Thursday, April 30, 2015

घड़े पर नक्कासी

आज सबेरे पुलिया पर मटकी बेचने निकली महिलाओं से मुलाक़ात हुई। रिछाई में रहती हैं दोनों जनी। कंचनपुर बेचने जाती हैं मटकी । बीच में पुलिया पड़ी तो सुस्ताने रुक गयीं।

मटकी ये लोग कुम्हार से खरीदती हैं। 35 रूपये की एक। 45 से 50 रूपये तक की बिक जाती हैं। मतलब 10 से 15 रूपये एक मटकी पर मिल जाते हैं।बेचने निकली महिलाएं सास-बहू थीं शायद। बहुरिया की टोकरी में सात मटकी थीं। सास की टोकरी में दो। सास की उम्र और ओहदे के चलते बहू सास से ज्यादा मटकी ले जा रही थी।
सुबह 7 बजे करीब घर से निकलक...र 10 बजे तक मटकी बेंचकर घर लौट आएँगी। कोई मटकी टूट गयी तो पूरा ही नुकसान समझो। घर लौटकर फिर खाना बनाएंगी। गर्मी में मटकी का काम है। बाकी दिनों में मजदूरी करती हैं दोनों। इनके घर वाले भी मजदूरी करते हैं।

फोटो खींचने की पूछने पर बहुरिया ने पल्ला सर के ऊपर धरा फिर फोटो खिंचाई। लेकिन तब तक हम फोटो खैंच चुके थे।

घड़े पर नक्कासी देखिये कितनी सुन्दर है।

साथ वाली बहन जी किसी बैग दबाये बगल में किसी सवारी के इंतजार में हैं।

यह पोस्ट सटाकर हम भी निकल रहे हैं स्टेशन के लिए। कानपुर की तरफ। आप मजे से रहिये। इस बीच कोई मटकी खरीदने के जाएँ तो ज्यादा मोलभाव के चक्कर में न पड़े।
 

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कोदो सवा जुरतो भरि पेट जो

कोदो सवा जुरतो भरि पेट जो
चाहत न दधि दूध मिठौती।


यह सुदामा द्वापर में अपने हाल बताते हुए कहते हैं। फिर कृष्ण के पास सहायता मांगने जाते हैं। आज मुलाकात हुई इमरत से जो डिंडौरी से आये हैं जबलपुर मजूरी के लिए। गांव में जमीन पथरीली है।कोदो सवां थोड़ा होता है। लेकिन गुजारा नहीं होता इसलिए मंजूरी करने जबलपुर आते हैं।

ऊंचाई पर स्थित मन्दिर के नीचे अनेक परिवार शरण पाये हैं। लोग अलग अलग जगह से मजूरी करने आते हैं। कोई अकेले आता है कोई परिवार सहित। कोई 15 दिन,कोई महीना और कोई और भी दिन मजूरी करता है। फिर घर लौट जाता है। कुछ दिन बाद फिर आता है। मजूरी कभी मिलती है कभी नहीं मिलती है।

यह जगह शोभापुर रेलवे क्रासिंग के पास है। एक ओवर ब्रिज बन रहा है यहां। तीन साल हमको हुए इसको बनते देखते। अभी बन ही रहा है। ओवरब्रिज रुप्पन बाबू हो गया (रुप्पन बाबू को पढ़ने और खासकर कक्षा 9 में पढ़ने का शौक है इसलिए पिछले तीन साल से कक्षा 9 में पढ़ रहे हैं-- रागदरबारी) जिसको बनने और बनते रहने का ही शौक है।पूरा होना इसकी शान के खिलाफ है।

इमरत पत्नी के साथ आये हैं मजूरी के लिए। बच्चे घर में हैं।बेरोजगार हैं।हम कहते हैं -'अच्छा नाम है इमरत।' इस पर वो कहते हैं-'नाम तो सब अच्छे होते हैं लेकिन किस्मत ख़राब है तो कोई क्या करे।'

सुबह हुई है। इमरत प्लास्टिक का दस लीटर वाला डब्बा लिए पानी की तलाश में निकले हैं। हैण्डपम्प से पानी भरेंगे फिर दिन शुरू करेंगे।इमरत की तरह अनगिनत लोग अपना अपना घर छोड़कर परदेश में कमाई के लिए टिके हैं। वो भी सोचते होंगे घर में कमाने खाने का जुगाड़ होता तो काहे को यहां पड़े होते।


अभी तो सामान्य काम काज हो रहा है तब कुछ ही लोग आये हैं काम के लिए। जब जबलपुर कभी स्मार्टसिटी बनेगा तो पूरे प्रदेश से कामगारों की फ़ौज घरबार छोड़कर लिए प्लास्टिक का डब्बा शहर में घूमती दिखेगी।

आगे आधारताल इंडस्ट्रियल एरिया के पास एक चाय की गुमटी पर चाय पी। अखबार में किसी जगह डकैती की खबर है। एक आदमी उसका जिक्र करके बताता है -'ये अच्छा काम हुआ।' हमने पूछा -'क्या अच्छा हुआ?' इस पर वह तीन-चार जगह पड़ी डकैती के बारे में बताता है-'ये डकैत लोग यहां के नहीं हैं। बाहर के आये लगते हैं। भोजपुरी बोलते हैं।' हमने कहा तो इसमें अच्छा क्या है? लेकिन तब तक वह चाय पीकर चला गया।शायद कुछ और कहना चाहता होगा लेकिन 'अच्छा' निकल गया मुंह से। लेकिन निकल गया तो निकल गया। वो कोई किसी टीवी का समाचार पढ़ने वाला तो है नहीं जिसे एक गलत उच्चारण पर नौकरी से निकाल दिया जाय।
डकैती की बात पर चाय वाले ने अपना बयान जारी किया-'सब पैसे वालों के लौंडे हैं। खर्च की आदत पड़ जाती है। बाप जब रहते नहीं तो लूटपाट में लग जाते हैं।'

