Thursday, March 30, 2017

हमें समाज ने जो दिया है; कम से कम तो उतना तो वापस देना ही चाहिए- आरिफ़ा एविस

[आरिफा एविस हिन्दी व्यंग्य की सबसे युवा हस्ताक्षरों में से एक हैं। मूलत: हरदोई की रहने वाली आरिफ़ा की पढाई-लिखाई मित्रों की मदद से दिल्ली से हुई। बी.ए. के दिल्ली विश्वविद्यालय से हिन्दी पत्रकारिता की पढाई की। रोजी-रोटी के जद्दोजहद के साथ लिखना चलता रहता है। पिछले वर्ष व्यंग्य लिखना शुरु किया और उसी साल व्यंग्य संग्रह आया- ’शिकारी का अधिकार’। व्यंग्य उपन्यास ’पंचतंत्रम’ आने वाला है। उर्दू से हिन्दी अनुवाद 'मजाकिए खाने' भी प्रकाशित हुआ है। छिटपुट लेखन - 'दैनिक जनवाणी', 'देशबन्धु' , 'राजएक्सप्रेस', ', लोकजंग' व 'ऑन्लाइन पत्रिकाओं व न्यूज पोर्टल पर करती रहती हैं।
आरिफ़ा का मतलब जंग का मैदान होता है। जिन्दगी की जंग लड़ते हुये अपनी समझ को संवारती हुई आरिफ़ा से व्यंग्य लेखन और अन्य मुद्दों पर हुई बातचीत यहां पेश है।]

