Wednesday, October 12, 2016

सर्जिकल स्ट्राइक पर ताजा खबरें

हरिभूमि 12.10.16


आम गृहस्थ के लिये घर के पचास काम होते हैं। 49 टरका भी दो एक तो बच ही जाता है। निकलना ही पड़ता है घर से बाहर 'सर्जिकल स्ट्राइक' के लिए।

अब ये ससुर 'सर्जिकल स्ट्राइक' भी इतना पॉपुलर हो गया है कि आदमी निपटने भी जाता है तो कहकर जाता है – “तू बैठ ज़रा अपन अभी शौचालय से 'सर्जिकल स्ट्राइक' करके आते है।“

'सर्जिकल स्ट्राइक' में पड़ोसी देश के कितने आतंकवादी जन्नत में हूरों से मिलने निकल लिए इसकी तो संख्या में मतभेद हैं लेकिन इस 'सर्जिकल स्ट्राइक' के हल्ले में तमाम जरूरी लगने वाले मुद्दे उबलती हुई कड़ाही से कोल्ड स्टोरेज में जमा हो गये। वे मुद्दे ऐसे निपट गए कि उनके शव तक न खोजे मिलेंगे।

जनता को भी इसी बहाने एक नया शब्द मिला -सर्जिकल स्ट्राइक । महीने में एकाध बार इसी तरह नए-नए शब्द उछलते रहे तो पांच साल का समय सीखते हुये ही बीत जाएगा। सरकार अपनी उपलब्धियां बताते हुए कहेगी -'हमने अपनी जनता को सबसे ज्यादा नये शब्द सिखाये। हमने सबसे ज्यादा जुमले जोड़े। बोलो जोड़े कि नहीं।'

इस सवाल के जबाब में जनता झकमारकर हाँ कहने के सिवा और क्या कर सकती है ।

हमारे एक मित्र हैं। उन पर आदतन विपक्षी दल की आत्मा सवार रहती है। हर बात का स्टीयरिंग गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी की तरफ़ मोड़ देते हैं। 'सर्जिकल स्ट्राइक' से उत्साहित होकर मित्र ने सवाल उछला -'ये सरकारें आतंकवादियों पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' की तर्ज पर अपने यहां गरीबी, भुखमरी के खिलाफ 'सर्जिकल स्ट्राइक' क्यों नहीं करती। घात लगाकर बेरोजगारी को क्यों नहीं निपटा देती।

मित्र के सर्जिकल हमले से भौंचक्के रह गए हम। जबाब नहीं सूझा फिर भी कह ही दिए -'ये 'सर्जिकल स्ट्राइक' सेना करती है। जबकि गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी से निपटने का काम सरकार का है। सरकार का काम सेना को कैसे सौंपा जा सकता है।

फिर सरकारें सेना के काम की वाहवाही बटोरने की बजाय अपना काम क्यों नहीं करती? गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी को क्यों नहीं निपटातीं? - मित्र बख्सने के मूड में नहीं थे।

मित्र के सवाल का कोई जबाब हम दे पायें तब तक पास बैठे मोबाइल में डूबे एक दूसरे मित्र ने जबाब उछाला-“ लोकतंत्र में सरकारों के लिये गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी बने रहना उतना ही जरूरी होता है जितना कि पाकिस्तान में सेना बने रहने के लिये आतंकवादी। इसीलिये वहां आतंकवादी की खेती होती रहती है यहां गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी को खाद पानी मिलता रहता है।“


हम कुछ और कहें तब तक दोनों मित्र टेलिविजन पर ’सर्जिकल स्ट्राइक’ पर ताजा खबरें सुनने लगे।

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10209326872462276&set=a.1767071770056.97236.1037033614&type=3&theater

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Tuesday, October 11, 2016

व्यंग्य के बहाने-5



कल Arvind Tiwari जी ने लिखा :

"कविता और व्यंग्य में सर्जिकल स्ट्राइक का दौर शुरू। "

इस पर कई टिप्पणियां आईं। Nirmal Gupta जी ने लिखा :

"लेकिन जो हो रहा है वह यकीनन दुखद है। "

Subhash Chander जी ने अपना दु:ख इन शब्दों में बयान किया:

"व्यंग्य में बस बढ़िया लिखना ही कम हो रहा है ,बाकी सब तो खूब ही चल रहा है। "

अरविन्द तिवारी ने मुद्दे की तरफ़ इशारा करते हुये जबाब दिया :

"बिलकुल आज की तारीख़ में तो तलवारें निकल आयीं हैं ।अपना अपना आउट लुक है। "

इत्ता इशारा काफ़ी था अपन के लिये। मल्लब यह निकाला गया कि आउटलुक में कुछ छपा है जिसमें व्यंग्य का सर्जिकल स्ट्राइक हुआ है।


इसके बाद तो ज्यादा खोजना नहीं पड़ा। पता चला सर्जिकल स्ट्राइक Suresh Kant जी ने की है। उनका ही लेख आउटलुक में छपा है। पता चला कि उन्होंने आउटलुक में "दांत पर दतंगड" नाम से लेख लिखा है। उसमें उन्होंने एक भूतपूर्व लेखक के ऊपर व्यंग्य ’टाइप’ कुछ लिखा है। व्यंग्य में लेखक चुका हुआ बताया गया है, उसकी एक पत्रिका है, कुछ ’आंख के अंधे -गांठ के पूरे चेले हैं, भूतपूर्व लेखक अपने लिये और अपने चेलों के लिये इनाम इकराम हासिल करने की बात लिखी है। कुल मिलाकर एक बहुत साधारण सा लेख। लेकिन अब चूंकि किसी का नाम तो है नहीं इसलिये कोई कह नहीं सकता कि यह हमारे लिये है। कोई हल्ला मचायेगा या विरोध करेगा तो कहा जा सकता है कि भाई यह लेख तो प्रवृत्तियों पर है।

रमानाथ अवस्थी के गीत :

मेरी रचना के बहुत से हैं,
तुम से जो लग जाये लगा लेना।
लोग अपने जिसाब से कुछ गलत-सलत अन्दाज न लगा लें इसलिये सुरेश कांत जी ने पाठकों के भले के लिये अलग से टिप्पणी लिखकर बता दिया:

"मेरा यह व्यंग्य चुके हुए लेखकों द्वारा अपने को चर्चा में बनाए रखने के लिए अपनाए जाने वाले हथकंडों पर है| ज्ञान ने इसे प्रेम जनमेजय से जोड़कर मेरी निंदा करने के बहाने प्रेम को 'चुका हुआ लेखक' बता दिया है|

ज्ञान भाई, दूसरे के कंधे पर बंदूक रखकर क्यों चला रहे हैं? क्या इसलिए कि अब तक यही करते आए हैं? "
बाकी की टिप्पणियां सुरेश कांत जी की कल की पोस्ट पर पढ सकते हैं।