चाय की दूकान वाले की चाय आसपास के कारखानों में जाती है। कोई मालिक कर्मचारियों को एक बार पिलाता है,कोई दो बार। कोई तीन बार भी। पैसे हफ्ते ,पन्द्रह दिन में जब चाहो मिल जाते हैं।चाय की दुकान से खर्च चल जाता है।

फ़ोटो खींचते हैं। दिखाते हैं तो दूकान पर ग्लास धोने वाले मूलचन्द खुश होकर कहते हैं- 'अच्ची है।' तुतलाते हैं। दुकानवाले को दिखाकर कहते हैं-'तैमरा दस हजार का होदा।' सब हंसते हैं। हम उनसे बात करते हैं तो बिना पूछे बताते हैं- '150 लुपया मिलता है। थाना तपड़ा भी।' एक आदमी जोड़ता है-'सोने के लिए तखत भी तो बताओ।'
दूकान पर खड़ी महिला बताती है कि दिमाग कमजोर है इसका। 40 साल उम्र है। अकेला है। यही रहता है।
कमजोर दिमाग का मूलचन्द ने जो भी बात की उसमें पैसा सबसे पहले था। दस हजार का कैमरा, 150 रूपये रोज। इससे क्या निष्कर्ष निकालें? वह भले ही दिमाग से कमजोर है लेकिन मतलब की बात समझता है या फिर यह की कमजोर दिमाग के लोगों के लिए पैसा ही सबसे अहम होता है।

सवा आठ बज गया। फैक्ट्री का समय हो गया। चलें। आप मजे करो। आपका दिन शुभ हो।

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Wednesday, April 29, 2015

हमारे उधर ऐसा ही होता है

लैला की उँगलियाँ ले लो,
मजनूं की पसलियां ले लो।

यही कहकर लखनऊ में ककडियां बेचने का जिक्र है किसी कहानी में। लेकिन पुलिया पर ककड़ी बेचने वाले सरयू बिना किसी हल्ले गुल्ले के ककड़ी बेचते दिखे। 20 रूपये किलो। ग्राहक नहीं दिखे तो बोले सरयू कि बिक जायेगी। ककड़ी बेचने का आज पहला दिन था। इसके पहले मूंगफली बेंचते थे। उसके पहले भुट्टा भी बेंचा।
...
दो बच्चों के पिता सरयू रीवा के रहने वाले हैं। उम्र 30 साल है अभी। 15 साल से ठेला लगा रहे हैं। बताया कि जब 2 साल के थे तब शादी हो गयी थी। हमने कहा ऐसे कैसे? बोले-'हमारे उधर ऐसा ही होता है।'

ताज्जुब यह सुनकर लगा कि पत्नी अभी भी बच्चों के साथ मायके में है और पढ़ रही है। हाईस्कूल में है। खुद सरयू आठ पास हैं। हमने पूछा- इत्ते दिन तक हाई स्कूल में कैसे? तो बोले-फ़ैल हो गयी होगी।
देर हो रही थी दफ्तर की सो सरयू को उनके ठेले पर छोड़कर फैक्ट्री चले गए।

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Tuesday, April 28, 2015

तेरे स्टेटस लाइक करूं,इतने भी बकवास नहीं

तुमको ब्लॉक करूं , इतने भी तुम खास नहीं,
तेरे स्टेटस लाइक करूं,इतने भी बकवास नहीं।

जब भी कोई स्टेटस डाला, तुम ऑफ़ लाइन हुये,
मौका था वाह वाही का,डाली तुमने घास नहीं।

चांद मिलेगा तो हड़कायेंगे, बहुत जोर से उसको,
चांदनी से तलाक लेगा?- अबे चुप ,बकबास नहीं ।

भूकम्प बहुत तेज आया है, पड़ोस के देश नेपाल मे,
कुछ हजार लोग मरे हैं, और कोई बात खास नहीं।

बहुत चिल्ला के रोये हैं, गला बैठा के बोले मौके पर,
खूब नौटंकी की हम फ़िजूल डरते थे- अभ्यास नहीं।

-कट्टा कानपुरी

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जैसी दुनिया है उससे बेहतर चाहिए

साढ़े पांच बजे जगे आज। साइकिल सैर को निकले एक घण्टे बाद।इस बीच करवटे बदलते रहे। मेस के बाहर ही बुजुर्ग दम्पति टहलते हुए दिखे। हाथ भर की सुरक्षित दूरी बनाये हुए। यह हाथ भर की दूरी भारतीय समाज में दाम्पत्य के सुरक्षा कवच की तरह रखी जाती रही है।दूरी कम होने से दाम्पत्य की सुरक्षा को खतरा हो सकता है।

बच्चे पैदल,साइकिल , ऑटो,कार से स्कूल पहुंच रहे हैं।एक महिला अपनी बच्ची का हाथ थामे लिए चली आ रही है। कुछ सिखाती भी जा रही है। सड़क किनारे दो बुजुर्ग सीमेंट की बेंच पर बैठे हुए बतिया रहे हैं। अचानक किसी बात एक बुजुर्ग ठठाकर हंसने लगे। दूसरे भी संग लग लिए। आसपास के पेड़ पौधे भी खिलखिलाने लगे। हंसी का प्रभाव संक्रामक होता है। हंसी पर लिखी एक कविता में हमने लिखा था:

हंसी तो भयंकर छूत की बीमारी है
एक से सौ तक फैलती इसकी क्यारी है।


सड़क किनारे शाखा लग गयी है। आठ दस लोग विभिन्न उम्र के। बचपन से ही शाखाओं के माध्यम बच्चों को 'नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि' सिखाया जाता है। जबकि मरकस बाबा की कक्षाएं विश्वविद्यालयों से शुरू होती हैं। उसमें भी ज्यादातर कक्षाएं देर रात की होती हैं।मार्क्सवाद की पढ़ाई शुरू होने तक बच्चे शाखाओं की पढ़ाई पूरी करके जीवन संग्राम शुरू कर चुके होते हैं।दुनिया भर में मार्क्सवाद के पिछड़ते जाने का यह भी एक कारण है कि उनकी शाखाएं देर से शुरू होती हैं।

