Sunday, February 26, 2017

शराफ़त


#व्यंग्यकीजुगलबंदी-23  https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210666791279409
शराफ़त की तलाश में हम शरीफ़ को खोजते हैं। अगर कोई शरीफ़ है तो उसमें शराफ़त तो होगी ही न। अब शरीफ़ की पहचान कैसे करें? आजकल तो हर आदमी जो होता है दिखता उससे अलग है। लोग तो कहते हैं जो आदमी जैसा दिखता है वैसा कत्तई नहीं हो सकता। इसलिये देखकर शरीफ़ की पहचान करना मुश्किल काम है। फ़िर क्या करें? हरकतों से पहचाना जाये क्या?
हरकतों पर अगर जायें तो लोग कहते हैं - ’आजकल शरीफ़ आदमी की मरन है।’
लेकिन शराफ़त के इस नियम में लफ़ड़ा यह तय करने में है कि मरन किसकी हो रही है। मरन से मतलब यह हुआ कि मरा नहीं है लेकिन बस मरने ही वाला है। मरणासन्न है। इस लिहाज से तो देखा जाये तो सारी दुनिया शरीफ़ है। अपने यहां चुनाव जीतने के लिये मारकाट मचाती पार्टियां, उनके दिग्गज नेता, कश्मीर के लिये हल्ला मचाते नवाज शरीफ़ से लेकर प्रवासियों को खदेड़ने की कसम खाते ट्रंप तक, रूस की कुर्सी पर अंगद के पांव की तरह जमे हुये पुतिन से लेकर अपने मोहल्ले के नुक्कड़ पर पान फ़ेरते छज्जू पनवाड़ी तक सब शरीफ़ ही तो हैं क्योंकि सबको एक न एक दिन तो मरना ही है। सबकी मरन ही तो है।
लेकिन अगर इन सबको शरीफ़ मान लिया जायेगा तो शराफ़त का जी दहल उठेगा। वह आत्महत्या कर लेगी बेचारी।
एक और कहावत है शरीफ़ लोगों के बारे में। देखिये शायद उससे कुछ काम बने। कहा गया है:
लहूलुहान नजारों का जिक्र आया तो
शरीफ़ लोग उठे और दूर जाकर बैठ गये।
शराफ़त का यह टेस्ट बड़ा बवालिया है। इसके लिहाज से अगर टेस्ट करना हो तो पहले सौ-पचास लोगों को इकट्ठा करो। फ़िर भीड़ के सामने खून खराबा करो। लहू लुहान नजारों की रनिंग कमेंट्री टाइप करो। उसको सुनकर जो लोग दूर जाकर बैठ जायें उनको शरीफ़ मान लिया जाये। लेकिन इस टेस्ट में भी पेंच हैं। जैसे ही शराफ़त का यह इम्तहान शुरु होगा, लोग कहेंगे - “अबे फ़िर चुनाव आ गये क्या जो यह दंगा होने लगा?”
इसके अलावा भी उठने-बैठने से लाचार, गठिया के मरीज और लहूलुहान नजारों का जिक्र सुनने में असमर्थ (कर्ण दिव्यांग) लोग इस इम्तहान में फ़ेल हो जायेंगे। वे जहां के तहां बैठे रहेंगे। यह भी कि जिनके घर ’लहूलुहान नजारों वाले घटनास्थल ’के एकदम पास ही होंगे वे भी दूर जाकर बैठ नहीं पायेंगे। बहुत दूर से अगर लोगों को लाकर लहूलुहान नजारे दिखाये जायेंगे तो दिखाने वालों का खर्चा डबल हो जायेगा। उनको लाने के साथ दूर जाकर बैठने का भी खर्च देना पड़ेगा। शराफ़त का यह बहुत इम्तहान खर्चीला होगा। इसलिये यह टेस्ट अमल में लाने लायक नहीं है। शायरी तक ही ठीक है। वैसे भी हम लोग रोजमर्रा की जिन्दगी में देखते ही हैं कि लोग अपने आसपास खून-खच्चर होते देखते हुये अपने काम से काम रखते हुये जीते रहते हैं। कहीं दूर जाकर नहीं बैठते। लहूलुहान नजारों के बगल से जरा बचाकर निकल जाते हैं। इनमें से भी सब नहीं तो कुछ लोग तो शरीफ़ होंगे ही !