कथा साहित्य में चरित्रों के बहाने लोगों पर लिखने की परम्परा थी। उदय प्रकाश जी की कई कहानियां किन-किन कवियों-लेखकों पर केंद्रित हैं इसके कई किस्से हैं।

व्यंग्य में परसाई जी ने भी लेखकों पर व्यंग्य करते हुये लिखा। लेकिन उन्होंने या तो साफ़ नाम लेकर लिखा ताकि गफ़लत न रहे किसी को या फ़िर प्रवृत्तियों पर लिखा तो ऐसे लिखा कि कोई उसे अपने से जोड़ न सके। ’दो लेखक’ लघु कथा में वे लिखते हैं:

"दो लेखक थे। आपस में खूब झगड़ते थे। एक दूसरे को उखाड़ने में लगे रहते। मैंने बहुत कोशिश की कि दोनों में मित्रता हो जाए पर व्यर्थ।

मैं तीन-चार महीने के लिए बाहर चला गया। लौटकर आया तो देखा कि दोनों में बड़े दाँत काटी रोटी हो गई है। साथ बैठते हैं साथ ही चाय पीते हैं। घंटों गपशप करते हैं। बड़ा प्रेम हो गया है।

एक आदमी से मैंने पूछा-'क्यों भाई, अब इनमें ऐसी गाढ़ी मित्रता कैसे हो गई इस प्रेम का क्या रहस्य है?'
उत्तर मिला-'ये दोनों मिलकर अब तीसरे लेखक को उखाड़ने में लगे हैं।"

लेखकों की प्रवृत्तियों पर लिखने की परम्परा लगता है परसाई जी के साथ ही विदा हो गयी। अब कोई व्यंग्य लेखक लिखता है किसी लेखक की प्रवृत्ति पर तो उसके सूत्र हालिया किसी घटना में पाये जा सकते हैं।


ऐसे ही जून के अंतिम सप्ताह में दिल्ली में एक व्यंग्य गोष्ठी हुई। दिल्ली और आसपास के कुछ व्यंग्य लेखक उसमें शामिल हुये थे। उसके बाद 3 जुलाई को जनसत्ता में ज्ञान चतुर्वेदी जी की व्यंग्य लेख ’विचारक के किस्से’ के नाम से छपा। मुझे लगा कि ज्ञान जी ने वह लेख उस गोष्ठी में शामिल हुये लोगों की खिल्ली उडाते हुये लिखा है।

वह लेख जब सुशील सिद्धार्थ जी ने अपनी फ़ेसबुक वाल पर साझा किया तो मैंने उसकी कड़ी वाली आलोचना करी। सुशील जी ने उस समय ज्ञानजी की भक्ति भावना में डूबे थे इसलिये उनको अच्छा नहीं लगा कि इस तरह की आलोचना उनकी वाल पर हम करें। उन्होंने मेरी टिप्पणी मिटा दी। हमने फ़िर की। उन्होंने फ़िर मिटा दी। हमने फ़िर की उन्होंने फ़िर मिटा दी। इस तरह कई बार टिपियाने-मिटाने के बाद सुशील जी ने आजिज आकर मुझे फ़ेसबुक से अमित्र किया और फ़िर ब्लॉक किया। मतलब - "न मैं देखूं तोये को न तुझ देखन देऊं" ।
लेकिन अपनी टिप्पणी तब तक मैं वलेस ग्रुप में भी पोस्ट कर चुका था। जिसको Gyan जी ने भी पढ़ा और शायद अगले दिन ही जबाब भी लिखा। जबाब का लब्बो लुआब यह था कि उन्होंने जो लिखा उसका उस तथाकथित गोष्ठी से कोई लेना देना नहीं है जिसका जिक्र मैंने किया ( मतलब जो मैंने समझा वह मेरा बचकानापन था) उन्होंने यह भी लिखा उनके पास इन सब फ़ालतू की बातों के लिये समय नहीं है। प्रेम जी से और (शायद हरीश नवल जी से भी ) रोज बात होने का जिक्र भी किया था मैंने।

बाद में Harish Naval जी ने ज्ञान जी के लेख पर प्रतिक्रिया करते हुये लिखा:

" जनसत्ता में छपा ज्ञान भाई का लेख पढ़ते हुए जो अनुभूति हुई आपसे शेयर करना चाहता हूँ ....
ऐसा लगा कि अरे यह तो मेरे जागरण हेतु मुझ पर लिखा हुआ है ...असली लेखन लक्ष्य छोड़ कर या उसके होते भी क्यों मैं गोष्ठियों के मोह जाल में हूँ .....

जानता हूँ ऐसा भीतर से कुछ अन्य रचनाकारों को भी लगा होगा...मुझे तो ज्ञान भाई का सूक्ष्म ऑब्ज़र्वेशन हमेशा चमत्कृत करता है ,वे थोड़े में अत्यधिक आब्ज़र्व करने की क्षमता रखते हैं ...दिन भर व्यस्त रहने वाला डॉक्टर कैसे कितना भाँप लेता है यह उसकी प्रतिभा और बेधक सूक्ष्म दृष्टि का कमाल है .....

बहुत बहुत सही आकलन किया है भटके हुए बुद्धिजीवियों का......

भाव की विशिष्टता के साथ शैली का ओज ज्ञान भाई के व्यंग्यकार के पास भरपूर है .....सच कहूँ विगत ५० वर्ष से निरंतर हिंदी गद्य व्यंग्य के परिदृश्य से जुड़ा हूँ ,ज्ञान जैसा लेखन कौशल किसी के पास नहीं ....कई मायनो में ज्ञान ,परसाई जोशी आदि से आगे निकल चुके हैं ,ऐसा स्वीकार करने में मुझे सत्य का आभास होता है ....

प्रिय ज्ञान भाई तुम्हारे इस लेख से आँखें खुल रही हैं ....

....आभार दोस्त आभार ... "

यह किस्सा इसलिये कि सुरेश कांत जी का यह कहना समझ में नहीं आता और सही भी नहीं लगता कि ज्ञानजी ने सुरेश कांत जी का लेख पढकर उनकी भूरि-भूरि भर्त्सना की होगी। यह शायद किसी ने उनको ऐसे ही कह दिया मजे लेने के लिये। सुरेश जी ने लिख भी मारा इस पर। इसे अरविन्द तिवारी जी ने सर्जिकल स्ट्राइक कहा तो अपन भी उधर गये जहां यह हो रहा था। हरि जोशी जी भी भयंकर वाले खफ़ा हैं उन लोगों से जिन लोगों ने सब इनाम उनके पहले कब्जिया लिये। बाकी लोगों को मौका नहीं दिया।

यह मजेदार बात है! व्यंग्य में कुल जमा आठ-दस इनाम हैं। वे भी देर-सबेर सबको मिल ही जाने हैं अगर यहां लिखते-पढते रहे। लोगों ने इनको सम्मानित किया और कोई रहा नहीं होगा जिसको सम्मानित करते। तो इसमें सम्मानित लोगों का क्या दोष! :)

