Sunday, May 31, 2015

बस गुजर हो जाती है किसी तरह

रात देर से सोये सो सुबह उठते-उठते साढे 6 बज गये। निकले टहलने तो देखा सूरज भाई आसमान पर चमक रहे थे। मन किया कहें कि भाईजी कभी-कभी तो छुट्टी मार लिया करो। लेकिन फ़िर  नहीं बोले। काम में जुटा हुये आदमी को काम से अलग रहने की सलाह दो बड़ी तेज भन्नाता है। अब गर्मी वैसे ही भयंकर पड़ रही है। ऐसे में सूरज भाई अगर और भन्ना गये तो समझ सकते हैं क्या हाल होंगे?


एक आदमी गन्ने का रस पेरने के बाद बचे हुये छिलकों को बटोरकर बोरे में भर रहा था। शायद ईंधन के रूप में जलाने के लिये। गन्ने के ये सूखा छिलके फ़ौरन सुलगते होंगे। वैसे भी रसहीन और सूखा आदमी हो या कूड़ा, सुलगता बहुत जल्दी है।

सड़के के नीचे एक सुअर की पीठ पर एक कौआ लम्बवत बैठा था। कौआ सूअर की पीठ को सिंहासन बनाये इधर-उधर चोंच घुमाते हुये प्रकृति का नजारा देख रहा था। सुअर पीठ पर सवार कौवे की गतिविधियों से उदासीन इधर-उधर मुंह मार रहा था।

व्हीकल मोड़ से जीसीएफ़ के लिये मुडे तो देखा एक भाईजी सड़क किनारे पेड़ से गिरी लकडियां बीनकर साइकिल के कैरियर पर बांध रहे थे। नेपाली मूल के रमेश की पैदाइश जबलपुर की ही है। उमर 61 वीं लग गयी है।एक जगह सिक्योरिटी गार्ड का काम करते हैं। 4500/- महीने के मिलते हैं। शाम 6 से सुबह 6 की ड्यूटी बजाकर घर लौट रहे थे। रोज की तरह ईंधन के लिये लकड़ी बीनते हुये।

दो बच्चे हैं रमेश के। दसवीं और बाहरवीं में पढ़ते हैं। खुद पढ़ नहीं पाये लेकिन बच्चों को पढ़ाने में कोई कमी नहीं। खर्च बस चल जाता है। मकान खुद का है। बोले-"बस चल जाता है। जितनी आमदनी उतने में पार हो जाता है महीना।  जुआ, तासपत्ती खेलते नहीं, दारू पीते नहीं, औरतबाजी भी नहीं। इस सबमें पैसा खर्चा होता है। बस गुजर हो जाती है किसी तरह। "

नेपाल में रिश्तेदार हैं। चाचा, ताऊ और अन्य भी। लेकिन न् तो वे इनसे मिलते हैं न वे इनसे। भूकम्प के समय जाने का बहुत मन था नेपाल  लेकिन 20000 रुपये चाहिये किराये के लिये। फ़िर चीजें भी मंहगी हो गयी नेपाल में। यहां चाय 5 रुपये में मिल जाती है। वहां 10/15 की है।

घर में गैस भी है लेकिन मंहगी पड़ती है इसलिये लकड़ी भी जलाते हैं। गैस कम जलाते हैं। गैस सब्सिडी खतम करने को उतावले लोगों तक यह सूचना पहुंचेगी भी तो क्या होगा? निर्णयवीरों के लिये आदमी और संसाधन महज एक आंकड़ा होता है।


महज 4500/- रुपये पाने वाले रमेश से जितनी बार मैंने आमदनी के मसले की बात करके सवाल किया उन्होंने यही कहा बस कि चल जाती है गाड़ी। किसी से कोई शिकायत नहीं।

जीसीएफ़ में घनश्याम दास से मिलने गये। कल रिटायर हुये। रात को रिटायरमेंट की पार्टी में बुलाया था लोगों को। घर के बगल में टेंट अभी भी लगा था। घर के बाहर रखे घडों में पानी भरकर बाहर टहल रहे थे। रिटायरमेंट के बाद के जीवन की शुभकामनायें थमाकर हम आगे बढ़ लिये।