सवाल1: व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में कैसे आई?
जबाब: व्यंग्य लेखन से पहले लेखन की शुरूआत बताना ज्यादा जरूरी है। महिला विमर्श की एक पत्रिका निकलती है 'मुक्ति के स्वर' जो मुझे मेरे अध्यापक के जरिये मिली थी। उस पत्रिका को पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया लिखकर भेजी, जो अगले अंक में छपी। यही मेरा पहला लेखन था। मैं उस समय नौवीं कक्षा में थी। इसी दौरान मैं शहीद भगत सिंह पुस्तकालय और नारी चेतना के संपर्क में आई। जहाँ मुझे समाज को देखने का नया नजरिया मिला। उन दिनों मैं सिर्फ कविताएँ लिखती थी , वो भी उर्दू में लिखकर फेविकोल से चिपका देती ताकि कोई पढ़ न सके। कारण यही था कि मुझे बड़ी मुश्किल से लड़- झगड़ कर पढ़ने का मौका मिला था। इंटर की पढ़ाई के बाद तो घर ही बैठ जाती लेकिन डीयू (दिल्ली विश्वविद्यालय) की पत्रकारिता की प्रवेश परीक्षा में पास होने पर दोस्तों ने फीस देकर मेरी पढ़ाई पूरी करवाई. एम.ए. की पढ़ाई नौकरी करते हुए करती रही।
ग्रेजुएशन के बाद एक वेब मैगजीन में खबरें बनाकर लिखना ही काम था। इसके बाद एक दो लेख पाठक की कलम से ही आये। कुछ दिन तक पुस्तकों के बारे में लिखना और पढ़ना चलता रहा। इन्हीं दिनों समीक्षा, लेख और कविता जनवाणी, देशबन्धु वगैरह में छपी। यहीं से नियमित लिखना शुरू कर दिया और फिर विभिन्न अखबारों और पत्रिकाओं में लेख भी मांगे जाने लगे।
विश्व पुस्तक मेले में अनूप श्रीवास्तव जी से मुलाकात होती है, तब उन्होंने बुक फेयर की रिपोर्टिंग व्यंग्यात्मक शैली में लिखकर मेल करने के लिए कहा था। रिपोर्ट लिखकर भेजी तो उन्होंने कहा कि अनूप शुक्ल की तरह लिखो। फिर क्या था अनूप शुक्ल को फेसबुक पर खोजा ,उनको पढ़ा लेकिन उन की तरह लिख नहीं पाई। व्यंग्यकारों को पढ़ते-पढ़ते हम भी व्यंग्य लिखने लगे। यहीं से हमारी व्यंग्य लेखन की शुरूआत हुई।
आज मैं जो कुछ भी हूँ उसमें पुस्तकालय और साथियों की वजह से हूँ और उस दृष्टिकोण की वजह से हूँ जो मुझे वहां से मिला।
सवाल 2 : पहला व्यंग्य लेख कब लिखा?
जबाब : पहला व्यंग्य लेख जनवरी 2016 में लिखा था। (कौन सा? खोजना है )
सवाल 3 : व्यंग्य आपकी समझ में क्या है? आपके नजरिये से आदर्श व्यंग्य कुछ उदाहरण अगर फ़ौरन ध्यान में आते हों तो बताइये।
जबाब : व्यंग्य विसंगतियों पर आलोचनात्मक प्रहार है जो बेहतर समाज बनाने में मदद करता है। कुछ उदाहरण जो फ़ौरन याद आ रहे हैं- 'एक मध्यवर्गीय कुत्ता', ’भोला राम का जीव’,’सुअर’, ’सदाचार का ताबीज’।
सवाल 4 : अपने लेखन के विषय कैसे तय करती हैं?
जबाब : जो विषय बहुसंख्यक आबादी को प्रभावित करते हैं और जो मुझे अन्दर तक झकझोर कर रख देते हैं। ऐसे ही विषयों को चुनती हूँ।
सवाल 5 : आपके व्यंग्य में सरोकार की धमक रहती है। हास्य से परहेज जैसा है क्या?
जबाब : रोजाना किसान, नौजवान , महिलाएं आत्महत्या करते हैं। इन्सान को इन्सान नहीं समझा जाता है। तो बताइए हास्य कैसे लिखूं। मैं भी लतीफ घोंघी की तरह लिखता चाहती हूँ। लेकिन लिखते-लिखते लेख अपने आप गंभीर हो जाते हैं। रही बात सामाजिक सरोकार की तो हर लेखक के व्यंग्य के अन्दर सामाजिक सरोकार होता है. फर्क बस इतना है कि वह सरोकार किसी व्यक्ति विशेष के लिए होता है या छोटे समूह के लिए या फिर जनसमूह के लिए. लेखक होता ही है सामाजिक तो फिर वह गैर-सरोकारी कैसे हो सकता है। हास्य व्यंग्य से मुझे कोई परहेज नहीं है।
सवाल 6 : किसी खास व्यंग्यकार के लेखन से प्रभावित हैं जिसके जैसा लिखना चाहती हैं?
जबाब : परसाई के लेखन से मैं बहुत प्रभावित होती हूँ। कोई भी व्यंग्य लेखक व्यंग्य परम्परा में अभी तक किसी को दोहरा नहीं पाया है। आप लाख कोशिश करो लेकिन आप जिनसे प्रभावित होते हैं उन जैसा नहीं लिख पाते हैं। समय, काल और बदली हुई परिस्थितियां एक दूसरे से अलग करती है समानता तो सिर्फ वैचारिक स्तर पर होती है। कोई भी लेखक अपने समय का प्रतिनिधि होता है। वह अपनी भाषा, शिल्प और विधा चुनता है। मैं व्यंग्य की विकसित परम्परा में विश्वास करती हूँ। परम्परा में अच्छा और बुरा दोनों होता है। मुझे अपनी परम्परा से जो भी अच्छा मिला है उसे ग्रहण करूंगी और सिर्फ आरिफा की तरह लिखना चाहती हूँ।
सवाल 7 : आपके व्यंग्य लिखने की प्रक्रिया क्या है? मतलब कब लिखती हैं? कितना समय लगाती हैं एक ’शिकारी का अधिकार’ जैसा व्यंग्य लिखने में?
जबाब : रोजी-रोटी के चक्कर में समय कम मिलता है। इसलिए घर पर ही काम करते हुए विषय के बारे में सोचती हूँ। फिर विषय की तथ्यात्मक जांच पड़ताल करती हूँ। उसके बाद दिमाग में एक ब्लू प्रिंट तैयार करके लिखती हूँ। दूसरी बार फिनिशिंग करती हूँ। तीसरी बार खुद पढ़कर ठीक करती हूँ। चौथी बार किसी मित्र को पढ़ाती हूँ। उनका सुझाव लेती हूँ। फिर कुछ बदलाव के साथ व्यंग्य लिख कर छोड़ देती हूँ। एक व्यंग्य में एक दिन और कभी कभी एक सप्ताह से ज्यादा समय लग जाता है।
सवाल8 : व्यंग्य के क्षेत्र में महिलायें काफ़ी कम रहीं शुरु से ही। इसका क्या कारण है आपकी समझ में?
जबाब : व्यंग्य में ही में नहीं साहित्य,समाज और यहाँ तक कि राजनीति में भी महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है। जो आज भी जारी है।
पहला कारण है - भारत की विशिष्ट सामाजिक संरचना।
दूसरा - भारत में अभी तक किसी भी बड़े सामाजिक, राजनीतिक आन्दोलन का खड़ा न होना।
इसके बावजूद व्यंग्य में महिलाओं का अकाल नहीं रहा। शुरूआत से ही महिला व्यंग्यकारों का योगदान रहा है। जिनमें -शान्ति मेहरोत्रा, सरला भटनागर, गीता विज, बानो सरताज, अलका पाठक,शिवानी, सूर्यबाला की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। आज तो और भी बेहतर स्थिति है महिला व्यंग्यकारों में रोज नई नई महिलायें व्यंग्य क्षेत्र में आ रही है। वो बात अलग है कि बहुत सी महिलाओं को व्यंग्यकार ही नहीं माना जाता। वैसे कुछ पुरुष व्यंग्यकारों को भी बहुत से लोग व्यंग्यकार नहीं मानते है।
सवाल 9 : आपके व्यंग्य लेखन में आम जनता की समस्याओं पर नजर रहती है। महिलाओं की समस्याओं पर आधारित व्यंग्य नहीं दिखते आपके यहां। क्या मेरा यह सोचना ठीक है ? यदि हां तो इसका क्या कारण है?
जबाब : महिलाओं की समस्या समाज की समस्या से अलग नहीं है। समाज की समस्या हल होगी तो बहुत हद तक महिलाओं का समस्या भी हल हो जायेगी। आज महिलाओं का मुद्दा अस्मिता और अस्तित्व से जुड़ा है। ऐसी धारणा बन गयी है कि महिला मुद्दों पर सिर्फ महिलाएं ही और दलित समस्या पर दलित ही लिख सकता है। बाकी राजनीति और अर्थतन्त्र पर पुरुष ही लिखें ऐसा ही क्यों?
मेरा मानना है कि अस्तित्व और अस्मिता दोनों पर व्यंग्यकार की दृष्टि होनी चाहिए। महिला अस्तित्व और अस्मिता का संकट भारत की आर्थिक , सामाजिक, राजनैतिक गतिविधि से तय होती है। यदि समस्या की मूल जड़ पर कुछ सार्थक प्रहार किया जायेगा तो उसमें तक स्त्री हो या पुरुष सभी आयेंगे। वैसे मैंने महिलाओं पर भी लिखा है।
सवाल 10 : आज के समय में हास्य व्यंग्य लेखन की स्थिति को आप स्तर और वातावरण के लिहाज से कैसी समझती हैं?
जबाब : हर दौर में हास्य व्यंग्य का आधार अलग अलग रूप में दिखाई देता है। हास्य- व्यंग्य का सौन्दर्य विकसित भी हुआ है और विकृत भी हुआ है। जहाँ एक तरफ सामाजिक विसंगतियों पर हास्य व्यंग्य रचा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ कुछ जगह फूहड़ता, वल्गर , लम्पट और महिला विरोधी भी होता है। समाज हमेशा आगे की तरफ बढ़ता है तो जाहिर है हास्य-व्यंग्य भी आगे ही बढ़ा है। रही बात स्तर की तो हर दौर में अच्छा बुरा रहा है।
सवाल 11 : अक्सर हास्य-व्यंग्य के लोगों की आपस में सोशल मीडिया पर आपस में बहस हो जाती है। इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
जबाब: पहले मैं सिर्फ यही जानती थी कि फलां लेखक बड़े हैं। उनकी फलां पुस्तक आई है। या फलां अखबार में छपते हैं। सोशल मीडिया ने सबको एक जगह पर ला दिया है। अगर कोई सक्रिय नहीं है तो भी पता चल जाता है। रही बात सोशल मीडिया पर बहस की तो यहाँ भी वही बात होती है जो अक्सर मंचो पर कही जाती है। मंच पर कोई जवाब नहीं दे पाता। सोशल मीडिया पर यह स्वतंत्रता होती है कि अगर मुद्दा आया है तो हर इन्सान हास्य-व्यंग्य पर अपनी बात रखता है।
बहस किसी भी तरह की क्यों न हो अच्छी हो या बुरी, व्यक्तिगत हो या प्रवृतियों पर व्यंग्यकारों को समझने में हमारी मदद करती है। क्योंकि लेखन में शिल्प द्वारा ईमानदारी, चालाकी,छिप जाती है। लेकिन बहसों में व्यक्तित्व उजागर होता है। कोई भी बहस नवीनता की जननी है। बहस करने वाले ज्यादा खतरनाक नहीं होता, चुप्पी साधने वाले ज्यादा खतरनाक है। हर बहस के बाद इन्सान की मानसिक दशा के बारे में जानने समझने का मौका मिलता है।
सवाल 12 : अपनी किताब ’शिकारी का अधिकार’ छपवाने की विचार कैसे आया? इसको छपने के बाद कैसा महसूस हुआ/ होता है ?
जबाब: जब लेख प्रकाशित होने लगे तो कई लोगों ने पूछा कोई पुस्तक हो तो दो पढ़ना चाहते हैं। यानि जिसकी कोई किताब छपी न हो वह लेखक नहीं माना जाता। मैंने भी सोचा क्यों न एक छोटी सी किताब छपवा ली जाए। कई जगह पांडुलिपि भेजी एक प्रकाशक ने स्वीकृति दी तो छपवा दी। एक रुपया भी खर्च नहीं करना पड़ा। किताब आई तो लखनऊ अट्टहास कार्यक्रम में विमोचन भी हो गया। किताब ने पहचान दी है। किताब न होती तो आज जो व्यंग्य की दुनिया देखने को मिली है शायद बहुत देरी से देखने को मिलती।
रही बात महसूस करने की तो अच्छा ही लगता है। अब और भी अच्छा लगता है क्योंकि तीन किताबों पर और काम चल रहा है। लिखने, पढने और समझने की प्रेरणा है मेरी पहली किताब। पहली पुस्तक ने मेरी ताकत और कमियों को भी चिन्हित करने में मदद मिली है।
सवाल13 : सुना है जल्दी ही आपका एक उपन्यास भी प्रकाशित होने वाला है। इसकी विषय वस्तु के बारे में बतायें।
जबाब:यह उपन्यास दिल्ली से लखनऊ की यात्रा का संस्मरणात्मक व्यंग्य उपन्यास है बस इतना ही.
सवाल 14 : अपना सबसे पसंदीदा कोई लेख बतायें। इसको पसंद करने का क्या कारण है?
जबाब: 'शिकारी का अधिकार' मेरा पसंदीदा लेख है। इसका कारण यही है कि जंगल के बहाने पूरे सिस्टम को समझना हुआ। जंगल में सिर्फ शेर ही नहीं रहता बाकी जीवन भी होता है। उनका भी अपना एक पक्ष है।
सवाल 15 : अभी तक की पढी पुस्तकों में सबसे पसंदीदा पुस्तक और उसका कारण?