शराफ़त का मोटा-मोटी मतलब यह समझ में आता है कि जो अपने काम से काम रखे, किसी दूसरे के फ़ंटे में टांग न अड़ाये। ’न उधौ से लेना न माधौ’ का देना घराने का आदमी हो उसको शरीफ़ आदमी कहा जा सकता है।
इस लिहाज से भी देखा जाये तो और विकट कन्फ़्यूजन होता है। संपन्न और दबंग लोग गरीब और कमजोर को लूटने में अनासक्त भाव से लगे हैं। गरीब और कमजोर इसे अपनी नियति मानकर पूरी विनम्रता से लुटने में सहयोग कर रहा है। नेता जनता की भलाई के लिये उसके बुरे हाल बना रहे हैं। उनको पता है जितने बुरे हाल होंगे जनता के उतना ही उसकी सेवा और कल्याण में आसानी होगी। पूरी शराफ़त से वे जनता की सेवा का काम कब्जे में लेने में लगे हुये हैं। जनता की सेवा का ठेका पाने के लिये वे गाली, गलौज, मार-पीट, गुंडागर्दी वाली शराफ़त से भी परहेज नहीं कर रहे हैं। लोकतंत्र में शराफ़त के नये-नये नमूने पेश कर रहे हैं।
बड़े पैमाने पर देखा जाये तो पाकिस्तान पूरी तन्मयता से खुद को बरबाद करते हुये भी पडोस में आतंक फ़ैला रहा है, अमेरिका विश्व में अमन कायम करने के लिये दुनिया भर में बम बरसा रहा है, हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में दोस्ती बनाये रखने के लिये दोनों को हथियार बेंच रहा है। जिसके पास पैसा नहीं उसको अपने टेंट से दे रहा है (निकल तो आयेगा ही कभी न कभी)। विकसित देश अविकसित देशों को लूट रहे हैं और इसके बाद उसी लूटी हुई सम्पत्ति के कुछ हिस्से से उनकी आर्थिक सहायता कर रहे हैं। दुनिया भर में लोकतंत्र का हल्ला मचाने वाले अरब में राजतंत्र की हिफ़ाजत में लगे हुये। पूरी शराफ़त से अपना काम कर रहे हैं।
लेकिन शराफ़त का सच्चा नमूना देखना है तो बाजार के पास आना चाहिये। बाजार लोगों को लूटता भी है और लूटने के बाद लूट से बचने के तरीके भी बताता है। आपकी ही जेब से पैसा निकलकर आपको दर्द भी देता है। इसके बाद आपके पैसे से ही वह आपके दर्द की दवा भी बेंचता है। वह अपराध में भी सहयोग करता है, अपराधी को पकड़वाने में सहयोग भी करता है। बाजार अगर इंसान होता तो उसको दुनिया का सबसे शरीफ़ इंसान कहा जाता।
चलन के हिसाब से देखा जाये तो किसी आदमी की शराफ़त तभी तक शराफ़त कहलाती है जब तक वह दूसरे की शराफ़त में अडंगा न लगाये। अड़ंगा लगाते ही अगले की शराफ़त या तो बेवकूफ़ी में बदल जाती है या फ़िर (औकात के हिसाब से) हठधर्मिता, बदतमीजी, जबरदस्ती , मनमानी आदि-इत्यादि गुणों में बदल जाती है। विडम्बना यह है कि बेवकूफ़ी वाली बात को लोग तो मुंह पर कह देते हैं लेकिन बाकी को शराफ़त ही कहते रहते हैं।
मतलब कमजोर की शराफ़त को बेवकूफ़ी और समर्थ हठधर्मी की बदतमीजी और मनमानी भी शराफ़त ही कहलाती है।
इत्ते घनचक्कर हैं इस शराफ़त की राह में कि आपको और घुमायेंगे तो आप हमसे कहने लगोगे - ’अजीब बेवकूफ़ी कर रहे हो यार शराफ़त के नाम पर।’
हम आपकी बात काट भी नहीं पायेंगे क्योंकि एक तो आपकी बात कहीं से गलत भी नहीं होगी और अगर होगी भी तो भी आपकी हर बात को शराफ़त कहना हमारी मजबूरी है फ़िलहाल। :)
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Friday, February 24, 2017

स्मार्ट शहर में जाम


कल सुबह दफ़्तर जाते हुये सूरज भाई फ़ुल मूड में दिखे। सुबह-सुबह का समय था इसलिये गरम तो नहीं लेकिन चमक खूब रहे थे। सारी सड़क पर किरणों और उजाले का इंतजाम था। पेड़-पत्ती-फ़ूल सब जगह किरणें खिलखिला रही थीं। एकाध पत्तियां हवा के इशारे पर खुद तक धूप न पहुंचने की शिकायत करने के लिये जैसे ही हिलीं, उजाले और किरणों ने उनका मुंह चमका दिया। जन्मदिन केक कटने पर जैसे क्रीम से मुंह पोत देते हैं उसी तरह पूरी पत्ती, कली को रोशनी से लहलहा दिया। पत्ती मगन मन और तेज थिरकने लगी।
