उसने उस बच्चे को कई खाने की चीजें खरीदकर दीं (जिनको देखकर खाने के लालच में उसने पर्स छीना होगा)

दुर्घटना की रात वह अपने दोस्त के साथ पिक्चर देखने गयी थी। घर में बताकर कि 3-4 घंटे में आ जायेगी। उसका दोस्त कोई एक्शन पिक्चर देखने चाहता था। लेकिन उसने ’लाइफ़ ऑफ़ पाई’ देखना तय किया। देखी। लौटते समय बस में हादसा हुआ। वह वावजूद अपनी अदम्य जिजिविषा के बच नहीं सकी।

अपने गांव में अस्पताल बनाना ज्योति का सपना था। उसका सपना अधूरा रह गया। निर्भया फ़ंड के करोडों रुपये बिना उपयोग के रह गये। सरकार को उन पैसों से उस बहादुर बच्ची का सपना पूरा करने के बारे में सोचना चाहिये।

यह फ़िल्म देखकर तमाम अपराधों की जड़ अपनी शिक्षा व्यवस्था. अपने समाज की विषमता, गैरबराबरी के बारे में फ़िर एहसास होता है। हम लोग अभी बहुत-बहुत पिछड़े हैं अपने समाज के हर तबके तक जीवन की न्यूनतम बुनियादी सुविधायें मुहैया कराने के मामले में।

स्त्रियों के बारे में अपने समाज के बहुत बड़े तबके की सोच सामंती है। स्त्रियां उनके लिये घर, परिवार की जरूरतें पूरा करने का माध्यम हैं बस।

 एक बेहद संवेदनशील फ़िल्म जिसको देखकर मन दुखी हो जाता है। जिसको देखकर एहसास होता है कि अपने समाज में अपराधी कैसे बनते हैं और जिसको देखकर यह भी भान होता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी अपने समाज में लड़कियों का हौसला कैसा हो सकता है। कैसे वे तमाम अवरोधों को फ़लांगकर आगे बढ़ने का जज्बा रखती हैं।

फ़िल्म के बारे में बहुतों ने लिखा इस नजरिये से लिखा कि इससे समाज में गलत संदेश जाता है। पता नहीं उन लोगों को यह क्यों नहीं लगा कि यह फ़िल्म समाज की अनगिनत लड़कियों के मन में ज्योति सिंह जैसी बनने की ललक जगायेगी जो मां-बाप का सहारा बनना चाहती थी, एक कम उम्र चोर बच्चे को सुधारना चाहती थी । जिसकी सबसे बड़ी तमन्ना अपने गांव में अस्पताल खोलना रही हो।

फ़िल्म देखकर अफ़सोस होता है समाज की ऐसी परिस्थितियों के प्रति जिसके चलते ऐसे अपराधी पैदा होते हैं जो सोचते हैं लड़की के साथ बलात्कार और हत्या में गलती लड़की की ही थी।

फ़िल्म देखकर असमय शहीद हो गयी लड़की के प्रति सम्मान का भाव पैदा होता है।

ज्योति (रोशनी) हमेशा अंधेरे पर भारी पड़ती है।

द्वापर में भू- अधिग्रहण

आजकल देश में भूमि अधिग्रहण कानून चर्चा में है। कुछ लोग इस कानून के खिलाफ़ हैं और कह रहे हैं कि यह आम जनता के खिलाफ़ है।  उनको लगता है कि इस कानून से आम लोगों की जमीन पर खास लोग कब्जा कर लेंगे और जनता  सड़क पर आ जायेंगी।

हमारे एक मित्र इस कानून के परम समर्थक हैं। वे कहते हैं  देश के विकास के लिये जरूरी है यह।

"दुनिया में जहां-जहां भी तरक्की हुई है वहां-वहां भूमि अधिग्रहण हुआ है। बिना भूमि अधिग्रहण के तरक्की हो ही नहीं सकती। हमेशा से ऐसा होता आया है।"