आगे आज  दीपक गुप्ता से मिलना हुआ। दीपक हमारे ही कालेज में पढे हैं। एक साल बाद आये हमसे वहां। फ़िर आर्डेनेन्स फ़ैक्ट्री में भी हमारे पीछे चले आये। हम अपर महाप्रबंधक हुये तो देखा देखी अभी हाल ही में दीपक भी अपर महाप्रबंधक हो लिये। हमारे विभाग के बेहतरीन अधिकारियों में हैं दीपक। स्माल आर्मस उत्पादन में एक्स्पर्ट हैं। पिछले हफ़्ते ही जीसीएफ़ आये तबादले पर। स्माल आर्मस का एक्सपर्ट गन बनाने के काम में जुटेगा।

हम जब साइकिल से 1983 में भारत दर्शन के लिये निकले थे तो इलाहाबाद के बाद हमारा पहला पड़ाव बनारस था। दीपक का घर वहीं था। दीपक के पापा श्री ब्रज किशोर बीएचयू आई टी के मेकेनिकल विभाग में प्रोफ़ेसर थे। आज भी 79 साल की उमर में अमेरेट्स प्रोफ़ेसर हैं। स्पेशल क्लासेस लेते हैं। लेक्चर, लैब आदि।

करीब 13 साल पहले दीपक की पहली पत्नी का लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया। दो छोटे बच्चे थे। पत्नी की  बीमारी के दौरान बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी निभाने लग थे दीपक। कुछ लोगों ने दुबारा शादी के सलाह दी। कुछ ने एतराज। दुबारा विवाह करें या न करें इस पर विचार करते हुये एक रिश्ता पता चला। लड़की के पति और बच्चे एक सड़क दुर्घटना में नहीं रहे थे। लड़की भी दो साल के इलाज के बाद चरने फ़िरने लायक हो सकी। फ़िर भी एक पैर सीधा ही रहता है। घुटना मुड़ता नहीं। पति के निधन के 7 साल बाद दीपक से शादी की बात चली।

रिश्ते पर कोई निर्णय लेने के लिये दीपक अपने दोनों बच्चों के साथ अपनी सम्भावित पत्नी बबिता से मिलने गये। चारों ने मिलकर दोनों की शादी की बात पक्की की। नक्की की। दो जिन्दगियां जो ठहर सी गयी थीं वे फ़िर से स्पन्दित हुयीं और गतिमान भी। आगरे के ग्रैंड होटल में हुई इस शादी का मैं भी गवाह बना।

दीपक के दोनों बच्चे अब इंजीनियरिंग की पढ़ाई करते हैं। बिटिया आकांक्षा 6 वीं में पढ़ती है। उसको स्केचिंग और पेंटिग का शौक है। जल्दी ही शायद यहां पोस्ट भी करें।

आज सालों बाद दीपक और बबिता को देखकर बहुत खुशी हुई। उनकी शादी के बाद पहली मुलाकात थी। अब तो अक्सर होगी। शहर जाते रास्ते में ही पड़ता है घर।बबिता ने चाय खूब अच्छी बनाई। फ़िर आम का पना भी। बेल भी खूब सारे लगे हैं दीपक के घर में। आम का पना पीते हुये बतियाते हुये हम बातचीत में इतना मशगूल हुये कि ध्यान ही नहीं रहा कि जो ग्लास हम मेज पर धर रहे हैं वहां मेज नहीं हवा थी। ग्लास हवा में रखा तो वह नीचे आकर जमीन से आ मिला। नतीजा ग्लास के कई टुकड़े हो गये। अब और कितने ग्लास और कम टूटेगे दीपक के यह आने वाला समय बतायेगा।

लौटकर आये तो पोस्ट टाइप करके फ़ेसबुक पर अपलोड करने की कोशिश की। लेकिन फ़ेसबुक ने मना कर दिया। कोई लफ़ड़ा रहा होगा। मजबूरन दुबारा टाइप करना पड़ी।

