Wednesday, July 27, 2016

चींटा और आदमी

रिक्शे में गेंद हैं
दो दिन पहले किसी काम के सिलसिले में हम लोग खुले में खड़े थे। काम चल रहा था। जिम्मेदारी और दिखावे के के लिहाज से कार्यस्थल पर ही खड़े थे। काम में कोई योगदान देना नहीं था सो देश दुनिया की चिंता करने लगे।

कवि यहां यह नहीं कहना चाहता कि जो देश दुनिया की चिंता करते हैं वे सब निठल्ले होते हैं। उसका मतलब शायद यह है कि जब आदमी निठल्ला होता है तो देश और दुनिया के बारे में चिंतन करने लगता है।

खुले में खड़े थे।आसमान साफ़ था। जमीन पर जगह-जगह बारिश का पानी टाइप जमा था। जहां पानी संगठित था, ज्यादा जमा था वहां तो जमा रहा। लेकिन जहां जमीन पर पानी पाउडर की पर्त सरीखा बस नाम को था उसे सफाई पसंद सूरज भाई किरणों की गर्मी के लाठी चार्ज से तितर-बितर कर दे रहे थे। वहाँ जमीन सूख रही थी। 


इसीबीच देखा कि एक लाल चीटा अपने से कई गुना बड़ा लगभग गोल आकार का एक बोझा इधर-उधर धकिया के ले जा रहा था। गोल बोझे का व्यास चीटे की कुल लम्बाई से कुछ ज्यादा ही रहा होगा। आयतन तो कई गुना रहा होगा उसके शरीर से। लेकिन लगता है वजन उतना नहीं था क्योंकि उसको वह इधर-उधर ठेले चला जा रहा था।

वजन ठेलता हुआ चीटा वजन को दो-चार इंच एक तरफ ले जाता। थक जाता तो ठहर जाता। थोड़ी देर रुकता। फिर दूसरी तरफ ठेलने लगता। मने जैसे दुनिया भर की सरकारें करती हैं। एक सरकार से एकदम उलट काम दूसरी सरकार करने लगती है।

बीच-बीच में चीटा उस वजन पर उचककर चढ़ जाता। उसकी इधर-उधर घूमती गर्दन देखकर लगता उस वजन को मंच समझकर भाषण दे रहा है। शायद भाइयों और बहनों भी कह रहा हो। क्या पता यह भी कह रहा हो कि पिछले कई दिनों से यह बोझ यहां रखा था लेकिन किसी को चिंता नहीं कि इसे आगे ले जाए। यह कहकर वह उस वजन से उतरता और फिर उसको उस दिशा की उलटी दिशा में ठेलने लगता जिधर वह थोड़ी देर पहले ठेल रहा था।


लग रहा है कोई रबर का पुल लिए जा रहा है रिक्शेवाला
दस मिनट तक देखते रहे। वजन जहां था लगभग वहीं बना रहा। लेकिन चीटा लगातार पसीने-पसीने होता रहा। यह भी हो सकता है कि चीटे ने इस काम को कोई नाम दिया हो। हर बार रुक कर इसका नाम बदल दिया हो। हर बार नाम बदलकर हल्ला मचाता कि हमने बहुत बदलाव कर दिया।

यह कुछ ऐसे ही जैसे लोकतांत्रिक देशों में सरकारें जिलों,प्रदेशों , परियोजनाओं के नाम बदलकर बिना कुछ काम किये अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटती हैं।

खैर छोड़िये चीटे को । आइये आपको आदमी के किस्से सुनाते हैं। कल देखा कि एक रिक्शेवाला अपने रिक्शे से कई गुना ज्यादा लम्बा बोझ लादे चला जा रहा था। रिक्शा मारे वजन के हिल रहा था । पता चला कि रबर वाली रिक्शे में रबर वाली गेंदें लदी हुई थीं। दादानगर के किसी कारखाने में बनी थी। नौघड़ा की किसी दुकान में जा रही थी बिकने के लिए।

आकार देखकर लगा कि कोई ' रबर फ्लोट' रिक्शे पर लदा चला जा रहा हो।

रिक्शा वजन के बोझ से हिल रहा था। उसको देखकर मुझे दो दिन पहले अपने से कई गुना बड़ा वजन ढोता चीटा याद आया। बस फर्क यही दिखा कि चीटा बहुत फुर्ती से यह काम कर था। जबकि रिक्शेवाला बड़े बेमन से किसी तरह बोझ ढो रहा था।

