Friday, September 30, 2016

लिखाइयां-पढाइयां करते हुये आलोक पुराणिक पचास के हुये




व्यंग्य के मैदान पर शानदार बैटिंग करते हुये घड़ी की सुई को थोड़ा आगे की तरफ़ बढाया । उमर की पिच पर टहलते हुये एक रन लिया और अपने जीवन का अर्धशतक पूरा किया। पाठकों ने करतल ध्वनि से उनका हौसला बढाया। दुनिया भर के तमाम प्रशंसकों जिनमें सन्नी लियोन से लेकर राखी सावंत, बुश से लेकर हनी सिंह तक, ओबामा , ट्रंप से लेकर छज्जू पनवाड़ी तक शामिल हैं ने अपने-अपने अंदाज में उनको जन्मदिन की बधाई दी। टिमरिया टाइम्स के दिहाड़ी संवाददाता ने अपने अखबार की में आलोक पुराणिक की फ़ोटो छापकर उनको दुनिया के सब लेखकों से बड़ा बताते हुये सूचना दी कि इनके साथ हमने रेलवे प्लेटफ़ार्म पर एक साथ चाय पी है, भले ही पैसे अपने-अपने अलग दिये हों।

बुश ने भी फ़ोन करके बधाई दी कहते हुये -’ भाई साहब आपने बहुत हड़काया जब हम प्रेसीडेंसी की नौकरी बजा रहे थे अमेरिका में।' यह आलोक पुराणिक का ही जलवा था कि उन्होंने व्हाइट हाउस में रामलीला करवा दी ( http://iari.egranth.ac.in/cgi-bin/koha/opac-detail.pl…)

सन्नी लियोन ने लड़ियाते हुये जन्मदिन की बधाई दी और कहा -’ आलोक डियर, जब तक तुम लिख रहे हो तब तक हमको इंडियन मार्केट में अपनी पब्लिसिटी के लिये पैसा फ़ूंकना बेवकूफ़ी लगती है। लेकिन फ़ूंकते रहते हैं वर्ना लोग हमारे बारे में अच्छी-अच्छी बातें करने लगेंगे। फ़ालतू में मार्केट डाउन होगा।

राखी सावंत ने जो कुछ कहा वह राज ठाकरे की तेज आवाज और फ़िर भारतीय सर्जिकल स्ट्राइक के हल्ले में सुनाई ही नहीं।

उमर का अर्धशतक पूरा करने वाले आलोक पुराणिक से जब बात करो और पूछो क्या चल रहा है तो हमेशा एक ही जबाब - ’अजी बस, वही काम लिखाइयां-पढाइयां।’ मल्लब अगला लिखने पढ़ने में जिस कदर जुटा रहता है उससे तो लगता है अगला तो काम के बोझ का मारा है, इनका इलाज तो सिर्फ़ हमदर्द का टानिक सिंकारा है। किसी की कोई बुराई नहीं, कोई चुगली नहीं, कोई लगाई- बुझाई नहीं। ऐसे कहीं होती है व्यंग्यकारिता - "हाऊ अनरोमांटिक। हाऊ अनलाइक अ सटायरिस्ट।"

आलोक पुराणिक को पिछले कुछ सालों से लगातार पढ़ते आ रहे हैं हम। इस बीच उन्होंने भतेरे प्रयोग किये अपने व्यंग्य लेखन में।एक पूरे लेख की बजाय तीन-चार लघु लेख मय स्केच के। दिन भर समसामयिक विषय पर ट्रेंडियाते हुये लिखना। ट्रेंड लेखन में भी साथ में कार्टून खोजकर सटाना। बहुत मेहनत का काम है भाई। बाजीबखत जलन भी होती है कि कैसे कर लेता है बंदा यह सब।

आलोक पुराणिक किसी राजनीति में नहीं पड़ते। लोगों के बारे में कोई नकारात्मक बातचीत नहीं करते। बहुत मजबूरी न हो तो उठापटक वाले बयान भी नहीं देते। शरीफ़ आदमियों की तरह हरकतें करते हुये चुपचाप लिखते रहते हैं। लेकिन उनके प्रसंशक इतनी वैविध्यपूर्ण हैं कि उनसे मजे लेते रहते हैं। हमारे जैसे लोग तो उनसे जलते हैं तो खुले आम जलते हैं। लेकिन तमाम चुपचाप जलने वाले भी हैं। वे अकेले में धुंआ-धुंआ होते रहते हैं।