इतना कहकर वे मुझे घसीटकर द्वापर युग में ले गये और सुदामा की जमीन का अधिग्रहण का किस्सा सुनाया जो कि इस प्रकार है:

महाभारत की लड़ाई निपटाने के बाद कृष्ण जब राजकाज निपटाने लगे तो उनको किसी भक्त ने समझाया- "प्रभो आप अपने पूर्ववर्ती अवतार राम चन्द्र जी से ज्यादा समर्थ हो। आपकी कलायें उनसे चार ज्यादा हैं। फ़िर भी आपके राज्य में विकास रामराज्य के मुकाबले पिछड़ा हुआ। दुनिया अभी भी खुशहाली के मामले में रामराज्य का ही हवाला देती है। आप कुछ करिये वर्ना रामजी के ज्यादा काबिल होने के बावजूद आपका नाम पिछड़ जायेगा।"

कृष्ण जी ने उत्सुकतावश पुराना गजट मंगवाया।  रामराज्य के रिकार्ड में था:

"नहिं दरिद्र कोऊ दुखी न दीना। नहिं कोऊ अबुध न लक्षन हीना॥
दैहिक, दैविक, भौतिक तापा ।   रामराज नहिं काहुहिं व्यापा॥"

कृष्ण जी ने अपने मुंहलगे चेले से, जिसको कि वे विद्वान भी मानते थे ,  इस बारे में चर्चा की। पूछा--"रामराज्य में  कोई दुखी और दरिद्र नहीं था। ऐसा कैसे हुआ? क्या रामचन्द्र जी राजकाज हमसे भी अच्छे से चलाते थे। इसलिये ऐसा हुआ। हमारे यहां क्या गड़बड़ है जिसको सुधारना चाहिये हमें? "

विद्वान चेले ने बताया- "आपके यहां गड़बड़ कोई नहीं। लेकिन आज के मुकाबले  रामराज्य में  विकास बहुत धड़ाधड़ हुआ। क्योंकि उनके यहां विकास के लिये जमीन फ़टाफ़ट मिलती गयी। कारण यह कि उस समय भूमि अधिग्रहण का तरीका सहज और प्रभावी था। राम जी अश्वमेघ यज्ञ के नाम पर अपना घोड़ा देश -दुनिया में टहलाते थे। घोड़ा जहां-जहां से गुजर गया वहां -वहां की जमीन उनकी हो गयी। इसके बाद वे अपनी जमीन पर मनचाहा विकास करते रहे। रामचन्द्र जी की सफ़लता का राज उनके समय में भूमि अधिग्रहण की सफ़लता की कहानी है। आपको भी अपने राज्य के विकास के भूमि अधिग्रहण तेजी से करना होगा। "

"लेकिन जहां सुई की नोक के बराबर जमीन के लिये भाई-भाई में महाभारत हो गया वहां राज्य के विकास के लिये अपनी जमीन कौन देगा भाई?" -कृष्ण कुछ हताश से बोले।

"होगा मालिक, सब होगा। आप चिन्ता न करें। आप रामचन्द्र जी से ज्यादा कलाओं के स्वामी हैं। इसलिये आपके राज्य में विकास तो ज्यादा होकर ही रहेगा। हम तरीका खोजते हैं। आप चिन्ता न करें।" -कहकर विद्वान चेला फ़ुर्ती से निकल गया।

इसके बाद कृष्ण जी के सलाहकारों ने खोजबीन करके पता किया कि कृष्ण जी के बाल सखा सुदामा गरीबी में दिन गुजार रहे हैं। वे ब्राह्मण थे। मांगते-खाते गुजारा करते मस्त रहते थे। उनकी पत्नी कभी टोकती तो कहते- "औरन को धन चाहिये बाबरि, बामन को धन केवल भिक्षा।"

यह कुछ इसी  तरह था जैसे आज अपने देश के वैज्ञानिक सोचते हैं दूसरों को मौलिक काम करने दो, अपन तो नकल में मस्त रहेंगे।