जबाब: सबसे पसंदीदा पुस्तकों में किसी एक पुस्तक का नाम बताना मुश्किल है। फिर भी चंगेज आइत्मतोव द्वारा लिखा गया रूसी उपन्यास 'पहला अध्यापक'। इस लघु उपन्यास का मुख्य पात्र सोलह साल का लड़का 'दुइशेन ' होता है। उसे वर्णमाला के कुछ ही अक्षर का ज्ञान होता है। वह जितना जानता है उतना ही स्कूल खोलकर बच्चों को सिखाता है। जब बच्चे उतना अक्षर ज्ञान सीख जाते हैं तो उन्हें दूसरे स्कूल में पढ़ने भेज देता है।
कुल मिलकर यही कि वह समाज से जितना सीखता है उतना समाज को वापस लौटा देता है। इसका मतलब यही है कि हमारे पास जो भी ज्ञान है वह सामाजिक है व्यक्तिगत कुछ भी नहीं। इस किताब से यही प्रेरणा मिलती है कि हमें समाज ने जो दिया है; कम से कम तो उतना तो वापस देना ही चाहिए।
सवाल 16 : लेखन करते हुये आपको अपने अन्दर अभी क्या कमी लगती है जिसमें अभी आपको सुधार करने गुंजाइश लगती है?
जबाब: मुझे लगता है वैचारिक पक्ष मुझे विरासत से मिला है जो दोस्तों की मंडली से प्राप्त हुआ है। रही बात कमी की तो शिल्प पर काम करना बाकी है। शिल्पगत महारथ भी करत-करत अभ्यास से हासिल होगी, ऐसा मेरे वरिष्ठ व्यंग्यकारों ने कहा है।
सवाल 17: हाल के लेखकों में सबसे पसंदीदी लेखकों के नाम और वे अपने लेखन के किस पहलू के चलते पसंद हैं आपको?
जबाब: मैं अपने समकालीन सभी लेखकों को पसंद करती हूँ। कोई भी किसी को ख़ारिज नहीं कर सकता मेरा ऐसा मानना है। सीखने के लिए सभी में कुछ न कुछ मिल जाता है। प्रतिबद्धता, शिल्प, भाषा ,शब्दों की बनावट, आक्रामकता, वैचारिकता, संरचनात्मकता, सरोकार, यहाँ तक कि पठनीयता भी सीखने को मिलती है। सभी को पढ़ती हूँ। बिना नाम लिए उन लेखकों की तरफ इशारा कर दिया है जिनको मैं पसंद करती हूँ।
सवाल 18 : आज के समय में जब हर तरफ़ बाजार हावी हो रहा है ऐसे समय में व्यंग्य लिखने में क्या चुनौती महसूस करती हैं?
जबाब:बाजार की समझ ही व्यंग्य लेखन की असली चुनौती है। आज का बाजार एक देश तक सीमित नहीं रहा है। यह वैश्विक आधार प्राप्त कर चुका है। वैश्विक पूंजी का चरित्र बदल चुका है। वित्तीय पूंजी की समझ के बिना कोई व्यंग्य लेख संभव नहीं हो सकता। इसकी धमक हर इन्सान की मानसिकता हो प्रभावित कर रही है। मुनाफाखोर बाजार हर इन्सान को लालच,मुनाफे पे आधारित संबंधों के निर्माण में सचेत रूप से लगा हुआ है। व्यंग्य लेखन में भी इसी समझ का सचेत प्रयास करना पड़ेगा।
सवाल 19 : आपकी हॉवी क्या है? उसको पूरा करने का समय कैसे निकालती हैं?
जबाब:मेरी हॉवी पढ़ना और घूमना है। मानसिक जरूरत को पूरा करने के लिए जैसा साहित्य पढ़ना चाहती हूँ पढ़ती हूँ। घूमने के लिए हर साल एक कोष बचाती हूँ जिससे पहाड़ी इलाके में घूमा जा सके।
सवाल 20 : जीवन में आगे क्या करना चाहती हैं और उसको करने की योजनायें क्या हैं?
जबाब: उर्दू और अंग्रेजी व्यंग्य का अनुवाद करना चाहती हूँ। धीरे-धीरे खोज रही हूँ। कर भी रही हूँ। उनको पूरा करने की योजना है। जब भी टाइम मिले पढ़ती हूँ और करती हूँ।
सवाल 21 : जब लिखना शुरु किया और अब कुछ साल/महीने हुये लिखते हुये। इस दौरान आपने लेखन के क्षेत्र में क्या बदलाव देखे?
जबाब: एक ही बदलाव आया है। व्यंग्य लेखन ज्यादा हो गया है। व्यंग्य ने ही मुझे पहचान दी है। व्यंग्य के प्रति ज्यादा जिम्मेदारी महसूस होने लगी है जिसको पूरा नहीं कर पाती हूँ।
सवाल 22 : लिखना शुरु करने के पहले और अब लेखन बनने के समय में आपकी सोच और समझ में क्या बदलाव आये?
जबाब: पहले लिखने का मतलब अपनी भावना को जाहिर करना लगता था। अब लगता कि लेखन भी सामाजिक बदलाव में अपनी भूमिका निभा सकता है।
सवाल 23: आज सोशल मीडिया के चलते व्यंग्य लेखन का विस्फ़ोट सा हो रखा है। आम आदमी लिखने और छपने लगा है। कुछ पुराने , सिद्ध लेखक इसको व्यंग्य लेखन के लिये ठीक नहीं मानते। उनका कहना है कि लिखास और छपास की कामना के चलते व्यंग्य लेखन का स्तर गिरा है। आपका क्या मानना है इस बारे में।
जबाब: दुनिया को परिवर्तित करने में अगर किसी टूल का सबसे ज्यादा योगदान रहा है तो वह है तकनीक जैसे-जैसे तकनीक का विकास हुआ है समाज की संरचना भी बदली है। आदिम युग से दास प्रथा, दास प्रथा से सामन्ती युग, सामन्ती युग से पूंजीवाद, पूंजीवाद से समाजवाद में परिवर्तन नई तकनीक के कारण ही संभव हो पाया है।
सोशल मीडिया से सभी को एक साथ आने का मौका मिलता है। कुछ लोग लगातार अखबार में छपते हैं लेकिन उनका नाम लेने वाला नहीं है क्योंकि वो सोशल मीडिया पर सक्रिय नहीं हैं. जो सक्रिय है अगर वो छपते है और अपनी वाल पर लगाते हैं तो इसमें बुराई क्या है. सबके अपने पाठक हैं। जो नहीं छपता वो भी अच्छा लिखता है। सोशल मीडिया एक प्लेटफार्म है। इसका उपयोग कैसे करना है यह आप पर निर्भर है।
सवाल 23. आज अखबारों में छपने वाला व्यंग्य 400 शब्दों तक सिमट गया है। व्यंग्य की स्थिति के लिये आप इसे कैसे देखती हैं? आप इस फ़ार्मेट में नहीं लिखती?
जबाब: हर अख़बार का अपना एक कॉलम है अपना अलग फोर्मेट है। यहाँ तक कि 2000 शब्दों में भी व्यंग्य छपता है। इसको सीमित शब्दों का नाम देना शायद ठीक नहीं। यह फोर्मेट का सवाल है। कविता, कहानी,व्यंग्य शब्दों की सीमा से नहीं बंधे होते। विचार की अवधारणाओं से बंधे होते हैं। मैं किसी भी फोर्मेट में नहीं लिखती। जितना लिखा जाता है उतना लिखती हूँ.
सवाल 25: वनलाइनर को किस तरह देखती हैं? लिखती क्यों नहीं वनलाइनर? रुचि न होना या जीवन की आपाधापी की व्यस्तता?
जबाब: व्यंग्य में वनलाइनर नया शब्द नहीं है। अपने विचारों को कम शब्दों में लिखना पहले भी था और आज भी जारी है। व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति किसी भी रूप में हो अच्छी ही होती है। चाहे वो वनलाइनर के रूप में ही क्यों न संभव हो। लिखने के बारे में सोचा नहीं। अगर लिखने का मन होगा तो जरुर लिखूंगी।
सवाल 26: सवाल-व्यंग्य लेखन में आम तौर पर व्यंग्य की स्थिति पर चिंता व्यक्त करने वाले लोग नये-नये बयान जारी करते रहते हैं। सपाटबयानी सम्प्रदाय, गालीगलौज सम्प्रदाय, कूड़ा लेखन आदि। इस स्थिति को आप किस तरह देखती हैं।
जवाब : सृजनशीलता सामाजिक सम्पत्ति है। हर इन्सान समाज से ही सीखता है। अपने व्यवहार, आसपडोस के माहौल से सीखता है। कोई भी लेखक पैदाइशी लेखक नहीं होता। न ही व्यंग्य लेखन DNA में होता है। यह कोई अनोखी घटना नहीं है। यह सब चलता रहता है। कुछ खराब ब्यान आते है तो कुछ अच्छी चिंताएं भी तो व्यंग्य में दिखाई देती है। शोधपरक लेख भी तो दिखाई देते है। आज की दुनिया एकतरफा नहीं यदि अँधेरा है तो उजाला भी है।
सवाल 27: समाज में महिलाओं की स्थिति और व्यंग्य लेखन में महिला लेखिकाओं की स्थिति पर आपका क्या सोचना है?
जबाब: समाज में महिलाएं दलितों से भी दलित हैं। उनकी दोयम दर्जे की स्थिति बदस्तूर जारी है। महिलाओं के सामने अस्तित्व और अस्मिता दोनों का सवाल है। इसके बावजूद महिलाएं आगे आ रही हैं। पढ़ लिख रही हैं , नौकरी पेशा कर रही हैं। हर क्षेत्र में अपनी भागीदारी निभा रही हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों के बावजूद महिलाएं अगर लेखन में आयीं हैं तो उन्हें देखकर अच्छा लगता है। आधुनिक व्यंग्य काल महिलाओं के लिए स्वर्णकाल है। जितनी महिलाये आज व्यंग्य लेखन में सक्रिय है , शायद पहले इतनी नहीं थी। व्यंग्य लेखन मंत डॉ. नीरज शर्मा , शशि पाण्डेय , वीणा सिंह, नेहा अग्रवाल , शैफाली पाण्डेय, डॉ. स्नेहलता पाठक, इंद्रजीत कौर,अर्चना चतुर्वेदी, सुनीता सानु, पल्लवी त्रिवेदी, शशि पुरवार ,रंजना रावत, यामिनी चतुर्वेदी,ऋचा श्रीवास्तव, सुनीता सनाढय पांडे, सोमी पांडे, सुधा शुक्ला, डा विनीता शर्मा,सपना परिहार, छमा शर्मा और दर्शन गुप्ता आदि दमदार तरीके से अपनी भूमिका निभा रही है। महिलायें और भी है जिनके व्यंग्य यदा कदा अख़बारों में पढ़ने को मिलते रहते है।
सवाल 28: अपने देश , समाज की सबसे बड़ी खूबी क्या है आपकी नजर में?
जबाब: अपना देश ही नहीं पूरी दुनिया बड़ी ही खूबसूरत है। समाज में विभिन्नता है। ढेरों बोली,कई भाषाएँ हैं। अलग अलग रहन सहन है। कई तरह के मौसम है। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी जिन्दा रहने की जद्दोजहद हमारे देश की सबसे बड़ी ख़ूबी है।
सवाल 29: और खामी?
जबाब: जहाँ एक तरफ शाइनिंग इण्डिया है वहीं दूसरी तरफ गरीब भारत है। इस समाज में क्षेत्रवाद,जातिवाद,धर्म ,औरत मर्द में गैर बराबरी,गरीबी ,भुखमरी,मुनाफे पर आधारित व्यवस्था जो अंदर ही अन्दर देश को खोखला कर करती जा रही है।
सवाल 30: आपको एक कुछ दिनों के लिये मनचाहा करने की स्वतंत्रता दी जाये तो आप क्या करना पसंद करेंगी?
जबाब: अगर सच में मुझे ऐसी छूट मिल जाये तो मैं पूरी दुनिया घूमना चाहूँगी। बेहतर दुनिया का सपना पहुंचाऊगी और उन पलों को विरासत के लिए लिखना चाहूँगी।
सवाल 31: जीवन का कोई यादगार अनुभव साझा करना चाहें?
जबाब: वैसे तो पूरी जिन्दगी ही मेरे लिए यादगार है. एक यादगार लम्हा मुझे हमेशा याद आता है - मैं अपने दोस्तों के साथ ट्रेकिंग पर गयी थी, जिंदगी में पहली बार पहाड़ों का नजारा देखना और उनकी खूबसूरती को निहारना और महसूस करना एक अजब एहसास है। तभी महसूस किया कि राहुल सांकृत्यायन ने अधातो घुमक्कड़ जिज्ञासा क्यों लिख डाली। उन पहाड़ों की पगडंडियों पर चलना कभी उबड़ खाबड़ रास्ता कभी एक दम साफसुथरा रास्ता. अपनी मंजिल पर पहुंचने की चाह में आगे बढ़ते रहने का जुनून मुझे हमेशा प्रेरणा देता है।
सवाल 32: और कुछ बताना चाहें अपने बारे में, लेखन के बारे में , समाज के बारे में।
जबाब:बस यही कि बहुत कुछ सीखना है, बहुत कुछ पढ़ना है और अमल करना है। रही बात लेखन की तो एक लेखक के लिए कलम ही उसका हथियार है। जहाँ तलवार काम नहीं आती वहां कलम काम आती है। समाज को बदलने में कलम ने अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है और आगे भी निभाती रहेगी। मुनाफे और गैर -बराबरी पर आधारित समाज को समाप्त करके, एक बेहतर समाज की नींव रखने में यदि मेरी कलम साथ देती रहे। बस इतनी-सी चाहत है।
1. आरिफ़ा के व्यंग्य संग्रह ’शिकारी का अधिकार’ की अनूप शुक्ल द्वारा लिखी भूमिका यहां पढ सकते हैं। http://fursatiya.blogspot.in/2016/04/blog-post_24.html
2. आरिफ़ा का व्यंग्य लेख ’शिकारी का अधिकार’ यहां पढ सकते हैं http://www.hastaksher.com/rachna.php?id=361
3. आरिफ़ा के व्यंग्य संग्रह ’शिकारी का अधिकार’ के कुछ पंच वाक्य यहां पढ सकते हैंhttps://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210942630975229