बहरहाल यह सब तो चलता है। आप मजे की कीजिये आराम से। इतवार मुबारक हो आपको।


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Friday, May 29, 2015

मजूरी के लिए निकली वीरांगनायें

सुबह उठकर आज सबसे पहले रॉबर्टसन झील की तरफ गए। झील सोई थी। पानी ठहरा। कोई छोटी मछली या कोई और जलजीव पानी में कूदता तो झील थोड़ा सा कुनमुनाकर फिर सो जाती। ऊपर से सूरज अपनी लाली से झील के पानी में उस जगह 'किरणपैड' सा बना रहा था जहां वह झील के पानी में उतरेगा।

शोभापुर रेलवे क्रासिंग बन्द थी। एक इंजन धड़धड़ाता हुआ पटरियों पर से निकला। पटरियां थरथराती हुई इंजन से मानों पूछती रहीं बहुत देर तक-'भईया अकेले आये। बच्चों को नहीं लाये।' इंजन बिना कोई जबाब दिए भड़भड़ाता चला गया।

लोग घरों के बाहर, सड़क पर, पेड़ के नीचे बैठे दिखे। कइयों के चेहरे पर नींद, उबासी,उनींदापन चिपका था।कुछ अनमने से भी दिखे लोग और कुछ उदास भी। कई लोग ऐसे भी दिखे तो तेजी से टहल रहे थे। उनके चेहरे के भाव कहीं रास्ते ने गिर गए होंगे शायद। चेहरे सपाट थे उनके।

क्रासिंग पार अधबने ओवरब्रिज के नीचे लोग चूल्हे जलाये खाना बनाने में जुटे हुए थे। कई घरों में उस समय बेड टी भी न बनी होगी जब इनका दिन का खाना बन रहा रहा।

चाय की दुकान पर लोग इकट्ठा थे।हंसी-मजाक के बीच गाली-गलौज कर रहे थे।शायद हमको प्रभावित करने के लिहाज से चुनिंदा गालियों की झड़ी लगा दी। कुछ ऐसे ही जैसे कोई बाहरी मेहमान आता है तो हम अपने सबसे दर्शनीय स्थल दिखाने ले जाते हैं।

एक ऑटो वाला खड़ा था। पता लगा नया ऑटो लिया है। ढाई लाख का। परमिट के पांच हजार। कानपुर में परमिट के तीन लाख से भी ज्यादा पड़ते हैं।लोगों ने बताया कि बीड़ी पीने का शौक ऐसा है ऑटो वाले भाई जी का कि अगर कोई सवारी बीड़ी के धुएं पर एतराज करती है तो सवारी उतार देते हैं।

चाय वाले से जब पूछा कि कितनी चाय दिन में बिक जाती हैं तो उनकी प्रतिक्रिया वैसी ही थी जैसी उमर पूछने पर महिलाओं की होने की बात कही जाती है। बोले- 'ये गिनती तो अपन ने भी नहीं की कभी।'

आगे कंचनपुर में एक हैंडपंप के नीचे दो महिलाएं नहा रहीं थीं। एक महिला पूरा ऊपरी बदन उघारे तन्मय होकर साबुन लगा रही थी। हम आगे निकल गए लेकिन वह दृश्य बहुत देर तक पीछा करता रहा। अभी फिर सामने आकर खड़ा हो गया।



आगे आधारताल सब्जी मण्डी चौराहे के पास बिरसा मुंडा की मूर्ति के पास से वापस आने के लिए महाराजपुर की तरफ चल दिए। व्हीकल मोड़ से रिछाई की तरफ। रेलवे फाटक के पहले दो महिलाएं सर पर घड़े रखे आ रहीं थीं। वीरांगना सरीखी। सुबह-सुबह सर पर घड़े रखकर मजूरी के लिए निकली वीरांगना ही तो कहलायेगी। जीवन समर में मेहनत की तलवार से कठिनाइयों का संहार करती वीरांगनाएं हैं ये। जब तक ये युध्द में डटी हैं, मानवता का भविष्य सुरक्षित है।