कृष्ण के सलाहकारों ने सुदामा को विकास के लिये उकसाया और भूमि अधिग्रहण के  लिये पटाने की कोशिश की। पहले तो वे नहीं माने लेकिन फ़िर उन्होंने सुदामा की पत्नी के माध्यम से पटाया।


सुदामा की पत्नी ने सुदामा को ठेल-ठालकर  कृष्ण के पास भेजा। उन्होंने सुदामा को सारे इलाके का प्रतिनिधि मानकर इलाके की सारी जमीन के अधिग्रहण वाले कागज पर सुदामा का अगूंठा लगवा लिया। अधिग्रहण हो गया। 


कृष्ण को अंदेशा था कि हो सकता है कि सुदामा को रास्ते में कुछ लोग भड़कायें और वे बाद में अधिग्रहण मानने से मना कर दें। इसकी व्यवस्था उन्होंने पहले से ही कर रखी। निर्माण एजेन्सियों को ठेके पहले ही दिये जा चुके था। इधर सुदामा ने अधिग्रहण कागज पर दस्तखत किये उधर  उनके गांव में विकास की नींव खुदने लगी। इमारतें खड़ी होंने लगीं। अब उस समय कोई ट्रेन चलती नहीं थी कि आज निकलो कल पहुंच जाओ। सुदामा महीने-दो महीने में मांगते-खाते वापस अपने गांव पहुंचे  तब तक वहां सब निर्माण कार्य पूरा हो गया।  ऊंची-ऊंची अट्टालिकायें बन गयीं थीं। सुदामा अपने इलाके का विकास देखकर भौंचक्के रह गये। उनके हाल वैसे ही हो गये जैसे विकट पिछड़े इलाके में हफ़्ते महीने हाट-बाजार से सौदा सुलफ़ जुगाड़ते गरीब के हाल शहर के विराट माल को देखकर होते हैं।

सुदामा के गांव के विकास से चौंधियाये आसपास के गांव के लोगों ने भी अपनी भूमि अधिग्रहण  में दे दी। इसके बाद तो धड़ाधड़ विकास के काम हुये।   इसीलिये लोग आज भी कृष्ण का नाम लेते हैं। उनको मर्यादा पुरुषोत्तम राम से ज्यादा काबिल मानते हैं।

फ़िर तो सुदामा और उनके गांव वालों के ऐश हो गये होंगे। मैंने मित्र से पूछा?

इस बारे में कोई रिकार्ड नहीं मिलता। क्योंकि राज्य की रुचि अधिग्रहण और उसके बाद  विकास तक ही रहती है। लेकिन उड़ती खबर से पता चलता है कि सुदामा को अपनी जमीन के मुआवजे में जो रकम मिली वह साल भर में उनके ही गांव में खुले मंहगी दुकानों में खर्च कर हो गयी। गांव खतम हो जाने के चलते भीख मिलना भी बन्द हो गया। बाद में उनको वहीं के एक मॉल में चौकीदारी का काम मिल गया क्योंकि बाहर से बुलाने पर चौकीदार मंहगे पड़ते थे। किसी तरह गुजर बसर होती रही।

इस तरह द्वापर में कृष्ण राज्य में भूमि अधिग्रहण संपन्न हुआ।







Monday, March 02, 2015

कल रात मैंने सपना देखा

कल रात देर तक पानी बरसता रहा। टप टप। बादल हमसे बोला भी एक दो बार गरजकर, आओ मेरे जलवे देखो।

हम नहीं आये झांसे में। दुबककर सो गए। कुछ किताबें बगल में धर लिए जिससे कि सपने में कोई आये तो हवा-पानी पड़े। वह भी सोचे कि पढ़ने-लिखने वाला आदमी है। कोई अच्छा सपना दिखाना चाहिए इसको।