चौराहे पर स्कूल बस बिना गोल चक्कर लगाये शार्टकट मारते हुये निकलने लगी। आजकल भीड़ के चलते सवारियां चौराहे पर चक्कर लगाने का समय बचाते हुये ऐसे ही निकल जाती हैं। ट्रैफ़िक वाले भी अक्सर यह काम कराते हैं। जाम हटवाते हैं, जाम लगवाते हैं।
बस के आगे बैटरी वाले ऑटो ने अपनी गाड़ी सटा गयी। दस गुनी बड़ी बस अपना सा मुंह लेकर खड़ी हो गयी। ड्राइवर पिपियाते हुये आटो के निकलने का इंतजार करता रहा। ऑटो वाला अपने आगे वाले रिक्शे वाले को हटने के लिये हार्न बजाता रहा। जब तक बुजुर्ग रिक्शा वाला पहले उचककर और फ़िर उतरकर रिक्शा आगे से हटा दिया तब तक ऑटो वाले ने उसको दो-चार हल्की टाइप गाली दे डालीं। सुबह का समय होने के चलते गालियों में गुस्सा और तेजी की कमी थी। लेकिन गालियां तो गालियां थीं जैसी भी हों। रिक्शे वाला आगे निकलजाने के चलते उसे सुन नहीं पाया तो आसपास के राहगीरों को सुननी पड़ी।
फ़जलगंज चौराहे के पर एक दूसरे के लम्बबत जाते दो मोटरसाइकिल सवार के अगले और पिछले पहिये हल्के से भिड़ गये। जब तक दोनों को भिड़ने का पता चलता तब तक वे लोग न्यूटन बाबा के जड़त्व के नियम का सम्मान करते हुये एक दूसरे से दस मीटर की दूरी पर पहुंच गये थे। एक ने मुड़कर दूसरे को देखा। गर्दन में शायद तकलीफ़ थी इसलिये पूरी तरह नहीं देख पाया। दूसरा सवार हेलमेट पहने थे। उसने भी हेलमेट उतारकर कुछ करने बोलने की मंशा जताई लेकिन दूसरी तरफ़ से कोई पहल न होते देख चुप रहा। अंतत: दोनों किकिया के अपने-अपने रास्ते चले गये। लगता है दोनों को दफ़्तर पहुंचने की जल्दी रही होगी।
हमसे आगे एक रिक्शे वाला रिक्शे पर लम्बी सरिया लागे हुये चला जा रहा था। सरिया रिक्शे से तीन-चार फ़ुट पीछे तक तोप की तरह निकली हुई थी। खतरे का निशान बताने की गरज से उस पर एक लाल कपड़ा लहरा रहा था। हमको लगा रिक्शा चलने पर हिलती सरिया गाना गा रही है- हवा में उड़ता जाये मेरा लाल दुपट्टा मलमल का।
झकरकटी पुल पर भीड़ के चलते हुये धीमे हुये स्कूटर पर एक पुलिस वाला. हल्का हाथ देकर, बिना कुछ पूछे अधिकार सहित बैठ गया। जैसे विक्रम के कन्धे पर बेताल बिना कुछ पूछे बैठ जाता है उसी तरह। स्कूटर वाले ने कुछ पूछने की बेवकूफ़ी भी नहीं की। आगे टाटमिल चौराहे पर बेताल विक्रम से बिना कोई सवाल पूछे उतर गया।
हमको लगा कि जब आप किसी से कोई सुविधा लेते हो तो सवाल पूछने का सहज हक अपने आप खो देते हैं।
लौटते में फ़िर झकरकटी पुल पर जाम मिला। एक ऑटो वाले ने हमसे कहा - ’ए सैंट्रो , आगे बढो भाई।’ हमने अचकचा कर आगे देखा। हमारे आगे की सवारी और हमारी गाड़ी के बीच आधा मीटर की सड़क खाली थी। हमने फ़ुर्ती से आगे बढकर उस सड़क पर कब्जा किया। फ़िर थम गये। इस बीच एक बैटरी वाले ऑटो वाले ने बगल वाले ऑटो वाले से कुछ कह दिया। बगल वाले ने जाम का व्यवहारिक उपयोग करते हुये अपना ऑटो चलता हुआ छोड़ा और ऑटो वाले के पास अकड़ता हुआ आकर उसको सबक सिखाने की बात करने लगा। दूसरा ऑटो वाला भी जबाबी सबक सिखाने की बात की बात करने लगा। दोनों के बीच सड़क पर ही गालियों का जबाबी कीर्तन होने लगा। बात कुछ आगे बढती तब तक जाम कुछ आगे सरक गया। एक मीटर जगह सड़क पर निकल आई थी। आगे वाले ऑटो वाले ने सबक सिखाना स्थगित करके अपना लपककर अपना ऑटो संभाला और आगे बढ गया।