रिछाई गाँव में कई लोग ईंट के भट्टों पर काम में जुटे थे। एक भट्टे पर एक परिवार के तीन लोग मिले। एक महिला और एक पुरुष मिटटी की लोई सरीखी बना रहे थे। आदमी उनको ईंट के साँचे में ढालता जा रहा था।
ईंट के लिए मिट्टी पास के एक गाँव से लाते हैं। 600 रूपये प्रति ट्राली जिसमें करीब 1000/1100 सौ ईंट बन जाती हैं। ईंधन,मेहनत लगाकर जो ईंटे बनती हैं वो 3/4 हजार रूपये प्रति हजार के हिसाब से बिकती हैं। दिन भर में सात आठ सौ ईंटे पाथ लेते हैं। 15 दिन के करीब भट्ठा लगाते हैं।

हम जब बात कर रहे थे पुरुष से तो महिला हल्की मुस्कान के धारण किये काम करती हुई सुन रहीं थी बातें। फोटो खींचने के लिए पूछा तो हाँ कहकर बताया -'कल भी एक जने खींचकर ले गए थे।'

कमाई का कोई साधन जब कौतुहल और फोटो खींचने का विषय बन जाए तो लगता है कि उसके कठिन दिन आ गए हैं। ऐसा मुझे वहां से लौटते हुए लगा।

लौटकर मेस आ गए। चाय मिल गयी। पीते हुए पोस्ट कर रहे हैं।

आपका दिन शुभ हो।मंगलमय हो।

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Thursday, May 28, 2015

नदियां हैं तो जीवन हैं

कल रात ग्वारीघाट गए। रात साढ़े ग्यारह के बाद। नर्मदा जी सोई हुई सी थीं। सोने में खलल न पड़े इसलिए अँधेरा कर रखा था। सूरज का बल्ब बुझा दिया था। जैसे अपने बेडरूम की लाइट बन्द कर ली हो। अँधेरे की काली चादर ओढ़ रखी थी उन्होंने। हल्की हवा चल रही थी। ऊपर चाँद नाइट बल्ब की तरह लटका था।

नदी किनारे तमाम लोग सोये थे। कुछ जमीन पर, कुछ घाट किनारे के तख्तों पर और कुछ सीढ़ियों पर। दुकाने ज्यादातर बन्द हो चुकी थीं। गक्कड़ भर्ता के बोर्ड के नीचे चाय बन रही थी। फूल-मालाओं वाली कुछ खुली दुकानें भी ...बन्द हो रहीं थीं।

कुछ मंडलियां ढोलक,मंजीरे, झांझ, करताल पर भजन कर रहे थे। तीन मंडलियां अलग-अलग भजन गा रहे थे। कोई साफ सुनाई नहीं दे रहा था। लेकिन तीनों मंडलियां तल्लीन थीं भजन में। कुछ मिनट के लिए दो मण्डलियों ने 'भजन विराम' लिया तीसरी के बोल सुनाई दिए:

रेवा महारानी मैया रेवा महारानी
सुंदर सजी है मैया रेवा महारानी।

नदी को भजन सुनाते हुए सुला रहे हैं भक्तगण। थकी हैं नर्मदा मैया। कीर्तन की थपकियों से नींद अच्छी आएगी।

 सुबह फिर लहरों से अठखेलियां करती हुई बहेगी सौंदर्य की नदीं नर्मदा।

लेकिन बह तो अब भी रही है नदी। नदी को विराम कहां। वो तो हम ठहर गए तो लगता है नदी रूकी है।हम जैसे होते हैं वैसे ही दूसरों को देखते हैं। नदी तो अविराम चलती रहती है। समंदर से मिलने की बेचैनी है उसको। गुरुत्वाकर्षण बल की टैक्सी कर रखी है नदी ने। लगातार चलते हुए समुद्र से मिलेगी जाकर। फिर आगे का इंतजाम समुद्र को देखना है। नदी को लिफ्ट कराकर फिर आसमान तक ले जाएगा। सूरज की गर्मी की लिफ्ट से कांट्रेक्ट है समुद्र का। गतिज ऊर्जा को स्थितिज ऊर्जा में बदलना और फिर स्थितिज ऊर्जा को गतिज ऊर्जा में बदलना। नदी,सागर, बादल और फिर नदी में पानी का आना ऊर्जा का रूपांतरण ही तो है।