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210970791519225

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Monday, March 27, 2017

कैदी भिड़ गये जेल में

कैदी भिड़ गये जेल में, सबने काटा खूब बवाल,
रिश्वत बिन भर्ती न हुआ, वही हो गया लाल।
गुटका दफ़्तर में बैन हुआ, कैसे होगा अब काम,
’थूक-पीक’ बिन कौन विधि, बाबू देगा ’काम-अंजाम’।
सुना, हुई गुंडई बैन अब, ठेकेदारी पर भी लग गई रोक,
कुछ दिन को चुप नेतागिरी, फ़िर होंगे सम्राट अशोक।

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परसाई जी के पंच


1. जिसे जुआखाना चलाना चाहिए वह मंत्री है, जिसे डाकू होना चाहिए वह पुलिस अफसर है, जिसे दलाल होना चाहिए वह प्रोफ़ेसर है, जिसे जेल में होना चाहिए वह मजिस्ट्रेट है, जिसे कथावाचक होना चाहिए, वह उपकुलपति है. जिसे जहाँ नहीं होना चाहिए वह ठीक वही है.
2.प्रजातंत्र में सबसे बड़ा दोष है तो यह कि उसमें योग्यता को मान्यता नहीं मिलती, लोकप्रियता को मिलती है.हाथ गिने जाते हैं, सिर नहीं तौले जाते.
3.जब विधानसभाओं और संसद के आधे से अधिक सदस्य एम्बुलेंस में सभा भवन जाया करेंगे और हर सदस्य के बगल में एक डाक्टर बैठा करेगा, तब समझेंगे कि हमारा जनतंत्र सयाना हो गया है.
4. ये चुनाव घोषणा पत्र ऐसे बनते हैं कि अगर अखिल भारतीय चोर महासभा भी घोषणा पत्र निकाले तो उसे पढ़कर विश्वास हो जायेगा कि भारत का कल्याण चोरों को सत्ता सौप देने में ही है.
5.भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से कोई नहीं डरता. एक प्रकार का मनोरंजन है जो राजनैतिक पार्टी कभी-कभी खेल लेती है, जैसे कबड्डी का मैच. इससे न तो सरकार घबड़ाती , न भ्रष्टाचारी घबड़ाते , न मुनाफाखोर, न कालाबाजारी. सब इसे शंकर की बरात समझकर मजा लेते हैं.
6.नस्ल बदले बिना भ्रष्टाचार नहीं मिटेगा. जब तक आदमी की नस्ल है, भ्रष्टाचार रहेगा.
7.गम्भीर आदमियों में भी आपस में होड़ लगती रहती है कि कौन सबसे बड़ा जोकर हो जाये.
8.फासिस्ट संगठन की विशेषता होती है कि दिमाग सिर्फ नेता के पास होता है, बाकी सब कार्यकर्ताओं के पास सिर्फ शरीर होता है.
9. राजनीति में शर्म केवल मूर्खों को आती है.
10. जब शर्म की बात गर्व की बात बन जाए तब समझो कि जनतंत्र बढ़िया चल रहा है.
11.राजनेता की नैतिकता और ईमान ऐसी चीजें हैं जो मेढक की तरह मौसम आने पर जाग उठती हैं.
12.जो देश की हालत से बात शुरू करे ,वह भयानक " चिपकू" होता है. दुनिया की हालत वाला तो और खतरनाक होता है.
13.राजनातिक तलाक और पुनर्विवाह बड़े जल्दी-जल्दी हो जाते हैं.
14.गलत कंठों से निकला अच्छा नारा भी अहितकर होता है.
15. ‘‘इस व्‍यवस्‍था में कोई भी अकेला पैसा नहीं खाता, सब मिलकर खाते हैं, खाने वाले भी और पकड़ने वाले भी । इसलिए वास्‍तविक भ्रष्‍टाचारी कभी पकड़े नहीं जाएंगे । पकड़े जाने लगे तो इस देश के तीन चौथाई मंत्री, सांसद, विधायक जेल में होंगे ।''
-परसाई

