Sunday, August 30, 2026

तैराकी के तीन माह

 आज स्विमिंग सीखना शुरू किए हुए तीन महीने हुए। तीस मई को पहली बार पूल में उतरे थे। लगता था पता नहीं कब सीख पायेंगे।

कई बार लगता था कि तैरना आना चाहिए। लेकिन कंधे की समस्या के कारण हिम्मत नहीं हुई। लगता कहीं पानी में कंधा न उखड़ जाये। लेकिन अक्टूबर में लक्षद्वीप टूर के दौरान स्कूबा डाइविंग के बाद बेटे अनन्य Anany ने कहा -'पापा स्वीमिंग सीख लीजिए।' उसी पल हमने तैराकी सीखने को अपनी 'विश लिस्ट' में शामिल कर लिया।
अक्टूबर में 'विश लिस्ट' में शामिल करने के बावजूद सीखना शुरू करने में सात महीने लग गए। 30 मई से राम मनोहर लोहिया स्विमिंग पूल में सीखना शुरू किया। कंधे की समस्या के चलते ब्रेस्ट स्ट्रोक सीखना शुरू किया। लेकिन पैर फ्री स्टाइल में ही चलाते रहे। पैर फ्री स्टाइल में चलाने का कारण कूल्हे की हड्डी का दर्द था। पाँच-सात मीटर बिना पानी में सांस लिए तैरने लगे तो लगा सीख गए। लेकिन बाद में पता चला यह तो हसीन भ्रम था। असल चीज तो पानी में तैरते हुए साँस लेना था।
बाद में कूल्हे का दर्द , शायद स्विमिंग के कारण ही, ख़त्म हो गया। हमने गठबंधन स्ट्रोक छोड़कर ब्रेस्ट स्ट्रोक की सरकार बनाई। सीखने लगे। जब हमें लगे कि हम सीख गए तब कोच कोई कमी बता देते।
हमने सैकड़ों वीडियो देखें। उनसे सीखा।याद किया लेकिन अमल में लाने में गड़बड़ाते रहे। तमाम बाधाएँ आयीं। कई बार लगा कि हमसे न हो पायेगा। लेकिन लगे रहे। अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔंध' जी की कविता याद करते :
'देखकर बाधा विविध, बहु विध्न घबराते नहीं।'
हमको अपने गुरु जी की कही बात भी याद आती रही -' दुनिया में कोई ऐसा काम नहीं जो दूसरे कर सकते हैं और तुम नहीं कर सकते।'
तैराकी के किस्से हम अपने लिए लिखते रहे। एक चुनौती थी ख़ुद के लिए कि तैरना सीखना है। सीखना ही है। इन किस्सों को पढ़कर कई मित्रों ने भी सीखना शुरू किया। दोस्त लोग उत्साह भी बढ़ाते रहे।
आज तीन महीने होने पर हमने पूल की चौड़ाई कई बार पार की। 12 मीटर का पूल है। एक बार विकर्ण पर चलते हुए तैरे -करीब 14 मीटर। साँस नहीं फूली। हाथ -पैर थोड़ा गड़बड़ हुए लेकिन अगली बार ठीक कर लिया। मुँह में थोड़ा पानी गया लेकिन उससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। एक बार सामने कोई आया तो तैरते हुए ही ठहर कर उसको निकलने दिया। पहले सिटपिटा के खड़े हो जाते थे।
तीन महीने के दौरान चार पूल में तैरे। सबसे ज़्यादा RML में । लेकिन सीखा सबसे ज़्यादा दूसरे, छोटे कहे जाने वाले पूल में। इन पूल के कोच ने व्यक्तिगत रूप से टिप्स दिए। किसी न कुछ सिखाया, किसी ने कुछ। सभी का शुक्रिया।
आप सभी मित्रों का आभार।

Saturday, August 29, 2026

13 मीटर के तैराक

 आज बेटे अनन्य को एयरपोर्ट पर छोड़कर स्विमिंग पूल गए। 8-9 वाले बैच में हम अकेले थे। बाक़ी लोग सुबह वाले बैच में आकर चले गए थे। इसके बाद शाम के बैच चलेंगे।

आज दस मीटर की दूरी पूल की आराम से कई बार पार हुई। आते-जाते। पैर अभी भी ठीक नहीं चल रहे थे। दो-चार किक मेढक की तरह होते इसके बाद फिर हवा में उठ जाते पैर झंडे की तरह। जैसे बदमाश लोग जल्दी साथ नहीं छोड़ते उसी तरह खराब आदतें देर तक साथ देती हैं।
दस मीटर चौड़ाई आराम से कई बार तय करने के बाद पुल की लंबाई पर हाथ साफ़ किया। लंबाई 13 मीटर है। पहली बार तो मुँह में पानी भर जाने के कारण आधी दूरी पर ही खड़े हो गए। दूसरी बार आराम से 13 मीटर तैर लिए। एक बार तय कर लिए तो फिर दुबारा भी किए। तिबारा भी। कोई पर्वतारोही एक बार एवरेस्ट पर चढ़ जाता है तो बार-बार चढ़ता है। उसी तरह हमने भी कई बार पुल की लंबाई पार की।
तैराकी का घंटा पूरा होने के पहले हमने सोचा तैरने का वीडियो बनाया जाये। कोच शिव ने मेरे मोबाइल से वीडियो बनाया। दस मीटर की जो दूरी हम पहले आराम से तैर ले रहे थे उसको पार करते हुए ध्यान सामने कैमरे की तरफ़ गया। इस चक्कर में पानी मुँह में भर गया। हम वहीं ठहर गए। जैसे कोई भाषण देते नेता का टेलीप्रॉम्टर खराब हो जाने पर वह वहीं अटक जाता है। रुक जाता है। वह किंभाषणविमूढ़ हो जाता है। उसी तरह मुँह में पानी जाने से हम बीच पूल खड़े हो गए। तैरना स्थगित हो गया। किक लगी नहीं। मतलब हम किंकिकविमूढ़ हो गए। वापस शुरुआती जगह पर गए। फिर से तैरना शुरू किया।
पूल किनारे आने के बाद वापस जाते समय भी वीडियो बनवाया। इस बार सर की जगह पैर मोबाइल कैमरे के सामने थे। दूसरी तरफ़ पहुँच गए। दस मीटर दूरी तारे करने के बाद भी हाँफना नहीं हुआ। तसल्ली से तय हुई दूरी। जैसे 13 मीटर तय हुई थी।
वीडियो देखने पर दो कमियाँ पता चलीं। पहली और प्रमुख गलती यह कि किक करते समय पैर पानी के अंदर मेढक की तरह न चलकर ऊपर की तरफ़, हेलीकॉफ्टर के पिछले पंख की तरह चल रहे थे। दूसरी बात हाथ चलाते समय कई बार ग्लाइड करना भूल जा रहे थे। इस चक्कर में हाथ जल्दी-जल्दी चल रहे थे। थकान हो जा रही थीं।
इस सबके बावजूद आज की उपलब्धि यह रही कि अब हम दस मीटर से बढ़ाकर 13 मीटर के तैराक हो गए। कल में मुकाबले 30% सुधार। एक घंटा छह मिनट में 321 एक्टिव किलो कैलोरी खर्च हुई। यह खर्च किसी भी दिन के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा हुआ।
13 मीटर के तैराक होने के बाद अब अगला कदम क्या होगा यह कल पता चलेगा। फ़िलहाल आप आज के तैराकी के वीडियो देखिए। बताइए कैसा लगा देखकर।