एक बार फ़िर सिद्ध हुआ कि सड़क पर लगने के बाद खुला हुआ जाम कई झगड़े स्थगित कराता है।
जरीब चौकी पर एक बड़ी कार वाला हमको बायें से ओवरटेक करते हुये आगे निकला। तब तक क्रासिंग बन्द हो गयी। कार में किसी को निकलते देखकर मुझे लगा कि अब यह पीछे आकर हमको किसी बात पर हड़कायेगा। हालांकि मैंने गलती जैसी कुछ की नहीं थी। लेकिन उसकी गाड़ी बड़ी थी और हमारे आगे होने के चलते उसको मुझे बायें से ओवरटेक करना पड़ा यह भी कम बड़ा अपराध नहीं था मेरा। हमें यह भी लगा कि वह निकलेगा तो साथ में कोई कट्टा टाइप लहराते हुये या तो फ़ौरन गोली चलायेगा या फ़िर कुछ देर बाद चलायेगा।
मन किया कोई कानून बनना चाहिये जिससे किसी गाड़ी को देखते ही पता चल जाये कि अंदर बैठे लोग कितने गुस्से में हैं। उनके पास कट्टा है कि नहीं। लेकिन कानून बनने से होता क्या है भाई आजकल। कानून बेचारे का तो जन्म ही उल्लंघित होने के लिये होता है। अपने लोगतंत्र में हर कानून बेचारा अपना उल्लंघन करवाकर ही जिन्दा रह पाता है। जहां उसने उल्लंघन होने से एतराज किया, बदल दिया जाता है।
फ़्रिर हमको लगा कि जैसे थरमल इमेजिंग से लोग अंधेरे में भी दिख जाते हैं वैसे ही कोई गुस्सा इमेजिंग तकनीक भी होनी चाहिये। किसी के दस/सौ मीटर दूर से ही पता चल जाये कि उसका कितना गुस्सा है। वह देखते ही कच्चा चबायेगा या फ़िर हल्ला-गुल्ला मचाकर शान्त हो जायेगा।
विजय नगर चौराहे पर तो गदर जाम लगा था। मतलब हर दिन की तरह नजारा था। हमारे पीछे वाले ऑटो वाले अपने पीछे वाले ऑटो की तरफ़ देखते हुये हमारी आगे वाली गाड़ी वाले को गाड़ी को गाली थी। गाली देना का कारण शायद यह रहा हो कि वह जाम में सबसे आगे खड़ा था। चौराहे पर हर तरफ़ से गाड़ियां आ रही थी। सब जाम में फ़ंस जा रही थीं। हर गाड़ी वाला अपने हिसाब से आगे निकलने के लिये छटपटा रहा था, फ़टफ़टा रहा था। फ़िर फ़ंस जा रहा था।
अचानक पीछे वाला ऑटो वाला आगे निकलकर जाम हटवाने में सहायता टाइप करने लगा। गाड़ियों को दिशा बताते हुये निकालने लगा। गाड़ियां अदबदाकर इतनी तेज आगे बढ़ीं कि एकबारगी लगा कि उसके ऊपर चढकर निकल जायेंगी।
कल को हो सकता है कि बड़ी गाड़ियां अपने विज्ञापन में बतायें- ’ अब जाम के झंझट से मुक्ति पाने के लिये जिन्दगी भर के एक/दो जामब्वॉय साथ में।’ सेटपनी की तरह शायद डिक्की में बैठे रहे वे जामब्वॉय। जहां जाम लगा फ़ौरन उतरकर हटवाने लगें।
कानपुर स्मार्ट शहरों की लिस्ट में सुमार हो रहा है शायद। इसकी यह स्मार्टनेस ही है कि यहां के चौराहे किसी ट्रैफ़िक सिग्नल के मोहताज नहीं। किसी चौराहे पर कहीं हरी बत्ती जलती दिखी तो जाम ट्रैफ़िक को आगे बढने से रोक देता। ट्रैफ़िक के हाल अनारकली सरीखे हो जाते हैं। हरी बत्ती उसे रोकती नहीं, जाम उसे आगे नहीं जाने देता।
आगे वाली छुटकी गाड़ी आगे बढने में देर कर रही थी क्योंकि उसके आगे एक ट्रक लम्बवत खड़ा था। पीछे वाली गाड़ी घुरघुराते हुये ऐसे आवाज कर रही थी मानो आगे वाली पर दांत पीस रही हो।
इस बीच अचानक जाम खुल गया। सारी गाड़ियां कांजी हाउस की दीवार टूटने पर भागते जानवरों की तरह भागी। भागते हुये हमने जाम हटाने के सूत्रधार ट्रैफ़िक वाले सिपाही को देखा। सैकड़ों गाड़ियों के बीच फ़ंसा सिपाही हर तरह से गाड़ियों को निकालने की कोशिश कर रहा था लेकिन सब गाड़ी वाले अपनी मनमर्जी कर रहे थे। जाम लगाने में सहयोग कर रहे थे।
हमने घर पहुंचकर जो सांस ली उसे सांसों की भाषा में सुकून की सांस कहते हैं।
#रोजनामचा#व्यंग्य है क्या यह ?

