Wednesday, September 30, 2015

हरेक बहाने तुझे याद करते रहते हैं

शाहजहांपुर में हम 1992 से 2001 तक रहे। कई कवि और शायरों से परिचय रहा वहां। उनमें शाहिद रजा मेरे सबसे पसंदीदा शायर थे। आज याद आया कि हमारे घर में एक शाम को महफ़िल जमी थी 94-95 में कभी। उसमें शाहिद रजा ने कुछ शेर और एक गजल पढी थी। उनको मैंने टेप किया था। संयोग से वे नेट पर भी डाले थे। उनको सुनते हुये कई आवाजें ऐसे भी सुनाई दीं जो अब शान्त हो गयीं। पंखे की आवाज में किये गये इस टेप में शाहजहांपुर के कवि दादा विकल जी की वाह-वाह करती हुयी आवाज भी है जो शहीदों की नगरी शाहजहांपुर के बारे में कहते थे:
पांव के बल मत चलो अपमान होगा,
सर शहीदों के यहां बोये हुये हैं ।
शाहिद रजा के शेर यहां पोस्ट कर रहा हूं। आगे टिप्पणी में आडियो का लिंक भी। जो लोग वहां उस दिन थे वे उसको महसूस कर सकेंगे और आवाज भी पहचान सकेंगे।  

 
हरेक बहाने तुझे याद करते रहते हैं
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मौसमें बेरंग को कुछ आशिकाना कीजिये
आप भी जुल्फ़ों को अपनी शामियाना कीजिये।

दिल की ख्वाहिश है ख्यालों में तेरे डूबे रहें
जेहन कहता है कि फ़िक्रे आबो दाना कीजिये।

यकीन खत्म हुआ है, गुमान बाकी है
बढे चलो कि, अभी आसमान बाकी है ।

जरा सा पानी गिरा और जमीन जाग उठी
हमारी मिट्टी में लगता है अभी जान बाकी है।

तलाश करते रहो फ़ितनागर यहीं होगा
अभी तो बस्ती का पक्का मकान बाकी है

हरेक बहाने तुझे याद करते रहते हैं
हमारे दम से तेरी दास्तान बाकी है ।

तू उसके डर से अब डरना छोड़ दो ’शाहिद’
तीर खत्म हुये बस कमान बाकी है।

जहां भी खायी है ठोकर निशान छोड आये
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जहां भी खायी है ठोकर निशान छोड आये,
हम अपने दर्द का एक तर्जुमान छोड आये।

हमारी उम्र तो शायद सफर में गुजरेगी,
जमीं के इश्क में हम आसमान छोड आये।

किसी के इश्क में इतना भी तुमको होश नहीं
बला की धूप थी और सायबान छोड आये।

हमारे घर के दरो-बाम रात भर जागे,
अधूरी आप जो वो दास्तान छोड आये।

फजा में जहर हवाओं ने ऐसे घोल दिया,
कई परिन्दे तो अबके उडान छोड आये।

ख्यालों-ख्वाब की दुनिया उजड गयी 'शाहिद'
बुरा हुआ जो उन्हें बदगुमान छोड आये।

शाहिद रजा, शाहजहांपुर

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पूछकर 'मिस' करना चाहिए


एक दिन हम कहीं फोन मिलाये तो वो कहीं और दूसरी जगह मिल गया। फोन पर जो बातचीत सुनाई दिया ऊ हमको अब्भी याद आ गया। सुनिये अरे मतलब पढ़िए आप भी:
आवाज 1: ये सुनो ।
आवाज 2: सुनाओ न। सुन त रहे हैं।

आवाज 1: एक बात बताएं। बुरा तो नहीं मानोगी।
आवाज 2: बताओ न। ई तुम नाटक करना कब से सीख गए। दो दिन हो गए तुमसे बात होते। फिर भी फार्मेल्टी कर रहे।
आवाज1 : वो क्या है न। जब तुमसे बात नहीँ होता न। मुलाक़ात नहीं होता न तब हम तुमको बहुत 'मिस' करते हैं।
आवाज 2:अरे!!!!! तुमको पता है तुम का कह रहे हो? कुछ मतलब पता है 'मिस' करने का। हम तो तुमको अच्छा लड़का समझते थे। तुम तो पूरा सोशल मिडिया वाला लड़का निकले। बात करते दो दिन हुए नहीं कि मिस करने लगे।
आवाज 1: हमको कुछ पता नहीं इस बारे में। हमरा सब दोस्त बताया कि अगर दोस्ती पक्की करनी है तो मिस करना जरूरी होता है। हम सोचे दोस्त लोग सही ही कहता होगा। तो हम सुबह ही सुबह तुमको 'मिस' कर दिए। अब तुमको खराब लगा तो बता दो नहीं 'मिस' करेंगे।
आवाज 2: नहीं 'मिस' करोगे। पकड़ के पीट देंगे।मुंह पूरा तुम्हारा नया वाला 'डिजिटल इण्डिया प्रोफाइल' की तरह रंगीन हो जाएगा। बड़ा आया नहीं 'मिस' करने वाला। न 'मिस' करके देखो एक दिन फिर बताते हैं तुमको।
आवाज 1: फिर तुम गुस्सा क्यों हो रही थी हमारे 'मिस' करने की बात पर।
आवाज 2: तुमको कुच्छ नै पता यार। हम कोई मना थोड़ी किये 'मिस' करने को। पर 'मिस' करने के पहले एक बार पूछना तो चाहिए था न।हम कोई मना थोड़ी कर देते।
आवाज 1: तो 'मिस' क्या पूछ के किया जाता है? बिना पूछे नहीं कर सकते 'मिस'।
आवाज 2: पहले कर सकते थे। पर जबसे 'गैंग ऑफ़ वासेपुर' आई न तबसे सब गड़बड़ हो गया। सब काम हीरोइन से पूछकर किया जाता है अब। उसमें देखा नहीं हिरोइन कैसे डांटती है हीरो को बिना पूछे हाथ पर हाथ रखने को।
आवाज 1: अरे हाथ पकड़ना और बात। 'मिस' करना और। हाथ वाला नियम यहां थोड़ी नहीं लगेगा।
आवाज 2: काहे नहीं लगेगा। जब और कोई नियम नहीँ है तो जो है उसी को खींच के लागू किया जाएगा।
आवाज 1: मतलब तुम अपने को हीरोइन समझती हो?
आवाज 2: तब क्या। हीरोइन त हइये हैं।हर लड़की अपने में हीरोइन होती है। उसके लिए लड़का लोग एक्स्ट्रा आर्टिस्ट होता है। उनमें से छाँट के वो किसी को हीरो का रोल देती है। पहले टेम्पोरेरी फिर जमा तो परमानेंट। बताओ, हम हीरोइन नहीं होते तो तुम बिना पूछे 'मिस' करते। अब तो यहां तो हाल ई है कि लोग नमस्ते बाद में करते हैं 'मिस' पहले करते हैं। इसीलिये हमको बिना पूछे 'मिस' करने वाला लड़का लोग डिफॉल्टर टाइप लगता है।
आवाज 1: अच्छा ई बताओ तुम भी हमको 'मिस' करती हो। हमको नहीं तो किसी को करती हो?
आवाज 2: तुम सच्ची में एकदम पग्गल हो। तुमको ई तक नहीँ पता कि ..................
बात करते-करते लाइन कट गयी। दुबारा मिलाई तो पत्नी से बात हुई। मन किया कि कह दें -बहुत मिस करते हैं। पर फिर फोनवार्ता याद आ गई। सोचा 'मिस' करने के पहले पूछ लें। आखिर वो हीरोइन है हमारी। कोई मना थोड़ी करेगीं। है कि नहीं?
तब तक आप भी किसी को 'मिस' कर लीजिये। पर पूछकर करियेगा। फिर न कहना बताया नहीं।

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Monday, September 28, 2015

मान गए यार तुमको

रात कब सोये पता नहीं चला। सुबह जगे तो समय देखने के लिए मोबाईल देखा। मोबाईल एकदम काला हो गया था। कब डिस्चार्ज होकर बन्द हो गया पता नहीं चला। इंसान के साथ भी ऐसा ही होता है। चलते-चलते कब 'शांत' हो जाए पता नहीं चलता।

चार्जर लगाते ही सुई सी लगी मोबाइल को। फौरन चमकने लगा। 5 बजा था। घर फोन किये। चलती ट्रेन में आवाज साफ सुनाई नहीं दी। पर सुकून इतने से ही मिल गया कि फोन उठा और बात हो रही है।

गाड़ी कटनी पहुंचे उसके पहले एक अख़बार वाला बच्चा अख़बार आया ट्रेन में। पत्रिका अख़बार का दाम 5 रुपया। हमने अखबार ले लिया। पर जब देखा कि दाम की जगह पेन की स्याही लगी हुई थी तब अचानक नागरिक बोध जागा। उससे पूछे कि यह गड़बड़ क्यों की। फिर अख़बार वापस करके पैसे वापस ले लिए। यह धोखा बर्दास्त नहीं करना।

बाद में और अभी भी यह सोच रहे कि अख़बार की जगह अगर खाने-पीने की कोई चीज होती या फिर अख़बार में हमारी कोई खबर होती तो क्या अख़बार वापस कर देते। न करते। पक्का न करते। अत: सिद्ध हुआ कि हमारा नागरिक बोध हमारी आवश्यकता के अनुसार परिवर्तन शील होता रहता है।

कटनी पर उतरकर चाय पिए। स्टेशन की फोटो लेने की कोशिश किये लेकिन बैटरी लो होने की बात कहकर मोबाईल ने हाथ खड़े कर दिए। हम वापस आ गए डिब्बे में।

बाहर अँधेरा था। सुबह हो रही थी मगर आहिस्ता-आहिस्ता। क्षितिज पर आसमान नीचे कालिमा युक्त था। उसके ऊपर लालिमा छाई थी। लालिमा सूरज की अगवानी की घोषणा कर रही थी। सूरज का प्रसाद पहले उनको ही मिलता है जो ऊपर हैं। नीचे वितरण बाद में होगा। समाज के नियम प्रकृति पर भी लागू होते हैं।

डब्बे में लोग सोये हुए थे। सीटों की बीच की जगह पर लोग चद्दर बिछाये लेते-अधलेटे थे। कुछ गहरी नींद में भी। हमारे सामने एक युवा दम्पति नीचे सीट की बीच की जगह सो रहा था। पत्नी पति के सीने से सर लगाये सो रही थी। गाड़ी के हिलने के साथ जोड़ा हिल-डुल हो रहा था।आराम से सो रहा था। निश्चिन्त नींद।

सीट पर एक बच्चा बैठा था। कर्बी से चढ़ा था। बताया कि जबलपुर जा रहे हैं। सात में पढ़ता था। बीमार हो गया तो स्कूल छूट गया। बीमारी क्या यह पता नहीं। बस बुखार आता रहा।

बच्चा हाथ में फेंडशिप बैंड बांधे है।लम्बी चुटिया धारण किये है।नाम है अनुज पाण्डेय। जनेऊ अभी हुआ नहीं है पर चुटिया की लम्बाई बता रही है कि घर में पंडिताई का झंडा फहराता है।

फ्रेंडशिप बैंड देखकर हमने पूछा-सबसे पक्का दोस्त कौन है तुम्हारा। अनुज पाण्डेय बोले-अनीस।

इस साल स्कूल नहीं गए तो छूट जाएगा। दोस्त भी। यह पूछने पर बोले अनुज-नहीं। अगले साल आठ में एडमिशन लेंगे। इस साल भी इम्तहान देंगे।

अनुज के पिता कर्बी में पत्थर लगाने का काम करते हैं। दो बहनें है। बड़ी बहन की शादी मई में हई। दूसरी 12 वीं में पढ़ती है। पता चला नीचे जो लेटे हुआ जोड़ा है वह अनुज के दीदी जीजा हैं। जीजा अहमदाबाद में काम करते हैं। वहीं जा रहे हैं सब लोग।

इस बीच फैक्ट्री के एक साथी दिखे डब्बे में। बोले-आप यहां कैसे। हम बोले- क्या नहीं हो सकते? कहने का मतलब यह कि हमारा 3 टियर स्लीपर में पाया जाना आश्चर्य का कारण बना।

ट्रेन जबलपुर स्टेशन पहुंच गयी। अपने लिए सवारी का इंतजार करते हुए देखा एक आदमी बहुत मोटी सोने की चेन धारण किये हुए एक आदमी ऑटो वाले से पूछता है -'यहां सिगरेट पीना अलाउड है कि नहीं।'

