tag:blogger.com,1999:blog-79933182008-05-09T10:06:43.359+05:30फ़ुरसतियाअनूप शुक्लhttp://www.blogger.com/profile/07001026538357885879noreply@blogger.comBlogger42125tag:blogger.com,1999:blog-7993318.post-30493311148084798812008-04-14T16:55:00.002+05:302008-04-14T17:27:04.184+05:30<div><embed src="http://widget-34.slide.com/widgets/slideticker.swf" type="application/x-shockwave-flash" quality="high" scale="noscale" salign="l" wmode="transparent" flashvars="cy=bb&il=1&channel=1729382256918834996&site=widget-34.slide.com" style="width:400px;height:320px" name="flashticker" align="middle"></embed><div style="width:400px;text-align:left;"><a href="http://www.slide.com/pivot?cy=bb&at=un&id=1729382256918834996&map=1" target="_blank"><img src="http://widget-34.slide.com/p1/1729382256918834996/bb_t000_v000_s0un_f00/images/xslide1.gif" border="0" ismap="ismap" /></a> <a href="http://www.slide.com/pivot?cy=bb&at=un&id=1729382256918834996&map=2" target="_blank"><img src="http://widget-34.slide.com/p2/1729382256918834996/bb_t000_v000_s0un_f00/images/xslide2.gif" border="0" ismap="ismap" /></a></div></div>अनूप शुक्लhttp://www.blogger.com/profile/07001026538357885879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7993318.post-53054888815942179792007-10-29T07:32:00.000+05:302007-10-29T07:32:08.116+05:30मेरा चिट्ठा यहां पढ़ेंमेरा चिट्ठा <a href="http://hindini.com/fursatiya"> यहां </a> पढ़ें।अनूप शुक्लhttp://www.blogger.com/profile/07001026538357885879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7993318.post-1148673571806441392006-05-27T01:28:00.000+05:302006-05-27T01:29:31.816+05:30आज हम दिल्ली वापस आये।नंदकिशोरतिवारीअनूप शुक्लhttp://www.blogger.com/profile/07001026538357885879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7993318.post-1126760009120091972005-09-15T07:26:00.000+05:302005-10-23T12:54:31.126+05:30हम तो बांस हैं-जितना काटोगे,उतना हरियायेंगेआज हिंदी दिवस था .उसका <a href="http://www.kaulonline.com/chittha/?p=70">उपहार</a> हमें यह मिला कि पता चला कि किसी ने हमारी जमीन पर अपना <a href="http://chitthacharcha.blogspot.com/">तम्बू गाड़ लिया</a> है. <strong>चिट्ठाचर्चा </strong>जिसे हमने बड़े मन से शुरु किया था उस पर किन बचकानी हरकतों या गफलतों के कारण ऐसा हुआ मैं इस विवरण में नहीं जाना चाहता.न उसकी जरूरत समझता हूं.खाली नाम उडा़ने से लिखना होता होता तो सारे उठाईगीर लेखक/ कवि होते. तम्बू जिसने भी गाडा़ हो लेकिन यह सच है कि किसी भी तम्बू के लिये बम्बू(बांस) की दरकार होती है.बम्बू तो बिना किसी तम्बू के गड़ सकता है लेकिन कोई भी तम्बू बिना बम्बू के नहीं खडा़ हो सकता.<br /><br />इसी क्रम में याद आ रही है अपने शाहजहांपुर के साथी <strong>राजेश्वर दयाल पाठक </strong>की कविता जो हमारी बात कहती है:-<br /><br /><strong>हम तो बांस हैं,<br />जितना काटोगे,उतना हरियायेंगे.<br /><br />हम कोई आम नहीं <br />जो पूजा के काम आयेंगे<br />हम चंदन भी नहीं<br />जो सारे जग को महकायेंगे<br />हम तो बांस हैं,<br />जितना काटोगे, उतना हरियायेंगे.<br /><br />बांसुरी बन के, <br />सबका मन तो बहलायेंगे,<br />फिर भी बदनसीब कहलायेंगे.<br /><br />जब भी कहीं मातम होगा,<br />हम ही बुलाये जायेंगे,<br />आखिरी मुकाम तक साथ देने के बाद<br />कोने में फेंक दिये जायेंगे.<br /><br />हम तो बांस हैं,<br />जितना काटोगे ,उतना हरियायेंगे.</strong><br /><br />तो भइया, हमें जब लिखना होगा तो किसी खास ब्लागनाम के तंबू की दरकार नहीं होगी.हम तो बांस हैं,जितना काटोगे, उतना हरियायेंगे.