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व्यंग्य की जुगलबंदी -22

व्यंग्य की जुगलबंदी -22 का विषय था -बोल सारा रा रा। होली से इतना मिलता-जुलता होने के चलते साथियों ने खूब होलियाया। सबसे पहले Yamini Chaturvedi आईं अपना हिसाब लेकर और शुरुआत की :
जोगिरा सा रा रा रा
होली रंग त्यौहार है, रिमझिम बरसै फाग
रंग भंग की मस्ती मैं बाढ़े जोगीरा तान
जोगीरा सा रा रा रा
आगे समसामयिक घटनाओं से जोड़कर लिखते हुये नोटबंदी पर लिखा:
नोट बंद कर लाइन में जनता दई लगाय
कालाधन तो ना मिलो, कैशलेस हुई जाय
जोगीरा सा रा रा रा
फ़िनिशिंग टच देते हुये सोशल मीडिया की कहानी उजागर कर दी:
गोरी सोवे सेज पै, मुख पे डारे केस
केसन पाछे कर रई व्हाट्सएप पे चैट
जोगीरा सा रा रा रा
ये तो हमने बस नमूने बताये। पूरे सारा रा रा देखने के लिये आप उनकी पोस्ट पर पहुंचिये। लिंक यह रहा :
Udan Tashtari ने खुद भले सातवीं में पढ़ते हुये कभी होली पर निबंध न लिखा हो लेकिन दूसरे बच्चे की कापी में होली का निबंध देख लिया। बच्चे से लिखवाया:
“होली के दिन स्कूल की छुट्टी होती है. इस दिन हम मम्मी, पापा और उनके खूब सारे दोस्तों के साथ मिल कर पिकनिक पर जाते है. सब एक दूसरे से गले मिलते हैं और हैप्पी होली बोलते हैं. बच्चे दिन भर खूब खेलते हैं. पापा मम्मी और उनके दोस्त बीयर पीते है. केटरर खूब सारा खाना बनता है. डी जे वाला गाना बजाता है. सब लोग नाचते हैं. देर शाम को सब थक कर घर वापस आ कर सो जाते हैं... “
संस्कारधानी वाले इसको देखेंगे तो दौड़ा लेंगे कि यहां बीयर कौन पीता है होली में। इसके बाद समीरलाल व्यंग्यात्मक मोड़ में आ गये और कहने लगे:
बाथरुम में झाँक के बोले अपनी ये सरकार
रेनकोट में नल के नीचे, बैठे हैं सरदार
जोगी रा सा रा रा रा, जोगी रा सा रा रा रा
अमेरिका को भी लेकर आ गये समीर बाबू होली के बहाने और बोले:
सच को झूठ बताने वाले, जीत रहे हैं जंग
सीएनएन को रोज झिड़कते, राष्ट्रपति जी ट्रम्प..