कुछ लोग आलोक पुराणिक से इतनी मोहब्बत करते हैं कि उनको बारे में कुछ भी बयान जारी कर देते हैं। ऐसे ही किसी ने एक दिन कह दिया -"आलोक पुराणिक तो व्यंग्यकार हैं ही नहीं।" इस बयान को कुछ सुशील पाठकों ने मौनं स्वीकार लक्षणम वाले तरीके से चुपचाप मान लिया। फ़िर दिन भर की बमचक के बाद बड़े लोगों ने तमाम फ़ायदे नुकसान को मद्देनजर रखते हुये बीच का रास्ता अपनाते हुये बयान जारी किया- " बावजूद तमाम हालिया विचलन के आलोक पुराणिक व्यंग्यकार हैं।" व्यंग्य की विधा के लोगों का यह सुरक्षित बयान ’वाली असी’ का यह शेर याद आया:
"तकल्लुफ़ से तसन्नों से अदाकारी से मिलते हैं
हम अपने आप से भी कितनी तैयारी से मिलते हैं।"
आलोक पुराणिक लिखने पढ़ने में लगे रहते हैं। उनको लगता है और वे कहते भी हैं कि बाकी सब बेफ़ालतू है। समय यह नहीं याद रखेगा कि किसने किसे उठाया, किसको गिराया, किसके साथ खाया, किसको गरियाया। समय की छलनी में केवल आपका रचा हुआ जायेगा आगे। जब इस तरह की बातें करते हैं तो शंका भी होती है कि अर्थशास्त्री व्यंग्यकार फ़ायदे का धंधा देखकर कहीं उपदेशक बनने का अभ्यास तो नहीं कर रहा। लेकिन शंका हमेशा सबूत के अभाव में अपनी मौत मर जाती है।

कुछ लोग व्यंग्यकारों से सहज आशा के चलते आलोक पुराणिक से आशा करते हैं वे सरकार की बैंड बजाते रहें। आलोक पुराणिक ऐसा न करते देखकर उनके नंबर भी काट लेते हैं। लेकिन आलोक पुराणिक इस सब मूल्यांकन से बेपरवाह अपनी लिखाई में लगे रहते हैं। कोई लेख अच्छा बन गया और किसी ने तारीफ़ कर दी तो पगड़ी वाले राजस्थानी टाइप आदमी को हाथ जोड़कर हिलते-डुलते हुये आभार प्रकट करने भेज देते हैं।
समसामायिक लेखन के चलते यह भी बात होती है कि उनका लेखन बाजारवाद से प्रभावित है। मल्लब कालजयी टाइप का नहीं हैं। लेकिन आज जब समूची दुनिया का स्टियरिंग बाजार के हिसाब से घूम रहा है तब व्यंग्य लेखन कैसे उससे अछूता रहेगा। लेकिन यह सब बहस का विषय है, और बहस के बहाने नंबर देने/काटने का भी, इसलिये इसके बारे में अलग से।

आलोक पुराणिक एक बेहतरीन व्यंग्यकार ( उनको व्यंग्यकार न मानने वाले लेखक पढ सकते हैं) होने के साथ-साथ एक प्यारे इंसान भी हैं। बीहड़ व्यस्ता के बावजूद जब भी कोई सलाह मांगी जाती है देने के लिये उपलब्ध। बिना मांगे सलाह देने की आदत से बचे हुये हैं अभी तक। उनको जब भी अपने खिलाफ़ महीन साजिशों का पता चलता है वे और तगड़ाई से अपने काम में जुट जाते हैं। अपने बारे में कोई मुगालते पालने में समय बर्बाद करना पसंद नहीं उनको।

आलोक पुराणिक अपने काम पर फ़ोकस करके चलने वालों में हैं। अब पचास की तरफ़ बढ़ने हुये ’माइक्रो फ़ोकस’ करने लगे हैं। आगे क्या पता ’नैनो फ़ोकस’ हो जायें।

आज जीवन का अर्धशतक पूरा करते हुये आलोक पुराणिक को उनके जन्मदिन की बहुत बधाई।

 मंगलकामनायें। कामना है कि वे अपने व्यक्तित्व की तमाम अच्छाईयां बनाये रखते हुये नित नया रचें और उपलब्धियों के नये-नये आयाम छुयें। शतायु हों, कालजयी और मालजयी लिखें। मुझे पूरा भरोसा है कि आने वाले समय में आलोक पुराणिक के बारे में कही हमारी यह बात सब स्वीकार करेंगे - आलोक पुराणिक व्यंग्य के अखाड़े के सबसे तगड़े पहलवान हैं।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10209222092442841