सिगरेट पीते हुए ऑटो वाले के बार-बार सवारी के लिए पूछने की बात की तारीफ़ करते हुए मजे लेते हुए वह बोला-मान गए यार तुमको। लगे हुए हो लगातार ट्रेन से ऑटो पर ले चलने के लिए जबकि हमने कह दिया कि हमारी गाडी आ रही है।

क्या विदेशों में निवेश के लिए बार-बार अनुरोध करने पर विकसित देश के लोग भी कुछ ऐसा ही कहते होंगे हमारे लोगों से--मान गए यार तुमको। लगे हुए हो कब से निवेश कराने के लिए।

अब कमरे पर आ गए। चाय आ रही है। आ जाइए आप भी। देखिये बाहर का सीन कैसा दीखता है। कविता याद आ रही है:

जितना खिड़की से दिखता है
बस उतना ही सावन मेरा है।
हैं जहां नहीं नीले निशान
बस उतना ही तन मेरा है।
आपका दिन शुभ हो। मजे से रहें।

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Sunday, September 27, 2015

शादी बर्बादी है

जसपाल सिंह , उम्र 75 साल। रहने वाले भीमसेन के आगे कठारा के। डब्बे के बाहर सीढ़ी पर पाँव लटकाये बैठे दिखे तो हमने कहा -पाँव अंदर कर लेव दादा। नहीं तो कहीं झटका लगा तो बाहर हुई जईहौ।

पाँव अंदर करके बोले-रॉड पकरे हम। चिंता न करौ।

हमने पूछा-कहां से आ रहे हैं तो जेब से जनरल का टिकट निकाल के दिखाया। हावड़ा से आ रहे है।

फिर बताया- सात बजे की ट्रेन थी। पांच घण्टा लेट चली 12 बजे।

हमें लगा -अच्छा हुआ हम रेल मंत्री नहीं हैं वरना पूछने लगते दादा-राष्ट्र इस देरी का कारण जानना चाहता है।
और बात हुई तो पता चला कि कलकत्ते में एक बेकरी की दुकान में दरबान की नौकरी करते थे। 1995 में छोड़ दी नौकरी। पाँव फूला हुआ था। मलेरिया/फाइलेरिया (?) हो गया था।

कलकत्ता अपने भाई के साथ गए। वहीं बंगाली महिला से शादी कर ली। जुलाई ,1977 में। मतलब 38 साल पहले। दो लड़के है। एक 36 साल का एक 37 साल का। एक कलकत्ता में माँ के साथ रहता है। एक कठारा में। अभी कुछ पक्की आमदनी का कोई काम नहीं करते।

लड़कों की शादी नहीं की अभी तक ? पूछने पर बोले-शादी बर्बादी है। हमने कहा- आपने तो कर ली। बोले-तभी तो पता चला।

घर में हिंदी और बंगाली मिलीजुली बोलते हैं। पत्नी हिंदी अच्छी जानती हैं। जसपाल सिंह का हाथ तंग है बंगाली में।

कठारा से एक किमी दूर गाँव है। खेती है 2 /3 बीघा। बँटाई पर उठा देते हैं। खुद कलकत्ता और कठारा आते जाते रहते हैं। हफ्ते बाद फिर कलकत्ता के लिये झोला उठाकर चल देंगे।

कठारा में खाना का क्या जुगाड़ होगा? पूछने पर बोले-होटल में खाएंगे।

इस बीच टीटी आ गया और पूछने लगा-16 नम्बर बर्थ आपका है? हम हाँ कहते हुये बर्थ पर आ गए।

कठारा निकल गया । जसवंत सिह अब तक उतर चुके होंगे। शायद होटल में खाना खा रहे हों।

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चाँद भी हमारी ही तरह अकेला होता है

गोविन्दपुरी स्टेशन पर पहुंचते ही चाँद ने लपककर पूछा- मैं भी अकेला। तुम भी अकेले। हम दोनों ही अकेले हैं। साथ चलते हैं। ले चलोगे साथ में?

हमने पूछा -रिजर्वेशन तो है नहीं तुम्हारा। कैसे चलोगे?

इस पर वह बोला-छत पर बैठकर चले चलेंगे। छत का रिजर्वेशन थोड़ी होता है।

हमने कहा-चलो। चांदनी को भी ले चलना साथ में। वरना अँधेरे में कहीं भटक गए तो लफ़ड़ा होगा।

चाँद बोला-हम चांदनी के बिना कहीं नहीं जाते।

हमने कहा -समझ गए भाई। चलो चलना साथ में। ट्रेन आने तो दो। ट्रेन तो अभी 3 किमी दूर सेंट्रल पर सुस्ता रही है।

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Saturday, September 26, 2015

दुःख और उदासी का तारतम्य तोड़िये

सुबह हो गयी कानपुर में। एक और सुबह। शानदार, जबरदस्त, जिंदाबाद।

सुबह का समय ऐसा होता है जब सारे दुःख ऐसे तिड़ी-बिड़ी हो जाते हैं जैसे सड़क घेरकर खड़े रेहड़ी वाले डण्डा फटकारते आते होमगार्ड को देखकर इधर-उधर फुट लेते हैं। चिंता हाथ जोड़कर विदा हो जाती हैं। हर सुबह जीवन की नई शुरुआत होती है।

हमारे कई मित्र अपनी अनगिनत परेशानियों से जूझते रहते हैं। कभी उदास हो जाते हैं। कभी बहुत उदास। हम भी होते हैं। लगता है कुच्छ नई होना अब। सब समय सरक गया हाथ से। हम तो एक ठो कविता भी लिख मारे थे एक दिन:
सबेरा अभी हुआ नहीं है
पर लगता है
यह दिन भी गुजर गया हाथ से
हथेली में जकड़ी बालू की तरह।
अब सारा दिन
फिर इसी एहसास से जूझना होगा।
कित्ती तो शानदार कविता है। पर सोचिये कि सारा दिन यह सोचकर क्यों गुजारना कि दिन गुजर गया। भौत गड़बड़ बात।

लोग कहते हैं कि प्रकृति ने इंसान की मुंडी को घूमने वाला इसलिए बनाया कि वह घूमकर इधर-उधर देख सके। पर मुझे तो यह भी लगता है कि मुंडी घुमाने की व्यवस्था इसलिए भी बनाई गयी है ताकि इंसान अपने सर की परेशानियां झटक सके। नकारात्मक भाव जहां हावी होने की कोशिश करें फौरन सर जोर से हिलाएं ताकि अवसाद सर से नीचे आकर गिरे। उसके हाथ-पाँव ऐसे टूटें कि दुबारा आपके सर चढ़ने की कोशिश न करें।

सुबह-सुबह ज्ञान की बात भौत गड़बड़ बात है पर एक बेवकूफी यह भी सही।

अपने सब मित्रों को हम यही समझाते हैं कि दुःख और अवसाद और परेशानी और हर तरह के नकार भाव से निपटने का सबसे बढ़िया तरीका है उसका तारतम्य तोड़ना। परेशानी आप पर हावी हो रही है तो जरा सा हिला दीजिये उसको। चेहरे पर बारह की जगह दस बजकर दस मिनट हो जाएंगे।

कभी-कभी शौकिया उदासी ठीक बात है जिससे कुछ शेरो शायरी निकल आये। हम भी लिखते हैं कभी-कभी न उदासी में नहाये शेर। पर ऊ तो नदी में नहाकर तरोताजा होने जैसा होता है। नदी में नहाना और उसके भँवर में फंसना अलग बात है।

खुश रहिये। मस्त रहिये। बिंदास। दुःख और उदासी का तारतम्य तोड़िये। न कुछ समझ आये तो प्रसाद की कविता गुनगुनाइए:
दुःख की पिछली रजनी बीच
विलसता सुख का नवल प्रभात।
ठीक न। चलिए अब मुस्कराइए। काम पर लग जाइए। कोई काम न हो तो एक बार फिर मुस्कराइए। अभी मुस्कान पर कोई टैक्स नहीँ लगा। टेक्स फ्री मुस्कान के साथ देखिये आप कितने हसीन लग रहे हैं।

आपकी सुबह गुड वाली मॉर्निंग हो।

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Wednesday, September 23, 2015

चल मेरे घोड़े टिक टिक टिक

उड़ान का समय होने पर जहाज रन वे पर बड़ी तेज भागा। ऐसा जैसे कोई ट्रेन छूटी जा रही हो उसकी। भागते-भागते अचानक मुंडी ऊपर करके उछलकर आसमान के समुद्र में कूद गया और फिर आहिस्ते-आहिस्ते तैरने लगा हवा में।

नीचे की इमारतें चौकोर डब्बों में बदलती हुई छोटी होती गयीं। छोटी और छोटी। कुछ और ऊपर जाने में सब इमारतें गड्ड-मड्ड होकर एक में मिल गयीं। और ऊपर जाने पर जहां इमारतें और खाली जमीन थी वहां भूरे चकत्ते दिखने लगे।मानों धरती को वहां स्किन डिजीज हुई हो जहां जमीन पर मकान हैं या जमीन हरी नहीं है।

बादलों के ऊपर आ गया है जहाज। बादल जहाज के नीचे टहलते हुए इधर-उधर घूम रहे हैं। झुण्ड के झुण्ड बादल देखकर क्या पता ये भी किसी स्कूल जाते होंगे सुबह-सुबह।

एक जगह बादलों का एक समूह दिखा।कोई बादल नीला, कोई सफेद, कोई कम सफेद तो कोई एकदम भक्क सफेद।

बादल के साथ बदलियाँ भी टहल रहीं होंगी पकक्का। पर सबकी ड्रेस एक जैसी है तो पता नहीं चल रहा कौन बादल है कौन बदली। लगता है बादल समाज में बादल और बदली के संग-संग घूमने पर कोई रोक-टोंक नहीं है। कोई मुर्गा नहीं बनाता बादलों को बदली का हाथ पकड़ घूमने पर। कोई राखी नहीं बन्धवाता बदली से बादल के जब वह बादल की पीठ पर सवार घूमते हुए कहती है---चल मेरे घोड़े टिक टिक टिक।


एक जगह कुछ बादल और बदलियाँ खूब भक्क सफेद के साथ चमकते हुए भी दिखे। उनकी चमक देखकर ऐसा लग रहा था मानों सूरज की किरणों ने सुबह-सुबह आते ही उनके गुदगुदी कर दी हो। गुदगुदी से बचने के लिए खिलखिलाते हुए बादल इधर-उधर भाग रहे हैं। खिलखिलाते हुए लोट-पोट हो रहे हैं। किरणें भी उनका पीछा करती हुई गुदगुदाते हुए मुस्करा रही हैं।

जहाज कप्तान ने बताया कि बाहर का तापमान शून्य से 11 डिग्री नीचे है। अन्दर का तापमान 20 डिग्री। दोनों को मिला दिया जाए तो औसत तापमान हो जाए 5 डिग्री करीब।

नीचे अब बादल एकदम सफेद गद्दे की तरह लग रहे हैं।मन कर रहा कि बाहर निकलकर लेट जाएँ उनके ऊपर और सूरज भाई से कहें आओ चाय पिलाते हैं बादलों की बेंच पर बैठकर तुमको।

इस बीच एयरहोस्टेस नास्ता में सैंडविच दे गयी है। पानी साथ में। हमने सर झुकाकर करना शुरू कर दिया। बगल वाले से पूछने का चलन ही कहां है जहाज में। और हां, हमने उड़न बालाओं को इस बार न तो घूरकर देखा और न ही दुबारा पानी माँगा उनसे। बल्कि एक बार के नाश्ते और पानी के लिए दो बार थॅंक्यू बोला। smile इमोटिकॉन
बाहर बादल का फोटो लिया कैमरे से। जितना हमको दिख रहा उतना कैमरे को नहीं दिख रहा। मन किया खिड़की को सरकाकर कैमरा बाहर करके फोटो खींच लें। फिर यह सोचकर कि सारे बादल फिर अंदर घुस आएंगे अपना इरादा स्थगित कर दिया।


अल्लेव जहां बादलों के अंदर आने की बात कही तो ढेर सारी यादें धड़धड़ाते हुए जेहन में घुस गयीं। जितने भी लोग याद आये उनके साथ यह भी याद आया कि वो इस समय क्या कर रहा होगा। पत्नी स्कूल में बच्चों को पढ़ा रही होगी, बड़ा बच्चा नास्ता करते हुए आफिस जाने की सोच रहा होगा छोटा मेस नास्ता करके दोस्तों के साथ बतियाते हुए क्लास जा रहा होगा। ड्राइवर एयरपोर्ट पहुंचने वाला होगा।