चाय की दुकान आज भी नहीं खुली हैं।इंदौर गए हैं किसी शादी में-बगल की दूकान वाला बताता है। सामने से एक आदमी मुंह में बीड़ी हेडलाइट की तरह ठूंसे तेजी से आता है। कई दिन के मैले कपड़े पहने आदमी को देखकर लगता है कि यह बिना कपड़े वाले आदमी से तो बेहतर है।

बेहतर की तुक मिलाते हुए मुक्तिबोध की कविता पंक्ति याद आती है:
"जैसी दुनिया है उससे बेहतर चाहिए
दुनिया साफ़ करने को मेहतर चाहिए।"


गाना बज रहा है। दिल की बात करते हुए:
"कभी छोड़ दिया कभी कैच किया रे
साड़ी के फॉल सा भी मैच किया रे।"


अगला गाना बज रहा है:
"तेरा मेरा रिश्ता है कैसा
एक पल दूर गवारा नहीं।"


जब यह गाना बज रहा है तब अनगिनत लोग अपने अपने घरों से दूर निकल चुके होंगे काम पर। पैदल,साइकिल, रिक्शा,कार,बस,ट्राम या फिर मेट्रो में। गाना अभी भी लागू हो रहा होगा। बस प्रेमी/प्रेमिका की जगह जिंदगी/नौकरी ने ले ली होगी।

लौटते हुए बस स्टैंड पर बैठे लोग दीखते हैं। बुजुर्ग,बच्चे और युवा भी। सब मर्द हैं। उनको सामने से साईकिल पर प्लास्टिक के डिब्बे लादे बच्चियां दिखती हैं। ये पानी भरने जा रही हैं। पानी भरने का काम बच्चियों को ही सौंपा जाता है। बच्चियां भी इसी बहाने घर से निकलने का मौका पाती हैं।

पानी की बात से याद आया एक दिन भजन मण्डली के बाबा जी भगवान की मित्र विव्हलता की बात बताते हुए भजन सूना रहे थे:
"पानी परात को हाथ छुओ नहिं
नैनन के जल सों पग धोये।"


भगवान ने परात का पानी छुआ तक नहीं।अपनी आँखों के पानी से ही पाँव धोये। मैं सोचता हूँ शायद द्वापर में भी पानी की इतनी कमी होती होगी कि बहुत महंगा होता होगा। पानी की कम्पनियों ने सारे पानी पर कब्जा कर लिया होगा। पानी इतना मंहगा हो गया होगा कि भगवान तक सोचने लगे होंगे कि मित्र के पाँव धोने के लिए परात भर पानी बर्बाद हो जाएगा। भगवान को अपनी विवशता पर रोना आ गया होगा कि भगवान होने के बावजूद वे पानी कम्पनियों की मनमानी पर काबू नहीं कर पा रहे हैं। कम्पनियों ने ही उनको भगवान बनाया है। अगर वे उन पर लगाम लगाने का प्रयास करेंगे तो कम्पनियां भगवान को बदल देंगी। यह सोचकर भगवान को इतना रोना आया होगा कि उन आंसुओं का उपयोग करके ही उन्होंने मित्र के पाँव पंखारे। भगवान के आंसू मित्र प्रेम के नहीं विवशता के आंसू थे। नरोत्तम दास चूँकि भगवान के लगाये हुए कवि थे इसलिए उन्होंने इसको उनके मित्र प्रेम के रूप में चित्रित किया।उनकी विवशता को उनकी महानता बताया।

तो मित्रों हम भले ही कलयुग में जी रहे हैं लेकिन शीघ्र ही हम द्वापर जैसी स्थितियों में पहुंच जाएंगे जब पानी इतना मंहगा हो जायेगा जब हम पानी की जगह नयन जलपान करेंगे।

ओह कहाँ से कहाँ पहुंच गए। चलें नहा लें। अभी द्वापर आने में देर है। नल में पानी आ रहा है। तब तक आप मजे से रहें। हंस लें। मुस्करा लें। हँसना मुस्कराना अभी टैक्स फ्री है।

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Monday, April 27, 2015

नम्बर तो ले लीजिये

आज दोपहर को पुलिया पर ये भाई मिले। सुस्ताते हुये। स्प्लेंडर मोटर साइकिल पर जाली दार प्लास्टिक के कवर की हमने तारीफ़ की तो खुश हो गए। बोले -बैठकर,चलाकर देखिये। हमको चलाना तो था नहीं। बस बात शुरू करना था सो तारीफ कर दिए और शुरू हो गया वार्तालाप। किसी व्यक्ति से जुड़ी किसी वस्तु की तारीफ़ करना शुरू करते ही बात की गाडी स्टार्ट हो जाती है। तबियत और हाल चाल,खासकर बुजुर्गों के साथ, भी संवाद शुरू करने का एक तरीका होता है।

प्रीतम सिंह नाम है भाईजी का।मनगवां में रहते हैं। ईंट, मिट्टी,... मौरम आदि ढोने का काम करते हैं। दो छोटे ट्रक हैं टाटा- 407 । एक पहले किसी दूसरे का था। किराए पर खुद चलाते थे। फिर एक अपना ट्रक खरीद लिया किस्तों में। ढाई साल में किस्तें चुका दीं। अब दो ट्रक हैं।

ड्राइवर रखा है। ड्राइवर को 1000 रूपये प्रति हफ्ता ड्राइवरी के और 1500 प्रति हफ्ता मजदूरी के देते हैं। मिट्टी के 700 रुपया ट्राली होते हैं। इसके ऊपर अगर ड्राइवर कमा ले तो वह उसका। और भी तय कमाई में से ऊपर ड्राइवर कमा ले तो उसका हिसाब नहीं लेते। वह कमाई उसकी।