Friday, August 28, 2026

दस मीटर के तैराक


 कल सुबह स्विमिंग के लिए गए। 6-7 के बैच में।पहुंचे तो देखा पूल आधा खाली था। पता चला एक दिन पहले शाम को किसी बच्चे ने पूल के पानी में कई उल्टियाँ कर दीं। पूल का पानी बदला जाना है। रात आधा ही ख़ाली हो पाया। दो दिन लगेंगे पूल खाली होने और फिर भरने में।

तैराकी के लालच ने हमने आसपास के कई स्विमिंग पूल खोजे। गूगल की सुविधा -swimming pool near me का उपयोग करके। जो पूल मिले उनमें से कुछ काफ़ी दूर थे। पास के पूल अधिकतर बंद हो चुके थे। एक पूल खुला था। हमने सोचा 8-9 वाले बैच में जायेंगे वहाँ तैरने। अभी घंटा भर बाक़ी था। इसलिए घर लौट आए।
आठ बजे के हिसाब से पूल के लिए निकले। कार से। मैप देखते हुए पूल पहुँचे तो देखा तो पूल बंद था। मतलब हम गलती से उस पूल पर पहुँच गए थे जिसने पहले ही बता दिया था कि पूल बंद है।
अपनी गलती पर ख़ुद को थोड़ा हड़काया। फिर उस पूल की तरफ़ गए जिसने खुला होने के बारे में बताया था। लोकेशन पर पहुँचे तो वह पूल splash पूल के बगल में था जहाँ अपन दो बार पहले भी आ स्विमिंग कर चुके हैं। इस पूल का नाम था - Summer Wind Swimming Academy. स्प्लैश और समर विंड मिलकर पहले एक ही पूल था। दो भाइयों का पूल। बंटवारा हुआ तो पूल के बीच दीवार उठ गई। एक पूल दो भागों में बंट गया। अम्बुजा सीमेंट वाली दीवार की तरह।
कल देर हो गई थी। फिर शाम को जा नहीं पाये। आज पूल शाम को 7-8 खुलना था। गए तैरने। पूल की अधिकतम गहराई पाँच फीट है। लंबाई 13 मीटर , चौड़ाई 10 मीटर । हम पानी में उतर गए। हमारे अलावा एक बच्चा , एक महिला और एक युवा पूल में थे। कोच कहीं टहलने गया था।
शुरुआत में पूल की चौड़ाई दो बार ने तय की। अब सर ठीक से उठने लगा है। साँस लेने लगे हैं। पैर भी ठीक चलने लगे। लेकिन शुरुआत में आधी दूरी पर रुकते रहे। कभी मुँह में पानी चला जाता, कभी हाथ ग़लत चल जाता। कभी पैर।
कोच शिव ने बताया कि पैर पीछे ले जाते समय पंजे मिलाइये। हमने ध्यान से मिलाया। इसके बाद तैरे तो दस मीटर की दूरी तय कर ली। साँस भी नहीं फूली। कई बार पूल की चौड़ाई तैर कर पार की।
मतलब अब हम सवा छह मीटर के तैराक से दस मीटर के तैराक हो गए। यह करीब पचास प्रतिशत का सुधार है।
वापस आते हुए देखा कि कार का अगला शीशा खुला था। हम मोबाइल कार में छोड़कर गए थे। लगा मोबाइल विदा हो गया। जी धक्क से हुआ। लेकिन देखा कि मोबाइल कार में आराम फ़रमा रहा था। एक बार फिर जी धक्क से हुआ। एक मिनट में दो बार जी धक्क से हुआ। एक डर के मारे दूसरी बार संतोष के मारे। दिल ने हड़काया दिमाग़ को कि जरा ध्यान से कार का दरवाज़ा बंद किया करो।
दिमाग़ ने मुस्करा कर दिल को लव यू बोला। दोनों मुस्कुराते हुए आपस में बतियाने लगे।
फ़ोटो रक्षाबंधन के मौक़े पर परिवार के साथ। लंबे अरसे बाद दोनों बेटे एक साथ घर पर आए। इस घर में तो पहली बार। आप को रक्षा बंधन की शुभकामनाएँ।