फेसबुक पर लिख रहे तो फेसबुक के बारे में याद आया। दिल्ली से चलने से लेकर अब तक कई दोस्त खूब सारे स्टेट्स लगा चुके होने। मेरे स्टेट्स पर कुछ और लाइक्स और टिप्पणी आ चुकी होंगी। समाचार का एंकर चिल्लाता हुआ कई बार पढ़ु खबर फिर से पढ़ रहा होगा।

इस बीच जहाज टेढ़ा सा हुआ। वह अपने को जबलपुर उतरने के लिए तैयार कर रहा है। नीचे खूब हरियाली दिखी। धुंध के बादल हरियाली के ऊपर होते हुए जहाज की तरफ लपके जैसे स्टेशन पर ऑटो वाले लपकते हैं यात्री देखकर। जहाज आगे बढ़ गया और एयरपोर्ट की सड़क को चूमते हुए धीमा होते हुए उसके ऊपर ही ठहरकर सुस्ताने लगा।

जबलपुर आ गया। अब हम निकलते हैं बाहर। आप मजे करो। मुस्कराओ कि आपका दिन मंगलमय हो।

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Tuesday, September 22, 2015

पसीना मेहनतकश इंसान का प्राकृतिक श्रंगार होता है


सुबह उठते हुए 6 बज गए। बाहर सड़क पर बच्चे अभी भी काम कर रहे थे। कुछ हाथ गाड़ी से गर्म कोलतार सड़क पर डाल रहे थे।कुछ उसको सड़क पर समतल कर रहे थे। कोई लकड़ी की पटिया की सीध में कोलतार पर गिट्टी ठोंक रहा था। एक आदमी पहले बनी सड़क पट्टी और ताज़ी पट्टी के जोड़ को गैस बर्नर से पिघला कर दोनों को मिला रहा था। दो अलग तापमान की सड़क को मिलाने के लिए मिलन बिंदु को एकताप पर ला रहा था।
सद्दाम की ड्यूटी हाथ गाड़ी में गर्म कोलतार सप्लाई की थी। फोटो भी खींचता जा रहा था। हाथ में दस्ताना था। फेसबुक पर फोटो दिखाए तो बोला पढ़ने में नई आ रहा। अंग्रेजी में नाम लिख दीजिये। काम करते हुए बच्चे की नाक और होंठ के बीच पसीने की बूँद ऐसे किसी फूल पर ओस की बूँद की तरह चमक रही थी।पसीना मेहनतकश इंसान का प्राकृतिक श्रंगार होता है। अद्भुत, अनूठा, अलौकिक,अप्रतिम श्रंगार।

वहां से चिड़िया मोड़ के लिए बस पकड़े। कुछ महिलाएं बच्चों को स्कूल
छोड़ने जा रहीं थीं। कुछ आदमी काम पर। आठ रूपये की यात्रा करके चिड़िया मोड़ पहुंचे। चाय की दुकान पर चाय पी। वहीं अपनी पत्नी के साथ फुटपाथ पर बैठकर चाय पीते बोऊ दास मुल्ला मिले। कागज-कूड़ा बीनने का काम करते हैं। साथ बच्चे हैं। कोई रिक्शा चलाता है कोई ऑटो। होंठ पान मसाला की मार से घायल थे मुल्ला जी के।

चिड़िया मोड़ के आगे मन्दिर के पास फूल बेचती मिली करुणा। नाम पूछा तो बंगाली उच्चारण में बोली-- 'कोरुना'। हमें लगा ये कोरुना कौन नाम होता होगा। फिर समझ में आया ओ, करुणा। फ़ोटू दिखाया तो हंसती हुई दुकान पर खड़े एक आदमी को बताती हुई बोली-- देखो हमारा फोटो उठाया।

आगे एक की दुकान दिखी। याद आया कि यहां पांच सात साल पहले भी पिए थे चाय। सासाराम के ड्राइवर की फोटो खींचे थे। उसका पता हमारे पास अभी भी है। उसको फोटो भेजना है। चाय का पैसा देने नहीं दिए थे वो लोग हमको उस दिन।


उस समय हमारा मोबाईल नोकिया का ई-71 था। वह पत्नी ने दिया था भेंट। अब बेटे का दिया सैमसंग गैलक्सी है। कितना समय बदल गया। कितने नए दोस्त बन गए इस बीच। नए ,प्यारे बेहद प्यारे।

एक बुजुर्ग बड़ी धीमी गति से चलते हुए आ रहा था। गर्दन में कुछ तकलीफ के चलते टेढ़ी थी गर्दन। एक नल के पास बैठी कुछ महिलाएं पानी भर रहीं थीं। एक सन्मार्ग अखबार बांच रही थीं।

आगे गन एन्ड शेल फैक्ट्री काशीपुर मिली। स्थापना वर्ष 1802 मतलब 213 साल पुरानी। सबसे पुराने औद्योगिक संस्थान। खड़े होकर देखने लगे तो हाथ में कैमरा देखकर कई लोग बोले बारी बारी से--फोटो नहीं उठाना। यह फोटो नेट पर उपलब्ध है। पर फोटो खींचने के लिए टोंकना यह बताता है कि लोग अपने साथ जुडी चीजों से असंपृक्त नहीं हैं। जुड़ाव है। यह कोलकता की खासियत है शायद।


एक आदमी सड़क किनारे खड़ी कार की छत पर लेटा सो रहा था। मन किया जगाकर रास्ता पूँछ लें पर फिर नहीं किये डिस्टर्ब।

एक छोटी जगह में बोरी में छोटी शीशी भरते हुई बच्ची दिखी। पैर में हवाई चप्पल और बिछिया। ये छोटी शीशियां 400 रूपये बोरी के हिसाब से जाती हैं। बोरी में कितनी आती हैं यह नहीं बता पाया लड़का। सिंदूर आदि पूजा का सामन भरकर बेंचने के काम आती हैं यह शीशी।


आखिर में काशीपुर घाट पर गंगा नदी मिली। स्टीमर नाव से नदी पार जाते यात्री दिखे। नदी में नहाते लोग दिखे। पानी में कुल्टी मारकर कूदते और किनारे तैरते बच्चे दिखे।वहीं एक महिला किनारे कपड़े भी धो रही थी। भगीरथी नाम है यहां नदी का एक महिला ने बताया। हम गंगा की विशाल जलराशि को कुछ देर निहारते रहे और सोचते रहे इसमें कानपुर से आया पानी भी मिला होगा। पानी आगे चला जा रहा था जीवन प्रवाह की तरह।


लौटे रिक्शे से। सईद नाम था रिक्शा वाले का। उमर 52 साल। तीन बच्चा। एक लड़का सब्जी बेचता है दूसरा मनी बैग बेचता है। और एक ठो लड़की । बड़ा लड़का और लड़की का शादी बना दिया। रिक्शा तृणमूल ने दिया। 5000 रूपये चन्दा लेकर। पहले सीपीएम में थे। क्या करें -गरीब आदमी किसी पार्टी में नहीं रहेगा तो मारा जाएगा।

5000 में पुराना रिक्शा मिलता है। 10000 में नया। 5000 रूपये लेकर नया रिक्शा दिलाया पार्टी। क्या पता रिक्शा सरकार की तरफ से मुफ़्त मिला हो। 5000 रुपया पार्टी फंड में या स्थानीय कार्यकर्ता के पास गया हो।

चिड़िया मोड़ पर अख़बार की बिक्री खरीद करते दो हॉकर दिखे। हम प्रभात खबर अख़बार खरीदे। नारियल पानी पिए थे जब पिछली बार आये थे। इस बार नहीं पिए।


दमदम के लिए बस पकड़े। बेध्यानी में आगे चले गए। उतरकर पूछे तो रिक्शा वाला बोला– 30 बी बस पकड़िये। दूर है। इस बार फिर गेस्ट हॉउस के आगे निकल गए। फैक्ट्री के पास तक। उतरकर पीछे आये।

दो बार गन्तव्य से आगे निकलकर जाना ऐसे ही लगा जैसे ड्रोन हमले में बम कभी निशाने पर न लगे। या फिर जनकल्याण के कामों के लिए आवंटित पैसा निजकल्याण में लगे।

मोड़ पर मिले सुनील कुमार चक्रबोर्ती। यही रिक्शे वाले कल सबसे पहले दिखे थे। उम्र 54 साल। बच्चे हैं नहीं। शादी बनाया 9 साल पहले। पत्नी की उम्र 35 साल। बीबी डांट के रखती होगी ? के जबाब में बोले-ख्याल भी तो रखती है।

लौटकर कमरे पर आये। चाय मंगाए। पीते हुए पोस्ट लिख रहे हैं। अब आप पढ़िए। मजे से रहिये। खूब खुश। बिंदास। ठीक न। आपका दिन शुभ हो। मंगलमय हो।


                                        



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मुस्कराओ खिली रहो हमेशा

तुमको मुस्कराते देखा
तो मन किया
स्टेच्यू बोल दूँ तुमको
ताकि मुस्कान बनी रहे
तुम्हारे चेहरे पर हरदम।

पर फिर सोचा
फिर तो तुम बनकर
रह जाओगी मैनिक्वीन
जिसमे चस्पा रहती है
हमेशा एक सी मुस्कान।

अब यह चाहता हूँ
कि हमेशा मुस्कराओ
नए नए अंदाज में
हर अंदाज पहले से अलग।

मुस्कराओ
खिली रहो हमेशा
जैसे खिलते हैं घाटियों में फूल
बगीचे में फूलों पर इतराती हैं तितलियाँ
और मुस्कराती है कायनात सूरज की किरणों के साथ।

-अनूप शुक्ल

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भाई तुम्हारा लोटा किधर गया?

दिल्ली अभी ऊंघ ही रही थी जब हम उसको बाय कहकर निकल लिए। जब आँख मलते हुए उठेगी दिल्ली तब हम जमीन से हजारों मीटर ऊपर सूरज भाई से बात कर रहे होंगे। राजधानी से संस्कारधानी का सफर शुरू।

स्पाइसजेट का बोर्डिग पास बनवाने के लिए लाइन में लगने को हुए तो स्टाफ ने पूछा -प्रियारिटी चेकइन करवाना है ? मतलब पहले बोर्डिंग पास। फीस 1000 रूपये। टिकट 6000 की। बोर्डिंग पास पहले बनवाने के 1000 रूपये। 5 मिनट लगे साधारण चेकइन के। पांच मिनट का इन्तजार कम करवाने के 1000 रूपये।

के। क्या पता जबलपुर पहुँचने तक जहाज से निकलने के 1000 रूपये धराने लगे यह कहते हुए कि अभी लागू हुई योजना।
आगे 500 रूपये ख़ास सीट

बैठने के जगह नहीं। लोग सीढ़ियों में बैठे हैं प्लेन के इन्तजार में। लोग जमीन पर भी बैठे हैं। एक यात्री निपटान मुद्रा में ऐसे बैठा है कि पूछने का मन हुआ -भाई तुम्हारा लोटा किधर गया?

सेवायें हर तरह से आम आदमी के हिसाब से सस्ती होती जा रही हैं।

जहाज में चढ़ते हुए देखा सूरज भाई मुस्कराते हुये गुड मार्निंग कर रहे हैं। कह रहे हैं साथ चलेंगे। हम भी गुडमार्निंग कह रहे हैं। साथ में यह भी:
मुस्कराओ
खिले रहो हमेशा
जैसे खिलते हैं घाटियों में फूल
बगीचे में फूलों पर इतराती हैं तितलियाँ
और मुस्कराती है कायनात सूरज की किरणों के साथ।

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आप हिन्दू की मुसलमान?