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Thursday, September 29, 2016

स्पीड तो बहुत तेज है नेट की गुरु लेकिन

स्पीड तो बहुत तेज है नेट की गुरु लेकिन
खाक हो ही जाते हैं , खबर पहुँचते पहुँचते।
शरीफ तो हमको समझता है, पुलिस वाला भी
दो-चार तो जमा ही देता है, समझते-समझते।
हमने बहुत कहा था हमको काबिल मत समझो,
कुछ न कुछ बेवकूफी कर ही देंगे, चलते-चलते।

-कट्टा कानपुरी

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Wednesday, September 28, 2016

बताओ तो कैसी लग रही हूं

जितने बजे सोचा था उससे बस पांच मिनट देर हो गयी कल निकलने में। बस निकलते ही देरी हो जाने का ख्याल बेताल की तरह सवारी गांठ लिया। हम लाख झटका दिये लेकिन देरी का ख्याल लदा रहा। मुफ़्त की सवारी कौन छोड़ता है भाई आजकल। जब बहुत झटकने पर भी नही हटा तो हम उसको लिफ़्ट देना बन्द कर दिये। पड़े रहो चुपचाप एक कोने में, किसी शायर की भूली हुई मोहब्बत की तरह। जहां लिफ़्ट देना बंद किये, बिला गया कही॥ गुमसुम बैठा होगा किसी कोने में।

मोड़ पर कई कुत्ते अपनी पूंछों को झंडे की तरह फ़हराते घूम रहे थे। चेहरे से लग रहा था किसी अपनी पंचायत सम्मेलन में कोई क्रांतिकारी प्रस्ताव पारित करके निकले हैं। देख नहीं पाये लेकिन मूछों के पास जरूर पसीना चुहचुहा रहा होगा। वहीं सड़क पर एक कुतिया बहुत धीरे-धीरे सरक-सरककर सड़क पार कर रही थी। उसका कमर के पीछे का हिस्सा चोटिल सा था। ठीक-ठीक कहना मुश्किल कि उसका हिस्सा किसी वाहन से ठुका था या कुत्तों का श्वानत्व का शिकार था।

ओएफ़सी मोड़ पर बैठी महिला रोज की तरह हाथ फ़ैलाये सर खुजाती मांगने का काम कर रही थी। उसके दो बच्चे वहीं गलबहियां डाले खेल रहे थे।

एक ठेलिया वाला पेप्सी का छाता लगाये देशी मट्ठा बेच रहा था। ’मेक इन इंडिया’ सड़किया संस्करण सा।’मेक इन इंडिया’ में लोग बाहर से सामान लाकर अपने यहां जोड़ रहे हैं। ठेलिया वाला पेप्सी का छाता लगाये भूलोक मट्ठा बेच रहा था।

फ़जलगंज के मोड़ के पहले कूड़े के ढेर पर एक सुअर और एक आदमी अपने-अपने मतलब की चीजें खोज रहे थे। आदमी और सुअर में अंतर बस यही था कि सुअर कूड़े में मुंह मारने के लिये आदमी की तरह किसी लकड़ी का मोहताज नहीं था।

आगे एक ठेलिया वाला ठेलिया पर सेव सजा रहा था। सेव घुमा-घुमाकर ढेरी पर रख रहा था। नहीं जमने पर एक सेव को हटाकर दूसरा सेव रख देता। जिस तरह कोई स्त्री शीशे में अलग-अलग तरह की बिंदिया लगाकर देखती है और फ़िर आखिर में एक से संतुष्ट होकर उसी को फ़ाइनल कर देती है उसी तरह सेव वाला अपनी ठेलिया का ’सेव श्रंगार’ कर रहा था। ठेलिया के अगर जबान होती हो हर सेव लगने के बाद पूछती -’ बताओ तो कैसी लग रही हूं।’

बाजपेयी जी पास पहुंचकर हार्न बजाते ही वे उठ खड़े होते हैं। हाथ मिलाते हैं। वे कुछ न कुछ जानकारी देने लगते हैं। एक दिन बोले -’ माधुरी दीक्षित का रैकेट पकड़ा गया है। पुलिस ले गयी है। तीसरे मंजिल पर धंधा चलता था। सब आ गया है अखबार में।’

कल हमने पूछा-’ पाकिस्तान बहुत गड़बड़ कर रहा है। क्या किया जाये?"