35 साल के प्रीतम की शादी शायद लेट हुई। दो बच्चे हैं।बिटिया बड़ी है।चार साल की। लड़का और छोटा है। हमने पूछा-मोटर साइकिल पर पत्नी को कभी घुमाने ले जाते हो कि नहीं। इस पर प्रीतम ने बताया-हाँ, ले जाते हैं न!
इतना बतिया कर हम फैक्ट्री को चल दिए। पीछे से प्रीतम बोले-'मट्टी ,मौरम की जरूरत हो तो बताइयेगा।'हम बोले- 'हाँ, बताएँगे।' इस पर वो बोले-'नम्बर तो ले लीजिये।' हमने कहा-'नाम याद है। प्रीतम सिंह को पूछ लेंगे।जब जरूरत होगी तब।'

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साफ़ आइनों में चेहरे भी नजर आते हैं साफ़

साफ़ आइनों में चेहरे भी नजर आते हैं साफ़,
धुंधला चेहरा हो तो आईना भी धुंधला चाहिए।

कौन जाने कब ये बरकी कुमकुमे(बल्ब)दम तोड़ दें,
इसलिए कुछ घर में मिट्टी के दिए भी चाहिए।

रोग बन जाती है अक्सर मुस्तकिल(लगातार)संजीदगी,
कुछ जराफत(मजाक)कुछ हंसी,कुछ कहकहे भी चाहिए।

एक मरकज पर हों सब कायम,ये अच्छा है मगर,
इफ्तला फाते नजर के जाविये(कोण) भी चाहिए।

सिर्फ-ए-शायर मताये बालों पर काफी नहीं,
कुब्ब्ते परवाज भी हो, और हौसले भी चाहिए।

शाह राहों से गुजर जाता है हर एक राह रौ(राहगीर)
पेचोख़म हो जिसमें ऐसे रास्ते भी चाहिए।

हर गली कूचे में है 'वासिफ' शनासाओं(पहचान)की भीड़,
हमको कुछ अनजान लोगों के पते भी चाहिए।

-वासिफ़ शाहजहाँपुरी

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फ्रॉम फ्राइंग फैन टु फायर

आज चाय की नियमित दूकान बन्द मिली। दूसरी दुकान से लाये चाय। वहां जलेबी छन रहीं थी।पोहा भी तैयार था। ’ऊँ भूर्भुव: स्व: ’ का जाप रेडियो पर चल रहा था।

जीसीएफ वाले भाई मिले। बताया कि कल भी उनकी फैक्ट्री खुली थी। 1 मई के बदले। हमने कहा-अच्छा! इस पर बोले-"हमारा जीएम ऐसा ही है।किसी की सुनता नहीं।"

यह सुनकर मुझे लगा कि आजकल निर्णय लेने वाले की मरन है। कोई भी निर्णय ले उसकी आलोचना का कोई न कोई पहलू खोज ही लिया जायेगा। एक मई की छुट्टी के बदले किसी इतवार को ओवरटाइम पर काम कर्मचारियों के हित के लिये ही किया जाता है। अब वह इतवार छुट्टी के पहले वाला हो सकता है छुट्टी के बाद वाला। महाप्रबंधक अगर छुट्टी के बदले ओवरटाइम न चलाये तो आफ़त, छुट्टी के पहले इतवार को चलाये तो शिकायत और छुट्टी के बाद वाले इतवार को काम कराये तब भी कोई न कोई कुछ न कुछ कहेगा ही।

फिर पुराने जीएम की बात चली। बोले यादव जी बढ़िया जीएम थे। न्यायप्रिय थे। फैक्ट्री बढ़िया चलाई। सुधार दिया। सबसे काम करा लिया।पहले लोग मनमर्जी करते थे। गर्मी तक में 10 बजे आते थे। लेकिन यादव जी ने सबको टाइट कर दिया। सब खुर्राट लोगों को दो-दो,तीन-तीन चार्जशीट थमा दी। वो उसी के जबाब देने में लगे रहे। किसी को बदमाशी की फुर्सत नहीं।

यादव जी मतलब एस पी यादव जी हमारे भी जीएम रहे।कानपुर एस ए ऍफ़ में। वह फैक्ट्री बहुत गरम फैक्ट्री है। कर्मचारी अपने उचित और परम्परा से चले अधिकारों के प्रति बहुत जागरूक। छोटी छोटी बात पर आये दिन बवाल। घेराव। यादव जी ने बहुत मेहनत की वहां।

यादव जी प्रतिदिन चार पांच कर्मचारियों को अपने दफ्तर में दोपहर के समय बुलाते थे। ये किसी भी सेक्सन के लोग हो सकते थे। उनसे उनके घर, परिवार और फैक्ट्री की किसी परेशानी के बारे में पूछते थे।यथासम्भव हल करने का प्रयास करते थे। सुझाव देते थे। इससे यह हुआ कि फैक्ट्री के तमाम कर्मचारी उनको अपना हितचिंतक मानने लगे।

उत्तर प्रदेश सरकार में अधिकारी रहे डॉ हरदेव सिंह की किताब -"क्यों बेईमान हो जाती है नौकरशाही" के बड़े प्रशंसक हैं। एक बार जिक्र किया तो मैंने वह किताब फ़ील्डगन फैक्ट्री की लाइब्रेरी से मंगाई। उस किताब के लगभग हर पन्ने पर यादव जी ने कुछ न कुछ अंडरलाइन कर रखा था। इस किताब में हरदेव सिंह जी ने एक अधिकारी के काम के दौरान आने वाली परेशानियों और उनसे वे कैसे निपटे इसका जिक्र किया।

सिविल सेवा के अधिकारियों के काम और मनोबल में गिरावट आने का कारण बताते हुए डॉ हरदेव सिंह ने लिखा है : "अधिकारी समय के साथ सुविधाओं के आदी हो जाते हैं। इसके बाद उनमें सही बात के लिए अड़ने की क्षमता कम होती जाती है। फिर वे कमजोर और बेईमान भी हो जाते हैं।"