सपने के नाम पर एक गाना है न, 'कल रात मैंने सपना देखा, तेरी झील सी गहरी आँखों में।' कितना हसीन लेकिन उससे ज्यादा बीहड़ सपना है। सपना देखने के लिए किसी झील सी गहरी आँखों की कल्पना करें।
झील के नाम पर हमारे पास ही 'रॉबर्टसन झील' है। वहां तक पहुंचने के पहले उसके आसपास के अवैध कब्जे से होते हुए गुजरना होता है।यह कब्जा बिना 'भूमि अधिग्रहण क़ानून' के आम लोगों ने किया है। बताते हैं प्रदेश के एक छुटभैये नेता ने लोगों को इस झील के पास की जमीन पर कब्जा करने में सहयोग किया। फिर कब्जेदारों के वोटों के सहयोग से चुनाव जीतकर प्रभावी , वरिष्ठ और लोकप्रिय नेता होते हुए परमगति को प्राप्त होकर अमर हो गए।

लेकिन हमको झील वाले बवालिया सपने नहीँ आते। हमको हमारी औकात वाले सपने ही आते हैं। कल भी आया ।वही लिखाई-पढ़ाई और इम्तहान वाला। सपने में देखा कि इन्तहान के दिन नजदीक आ गए हैं लेकिन पढ़ाई बिलकुल नहीं हुई है। कोर्स अधूरा है। डर लग रहा है कि कैसे पूरा होगा कोर्स।

आज के सपने में एक और लफड़ा हुआ कि आज दो-दो इम्तहान देने का सपना आया। दोनों की तारीखें आपस में भिड़ी हुई हैं। पर्चे एक ही दिन। मजे की बात की इंटर और ग्रेजुएशन के इम्तहान एक साथ देने हैं। तय किया कि एक इम्तहान छोड़ देंगे। कौन सा छोड़ना है यह तय नहीं किया। जाहिर है कि पहले इंटर वाला पर्चा ही देंगे।लेकिन यह अच्छा हुआ कि कोई इम्तहान देना नहीँ पड़ा। बिना पढ़े ही सपना खत्म हो गया।

हमें हमेशा ये इम्तहान वाला सपना ही आता है।कोर्स ज्यादा है,तैयारी अधूरी। शायद इसलिए कि तमाम काम अधूरे छूटने का एहसास रहता है अवचेतन में।सोचते ज्यादा हैं करने की, हो कम पाता है। बजट घाटे की तरह काम-घाटा सपने में आता है। काम का दबाब मतलब व्यक्तिगत,सामजिक और दफ्तरी काम का दबाब।बगल में धरी मोती किताबें भी सपने में शामिल हो जाती होंगी-'अभी हमें पढ़ा जाना बाकी है।'

मैं सोचता हूँ कि क्या हमारी तरह और लोगों को भी सपने आते होंगे? क्या उनको भी अधूरे काम की चिंता सताती होगी? आते तो जरूर होंगे। प्रेम करने वालों/वालियों के सपने में उनके प्रेमी/प्रेमिकाएं हीरो/हीरोइनों की तरह आते होंगे।बेरोजगारों के सपने में नौकरी आती होगी। नौकरी करने वालों के सपने में प्रोन्नति दिखती होगी। कुछ को बर्खास्तगी का सपना आता होगा।युवा होती लड़कियों के माँ-बाप को सपने में दामाद दीखते होंगे।

यह तो आम लोगों के सपने हुए। घरेलू टाइप। कुछ लोग अलग टाइप के सपने भी देखते होंगे।आतंकवादी सपने में देखते होंगे -'इतने लोगों को ठिकाने लगा दिया, अब इतनों को और लगाना है।'

कोई देखता होगा-'इतनी जमीन हड़प ली।अभी इतनी और हड़पनी है।'

बांग्लादेश में ब्लॉगर को मारने वाले सपने में किसी दूसरे ब्लॉगर की पहचान कर रहे होंगे जिसको वे ठिकाने लगा सके।

और भी सपनों की लिस्ट बनाते लेकिन देखते हैं कि दफ्तर जाने का समय हो गया है। सपना होता तो टाल जाते लेकिन यह सपना नहीं हकीकत है। जाना पड़ेगा।

आप मस्त रहो।हम निकलते हैं।

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