व्यंग्यकारों द्वारा प्रवृत्तियों के बहाने में लेखकों पर लिखने का चलन देखकर यह भी लगता है व्यंग्यकारों का अनुभव संसार अपने साथियों की गतिविधियां नोट करने उनकी विसंगतियां उजागर करने तक ही सीमित होता गया है। सुशील सिद्धार्थ जी के बहुचर्चित व्यंग्य संग्रह ’मालिश महापुराण’ (जिसकी 40 से अधिक समीक्षायें हुयीं जो कि शायद एक व्यंग्य संग्रह के लिये गिनीज बुक आफ़ वर्ल्ड रिकार्ड में आ सकती है) के सत्रह लेख लेखकों पर केन्द्रित हैं। एक तरफ़ यह उनके लेखकों के गहन संपर्क में रहने का परिचायक है तो साथ ही उनकी सीमा भी बताता है कि उनका अनुभव संसार साथ के लेखकों तक ही सीमित है। लेकिन उसके बारे में अलग से विस्तार से। अभी उसकी समीक्षा लिखनी है मुझे।

इतना सब लिखने के बाद मैं भूल गया कि किस लिये लिखना शुरु किया था लिखना। कहना शायद यह चाहता है कि आज के समय में व्यंग्य लेखन में प्रवृत्तियों के बहाने जो व्यक्तियों पर लिखने का चलन है उसमें इतना अनगढपन है कि साफ़ समझ में आ जाता है कि यह किसके खिलाफ़ लिखा गया है। जो कहीं समझ में नहीं आता तो लेखक इशारा करके बता देता है कि किसके लिये लिखा गया है यह सब !

लेकिन यह तय है इस तरह का लेखन बहुत आगे तक नहीं जाता। कूड़ा-करकट की तरह समय की डस्टबिन में पड़ा रहता है। शायद खाद बनने लायक भी नहीं रहता।

क्या कहना है आपका ?


डिस्क्लेमर: व्यंग्य के बहाने का यह लेख किसी के प्रति दुर्भावना से नहीं लिखा गया। सभी के प्रति मन में आदर, उत्साह है मेरे मन में। जो लिखा निर्मल मन से लिखा। नाम लेकर इसलिये लिखा कि कोई गलतफ़हमी न रहे।

रही इनाम-विनाम वाली बात तो उसका अलग गणित होता है। इनाम हमेशा छंटे हुये लेखक को ही मिलता है। उसके बारे में इसकी पहली पोस्ट में लिख चुका हूं !

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10209319133308802


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Monday, October 10, 2016

सड़क पर साईकल पथ

छुट्टी के दिन घर के पचास काम होते हैं। 49 टरका भी दो एक तो बच ही जाता है। निकलना ही पड़ता है घर से बाहर 'सर्जिकल स्ट्राइक' के लिए।

अब ये ससुर 'सर्जिकल स्ट्राइक' भी इतना पॉपुलर हो गया है कि आदमी निपटने भी जाता है तो कहकर जाता है -बैठ ज़रा अपना अभी 'सर्जिकल स्ट्राइक' करके आते हैं।

आर्मापुर से विजय नगर की तरफ जाते देखा कि सड़क के दोनों तरफ़ साईकल पथ बन रहा है। सड़क के किनारे दोनों तरफ की सड़क पर गड्ढा करके खंभे लगाये जा रहे हैं । खम्भे से फुटपाथ तक की सड़क साईकल के लिए सुरक्षित रहेगी।


कालपी रोड हाइवे है। साईकल बीच सड़क पर चलाने पर कोई भी ठोंक कर चला जा सकता है। उसके लिए सड़क का किनारा सुरक्षित करके रखना बढ़िया बात है।

जगह-जगह साईकल चलाने के लिए स्लोगन लगे हैं। 'साईकल चलायें, पर्यावरण बचाएं', 'मुस्कराइए कि आप साईकल पथ पर हैं' इसी तरह के और भी लुभावने वाक्य।



अभी तो पूरा रास्ता बना नहीं। लेकिन जिस तरह साईकल पथ पर ठेलिया वाले अपनी दुकान लगाकर खड़े हो गए उससे लगता नहीँ कि इस पथ पर साईकल चलेंगी। अंतत: इस जगह पर सब्जी वाले, फल वाले, मठ्ठा वाले ही खड़े मिलेंगे। साईकल बीच सड़क पर ही चलेगी। एक्सिडेंट बदस्तूर जारी रहेंगे।

आपका क्या कहना है इस बारे में?

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10209310072922298?pnref=story

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Sunday, October 09, 2016

स्वच्छता अभियान के बाद



इतवार को विक्रम की छुट्टी होती है। वह आराम से खर्राटे लेते हुये सो रहा था कि उसके मोबाइल की घंटी बजी। फ़ोन बेताल का था। झुंझलाते हुये विक्रम ने फ़ोन उठाया। बेताल बोला –’तू अभी तक सो रहा है। मैं यहां कब से नगर निगम के दफ़्तर के पास तेरा इंतजार कर रहा हूं कि तू लादकर ले चलेगा।
सवाल-जबाब करने होंगे। जल्दी आ जा यार। ड्यूटी पूरी करके फ़िर ऐश करें।’


विक्रम ने अनमने मन से मुंह धोया और निकल लिया। बेताल को लादा और चल दिया। आज फ़िर उसको बेताल के बढे हुये वजन का अंदाज हुआ। उसने कहा-“ बेताल भाई, तुम्हारा वजन तो नेताओं के वेतन भत्ते की तरह बढ़ता जा रहा है। कुछ मेरे पर भी रहम कर भाई। वजन कम कर।“

बेताल ने पहले तो सोचा इस विक्रम को हड़का दें। लेकिन यह सोचकर कि इसके बाद किसकी पीठ पर फ़्री फ़ंड में लदेगा वह चुप रह गया। उसने विक्रम को ’सर्जिकल स्ट्राइक’ के किस्से सुनाये। सरकार और सेना की बहादुरी का बखान किया और फ़िर विक्रम को किसी को न बताने की कसम खिलाते हुये बताया कि सरकार ने ’पहली सर्जिकल स्ट्राइक’ कूड़े के खिलाफ़ की थी। उस अभियान का नाम रखा था ’स्वच्छता अभियान।’ मैं अपना आज का सवाल पूछने के पहले इस अभियान के बारे में बताता हूं।

विक्रम को हंसी आने को हुई। उसका मन किया कि वह बेताल को बता दे कि जिस बात को देश का बच्चा-बच्चा जानता है उसको यह बेताल किसी को न बताने की कसम दिला रहा है। पिछले दिनों स्वच्छता अभियान की फ़ाइलें इतनी दौड़ीं कि बाकी के लिये ट्रैफ़िक जाम हो गया था। जो भी गन्दगी हुई खर्च-वर्च में उस सबको ’स्वच्छता अभियान’ के नाम पर निपटा दिया गया। और भी तमाम बातें उसको पता थीं लेकिन वह चुप रहा। उसको पता था कि आजकल सच बोलना बड़ा बवाल का काम है। क्या पता कौन देशद्रोही, गद्दार बताकर गरियाने लगे।