यह भी मजे की बात कि फ़ैक्ट्री में चीटे को जिस जगह देखा था उस जगह 'रबर फ्लोट' बनते हैं और रिक्शे पर जो आकृति बनी थी गेंद के बोझ की वह भी एक रबर फ्लोट सरीखी ही लग रही थी।

चींटे और आदमी की तुलना करना ठीक नहीं। दोनों में कोई तुलना नहीं लेकिन याद पर क्या बस। आ गई तो आ गई। क्या किया जाए। याद पर बस भी तो नहीं चलता।

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Sunday, July 24, 2016

अजनबी तुम जाने पहचाने से लगते हो

कल निकल लिए समय पर दफ़्तर के लिए। लेकिन लगा कुछ ऐसा कि गुरु देर हो गयी। ऐसा लगते ही गाड़ी सरपट हाँकी। एक्सिलेटर जरा जोर से दब गया तो गाड़ी जोर से हुँहुआई। मानो बोल रही हो -'जय बजरंगबली।' शनिवार के दिन लगता है शनीचर सवार हो गया था गाड़ी पर सुबह-सुबह।
यह भी हो सकता है कि जयबजरंग बली की जगह बोली हो - ' काहे जान आफत किये हो बुढ़ौती में हमारी। सुबह-सुबह दौड़ा दिए।' कहते हुए ढेर सारा धुंआ मय पेट्रोल सड़क पर उगल दिया। सड़क किनारे के पेड़ो की पत्तियों ने हिलडुल कर अपनी जान धुएं के कार्बन डाइआक्साइड से बचाने की कोशिश की। कुछ टहनियों ने पत्तियाँ ऊपर की तरफ उचका लीं जैसे महिलाएं पानी भीगी सड़क पर गीली होने से बचाने के लिए साड़ी उचका लेती हैं। कुछ तो साथ में खुद भी थोड़ा उचक जाती हैं।
कुछ पत्तियाँ धुंए से खांसने लगीं। कुछ टहनियां कहने लगीं -'इससे अच्छा तो जंगल में पैदा करता भगवान हमें। कहां लाकर खड़ा कर दिया सड़क किनारे।'
इस पर कोई टहनी बोली-'खुदा का शुकर मनाओ हाई वे किनारे खड़े हो। किसी जंगल में होते तो क्या पता अब तक कट-कुटा के कहीं हिल्ले लग गए होते। हाई वे पर कम से कम जिंदगी तो सुरक्षित है। कटोगे तो नहीं। एक नम्बर तो है हमारे पास। पेड़ का नम्बर होना बड़ी बात है। अमेरिकन वीसा और आधार कार्ड मिलने जैसा है पेड़ को नम्बर मिलना। न जाने कित्ते गुमनाम पेड़, जिनका कोई नम्बर नहीं है, रोज कट जाते हैं। कुछ पेड़ तो इसलिए कट जाते हैं ताकि जगह खाली हो और वृक्षा रोपण किया जा सके।'
पेड़ पर और कोई न जाने क्या बोला हम सुन नहीं पाये। लेकिन यह आगे बढ़ते हुए यह जरूर देखा कि ऊपर की पत्ती सामने खिले फूल को देखते हुये इठला रही थी और हवा के साथ सीटियां बजाते हुए शायद गाना गा रही थी -'अजनबी तुम जाने पहचाने से लगते हो।'
सेक्टर 4 मतलब फजलगंज और जरीब चौकी के बीच एक बच्चा साईकल का टायर अपने हाथों के सहारे हांकता हुआ भगा चला जा रहा था। कुछ देर पहिये को लुढ़काने के पहिया एकदम सीधा होकर चलने लगा। बच्चा खुश सा होकर कुछ देर चलाता रहा उसको। फिर एक खुली दुकान पर बैठ गया। टायर को गोद में रख लिया। बच्चे को टायर गोद में रखे देखकर एयरपोर्ट में जहाजों का इन्तजार करते लोग याद आये। लोग जहाज का इन्तजार करते हुए बैठते हैं। बच्चा पता नहीं किस चीज के इंतजार में था।