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210946584234058

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Sunday, March 26, 2017

घटिया कविता/व्यंग्य गिरोह


कल रात जब हम सोते हुये एक बढिया सा सपना देख रहे थे। क्यूट एन्ड स्वीट टाइप।हमारे साथ हमारी कविता के कोमल , सुकोमल बिम्ब भी थे। अचानक कुछ ’घटिया कविता गिरोह ' के लोग धड़धड़ाते हुये हमारे सपने में घुस आये और हमको धमकाने लगे। बोले -"खबरदार जो घटिया कविता लिखी। घटिया कविता केवल हमारे गैंग के लोग लिख सकते हैं। तुम्हारी हिम्मत कैसे हुयी हमसे घटिया लिखने लिखने की?"
यह कहते हुये वे हमारे तमाम कोमल बिम्बों से मारपीट करने लगे। उनको नोच-नोच कर अधमरा कर दिया। हमने उनसे कहा भी कि भाई जो करना हो हमारे साथ करो लेकिन हमारे मासूम बिम्बों ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है। लेकिन उन्होंने हमारी एक न सुनी और हमारे सब बिम्बों को मारपीट कर घायल कर दिया। सारे बिम्ब बचाओ, बचाओ चिल्ला रहे थे।
सपने में और भी तमाम लोग हमारे साथ थे। हमने कई लोगों से कहा कि भाई इन बिम्बों को थोड़ी देर अपने पास रख लो । इनको बचा लो। लेकिन किसी ने सहयोग न किया।
एक कवि ने कहा - "मैं तो वीर रस की कविता लिखता हूं। इन बिम्बों का मैं क्या उपयोग करूंगा? कोमल बिम्ब अपने दिमाग में रखूंगा तो हमारी वीर रस की कविता प्रभावित हो जायेगी।"
एक व्यंग्यकार बोला- " इतने मासूम बिम्बों का मैं क्या करूंगा? हमें तो विसंगतियां चाहिये। इनको अपने पास रखूंगा तो लोगों को लगेगा कि समाज में विसंगतियां खलास हो गयीं। हां जब इनकें अच्छे से अंग भंग हों जायें तो दे देना इनका उपयोग कर लूंगा थोड़ा और बिगाडकर।"
एक गीतकार बोला- "फ़िलहाल तो मैं प्रेम कवितायें लिखने में लगा हूं। जिसको पटाने के लिये दण्ड पेल रहा हूं उसको जो पसंद सिर्फ़ वही बिम्ब अपने पास रखता हूं। दूसरे बिम्ब रखूंगा तो उसको कोई दूसरा पटा ले जायेगा। इसलिये अभी तो मुझे माफ़ करो।"
मित्रों, इस तरह हमारे बिम्ब बेचारे सपने में पिटते। मैंने 100 नंबर भी डायल किया लेकिन वहां से भी कोई सहायता नहीं मिली।
अचानक ’घटिया कविता गिरोह’ के एक सदस्य को कोई ’घटिया कविता’ सूझी। हमारे बिम्बों से मारपीट करना छोड़कर वह बोला- "गुरु, एक घटिया कविता सूझी है। इससे घटिया कविता आपने आज तक न सुनी होगी। मुलाहिजा फ़र्माइये।"
फ़िर उसने हमारे बिम्बों से मारपीट स्थगित करके बीच सपने में अपनी घटिया कविता पेश की। कविता वाकई घटिया थी। इतनी कि हमारे घायल बिम्ब तक अपना पिटाई का दर्द भूलकर ताली बजाते हुये , वाह -वाह करने लगे। हमने भी मजबूरन वाह -वाह की। कुछ डर के मारे और कुछ कविता के घटियापने से प्रभावित होकर।
हमारी तारीफ़ सुनकर वह थोड़ा नरम पड़ा। फ़िर पूंछा - कैसी लगी कविता?
हमने कहा-" बेमिसाल, अद्भुत। आजतक इतनी घटिया कविता हमने नहीं सुनी। इतने घटिया बिम्बों का इतना घटिया संयोजन हमने आजतक नहीं देखा। "
कविता की तारीफ़ सुनकर वह भावुक हो गया। पूछा- सच्ची?
हमने मारे डर के कहा -मुच्ची।
इसके बाद तो उन सबका व्यवहार ही बदल गया। उन्होंने हमारे सब बिम्बों को प्यार से सहलाया। मरहम पट्टी की। टॉफ़ी चॉकलेट भी खिलाई। हमारे बिम्ब भी खिलखिलाते हुये उनके साथ खेलने कूदने लगे।
कुछ देर बाद वे जैसे आये थे वैसे ही चले गये। लेकिन जाते -जाते धमकी देते गये-" जो लिखना हो लिखो लेकिन हमसे घटिया कविता लिखने की कोशिश की तो खैर नहीं। सारे बिम्बों की बोटी-बोटी काटकर साहित्य समुद्र में फ़ेंक देंगे। घटिया कविता के इलाके में हमारा और सिर्फ़ हमारा कब्जा रहेगा। किसी आलोचक की हिम्मत नहीं कि किसी और की कविता को हमारी कविता से घटिया टहरा सके। "
वे जा रहे थे तो हमने उनमें से एक को कहते हुये सुना- "गुरु, कविता के घटियापने पर तो अपन का कब्जा हो ही गया। एकछत्र राज्य है। अब व्यंग्य के इलाके में भी धंसा जाये। वहां भी घटिया गैंग का जलवा होना चाहिये। "
हम सिहरने की कोशिश में हिले। इस झटके में नींद खुली। देखा तो सुबह हो गयी थी।
सुना है सुबह का देखा सपना सच होता है। ऐसा क्या? इस सपने का क्या मतलब हो सकता है आपमें से कोई बता सकता है क्या?

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210937274121311

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घटिया कविता/व्यंग्य गिरोह


कल रात जब हम सोते हुये एक बढिया सा सपना देख रहे थे। क्यूट एन्ड स्वीट टाइप।हमारे साथ हमारी कविता के कोमल , सुकोमल बिम्ब भी थे। अचानक कुछ ’घटिया कविता गिरोह ' के लोग धड़धड़ाते हुये हमारे सपने में घुस आये और हमको धमकाने लगे। बोले -"खबरदार जो घटिया कविता लिखी। घटिया कविता केवल हमारे गैंग के लोग लिख सकते हैं। तुम्हारी हिम्मत कैसे हुयी हमसे घटिया लिखने लिखने की?"
यह कहते हुये वे हमारे तमाम कोमल बिम्बों से मारपीट करने लगे। उनको नोच-नोच कर अधमरा कर दिया। हमने उनसे कहा भी कि भाई जो करना हो हमारे साथ करो लेकिन हमारे मासूम बिम्बों ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है। लेकिन उन्होंने हमारी एक न सुनी और हमारे सब बिम्बों को मारपीट कर घायल कर दिया। सारे बिम्ब बचाओ, बचाओ चिल्ला रहे थे।
सपने में और भी तमाम लोग हमारे साथ थे। हमने कई लोगों से कहा कि भाई इन बिम्बों को थोड़ी देर अपने पास रख लो । इनको बचा लो। लेकिन किसी ने सहयोग न किया।
एक कवि ने कहा - "मैं तो वीर रस की कविता लिखता हूं। इन बिम्बों का मैं क्या उपयोग करूंगा? कोमल बिम्ब अपने दिमाग में रखूंगा तो हमारी वीर रस की कविता प्रभावित हो जायेगी।"
एक व्यंग्यकार बोला- " इतने मासूम बिम्बों का मैं क्या करूंगा? हमें तो विसंगतियां चाहिये। इनको अपने पास रखूंगा तो लोगों को लगेगा कि समाज में विसंगतियां खलास हो गयीं। हां जब इनकें अच्छे से अंग भंग हों जायें तो दे देना इनका उपयोग कर लूंगा थोड़ा और बिगाडकर।"
एक गीतकार बोला- "फ़िलहाल तो मैं प्रेम कवितायें लिखने में लगा हूं। जिसको पटाने के लिये दण्ड पेल रहा हूं उसको जो पसंद सिर्फ़ वही बिम्ब अपने पास रखता हूं। दूसरे बिम्ब रखूंगा तो उसको कोई दूसरा पटा ले जायेगा। इसलिये अभी तो मुझे माफ़ करो।"
मित्रों, इस तरह हमारे बिम्ब बेचारे सपने में पिटते। मैंने 100 नंबर भी डायल किया लेकिन वहां से भी कोई सहायता नहीं मिली।
अचानक ’घटिया कविता गिरोह’ के एक सदस्य को कोई ’घटिया कविता’ सूझी। हमारे बिम्बों से मारपीट करना छोड़कर वह बोला- "गुरु, एक घटिया कविता सूझी है। इससे घटिया कविता आपने आज तक न सुनी होगी। मुलाहिजा फ़र्माइये।"
फ़िर उसने हमारे बिम्बों से मारपीट स्थगित करके बीच सपने में अपनी घटिया कविता पेश की। कविता वाकई घटिया थी। इतनी कि हमारे घायल बिम्ब तक अपना पिटाई का दर्द भूलकर ताली बजाते हुये , वाह -वाह करने लगे। हमने भी मजबूरन वाह -वाह की। कुछ डर के मारे और कुछ कविता के घटियापने से प्रभावित होकर।
हमारी तारीफ़ सुनकर वह थोड़ा नरम पड़ा। फ़िर पूंछा - कैसी लगी कविता?
हमने कहा-" बेमिसाल, अद्भुत। आजतक इतनी घटिया कविता हमने नहीं सुनी। इतने घटिया बिम्बों का इतना घटिया संयोजन हमने आजतक नहीं देखा। "
कविता की तारीफ़ सुनकर वह भावुक हो गया। पूछा- सच्ची?
हमने मारे डर के कहा -मुच्ची।
इसके बाद तो उन सबका व्यवहार ही बदल गया। उन्होंने हमारे सब बिम्बों को प्यार से सहलाया। मरहम पट्टी की। टॉफ़ी चॉकलेट भी खिलाई। हमारे बिम्ब भी खिलखिलाते हुये उनके साथ खेलने कूदने लगे।
कुछ देर बाद वे जैसे आये थे वैसे ही चले गये। लेकिन जाते -जाते धमकी देते गये-" जो लिखना हो लिखो लेकिन हमसे घटिया कविता लिखने की कोशिश की तो खैर नहीं। सारे बिम्बों की बोटी-बोटी काटकर साहित्य समुद्र में फ़ेंक देंगे। घटिया कविता के इलाके में हमारा और सिर्फ़ हमारा कब्जा रहेगा। किसी आलोचक की हिम्मत नहीं कि किसी और की कविता को हमारी कविता से घटिया टहरा सके। "
वे जा रहे थे तो हमने उनमें से एक को कहते हुये सुना- "गुरु, कविता के घटियापने पर तो अपन का कब्जा हो ही गया। एकछत्र राज्य है। अब व्यंग्य के इलाके में भी धंसा जाये। वहां भी घटिया गैंग का जलवा होना चाहिये। "
हम सिहरने की कोशिश में हिले। इस झटके में नींद खुली। देखा तो सुबह हो गयी थी।
सुना है सुबह का देखा सपना सच होता है। ऐसा क्या? इस सपने का क्या मतलब हो सकता है आपमें से कोई बता सकता है क्या?