बेताल ने कहा- आजकल सब जगह काम करने का तरीका बदला जा रहा है। जगहों के नाम बदले जा रहे हैं। कुछ हो भले ने लेकिन बदलाव का एहसास हो यह ध्यान रखा जा रहा है। इसलिये मैं भी आज से ही कहानी कम सुनाऊंगा लेकिन सवाल ज्यादा। सवाल भी ऐसे पूछुंगा जिनके बारे में कहानी में हमने बताया ही नहीं होगा। तुमको खुद अपने मन से जबाब देने होंगे।

विक्रम को पता था कि उसका कुछ बोलना बेकार है। दफ़्तरों के अडियल बास की तरह करेगा यह अपने ही मन की। इसलिये उसने झल्लाते हुये कहा –’अब यार तू शुरु कर। दूसरे की गर्दन पर लदे-लदे तुझे तो कुछ फ़र्क नहीं पड़ता लेकिन मेरे हाल तो उस जनता की तरह हो रहे हैं जो नाकारा जनप्रतिनिधियों को लादे-लादे घूमती रहती है।

बेताल ने गला खखारकर अपनी बात शुरु की:

“आजकल स्वच्छता अभियान का हल्ला मचा हुआ है देश भर में। कूड़ा ठिकाने लगाया जा रहा है। कहीं-कहीं का कूड़ा हल्ला मचा रहा है। ऐसे कैसे भगा दोगे हमको? हम यहां के स्थायी रहवासी हैं। कहां जायेंगे अपना परिवार लेकर?

सफ़ाई अभियान वाले हाथ जोड़ रहे हैं कूड़े के! भाई साहब एक-दो दिन की बात है! कहीं इधर-उधर हो जाइये। हमको साफ़-सफ़ाई कर लेने दीजिये। फ़ोटो-सोटो हो जाने दीजिये। फ़िर आप रहियेगा ठाठ से। आपकी ही जगह है। कौन रोकने वाला है आपको!

कूड़ा शरीफ़ आदमियों की तरह इधर-उधर हो जाता है। कहीं दीवार के पीछे, कहीं किसी गढ्ढे में, कहीं किसी पुल की आड़ में। जहां कुछ आड़ नहीं मिली वहां फ़टा तिरपाल ओढ़ के सो गया। नदी, नहर, नाले में कूद गया। सफ़ाई की इज्जत के लिये गन्दगी कुर्बान हो गयी।

सबने सफ़ाई के करते हुये फोटो खिंचाये। सफ़ाई मुस्करा रही है। लोग खिलखिला रहे हैं। स्वच्छता अभियान पूरा हो गया है। छुट्टी बरबाद होने का दुख कम हो गया है।“

इतने के बाद बेताल ने कहा। नये पैटर्न के हिसाब से आज कहानी इतनी ही। अब नये पैटर्न के हिसाब से मैं आज तुमसे एक से ज्यादा सवाल पूछूंगा। तुम उनके जबाब दे दोगे तो ठीक वर्ना तुम जो मुझे ढोते हुये कहानी सुनते हो और सवाल के जबाब देते हो उस पर भी सर्विस टैक्स लगा दिया जायेगा जिसकी वसूली भी तुमसे ही होगी। इसके बाद बेताल ने ये सवाल पूछे:

1. सफ़ाई अभियान के लिये झाडू-पंजा मंहगी दरों पर खरीदने के लिये कौन जिम्मेदार है?
2. एक ही तरह की झाडू एक ही दिन अलग-अलग दामों पर क्यों खरीदी गयीं?
3. एक दिन के सफ़ाई अभियान के लिये झाड़ू-पंजा खरीदने के बजाय किराये पर लेने के विकल्प पर क्यों विचार नहीं किया गया?
4. जब एक आदमी को दो घंटे ही सफ़ाई करनी थी तो हर आदमी के लिये एक झाड़ू खरीदने की बजाय एक ही झाड़ू से चार लोगों से सफ़ाई कराने विकल्प पर क्यों विचार नहीं किया गया?
5. सारे लोग एक ही जगह सफ़ाई करते पाये गये इससे कम क्षेत्र की सफ़ाई हुई। अलग-अलग जगह सफ़ाई करने के विकल्प पर क्यों विचार नहीं किया गया?
6. साल भर सफ़ाई का ठेका चलने के बावजूद इतना कूड़ा इकट्ठा कैसे हुआ? क्या सफ़ाई के ठेके में धांधली हुई है?
सवालों से विक्रम को पता चल गया कि ये ससुरा बेताल किसी बाबू से पैसा लेकर उसकी आपत्तियों के जबाब बनाने में सहायता करने का ठेका लिया है। उसने बेताल को बड़ी तेज से हड़काया और कहा कि बेताल यह आदमियों की तरह की हरकतें तुमको शोभा नहीं देती। इस तरह दलाली करना शुरु मत करो। हम लोगों की कहानियां आम जनता अभी मन लगाकर सुनती है। लेकिन जब उसको पता लगेगा कि हम इस तरह पैसा लेकर बाबुओं की आपत्तियां निपटाने में सहायता करते हैं तो वह हमको भी उन नेताओं सरीखा ही समझेगी जो पैसा लेकर संसद में सवाल पूछते हैं।

बेताल ने शर्मिंदा होने का नाटक किया और कहा इस बार बता दो क्योंकि मैं एडवांस में पैसे ले चुका हूं। अब मना करूंगा तो दलाली से बाबू का विश्वास उठ जायेगा जो किसी नौकरशाही के लिये बहुत खराब चीज है। आइंदा ऐसा नहीं होगा।

विक्रम ने झल्लाते हुये बेताल से बाबू का नाम और दफ़्तर का पता पूछा। गूगल सर्च करके आडिटर का पता लगाया। स्कैनर लगाकर उसके दिमाग से सवाल के जबाब निकालकर बेताल को लिखवाये। सवालों के जबाब इस तरह थे:

1. सफ़ाई अभियान की जब घोषणा हुई तो मांग और आपूर्ति के नियम के तहत अचानक झाडू-पंजे के दाम बढ़ गये क्योंकि सभी को सफ़ाई करनी थी। बढ़े हुये दाम पर खरीद अपरिहार्य होने के चलते जायज है। और जहां तक जिम्मेदारी का सवाल है तो इसके लिये जनता जिम्मेदार है क्योंकि जो हुआ सब अंतत: आम जनता के लिये हुआ।