बच्चे के बगल में ही एक बच्चा पीठ पर बस्ता लादे स्कूल जाने के इंतजार में खड़ा था। शायद बस या रिक्शे के इंतजार में हो। एक ही उम्र के बच्चों के लिए अलग-अलग स्कूल हैं। टायर खेलता बच्चा बिना पैसे के जिंदगी के स्कूल में दाखिल हुआ और बस्ते वाला बच्चा फ़ीस वाले स्कूल ने जा रहा है। शायद आना दोनों को बाद में सड़क पर ही है। जिंदगी के स्कूल वाला बच्चा पहले आ गया।
साईकल के टायर से खेलते बच्चे को देखकर याद आया कि कई दोस्त पुराने दिनों को याद करते हुए लिखते हैं कि अब टायर नहीं चलाते लोग, उतरे कपड़े नहीं पहने जाते। दुनिया बदल गयी है। मुझे लगता है दुनिया बदलती नहीं है। कुछ सीन भले बदल जाते हों। जो दुनिया कल तक हमारे लिए थी वो किसी दूसरे के हिस्से में आ जाती है। बड़े होने पर नए कपड़े मिल जाते कुछ लोगों को तो पुराने कपड़े दूसरों को मिल जाते हैं। यह सब कुछ दीखता भले न हो लेकिन खत्म नहीं होता। अभाव, गरीबी, गैरबराबरी लगता है अमरौती खाकर आये हैं।
बगल की गली में एक महिला अपने घर की देहरी पर बैठी न जाने क्या सोच रही थी। शायद उस तक अभी स्मार्टफोन नहीं पहुंचा। पहुंचता तो सुबह-सुबह वाली गुड मॉर्निंग कर रही होती मित्रों से।
दिन में फिर एक आदमी दिखा टायर लुढ़का कर ले जाते हुए। गोल होने के चलते टायर की नियति ही लुढ़ककर चलना है। जब तक बेरोजगार रहता है, हवा नहीं भरती तक तक आराम से लुढकता है। जहां हवा भर जाती कोई पहिया मिल जाती है, सरपट भागने लगता है। हवा से बातें करता है। एक मिनट की फुर्सत नहीं मिलती। जुटा रहता है कार को आगे ले जाने में जैसे कामगार अपनी कम्पनी को आगे ले जाने में जुटे रहते हैं। दोनों को तब तक छुट्टी नहीं मिलती जब तक पंचर न हो जाएँ।
एक साईकल वाले भी दिखे कल। कन्धे पर लोहे के पाइप लादे साईकल हांकते चले जा रहे थे आगे। जितनी तल्लीनता से वे कन्धे पर पाइप लादे चले जा रहे थे उतने मनोयोग से अगर देश के कर्णधार देश को आगे ले जाते तो देश न जाने कहां पहुंच गया होता। लेकिन कर्णधारों को गाली -गुप्तारी की नौटँकी से फुरसत मिले तब न।
खैर, छोड़िये ई सब। आप मजे करिये। इतवार है। कुछ की छुट्टी भी होगी। सो मजे करिये। बाकी तो सब चलता ही रहता है। है कि नहीं। बस जरा मुस्कराते रहिये। मुस्कान पर अभी तक कोई टैक्स नहीं लगा। मुस्कराते हुए लोग खूबसूरत भी लगते हैं। यकीन न हो तो देखिये मुस्कराकर। ऐसे 
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, बाहर
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, बैठे हैं, बच्चा और बाहर
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Saturday, July 23, 2016