एस ए ऍफ़ से यादव जी का तबादला जीसीऍफ़ जबलपुर हुआ। जीसीएफ की हालात उन दिनों बहुत खराब थी। यादव जी की प्रतिक्रिया थी-"आई एम गोइंग फ्रॉम फ्राइंग फैन टु फायर।"

जीसीऍफ़ में बहुत परेशानियां रहीं साहब को। यूनियन के नेताओं ने उन पर गेट मीटिंग में व्यक्तिगत हमले किये। अनर्गल आरोप लगाए। लेकिन यादव जी ने आम कामगार और अपने अधिकारियों के सहयोग से सबको सीधा कर दिया। बड़े बड़े खुर्राट नेता मशीन पर खड़े होकर काम करने लगे।

संयोग से मैं जो काम आज वीएफजे में देखता हूँ वह पहले यादव जी देखते थे। फाइलों पर उनकी टिप्पणियाँ देखते हैं अक्सर। 30 से 45 डिग्री की चढ़ाई में साफ़ राइटिंग में लिखी टिप्पणियॉ देखकर पता चलता है कि कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने में वे हिचकते नहीं थे। वे कहते भी थे-"वी आर बीइंग पेड फॉर टेकिंग डिसीजन्स"। हम निर्णय लेने से बचेंगे तो हमारे होने का फायदा क्या?

हमारा एक लेख "हमें पेंशन लेनी है" फैक्ट्री पत्रिका में पढ़ा तो उन्होंने रात 10 बजे मुझे फोन किया और बोले-"अनूप तुम्हारा लेख पढ़कर मुझे रहा नहीं गया तुमको फोन किये बिना। तुमने तो मेरे मन की बात लिखी है।"

कुछ सरकारी अड़चनों के चलते यादव जी को महाप्रबंधक के बाद मेंबर का प्रमोशन नहीं मिल पाया। इससे वो स्वाभाविक तौर पर दुखी थे। उन्होंने एक पत्र में इसका जिक्र भी किया। मैंने उनसे कहा-आपको प्रमोशन नहीं मिला यह अफसोस की बात है।लेकिन इसी बहाने आप जीसीएफ में बने रहे और आपको यहां महाप्रबन्धक बने रहने का मौका मिला। आप मेंबर बन गए होते तो शायद इतने काम यहां न कर पाते जितने आप यहां महाप्रबंधक रहते हुए कर सके। मेंबर को कौन याद रखता है। जीसीएफ के लोग आपको लम्बे समय तक याद रखेंगे।

आज जीसीएफ के एक कर्मचारी से यादव साहब की तारीफ़ सुनकर यह सब लिखते हुए यही लगता है कि अगर आप अच्छा काम करते हैं तो लोग आपको लम्बे समय तक याद रखते हैं।

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Sunday, April 26, 2015

नाव जर्जर ही सही लहरों से टकराती तो है

 
 
आज इतवार को साइकिल से डुमना एयरपोर्ट की तरफ गए। फैक्ट्री इस्टेट से बाहर निकलते ही एक मकान दिखा जिसकी छत सड़क की उंचाई के बराबर है। छत पर सोते हुए लोग साइकिल से दिखे। रांझी होते हुए निकले तो देखा एक आदमी साईकिल पर दो बल्ली लादे लिए जा रहे था।आगे सीओडी में घुसते ही भक्क लाल गुलमोहर का पेड़ दिखा।आसमान में परचम की तरह लाल फूल का झंडा फहराते।

सड़क पर लोग कम ही थे।'हम दो हमारे दो' योजना का पालन करने वाला एक परिवार टहलता दिखा। एक बच्चे के साथ पति आगे आगे। दूसरे बच्चे के साथ पत्नी अनुगामिनी मुद्रा में। बच्चों के टहलते हुए मियां बीबी बराबर नहीं रह पाते।

सुनसान सड़क पर बनी सफ़ेद पेंट की लाइनें बता रहीं थी कि समान्तर रेखाएं अनंत में मिलती हैं। साइकिल
चलाते हुए पता नहीं क्यों यह गाना दोहराते जा रहे रहे थे बार बार:
आग लगे हमरी झोपड़िया में
 हम गायें मल्हार।


आगे आईआईआईटी डुमना तक गए। सोचा इंजीनियरिंग कालेज के बाहर किसी चाय की दूकान पर बैठकर चाय पिएंगे। लेकिन पता चला कि वहां कोई चाय की दूकान ही नहीं बाहर। बच्चों को सब मेस में ही मिलता है। बाहर आने की मनाही है। हमें ताज्जुब हुआ कि ये इंजिनियरिंग कालेज के छात्र हुए या किंडर गार्डन के बाल गोपाल।

अपना हॉस्टल याद आया जहां गेट खुला होने पर भी लड़के दीवार फांदकर चाय की दूकान पर पहुंचते थे। यहां बच्चों को बाहर खाने पीने की मनाही। सिक्योरिटी वाले दरबान ईगल सिक्योरिटी सर्विस के थे। बताया पैसा पूरा मिलता है मतलब 328 रुपया प्रतिदिन।इसके पहले दूसरी सिक्योरिटी सर्विस थी।वह पूरा पैसा नहीं देती थी। उसको हटा दिया मैनेजमेंट ने।

दरबान पास के ही गाँव का था। बता रहा था कि यहां शाम को शहर से तमाम लोग कार में आते हैं।कार में बैठकर दारू पीते हैं। मस्ती करते हैं।हल्ला गुल्ला करते हैं। बदनाम हमारे गाँव का नाम होता है। इसीलिये जब ज्यादा हल्ला काटते हैं लोग तो हम भगा देते हैं उनको। कालेज के लड़कों को रात आठ के बाद बाहर निकलने की मनाही है।


लौटते में डुमना अभ्यारण्य होते हुए आये।घुसते ही दरबान मिला।बताया सन 72 के फ़ौज से रिटायर हैं। बांग्लादेश की लड़ाई लड़ी है। अब पेंशन मिलती है।सिक्योरिटी सर्विस वाला उसके ही गाँव का है।कामर्शियल सिक्योरिटी सर्विस का बिल्ला था कन्धे पर उसके।