2. स्वच्छता अभियान में अलग-अलग पद के लोग शामिल थे। सबके ’ग्रेड पे’ अलग थे। जैसे एक ही दूरी और एक ही तरह की गाड़ी से आने वालों लोगों के लिये वाहन भत्ता ’ग्रेड पे’ के अनुसार मिलता है वैसे ही सबके ’ग्रेड पे’ के हिसाब से झाडू की व्यवस्था की गयी। इसलिये एक ही तरह की झाडू अलग-अलग दाम पर खरीदी। ऐसा न करते तो सीनियर लोग स्वच्छता अभियान में भाग न लेते। इसलिये एक जैसी सफ़ाई सामग्री अलग-अलग दामों पर खरीदना अपरिहार्य था।

3. किराये पर सफ़ाई सामग्री उपलब्ध ही नहीं थीं। अगर कहीं थी भी तो पर्याप्त नहीं थी। इसके अलावा विभाग में कभी किराये पर सामान खरीदने का काम किया नहीं गया इसलिये अनुमानित किराये की दरें उपलब्ध नहीं थीं इसलिये भी किराये पर लेने के प्रस्ताव पर विचार नहीं किया गया।

4. जो भी लोग स्वच्छता अभियान में शामिल थे उनको अभियान के बाद एक साथ कहीं न कहीं जाना था इसलिये सब लोग एकसाथ सफ़ाई के लिये बुलाये गये। स्वच्छता के बहाने सामूहिकता का भी प्रसार हो गया। इसके अलावा अगर दिन भर सफ़ाई करते लोग तो फ़ोटोग्राफ़ी, नाश्ते वगैरह का खर्च बढ जाता।

5.अलग-अलग जगह सफ़ाई करने से फ़िर लगता बहुत कम लोग सफ़ाई कर रहे हैं। एक जगह इकट्ठा सफ़ाई करने से यह लगा कि पूरा हुजूम जुट गया है सफ़ाई के लिये।जैसे अभी प्रधानमंत्री जी के अमेरिका दौरे में ’दवाई चौराहे’ पर लोग इकट्ठा हुये तो लगा न कि पूरा अमेरिका उमड़ पड़ा। अलग-अलग शहरों में रहते तो वो मजा नहीं आता न।

6. सफ़ाई व्यवस्था साल भर चकाचक चली लेकिन जब स्वच्छता अभियान चलाना था तो इधर-उधर से कूड़े का इंतजाम किया गया। अब सरकार के आदेश का अनुपालन तो जरूरी है न!

सवालों के जबाब नोट करते ही बेताल उड़ते हुये उस बाबू के पास पहुंचा। बाबू ने उससे कहा- ’तुमने आने में देर होते देखकर मैंने आडिटर से सीधे सेटिंग करने की सोच ही रहा था। अच्छा हुआ तुम आ गये। सस्ते में काम हो गया। यह कहकर उसने बेताल को बाकी के पैसे थमाये और आपत्तियों के जबाब टाइप करने लगा।

बेताल लटकने के लिये पेड़ की तरफ़ लौटते हुये सोच रहा था कि कूड़े वाली गंदगी तो साफ़ हो जायेगी लेकिन व्यवस्था की यह गंदगी कैसी साफ़ होगी जो दिखती भले नहीं हो लेकिन गंध सबसे ज्यादा मारती है। इसके लिये स्वच्छता अभियान कब चलेगा?

#व्यंग्य, #व्यंग्यकीजुगलबंदी, Nirmal Gupta, @ravishankar.shrivastava

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10209300271597271&set=a.1767071770056.97236.1037033614&type=3&theater

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Saturday, October 08, 2016

कोई काम है क्या मेरे लिये?

पूजा पांडाल देखकर वापस होटल के पास पहुँचे तो बाहर ही एक जगह चाय बनती दिखी। बहुत देर से चाय पिए नहीं थे तो चाय बनती देखकर 'चयास' लग आई। लेकिन यह भी लगा कि अब चलकर खाना ही खाया जाए। पर फिर इस ख्याल ने जोर मारा कि पता नहीं अब कब फिर कोलकता आना हो। इस ’पिए’ कि ’छोड़ें’ के झूले में काफी देर झूलते रहे। जब खुद तय नहीं कर पाये तो निर्णय मोबाईल के हाथ में सौंप दिए।

तय यह किया कि अगर नौ बज चुके होंगे तो चाय नहीँ पीयेंगे। लेकिन अगर नौ से कम बजा होगा तो पी लेंगे। इतना तार्किक निर्णय लेने के बाद आहिस्ते से मोबाईल निकाला। देखा तो नौ बजने में दो मिनट बाकी थे। अब तो चाय पीना मजबूरी थी।

चाय की दुकान पर खड़े होकर कब आर्डर दिया तब तक उसकी सब चाय बिक चुकी थी। केतली खाली हो चुकी थी। एक बार फिर सोचा छोड़ें चाय अब चलें। लेकिन इस बार चाय वाले बच्चे और वहां खड़े आदमी में रोक लिया। बोले - ’अब्बी दो मैने रुको। अब्बी बनाते।’ अब हम क्या करते । रूकने के अलावा कोई चारा नहीँ था।
बालक ने स्टोब में हवा भरना शुरू किया। जलाया और चाय चढ़ा दी। हम वहां खड़े आदमी से बतियाने लगे।
उसमें बताया कि यह जगह मेट्रो की है। तीन दिन पहले उसने किराये पर ली है। तीस हजार रुपये महीने किराया है। अभी चाय, डोसा वगैरह बनता है। फिर और काम बढ़ेगा। पता लगा वह आदमी कोलकता इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में काम करता है। दुकान किसी के साथ पार्टनरशिप में है।


हम चाय बनाने वाले बालक से बतियाने लगे। पता चला बालक यहां आने के पहले भुवनेश्वर के एक गेस्ट हॉउस में काम करता था। पांच साल काम किया। खाना-वाना सब बना लेता है। कुछ दिन पहले कोलकता आ गया। यहां अकेले रहता है। माँ मिदिनापुर में रहती है। पिता रहे नहीं। पांच साल पहले। घर का अकेला लड़का है। हाईस्कूल तक पढाई किया। पिता के न रहने पर मजबूरी में काम पर लगना पड़ा।

बालक चाय बनाते हुए बतिया रहा था। हवा भरते हुए अंदाज से चीनी और पत्ती डाली। बताया कि सुबह आठ से रात ग्यारह बजे तक दुकान पर रहना होता है। रात को दुकान बन्द करके अंदर ही सो जाता है। नहाने-निपटने का काम पास के सामूहिक शौचालय में करता है।

चाय बन गयी तो छान कर हमको दी। इस बीच एक युवा जोड़ा वहां आया। लड़के ने दो 'कम चाय' मांगी। उसने दी। हमने सोचा कम चाय के पैसे कुछ कम होंगे। लेकिन उसने बताया कि रेट सेम हैं-पांच टका।