रात खाना खाने के बाद ऐसे ही जरा बाहर टहलने निकले। इंस्पेक्शन बंगले के बाहर ही मुख्य सड़क। एक तरफ की सड़क बन रही थी। 17 से 25 की उम्र के बच्चे काम कर रहे थे। डामर गर्म हो रहा था। बच्चे आपस में बात करते हुए काम कर रहे थे।

हमने सड़क के डिवाइडर के इधर रहते हुये कुछ पूछा तो एक लड़के ने कहा-इधर ढुक आइये (आ जाइए)। हम ढुक गए। बात करने लगे। पूछा तो पता चला कि बच्चे सब मुर्शिदाबाद जिले के एक ही गाँव के रहने वाले हैं।कुल 15 लोग यहां काम करने आये हैं।

सड़क पीडब्ल्यूडी की है। रात को काम करते हैं बच्चे। दिन में सोते हैं। यहां सेंट्रल जेल के पास फुटपाथ में सो जाते हैं। जनता शौचालय में निपटते हैं। नहाने का काम भी सड़क किनारे के नल में। रोज के 300 से 400 रूपये मिलते हैं।

एक बच्चा बीड़ी पी रहा था। उम्र 17 बताई उसने। हमने पूछा-बीड़ी क्यों पीते हो? इस पर आखिरी कश लेकर पीने के बाद बीड़ी का टुकड़ा फेंकते हुए उसने बताया-रात में काम करने में नींद आती है। इसलिए बीड़ी पीते हैं। रोज दो बण्डल बीड़ी पी जाता है।


उन बच्चों में एक बच्चा जो हिंदी समझता था उससे पूछा तो उसने बताया हिंदी/बांगला मिलजुल भाषा में कि मुर्शिदाबाद में काम नहीं मिलता।इसलिए सब कलकत्ता आ जाते हैं। बच्चा खुद अभी 11 वीं क्लास में पढ़ रहा है। उसका पिता किसान मजदूर है। दो बहनें है । एक की शादी हो गयी। दूसरी अभी पढ़ रही।

अपने काम के बारे में बताते हुए उसने मेरे से भी पूछा -क्या करते हैं? कहां रहते हैं? इस फैक्ट्री में क्या बनता है? फिर पूछा---आप हिन्दू की मुसलमान? हम बोले-हम एक इंसान। फिर हमने पूछा-तुम ये क्यों पूछे कि हिन्दू की मुसलमान? बोला -ऐसे ही। हम बताये अपने बारे में।

बच्चा इतना प्यारा और मासूम लगा बातचीत में कि उस पर प्यार उमड़ आया। कन्धे पर हाथ रखकर पीठ सहलाये और बताये मेरा छोटा बेटा तुम्हारे जितना ही बड़ा है। इस पर वह थोड़ा और मासूम सा हो गया।

हम बच्चे का फोटो लिये तो अन्धेरे में आया नहीं। बच्चा बोला-फ्लैश चलाइये। हम आजतक फ्लैश चलाये नही थे। आज भी नहीँ चला पाये। बच्चे ने मोबाईल हाथ में खट-खट इधर -उधर टच किया और फ्लैश चमकने लगा। फोटो काली से रँगीन हो गयी।


तकनीक हो या कोई भी संसाधन उसका बेहतर होना जितना जरूरी है उतना ही जरूरी है उसका समुचित उपयोग। हमारे यहां कितने संसाधन बिना समुचित उपयोग के बर्बाद हो रहे हैं। मानव संसाधन उनमें सबसे प्रमुख है।

बच्चे से नाम पूछे तो बताया-सद्दाम हुसैन। हमने कहा-बड़ा खतरनाक नाम है। हंसने लगा। बोला-पापा रखे थे। पता लगा सब बच्चे एक ही गांव के हैं। सब मुस्लिम। 23 तक काम करेंगे। फिर चले जाएंगे गाँव। 25 को ईद है।
सद्दाम saddam से और भी बात हुई। बोला--नींद आती है इसलिए बीड़ी कभी-कभी पी लेते।चाय नहीं पीते। गैस बनती है। हमने बोला-पानी पिया करो। बच्चे के पास माइक्रोमैक्स मोबाईल है।6000 का लिया था। फेसबुक खाता है पर उसका सिम घर छूट गया।

नाम पर बात चली तो हमने पूछा-किसी का नाम ओसामा भी है क्या। सब हंसने लगे।

उनको काम करता छोड़कर हम चले आये। हम स्टेट्स अपडेट कर रहे हैं। वो काम कर रहे होंगे। आप सो रहे होंगे। सुबह देखिएगा स्टेट्स। शुभ रात्रि।

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Monday, September 21, 2015

कोई रिश्ता हो तो बताइयेगा

कलकत्ता में सुबह पहली नींद खुली 3 बजे । करवट बदलकर सोये फिर तो पलक-पट खुले 5 बजे। साढ़े पांच तक आलस्य की संगत में रहे। फिर निकल लिए टहलने। कलकत्ता की भोर देखने।

कलकत्ता जिसे राजीव गांधी ने मरता हुआ शहर कहा। डॉमिनिक लैपियर ने 'सिटी आफ ज्वाय'। इस शहर में अभी भी कम आमदनी वाला व्यक्ति भी सम्मान की जिंदगी जी सकता है यह इसकी ख़ास बात लगती है मुझे।
एक रिक्शा वाला बरमूडा टाइप जाँघिया पहने ऊपर लुंगी लपेटे सड़क पर टहलता मिला। बोला-हेंयि त पैदा हुआ। रिक्शा चलाता है। 400/500 कमा लेता है। हमने पूछा-काशीपुर घाट कितना दूर।बोला-अनेक दूर। 3 से 4 माइल धर लीजिये।


इस बीच सवारी आ गया। मियाँ-बीबी। लादकर चलने लगे। हमने कहा -एक फोटो खैंच ले। वो ब्रेक मारकर रिक्शा रोक लिया। पोज दिया। देखिये हाथ ब्रेक पर हैं। चला गया।हम आगे बढे।

एक चाय की दुकान पर कुछ लोग जमे थे। हम भी खड़े हो गए। चाय मांगे। बोला-बिस्कुट लीजिएगा? हम बोले-दीजियेगा तो ले लेंगे। दिया एक ठो बिस्कुट। हम खाते हुए चाय पीने लगे।

एक आदमी बेंच पर बैठा खैनी रगड़ रहा था इत्मिनान से। पता चला उसके गाँव से 60 गो लोग कलकत्ता घूमने आये हैं। सबसे बड़ा समस्या निपटने का है। डर ई लगता है कि गांव-देहात का आदमी कहीँ इधर-उधर बैठ गया त आफत।अब त खैर सब घूम लिया। गाड़ी खुल गया वापसी के लिए।

पता किये तो बोले--'समस्तीपुर के रहने वाले हैं। रिक्शा चलाते हैं। कमरा ले लिए हैं।परिवार साथ रहता है।'


बात करते-करते समस्तीपुर वाले बाबू ने अंटी से कुछ निकाला। हम समझे बटुआ-सटुआ कुछ होगा। पर वो कपड़ा में लपेटा हुआ सामान खोला तो वो नोकिया का सबसे मजबूत वाला मोबाईल निकला। सस्ता मोबाईल जिसको फेँककर किसी को मार दो तो मोबाईल को कुछ न हो।बटन दबाकर किसी से बतियाने लगे भाई जी।
दुकान मालिक विजय जादव बलिया जिला के रहने वाले। 25 साल से ऊपर हो गया दुकान चलते हुए। दुकान तबसे है जब यह रोड सिंगल था। कभी-कभी उखड़ता-पछड़ता है दुकान। पर फिर बस जाता है दू चार दिन में।
क्या बदला है कलकत्ता में ममता जी के राज में पूछने पर एक बोला-कुच्छ नहीं बदला। खाली लाईट-फाइट लगवाया है। दूसरे ने आगे बोला- 'ई लाईट तो लगवाया पर इसमें कोई बिजली तो आता नहीं। सब पैसा खाने का खेल है।'


एक रिक्शा वाले वैशाली के रहने वाले। नाम बिन्देश्वर दास। 30 साल से चला रहे रिक्शा। 40 रूपये रोज किराये का रिक्शा। कलकत्ता कैसा लगता है पूछने पर बोले-अच्छा लगता है। बकिया पटना भी जाकर देख चुके एक बार।मन नहीं लगा तो फिर लौट आये।

एक बुजुर्ग और खैनी रगड़ते हुए आहिस्ते से बताते हुए बोले-40 साल से हैं कलकत्ता में। ऊँगली दिखाते हुए बोले-3 बच्चे हैं। 'छोटा परिवार-सुखी परिवार।'

वहीं तख्त पर सर घुटाये हेम नारायण सिंह बैठे थे। पूछा- कहां के रहने वाले? बोले- 'बलिया। चन्द्रशेखर सिंह।' हम बोले-' हाँ पता है। चन्द्रशेखर सिंह रहने वाले थे वहां के। हजारी प्रसाद द्विवेदी भी तो वहीं के थे।' हजारी प्रसाद द्विवेदी के नाम पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई हेम नारायण की। हमारे यहां लोग राजनीतिज्ञों को ही जानते हैं। साहित्यकार का नाम नहीं लेते।


हेम नारायण के सर पर कुछ चोट सी लगी थी। बोले-मस्सा था। नाई को भी नहीं दिखा। उस्तरा चलाया तो कट गया। खून बहने लगा। बहुत फिटकरी लगाया। चूना लगाया। नहीं रुका खून तो फिर कटा हुआ बाल चिपका दिया। तब रुका खून।

65 पार के हेम नारायण 6 भाई थे। अब दो बचे।एक भाई फ़ील्ड गन फैक्ट्री में नौकरी करते थे। वहीं आर्मापुर में टाइप 2 क्वार्टर में रहते थे। जो जगह बताई वह हमारे घर के पास ही है। हमने बताया तो फिर तो यादों के थान के थान खोलते गए हेम नारायण। भाटिया होटल। मसवानपुर। पनकी।और न जाने किन-किन जगहों की याद नदी में डुबकी लगाते रहे ।

एक किताब की दुकान में नौकरी करते हेम नारायण ने शादी नहीं की। पूछने पर बोले- 'बीमार रहते हैं। ऐसा कोई अस्पताल नहीं जहां से लौट के न आये हों। हेपटाइटिस बी भी हो चुका है। इसीलिए शादी बनाये नहीं। अब तो बस आखिरी शादी की तैयारी है।'


शादी की बात पर दुकान मालिक विजय बोले-'आपकी निगाह में कोई लड़की हो तो बताइये।' हम बोले-'तुम लोग देखे नहीं। हम बताएंगे।' फिर बड़ी उम्र में शादी की बात चली तो एक लड़का बोला-'अरे अभी एक 35 साल की लड़की 85 साल के बुड्ढे से शादी बनाई है। जानती है बुढ्ढा टपक जायेगा कुछ दिन में। सब माल उसका होगा।'
हालिया चर्चित दिग्विजय सिंह की शादी का कोई चरचा नहीं हुआ वहां। इतने पॉपुलर नहीं हैं लगता दिग्विजय जी यहां।

इस बीच विजय जादव ठेले के ऊपर से दातुन निकालकर चबाने लगे। हम पूछे-'खास बलिया के हो या किसी गाँव के?' जबाब हेम नारायण देने लगे-'बलिया नहीं। दोआबा पकड़ीये। दोआबा मतलब गंगा और सरयू का बीच का जगह।'

विजय लिट्टी बनाने के लिए लोई में सत्तू भरने लगे। सत्तू भरकर कड़ाही के तेल में छूआकर वहीं रखने लगे। हम चलने लगे तो बोले-'अपना नम्बर देते जाइये।कोई रिश्ता हो तो बताइयेगा भाई जी के लिए।'


लौटते हुए देखा कि एक आदमी सड़क पर खड़ा किसी को हाथ जोड़कर प्रणाम कर रहा था। पूछा तो पता चला कि देवी का मन्दिर है दीवार के पीछे। उन देवी को ही दूर से प्रणाम कर रहा था। वाई-फाई तो अभी आया दुनिया में। पर अपने यहां वाई-फाई प्रणाम अनादि काल से चला आ रहा है। दुनिया में जो भी नई खोज होती है वह हमारे यहां सदियों पहले हो चूका होता है।

दमदम फैक्ट्री के गेट के सामने से गुजरते हुए वापस लौट आये। कलकत्ता की सुबह हो गयी।