Thursday, August 27, 2026

मैं इस उम्मीद में डूबा कि वो बचा लेगा

 मैं इस उम्मीद में डूबा कि वो बचा लेगा,

अब इसके बाद मेरा इम्तहान क्या लेगा?
वसीम बरेलवी जी का यह शेर कल तब याद आया जब कोच हितेश ने मुझे पानी में कूदने को कहा। जहाँ से कूदने को कहा वहाँ पानी हमने ऊँचाई से क़रीब दो गुना होगी।
कल दायाँ कंधा भी कुछ दर्द कर रहा था। आधी चौड़ाई तैरने में ही ठहर जा रहे थे। लगा कहीं दर्द बढ़ न जाये। लेकिन तैरते रहे आहिस्ते-आहिस्ते।
ऐसे में कोच ने गहरे ने कूदने को कहा तो मैंने मना किया। यह सोचकर कि कहीं उखड़ न जाए। लेकिन हितेश ने दुबारा कहा यह कहते हुए -‘ आप चिंता न करें। कंधे को कुछ नहीं होगा। मैं हूँ न।’
मैंने कहा मैं कूदूँगा लेकिन पहले चौड़ाई एक बार में पार कर लें। पूल बंद होने के पहले कूदूँगा। इस पर हितेश ने कहा -‘ आप जम्प करिए। मैं पूल आज से बंद करवा दूंगा।’
इसके बाद हम कूदने की जगह पर जाकर खड़े हो गए। हितेश भी पानी में उतर गए। थ्री, टू, वन हुआ। वन के बाद भी थोड़ा झिझके कि न कूदें। लेकिन फिर कूद ही गए पानी में। छपाक से।
कूदने पर चारो तरफ़ पानी ही पानी। हम पानी में पाँव चलाने लगे। हाथ भी। लेकिन सर पानी के अंदर ही रहा। सर पानी के अंदर रहने के कारण सांस नहीं ले पाये। जो जमा थी उसी से काम चलाते हुए हाथ-पांव मारते रहे। क़रीब चौथाई मिनट के बाद जमा साँस खर्च हो गई। हमने हाथ ऊपर किया। बग़ल में चल रहे हितेश ने मेरा हाथ पकड़ कर किनारे कर दिया।
बाद में कूदने का वीडियो देखा। पाँव ठीक से नहीं चल रहे थे। हाथ भी उस तरह नहीं कि सर ऊपर उठ सके।
एक बार गहरे में कूदने का अनुष्ठान हो गया। अब जल्दी ही फिर कूदेंगे। रोज़ कूदेंगे। बस चौड़ाई तैरकर पार करने लगें।
ऊपर वसीम बरेलवी का शेर लिख तो दिया। लेकिन हमारे लिए इसमें ‘डूबा’ की जगह ‘कूदा’ होना चाहिए।
वैसे नामी शायर का शेर तो प्रभाव जमाने के लिए लिखा। सच ने यहाँ मेरी ख़ुद की तुकबंदी ज़्यादा मुफ़ीद बैठती है जिसकी शुरुआत इस तरह है :
“मेढक ने पानी में कूदा-छपाक”
यह तुकबंदी और इससे जुड़ा क़िस्सा टिप्पणी में दी लिंक में पढ़ सकते हैं।
पानी में कूदने का वीडियो Shivam के सौजन्य से। शिवम भी पूल में लोगों को तैरना सिखाते हैं।
वीडियो में हितेश मेरे पानी में कूदने के बाद मेरे साथ , बगल में चलते दिख रहे हैं।

Wednesday, August 26, 2026

नौकरी का नाटक

 


पिछले हफ़्ते अख़बार में ख़बर पढ़ी -‘ चीन में बेरोजगार जेन-जी पैसे देकर कर रहे हैं नौकरी का नाटक।’

सामाजिक दबाब और काम का अभ्यास बना रहे इस लिए चीन में बेरोजगार युवा पैसे देकर ऐसे ऑफिस या ऑफिस जैसा दिखने वाली जगहों में जाते हैं। इसके लिए वे कंपनियों को 350 से 600 रुपये प्रतिदिन तक भुगतान भी करते हैं।
पैसे देकर नौकरी का भ्रम बनाते रखने के कारण यह हैं :
-घर पर दिन नहीं बिताना चाहते
-ऑफिस जाने का रूटीन बना रहता है
-दूसरों के बीच अकेलापन कम होता है
-नौकरी के लिए आवेदन करते हैं
-स्टार्ट अप या फ्रीलांस काम कर रहे हैं
-कंप्यूटर -इंटरनेट का इस्तेमाल
मतलब इज़्ज़त से बेरोजगार बने रहे के लिए भी पैसा चाहिए।
सामाजिक प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए घर से बाहर रहने के उदाहरण तो भारतीय समाज में भी मिलते हैं। आयुध निर्माणियों में कुछ लोग जब सस्पेंड होते थे तो घर से समय पर निकलते थे। शाम को समय पर घर जाते थे। घर में बताते नहीं थे कि सस्पेंड हुए हैं। भले ही बाद में कोई दूसरा बता देता था या जब महीने के आख़िर में तनख़्वाह आधी मिलती होगी तब घर वाले पूछते हींगे तो बता देते होंगे।
नेट पर इस बारे में खोजने पर पता चला कि इस तरह काम करने वाले बेरोजगार दफ़्तर में काम करने की हरकते करते हैं। फ़ाइल में डूबे रहना। फ़ाइल लेकर झटके से कहीं चल देना। किसी से कुछ डिस्कस करने लगना। शायद बॉस की एक्टिंग करने वाले के लिए ऐसे इंसान की सुविधा भी मिलती हो जिसको वो फटकार भी सकते हों।
भारत में लोगों के क्या करते हो के सवाल से बचने से के लिए लाइब्रेरी स्टडी कैफ़े का चलन बढ़ा है। जापान में भी स्टडी रूम और कैसे वर्क का चलन बढ़ा है। अमेरिका और यूरोप में को वर्किंग स्पेश और को वर्किंग कैफ़े का चलन है।
लेकिन यह सब चीन जैसा पैसे देकर रोजगार का नाटक करने से अलग है।
कोई बहुत व्यस्त दिखे तो हमे लगता है कि वह काम से ज़्यादा काम का नाटक कर रहा। क्या पता दिन में अठारह-बीस घंटे काम करने वाले लोग भी इसी तरह काम से ज्यादा काम का नाटक करते हों।
शाहजहांपुर में हम लोग मजाक में अपने दोस्तों से कहते थे -‘ क्या बात है ? बहुत बिजी दिख रहे हो, कोई काम-धाम नहीं है क्या?’
आपका क्या कहना है इस बारे में ?