युवा जोड़े में से लड़के की दाढ़ी ऐसी लग रही थी मानो उसने मेहनत से ठोढ़ी पर सामन्तर चतुर्भुज बनाने का प्रयास किया हो। उसने बताया कि चाय में चीनी कम है। बालक ने थोड़ी-थोड़ी चीनी उनके कप में डालकर चम्मच से मिला दिया। इस बीच एक आदमी ने चाय में चीनी कम डालने के सिद्धान्त की व्याख्या करते हुये बताया- " कम हो और डाली जा सकती है। लेकिन ज्यादा हो जाये तो निकाली नहीं जा सकती। इसलिये  चीनी कम डालना हमारा ठीक रहता है।’

चाय वाले बालक ने अपने बारे में पूछते देखकर मुझसे पूछा- ’ कोई काम है क्या मेरे लिये?’ हमने कहा -’नहीं ऐसे ही पूछ रहे।’ वह बोला- ;’आजकल कौन पूछता है किसी से इतना। किसी के पास इतना फ़ालतू टाइम कहां।’

मल्लब उसने मुझे बता दिया कि हम जो पूछ रहे हैं वह खाली-मूली टाइम वेस्ट कर रहे हैं।

लेकिन फ़िर अपने आप बताने लगा- " पैसा बहुत कम देते हैं यहां।" कुल तीन हजार महीने और खाना-खुराक पर चाय बनाने का काम करता है वह। उसकी आवाज में विवसता और शिकायत का मिला जुला भाव था।
बाइस साल की उमर के उस बालक को सुबह आठ बजे से रात ग्यारह बजे तक की महीने भर की मेहनत के मात्र तीन हजार रुपये मिलते हैं। इससे ढाई गुना होटल में एक रात के कमरे का न्यूनतम किराया है। आर्थिक असमानता का कितना जलवा है अपने समाज में। यही सोचते हुये वापस चले आये कल होटल में।

आज फ़िर से फ़ोटो देख रहा था तो सब याद आया। सोचा आपसे साझा करें।

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कोलकता की दुर्गा पूजा

न्यू मार्केट का दुर्गा पंडाल
कोलकता आये तो पहले भी थे लेकिन पूजा के मौके पर पहली बार आये। हर तरफ भीड़। हर तरफ उल्लास। पूजा का उत्साह।

कल शाम को घूमने निकले। जहां ठहरे थे वहाँ से शाम को पूजा पंडाल देखने गए। पास में न्यू मार्केट में सजा था पांडाल। फुटपाथ के रास्ते गए। फुटपाथ की चौड़ाई में दोनों तरफ़ दुकानें लगी हुई थी। दुकानों के बीच की जगह पर लोगों की भीड़ ठहरते हुए टहल रही थी। जगह की कमी, गर्म हवा। ऐसा लगा फुटपाथ में ब्लोअर चल रहा हो।


रास्ते के एक पांडाल में दुर्गा जी
एक लड़का मोबाईल में बात कर रहा था। आवाज सुनाई नहीं दे रही होगी तो एकदम फुटपाथ की दीवार से स्पाइडरमैन की तरह चिपका हुआ मोबाइल को दीवार से सटा कर एक कान में ऊँगली डाले हुए बतिया रहा था। शायद दीवार के कान के सहारे दूसरी तरफ से आती आवाज सुनने की कोशिश कर रहा हो।

न्यू मार्केट की तरफ गए। पूजा पांडाल सजा हुआ था। लोग आते। देवी मूर्ति को निहारते। निकल लेते। हम भी निहारते हुए निकल लिए।


मोहम्मद अली पार्क की महिषासुर मर्दनी
पता चला आगे मोहम्मद अली पार्क में भी पूजा पांडाल सजा हुआ है। पांच किलोमीटर दूर। एस्प्लेनेड मेट्रो से टिकट लिए। पांच रूपये का टिकट दो स्टेशन आगे का। मेट्रो में भीड़ गजब की। एक लड़की चढ़ी। साथ का बैग अपने आगे सटा के खड़ी हो गयी। साथ के यात्री ने जगह बनाते हुए उसको घूमकर खड़ा होने की सलाह दी ताकि भीड़ के धक्के और रगड़-घसड़ से बचाव हो सके। लड़की खड़ी हो गयी। आराम से।

सेन्ट्रल में उतरकर पूजा पांडाल देखने मोहम्मद अली पार्क की तरफ गए। रास्ते में और भी भव्य पांडाल दिखे। एक जगह आरती हो रही थी। महिषासुर मर्दिनी की मूर्ति ऊँचे स्टेज पर सजी हुई थी। गलियारे में कुछ कुर्सियां पड़ी हुई थी। लोग आते-जाते जा रहे थे। जगह-जगह व्यवस्था के लिए पुलिस तैनात थी। एक पूजा पंडाल के बाहर किताबें भी सजी हुई थीं। सब बांगला में। हिंदी की होती तो देखते भी।


फ्रूट कुल्फी और बायीं तरफ मुफ़्त में वितरित होती दवाएं
रस्ते में जगह-जगह फुटपाथ पर दुकाने खाने-पीने की थी। दो लोगों के एक साथ चलने की जगह के बराबर फुटपाथ पर जगह-जगह लोग सो भी रहे थे। कुछ पतली चटाई बिछाये कुछ सीधे जमीन पर। थककर लोग आसपास के जनरव, कलरव से निर्लिप्त बेसुध, बेखबर, निर्लिप्त सो रहे थे। लोग उनके अगल-बगल से बतियाते हुए गुजरते जा रहे थे। जैसे कभी आक्रमणकारियों की फौजों के आवागमन से बेखबर निर्लिप्त किसान लोग अपने खेत जोतते रहते थे वैसे ही तमाम लोग फुटपाथ पर आरामफर्मा थे।

मोहम्मद अली पार्क जाने के लिए सड़क पार करनी थी। जब तक ट्रैफिक लाइट हरी थी तब तक चौराहे पर कोलकता पुलिस वाले रस्सी लगाये लोगों को रोके हुए थे। बत्ती लाल होते ही गाड़ियां रुक गयीं। पुलिस वाले ने कमर की ऊंचाई तक पक़ड़ी हुई रस्सी जमीन पर लिटा दी। भीड़ चौराहा पार करने लगी।


सात रूपये का बस का टिकट
एक परिवार शायद बाहर से आया था। दस-बारह लोग एक के पीछे एक लाइन से सड़क पार करने के बाद भी लाइन में चलते रहे। सबसे आगे एक आदमी की कमीज एक महिला ने पकड़ी हुई थी। माहिला का पल्लू पीछे से दूसरी महिला ने थाम रखा था। एक के पीछे एक को थामे हुए लोग सड़क पार कर रहे थे। वहीँ कुछ लोग हाथ फैलाये हुए मागने का काम भी अंजाम दे रहे थे। फुथपाथ से लगे हुए झोपडी नुमा घर के बाहर सफाई करते हुए एक महिला भीड़ को देखती जा रही थी। रास्ते में एक दारु के ठेके पर लोग जमा थे। शायद मारे जाने के पहले महिषासुर के लिए पीने का इंतजाम कर रहे थे।