अन्दर झील के पास कुछ देर बैठे हम। सीमेंट की साफ़ बेंच देखकर लगा कि लोग आते हैं यहां वरना धूल जमी होती। झील के पानी की लहरें तट से टकरा रहीं थीं। एक नाव पानी से दूर थोडा ऊपर रखी थी। पानी में होती तो दुष्यंत कुमार शेर पढ़ देते:
नाव जर्जर ही सही
लहरों से टकराती तो है।



हम लोगों के अलावा कुल जमा चार युवा और दिखे वहां। वे फोटोग्राफी करने आये थे।एक बच्ची एक सूखे पत्ते को आसमान की तरफ करके फोटो खींच रही थी। एक बच्चे ने हमारा साइकिल चलाते हुए फोटो खींचा। हमने भी बदले में उसका कैमरा सहित फ़ोटो खींच लिया। 90000 हजार का कैनन का कैमरा एकदम छोटी तोप सरीखा लगता है। इसीलिये फोटोग्राफी को शूटिंग कहते हैं शायद।

इंजिनियरिंग कालेज से इसी साल आईटी की पढ़ाई पूरी करके निकले Shubham को फोटोग्राफी के साथ थियेटर का भी शौक है। विवेचना रँगमण्डल से जुड़े हैं।एक्टिंग और निर्देशन करते हैं।

बालक के बड़े बड़े बाल देखकर हमने उनकी तारीफ की तो बताया कि "आषाढ़ का एक दिन" नाटक में विलोम का रोल करना है। उसी के हिसाब से बाल बढ़ा रहे हैं।

कैफेटेरिया के कैफे में चाय पी। ब्रेड खायी। 15 रूपये की चाय और 30 रूपये की दो ब्रेड। इतने में सात चाय पी लेते व्हीकल मोड़ पर।


जंगल में कुछ पेड़ो के परिचय भी लिखे थे।एक पेड़ टुइँया सा था लेकिन हरा भरा ऐंठता ऐसा दिखा मानो बहुमत की सरकार का मुखिया हो। पता चला कि इसकी जड़े गहरी होती हैं। इसी से वह जमीन से रस खींचकर हरा भरा बना रहता है। मतलब साफ़ कि हरे भरे बने रहने के लिए जमीन से गहरे जुड़ाव बने रहने चाहिए।

बाहर निकल कर सड़क पर देखा कि एक बच्चा साइकिल पर दो डब्बों में पानी लादे लिए चला जा रहा था। साइकिल की गद्दी लगता है उचक उचककर देख रही थी कि घर अभी कितना दूर है।

आगे सड़क के किनारे की बंजर जमीन पर बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे।लकड़ी के स्टंप। रबर की गेंद।बैटिंग करता बच्चा पैन्ट घुटनों तक चढ़ाये था।यह उसका बैटिंग पैड था। दूसरी छोर पर बॉलर पूरा फास्ट बॉलर की तरफ बड़ा रनअप लेकर गेंद फेंक रहा था। कुछ बच्चे पेड़ पर चढे मैच का लुत्फ़ उठा रहे थे।बाकी के दर्शक जिनमें हम भी शामिल थे सड़क स्टेडियम से मैच के मजे ले रहे थे। लग रहा था लगान फ़िल्म दोहराई जा रही थी।

लौटते समय रास्ता आसान लगा क्योंकि उतार था। स्थितिज ऊर्जा को गतिज ऊर्जा में बदलते देखते हुए साईकिल चलाना खुशनुमा अनुभव होता है।

आगे सड़क पर फल बिक रहे थे। एक पपीता और चार केले 40 रूपये के लिए। अभी वही खाते हुए पोस्ट लिख रहे हैं। बताइये कैसी लगी?
 
 

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Saturday, April 25, 2015

नत नयनों से आलोक उतर

#‎सूरज‬ की किरणें भी बड़े खिलन्दड़े मूड में हैं आज। सड़क पर सरपट जाती महिला के कान के बालें में लटक कर झूला सरीखा झूलने लगीं। कान का बाला रोशनी से नहा सा गया। ऐसे चमकने लगा जैसे अनगिनत चकमक पत्थर रगड़ दिये हों किसी ने बाले में। रोशनी की थोड़ी चमक आंखों तक जा पहुंची बाकी सब सूरज की किरण ने दुनिया भर में बिखेर दी।

दूसरी किरण एक बच्ची की नाक की कील पर बैठकर उछल-कूद करने लगी। नाक की कील चमकने लगी। उसकी चमक किसी मध्यम वर्ग की घरैतिन को सब्सिडी वाला गैस सिलिन्डर मिलने पर होने वाली चमक ...को भी लजा रही है। रोशनी से बच्ची का चेहरा चमकने लगा है, आंखों और ज्यादा। आंखों की चमक होंठों तक पहुंच रही है। लग रहा है निराला जी की कविता मूर्तिमान हो रही है:

नत नयनों से आलोक उतर,
कांपा अधरों पर थर-थर-थर।

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अखबारों का मसखरापन

कुछ दिन पहले अंग्रेजी के एक अख़बार की खबर का शीर्षक था- "वाइफ एंड्स मैरिज ऐज मैं रिफ्यूजेस कैंडल लाइट डिनर" मतलब आदमी के द्वारा कैंडल लाइट डिनर से मना करने पर पत्नी ने शादी तोड़ी।