बाजपेयी जी बोले-"पाकिस्तान गड़बड़ नहीं कर रहा। वह मित्र देश है। हबीब भाई का इलाका है यह। वो दोस्त हैं हमारे। गड़बड़ जार्डन और कनाडा कर रहा है। सब पता चल गया है।’

कल यह भी बोले-" गाड़ी बहुत हीट करती है। कूलेंट डलवा लेना। किसी को बैठाना नहीं गाड़ी में। विदेशी लोग घूम रहे हैं।"

उनसे बात लम्बी खिंचती है तो यही पूछकर खत्म कर देते हैं-" चाय पी ली कि नहीं अभी तक? वे बोलते हैं-" अभी जायेंगे मामा के यहां।" हम -" अच्छा चलते हैं कहकर चल देते हैं।"

कल लौटते में जरीब चौकी क्रासिंग बंद थी। दो गाड़ियां निकलीं। जब क्रासिंग खुली तो सबको भागने की जल्दी। हम आहिस्ते-आहिस्ते चलते हुये आगे बढे।

सामने से आते एक आटो ने अचानक अपना आटो मोड़ा। इधर से जाते हुये रिक्शे का पिछला पहिया आटो वाले के ’मुड़न वृत्त’ की हद्द में आ गया। रिक्शे वाले ने जिस तरह देखा उससे लगा कि वह कह रहा था आटो वाले से - ’जरा पीछे कर लो तो हम बगलिया के निकाल लें।’ लेकिन आटो वाले के दिमाग में डीजल भरा सो वह अपना आटो पीछे की तरफ़ करने की बजाय रिक्शे के पिछले पहिये को कुचलकर निकलने पर आमादा था।

रिक्शे वाले ने निरीह आंखों से उसे देखा। उसकी निरीह नजर देखकर लगा कि निराला जी की कविता पंक्ति -’वह मार खा रोई नहीं’ का फ़िल्मांकन हो रहा हो। रिक्शेवाले ने उतरकर अपना रिक्शा पीछे किया। आटो वाले विजयी मुद्रा में झटके से आटो का मोड़ा और आगे खड़ा करके सर से अंगौछा उतारकर फ़टकारने लगा।
रिक्शे को धकिया कर मुड़ने में सफ़ल होने के अपने शौर्य पर किंचित मुग्ध सा भी दिखा। शायद अफ़गानिस्तान, ईराक को बरबाद करने पर अमेरिका ने भी ऐसे ही मुग्ध होकर अपने को शीशे में निहारा हो, अपना अंगौछा फ़टकारा हो।

इस बीच दिलीप घोष जी से रोज बात होती रहती है। उनके पांव का घाव बढ गया था। मवाद पड़ गया था। दवा चल रही है। खाने में लोग जो दे जाते हैं वो खाते नहीं। लोग श्राद्ध पक्ष में खूब खाना दे जाते हैं लेकिन उसको वे खाते नहीं। घोष जी के मित्र ने बताया -"वह बहुत बड़ा गप्पी है। कहीं गया -वया नहीं। लेकिन जीनियस है वह -spoilt genious " लेकिन घोष जी जिस विश्वास से बातें करते हैं उससे बड़े दिलचश्प इन्सान लगते हैं। हो सकता है उनके तमाम किस्से झूठे ही हों लेकिन अंदाजे बयां और जानकारी का स्तर से उनसे बातचीत करने में आनन्द आता है। जल्दी ही उनके वीडियो अपलोड करेंगे।

फ़िलहाल इतना ही। आगे जल्दी ही फ़िर कभी। मतलब शेष अगली पोस्ट में। (अरविन्द तिवारी जी के उपन्यास शेष अगले अंक में की तर्ज पर)
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10209205595550429