नदी किनारे नावें खड़ी हैं। रात को नहीं चलती। कोई आता होगा तो कहने पर शायद कोई पार ले जाता होगा। दूसरी तरफ गुरूद्वारे की रौशनी नदी के पानी पर पड़ रही है। वहां कुछ चमक रही हैं नर्मदाजी।

एक आदमी मोटर साइकिल पर आया है। नर्मदा नगर में रहता है। बोला--' हम नर्मदा के सरकारी नौकर हैं।रोज हाजिरी देते हैं यहां इनके दरबार में।' कुछ परिवार कार से आये हैं नर्मदा दर्शन करने।

चलने लगते हैं तो कुछ माँगने वाले आ जाते हैं। साथ के मित्र कुछ देते हैं उनको। देखते हुए कुछ और लोग आ जाते हैं। एक को कुछ देकर दोनों को बाँट लेने की हिदायत देकर चल देते हैं हम। पीछे देखते हैं वो आपस में मिले पैसे का हिसाब कर रहे हैं। रात के 12 से ज्यादा बज गए हैं। मांगने वालों की दुकान कभी बन्द नहीं होती।

नदियां लाखों वर्षों से बह रही हैं। कितनी सभ्यताएं, साम्राज्य उन्होंने बनते, बिगड़ते देखें होंगे। चुपचाप बहते हुए। कितने लोगों को जीवन दिया होगा, कितनों को अपने साथ ले गयीं होंगी। 'नदियां हैं तो जीवन हैं' कहते हुए आदमी हर वह काम कर रहा है जो नदियों को खत्म करने के कारण हो सकते हैं।

कल ग्वारी घाट से आते हुए सोचा कि हफ्ते एक दिन किसी न किसी घाट पर अवश्य जाया करेंगे। दो चार घण्टे बैठेंगे। नर्मदा नदी के किनारे-किनारे साइकिल यात्रा का विचार थोडा और मजबूत हुआ।

आप भी मन करे तो अपने आसपास किसी नदी, तालाब को देखने जाया करें। उसके किनारे बैठें। अच्छा लगेगा।
फिलहाल आज इतना ही। बाकी फिर कभी। मजे से रहें ।

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Wednesday, May 27, 2015

मकतबे इश्क का खेल निराला देखा

मेस के बाहर निकलते ही दो बच्चे साईकिल से अंदर आते मिले। ये बच्चे मेस में झूला झूलने आते हैं। एक बच्चे की साइकिल में गियर लगा है। हमने कहा-'हम गियर वाली साइकिल तो चला ही नहीं पाते।' बच्चे ने कहा-'आसान है चलाना। कल ही तो लगवाये हैं गियर।'

रास्ते में हमारे साथी अधिकारी मिले। रोज की तरह। हमने उनको भी साइकिल खरीदने का सुझाव दे दिया। बोले- 'अब बुढ़ापे में क्या साइकिल चलायें।' हमने उनके बुढ़ापे को निरस्त करते हुए सड़क पर खड़े-खड़े शेर सुना दिया:

'मकतबे इश्क का खेल निराला देखा,
उसको छुट्टी न मिली जिसको सबक याद हुआ।'
बुढ़ापे और साईकिल से इस शेर का कोई रिश्ता नहीं। लेकिन जाने क्यों यही शेर उचककर सामने आ गया जेहन में और हमने सुना भी दिया।