जोगी रा सा रा रा रा, जोगी रा सा रा रा रा
पूरा लेख बांचने के लिये उड़नतश्तरी का इधर आइये
Sanjay Jha Mastan ने शुरुआत हर-हर गंगे से किया और लिखा:
मैश - अप के हमाम में बोलो हर हर गंगे
मिडिया के रिवेंज पोर्न में सब के पंगे नंगे
जोगीरा सा रा रा रा रा रा रा
सारा रा रा के बहाने सरकार का भी अबार्शन करा दिया:
बूथ दर बूथ पानी हुआ और दूध का दूध
प्रेग्नेंट थी सरकार अब है अबॉर्शन का मूड
जोगीरा सा रा रा रा रा रा रा
फ़ाइनली मन की बात करने लगे संजय झा मस्तान :
दो पाटन के बीच में कोई बाकी बचा न जात
रेडियो में कौन कर रहा है अपने मन की बात
जोगीरा सा रा रा रा रा रा रा
पूरी पोस्ट इधर देखिये संजय की : https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=10155067451062658&id=640082657
Anshu Mali Rastogi होली के इतने मूड में थे कि इनबॉक्स में ही धमक गये। कारण बताते हुये बोले भी:
“लाइफ में आदमी दो स्टेजस पर ही ‘बौराता’ है। पहला- शादी का प्रस्ताव स्वीकारते वक्त और दूसरा- फागुन के महीने में। शादी की बौराहट जब तलक तलाक की नौबत न आए तब तलक यों ही बनी रहती है। किंतु फागुन की बौराहट महीने भर में खुद ही ‘ठंडी’ पड़ जाती है। “
इनबॉक्स में होली का कारण भी बताया:
“हालांकि होली के रंगों से मुझे एलर्जी तो नहीं मगर रंगने-पुतने से जरा बचता ही हूं। एंवई, अच्छा-खासा टाइम खोटी हो लेता है रंगों को छुटाने में। इसीलिए फेसबुक के ‘इन-बॉक्स’ में होली खेलना अधिक पसंद करता हूं। यहां न रंग लगाने-लगवाने का झंझट, न छुटाने का संघर्ष। एकदम सिंपल डिजिटल तरीके से होली का लुत्फ। “
आखिर तक पहुंचते हुये अपनी मंशा भी साफ़ कर दी:
“होली पर महिला मित्र से इन-बॉक्सिए रंग खेलने में बुराई तो कोई नहीं बस जोगी रा सा रा रा रा रा... बहुत अधिक नहीं होनी चाहिए। अपनी मंशा तो बस इत्ती रहती है कि अबीर-गुलाल इन-बॉक्स में थोड़ी-बहुत हंसी-ठिठोली के साथ उड़ते रहें। न हम ओवर होएं। न महिला मित्र ओवर होए। हां, तबीयत में रंगीनियत बनी रहे। और क्या चाहिए। “
अंशुमाली रस्तोगी का लेख पढ़ने के लिये इधर आइये: https://www.facebook.com/anshurstg/posts/200438177103211
Alok Puranik होली में गालव गजक खाते हुये लेख लिखते हुये बताया:
“स्वाद और सुंदरियों की साधना तो इधर के कुछ नये ऋषिवर कर रहे हैं। पहले तो ऋषि की जिंदगी खासी स्वादहीन ही होती होगी। ऋषिगिरी पर्याप्त नोटप्रदायक कैरियर तो इधर ही हुई है। एक बहुत ही प्रख्यात और सम्मानित प्राचीन ऋषि के नाम पर स्थापित संस्था कब्जनाशक और वीर्य को पुष्ट करने वाली दवाओं की बिक्री करती है।”
पूर्वजों के पल्ले सेल्समैन शिप का काम आ गया है। खुलासा करते हुये बताया :
“पुरानों के नाम पर जाने क्या क्या हो रहा है। गजक से लेकर जूते तक बिक रहे हैं।”
पूर्वजों का भविष्य देखते हुये आलोक जी लिखते हैं:
“ शाहजहां साहब क्या पता पाँच दस हजार सालों बाद कारोबारी के तौर पर चिह्नित किये जायें, जिनके चाय ब्रांड और जूता ब्रांड थे। गालवजी की नाम परमानेंटली गजक के साथ जोड़ दिया जाये।”
हमने तो बस झलकियां दिखाईं लेख की। पूरी पोस्ट बांचने के लिये आप इधर पहुंचिये:
https://www.facebook.com/puranika/posts/10154475061578667
Nirmal Gupta जी ने होली में अप्रैल फ़ूल मना लिया। होली के बहाने शोले फ़िल्म की याद करते हुये लिखा:
“अब सवाल किसी जवाब की प्रत्याशा में पूछे भी नहीं जाते ,अब प्रश्न उठाये जाते हैं।ठीक उसी तरह उठाये जाते हैं जैसे हेल्थ कांशस लोग जिम में जाकर बहुरंगी वजन उठाते हैं।जैसे सिक्स या एट एब्स वाले नायक फूल –सी नायिका को बड़े सलीके से उठाया करते थे / हैं।”