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Tuesday, September 27, 2016

कहो तो आज पाकिस्तान को निपटा आएं

कहो तो आज पाकिस्तान को निपटा आएं,
लेते जाएँ कुंजी सबक ठीक से सिखा आएं।

जाओ अगर तो साथ में झोला लेते जाना,
सब्जी मिल रही हो बढ़िया तो लेते आना।

सामान जो भी लेना वो मोलभाव करके लेना,
निपटाने के चक्कर में, कमाई मत गवां देना।

चाय पीना वहाँ तो ग्लास सामने धुलवाना,
चीनी जरा कम और पत्ती कड़क डलवाना।

चलना सड़क पर आँख खोलकर सावधानी से,
आती-जातियों से अनजाने में भिड़ मत जाना।


मिले जो कहीं भीड़ तो वहीं पकड़ कर माईक,
'कटटा कानपुरी' के कलाम जबरियन झेला आना।
-कट्टा कानपुरी

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Sunday, September 25, 2016

मोबाइल


(व्यंग्य की जुगलबंदी के तहत यह पहली पोस्ट। बाकी की पोस्टस देखने के लिये साथी Nirmal Gupta, एम.एम. चन्द्रा और Ravi Ratlami के पास पहुंचिये । रवि रतलामी की पोस्ट का लिंक यह रहा http://raviratlami.blogspot.in/2016/09/blog-post_25.html । बताइये कैसा है यह प्रयोग? पसंद करेंगे तो आगे भी चलेगा। हर हफ़ते इतवार को। )

आज की दुनिया मोबाइलमय है। समाज सेवा के नाम पर सरकारें बनाने के काम से लेकर अपराध का धंधा करने वाले माफ़िया लोग मोबाइल पर इस कदर आश्रित हैं कि इसके बिना उनके धंधे चौपट हो जायें।
बिना मोबाइल का आदमी खोजना आज के समय कायदे की बात करने वाले किसी जनप्रतिनिधि को खोजने सरीखा काम है। जितनी तेजी से मोबाइल की जनसंख्या बढी है उतनी तेजी से इन्सान के बीच के दूरी के अलावा और कुछ नहीं बढा होगा। आज के समय में आदमी बिना कपड़े के भले दिख जाये लेकिन बिना मोबाइल के नहीं दीखता। गर्ज यह कि बिना आदमी के दुनिया का काम भले चल जाये लेकिन बिना मोबाइल के आदमी का चलना मुश्किल है।

मोबाइल ने लोगों के बीच की दूरियां कम की हैं। झकरकटी बस अड्डे के पास जाम में फ़ंसा आदमी लंदन में ऊंघती सहेली से बतिया सकता है।भन्नानापुरवा के किचन में दाल छौंकती महिला अपने फ़ेसबुक मित्र को कुकर की सीटी से निकली भाप की फ़ोटो भेज सकती है। गरज यह कि दुनिया में घूमता-फ़िरता आदमी बड़े आराम से दुनिया को मुट्ठी में लिये घूम सकता है।

जितनी दूरियां कम की हैं, बढाई भी उससे कम नहीं हैं इस औजार ने। आमने-सामने बैठे लोग अगर अपने-अपने मोबाइल में डूबे नहीं दिखते तो अंदेशा होता है कि कहीं वे किसी और ग्रह के प्राणी तो नहीं। एक ही कमरे में बैठे लोगों के बीच अगर संवाद कायम नहीं है तो इसका मतलब यही समझा जा सकता है कि उस कमरे में मोबाइल नेटवर्क गड़बड़ है।

मोबाइल ने बिना शर्मिन्दगी के झूठ बोलना सुगम बनाया है। नाई की दुकान पर दाढी बनवाता आदमी अपने को दफ़्तर में बता सकता है। बगल के कमरे में बैठा आदमी अपने को सैकड़ो मील दूर होने की बात कहकर मुलाकात से बच सकता है। घंटी बजने पर फ़ोन उठाकर बात करने की बजाय तीन दिन बाद कह सकता है – ’अभी तेरा मिस्डकाल देखा। फ़ोन साइलेंट पर था। देख नहीं पाया।’

समय के साथ आदमी की औकात का पैमाना हो गया है मोबाइल। फ़ोर्ड कार वाले आदमी को मारुति कार वाले पर रोब मारने के लिये उसको बहाने से सड़क पर लाना पड़ता था। मोबाइल ने रोब मारने का काम आसान कर दिया है। आदमी अपनी जेब से एप्पल का नया आई फ़ोन निकालकर मेज पर धरकर वही रुतबा काबिल कर सकता है जो रुतबा गुंडे लोग बातचीत के पहले अपना कट्टा निकालकर मेज पर धरकर गालिब करते थे।
मोबाइल और इंसान समय के साथ इतना एकात्म हो गये हैं कि एक के बिना दूसरे की कल्पना मुश्किल हो गयी है। किसी आदमी को खोजना हो तो उसका फ़ोन खोजना चाहिये। इंसान अपने फ़ोन के एकाध मीटर इधर-उधर ही पाया जाता है।