मैंने महसूस किया है कि बात-बहस में हम अक्सर वही तर्क,जुमले, उद्धरण पेश करते हैं जो अब तक के जीवन में सीखे होते हैं। अधिकतर लोगों के मामले में एक समय बाद सीखना या तो बन्द हो जाता है, या स्थगित या खत्तम हो जाता है। कुछ नया अनुभव नहीं होता और आदमी बूढा हो जाता है। जैसा कि परसाई जी ने लिखा भी है:


' यौवन नवीन भाव, नवीन विचार ग्रहण करने की ततपरता का नाम है, यौवन साहस, उत्साह, निर्भयता और खतरे भरे जिंदगी का नाम है, यौवन लीक से बच निकलने की इच्छा का नाम है। और सबसे ऊपर ,बेहिचक बेवकूफी करने का नाम यौवन है। '

इस लिहाज से देखा जाए तो पुराना शेर ठेलने के चलते हम गत यौवन माने जाएंगे। लेकिन बेतुका ठेलने की बेहिचक बेवकूफी के चलते हम कह सकते हैं -'अभी तो मैं जवान हूँ।'

चाय की दूकान पर गाना नहीं बज रहा था। बोले बजाने को तो चाय वाला बोला-'पहले दूकान का गाना तो बजाना शुरू कर लें।' फिर जब चालू किया तो दूसरी दूकान का भी बजने लगा। दोनों में अलग-अलग गाने बज रहे थे। ऐसा लग रहा थी की चैनल की प्राइम टाइम बहस में विरोधी दलों के प्रवक्ता दूसरे की बिना सुने अपनी-अपनी हांकने में लगे हों और सुनाई कुछ न दे रहा हो।


लौटते में दो बच्चियां साइकिल चलाती दिखीं। जाते समय भी कुछ लड़कियां दिखीं थीं साईकिल पर। लेकिन बच्चे नदारद हैं। शायद इसलिए कि वे तो ऐसे ही घूम लेते हैं। बच्चियां सुबह की सैर के बहाने घर से बाहर खुले में निकली हैं।

राबर्टसन लेक की तरफ गए आज। इस झील के चारो तरफ की जमीन पर लोगों ने कब्जा करते हुए झील को 'विनजिप्ड' टाइप करके संकुचित कर दिया है। इसके बाद गन्दगी अलग से।

झील के चारो तरफ पक्के मकान बन गए हैं।पगडंडियों के किनारे पक्के मकान झील पर कब्जे की कहानी सुना रहे हैं। लेकिन सुने कौन? झील कोई दिल्ली तो है नहीं जिसके किस्से सुनने में दिलचस्पी हो लोगों में।



झील के किनारे ही पक्का कूड़ा दान बना था। कूड़ादान बिलकुल खाली था। सारा कूड़ा कूड़ेदान के बाहर पड़ा 'स्वच्छता अभियान' की खिल्ली उड़ा रहा था। मुझे लगता है कि सरकार को 'कूड़ा कूड़ेदान में अभियान'भी जल्दी ही चालू कर देना चाहिए। आगामी किसी भी महापुरुष के जन्मदिन पर यह पवित्र अभियान शुरू होना चाहिए।
सूरज भाई भी दिखे झील के किनारे। सूरज की अनगिनत किरणें झील के पानी में अठखेलियां कर रहीं थीं। सूरज भाई ऊपर से किरणों को पानी में छप्प छैंया करते हुए निहार रहे थे। किरणें झील के पानी को चांदी जैसा चमका रहीं थीं। सूरज खुद भी सुबह शाम झील के पानी में डुबकी लगाते हैं।बच्चियों की जलक्रीड़ा देखकर आनन्दित हो रहे हैं भाई जी।

कल शहर में आंधी-पानी में पेड़ गिरे,बिजली व्यवस्था चौपट हो गयी। हम उससे अप्रभावित रहे। अख़बार से पता चला। गाँव में बदलती दुनिया के ये हाल हैं। पड़ोसी के समाचार भी अखबार से पता चलते हैं।