हाल में हो रहे चुनाव की असलियत की तरफ़ इशारा करते हुये कहा:
“अलबत्ता राजनीतिक बयानों के जरिये फाग तो शुरू हो लिया है।हर दल इतनी इतनी सीटों पर काबिज होने वाला है कि एक एक राज्य में अनेकानेक सरकारों का गठन होगा ।इतने अधिक मुख्यमंत्री बनेगे कि पदानुकूल कुर्सियों का टोटा पड़ने वाला है।इस बार सारे राजनीतिक दल जीतने वाले हैं।लेकिन जनता को नहीं पता कि उसकी करारी हार कितने मार्जिन से होगी।उसे जोगी सा रे रे का न तो ठीक से पता है और न उसे पता लगाने की कोई आतुरता है।उसे तो यह पता है कि इस बार होली से पहले फर्स्ट अप्रेल फूल को आ जाना है। “
आखिर में निर्मल जी लिखते हैं:
“यह रंगपाशी का नहीं वक्त के अनुरूप रंग बदलते रहने का अवसर है।यह रंगदारी का गिरगिटिया समय है।यह रंगदारों के लिए मनोनुकूल मौका है।वाटर प्रूफ दस्ताने पहन कर बहते दरिया में हाथ धोने में ही बचाव है।एक दूसरे के गले रेतने की इस मारक होड़ में खुल्लमखुल्ला कुछ न करने में ही भलाई है। “
यह लेख बाद में हरिभूमि में छपा भी। पूरा लेख पढने के लिये इधर आयें।
रविरतलामी जी का फ़ेसबुक खाता फ़ेसबुक पेज में बदल गया अत: टैग करने में लफ़ड़ा होता है। उन्होंने हालिया बयानबाजी को अपने लेख में शामिल करते हुये सारा रारा तुकबंदी की। देखिये नमूना:
शौचालय में लगे ताले को दिखाते हुये लिखा:
शौचालय तीन ताले में
जनता निपटे मैदान में
बोलो सा रा रा रा रा रा
हालिया गधा गीरी वाले बयानों पर लिखते हैं:
गुजराती गधे चले दिल्ली
और सैफई के नखलऊ में
बोलो सा रा रा रा रा रा
लेख का पूरा मजा फ़ोटो सहित लेने के लिये इधर आइये
अनूप शुक्ल ने लिखने में देरी की। जब लिखा तो जोगी रा सारा रा रा की उत्पत्ति खोजने लगे:
“लगता है कभी, किसी ने किसी जोगी को शरारा पहने देख लिया होगा कभी। जटा-जूट धारी ,’स्त्री संग-संसर्ग पलायन कारी जोगी को कम कपड़ों में देख अटपटा लगा होगा उसको। औचक उसके मुंह से निकल गया होगा -जोगी रा सा रा रा। “
जोगीरा सारा रा रा में साम्प्रदायिक सद्भाव देखने की कसरत भी की:
“बताने वाले बताते हैं कि जोगी रा सारा रा रा में साम्प्रदायिक सद्भाव की छटा दर्शनीय है। जोगी का संबंध हिन्दू और हिन्दी है शरारा का जुड़ाव मुस्लिम मने उर्दू से है। दोनों को मिलाकर जो बना जोगी रा सारा रा रा उससे हिन्दुस्तानी मेलजोल की संस्कृति का झण्डा फ़हराने लगा।”
अंतत: राजनीति के मैदान में पहुंच ही गये अनूप शुक्ल भी और लिखते भये:
“नेता जी भाषण दे रहे हैं। बिजली, पानी, लैपटाप, साड़ी ब्लाउज, मकान, रोजगार देने का वादा करते हैं। जनता सुन रही है। जनता जानती है नेता जी मजाक के मूड में हैं। वह बोलती है जोगी रा सारा रारा। नेता जी को सुनाई पड़ता है- ’जिन्दाबाद , नेता जी जिन्दाबाद।’ वे अविभूत हो जाते हैं। फ़िर नये वादे करते हैं। चुनाव में वोट देने के लिये कहते हैं। जनता कहती है -जोगी रा सारा रा रा। “
लेख पूरा बांचने के लिये इधर पहुंचिये। https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210638998024595
बाकी साथी शायद व्यस्तता के चलते लिख नहीं पाये। शायद आगे लिखें। लिखेंगे तो इसमें शामिल करेंगे उनको भी।
फ़िलहाल इतना ही । व्यंग्य की जुगलबंदी कैसी लगी बताइयेगा। 

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Thursday, February 23, 2017

जोगी रा सारा रा रा