सूरज भाई बड़ी तेज हंसे



चित्र में ये शामिल हो सकता है: 2 लोग, लोग खड़े हैं, लोग पैदल चल रहे हैं और बाहरआज सुबह नहाने गये। जैसे ही पानी मग में भरा तो देखा कि सूरज भाई भी घुस खिड़की के रास्ते। हमने कहा -’ भाई जी आप भी न पक्के स्टिंगर की तरह हरकतें करने लगे। क्या वीडियो बनाओगे। वायरल करने का इरादा है?’

सूरज भाई बड़ी तेज हंसे। उनके साथ आई किरणें भी खिलखिलाने लगीं। कुछ तो पेट पर चढकर उछलने कूदने सा लगीं। मानो हमारा पेट न हुआ उनकी फ़िसलपट्टी हो गयी। सूरज की किरणों की धमाचौकड़ी से हाथ, पेट पर तरह-तरह की आकृतियां बनने लगीं। आयत, वर्ग, वृत आदि के बेतरतीब गठबंधन टाइप। आकृतियां देखते ही एक बार फ़िर मन किया कि उन आकृतियों की लंबाई-चौड़ाई नापकर उनका क्षेत्रफ़ल निकाल दें।

आकृतियों के क्षेत्रफ़ल निकालने की बात इसलिये याद आई कि पढाई के दिनों में दिनों में यह काम हम खूब किया करते थे। अच्छा लगता था। पढाई के दिन बीत गये लेकिन मन करता है कि अगर कभी खूब सारा समय मिले इफ़रात तो हम तरह-तरह की आकृतियों के क्षेत्रफ़ल निकालने बैठ जायेंगे। यह तमन्ना इस कदर है कि मानों अगर सड़क पर कहीं सौ-पचास आदमी मर जायें और हम घटनास्थल पर पहुंचे तो सबसे पहला सवाल मन में यह उठेगा कि जिस रकबे में लाशें पड़ी हैं उसका क्षेत्रफ़ल कितना है या फ़िर जहां-जहां खून बिखरा है उसका कुल एरिया कितना है।

मुझे पता है कि यह बेवकूफ़ी की बात है। लेकिन यह सहज स्वभाव है। जिसका जिसमें हुनर होता है वह हर मसले को अपने हुनर के हिसाब से ही देखता है। आज भी देखिये कोई घटना होती है तो लोग अलग-अलग तरह से उस पर प्रतिक्रिया देते हैं। बयानवीर बयान देेते हैं, ट्वीटवीर ट्विट करते हैं, गाली गलौज के एक्सपर्ट ’गाली गरारा’ करते हैं। कहीं दंगा होता तो कुछ लोग दुखी होते हैं इत्ते इंसान मर गये, कुछ गिनती करते हैं इत्ते हिन्दू-मुसलमान मर गये। और ऊपर से देखने वाले अलग नजरिये से देखते हैं- ’अब इस इलाके के वोट अपने हुये, अब यह सीट गयी हाथ से।’

जब हम सोचने से उबरे तो देखा कि सूरज भाई आसमान पर चमकने लगे थे। किरणें भी पानी से भीगने के डर से टाटा, बाय-बाय करके चली गयीं। हम भी पानी गिराकर वापस गये।

खैर छोडिये ई सब किस्सा आइये आपको कल का किस्सा सुनाते हैं। हुआ क्या कि कल जब हम दफ़्तर से छूटकर घर आ रहे तो स्पीड में थे। दफ़्तर से घर लौटता आदमी कांजीहाउस से छूटे जानवर की तरह भागता है ( जिनको घर भी कांजीहाउस सरीखा लगता वे अपने लिये कोई अलग उपमा खोज लें) । तो अचानक सामने कुछ गायें दिख गयीं। वे सभा टाइप कर रहीं थीं सड़क पर। हम फ़ौरन रुक गये।

रुके तो देखा कि सामने एक बुजुर्ग मस्ती में टहलते चले जा रहे थे। उनके गले पर कन्धे पर अंगौछा ऐसे लटक रहा था मानो गला तराजू की डंडी हो। अंगौछे के दोनों तरफ़ कुछ सामान तराजू के पलडे की तरह लटक रहा था। बुजुर्ग खरामा-खरामा टहलते जा रहे थे।

हम ठहर-ठहरकर बुजुर्ग को देखते रहे। हमको बार-बार रुकता देखकर लोग हमको देखने लगे। हम फ़िर कार में बैठगये। सोचा कि शीशे में देखकर फ़ोटो ले लें। नहीं बना तो आगे निकलकर , किनारे गाड़ी खड़ी करके उनके आने का इंतजार किया। जब तक वे पास आते तब तक फ़ोटो खैंच लिये।

पास आये बुजुर्ग तो पूछा -’ ये क्या लादे लिये जा रहे हो दादा? वे बोले- ’फ़ूल हैं। लोगों के यहां देने जा रहे हैं।’