आप मजे से रहिये।।मस्त रहिये। बिंदास।

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Sunday, September 20, 2015

दिल्ली से कलकत्ता, पहुंच गए अलबत्ता




1.हवाई अड्डे पर टर्मिनल 1 पर उतरे। मतलब आगमन पर। हमने समझा कि प्रस्थान भी कहीँ अगलै-बगल कहीं से होगा। पता चला की आठ दस किलोमीटर की दूरी पर था। हम व्यंग्य की चिंता और गद्दी
2. बस वाले ने 25 रूपये धरा लिए किराये के। यह भी बताया कि अगर हवाई अड्डे से टोकन बनवा लिए होते तो यात्रा मुफ़्त होती। अज्ञानता का फाइन पड़ गया 25 रूपये।
3. सुरक्षा जांच के लिए सीआईएसएफ वाले से बतियाये तो पता चला कि लखनऊ का रहने वाला है। अलीगंज । मन किया और बतियाएँ पर तब तक सुरक्षा जाँच वाला-चलो आगे। हम समर्पण मुद्रा में दोनो हाथ हवाई जहाज के डैनों की तरह फैलाकर खड़े हो गए।
4. एक किताब की दुकान पर अंग्रेजी किताबें बिक रहीं थी।मन किया कोई अंग्रेजी किताब पलटते हुए फोटो खिंचवा ले। फेसबुक पर अपलोड करेंगे। इम्प्रेशन पड़ेगा। पर फिर नहीँ किये। बस इस आइडिया पर शर्मा कर रह गए।
5. जिस गेट से घुसना था वहीं एक चार्जिंग बोर्ड के पास जाकर बैठ गए। किनारे की कुर्सियां पर लोग बैठे थे। हम खड़े-खड़े चार्ज करते रहे। कुछ देर बाद एक कुर्सी खाली हुई। हमें फील गुड हुआ। हम बैठकर चार्जिंग करने लगे।
6. इस बीच नेट गोल हो गया। ध्यान आया यहां वाई-फाई होगा। कनेक्ट भी हो गया। फील गुड बढ़ गया। फ्री का वाई-फाई और चार्जिंग प्वाइंट ।सैमसंग स्मार्टफोन धारक को इससे अधिक क्या चाहिए।
7. पीछे बैठी एक बालिका फोन पर किसी को बता रही थी । उसकी शादी की बात चल रही थी। लड़का शयद अमेरिका में हैं। अंगेरजी एक्सेंट ठीक करने को बोला गया है लड़की को। हमें लगा कि पीके पिक्चर की तरह कोई एक्सेंट डाउनलोडर भी होता उससे गिरा लेती बालिका उच्चारण।
8. जहाज का समय हो गया तो पता चला कि दूसरे गेट से जाना होगा। वहां से पहुंचे जहाज के पास पहुंचे तो याद आया कि अपना फोल्डर कुर्सी पर ही भूल गए थे। लौटकर लाने की बात कही तो जहाज क्रू बोला-देख लीजिये देर हो गयी है। हम यह सोचे कि कहीं फोल्डर छोड़कर चले गए तो क्या पता कोई खोजी पत्रकार शाम के किसी चैनल में प्राइम टाइम बहस समाचार न बना डाले। अपने 'रिक्स' पर भागते हुए हुये गए और ले आये फोल्डर। जहाज पर अभी भी लोग अंदर आ रहे थे।
9. जहाज उड़ा और देखते-देखते 10 किमी पहुंच गया। अचानक बाहर मौसम खराब होने की घोषणा हुई। जहाज इस तरह हिलने लगा मनो कोई घरैतिन सूप हिलाकर नाज पछोर रही हो। उस समय बाहर का तापमान - 38 मतलब बर्फ ताप से 38 डिग्री नीचे। कनाडा का जाड़े का सामान्य तापमान।
10. कुछ देर में जहाज का हिलना बन्द हो गया। खाना बंटने लगा। खाना मिलते ही सब लोग भुक्खड़ की तरह उस पर टूट पडे। ऐसा लगा कि जहाज में खाने के लिए आये हैं सब।
11. सलाद,चावल,दाल पनीर और सेवई थी खाने में। साथ में पाव और मक्खन। प्लास्टिक की चम्मच जरा जोर लगते ही लालू -मुलायम गठबंधन की तरह टूट गयी।फिर हममे चम्मच से मक्खन लगाकर खाया।
12. चाय पीते हुए याद आया कि एयरपोर्ट पर चाय सत्तर रूपये की थी। यहां मुफ़्त में। सोचते ही चाय का स्वाद बढ़ गया। चाय खत्म हुई तब जहाज बनारस पार कर रहा था।
13. बाहर रौशनी टिमटिमा रही थी। देखते-देखते वह भी ग़ायब हो गयी। अब एयरपोर्ट आते हुए रौशनी भी आ गयी। अवसरवादी है रौशनी भी।
14. जहाज कलकत्ता एयरपोर्ट पर झटके से उतर गया। बाहर का तापमान 28 डिग्री है। -38से 28 डिग्री मतलब 66 डिग्री का तापमान अंतर और 10 किमी की ऊंचाई नाप आये।
15. जहाज रुकते ही सब यात्री जनगण मुद्रा में खड़े होकर गैलरी में जाम लगा दिए। कुछ देर बाद सरकते हुए और फिर सरपट लोग बाहर हुए।
16. हम ड्राइवर को फोन किये। जो नम्बर बताया गया उसमें बैठ गए। चलने ही वाले थे कि पता चला कि वह गाड़ी दूसरे के लिए आई थी। गाड़ियों का वज्र गुणन गया। वो तो कहो चले नहीं वरना मामला 'लंच बॉक्स' सरीखा लफ़ड़े वाला हो सकता था।
17. कलकत्ता में पानी दिन भर बरसा था। ठण्डा और धुला-धुला शहर । ड्राइवर उड़िया है। कटक के पास का। बता रहा था कि कई चेयरमैन की गाड़ी हांक चुका है।
18.जहां गाड़ी रुकी थी वहीं चाय-कॉफी और नास्ते की दुकान थी। दुकान का नाम 'बिरियानी भाई'।चाय के दाम 10 रूपये। दिल्ली में जितने में एक चाय पी उतने में यहां 7 पी लेते।
19. हमरे मित्रगण होटल गए हैं ठहरने। हम।अपने आई बी आ गए। होटल का किराया 5000 होगा। आई.बी. का 100 रूपये करीब। यहां घर जैसा एहसास होता है। होटल में कोई भी चीज माँगने से पहले सोचना पड़ता है। यहां ऐसा कोई लफ़ड़ा नहीं।
20. अब चाय पीते हुये स्टेटस लिख रहे। साथ में गाना सुन रहे हैं--पहिने कुरता पर पतलून, आधा फागुन आधा जून। आप भी मजे करो।

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एक स्टेट्स हवाई जहाज से


एक स्टेट्स हवाई जहाज से स्याही और फ़ोटू का गठबंधन। जगह भी जमीन और हवा दोनों। पढ़ने के लिए संकेत भी आसमान से ही तो आएंगे। सेटेलाइट से भई।

नेपकिन ले जा रही थी व्योम बालिका। हम छिपा लिए और कलम से लिखने लगे कुछ। पहले सोचा आर्ट बनाएं। फिर यह लगा कि लिखेंगे वह भी तो आर्ट की ही तरह टेढ़ा मेढ़ा ही होगा।
 

बताओ भला और कोई लिखा होगा इतनी ऊंचाई से हिंदी में स्टेट्स। कितनी ऊंचाई पर पहुंचा दिया हमने हिंदी को यह स्टेट्स लिख कर। पर कोई इनाम थोड़ी मिलेगा हमको इसका। इनाम तो सिर्फ 'छंटे हुए लोगों' को मिलता है। smile इमोटिकॉन
 


यह लिखते समय जहाज ऐसे हिला जैसे मलेरिया का रोगी। बहुत जाडा लग रहा होगा ऊपर उसको इसीलिये। कोई पकड़े भी तो नहीं पहने था मुंडा जहाज। बहुत स्मार्ट बनता है।


पायलट बोला अब आप दिल्ली उतरने वाले हैं। बाहर का तापमान 33 डिग्री ।
 
 

ई चहुँप गए दिल वालों की नगरी दिल्ली जो आजकल डेंगू से बदहाल है

 


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Saturday, September 19, 2015

हर आदमीं के अंदर एक अमेरिका होता है

उस दिन हम सुबह 5 बजे ही 'इकल' लिए थे टहलने के लिए। अँधेरा था 'सरक' पर। बिजली के बल्ब जल रहे थे। पटेल की चाय की दुकान खुल गयी थी। दू ठो नमकीन बिस्कुट का पैकेट लेकर हम निकल लिए आगे।

रस्ते में रामफल का घर मिला। उनकी पत्नी बाहर ही बैठी थी। बोली तबियत ठीक है। गुड्डू का फल का काम ठीक चल रहा है।

सड़क पर कई महिलाएं पूजा के लिए निकलीं थीं। तीज की पूजा के लिए हाथ में लोटे में पानी लिए मन्दिर की तरफ जा रहीं थीं। एक मन्दिर में खूब महिलाएं इकट्ठा थीं।पूजा कर रहीं थीं। दो महिलाएं सड़क पर बतियाते हुए जा रहीं थीं। शायद उनका व्रत न हो। एक के कान में सोने के झुमके खूब चमक रहे थे। गाना याद आ गया-
'झुमका गिरा रे,बरेली के बाजार में।'

तीज का व्रत महिलाएं अपने घर परिवार के सदस्य की सलामती के लिए रहती हैं। अपने समाज में भूखे रहकर घर के लोगों की रक्षा के लिए करने वाले सारे ही व्रत स्त्रियों के पल्ले से बांध दिए गए हैं। देर तक भूखी तो रहती हैं। एक दिन नहीं खायेंगी तो क्या हो जाएगा। परिवार की सलामती के साथ तेज भी मिलेगा चेहरे पर।


शायद इसका कारण यह भी रहा हो कि पुरुष प्रधान समाज में स्त्री दूसरे परिवार से आने के कारण कमजोर स्थिति में रही तो सारे कठिन काम उसके माथे मढ़ दिए गए। अधिकतर स्त्रियां अपनी इस स्थिति को ख़ुशी से ग्रहण करती हुई सी लगती हैं। 'होलियर दैन दाऊ' वाला भाव। जिनको ये व्रत बकवास लगते हैं वे भी रह ही लेती हैं।

आधारताल के लिए इस बार दूसरे रस्ते गए। लोग बोले लम्बा है। हम सोचे इसी से जाएँ। शार्टकट तो सब जाते हैं। हम जरा लांग कट मारे।

एक बिजली के खम्भे के पास कुछ लोग बतकही कर रहे थे। हम रास्ता पूछने के बहाने उससे बतियाने लगे। लोग एक दुसरे की आपस में खिंचाई कर रहे थे। हम बतियाने लगे तो हम भी शामिल हो गए उसमें।
इस बीच एक मोटर साइकिल सवार खूब सारे कमल के फूल हैंडल पर लादे वहां आया। खुद का तालाब है उसका। उसमें से फूल तोड़कर जा रहा था बाजार। पांच रूपये का एक के हिसाब से बेंचने। हमने फोटो लेने के लिए पूछा तो बोला -पैसे पड़ेंगे। हमने कहा-दे देंगे। फिर हम खींचने के पैसे लेंगे। इस पर वह हंसने लगा। उसकी हंसी फोटो खींचने की अनुमति थी।


वह मोटर साइकिल वाला चला गया। उसी गली से महिलाओं का एक और दल निकला पूजा के लिए जाते हुये। वहां बतियाते हुए लोगों में से दो लोग खड़े हुए तो उनका भी फोटो 'हैंच' लिए। आगे बढ़े।

घरों के बाहर महिलाएं झाड़ू लगाती, देहरी पर बैठे दिखीं। एक बच्चा एक बच्ची के साथ खेलता, धक्कम-मुक्का करता सड़क पर दौड़ रहा था। भाई बहन रहे होंगे शायद।

बिरसामुंडा चौराहे पर चाय की दुकान पर एक आदमी ने वहां बैठे एक कामगार को थपड़िया दिया। हम जब पहुंचे तो उसका थपड़ियाने के बाद का प्रवचन चल रहा था। हमने जब पूछा कि क्यों मारा इसको तो उसने बताया-' अरे भाईसाहब, हम कल अपनी वाइफ के साथ खड़े थे। ये साला दारु पीकर हमारे पीछे खड़ा हमारी बातें सुन रहा था। कल कुछ नहीं बोला मैं। वाइफ साथ में थीं। लेकिन हमने सोच लिया था छोड़ेंगे नहीं इसको।' यह कहते हुए उसने अपना थप्पड़ कर्म सही ठहराया।

मार खाने वाले आदमी ने मिमियाते हुए अपना प्रतिवाद करना चाहा। इस पर वह फिर उसको मारने के लिए झपटा। साथ के आदमी ने मार खाये आदमी को प्रतिवाद करने से घुड़कते हुए मना किया। थपड़ियाने वाला वीर बालक चला गया।


इसके बाद मारे गए व्यक्ति ने बताया--हम काम के लिए खड़े थे। उधर लोग काम वाले लोगों को लेने के लिए खड़े थे। हम वहीं जाकर खड़े हो गए। इस पर इन्होंने मुझे आज मारा। देखिये आँख के नीचे निशान पड़ गया।