मोहम्मद अली पार्क में पूजा पांडाल बड़ा भव्य था। लोग मूर्ति देखते जा रहे थे। कुछ लोग फोटो भी ले रहे थे। उद्घोषक तड़ातड़ी आगे बढ़ने का निर्देश दे रहा था। फोटो खींचने से मना कर था कहते हुए कि फोटो खींचने वाले का मोबाइल छीन लिया जायेगा। लेकिन लोग उसके सामने फोटो खींच रहे थे।

लोग अपने साथ वालों के साथ सेल्फिया रहे थे। मेरे सामने एक लड़के के अपना हाथ क़ानून के हाथों की तरह लंबा करते हुए अपने परिवार के साथ सेल्फी ली। एक जगह चाट खाते हुए कुछ नौजवान लड़के लड़कियां आपस में चुहल करते बतिया रहे थे। लड़के की किसी बात पर चहकते हुए एक लड़की ने हंसकर उसकी पीठ पर धौल जमाया। मल्लब मजे का इजहार किया। लड़के ने इस सर्जिकल धौल का आनन्द उठाते हुए बतियाना जारी रखा।

बातें तो हमारे पास भी बहुत थीं लेकिन अकेले थे। किसी धौल-धप्प की गुंजाईश नहीं होने के कारण बाहर आ गए। बाहर एक जगह फ्रूट कुल्फी बिक रही थी। एक लोहे के बेलनाकार बर्तन को दो लोग खड़े-खड़े बैल की तरह घुमा रहे थे। बर्तन में भरी बर्फ से कुल्फी ऊपर जम गयी थी। एक लड़का चाकू से कुल्फी खुर्चते हुए लोगों को देता जा रहा था। हमने भी खाई। 20 रूपये का पत्ता। मुंह में रखते ही घुल जा रही थी 'कुल्फी चूरा' घुल कर दांत ठंडा कर रही थी। पैसे देते ही बदनाम कुल्फी का पञ्च याद आया -'बदनाम कुल्फी, खाते ही जुबान और जेब की गर्मी गायब।

वहीं एक लड़का एक लड़की के साथ कुल्फी खाने रुका। लड़की ने चम्मच से लड़के को खिलाई कुल्फी। लड़के ने चिड़िया की चोंच की तरह मुंह खोला। लड़की ने उसके मुंह में कुल्फी धर दी।जब तक बालक ने आँख मूंदकर कुल्फी की ठंडक का एहसास किया होगा तब तक बालिका ने खुद भी दो चम्मच कुल्फी का चूरा मुंह में भर लिया।

बगल में ही निशुल्क दवाओं का वितरण हो रहा था। तृण मूल कांग्रेस की तरफ से। सामान्य दवाएं वितरण के लिए रखी थीं। पास ही मुफ़्त पानी भी पिलाया जा रहा था। प्लास्टिक के ग्लास में पानी पीने वालों का हुजूम जमा था। बगल में ही बोतल बंद पानी 20 रूपये बोतल बिक रहा था। मुफ़्त सेवा और भुगतान पर सेवा की साझा सरकार चल रही थी।

लौटते हुए उत्तर प्रदेश में एक जगह नवाजुद्दीन को रामलीला में मारीच का रोल अदा करने से रोकने की घटना याद आई। शुक्र मनाया कि यहां मोहम्मद अली पार्क में दुर्गा पूजा पंडाल लगाने पर किसी ने कोई बवाल नहीं काटा।

लौटते हुए बस से आये। किराया 7 रूपये। दो रूपये ट्राम के मुकाबले ज्यादा। कंडक्टर पतली-पतली टिकटें अंगुली के बीच दबाये सबको बाँटता जा रहा था।रेजगारी वापस करता जा रहा था। भरी भीड़ में यह सब करना अपने में कुशलता का काम है। वह आराम से करता जा रहा था।

रास्ते में एक जगह बस रुकी। एक सामान्य परिवार के लोग हँसते-बतियाते बस में चढ़े। उनमें से एक महिला हमारी बगल की सीट पर बैठकर आगे-पीछे बैठे परिवार वालों से बतियाती रही। हमने अपने स्टॉप के बारे में कंडक्टर से पूछा तो उस परिवार की एक बच्ची ने कहा -'हम भी वहीँ उतरेंगे। बता देंगे।' हम तसल्ली से बैठ गए।

आगे एक स्टॉप पर कुछ सवारियां उतरी। परिवार वालों के पास की सीट खाली हो गयी। हमको लगा कि वह महिला अपने परिवार के लोगों के और पास/साथ बैठने चली जायेगी। लेकिन वह वहीँ बैठी रही। वहीँ से बतियाती रही।

स्टॉप पर उतरे तो होटल का रास्ता पुछा। एक ने बताया -'पंद्रह मिनट लगेगा। और तेज जाओगे तो दस मिनट।'लेकिन हमको कोई जल्दी तो थी नहीं सो आराम से पहुंचे। अपने आसपास से गुजरते लोगों को देखते-निहारते। आगे का किस्सा अगली पोस्ट में

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Sunday, October 02, 2016

गांधी जी की अहिंसा


आज दो अक्टूबर है। गांधीजी का जन्मदिन। जित्ती खुशी उससे ज्यादा गम है कि इस बार इतवार को पड़ा दो अक्टूबर। एक छुट्टी मारी गयी। लेकिन कुछ लोगों को गांधी जयन्ती मनाने के लिये छुट्टी के दिन भी तैयार होते देख दुख कम हो गया। दूसरे का फ़ूला दुख देखकर अपना दुख पिचक जाता ।

गांधी जी की याद साल में दो बार करी जाती है। एक बार 2 अक्टूबर को जब वे पैदा हुये और फ़िर 30 जनवरी को जब वे निकल लिये। लेकिन छुट्टी केवल 2 अक्टूबर को होती है। 30 जनवरी की छुट्टी नहीं होती। इससे पता चलता है आदमी के न रहने पर, भले ही वह गांधी जी ही क्यों न हो, उसका जलवा कम हो जाता है।

गांधीजी का खुद का जलवा भले कम हुआ हो लेकिन उनके नाम का भौकाल बना हुआ है। उनकी फ़ोटो लगा हुआ नोट फ़ुल जोरदारी से चलता है। बल्कि सही कहा जाये तो सिर्फ़ वही चलता है। बस ’नोट नाम सत्य’ है। सब तालों की चाबी है गांधीजी की फ़ोटो लगा नोट। इसीलिये जिसको भी गांधीगिरी करनी होती है वह पहले नोट का जुगाड़ करता है। नोट से वोट। उसके बाद फ़ाइनल चोट।

गांधीजी कहा करते थे कि उनका जीवन ही उनका दर्शन है। इस मामले में गांधीजी काफ़ी यूजर फ़्रेंडली हैं। लोग अपने-अपने हिसाब गांधीजी की शिक्षाओं पर अमल करते हैं।