खबर के शीर्षक से लगता है कि पत्नी ने शादी इसलिए तोड़ी क्योंकि पति बेचारे के पास उसको कैंडल लाइट डिनर कराने के लिए साधन या फिर समय नहीं होगा। यह भी लगा कि पत्नी जिद करती होगी कैंडल लाइट डिनर के लिए लेकिन पति को पसंद नहीं होगा। मना कर दिया होगा तो पत्नी ने शादी तोड़ दी।
हर तरह से खबर के शीर्षक से जो भी सहज धारणा बनती है वह स्त्री के खिलाफ बनती है। लगता है कि स्त्री ने पति को छोड़ दिया क्योंकि पति उसकी मांग पूरी करने में असमर्थ था। शीर्षक से लगता है पत्नी अत्याचारी है और पति बेचारा है।
लेकिन खबर पढ़ने पर पता चलता है कि वास्तविकता शीर्षक से बनी धारणा के उलट है।मामला बिजली कटौती से जुड़ा था। पति रात का खाना तभी  खाता था जब बिजली आ जाती थी। बिजली आने तक पत्नी को इंतजार करना पड़ता था। बिना बिजली आये पति खाना नहीं खाता था। बिजली आने तक पत्नी को इन्तजार करना पड़ता था। विरोध करने पर हिंसा, मारपीट करता था।
लगातार बिजली कटौती,पति की बिजली की रौशनी में ही डिनर की जिद से उपजी स्थितियों ने आजिज आकर तीन बच्चों की मां ने  सात साल पुरानी शादी तोड़ने का फैसला किया।पति की जिद से वह आजिज आ चुकी थी। पत्नी ने सम्बन्ध ख़त्म करने का निर्णय मजबूरी में लिया।
अखबार की खबर के शीर्षक और खबर में जमीन आसमान का फर्क है। शीर्षक से लगता है कि पत्नी  अड़ियल और अति महात्वाकांक्षी है। पति की मजबूरियों से उसको कोई मतलब नहीं। पति बेचारा और पत्नी मगरूर लगती है। जबकि खबर बताती है कि पत्नी मगरूर नहीं बल्कि मजबूर है। मगरूर तो पति है जिसको अपनी पत्नी की परेशानियों की चिंता नहीं है। उसे तो सिर्फ बिजली की रौशनी में ही खाना चाहिए भले ही इसके लिए पत्नी को रात भर जागना पड़े।
अखबार की खबर और शीर्षक में यह विसंगति अखबारों की खबर आकर्षक और चटपटी बनाने की होड़ में मसखरेपन की सीमा तक जाने की घातक प्रवत्ति की तरफ इशारा करता है।
सहज मानवीय संवेदना के खिलाफ है खबरों को पेश करने का यह रवैया। खबर बेंचने के लालच में मजबूर को दोषी और दोषी को मजबूर चित्रित करती है यह खबर। खबर कम्पोज करने वाले पत्रकार  के स्त्री विरोधी, खबर से सम्बंधित समुदाय  के सहज विरोधी होने की तरफ भी इशारा है यह खबर।
अखबार के मुखपृष्ठ पर छपी यह खबर  अपना सामान बेचने की होड़ में मसखरेपन की सीमा तक संवेदनहीन होते जाने की बाजार की सहज प्रवत्ति का उदाहरण है।

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Friday, April 24, 2015

करवटें बदलते रहे, सारी रात हम



रोहित् और् अभिषेक
सुबह उठ गए वही 5 बजे। 6 बजे तक करवटें बदलते रहे।सोचा गाना लिख दें-

"करवटें बदलते रहे, सारी रात हम"

लेकिन नहीं लिखे। हर कोई कहेगा-झूठ,झूठ,झूठ। सच ही तो है कि यह झूठ है। सो नहीं लिखे।

आज फैक्ट्री के सेक्टर एक की तरफ निकले साइकिल चलाने। लौट कर गेट नम्बर एक के पास चाय की दुकान पर रुके। दूकान पर एक कड़ाही में समोसे तले जा रहे हैं। संसद भवन के आकार की कड़ाही में समोसों का कोरम पूरा है। सब खौलते तेल में एक ही जगह पर धँसे एक दूसरे को ठेलते से लगते हैं। कड़ाही का खौलता तेल देखकर लग रहा है बहुत तेज बहस हो रही है समोसों में आपस में।

संसद की बात चलते ही धूमिल की कविता भागती हुई आती है और धप्प से बैठ जाती है स्क्रीन पर:

"हमारे देश की संसद
तेली की वह घानी है
जिसमें आधा तेल है
और आधा पानी है।"

चाय की दूकान और उसके आसपास चट्टानों पर बैठकर बतियाते लोगों को देखकर जेएनयू का गंगा ढाबा याद आता है। उन चट्टानों पर बैठकर अनगिनत लोग क्रांति, बदलाव, धर्म,राजनीति और समाज पर अंतहीन बहसें करते हैं। यहां बैठकर लोग नौकरी, मंहगाई, डीए, लड़कियों की शादी,बच्चों के भविष्य की बातें करते हैं।गंगा ढाबा का उत्तर आख्यान है यह ढाबा।

दो बच्चे अपनी अपनी मोटर साइकिलों पर बैठे पोहा जलेबी का नाश्ता कर रहे हैं।रोहित और अभिषेक।दोनों 'राज एक्सप्रेस' अखबार में प्रिंटिंग सेक्सन में काम करते हैं। रात की शिफ्ट से छूटे हैं। अखबार की छपाई के बारे जानकारी लेते हैं उनसे।अखबार का पेज सिविक सेंटर के आफिस में बनता है। छपाई रिछाई में।एक लाख करीब छपता है अखबार।रीवा,सतना,छिंदवाड़ा तक जाता है।

अभिषेक की आँख में मोटा चश्मा है। पावर -13 और -11 है।प्रिंटिंग में डिप्लोमा हैं।पहले एक डाक्टर के यहां एक्सरे बनाने का काम करते थे। उसका पानी आँख में चला गया तो आँख खराब हो गयी।इलाज कराना है।पिताजी पिछले साल खमरिया से रिटायर हुए। बम सेक्सन में काम करते थे।आँख के इलाज के लिए जाएंगे दो महीने में।

रोहित के पापा जीसीएफ में काम करते हैं।पैटर्न मेकर हैं।इंटर करके अखबार में आ गए।चार साल का अनुभव है काम का।