अख़बार में एक खबर और भी है।दो दिन पहले की। रतलाम के 9 साल के बच्चे अब्दुल ने अपने दोनों हाथ एक हादसे में साल भर पहले खो दिए थे। लेकिन हौसला नहीं खोया। दोनों पांव से मोबाइल चलाना और लिखना सीख लिया। अब उसने तैरना भी सीख लिया। 3 में पढ़ने वाले बच्चे ने 20 दिन में ही तैराकी सीख ली और अब 25 मीटर तक बिना रुके स्वीमिंग कर सकता है। बच्चे के हौसले को सलाम रमानाथ अवस्थी जी की इस कविता के साथ:
कुछ कर गुजरने के लिए
मौसम नहीं मन चाहिए।
चलिए आपका दिन मंगलमय हो। शुभ हो।I

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Tuesday, May 26, 2015

सुहाना सफ़र और ये मौसम हंसी

आज सुबह निकले 5 बजे।उजाला इतना था सड़क पर कि सोचा कि ये खम्भों पर लट्टू क्यों जल रहे हैं। लेकिन अगर बन्द कर दिए गए होते तो सोचता कि इतनी जल्दी क्या थी चिराग बुझाने की। लगा कि वर्तमान से चिर असन्तुष्ट होता है मध्यमवर्गीय आदमी। हमेशा यही सोचता है कि जो है वह मजेदार नहीं है। 'ये दिल मांगे मोर' मोड में रहता है।

सड़क पर स्पीड ब्रेकर सड़क बनने के बाद बने हैं। सड़क के मुकाबले चमक रहे हैं--'बेटा बाप से भी गोरा' वाले अंदाज में। काम भर की बेतरतीबी से बने हैं। एक बड़ा स्पीड ब्रेकर और उसके फौरन पहले और बाद में छोटे-छोटे स्पीड ब्रेकर। कोई तेजी से आये तो उसके लिए ये स्पीड ब्रेकर 'स्पीड फ्रेक्चर' साबित हो सकते हैं।

शोभापुर रेलवे फाटक तक पहुंचते क्रासिंग बन्द होती दिखी। बैठ गए चाय की दूकान पर। एक बुजुर्ग उबले आलू छील रहे थे, दुसरे युवतर बुजुर्ग प्याज के कपड़े उतार रहे थे। आलू और प्याज के गठबन्धन से समोसे की सरकार की शपथग्रहण की तैयारी चल रही थी।

सामने खम्भे पर 'बहल इंग्लिश क्लासेस' लिखा हुआ था। पता था-'रांझी थाने के बगल में'। हमें लगा थानों के आसपास तो केवल पैसे और रसूख की भाषा चलती है। वहां अंग्रेजी कैसे चलेगी। कैसे सीखेंगे लोग?


रेल पटरी पर धड़धड़ाती निकल गयी। हमारी चाय ख़त्म। इस बीच कुछ लोग आकर नाश्ता करने लगे। रात का पोहा अलसाया था लगा। रसगुल्ला शीरे के तालाब से निकलकर प्लेट पर बड़े बेमन से आया हुआ लग रहा था।औंघाये से रसगुल्ले को देखकर लगा जैसे शीरे के बिस्तर से गहरी नींद से उठाकर उसे प्लेट के आँगन में खड़ा कर दिया गया हों। सर्व करने वाले बुजुर्ग के हाथ कंपकपा रहे थे।

पहाड़ के पास जगहर हो गयी थी। चूल्हे सुलग रहे थे। एक जगह बहुत धीमे आते नल के पास खूब सारे प्लास्टिक के बर्तन तत्काल काउंटर पर रिजर्वेशन के इन्तजार में खड़े लोगों की तरह इकठ्ठा थे।

अधबने ओवरब्रिज के नीचे कुछ लोग मच्छरदानियां ओढ़े सी सो रहे थे। एक स्त्री और पुरुष एक दूसरे को निहारते हुए आहिस्ते-आहिस्ते दातून चबा रहे थे। किसी मोबाईल में गाना बज रहा था। लोग खाना बना रहे थे। चूल्हे सुलग रहे थे। खाना बन रहा था।