मोबाइल के आने से दुनिया में बहुत बदलाव आये हैं। कभी अपने जलवे से मोबाइल की दुनिया का डॉन कहलावे वाले नोकिया के हाल आज मार्गदर्शक मंडल सरीखे बस आदर देने लायक रह गये हैं। किलो के भाव मिलने वाले मोबाइलों से लेकर एक किले तक की कीमत वाले मोबाइल हैं आज बाजार में।

तकनीक की साजिश से खरीदते ही पुराना हो जाता है मोबाइल। सामने की जेब से आलमारी के कोने तक पहुंचने की यात्रा जितनी तेजी से पूरी करता है उतनी तेजी से बस नेता लोग अपना बयान भी नहीं बदल पाते।
मोबाइल का एक फ़ायदा यह भी है कि इसके चलते देश की तमाम समस्याओं से देश के युवाओं का ध्यान हटा रहता है। वे मोबाइल में मुंडी घुसाये अपना समय बिताते रहते हैं। मोबाइल न हो तो वे अपनी मुंडी घुसाने के लिये किसी और उचित कारण के अभाव में बेकाबू हो सकते हैं।

मोबाइल कभी बातचीत के काम आते हैं। आजकल मोबाइल का उपयोग इतने कामों में होने लगा है कि बातचीत का समय ही नहीं मिलता। फ़ोटो, चैटिंग, के अलावा लोग मारपीट के लिये अद्धे-गुम्मे की जगह अपने पुराने मोबाइलों पर ज्यादा भरोसा करने लगे हैं। टाइगर वुड्स की प्रेमिका ने वुड्स की बेवफ़ाई की खबर पाने पर अपने मोबाइल का हथियार के रूप में प्रयोग करके इसकी शुरुआत की थी। ऐसा फ़ेंक कर मारा था मोबाइल कि टाइगर वुड्स का दांत टूट गया था। भारत-पाक सीमा पर भी देश के पुराने मोबाइल इकट्ठे करके फ़ेंककर मारे जा सकते हैं। अपना कूड़ा भी उधर चला जायेगा और जलवा भी कि हिदुस्तान इतना काबिल मुल्क है कि मारपीट तक में मोबाइल प्रयोग करता है।

किसी भी देशभक्त कथावाचक की दिली तमन्ना की तरह बस यही बताना बचा है मेरे लिये कि दुनिया में यह तकनीक भले ही कुछ सालों पहले आई हो लेकिन अपने भारतवर्ष में महाभारतकाल के लोगों को मोबाइल तकनीक की जानकारी थी। महाभारत की मारकाट के बाद पांडव जब स्वर्ग की तरफ़ गये थे तो साथ में अपना कुत्ता भी ले गये थे। वास्तव में वह कुत्ता पांडवों का वोडाफ़ोन मोबाइल था। पांच भाइयों की साझे की पत्नी की तरह उनके पास साझे का मोबाइल था। जब देवदूत युधिष्ठर को अकेले स्वर्ग ले जाने की कोशिश करने लगे तो उन्होंने बिना कुत्ते के स्वर्ग जाने से मना कर दिया। अड़ गये। बोले-“ ऐसा स्वर्ग हमारे किस काम का जहां मेरा मोबाइल मेरे पास न हो।“ अंत में देवदूत युधिष्ठर को उनके मोबाइल समेत स्वर्ग ले गया।

महाभारत काल में सहज उपलब्ध मोबाइल तकनीक को हजारों साल चुपचाप छिपाये धरे रहे और इंतजार करते रहे कि जैसे ही कोई विदेशी इसको चुराकर मोबाइल बनायेगा हम फ़टाक से महाभारत कथा सुनाकर बता देंगे कि जो तुम आज बना रहे हो वो तो हम हज्जारों साल पहले बरत चुके हैं।

महाभारत काल में सबसे पहले प्रयोग किये मोबाइल का हजारों साल बाद फ़िर से चलन में आना देखकर यही कहने का मन करता है-“ जैसे मोबाइल के दिन बहुरे, वैसे सबसे बहुरैं।“

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10209178671397342

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