कन्नी वसूली लिए मजूरी के लिए निकले एक आदमी को दूसरा इस शक के आधार पर पीट देता है कि उसने उसकी पत्नी के साथ हुई बातें सुनने की कोशिश की। यह कुछ ऐसा ही हुआ जैसे अमेरिका ने इराक को इस शक के आधार पर बम-बर्बाद कर दिया कि इराक के पास रासायनिक हथियार हैं।

हर आदमीं के अंदर एक अमेरिका होता है जो अपने से कमजोर को इराक समझकर अपना अमेरिकापन दिखाता है।

दयनीय आवाज में अपनी पीड़ा बयान करते हुए उसने कहा- हमको मारकर बड़ा बहादुर बन रहे। कोई तुमसे तगड़ा मिलेगा तब समझ आएगा।

उस मार खाये आदमी की आवाज सुनकर निराला की कविता पंक्ति याद आई:

'वह मार खा रोई नहीं।'

चौराहे पर शिव पार्वती की मूर्तियां बिक रहीं थीं। चाय की दुकान पर साइकिलों पर अख़बार लादे हॉकर खड़े थे। अख़बार बांटने के लिए निकलने के पहले चाय पी रहे थे। एक बच्चे ने बताया कि वह बीएससी कर चूका है । अब सोच रहा है आई टी आई का फार्म डाल दे।

आई टी आई हाईस्कूल/इंटर के बाद करते हैं। यह बच्चा बीएससी के बाद करने की सोच रहा। यह तो कुछ नहीं।खबर आई थी कि उत्तर प्रदेश में सैकड़ों पी एच डी किये लोग चपरासी की नौकरी के लिए अप्लाई किये हैं जिसकी अहर्ता 5 पास है।

लौटते हुए मुन्ना की दुकान पर हवा भरवाये। उनकी बोहनी हुई 4 रूपये से। चाय की दुकान पर रमेश के साथ चाय पी। फिर ओवर ब्रिज के नीचे बने दीपा के घर आये। वह अपने पापा के साथ खाना बना रही थी। पूड़ी के लिए लोई बना रही थी। चूल्हे में जो लकड़ी थी वह किसी खटिया का पावा था। धुंआ उठ रहा था।

हमने दीपा को बिस्कुट के पैकेट दिए। बताया कि हमारा जन्मदिन था उस दिन। उसने हैप्पी बर्थडे बोला। हमने पूछा कि शाम को तुम्हारे लिए चॉकलेट लायेंगे। कौन सी खाओगी। बोली -कैडबरीज वाली।

फिर शाम को ले गए थे चॉकलेट और एक घड़ी। उसके बाद का किस्सा तो आप बांच ही चुके हैं।

जन्मदिन पर सभी मित्रों की शुभकामनाओं का जबाब देते हुए आभार दे रहे हैं। अभी तक टाइम लाइन, व्हाट्सऐप वाली शुभकामनायें निपट गयीं। पोस्ट पर जो आई उनके लिए आभार देना है।


आपका दिन मंगलमय हो। शुभ हो।

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Friday, September 18, 2015

'याद बटन' डिसेबल कर दिया जाए

मोबाइल का नेट कनेक्शन ऑफ करने से पहले ऐसे ही ख्याल आया कि क्या ऐसा सम्भव है कि जब मन आये तब मन का 'याद बटन' डिसेबल कर दिया जाए।

दुनिया का तमाम सारा तनाव तामझाम हो सकता है इससे कम हो जाए। चिंता के चलते ब्लड प्रेसर वालों को रोज एक घंटे का 'याद बटन' डिसेबल का डोज। घर,परिवार से दूर रहने वाला जहां घर की याद आई 'याद बटन' बन्द कर लेगा।

पता नहीं फायदे कितने होगें लेकिन नुकसान भी बहुत हो सकते हैं। पता चला आदमी घर से बाहर सब्जी खरीदने निकला और उसका 'याद बटन' बन्द हो गया। वह बीच सड़क में ही स्टेच्यू बना खड़ा रहेगा। कोई उसको किनारे करेगा। घर आकर पड़ा रहेगा।

किसी मित्र ने किसी को मिलने का वायदा किया। एन मौके पर उसका 'याद बटन' दब गया। मुलाक़ात नहीं होगी। फिर कभी मिलने पर शिकवा शिकायत पर बहानेबाजी होगी-अरे निकल लिए थे भाई घर से। लेकिन वो मेमोरी बटन दब तो। भूल गए किधर जाना है।

यह लिखना क्यों शुरू किये थे। भूल गए। लगता है 'याद बटन' दब गया। ठीक है भाई सोते हैं। सारे बटन बन्द करके।:)

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काबिले तारीफ़ अभियान


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Thursday, September 17, 2015

किसी ने अपना बनाके मुझको मुस्कराना सिखा दिया


कल जन्मदिन बीता -शानदार, जबरदस्त, जिंदाबाद।

शुरुआत श्रीमतीजी के फोन से हुई। फिर बच्चों के फोन आये। फिर यादव जी का।यादव जी 75 के हुए पिछले महीने। हमारे परिवार के सब लोगों को बिना भूले जन्मदिन की बधाई देते हैं। उपहार भी। जबकि हमारे साथ कभी काम नहीं किये। उनके बारे में फिर।

इसके बाद एसएमएस, फेसबुक, व्हाट्सऐप पर शुभकामनाओं का सिलसिला। दोस्त लोग हमको बधाई देने के लिए जगे थे। कल पैदाइश के लिहाज दे हमको बच्चा बनने का हक तो था इसलिए अपने लिए इतना प्रेम देखकर मन और मासूम हो गया।

सुबह 4 बजे Sushil Siddharth ने फोन करके शुभकामनाएं दी। हमारी नदी नहाईं फोटो व्यंग्यकारों के व्हाट्सऐप ग्रुप वलेस में लगा दी। अच्छा हुआ बचपन की फोटो नहीं थी कोई उनके पास वरना वो सूप में लेटी हुई कोई दिशा वस्त्र पहने फोटो लगा देते।

साइकिलियाने निकले तो लौटते में बूढ़ा माता बीच सड़क मिली। साइकिल देखकर रुक गयीं कि साइकिल निकल जाये तब सड़क पार करें। हम उनको देखकर रुक गए। फिर सड़क पर ही हाल-समाचार होने लगे। तबियत सबियत। फिर साइकिल से उतर गए और उनको पुलिया पर बैठाकर फोटो लिया। सर पर पल्लू रखकर फोटो खिंचाते हुए एक महिला ने मेरे बारे में दूसरे से पूछा--ई रमेश के साथ काम करत हैं का? रमेश जीसीएफ में काम करते हैं। जबाब मिला -न ई भैया वीएफजे में हैं।

बूढा माता से बात करते हुए मुझे अम्मा की याद आ गयी और फटाक से रोना भी (अभी भी यही हुआ)। लौटते हुए अम्मा से जुडी यादें दोहराता हुआ सोचता रहा कि अगर वो होतीं तो डगमग करती आतीं और --हॅप्पी बड्डे बोलते हुए सदा सुखी रहने का आशीष देतीं। दिन में गुलगुला बनाती। शाम को रोचना लगाती। दूध पिलाती। कह तो अब्बी भी रहीं होंगी जहां भी होंगी वहां से। पर दिख नहीं रहीं। देखने के लिए मुझे अतीत में ही जाना पड़ रहा है।

लौटने पर Alok Puranik काफी देर टेलिवार्ता हुई। हमें लगा कि वो कहेंगे कि व्यंग्य के हाल बड़े खराब है। अब जल्दी से व्यंग्य लेखन भी शुरू कर दो। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा। बल्कि यह कहकर कि रोज का वृत्तान्त अच्छा लिख रहे यही लिखते रहने को कह दिया। संतोष त्रिवेदी का भी फोन आया। इसके बाद देश विदेश से दिन भर फोन आते रहे। देवांशु ने अमेरिका से वायदा कराया कि कानपुर पर लेख लिखेंगे हम।
फिर हमारे Amit Chaturvedi ने फोन किया और बताया कि जबलपुर की संस्था 'कदम' लोगों के जन्मदिन के मौके पर उनसे पौधा लगवाती है।चलेंगे? रात Rajeev Chaturvedi का भी सन्देश आया था इस बारे में। तब मैंने कहा था देखेंगे। पर अमित ने कहा तो फिर पक्का किया जाएंगे।

अमित के साथ नेहरू उद्यान गए। वहां ठीक 10 बजे 3 लोगों ने पौधा रोपा। उसके पहले 'कदम' संस्था के बारे में, उसके उद्देश्य के बारे में बताया। कुछ गीत हुए। पिछले कई सालों से यह संस्था वृक्षारोपण, स्त्रीपुरुष बराबरी, युद्ध विरोध, गरीब बच्चों की शिक्षा और समग्र शिक्षा के उद्देश्य काम कर रही है।

पौधा लगाते हुए जितना अच्छा लगा उससे खुशनुमा एहसास हुआ संस्था के काम करने के तऱीके को देखकर। ठीक 10 बजे। ठीक मतलब ठीक 10 पौधा रोज लगाया जाता है। एक भी सेकेण्ड की देरी नहीं। अगर रास्ते में हुए तो संस्था के संस्थापक अध्यक्ष रस्ते में भी ठीक 10 बजे पौधा लगते हैं।

कदम संस्था के माध्यम से पौधा लगाते हुए जो सुखद अनुभूति हुई वह जिंदगी ने इससे पहले कभी नहीं हुई। मैंने वहां कहा भी-यह पौधा लगाते हुए मैं मन से हरा हो गया। आज पहली बार आया पर मुझे लग रहा कि यह संस्था मेरी अपनी है। आगे हर सम्भव सहयोग देने का प्रयास करूँगा ।

पौधे का नाम देने की बात चली तक एक साथी जिनका भी कल जन्मदिन था उनके बच्चे के नाम पर पौधे का नाम देवा रखा गया। पौधा नम्बर 4079 मेरे मन में भी लगा कल। इसके लिए अमित और राजीव जी का आभारी हूँ। संस्था के बारे में विस्तार से अलग से।

लौटते हुए ‪#‎CNEC‬ के चैनल हेड अमित ने लिखने के मामले में और गम्भीर होने की सलाह देने के पहले लेखन की तारीफ़ भी की। वो तो उसको वापस लौटने की जल्दी थी वरना चाय-वाय पिलाने के बहाने और तारीफ़ सुनते।
शाम को याद आया कि सुबह दीपा को वायदा किया था कि उसको एक घड़ी और चॉकलेट देने का वायदा किया था। बाजार गए। घड़ी मिली नहीं शोभापुर में। गोकलपुर गए। घड़ी और चॉकलेट खरीदी। उसको देने गए। उसके ठीहे तक पहुंचे कि चैन उतर गयी साईकिल की। वहीं अंधेरे में कई बार टटोल के चढ़ाई।

घर में कोई नहीं था उसके। बगल के कारखाने गए। आवाज लगाने पर बाहर आई दीपा। उसको चॉकलेट और घड़ी दी। हाथ में ग्रीस लगे हाथों से घड़ी उसके हाथ में बाँधी। पूछा बताओ कितना बजा है? उसने समय बताया नौ बजकर तीन मिनट। इतने बजे रात बच्ची अकेली थी। पिता रिक्शा चलने गया था।

बच्ची धन्यवाद देकर अंदर चली गयी। तब तक उसके पिता आ गए। आवाज लगाई तो घर गयी। हम भी पहुंचे पीछे। पूछा-देर क्यों हुई इतनी। बोला-दूर की सवारी थी। आते ही वह बर्तन मांजने लगा। हमसे बोला-साहब इसको सिखाओ कि घर के कुछ काम भी कर लिया करे।

हमने पूछा तो दीपा ने बताया कि बर्तन मांजने थे पर हम खेलते रहे। नहीं मांजे। बहुत मासूमियत से उसने यह बताया। मैं यही सोच रहा था कि सहज बचपन से वंचित यह बच्ची आगे चलकर कैसी बनेगी।

सड़क पर लैंप पोस्ट पर लाइट गुल थी। दीपा का पिता बोला-300 रूपये देने होंगे तब लगाएंगे आकर लाइट। जबलपुर स्मार्ट सिटी बनने वाला है। पता नहीं बनने के बाद यह बल्ब अपने आप ठीक हो जाएंगे या इसी तरह लेन देन से ठीक होंगे।