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आरिफ़ा एविस के व्यंग्य संग्रह ’शिकारी का अधिकार’ के कुछ पंच



आरिफ़ा एविस हिन्दी व्यंग्य के सबसे नयी लेखिकाओं में हैं। उनका पहला व्यंग्य संग्रह ’शिकारी का अधिकार’ पिछले साल प्रकाशित हुआ। आरिफ़ा के व्यंग्य संग्रह ’शिकारी का अधिकार’ के कुछ पंच यहां पेश हैं:
1. “वो बच्चे जिन्होंने कभी स्कूल की शक्ल नहीं देखी और वो बच्चे जो स्कूल सिर्फ एक वक्त के खाने के लिए भिखमंगे बना दिए गये है अगर वे भारतमाता कि जय नहीं बोलेंगे तो कौन बोलेगा।“
2. “ अगर किसी को ज्यादा प्यास सता रही है तो कोका कोला पी लो। देश की प्यास बुझाने के लिए सभी नदियों को एक-एक कर बेचा जा रहा है जब पानी ही देश का नहीं होगा तो पानी की लड़ाई भी अपने आप खत्म हो जाएगी। “.
3. देशभक्ति को समय-समय पर परखते रहना चाहिये क्योंकि लोग बहुत चालाक हो गये हैं।
4. राष्ट्रवाद तो हर व्यक्ति के डीएनए में होना चाहिये।
5. भारत माता की जय बोलो नौकरी की समस्या अपने आप दूर हो जायेगी।
6. वो बच्चे जिन्होंने कभी स्कूल की शक्ल नहीं देखी और वो बच्चे जो स्कूल सिर्फ़ एक वक्त खाने के लिये भिखमंगे बना दिये गये हैं, अगर वे भारतमाता की जय नहीं बोलेंगे तो कौन बोलेगा?
7. भारत माता की जय बोलकर देशी-विदेशी कम्पनियों को उनकी हर मांग को पूरा करते हुये किसानों की जमीन लेकर देनी चाहिये।
8. सामाजिक विकास बोले तो भीड़ का उन्माद, सांस्कृतिक विकास बोले तो प्राचीन सामन्ती विचारों को थोपना। आधुनिकता का विकास बोले तो मुनाफ़े में सब कुछ तब्दील कर देना।
9. पुल बनाया ही इसलिये जाता है ताकि पुल बार-बार बन सके।
10. आज पुल गिरा, कल किसी ने आत्महत्या कर ली, परसों खदान गिरी। यहां इमारत गिरी, वहां छत धंसी, यह सब तो होता रहता है। ये तो प्रकृति का नियम है, एक न एक दिन तो सबको जाना ही है।
11. नागनाथ और सांपनाथ में एकता हो चुकी है। दोनों मिलकर जंगलकानून को पूरी ईमानदारी , मेहनत और लगन से लागू करेंगे, चाहे इसके लिये कितना भी खून बहाना पड़े।
12. सत्य ही ईश्वर है, सत्य ही सुन्दर है, सत्य ही शिव है। सच बोलो, सच के साथ खड़े हो जाओ। न्याय की बात करना जंगलराज में कानूनी अपराध है।
13. “जंगलीकानून को जन्मजात माना जाये .....शेर बकरी को खाता है, बकरी घास को खाती है.....यही सच है.... यह सदियों से चला आ रहा है। अतः इसको कोई भी राजा के रहते छीन नहीं सकता। सियार और भेड़ियों को अपने इलाके में शिकार करने का जन्मसिद्ध अधिकार है।“
14. समस्या को सहन करो पर चूं न करो। गर चूं करी तो बिना कुछ लिये दिये आपको दूसरे घर की नागरिकता मिल जायेगी।
15. पड़ोसियों से घर तब तक नहीं बच सकता जब तक कि एक-दूसरे के प्रति गुस्सा बरकरार न हो।
16. जब आप एक गुलाम घर में रहते हो तो गुलामों की तरह रहो, घर के मुखिया की तारीफ़ करके अपने कर्तव्यों का पालन करो और खुश रहो।
17. देश के लिये बिकना हर किसी के बस की बात नहीं। जिसकी कीमत होती है वही तो बिक सकता है। बिके हुये देशभक्त ही सरकार की तमाम समस्याओं का एकमात्र समाधान हैं।
18. क्रिकेट देशभक्ति का उच्चतम प्रतीक है।
19. अगर कोई किसान पानी के नाम पर देशभक्ति में बाधा डालने की कोशिश करेगा तो देशभक्ति को बनाये रखने में धारा 144 पूरी मदद करेगी।
20. देश की प्यास बुझाने के लिये सभी नदियों को एक-एक करके बेचा जा रहा है। जब पानी ही देश का नहीं बचेगा तो पानी की लड़ाई भी अपने आप खत्म हो जायेगी।
21. इश्क करने वाले प्रेमी जोड़ों को भाई-बहन बनाकर भी प्यार को जिन्दा रखा जाये। ससुर को पति और पति को बेटा बनाने का गुण तो कोई इश्क के ठेकेदारों से सीखे।
22. इश्क ही करना है तो अपने वतन से करो, अपनी जाति, अपने धर्म से करो। इंसानों से क्या इश्क फ़रमाना।
23. दूसरे वतन से नफ़रत करे बिना देशप्रेम भी कोई प्रेम है। देशप्रेम को बरकरार रखने के लिये खून की होली भी खेलनी पड़े , तो भी कम है।
24. अब सब इंसानों से इश्क करने लगेंगे तो ये ऊंच, नीच, अमीर-गरीब, संस्कृति कौन बरकरार रखेगा?
25. लड़कियां घरवालों पर बोझ नहीं होतीं तभी तो 16 पार होते ही शादी करा देते हैं।
26. काम करना तो जन्मसिद्ध अधिकार है उनका। घर हो या बाहर सारे काम महिलायें ही करेंगी।
27. जितना धुंआ इनके (गरीबों के) चूल्हों से निकलता है उससे कई गुणा फ़ैक्ट्री या कम्पनी से निकलता है पर एक सर्टिफ़िकेट सब ठीक कर देता है। नदियां तो नहाने-धोने या जानवरों के नहलाने से प्रदूषित होता है, फ़ैक्ट्रियों के गन्दा पानी डालने से नहीं।
28. जिस फ़िल्म पर प्रतिबंध लगा हो वह हिट न हो , ऐसा कैसे सम्भव हो सकता है।
इस व्यंग्य संग्रह में 17 लेख संग्रहीत हैं। इसकी भूमिका आप यहां पढ सकते हैं।
पुस्तक: शिकारी का अधिकार
लेखिका-आरिफ़ा एविस
पृष्ठ -64
कीमत -30 रुपये
प्रकाशक: लोकमित्र प्रकाशन, दिल्ली