सबसे पहले ’जोगी रा सा रा रा’ कब, किसने, किसको,किसलिये, किस तरह बोला होगा यह पता करना पड़ेगा। कस के बोला होगा या बोल के कस लिया होगा यह भी पता नहीं। किस करके बोला या बोल के किस किया इसका वायरल वीडियो भी नहीं दिखा कहीं। पता करना पड़ेगा।
लगता है कभी, किसी ने किसी जोगी को शरारा पहने देख लिया होगा कभी। जटा-जूट धारी ,’स्त्री संग-संसर्ग पलायन कारी जोगी को कम कपड़ों में देख अटपटा लगा होगा उसको। औचक उसके मुंह से निकल गया होगा -जोगी रा सा रा रा।
यह भी हो सकता है कि जैसे राजनीतिक पार्टियों की निगाह विरोधी दल की हर हरकत पर रहती है उसी तरह जोगी जी के दिमाग में शरारा चलता रहता हो। माया से बचने के लिये माया का ध्यान करते रहते हों जोगी मतलब शरारा चिन्तन। जिस तरह जोगी लोग दस-बारह-पंद्रह बच्चे पैदा करने का आह्वान करते रहते हैं उससे भी लगता है इस बारे में कितनी चिन्ता करते हैं वे।
यह भी हो सकता है कि कोई जोगी कहीं शरारत करते पकड़ा गया हो। जैसे अपने पतंजलि पुरुष अक्सर करते दिखते हैं। बस लोगों ने हल्ला मचा दिया होगा -जोगी रा सारा रा रा। होने को हो तो यह भी सकता है कि किसी गांव में कोई गम्भीर टाइप जोगी जी रहते होंगे। गांव वाले उनकी गम्भीरता से आतंकित होकर उनसे गुहार लगाते हों -जोगी रा सारा रा रा। मतलब जोगी जी शरारत करिये।
बताने वाले बताते हैं कि जोगी रा सारा रा रा में साम्प्रदायिक सद्भाव की छटा दर्शनीय है। जोगी का संबंध हिन्दू और हिन्दी है शरारा का जुड़ाव मुस्लिम मने उर्दू से है। दोनों को मिलाकर जो बना जोगी रा सारा रा रा उससे हिन्दुस्तानी मेलजोल की संस्कृति का झण्डा फ़हराने लगा।
जो हो मेरी समझ में जोगी रा सारा रा रा का मतलब विसंगति से है। गम्भीर रहने वाले जोगी से हंसी मजाक करना भी एक विसंगति ही है।
हमारे मोहल्ले में एक बुजुर्गवार रहते हैं। झाडनुमा दाढी , ऊटपटांग बतकही और निठल्ला घूमते रहने के बावजूद वे दीगर बाबाओं जितने प्रसिद्ध नहीं हुये तो सिर्फ़ इसलिये कि मोहल्ले की गलियां टेलीविजन की ओबी वैन आने लायक चौड़ी नहीं थी और बुजुर्गवार इस बात के सख्त खिलाफ़ थे कि अपनी गली छोड़कर कहीं बाहर जायें।
बुजुर्ग हो जाने के चलते मोहल्ले भर के लोग उनको बाबा जी कहते कोई जोगी जी। जब टेलीविजन पर किसी बाबा को महिलाओं को दस बच्चे की पैदा करने की सलाह देते सुनते तो देश की शिक्षा व्यवस्था पर सर धुनते कहते इन जाहिलों को दस के आगे की गिनती भी नहीं आती है। दस बच्चे पैदा करने के बाद खाली बैठकर क्या करेगी महिलायें।
आज ही मिल गये जोगी जी। किसी बच्चे की भूगोल की किताब मिल गयी तो नक्शे का एक हिस्सा नोचकर बोले -पाकिस्तान को इस तरह उड़ा देना चाहिये दुनिया से। नक्शे से पाकिस्तान को उड़ाने के बाद किताब हमारी तरफ़ फ़ेंक दी। हमने देखा - नक्शे से पूरा कनाडा और चवन्नी भर अमेरिका नुचा हुआ था।
हिन्दुस्तान को सलामत देखकर हमने सुकून मनाया। लेकिन डर भी लगा कि कब तक बचेगा हिन्दुस्तान इनके गुस्से से।
हमने जोगी जी का गुस्सा टालने के लिये टेलीविजन पर न्यूज चालू कर दी। नेता जी भाषण दे रहे हैं। बिजली, पानी, लैपटाप, साड़ी ब्लाउज, मकान, रोजगार देने का वादा करते हैं। जनता सुन रही है। जनता जानती है नेता जी मजाक के मूड में हैं। वह बोलती है जोगी रा सारा रारा। नेता जी को सुनाई पड़ता है- ’जिन्दाबाद , नेता जी जिन्दाबाद।’ वे अविभूत हो जाते हैं। फ़िर नये वादे करते हैं। चुनाव में वोट देने के लिये कहते हैं। जनता कहती है -जोगी रा सारा रा रा।

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