लौटे तो रेलवे क्रासिंग बन्द थी। वहीं खड़े हुए कुछ मेसेज के जबाब दिए। फिर क्रासिंग खुलते ही पैडल पर पैर रखकर भागे।

कमरे में आकर खाना खाया। तब तक डब्बे में केक आया चलकर कमरे पर।मेस में साथ रहने वाले साथियों ने केक कटवाया। सबने साथ मिलकर खाया। पार्टी उधार रही।

कल प्यार बेशुमार मिला। इतना अपना पन मिला कि गाना गाने का मन हुआ:
किसी ने अपना बनाके मुझको मुस्कराना सिखा दिया।
पर गाने के मामले में अपन का गला थोडा तंग है सो आप ऐसे ही समझ जाइए या यू ट्यूब से सुन लीजिये।
जन्मदिन के मौके पर सभी की शुभकामनाओं के प्रति मन से आभार। मित्रों के प्रेम से अविभूत टाइप हूँ।सबकी शुभकामनाओं के प्रति आभार। व्यक्तिगत तौर पर भी सबको धन्यवाद दूंगा। काम शुरू हो गया है। व्हाट्सऐप और फेसबुक मेसेंजर पर काम निपट गया है। बाकी पर अब लगना है।

आपका दिन शुभ हो। मंगलमय हो।

पुनःश्च: कल के मौके पर एक हमारे बहुत ही प्यारे दोस्त ने मेसेज किया -आपको वायदा किया था कि आपके जन्मदिन से सिगरेट छोड़ दूंगा। सो आज से सिगरेट छोड़ दी।

कितना प्यारा उपहार है। मन खुश हो गया। अपने इरादे पर कायम रहना बच्चा।

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Wednesday, September 16, 2015

पहिने कुरता पर पतलून आधा फागुन आधा जून

.........और ये मजाक-मजाक में अपन 52 साल के हो लिए आज।

इससे पहले कि शुभकामनाओं, आशीर्वाद की बौछार होना शुरू हो हम कहना यह चाहते हैं कि:
1. इस सामाजिक माध्यम के जरिये हमको अपने तमाम मित्रों, पाठकों का प्यार बेशुमार मिला।हम उसके लिए बहुत आभारी हैं।

2.कुछ मित्रों ने मुझे इतना अच्छा लेखक बताया कि हम अक्सर सोचते कि शायद ये सच ही कह रहे हों।उसी झांसे में आकर हम लिखते रहे।

3. कई मित्रों ने मेरे बारे में यह धारणा बनाई कि मैं बहुत अच्छा इंसान हूँ। उनकी धारणा को हम गलत भले न ठहराए अपनी तरफ से लेकिन जब किसी से ऐसा सुनते हैं तो अच्छा लगने के साथ जी भी दहल जाता है कि मेरी अनगिनत चिरकुटाइयां और छुद्रताएं उनको पता चलेगीं तब यह धारणा कितनी तेजी से बदलेगी।

4. जिस फेसबुक पर लिखने–पढ़ने के जरिये हमको बहुत मित्र और प्रशंसक मिले उसको बहुत बार बन्द करने की सोचकर बेहतर कुछ लिखने-पढ़ने की सोचते रहे। फेसबुक खाता बन्द नहीँ किया तो सिर्फ इसलिए कि मैंने देखा है कि नियमित लिखने वाला अगर एक बार खाता बन्द करता है तो फिर उसको कई बार यह करम करना पड़ता है।

5. दोस्त लोग हमको बहुत मिलनसार और सामाजिक समझते हैं। जबकि हमें लगता है कि हम अकेलेपन के शिकार हैं। अकेलपन की बोरियत से बचने के लिए स्टेट्स ठेलते रहते हैं। लम्बे स्टेट्स भी इसी बोरियत के चलते लिखते हैं। एक स्टेट्स ठेला नहीं कि बोर होकर दूसरा ठेल दिया। फिर एक और। अगर किसी को हमारे ज्यादा लिखने से कष्ट हुआ तो यह भीड़ का अकेलापन ही उसका कारण है। हम नहीं।

6.पिछले साल दो बार हार्ट बीट 200 से पार हो गयी। तो लगता है कि तबियत भी गड़बड़ा सकती है। उसका ख्याल रखने का कोशिश करने की मंशा है।

7. यहाँ आभासी संसार में इतने बेहतरीन दोस्त मिले कि वे वास्तविक से भी ज्यादा नजदीक लगते हैं। कभी-कभी यह सोचकर डर लगता है कि उनका साथ न छूट जाए। एक यह भी बड़ा कारण है कि कभी-कभी इस आभासी संसार को समय बर्बादी का जरिया मानने के बावजूद यहां से जाने का मन नहीँ करता।

8. सभी मित्रों को जन्मदिन की शुभकामनाओं के लिए अग्रिम धन्यवाद। जो मित्र भूल जाएंगे उनसे हम कहकर शुभकामनाएं ग्रहण कर लेंगे। देरी का कोई सवाल नहीं। शुभकामना खाता साल भर खुला रहेगा।

9. जन्मदिन पर संकल्प लेने की परम्परा है। हमने देखा कि कही कोई पिछला संकल्प उधारी पर तो नहीं चल रहा। देखा कि कोई संकल्प लिया नहीं था पिछली बार भी। इस बार भी वही पालिसी अपनाते हुए कोई संकल्प नहीं ले रहे। हाँ, यह जरूर मन में है कि जितना अभी हैं उससे बेहतर बनने की कोशिश करनी चाहिए।अब बेहतर का कोई मापदण्ड तो है नहीँ तो कहीं पकड़े जाने की सम्भावना बनती नहीँ है।

अब ठीक। अपनी बात कह चुके। 52 साल की बाली उम्र के बाद अब आज से और अब्बी से नई जिंदगी शुरू करते हैं। पुराने सारे अनुभवों और तजुर्बो को तहाकर किनारे रखने के बाद नई शुरुआत। आपकी शुभकामनाएं और प्यार और आशिर्वाद के लिए शुक्रिया।  :)
 
पुनश्च: आज आपको इस मौके पर गाना सुनाने का मन था:

पहिने कुरता पर पतलून
आधा फागुन आधा जून।

खोज रहे हैं। मिलते ही सुनवायेंगे।

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Tuesday, September 15, 2015

हम तो बाहरै गाड़ी चला रहे

कल रात खाना खाने के कुछ देर बाद ही सो गए। रात में कई बार गर्मी लगी। मन किया एसी चलायें पर एक तो आलस दूसरे यह सोचकर कि चलाएंगे तो कुछ देर बाद फिर बन्द करने उठना पड़ेगा नहीं चलाये। आलस ने कुछ बिजली और कुछ पर्यावरण का नुकसान बचाया। फिर भी लोग बुरा मानते हैं आलस को । भलाई का जमाना नहीं दुनिया में।

किसी रेलगाड़ी की शहर आने के पहले चेनपुलिंग करके कुछ यात्री शहर के बाद उतर जाते हैं वैसे ही नींद गाड़ी की पहली क़िस्त पूरी हुई 3 बजे। घड़ी देखकर फिर सो गए तो सुबह के प्लेटफार्म पर पहुंचे 5 बजे। अलार्म बजते ही फौरन बन्द कर दिया। आजकल हर अनचाही आवाज को फौरन बन्द करने का रिवाज भी है न।

लेते-बैठे कुछ देर सर्फियाते, टिपियाते और स्टेटसियाते रहे। साढ़े 6 बजे साइकिल स्टार्ट करके निकल लिए सुबह सैर को। रात जो बरमूडा पहले थे वही और उसके ऊपर शर्ट पहनकर निकल लिये। बाहर निकले तो लगा जो भी सड़क पर टहल रहा है उसकी निगाह हमारे कपड़े की तरफ है। सवाल करती हुई -ये घुटन्ना पहन के निकल लिए आज !!

कपड़े हमारे शरीर की विपरीत मौसम से रक्षा से के लिए होते हैं। हमने उनको इज्जत की रक्षा के काम में लगा दिया है। बेचारे कपड़े और शरीर दोनों की आफत है। यह लिखते हुए मुझे सुनील दीपक की वह पोस्ट याद आई जिसमें एक फोटोग्राफर ( स्पेंसर ट्यूनिक) वस्त्र रहित लोगों के समूह फोटो लेता है। स्पेन्सर ट्यूनिक की ख़ासियत है कि वे दुनियाभर की मशहूर इमारतों और सड़कों पर बड़े पैमाने पर पूरी तरह नग्न हुए जनसमूह की तस्वीरें खींचते हैं। समन्दर किनारे लहरों के आकार, ऊंचे पुलों पर तनी कमान की शक़्ल में बनी कतारें, ऊंची इमारतों की दीवार तो पिरामिड-सा आकार बनाए सैकड़ों नग्न लोग इस फ़ोटोग्राफ़र स्पेन्सर की कला का अहम हिस्सा हैं। पोस्ट का लिंक यह रहा: http://priestofbeauty.blogspot.in/2007/05/blog-post_16.html


चाय की दुकान पर शंकर पासवान ड्राइवर मिले। बक्सर जिला के रहने वाले हैं। जमशेदपुर से शनिवार को आये हैं। टायर कुछ कमजोर हो गया था तो उसको रिसोल करवाने के लिए रुक गए। आजकल में जाएंगे। लौटानी का सामान नहीं मिलेगा तो चल जाएंगे भोपाल। ढेर माल मिल जायेगा लादने के लिए।

शंकर 14/15 साल की उम्र से खलासी का काम शुरू किये। 4 /5 साल किये। कई ड्राइवर के साथ रहे। पहले कोई सिखाया नहीँ ट्रक चलाना। फिर एक ड्राइवर सिखाया। बाद में ऊ ड्राइवरी छोड़ दिए। आजकल गुरु जी बगोदर में अपना होटल चलाते हैं।

बगोदर का सुनकर हमको 6/7 जुलाई,1983 का वो दिन याद आ गया जब हम साइकिल से अपने साथी विनय अवस्थी और दिलीप गोलानी के साथ बगोदर हाईस्कूल के बच्चों के साथ हॉस्टल में रुके थे। सुबह 7 जुलाई को विनय अवस्थी का जन्मदिन था। बच्चों ने वहीं के फूलों से माला पहनाकर जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं थीं। हमें स्कूल के अलावा कुछ याद नहीँ है पर हमें लगता है हम बगोदर से बहुत गहराई से जुड़े हैं। यादें ऐसी ही होती हैं। http://fursatiya.blogspot.in/2006/03/blog-post_5.html?m=1

महेश कक्षा 5 पास हैं। 10 साल से ड्राइवरी कर रहे। तम्बाकू के अलावा और कोई नशा नहीं। तम्बाकू रगड़ते हुए हमसे पूछा- खाइयेगा?बहुत बढ़िया होता है बिहारी खैनी। हम मना कर दिए।

घर में पत्नी और दो बच्चे हैं। एक लड़का-एक लड़की। भाई है उसको पढ़ा रहे हैं।

साथ में खलासी रहता है। लेकिन इस बार उसकी तबियत खराब हो गयी तो मालिक को ही ले आये। बोले चलो साथ में। यहां घर बैठे-बैठे घड़ी-घड़ी पूछते रहते हो कहां तक पहुंचे। देर किधर हुई। तो साथ में रहने पर पता तो चलेगा क्या तकलीफ होती है सड़क पर।

जमशेदपुर से जबलपुर आने जाने के एक चक्कर में 8000 रूपये तक बचता है। घर में दो छोटी बसें भी खुद की चलती हैं शंकर की। हमने कहा -तुम तो बड़े आदमी हो तो मुस्कराये।

थोड़ा लंगड़ाकर चलते हैं शंकर। बताया कि एक बार नीचे कुछ टाइट कर रहे थे। टायर के नीचे पटाला ठीक से लगा नहीँ था। पहिया पैर पर आ गया। फिर दूसरे ड्राइवर ने गाड़ी बैक की। फिर इलाज चला ।

रास्ते में जहां नींद आ जाती है गाड़ी किनारे करके सो लेते हैं। अमूमन 3 बजे से सुबह 8 बजे तक गाड़ी नहीं चलाते। सोते हैं। इस समय नींद बहुत आती है।

बिहार के चुनाव में कौन जीतेगा इस सवाल के जबाब में बोले- हम तो बाहरै गाड़ी चला रहे। त कैसे बताएं कौन जीतेगा। पर टक्कर तीन लोग में है -लालू, मांझी और नितीश। इसमें माझी का हवा तगड़ा है। देखिये जो होगा पता चलिए जाएगा।