पता चला कि उनके कंधे में को पुटलियां सरीखी बंधी थीं वे फ़ूल की पुडियां थीं। वे घर-घर , जहां बंधी हैं पुडिया , देते चले जा रहे थे। दो रुपये की एक पुडिया है फ़ूल की। रोज करीब डेढ सौ पुडिया पहुंचा देते हैं घरों में। शाम को करीब चार बजे निकलते हैं। रात नौ बजे तक ’फ़ूल पुडिया’ सप्लाई करते हैं। जहां बात हुई बोले- ’इधर के सब हो गये। अब उधर के देने जा रहे हैं।’
करीब सात बजा था उस समय। दो घंटे और टहलना था उनको अभी फ़ूल बांटने के लिये।

70 साल उमर है बुजुर्ग की। नाम बताया प्रहलाद। दांत ऐसे मानों गेरू से रंगाये हों। मसाला मय। हम और कुछ बतियाये तब तक वे आगे बढ गये। हम भी घर की तरफ़ चल दिये।

अरे बबा, आठ बजने वाले हैं। भागते हैं अब घर से दफ़्तर के लिये। आप मजे से रहो ।
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Friday, July 22, 2016

मतलब और हकीकत में अंत र हमेशा से रहा है

आज सुबह सोचा कि कुछ लिख ही डाला जाए। फिर दो तीन आइडिया आकर खड़े हो गए सामने। उनमें से कुछ बहुत पुराने थे, कुछ कम पुराने। कुछ एकदम नए। कुछ पुराने वाले आइडियों के चेहरों पर तो ’मार्गदर्शक आइडिया मंडल ’ में डाल दिये जाने की चिन्ता की सलवटें साफ़ दिख ती थीं। पुराने आइडिये बेचारे चुपचाप आकर खड़े हो जाते हैं। कुछ कहते नहीं लेकिन उनको देखकर ही लगता है -'यार, इसपर कुछ लिख ही दें। नहीं लिखेंगे तो बेचारा कहीं निपट गया तो 'आइडिया हत्या' का पाप लगेगा।' लेकिन चूँकि कई बार टाल चुके हैं तो एक बार फिर टाल देते हैं।

यह कुछ ऐसे ही जैसे संसद में महिला बिल है, लोकपाल बिल है, एक बार लटक गए तो लटके हैं। खैर, हमारा दिमाग कोई संसद थोड़ी है जो अमली जामा पहनाने के लिए कोई सत्र बुलवाना पड़े। जब मन आया लिख डालेंगे।

आइडिया जब ज्यादा हल्ला मचाने लगे तो उठकर चाय बनाने चले गए। पानी डाला, गैस जलाई, दूध डाला, चाय की पत्ती भी डाल दी। चाय उबलने लगी। उबलने लगी मने वही माहौल बन गया भगौने में जो अक्सर ही देश के किसी न किसी बनता ही रहता है। बस गनीमत यही कि भगौने के साइज छोटा था तो कोई बस, ट्रक नहीं जला।

चाय उबलने के बाद जब जब छानने का नम्बर आया तो मन में ख्याल आया कि चीनी डाली कि नहीं। अब यह ख्याल आया तो सबसे आगे आकर खड़ा हो गया। देखकर मानो रूपा फ़्र्ंट लाइन बनियाइन का ब्रांड अम्बेस्डर हो। अब हमने कोई इसका वीडियो तो बनाया नहीं जैसा ' वीरबाँकुरे ' लोग बनाते हैं लोगों की पिटाई/अत्याचार करते हुए, सो तय ही नहीं कर पा रहे थे कि चाय में चीनी डाली कि नहीं।

अब आपको बताएं कि जहां चीनी और वीडियो वाली बात आई तो फ़ौरन और नया आइडिया आकर खड़ा हो गया कि चाय में चीनी डालने वाली बात को वीडियो वाली बात से जोड़कर पोस्ट लिखी जाए। आइडिया नया था और एकदम उबल रहा था जोश में। लाजिमी है वो होश में नहीं था।लेकिन हम उससे यह बात कह भी नहीं सकते थे। कहने में डर था कहीं वो हमारी भी तुड़ईया करके सोशल मिडिया पर अपलोड न कर दे।

अब हम अचकचा कि क्या लिखा जाए। मने सोचा कि लिखें कि चाय बनाते समय वीडियो बनाया जाना चाहिए। अब देखिये कि मंहगाई बढ़ रही है। चीनी के दाम भी बढ़ ही रहे हैं। तो अगर चाय बनाते समय वीडियो बनाते रहेंगे तो चीनी डाली है कि नहीं चाय में यह बात वीडियो में रिवाइंड करके देख लेंगे। डिजिटल इण्डिया का भी प्रचार हो जाएगा। फ़्रीफ़ंड में देशभक्ति भी हो जायेगी। वीडियो देखकर भारत् माता की जय भी बोल देंगे।