Tuesday, August 25, 2026

पैर का मूवमेंट ठीक करना है

 कल हमारा पूल बंद था। दूसरे पूल में गए स्विमिंग के लिए। स्प्लैश पूल अकादमी। छोटा पूल है। घरेलू टाइप। पहले भी एक बार जा चुके हैं यहाँ। दो घंटे लगातार तैरे थे।

भुगतान के लिए मोबाइल साथ ले गए थे। पैसा जमा किया। एक घंटे के दो सौ रुपए। मोबाइल बैग में रखकर पूल किनारे ले आए। तैरते हुए वीडियो बनवाने की मंशा से।
पूल में उतरने पर पहले दो बारे में पूल की चौड़ाई पार की। छह मीटर चौड़ाई दो बारे में। फिर अभ्यास के बाद एक बार में इधर से उधर पहुँचे।
कोच अभिषेक ने बताया कि पैर का मूवमेंट ठीक करना है। तैरते समय पैर हेलीकॉप्टर के पिछले पंखे की तरह ऊपर उठे रहते हैं। हेलीकॉप्टर का पंखा उसके संतुलन के लिए होता है। हमारे पैर हमारी तैराकी में बाधा बने हुए थे।
इसके बाद पैर के ठीक मूवमेंट का अभ्यास किया। पैर मेंढक की तरह चलाये। उसको देखकर अभिषेक ने बताया -‘ हाँ अब ठीक है।’
घंटे भर की तैराकी के बाद बाहर आए। अभिषेक ने कल से पूल बंद हो जाएगा। अगले सीजन में खुलेगा। वो वापस अपने गांव लौट जाएगा। गोरखपुर में है उसका घर। पोखर-तालाब में सीखी है तैराकी। अब स्विमिंग में पूल में लोगों को सिखा रहे हैं।
घंटे भर तैरने के बाद पूल से बाहर आए। तब तक पूल की संचालिका भी आ गईं थीं वहाँ। बताया कि उनके घर वाले स्विमिंग से जुड़े हैं। कुशल, नामी तैराक हैं। पहले उनका पूल बड़ा था। फिर आधा करवा दिया। सुरक्षा के लिहाज से। छोटे पूल में निगरानी करना सहज रहता है। आने वाले वर्षों में पूल को 'आल वेदर पूल' बनवाने का प्लान है। तब साल भर खुला रहेगा पूल।
उन्होंने अपने पूल में तैरना सीखे उन बच्चों के फोटो दिखाये जिन्होंने शहर की तैराकी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिए और इनाम जीते। अपने गुरुकुल के बच्चों की सफलता की चमक उनके चेहरे पर झलक रही थी।
आज अपने पूल गए तो कोच हितेश ने बताया कि पैर को पेट तक लाकर पीछे ले जाऊँ। इससे किक अच्छा होगा। हमने किया। ग़ज़ब का सुधार दिखा। तैरने में आसानी हुई। सर ऊपर आराम से आया। साँस लेने में आसानी हुई। इसके अलावा तैराकी भी दूर तक हुई।
पहले इस पूल की 12 मीटर की चौड़ाई दो बार में पार कर पाते थे। मतलब क़रीब छह मीटर एक बार में। पुराने पूल के हिसाब से सवा छह मीटर के तैराक थे हम। आज करीब नौ मीटर एक बार में तैरे। आनंद की अनुभूति हुई। जल्दी ही 12 मीटर चौड़ाई तैरकर पार करंगे। इसके बाद लंबाई पर हाथ साफ़ करेंगे।
तैरना सीखना अपने में मजेदार और सुखद अनुभव है। इसके किस्से लिखते रहने का कारण अपने सीखने की रिकार्डिंग करना है। इन किस्सों को पढ़कर कुछ मित्र भी पूल में उतरे हैं। कुछ सीख भी गए। कुछ सीख रहे हैं। अपन भी लगे हैं। सीख ही जाएँगे जल्दी ही।
तैरना सीखने के साथ वीडियो बनाना भी सीख रहे हैं। आज तीन वीडियो और दो फोटो जोड़कर बनाया यह वीडियो। कैसा लगा बताइए?
तैराकी से जुड़ी पोस्ट कैसी लग रही हैं ? क्या आपको भी तैरना सीखने का मन करता है? तैराकी न सही कुछ और सीखने का मन तो ज़रूर करता होगा। शुरू करिए सीखना। कुछ भी सीखिये, सीखते रहिए। मजा आयेगा।

Monday, August 24, 2026

कौनौ नौकरी होय तौ बताओ दादा


 स्विमिंग पूल से लौटते हुए रास्ते में दिहाड़ी मजदूर मिलते हैं। काम की तलाश में खड़े। साइकिल रोककर अक्सर उनसे बतियाने लगते हैं। अक्सर मुलाक़ात होती है तो चेहरे पहचाने लगते हैं। नाम नहीं पूछा।