गांधीजी ने निर्णय लेने में दुविधा की स्थिति होने पर मंत्र बताया था कि आप विचार करो कि आपके काम से समाज के अंतिम व्यक्ति को क्या फ़ायदा होगा। उसके हिसाब से निर्णय लो। आज लोग इस ’गांधी निर्णय मंत्र’ का पूरी ईमानदारी से पालन करते हैं। वही निर्णय लेते हैं जिससे उनके समाज के अंतिम व्यक्ति को फ़ायदा पहुंचता हो। यह बात अलग है कि उनका समाज उनकी सोच के हिसाब से तय होता है। किसी का समाज उसके धर्म वाले हैं, किसी का उनके जाति वाले, किसी का उनके गांव वाले। ’छोटा परिवार, सुखी परिवार’ के हिमायती लोगों के लिये उनके परिवार का व्यक्ति ही समाज का अंतिम व्यक्ति होता है। इस लिहाज से देखा जाये तो परिवारवादी सच्चे गांधीवादी हैं।

गांधीजी का प्रिय भजन था – “वैष्णवजन ते तेते कहिये, जे पीर पराई जाने रे।“ आज लोग सच्चे वैष्णव की तरह अच्छी तरह से दूसरे की पीड़ा का अंदाज कर लेते हैं इसके बाद चोट पहुंचाते हैं। कोशिश करते हैं कोई कमी न रह जाये कष्ट देने में। आज के बाहुबली तक इस भजन पर अमल करते हैं। उनको अच्छे से पता होता है कि जिसने उनको ’गुंडा टैक्स’ से मना किया उसको सबसे अधिक पीड़ा तेजाब से नहलाने पर होगी। वे अपने विरोधी को सबसे क्रूर तरीके से निपटाते हैं। आज के गुंडे, बाहुबली इस मामले में गांधीजी के सच्चे अनुयायी हैं।

गांधी जी के ब्रह्मचर्य के प्रयोग को लोगों ने जितना अपनाया है उतना शायद उनकी किसी और शिक्षा पर अमल नहीं किया होगा। दिन दहाड़े लोग किसी भी उमर की बच्ची, स्त्री पर अपना प्रयोग कर डालते हैं। दिन प्रतिदिन यह प्रयोग बढ़ते जा रहे हैं। गांधी जी ने तो अकेले किया, बुढापे में किया। लेकिन लोगों को यह इतना अपील करता है कि कई लोग तो जवान बाद में होते हैं, यह प्रयोग पहले कर डालते हैं। और तो और लोग उनकी सामूहिकता वाली बात को जोड़कर ’सामूहिक ब्रम्हचर्य के प्रयोग’ कर डालते हैं। सरकारें भी इस मामले में इसीलिये कुछ बोल नहीं पातीं। क्या करें, कैसे अंकुश लगाये लोगों की इस ’नपुंसक गांधीगिरी’ यह न कानून को समझ में आता है न व्यवस्था को।

गांधी जी की ’पाप से घृणा करो, पापी से नहीं’ वाली बात को राजनीतिक पार्टियों ने अच्छी तरह से अमल में लाया है। वे अपराध से घृणा करते हैं, अपराधी से नहीं। गुंडई से घृणा करते हैं, गुंडो से नहीं। उनको अपने बटलहोल में गुलाब की तरह सजाकर रखती हैं। काली करतूतों का विरोध करती हैं लेकिन चुनाव जीतने के लिये जरूरी कालेधन से नहीं।

गांधीजी की शिक्षाओं पर जित्ता अमल सरकारों ने किया है उतना किसी और ने नहीं किया होगा। सरकारों को पता है कि बिना गांधीजी के रास्ते पर चले देश का उद्धार नहीं होगा। इसलिये जगह-जगह ’महात्मा गांधी रोड’ बनावाये हैं। इमारतों बनवाई हैं गांधीजी की नाम पर। योजनायें चलायी हैं। मनरेगा जैसी सबसे बड़ी पैसा खैचू योजना तक उनके नाम पर चलाई है।

लेकिन सरकारों को पता है कि देश का काम एक अकले गांधी जी से नहीं चलना इसलिये सरकारें यह व्यवस्था करने की कोशिश करती हैं कि देश में अनगिनत गांधी बनें। इसीलिये सरकारें इस तरह की योजनायें बनाती है और बनाने से अमल करती है कि लोग गांधीजी की तरह अधनंगे रहें। गांधी जी की तरह उपवास करें। भूखें रहें। गांधी जी जिस तरह का जीवन अपनी मर्जी से जिये उस तरह का जीवन जीने का इन्तजाम करती हैं सरकारें। भूखों नंगों की आबादी बढती जा रही है। हर साल करोडों लोगों को जबरियन गांधी बना रही हैं सरकारें।

गांधी जी के ’दरिद्रनारायण’ की अच्छी तरह से सेवा के इरादे से ही सरकारें समाज में दरिद्रों की संख्या बढाती जा रही हैं। इस चक्कर में चंद लोग अगर अमीर बनते जा रहे हैं तो कोई बात नहीं। बड़े उद्धेश्य को हासिल करने में थोड़ा-बहुत हेर-फ़ेर तो चलता है।

गांधी जी स्वच्छता के तगड़े हिमायती थे। अपनी गंदगी खुद साफ़ करने पर जोर देते थे। सरकारें उनकी इसी शिक्षा का प्रसार करने की मंशा से तमाम गंदगी सार्वजनिक जगहों पर छोड़ देती है। सड़कों और सार्वजनिक जगहों की सफ़ाई करके सरकारें लोगों की खुद सफ़ाई करने के गांधीजी के तरीके को खतम नहीं करना चाहती।
यह अच्छा हुआ कि आज गांधीजी नहीं हैं। केवल उनकी शिक्षायें हैं। हम अपने हिसाब से उन पर अमल कर लेते हैं और काम भर के संतुष्ट हो जाते हैं। आज गांधी होते तो बड़ा बवाल होता। आज अगर वे होते तो शायद उनका भी फ़ेसबुक खाता होता, ट्विटर हैंडल होता। हर तरह की हिंसा के खिलाफ़ वे अपनी आवाज उठाते और जहां देखो वहां अनशन पर बैठ जाते। आज वे होते तो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान की तनातनी के खिलाफ़ बाघा बार्डर पर हड़ताल पर बैठे होते। उनकी इस ’हरकत’ पर दोनों देशों के लोग उनको गरिया रहे होते। हिन्दुस्तान वाले उनको पाकिस्तान भेजने का आह्वान करते। पाकिस्तान वाले कहते इनको अफ़गानिस्तान पठाओ। बवाल है यह आदमी इसको फ़ौरन निपटाओ। गांधी अपनी अहिंसा की सीख देते हुये एक बार फ़िर हिंसा का शिकार हो जाते।

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