आगे चाय की दूकान पर रमेश मिले। उस दिन के बाद न दिखने का उलाहना दिया। कुत्ते-कुतिया के बहाने आदमी-औरत के बारे में दादा कोंडके घराने की घिसी-पिटी बातें। हमने दांत के दर्द के बारे में पूछा तो बताया कम है। दारू के बारे में खुद बताया-'शोभापुर अड्डे पर दस रूपये महंगी देता है साला। आधारताल अड्डे पर जाते हैं।'

इस बीच दूधवाला आ गया। मोटरसाइकिल पर दूध के कनस्तर लादे हुए। बताया कि दूध के दाम आजकल सुबह 50 रूपये लीटर और शाम को 55 रूपये लीटर हो गए। शाम को दाम बढ़ने का कारण शादी व्याह और काम-काज के चलते बढ़ती मांग कारण है या फिर गर्मी में कम दूध का उत्पादन इस पर एकमत नहीं हो पाया।


फोटो लिया तो दूध वाले ने देखा। खुश हुआ।दिखती बनियाइन के साथ फोटो देखकर मुस्कराया। दूसरे ने पूछा-'फेसबुक पर अपलोड करेंगे? आई डी क्या है?' मन किया वहीं माईक लगाकर भाषण देने लगें--'मितरों आज हमारे यहां सुबह-सुबह दूध बेचने वाले का भी फेसबुक एकाउंट है। वह आईडी के बारे में जानता है। पिछले साठ सालों में जो नहीं हुआ वह अब हो रहा है। हम बहुत तेजी से विकास कर रहे हैं।'

सुबह-सुबह माइक भले मिल जाता लेकिन सुनने के लिए जनता का जुगाड़ नहीं होने के चलते हमने भाषण देने के आइडिये को हड़काकर भगा दिया-"ससुर सुबह-सुबह पॉलिटिक्स की बात करते हो। शर्म नहीं आती। ये नहीं कि 'राम जी करेंगे बेड़ा पार' का कैसेट बजाए।चल भाग यहां से।"

आइडिया बेचारा मार्गदर्शक मार्गदर्शक मण्डल में शामिल बुजुर्गों की तरह अपना मुंह झोला जैसे लटकाये चला गया।

चाय की दूकान पर एक आदमी बिना चीनी की चाय मांग रहा था। अलग से बनाने का आग्रह भी। दूकान वाले ने ठसके से कहा-" 5 रुपये में ये '......गुलामी' हमसे न होगी। पीना हो तो बनाएंगे लेकिन 10 रुपये की पड़ेगी चाय।भरकर देंगे ग्लास लेकिन पड़ेंगे 10 रूपये।"


बताओ सुगर के मरीजों को कितनी परेशानियां हैं। अक्सर उनके हाल बहुमत वाली सरकार में निर्दलीय विधायकों सरीखे हो जाते हैं।

लौटते में दो बुजुर्ग एक छुटकी पुलिया पर बैठे बतरस में डूबे दिखे। दो बच्चियां साइकिल पर सैर करने निकली थीं। सड़क पर कुछ देर बतियाती रहीं खड़ी होकर। जैसे ही पैडल पर पाँव धरकर आगे बढ़ीं वो वैसे ही पेड़ों की पत्तियों ने हाथ हिलाकर ख़ुशी जाहिर की। हवा ने सीटी बजाते हुए बकअप किया।

कमरे पर आये तो सूरज भाई का जलवा देखने को मिला। सब जगह रौशनी का कब्जा जमा लिया है। पेड़,पत्ती,फूल, कली,लता,वितान हर जगह रौशनी की सरकार काबिज है। सूरज भाई मूड में हैं। कह रहे हैं-''साइकिल के चक्कर में आजकल लिफ्ट नहीं देते। कब से चाय नहीं पिलाई।"

सूरज भाई के साथ बहुत दिन बाद आज चाय पी रहे हैं। मजा आ रहा हैं। आप भी मजे कीजिये न। मस्त रहिये। जो होगा देखा जाएगा।

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