पहले दिन साइकिल रोकी तो कई लोग लपकते हुए आए। पूछने लगे -‘ काम के लिए मजदूर चाहिए ? क्या काम है?’
हमने बताया कि मजदूर नहीं चाहिए। हम स्विमिंग पूल से लौट रहे हैं।
लोगों को कौतूहल हुआ। पूछने लगे -‘ कित्ता बड़ा है? कित्ते पैसे पड़ते हैं? हमको भी जाने को मिल सकता है क्या ?’
हमने बताया। आसपास के शहरों/गांवों के लोग हैं। बोली जानी-पहचानी। उनकी ही बोली में बतियाने से और अनौपचारिकता हो गई। एकाध ने साइकिल की घंटी, लाइट छूना शुरू किया। उनके से कुछ छुवन ‘ बैड टच घराने ‘ की भी थी। एक ने बिजली वाली घंटी खोल ली हैंडल से। कहा -‘ ये कैमरा है?’
हमने बताया -‘ कैमरा नहीं ये घंटी है। बिजली से चार्ज होती है’
दूसरे ने उसे डपटा तो उसने घंटी वापस लगा दी साइकिल में।
कुछ और लोग आ गए वहाँ। एक आदमी सलमान ख़ान स्टाइल में चश्मा कई तरह से लगाते हुए पोज दे रहा था। घनी दाढ़ी वाले उस आदमी को लोगों ने बताया -‘ इसका नाम परमाणु बम है। जब फटता है तो तबाही मच जाती है।’ वह आदमी हंसते हुए इधर-उधर चला गया।
अगले दिन रुके तो एक नौजवान लपकता हुआ आया। पूछा -‘ दादा , नहा आए ? कैसा रहा आज का दिन ?’
हमने कहा -‘ हम नहाने नहीं तैरना सीखने आते हैं। सीख रहे हैं।’
बगल में खड़े दूसरे आदमी ने स्विमिंग पूल और हमारी तैराकी को ख़ारिज करते हुए अपने गांव के तालाब और फिर नदी में तैरने के किस्से बताये। कहा -‘ यहाँ से पानी में उतरते थे वहाँ निकलते थे।’ यहाँ से वहाँ तक की दूरी उसने हाथ के इशारे से बताई। आप अपने हिसाब से अनुमान कर लें।
काम के बारे में बात होने पर कुछ लोगों ने कहा -‘ काम नहीं मिला आज अभी। कल भी नहीं मिला था। त्योहार आने वाला है। खर्च का जुगाड़ समझ नहीं आ रहा। कमाई का कोई ठिकाना नहीं।’
एक ने कहा -‘ कौनौ नौकरी होय तौ बताओ दादा।’
नौकरी के लिए तो तमाम लोग कहते हैं। हम कहाँ से बता दें ?
इस बीच एक ऑटो वहाँ आता है। उसमें नाश्ते के पैकेट हैं। ऑटो में बैठे लोग बाँटने लगते हैं। मज़दूर लोग लपक कर पैकेट लेते हैं। कुछ लोग फ़ौरन खाने लगते हैं। कुछ सहेज लेते हैं।
नाश्ता बाँटने वाली संस्था का नाम Hunger free world है। नियमित कई जगह नाश्ता बाँटती है। बदल-बदल कर। नेट खोजने पर पता चलता है मलाबार ग्रुप (केरल) की संस्था है। दुनिया में भूखे, बेसहारा लोगों के लिए खाना पहुँचाने का प्रयास करती है। भारत के 70 प्रमुख शहरों में प्रतिदिन 50000 से 60000 लोगों को भोजन उपलब्ध कराती है यह संस्था।
लोगों ने यह भी बताया कि स्थानीय विधायक भी खाना बँटवाते हैं।
पास ही सड़क के बीच डिवाइडर पर कुछ लोग चूल्हे जलाए खाना बनाते भी दिखे। उनको शायद मुफ्त खाना पसंद नही आता।
काम की तलाश में कुछ महिलायें भी बैठी दिखीं। बतियाते हुए काम का इंतज़ार। बारिश के कारण भी काम कम हो गया है।
अपने-अपने शहरों से दूर काम की तलाश में आए लोगों की बातचीत में देश-दुनिया में छाये तमाम मुद्दों और राजनीति की कोई चर्चा नहीं सुनी। काम की तलाश उनके लिए सबसे बड़ा मुद्दा है। भूख का इलाज सबसे बड़ी चुनौती।

Thursday, August 20, 2026

कुसंग का ज्वार भयानक होता है


 कुसंग का ज्वार भयानक होता है। - आचार्य रामचंद्र शुक्ल


कल स्विमिंग पूल में तैरते हुए मुझे आचार्य शुक्ल का लिखा यह सूत्र वाक्य तब याद आया जब तैरते समय पैर पुराने अंदाज़ में चलते रहे।

स्विमिंग की शुरुआत हमने ‘गठबंधन स्ट्रोक’ से की थी। हाथ ब्रेस्ट स्ट्रोक स्टाइल में , पैर फ्री स्टाइल में। बाद में शुद्ध ब्रेस्ट स्ट्रोक की पार्टी ज्वाइन की। अभ्यास से हाथ का मूवमेंट ठीक हुआ। सर पानी के ऊपर आने लगा। साँस पानी के ऊपर लेने लगे। पानी में सांस छोड़ने लगे। लेकिन अभी भी बहक जाते हैं। एकाध बार ब्रेस्ट स्ट्रोक की मेढक स्टाइल में चलने के बाद फ्री स्टाइल में छप्प-छैयाँ करने लगते हैं। नतीजतन थोड़ी देर में पैर नीचे होते जाते हैं और कुछ देर में पानी में खड़े हो जाते हैं।

शुरुआत में फ्री स्टाइल में पैर चलाने की आदत ब्रेस्ट स्ट्रोक के लिए कुसंग की तरह लगी है। छूटती नहीं। इसी चक्कर में एक बार में लंबी दूरी तक तैरना नहीं हो पा रहा।

लगभग सभी कोच ने हमारी अभी तक की तैराकी देखकर हमको पास घोषित कर दिया है। यह कहते हुए कि बाक़ी स्टैमिना और सुधार अभ्यास से हो जाएगा। इतना सीख गए , बहुत है। प्रैक्टिस करेंगे आगे अपने आप सीखेंगे।

कोच द्वारा हमको पास घोषित करना मैं उसी तरह मानता हैं जैसे स्कूलों में नियम है कि छोटी क्लास में कोई बच्चा फेल नहीं किया जाएगा।

आजकल पैर की किक ठीक करने में लगे हैं। सबसे जरूरी है टाइमिंग। जब छोड़ने के बाद सर ऊपर उठे तो फ़ौरन सांस लेने के बाद सर पानी में डुबोकर हाथ आगे करके ग्लाइड करने के बाद पैर से किक करनी चाहिए। लेकिन हमारी किक हाथ के आगे होने के साथ ही हो जाती है। दोनों की टाइमिंग में गैप होना चाहिए। कभी हो जाता है। कभी नहीं होता। बल्कि ज़्यादा समय नहीं ही होता। इस चक्कर में ज़्यादा आगे नहीं बढ़ पाते। एक ही जगह कदमताल करके थोड़ा आगे बढ़कर खड़े हो जाते हैं।

आज की स्थिति है कि तैरने के सारे स्टेप्स सीख चुके हैं। अलग-अलग सब कर लेते हैं। लेकिन सबमें नियमित तालमेल का अभाव है। कभी हो जाता है, कभी नहीं हो पाता। सारे स्टेप्स लगता है हमसे मौज ले रहे हैं। देरी से तैराकी सीखने की सजा दे रहे हैं। सबके साथ के बिना तैराकी का विकास रुका हुआ है।