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Monday, March 20, 2017

चुनाव के बाद


चुनाव के बाद होने वाली हरकतों के बारे में गदर मतभेद हैं। कुछ लोग कहते हैं चुनाव के बाद सरकार बनती है। दीगर लोग मानते हैं कि चुनाव के बाद फ़िर चुनाव होते हैं। ज्यादा अनुभवी लोग बताते हैं कि चुनाव के बाद जो होता है उसको नौटंकी के अलावा कुछ कहना ठीक नहीं।
अब अपनी याद में अपन ने नौटंकी तो कभी देखी नहीं। अलबत्ता सुनते जरूर रहे कि कभी मनोरंजन के लिये नौटंकी का चलन था। ’सुल्ताना डाकू’ वगैरह की नौटंकी खेली जाती थी। ’सुल्ताना डाकू’ अमीरों को लूटकर गरीबों का भला करने के लिये बदनाम था। बाद में मनोरंजन का काम नौटंकी से छीनकर चुनावों को थमा दिया गया। ’सुल्ताना’ का काम सरकारें करने लगीं। अलबत्ता बदले हालात में लुटने का रोल गरीबो को मिला। शराफ़त के मारे अमीर लोग अपना भला कराने को अभिशप्त हुये।
यह हर चुनाव के बाद होता है। इसमें जीतने वाले को जीतते ही खारिज करने का रिवाज है। सरकार के स्याह पहलू जीतते ही उजागर होने लगते हैं। सरकार के मुखिया की कालिमा पर पर्दा डालने के लिये उसकी बचपन की मासूमियत और होनहारी के पोस्टर फ़ड़फ़ड़ाये जाते हैं। गर्ज यह कि जो जिसके खिलाफ़ जितना ज्यादा हल्ला मचता है उसका हुलिया उतना ही ज्यादा चमकता जाता है। आखिर बाजार को भी अपना लगाया हुआ पैसा वापस निकालना होता है।
ईवीएम और वैलटपेपर के लफ़ड़े से लफ़ड़े से बचने का सस्ता और टिकाऊ उपाय यह भी हो सकता है कि चुनाव में जिसको सबसे ज्यादा गरियाया जाये उसको इज्जत के साथ बुलाकर शपथ ग्रहण करा दी जाये-’ आइये भाई देश/प्रदेश को हिल्ले लगाना शुरु करिये एक तरफ़ से। अभी बरबादी की तमाम संभावनायें बची हैं।’
खैर यह तो वोट वाले चुनाव की बात हुई। चुनाव का एक मतलब चयन भी होता है। अपने पल्ले तो हर चयन के बाद पछतावा ही हाथ लगा है। चाहे घर हो या नौकरी, खरीदारी हो या नीलामी, दोस्ती हो दोस्त की तरफ़ से घोषित एकतरफ़ा दुश्मनी, हमने जो भी विकल्प चुना हमारे हिस्से अफ़सोस ही आया। हमारे चयन और पछतावे की संगत , शोले के जय-वीरू की दोस्ती के भी चार हाथ आगे लोकतंत्र में सरकार-भ्रष्टाचार की जुगलबंदी से भी ज्यादा फ़ड़कती हुई लगी। कई बार हमने चुनाव बाद में किया, पछतावा पहले आ धमका हल्ला मचाते हुये - ’अबे तेरा चुनाव किधर है।’
अच्छे घरवाले बनने की तमन्ना में लौटते हुये अक्सर घर का सामान ले जाते। मगर मजाल है कि कभी किसी सामान का चुनाव सही साबित हुआ हो। हर बार ठेले में बची हुई सब्जी बहुमत वाली सरकार की तरह जानदार और झोले की सब्जी अल्पमत विपक्ष की तरह मरगिल्ली निकली। घर पहुंचते ही उसको वापस लौटाने का फ़रमान होता। सब्जी वापस करने बाजार जाते। फ़िर उससे खराब सब्जी लेकर लौटते। उसकी भी वापसी की गुंजाइश इस लिये खत्म हो चुकी होती क्योंकि सब्जी वाले रात में खाली ठेलिया खड़ी करके ग्राहक का इंतजार पसंद नहीं करते हैं। मजबूरन घर में अपने चुनाव पर लानत पाते हुये भी लगता -गर फ़िरदौस बर रुये जमीनस्त, हमीअस्तों, हमीअस्तों, हमीअस्तों।
खराब चुनाव की अपनी इतनी धाक है कि घरवाले क्या बाहर वाले तक अन्दाजा लगा लेते हैं कि किस सामान की खरीदारी में हमारा हाथ है। बल्कि लोग तमाम गलत चुनाव धड़ल्ले से इसलिये करते रहते हैं कि गलत साबित होने पर हमारे नाम चढ जायेगा।
अब तो गलत चुनाव का ऐसा अभ्यास हो गया है कि जो भी निर्णय लेते हैं गलत निकलता है। पहले घंटो बरबाद करने और बेवकूफ़ी (जिसको हम बहुत दिन तक अपनी अक्ल समझते रहे) भिड़ाने के बाद जितना गलत चुनाव करते थे अब उससे भी गलत चुनाव बिना बेवकूफ़ी लगाये कर लेते हैं। इससे समय (जिसको बरबाद करने के सिवाय और कोई उपयोग नहीं समझ में आज तक मुझे) और बेवकूफ़ी (जिसके सौंदर्य के किस्से आप जानते ही हैं) दोनों की भरपूर बचत हुई।
बिना बेवकूफ़ी खपाये गलत चुनाव करने की अपनी स्पीड के जलवे का आलम यह है कि दोस्त क्या स्वघोषित दुश्मन तक हमसे सलाह लेते हैं। सौ में नब्बे फ़ोन गलत सलाह के लिये आते हैं। हम भी कंजूसी नहीं करते सलाह देने में। इस चक्कर में एक अध्ययन टाइप भी हो गया है गलत सलाह देने का। यह बताया लोगों ने कि हमने जो सलाह बिना सुने दी वह ज्यादा कारगर हुई। मेरे को अपना दुश्मन मानने वालों ने एहतियातन मेरी सलाह के उल्टा अमल किया और इंशाअल्लाह सफ़ल भी हुये।
गलत अनुमान का हाल यह हुआ कि जिस बात पर हम सोचते हैं कि साहब शाबासी देगा उसके लिये जो सुनाया जाता उसका मतलब वही होता जो शोले में गब्बर सिंह खाली हाथ लौटे हुये अपने आदमियों को सुनाता था। उसके बाद का अमल बचा हुआ है तो सिर्फ़ इसलिये कि दफ़्तरों में शोले की तरह पहाड़ों की व्यवस्था की जगह कुर्सी मेज का चलन हो गया है।
इसके उलट कभी-कभी दिन बीत जाता डांट खाने के लिये चातक की तरह बॉस का मुंह ताकते हुये लेकिन उस दिन उसके गुस्से की ग्रांट दीगर लोगों पर लुट जाने के चक्कर में हम तक पहुंच ही न पाती। हम साहब के इस अन्याय का बदला अपने अधीनस्थों पर गुस्साते हुये लेने की कोशिश करते तो वे उलटा हमको घुड़क देते। लेकिन उनके गुस्से में साहब के गुस्से जैसी तासीर कहां से आती।
कई बार ऐसा भी हुआ कि किसी को दी हुई सलाह गलत नहीं निकली। ऐसे में लोगों के गुस्से का अंदाज ही लगाया जा सकता है। बस समझिये कि आलम यह रहा कि लोगों की मारपीट से अभी तक बच पाये तो सिर्फ़ इसलिये कि पीटने की मंशा रखने वाले को ऐन वक्त पर कोई दीगर जरूरी काम याद आ गया। बाहर के पीटनार्थियों से रेलवे की लेतलतीफ़ी ने बचा लिया। खुदा रेलवे की खस्ताहाली में बरक्कत करे।
गलत चुनाव की इतनी आदत पड़ गयी है कि कहीं कोई चुनाव सही निकल जाता है तो दिल दहल जाता है। हाय, अब क्या होगा?
अपना तो हाल यह हो गया है कि हम यह तक नहीं तय कर पाते कि आजकल दिन अच्छे चल रहे हैं कि खराब। हम अभी खुश हैं कि दुखी। हम पूरी तरह लुट चुके हैं या अभी और लुटने की गुंजाइश है। बस यही सोचकर संतोष कर लेते हैं - ’सब कुछ लुट जाने के बाद भी भविष्य बचा रहता है।’


अब आप ही बताओ कि हम सही सोचते हैं या गलत?
नीचे चित्र आर्मापुर के पास बहने वाली नहर का जिसके दोनों किनारे कहते हैं कि वही सही किनारा है।

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Saturday, March 18, 2017

पंचबैंक

1. जो याचक है,पीड़ित है, परेशान है उसे घंटा बजाना आना चाहिए। Brajesh Kanungo

2.पर-निंदा एकदम मीठे खाज की तरह होती है | इसे जितना अधिक खुजाओं, उतना अधिक मीठी कशिश देती है| राजेश सेन

3.नोटबंदी अपनी पैदाइश से ही प्रमेह और पेंचिश जैसे गरिष्ठ रोगों का शिकार है | अब उसे कैशलेस के प्रतिरोधक टीके लगाए जा रहें हैं | ई-ट्रांजेक्शन का ओआरएस घोल पिलाया जा रहा है | राजेश सेन

4. बेरोजगारी की वर्षा मे आदमी राजनीति की छतरी ढूँढता है। Abhishek Awasthi

5.शराफ़त जितनी जल्दी छोड़ी वे उतनी जल्दी जी आत्मविकास के उच्चतर सोपान पर पहुंचे। DrAtul Chaturvedi

6. औसत से ज्यादा प्रदर्शन राजनीति में व्यक्ति को अपच का शिकार कर देता है। DrAtul Chaturvedi

7. राजनीति मिशन से कमीशन होते हुये अब प्रोफ़ेशन और फ़ैशन बन गयी है। DrAtul Chaturvedi

8. आने वाले समय में रोबोट बच्चे तैयार किये जाएँगे, जिन्हें अडॉप्ट करके लोग अपनी नाक ऊँची करने में कामयाब भी होंगे और जीनियस बच्चे के माँ बाप कहलाने का गौरव मिलेगा, सो अलग .. अर्चना चतुर्वेदी

9. नेता नौकरशाहों को सरकार बनने पर देख लेने की जिस तरह धमकी देता है उसी तरह लेखक अपने विरोधियों को पत्रिका निकालने की धमकी देता है! Arvind Tiwari

10. (नेता की) खास पहचान है रंगहीन होते हुए भी ये सभी रंगों को मिलाकर काला रंग बनाते है और सफेदपोश कहलाते है Arifa Avis



11. पहले बच्चे को बोलना सिखाया जाता है और जब वो बोलना सीख जाता है तो उसे न बोलना सिखाने की जरुरत पड़ती है Yamini Chaturvedi