अख़बार की छपाई का काम रात भर चलता है। जिस दिन पत्रिका छपती है उस दिन और देर हो जाती है। हफ्ते में एक ब्रेक मिलता है।जब कभी गलती हो जाती है तो इंचार्ज झल्लाता है। लेकिन इसका बुरा नहीं मानते। गलती होने पर गुस्सा तो आएगा ही। वैसे भी काम करते हुए गलती हो जाना स्वाभाविक है।

दोनों बच्चों के पिता आर्डनेंस फैक्ट्री से सम्बंधित हैं। दोनों की नजर में फोरमैन बहुत बड़ा पद होता है।यह पद खत्म हुए एक दशक से ज्यादा हो गया है।दोनों बच्चे फैक्ट्री में भर्ती के बारे में जानकारी लेते हैं। लेबर की भर्ती कब होगी। लेबर की भर्ती जाने कब बन्द हो चुकी है। केवल मृतक आश्रित लोग भर्ती होते हैं इसमें। लेबर के सब कम ठेके पर होते हैं। ठेका न होने पर काम ठप्प हो जाते हैं।

चाय पीकर दोनों पास की पान की दुकान की तरफ जाते हैं।मीठी सुपाड़ी खाने। हम उनको समझाते हैं यह सब मत खाया करो। नुकसान करता है। आज ही अख़बार में पढ़ा कि एक पान मसाला वाला पान मसाले की टेस्टिंग के लिए मसाला खाता था। आदत पड़ गयी। 25 पुड़िया रोज खाने लगा। मुंह का कैंसर हो गया। उसके इलाज के बाद उसने पान मसाले का धंधा बंद कर दिया।

पान मसाले की बुराइयां सबको पता होती हैं। लेकिन लोग आदत के चलते छोड़ नहीं पाते। जान के जोखिम पर जब छोड़ते हैं तब तक बहुत देर हो जाती है अक्सर। यही लगता है:

"सब कुछ लुटा के होश में आये तो क्या हुआ"

बच्चे जाते समय अखबार की एक प्रति मुझे देते हैं। उनको दो प्रतियां मिलती हैं।अखबार की मुख्य खबरें आप भी पढ़िए:

1.संसद से सड़क तक गजेन्द्र की मौत की गूँज
2.बीस करोड़ के कोयले की चोरी उजागर
3.राहुल ने शुरू की केदारनाथ की पैदल यात्रा
4.बीएसएनएल फोन से रात में करें मुफ़्त बातें
5.विवेक मूर्ति बने अमेरिका के सर्जन जनरल
6.चेतन भगत पर एक करोड़ का मुकदमा
7.सैंड्रा बुलाक सबसे खूबसूरत महिला
8.जेल में आशाराम से मिले सुब्रह्मण्यम

चेतन भगत पर मुकदमा उनकी किताब 'हाफ गर्लफ्रेंड' वर्णित अपमानजनक संदर्भ को लेकर मुकदमा पूर्व प्रिंसली स्टेट डुमरांव राजघराना के युवराज चन्द्र विजय सिंह ने किया है। कल उदय प्रकाश @Uday Prakash जी की कुछ कहानियों के बारे में चर्चा होने पर Samar ने बताया कि उन्होंने अपने समकालीनों का किस तरह जिक्र किया है। जिनका जिक्र हुआ उन लोगों ने उदय जी पर मुकदमा नहीं किया। किया होता तो वे किताबें खूब बिकतीं और तब शायद उदय जी अपनी 'ग्रीबी' (अश्क जी यही कहते थे अपनी गरीबी को)का इतना स्यापा नहीं करते शायद।

यह लिखते हुए उदय प्रकाश जी किताब 'ईश्वर की आँख' पलटता हूँ। उनके लेख " ब्रह्मराक्षसों की छायाएं गांधीजी की चप्पलें पहने घूम रहीं हैं" से कुछ अंश पोस्ट करने की सोचता हूँ।फिर सोचता हूँ शीर्षक काफी है।
एक और लेख "सरकारें पलटती हैं जहां हम दर्द से करवट बदलते हैं " में उदय प्रकाश जी ने बचपन में खुद के सोन नदी में डूबने से बचने की घटना का जिक्र करते हुए लिखा है:

"सोन नदी के जल में मेरी वह अंतिम छटपटाहट अमर हो जाती। मृत्यु के बाद। लेकिन नदी की घाट पर कपड़े धो रही धनपुरिहाइन नाम की स्त्री ने इसे जान लिया। नदी की धार में तैरकर,खोजकर उसने मुझे निकाला और जब मैं उसके परिश्रम के बाद दुबारा जिन्दा हुआ ,तो उसे इतना आश्चर्य हुआ कि वह रोने लगी।

तब से मैं स्त्रियों को बहुत चाहता हूँ।सिर्फ स्त्रियां जानती हैं कि किसी जीव को जन्म या पुनर्जन्म कैसे दिया जाता है।"

इसी लेख में उदय जी ने अपने पूर्वजों की आयु सीमा का जिक्र करते हुए लिखा था कि उनके यहाँ कई पीढ़ियों ने 46 वर्ष की आयु रेखा को पार नहीं किया।यह भी कि सबकी मृत्यु कैंसर से हुई।

इस बारे में लिखते हुए उन्होंने लिखा-"यह सच है कि अब ,जबकि मैं चालीस पार कर रहा हूँ , दो शब्द सबसे ज्यादा मेरी चेतना में उपस्थित हैं-'मृत्यु' और 'कैंसर'।"

यह संयोग ही है कि जिस दिन मैंने उनका यह लेख पढ़ा उसके अगले दिन ही उनका 47 वां जन्मदिन था।मैं दिल्ली में था। मैंने उनको फोन करके बधाई दी थी -आपको बधाई कि आप अपनी कई पीढ़ियों द्वारा अलंघ्य आयु रेखा को पार कर रहे हैं। फिर उनसे मुलाक़ात भी हुई। सोलह साल पहले की यह बात ऐसे ही याद आ गयी।
कहां से टहलते कहां तक पहुँच गए। चलिए आप मजे कीजिये। हम भी चलते हैं दफ्तर। आपका दिन शुभ हो मंगलमय हो।


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