रोज़ अपनी कमियाँ नोट करके उसको दूर करने के वीडियो देखते हैं। पूल में अभ्यास भी करते हैं। जब कभी ठीक हो जाता है तो जो सुख मिलता है वह अनिर्वचनीय घराने का है। जब साँस लेने के लिए सर हाथ के मूवमेंट और पानी के दबाव के कारण तैरता हुआ ऊपर आता है तो लगता है ‘ उदित उदय गिरि मंच पर’ ऐसी ही किसी मुद्रा के लिए लिखा होगा तुलसीदास जी ने।

25 मीटर चौड़े पूल को शुरुआत में छह बार में तैर लेते थे। अब आसानी से चार बार में कर लेते हैं। इस तरह सूत्र में कहा जाये तो अपन सवा छह मीटर के तैराक हैं।

सोचा था कि इसी महीने पूल की चौड़ाई एक बार में पार कर लेंगे। लेकिन लगता है कि अभी और समय लगेगा। पूल भी इसी हफ़्ते चार दिन बाद बंद हो जाएगा। इसके बाद किसी और पूल में सीखेंगे। चार दिन में कितना सीखते हैं यह आगे पता चलेगा।

फिलहाल यह अपने में सुकून देह है कि तैरना सीख लिए।

.....और ये फ़ुरसतिया के 22 साल

 


आज 20 अगस्त है। आज के ही दिन हमने अपना ब्लॉग फ़ुरसतिया Fursatiya शुरू किया था। 22 साल पहले। 20 अगस्त , 2004 को।

आज हिंदी में लिखने के टूल उपलब्ध हैं। 22 साल पहले लिखना कितना मुश्किल था यह इस बात से समझा जा सकता है कि पहली पोस्ट ने सिर्फ नौ शब्द लिख पाये थे :
‘ अब कब तक ई होगा ई कौन जानता है।’
सिर्फ़ नौ शब्द लिखकर ब्लॉग शुरू करके अपन लंबी पोस्ट लिखने के लिए इस क़दर बदनाम हुए कि कोई छोटी पोस्ट लिखने पर दोस्त लोग कमेंट करते -‘ यह पोस्ट फ़ुरसतिया की हो नहीं सकती।’
बाद के दिनों में क़रीब 15 साल से नियमित फेसबुक पर लिखने लगे। लेकिन फेसबुक की पोस्ट ब्लॉग पर ज़रूर जमा करते रहे। अब इंस्टाग्राम भी जुड़ गया। फेसबुक पर दस हज़ार से ऊपर पोस्ट हो गईं हैं।
ब्लॉगिंग से जुड़ी अनगिनत यादे हैं। उनको समय-समय पर साझा करते रहे। पिछले साल की पोस्ट का लिंक टिप्पणी में दिया है।
22 साल तक नियमित लिखना जाती रहा इसके पीछे सबसे प्रमुख कारण मेरे पाठक मित्रों का सहयोग रहा। वे हमारा लिखा पढ़ते रहे, उत्साह वर्धन करते रहे इसीलिए इतने दिन लिखना जारी जारी रहा।
अपने ब्लॉग फ़ुरसतिया के 22 साल पूरा होने मौके पर मैं अपने सभी पाठक मित्रों का आभार व्यक्त करता हूँ। शुक्रिया अदा करता हूँ।

Wednesday, August 19, 2026

हर इंसान अपने आप में एक महाआख्यान होता है

 


आज स्विमिंग पूल से पैदल लौटे। रास्ते में एक जगह फल का ठेला दिखा। सोचा आम ले लिए जाएँ। कुछ दिन के और मेहमान हैं आम। आम आदमी पार्टी के बारे ने भी लोग ऐसा ही कहते हैं। पार्टी का तो पता नहीं लेकिन आम फिर आयेंगे। अगले सीजन में। आम किसी नेता, चमचे , वोटिंग, पोलिंग के मोहताज नहीं।

एक किलो आम लिए। छाँटकर। कम से कम दस आम रिजेक्ट लिए। साइकिल या कार से आए होते तो खड़े-खड़े या बैठे-बैठे तौलवा लेते। घर में सुनने को मिलता -‘ तुमको फल ख़रीदना भी नहीं आता।’
सुनने को तो आज भी कुछ मिल सकता है। सुनने के लिए कोई गड़बड़ करना जरूरी नहीं। सुनाने वाला इसे अपना अधिकार समझता है।
आम के साथ एक किलो सेव भी लिए। 160/- किलो आम , 280/- किलो सेव। मिलाकर हुए 440/- हमने जोड़े ठीक लेकिन भुगतान किए 340/- गूगल में नाम आया अशरफी। दुकान वाले ने ध्यान दिलाया तो सौ रुपया और दिए।
पूछा तो पता चला अशर्फी भतीजे का नाम है। भतीजा मंडी गया है फल लेने। फल कानपुर से लाते हैं। उन्नाव के रहने वाले हैं। हसनगंज। 2000 से ठेला लगा रहे हैं। गाँव में खेती है तीन बीघा। दस बीघा वहाँ के पंडित जी की खेती बटाई पर करते हैं। 35 साल से।
पंडित जी के बारे ने बताया -‘ उनके चार भाई जहाज उड़ाते हैं। एक भाई कुड़क अमीन है।यहीं लखनऊ में रहते हैं।’
फल के गणित के बारे में बताया। कभी ख़राब हो जाते हैं तो फेकने पड़ते हैं। आम 130 में लाए थे। 160 में बेंच रहे हैं। जो आम ख़राब हो गए वो नुकसान भी झेलना पड़ेगा। लेकिन कोई समस्या नहीं। दाना-पानी चलता है।
‘ पुलिस वाले पैसा नहीं माँगते यहाँ ठेलिया लगाने के?’ यह पूछने पर बताया साहेबलाल ने -‘ पैसा नहीं देते। लेकिन खिला-पिला देते हैं कभी-कभी।’
क्या खिलाते- पिलाते हैं यह नहीं पूछा हमने।
साहेबलाल की बात सुनकर हमको जबलपुर की पुलिया वाले रामफल याद आए। रामफल का भतीजा उनका ठेला पुलिया से बाज़ार ले जाता था। उसके लिए रामफल उसको पैसे देते थे।
साहेबलाल ने अपना बताया-‘ किसी का पैसा दबाकर नहीं रखते। जो कहा वो किया। कभी बात से मुकरे नहीं। मुकर जाएँ तो जबान का कोई भरोसा नहीं करेगा।’
हम फल लेकर घर चले आए यह सोचते हुए कि हर इंसान अपने आप में एक महाआख्यान होता है। हरेक की एक कहानी होती है। कुछ कहानियाँ कही जाती हैं, बाक़ी सब अनकही रह जाती हैं।