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Friday, March 17, 2017

पंचबैंक

पंचबैंक/धांसू डायलॉग
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1. हर ऐसी मुहिम पर शक करो, फ़जीहत भरी जानो जिसके लिये नये कपड़े पहनने पड़ें।
2. मूंगफ़ली और आवारगी में खराबी ये है कि आदमी एक बार शुरू कर दें तो समझ नहीं खत्म कैसे करें?
3. जब कोई किसी पुराने दोस्त को याद करता है तो दरअस्ल अपने को याद करता है।
4. बुढापे की शादी और बैंक की चौकीदारी में जरा फ़र्क नहीं। सोते में भी एक आंख खुली रखनी पड़ती है और चुटिया पे हाथ रखकर सोना पड़ता है।
5. मर्द भी इश्क-आशिकी सिर्फ़ एक बार ही करता दूसरी मर्तबा अय्यासी और उसके बाद निरी बदमाशी।
6. जवानी दीवानी की तेजी बीबी से मारी जाती है। बीबी की तेजी औलाद से मारते हैं औलाद की तेजी साइंस से और साइंस की तेजी मजहबी शिक्षा से। अरे साहब तेजी का मारना खेल नहीं है, मरते-मरते मरती है।
7. इससे अधिक दुर्भाग्य क्या होगा कि आदमी एक गलत पेशा अपनाये और उसमें कामयाब होता चला जाये।
8. दुनिया में पीठ पीछे की बुराई से हजम होने वाली कोई चीज नहीं।
9. एक पांव लंगड़ाना दोनों पांव लंगड़ाने से बेहतर है।
10. मुगल बादशाह जिस दुश्मन को अपने हाथ से मारना नहीं चाहते थे उसे हज पर रवाना कर देते या झंडा, नक्कारा और खिलअत (शाही पोशाक) देकर दक्खिन या बंगाल जीतने के लिये भेज देते।
11. इतिहास पढने से तीन लाभ हैं। एक तो यह कि पूर्वजों के विस्तृत हालात की जानकारी होने के बाद आज की हरामजदगियों पर गुस्सा नहीं आता। दूसरे याददास्त तेज जाती है। तीसरे , लाहौल विला कूवत, तीसरा फ़ायदा दिमाग से उतर गया। कराची भी अजीब शहर है हां तीसरा भी याद गया। तीसरा फ़ायदा यह कि खाने, पीने, उठने, बैठने , भाइयों के साथ मुगलिया बरताव की सभ्यता से परिचय होता है।
मुश्ताक अहमद यूसुफ़ी
के उपन्यास धनयात्रा से 

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Wednesday, March 15, 2017

सोचते रहते हैं ऐसा आवारगी के बारे में

एक दिन दफ़्तर जा जाते हुये कुछ बाबा लोग दिखे। विजय नगर चौराहे के पहले। एक हाथी पर पूरा राज-पाट टाइप लादे चले जा रहे थे। घड़ी देखी। पांच मिनट लेट होने की गुंजाइश थी। आगे निकलकर गाड़ी किनारे की। दरवज्जे का पल्ला खोला। बाहर आकर बाबा लोगों का मय हाथी इंतजार करते रहे।

इन्तजार ऐसे जैसे चौराहे के सिपाही बीच-बीच में चौराहा छोड़कर दुपहिया-चौपहिया वाहन चेक करने लगते हैं। चेक करते हुये वे सरकार की कमाई में बरक्कत तो करते ही हैं। साथ में अपनी भी सब्जी भाजी और गैस के बढे हुई कीमत का दर्द हल्का कर लेते हैं।

इन्तजार का एक और अन्दाज जैसे शहर के नाके से गुजरने वाले मंत्री का उसकी पार्टी के स्वयंसेवक करते हैं। माला और मुंह मुर्झाते रहते हैं नेता जी के आते-आते।

बाबा लोगों के पास आते-आते हम उनको कैमरे में कैद कर चुके थे। पता चला कि वे पनकी मन्दिर के पास रहते हैं। मैहर दर्शन करने जा रहे थे। हमारे लिये इतना बहुत था । हम गाड़ी स्टार्ट करके चल दिये। तब तक एक बाबा ने खर्चा-पानी मांग लिया। लेकिन हम न्यूटन बाबा के जड़त्व के नियम के सम्मान करते हुये चल दिये थे तो चल ही दिये फ़िर।

लेकिन ज्यादा आगे नहीं जा पाये कि हमें यादों ने सालों पीछे धकेल दिया। जब हम साइकिल से भारत दर्शन करने जा रहे थे तो पहला पैडल धरते ही एक दम्पति कार से आये थे। उन्होंने अखबार में हमारी यायावरी की खबर बांची थी। आते ही उन्होंने शुभकामनायें दीं और कुछ पैसे भी रास्ते में खर्चे के दिये।

याद आते ही हमारी गाड़ी अपने आप धीमी हो गयी। हम फ़िर रुके। बाबा लोगों का इन्तजार किया। पास आने पर कुछ पैसे दिये। एक तरह से 34 साल पुराने कर्ज से उबरे तो नहीं लेकिन उसके सुपात्र से बने। हमको किसी ने दिया तो हम भी दे दिये।
पैसे और यादों से हल्के होकर आगे बढने से पहले मन किया कि हम भी गाड़ी यहीं किनारे ठड़िया के निकल लें संग में बाबा लोगों के। यह सोचते ही कई दुविधायें सामने आकर खड़ी हो गयीं:
1. गाड़ी सड़क पर खड़ी रहने से जाम लग जायेगा।
2. दफ़्तर में न पहुंचने पर बिना बताये अनुपस्थिति की नोटिश मिल जायेगी।
3. शाम तक घुमक्कड़ी का भूत न उतरा तो फ़िर कायदे भूत उतारा जायेगा।
हम इन्ही सब दुविधाओं के जबाब सोचने लगे। तब तक पीछे की गाड़ियां पिपियाने लगीं। मजबूरी में हमें आगे बढना पड़ा। इसके बाद का किस्सा क्या बतायें। बस समझ लीजिये कि सोचते रहते हैं ऐसा आवारगी के बारे में।
आप भी ऐसा सोचते हैं क्या कभी?


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Tuesday, March 14, 2017

सब जगह तो पैसे का जोर है

आज दोपहर शास्त्री नगर तक गये। पंजाब नेशनल बैंक में भाईसाहब से मिलने। गाड़ी नीचे ही खड़ी कर दी। फ़ुटपाथ पर एक सरदार जी अपनी खराद के कारखाने पर बैठे टिफ़िन खोले रोटी खा रहे थे। बात करने की मंशा से मैंने उनसे कहा -गाड़ी खड़ी है देखे रहियेगा।
’हां, ठीक।’ - कहकर वे रोटी खाने में मशगूल हो गये।
लौटकर आने पर देखा कि वे सरदार जी खराद की मशीन पर लोहा छील रहे रहे थे। कोई जॉब बना रहे रहे। शायद रिपेयर का काम। जॉब नापने के लिये स्क्रूगेज बगल में धरा था।
बात की तो पता चला कि 1967-68 में कानपुर आये थे। पंजाब से। चालीस साल से अधिक हुये शास्त्री नगर के इस मकान में रहते हुये। दो बेटियों की शादी कर चुके। एक बेटा है वह चण्डीगढ में काम करता है। पत्नी यहां साथ में है। खराद की मशीन पर काम करके अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं।
खराद मशीन के बारे में पूछने पर बताने लगे-’सन 1984 में खरीदी थी यह मशीन। दस हजार में मिली थी। उसके पहले जो मशीन थी उसे दंगाई लूट् के गये थे। और भी सामान ले गये थे।’
33 साल पहले की दंगे की बात एक सहज खबर की तरह बता रहे थे। हमने पूछा -’इत्ती भारी मशीन कैसे लूट ले गये।’
’अरे टन टन भर वजनी सामान ले गये थे।’- उन्होंने बताया।
73 साल के कर्मवीर की जिजीविषा और काम करने की लगन की तारीफ़ की तो बोले-’काम नहीं करेंगे तो खायेंगे क्या? कौन हमको पेंशन मिलती है कोई?’
अपने से ही बताने लगे-’ सब कागज भरा के ले गये कई बार पेंशन के। लेकिन कोई नहीं मिली। न वृद्धा न समाजवादी पेंशन।’
पता चला कि जहां दुकान है वो मकान किसी दूसरे ने किराये पर खरीद लिया है।
बोले- ’हरामजादे मकान मालिक ने नोटिस दिया है। कोर्ट में केस चल रहा है। कागज मेरे सब चौरासी के दंगे में लूट ले गये।’
फ़िर आगे बोले-’ सब जगह तो पैसे का जोर है। जज भी सब क्रप्ट हैं।’
हम न्यायपालिका के सम्मान में क्या कुछ कहते। चुप रहे।
दोनों आंखों में ज्यादा पावर का चश्मा। एक में पास और दूर दोनों की नजर वाला। फ़ोटो दिखाया तो बहुत हल्के से मुस्कराये। बोले -अच्छा है।
हमने सोचा हालिया चुनाव के नतीजे के बारे में उनकी राय जानें। लेकिन नहीं पूछा। हिम्मत नहीं पड़ी। नमस्ते करके चले आये। कर्मवीर भी में जुट गये।

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