लेकिन आइडिया केवल चायचर्चा देखकर गर्मा गया कि इसमें वो हमारा पिटाई वाकया किधर है भाई। उसके गुस्से से हमें लगा कि यह वाकया दोहराने के मूड में है।

हमने फिर कहा -जैसे चाय में चीनी दुबारा न पड़े । चीनी का खर्च अनावश्यक न हो वैसे ही पिटाई का, अत्याचार का भी वीडियो बनाना जरूरी होता है। ताकि सनद रहे। अब पिटाई का क्या वह तो लोग सदियों से करते आये हैं। बरजोर कमजोर की पिटाई करते ही आये हैं। लोग अपने समय के हिसाब से सनद भी इकट्ठा करते रहे हैं। जब लिखा-पढी का जमाना था तब लोग लिखकर सनद रखते थे। इत्ते पीट दिये, इत्ते जला दिये, इत्ते की इज्जत लूट ली, इत्तों का अंग-भंग कर दिया।

लेकिन अब समय के चलते तकनीक नयी हुई तो सनद भी नयी तरह से रखी जायेगी। मार-पिटाई , अत्याचार का वीडियो बना लिया। काम आयेगा। बहुत दिन तक असर रहेगा। चीजें अपना अपना उपयोग कराती है। जब अमेरिका ने बम बनाया बम ने अपना उपयोग कराया, पैटियाट मिसाइल बनाई उसने अपना उपयोग कराया, लोग पिज्जा बर्गर खाते हुये मिसाय ल गिरते हुये देखते, वाऊ वेरी गुड कहते। मने जो भी तकनीक आई नयी उसने अपना अपना उपयोग कराया। अब सोशल मीडिया है तो वो क्यों पीछे रहे। उसने अपना भी उपयोग कराया।

लेकिन क्या होता है न कि नयी तकनीक के साथ पुराने नियम भी पीछा नहीं छोडते। जैसे न्यूटन बाबा का क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम भी हमारी जाति व्यवस्था की तरह अमरौती खाकर आया है। जिनके यहां मिसाइल बरसती हैं वो टावर उडाते हैं। जिनकी मां-बहनों पर अत्याचार होते हैं वे संगठित होकर अत्याचारियों की मां-बहनों से हिसाब बराबर करते हैं।

इस मामले में अभी कोई नयी तकनीक नहीं आई है। मां-बहनों पर अत्याचार का बदला मां-बहनों से ही चुकाने का रिवाज बना हुआ है अभी तक। मजबूरी में मां-बहनों के माध्यम से ही सारी बहादुरी अंजाम होती है। अफ़सोस कि अत्याचारों के नये तरीकों के अभाव में मां-बहन-बेटियां अत्याचारों का शास्वत उचित माध्यम हैं। मने युनिवर्शल प्रापर चैनल।

हम इत्ता लिखते रहे तब तक देखा नौजवान आइडिया अपनी किसी नयी नवेली सहेली से बतियाने लगा। बड़ी मुलायम-मुलायम बातें करते हुये इत्ता तो क्यूट लग रहा था कि क्या बतायें आपको। आप खुदै समझ जाइये।

हम आईडिया और उसकी सहेली को बतियाने के लिये छोड़कर चले आये। बाकी सब आइडियों को फ़ुटा दिये कि अब आज इनका दिन है। इनको आपस में बतियाने दो जित्ता मन करे।

दफ़्तर आते हुये देखा कि जरीब चौकी पर क्रासिंग बंद थी। वहीं पास में कुछ लोग बैठे हुये फ़ाटक खुलने का इंतजार कर रहे थे। एक बच्ची गाड़ी की खिड़की से सटकर भीख मांग रही थी। हम उससे कुछ कहते-सुनते तब-तक क्रासिंग खुल गयी। हम फ़ूट लिये। रास्ते में एक ब च्चा रंगीन गुब्बारे बेंच रहा था। हमको नंदन जी की कविता याद आई:
आंखो में रंगीन नजारे, सपने बड़े-बड़े
भरी धार लगता है, जैसे बालू बीच खड़े ।
मतलब और हकीकत में अंत र हमेशा से रहा है।

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