Tuesday, August 18, 2026

कैम थान नारियल जंगल


 स्वीमिंग पूल में एक दिन एक कोच पानी में लट्टू की तरह तैरने लगा। लोगों की मांग पर कई बार अपनी जगह घूमते हुए तैराकी का प्रदर्शन किया। उसको देखकर मुझे वियतनाम के दानांग प्रवास के दौरान घूमने वाली बाँस की नाव की याद आ गई।

दानांग के मार्बल माउंटेन (https://www.facebook.com/share/p/1DeCDxx392/) के बाद हम लोग पास ही स्थित (करीब 20 किलोमीटर) कैम थान नारियल जंगल देखने गए। नारियल का यह जंगल थू बोन और उसकी सहायक नदियों के पास स्थित है।
कैम थान नारियल जंगल में पानी में बाँस कटोरी के आकार के टोकरी नुमा नाव चलती हैं। एक नाव में दो से तीन लोग बैठ सकते हैं। डगमगाती हुए नाव में बैठकर पानी की संकरी सड़क से होते हुए झील नुमा पानी के मैदान में पहुँचे। छोटी नहर नुमा पानी का रास्ता इतना संकरा था कि आते-जाते नावें एक-दूसरे से टकरा रही हैं। अगल-बगल अधिकतम दो नावें जा सकती थीं।
एक प्लेटफार्म से नीचे उतरकर हम लोग नाव में बैठे। बैठते समय नाव डगमगाई। जैसे हिलते हुए हमारा स्वागत कर रही थी। नाव में बैठने के बाद लोग पानी के मैदान की तरफ़ जा रहे थे। नाव चालकों में पुरुष और महिला दोनों थे। कुछ महिला नाव चालक वियतनामी हैट लगाए थीं।
करीब सौ-सवा सौ मीटर संकरी पानी की नहर में चलने के बाद नाव पानी के विस्तृत मैदान में पहुँची । रास्ते का पानी मटमैला था। जैसे किसी नाले में नावें चलने से पानी गंदा हो गया हो। उतना गंदा नहीं था फिर भी मुझे कानपुर का गंदा नाला याद आया।
रास्ते में एक जगह पानी में नारियल दिखा।यहाँ उगने वाले नारियल सामान्य नारियल जैसे गोल या हरे नहीं होते, बल्कि एक बड़े नुकीले फुटबॉल जैसे गुच्छे (Cluster) के रूप में दिखाई देते हैं। जब इन्हें काटा जाता है, तो इसके अंदर से सफेद रंग का पारदर्शी और जेली जैसा मीठा गूदा निकलता है।
पानी की नहर से पानी के विशाल मैदान में पहुँचने में क़रीब पाँच मिनट लगे होंगे। वहाँ सैकड़ों सैलानी नौका विहार कर रहे थे। जोड़े से, दोस्तों के साथ। कुछ लोग अकेले भी थे। सभी लोग इस नज़ारे का फ़ोटो भी लेते जा रहे थे।
सामान्य नौकाओं के अलावा कुछ नावें वहाँ ऐसी भी थीं जो लोगों को तेज चकरघिन्नी की तरह घूमती दिख रही थीं। नाव चलाने वाला सवारी को बैठाकर चप्पू की सहायता से नाव को पानी में लट्टू की तरह घुमा रहा था। काफ़ी देर तक दूसरों को घूमती नाव में बैठे देखने के बाद अपन भी बैठे उस नाव में। साथ में मित्र राजेश अग्रवाल थे। राजेश और हमारा साथ ऑर्डनेंस फैक्ट्री का साथ है। हम लोगों ने एक ही दिन (30.03.1988) एक ही जगह (OFC, कानपुर) आर्डनेस फ़ैक्ट्री ज्वाइन की थी। 38 साल का साथ है हमारा।
नाव में बैठने के बाद नाविक ने नाव घुमाना शुरू क्या। तेज होती गई नाव। रोलर कोस्टर में बैठने पर जैसा लगता होगा कुछ उसी तरह। धीरे-धीरे नाव का घूमना तेज होता गया। घूमती नाव के सर चकराने लगा। हमने नाव वाले से रोकने के लिए कहा। वह मुस्कराते हुए रुक गया।
घूमने वाली नाव से वापस अपनी नाव में आए। कुछ देर और घूमने के बाद हम वापस चल दिए।
लौटते हुए नाव वाले को पता चला तो उसने वंदे मातरम् बोला। इसके बाद ओले ओले गाना का मुखड़ा भी गया। भारत माता की जय के जबाब में वंदे मातरम। टूरिस्ट से जुड़ने का यह तरीका अनूठा है।
नाव से उतरकर हम लोगों ने पास ही एक रेस्टोरेंट में खाना खाया। खाना खाने के बाद हम लोग अगली मंजिल के लिए चल दिए।
बात शुरू हुई थी स्वीमिंग पूल में कोच के चकरघिन्नी के तैरने की। नाव का घूमना तो देख लिया आपने। स्विमिंग पूल में कोच का घूमना भी दिखायेंगे कभी।
यह किस्सा 7 अप्रैल, 2026 का है। वियतनाम से जुड़े और किससे पढ़ने के लिए इस कड़ी पर पहुँचिये।