शंकर को छोड़कर हम वापस लौट आये। पुलिया पर छोटी बाई सुस्ता रहीं थीं।मड़ई से गौरा-पार्वती लेकर बेंचने जा रहीं थीं कंचनपुर। रास्ते में तक गयीं तो पुलिया पर सुस्ताने लगीं। कल तीजा व्रत है। उसमें पूजा होती है गौरा-पार्वती की।

घर में पति के अलावा तीन बच्चे हैं। तीनों लड़के। दो यही कुम्हारी का काम करते हैं। कोई आठ तक पढ़ा कोई साथ तक । एक अभी भी पढ़ता है।

हमने पूछा-तुम भी रहती हो व्रत? बोली- पहले रहते थे। एक बार घर में किसी की मौत हो गयी तो व्रत खण्डित हो गया। रहना बन्द कर दिया।

सुबह घर में सबको चाय पिलाकर निकली हैं। अब 11 बजे तक बेंचकर वापस पहुंचेंगी तब खाना बनाएंगी।
बात करते हुए जाने का समय हो गया उनका। हाथ के अंगौछे को गोल बांधते हुए सर पर रख लिया तब हमने कहा फ़ोटू ले लें। कहने पर ढंके हुए गौरा-पार्वती को एक तरफ से खोल दिया। पीठ दिखने लगी मूर्तियों की। हमने फोटो लिया। दिखाया। मूर्तियों का पटरा उनके सर पर रखवाया। वापस चले आये।

आप अब मजे करें। आपका दिन शुभ हो। मंगलमय हो।

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तमाम काम अधूरे पड़े रहे मेरे

मैं रोज मील के पत्थर शुमार (गिनती) करता था
मगर सफ़र न कभी एख़्तियार (शुरू)करता था।

तमाम काम अधूरे पड़े रहे मेरे
मैँ जिंदगी पे बहुत एतबार (भरोसा)करता था।

तमाम उम्र सच पूछिये तो मुझ पर
न खुल सका कि मैं क्या कारोबार करता था।

मुझे जबाब की मोहलत कभी न मिल पायी
सवाल मुझसे कोई बार-बार करता था।

मैं खो गया वहीँ रास्तों के मनाजिर (मंजर) में
उदास रह के कोई इंतजार करता था।

-वाली असी

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समझते थे, मगर फिर भी न रखी दूरियाँ हमने

समझते थे, मगर फिर भी न रखी दूरियाँ हमने
चरागों को जलाने में जला ली उंगलियाँ हमने।

कोई तितली हमारे पास आती भी तो क्या आती
सजाये उम्र भर कागज़ के फूल और पत्तियाँ हमने।

यूं ही घुट घुट के मर जाना हमें मंज़ूर था लेकिन
किसी कमज़र्फ पर ज़ाहिर ना की मजबूरियाँ हमने।

हम उस महफिल में बस इक बार सच बोले थे ए वाली
ज़ुबान पर उम्र भर महसूस की चिंगारियाँ हमने।

-वाली असी

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Monday, September 14, 2015

सबको हिंदी सीखनी चाहिए

सबेरे एक मधुमक्खी दिखी थी नहानघर में। काटा नहीं उसने तो हम उसको ऐसे ही छोड़कर चले गए दफ्तर।
अभी शाम को फिर देखा तो वह बाशबेसिन के शीशे पर चुपचाप बैठी थी। लगा दिन भर इधर-उधर उड़ते- उड़ते थक गयी होगी। हम उसको शीशे पर बैठा छोड़कर आकर लेट गए।

फिर लेते-लेते सोचते रहे कि क्या पता वह भूखी हो।कुछ खाने को न मिला हो दिन भर।

कुछ देर सोचने के बाद पैंट की जेब से रुमाल निकाला। उसमें लपेटकर उसको बाहर छोड़ दिया। छोड़ते समय रुमाल इतनी तेज झटका कि लगा कन्धा एक बार फिर उतर जायेगा।

अब अंदर आकर फिर सोच रहे हैं कि कहीँ ऐसा तो नहीं कि उसका मन कमरे के अंदर ही रहने का कर रहा हो। हमने उसे बाहर छोड़ दिया तो वह दुखी हो गयी हो। क्या पता दिन भर में उसकी किसी से दोस्ती हो गयी हो और बाहर कर देने से उससे उसकी दूरी बढ़ गयी हो और वह उदास हो।

अगर मधुमक्खी हिंदी जानती होती तो वह अपने मन की बात मुझे बता देती और हम उसके हिसाब से उसके साथ आचरण करते।

इसीलिये कहते हैं कि सबको हिंदी सीखनी चाहिए।

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निज भाषा उन्नति अहै


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Sunday, September 13, 2015

नदी में नहान

ट्रेन में साथ के बच्चे से बातचीत शुरू की तो पता चला कि तक्षशिला इंजीनियरिंग कालेज से सिविल की पढ़ाई कर रहा है। तीसरे सेमेस्टर में। मनसौर गाँव का रहने वाला है।पढ़ाई के बारे में पूछा तो बोला ठीक होती है। हमने पूछा-ठीक होती है तो बच्चे ट्यूशन क्यों पढ़ते हैं पास होने के लिए। बोला-हम नहीं पढ़ते।

पिता किसान हैं। भाई एमबीए करके नौकरी कर रहा। बहन आंगनबाड़ी में। अनुसूचित जाति का होने के चलते 40000 रूपये फीस के पैसे छात्रवृत्ति से मिल जाते हैं। रहवासी भत्ता 2000 मिलता है। 3 लड़के मिलकर रहते हैं। खर्च चल जाता है।

रुचियाँ पूछने पर बताया- चेस खेलते हैं, क्रिकेट खेलते हैं, रनिंग का शौक है। हमने पूछा -कोई लड़की दोस्त है? कान तक मुस्काते हुए और लाज लाल होते हुए बोला बालक- नहीँ । हमने पूछा -क्यों क्या साथ में कोई लड़की नहीं पढ़ती? इस पर बालक बोला- पढ़ती है पर गर्ल फ्रेंड नहीँ। हमने पूछा- क्यों नहीं? बोला-इत्ता पैसा नही। हमने पूछा- गर्ल फ्रेंड से लड़की क्या सम्बन्ध? चाय,काफी या पिक्चर का खर्च होता होगा। कभी तुम कभी दोस्त।और क्या खर्च चाहिए।

उतना तो भर तो चल जायेगा। लेकिन ..............। यही भर बोला बालक और फिर चुप।

हमको लगा शायद और मंहगा हिसाब है दोस्ती में। जो हमको पता नहीं। याद आया पिछले दिनों जबलपुर कुछ बच्चे पकड़े गए थे जो मोबाईल चोरी करके बेंचकर अपनी दोस्तों को उपहार देते थे।


गाड़ी सुकरी मंगेला में रुकी। स्टेशन सन् 1957 के पहले का बना लगा। बाहर साइकिल खड़ी थी। लगता है इसी साइकिल का मॉडल देखकर मैकमिलन ने पहली साइकिल बनाई थी।

स्टेशन से एक महिला चढ़ी। मूंगफली और चने बेंच रही थी। दोनों 5 रूपये की। पूछा टिकट लिए हो तो बोली- टिकट लेंगे तो सब पैसा तो इसी में खर्च हो जायेगा। 5 रूपये के चने लेकर चबाते हुए शिकारा पहुंचे।

स्टेशन पर चाय की दुकान पर समोसा, पकौड़ी, गुझिया और चाय का नाश्ता किया। स्टेशन को, प्लेटफार्म पर खड़ी ट्रेन को और खिड़की से झांकते यात्रियों को देखते रहे। प्लेटफार्म पर ही हाथ से ऊपर नीचे किया जाने वाला सिग्नल भी लगा था। आदमी गया। सीढी से ऊपर चढ़ा। चाबी लगाई। सिग्नल घुमाकर उतर आया।


स्टेशन पर छोटे बच्चे एक छोटी पुड़िया में कुछ रखे बेंच रहे थे। 2 रूपये की एक पुड़िया। छोटे-छोटे बीज। कह रहे थे इसको खाने से जुकाम नहीं होता। फोटो खींचने की बात पर एक बोला -हम नहाये नहीं हैं। फिर सब सटकर बैठ गए। फिर देखते हुए बोले-मस्त आई है। कुछ ने बड़ी करके देखी।

एक बच्चे के साथ हम पास ही बहती कैमर नदी तक गए। दो लोग नदी में मोटरसाइकिल धो रहे थे। एक नहा रहा था। एक महिला नहाने के बाद कपड़े धो रही थी। हमने भी नदी किनारे कपड़े उतारे और उतर गए नदी में। नदी के पत्थर रपटीले थे। सीमेंट का चबूतरा था नदी के आरपार। वहां भी फिसलन थी। हम बहुत आहिस्ते-आहिस्ते चलते हुए नदी के बीच तक आये। करीब आधा घण्टा नदी के पानी में बैठे रहे।

मन किया अज्ञेय की तरह नदी के बीच कोई कविता पढ़कर रिकार्ड की जाये। पर मोबाईल किनारे छोड़ आये थे। रमानाथ जी की कविता पंक्ति याद आई:
आज आप हैं हम हैं लेकिन
कल कहां होंगे कह नहीँ सकते
जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।
नदी का पानी नीचे ठंडा ऊपर कुछ गर्म था। नीचे से लेकर पानी ऊपर तक लाते हुए इस ताप बदलाव को महसूस किया। नदी के प्रवाह को महसूस किया। फिर आहिस्ते-आहिस्ते पानी के बाहर आ गए।नदी अब मन में बह रही थी ।

बाहर आकर खुद फोटो लिया। फिर कुछ बच्चे दिखे तो उनसे कहकर फोटो खिंचवाया। फिर पानी में उतरकर। बाहर आकर फैंटम पोज में भी। फिर देखा तो बच्चों ने अपनी भी कई फोटो/सेल्फी खींची थीं। 11 वीं में एग्रीकल्चर में पढ़ते हैं बच्चे।


दूसरे किनारे पर महिला नदी में नहाने, कपड़े धोने और सुखाने के लिए फैलाने के बाद घर के लिए लकड़ी इकट्ठा कर रही थी। घर में मिस्टर और तीन बच्चे हैं। एक की शादी हो गयी। दो की करनी है। पास ही रहती हैं। फोटो देखकर मुस्कराई और बोली-बढ़िया तो आई है।  :)


स्टेशन पर आकर पता चला गाड़ी आने में देर है। टिकट घर वाला बोला -टिकट अभी नहीं मिलेंगे। जब ट्रेन आएगी उसके एक घण्टे पहले मिलेंगे। हमने कहा ऐसा क्यों? बोला-लोग टिकट वापस करते हैं ट्रेन न आये तो।हमने कहा-हम न करेंगे। दे दो टिकट। उसने दे दिया।

टिकट खिड़की के पास ही चाय की दुकान के कर्मचारी पाँव पसारे सांचे से गुझिया बना रहे थे और बोरी पर रखे आलू काटकर महीन कर रहे थे।


हम चाय की दुकान वाले लक्ष्मीकांत खण्डेलवाल जी से बतियाने लगे। बताये कि वो जबलपुर से एमएससी और वकालत पढ़े हैं। नयनपुर के रहने वाले। वहां अदालत थी नहीं पहले। फिर चाय की दुकान की।पहले नयनपुर फिर शिकारा । सुबह 6 बजे से रात 9 बजे तक दुकान चलती है। तब नौकरी पीछे घूमती थीं। की नहीं पारिवारिक समस्याओं के चलते। लड़का एमबीए करने के बाद जबलपुर में जॉब तकनीक सिखाता है लोगों को।

जबलपुर से कई और लोग भी आये हैं। हर एक के पास कैमरा। कुछ के पास स्टैंड भी। सुबह 530 की गाडी से आये थे। फर्स्टक्लास में। 150 लगा होगा किराया। हम 15 रूपये में आये। अब साथ में लौट रहे हैं।


ट्रेन आई तो ड्राइवर ने टोकन प्लेटफार्म पर फेंका । स्टेशन लाइनमैन से टोकन लिया। कुछ देर में गाडी चल दी जबलपुर के लिए। खटर खट, खटर खट, खटर ख़ट करते हुयी।

हम आलोक धन्वा की कविता याद करते हुए वापस लौट रहे हैं:
हर भले आदमी की
एक रेल होती है
जो उसकी माँ के घर की ओर जाती है
सीटी बजाती हुई
धुंआ उड़ाती हुई।

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