Saturday, August 15, 2026

देश की आजादी के बहाने


 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। आजादी के मौके पर दिया भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जी के संबोधन का शुमार दुनिया में बेहतरीन भाषणों में होता है। पाकिस्तान एक दिन पहले आजाद हुआ था। पाकिस्तान के कायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्ना जी ने 11 को पाकिस्तान की संविधान सभा (Constituent Assembly) में भाषण दिया गया था। इसे जिन्ना की 'विजनरी स्पीच' माना जाता है।

आजादी के समय भारत-पाकिस्तान की संयुक्त आबादी क़रीब 39 करोड़ थी (भारत 33 करोड़, पाकिस्तान 6 करोड़)। आज इन देशों की संयुक्त आबादी 192 करोड़ हो गई है (भारत 148 करोड़, पाकिस्तान 26 करोड़, बांगलादेश 18 करोड़)। यह दुनिया की कुल आबादी (830 करोड़ ) की लगभग एक चौथाई (23.13 %) है।
आजादी के बाद दोनों देशों के संबंध खराब होते गए। 1971 में पाकिस्तान और बांगलादेश अलग हुए। बांगलादेश के निर्माण में भारत की अहम भूमिका थी। उससे भी संबंध धीरे-धीरे कम अच्छे होते हुए ख़राबी की सीमा तक पहुँचे।
आजादी के बाद भारत-पाकिस्तान महासंघ बनाने के प्रयास भी हुए। यूरोपीय महासंघ की तर्ज पर प्रस्तावित इस महासंघ के प्रमुख पैरोकारों में डॉ राममनोहर लोहिया, पंडित दीनदयाल उपाध्याय थे।नेहरू जी और लालकृष्ण आडवाणी भी भारत-पाक महासंघ के हिमायती थे। पाकिस्तान के भी तमाम चुनिंदा लोग भी इसका समर्थन करते थे। शेख अब्दुल्ला इसी महासंघ (परिसंघ) के प्रस्ताव को लेकर पाकिस्तान गए थे ताकि दोनों देशों के बीच कड़वाहट खत्म हो सके। लेकिन पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान ने शेख अब्दुल्ला के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था।
नेहरू जी ने एक इंटरव्यू में कहा था -"अगर हम महासंघ की बात करते हैं, तो वे (पाकिस्तान) डर जाते हैं और सोचते हैं कि हम उन्हें निगल जाना चाहते हैं।"
वास्तव में, पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान ने नेहरू जी के इस महासंघ के विचार को यह कहकर खारिज कर दिया था कि यह पाकिस्तान की संप्रभुता को खत्म करने की भारतीय चाल है।
पाकिस्तान के शासन में सेना का नियंत्रण शायद भारत-पाक महासंघ की राह में प्रमुख रोड़ा रहा। पाकिस्तान में पिछले 79 वर्षों में से 33 वर्ष सीधा फ़ौजी शासन रहा :
1. जनरल अयूब खान (1958–1969)
2. जनरल याहिया खान (1969–1971)
3.जनरल जिया-उल-हक (1977–1988)
4. जनरल परवेज मुशर्रफ (1999–2008)
इसके बाद भी पाकिस्तान की सत्ता पर वहाँ की सेना का ही नियंत्रण रहा। हाल की ईरान-अमेरिका की लड़ाई में जनरल मुनीर की सक्रियता वहाँ सेना के जलवे की कहानी बताती है।
भारत के लिए भी पाकिस्तान वीरता, देशभक्ति, शौर्य प्रदर्शन का सहज साधन है। आए दिन फ़िल्में बनती हैं जिनमें पाकिस्तान की साजिशों को नाकाम बनाने की कहानी दिखाई जाती है। देश के नेता अपने से आबादी में देश के छठे हिस्से के बराबर देश के ख़िलाफ़ गरजते हुए बयान बाजीकरते रहते हैं। पाकिस्तान हमारे देश के लिए पंचिग बैग की तरह है। अपने से कई गुना कमज़ोर देश से तुलना करते हुए उसके मुक़ाबले ख़ुद को बेहतर बताने में गर्व करते हुए अपनी तमाम कमज़ोरियां छिप जाती हैं। अपने बराबर के किसी देश से तुलना करने में वो मजा नहीं आता।
कभी हर वर्ष होने वाले इंडो-पाक मुशायरे भी अब बंद हो गए हैं। ऐसे में भारत-पाकिस्तान महासंघ की बात गए जमाने की बात हो गई।
लेकिन दुनिया में कई देश जिनमें कभी आपस में कट्टर दुश्मनी थी, बाद में एक हुए हैं। पूर्वी जर्मनी-पश्चिमी जर्मनी, उत्तरी वियतनाम-दक्षिणी वियतनाम, उत्तर यमन और दक्षिण यमन ऐसे प्रमुख उदाहरण हैं। इसी तर्ज पर क्या भारत-पाकिस्तान-बांगलादेश फिर से मिलकर एक हो सकते हैं? कम से कम मिलकर एक महासंघ बन सकते हैं?
फ़िलहाल की स्थिति देखते हुए ऐसा होना संभव नहीं लगता। पाकिस्तान के कई हिस्सों में अलगाववादी आंदोलन की ख़बरें आती रहती हैं।
लेकिन आने वाले समय इन देशों के लोग फिर से मिलकर रहने की बात सोच सकते हैं इस बात से एकदम इनकार नहीं किया जा सकता। दोनों देशों की युवा पीढ़ी पुरानी कटुताओं को उतनी तल्ख़ी से शायद न याद करे जितनी तल्खी से दोनों देशों के हुक्मरान सत्ता में बने रहने के लिए दोहराते रहते हैं।
क्या पता आने वाले समय में दोनों की युवा आबादी इस बात के लिए प्रयास करे कि भारत-पाकिस्तान और बाँगलादेश को मिलाकर एक महासंघ बनाना चाहिए। सबको मिलकर रहना चाहिए। अगर ऐसा हुआ तो इन देशों के हुक्मरान क्या करेंगे?
अगर इस तरह की कोई पहल होती है तो क्या आप इसका समर्थन करेंगे?
फ़िलहाल तो आप सभी को आजादी की वर्षगांठ मुबारक हो। मंगलमय हो।
भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश का वर्तमान नक्शा (AI से बनाया)