<br /><br />हिंदी दिवस के अवसर पर हमारे यहां कविसम्मेलन भी हुआ.तमाम कवियों ने कवितायें पढ़ीं.एक साथी <strong>जय नारायन सक्सेना </strong>ने जो कविता पढ़ी़ वो काफ़ी पसंद की गयी.कविता यहां जस की तस प्रस्तुत है:-<br /><br /><strong>तन खा कर तनखा मिलती है,तनखा को तन खा जाता है,<br />तनखा जब कर में आती है,तन खा से मन अन खा जाता है.<br /><br />तनखा के मिलने से पहले,अधिकार आरक्षित होते हैं,<br />कर्तव्य आहें भरता है,आश्वास्सन बाधित होते हैं .<br /><br />तनखा के कर में आते ही,मांगों की पुकारें आती हैं,<br />मांग न हो पातीं पूरी,पुकारें तन खा जाती हैं .<br /><br />तनखा वह श्रम की खेती है,सीमित बोऒ सीमित काटो,<br />इस मासिक फसल के कटते ही,प्रसाद सा सबको बांटो.<br /><br />नववर्ष की पावन बेला पर,पत्नी ने की कुछ फरमाइस,<br />चलो पिया तुम हमें दिखा दो,फूलबाग में लगी नुमाइश.<br /><br />जब से बजट हुआ है घोषित,कभी न की कोई फरमाइस,<br />कल शादी की वर्षगांठ है,करो पिया तुम पूरी ख्वाइस .<br /><br />राजदूत से जाना होगा,मेघदूत में खाना होगा ,<br />प्रेमनगर का पान चबाकर,प्रेमदूत बन जाना होगा.<br /><br />पेंग बढ़ाकर झूले होंगे, आसमान को छूते होंगे,<br />ऊंचा वाला झूला झूलेंगे,क्षण भर को दुखड़े भूलेंगे.<br /><br />कुआं मौत का देखेंगे हम,उड़ता हुआ धुआं देखेंगे,<br />चारो ओर हों खेल तमाशे,बैठ खायेंगे चाट-बतासे.<br /><br />पंजाबी एक सूट सिला दो,हाई हील का बूट दिला दो,<br />जयपुर वाला लंहगा ले दो,सस्ता नहीं कुछ मंहगा ले दो.<br /><br />पप्पू की जिद पूरी कर दो,ले दो,दो पहिये की गाड़ी,<br />कब से आस लगाये हूं मैं,पिया दिला दो सिल्क की साड़ी.<br /><br />कल शादी की वर्षगांठ पर,मुझको क्या दोगे उपहार,<br />या फिर मुझको बहला दोगे,डाल गले में बाहों का हार.<br /><br />बन्द करो अपनी फरमाइस,ना जाना है हमें नुमाइस,<br />जितनी पूरी करते आओ,उतना बढ़ती जाती ख्वाइस.<br /><br />नयावर्ष हैं वही मनाते,जिनका साल गया उन जैसा,<br />वर्षगांठ हैं वही मनाते ,जिनकी गांठ में होता पैसा.<br /><br />अपनी तो है श्वेत कमाई,दो नंबरी मत बात करो तुम,<br />चादर से मत पैर निकालो,आडंबर की मत बात करो तुम.<br /><br />लक्ष्मण रेखा सी बंधी हुई, है मेरी तनखा सीता .<br />मत आमंत्रण दो मंहगे रावण को,अपहृत हो जायेगी सीता.<br /><br />प्यार भाव वाचक संज्ञा है,एहसासों की पावन गंगा है,<br />मत आंको इसे उपहारों से,दूषित होगी मनभावन गंगा है.<br /><br />मेरे पास न सोना-चांदी,न है धन खान रतन ,<br />मैं तो केवल प्रेम पुजारी,अर्पित तुझ पर निर्मल मन. <br /><br />कोई भौतिक चाह नहीं है,न मन में कोई और लगन,<br />बस यही कामना ईश्वर से,साथ रहें हम जनम-जनम.<br /><br />अंतिम बात तुम्हें समझाता,ओ मेरे दिन की रानी ,<br />याद रखो तुम'जय'की बानी,उतना उतरो जितना पानी.</strong><br /><br />इसमें फूलबाग,मेघदूत,प्रेमनगर आदि कानपुर की जगहों मोहल्लों के नाम हैं.<br /><br />यह पोस्ट खासतौर से <strong>भोलानाथ उपाध्याय </strong> के लिये बतौर <a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=39">इनाम</a> लिखी जा रही है.अनूप शुक्लhttp://www.blogger.com/profile/07001026538357885879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7993318.post-1124484267090027532005-08-20T14:50:00.000+05:302005-08-20T02:44:19.326+05:30फुरसतिया:कुछ बेतरतीब यादेंआज बीस अगस्त है। आज के ही दिन एक साल पहले मैंने ब्लाग लिखना शुरु किया था। रवि रतलामी के अभिव्यक्ति में छपे लेख तथा <a href="http://nuktachini.blogspot.com/">देवाशीष </a>के ब्लाग पर उपलब्ध की बोर्ड की सहायता से जो <a href="http://fursatiya.blogspot.com/2004/08/blog-post_20.html#comments">पहली पोस्ट</a> मैंने लिखी थी वह एक मायने में 'हायकू' पोस्ट थी।आज भी इससे भी छोटी पोस्ट लिखने का हुनर सिवाय हिंदी के आदि चिट्ठाकार आलोक के अलावा किसी को नहीं पता।शुरुआती दिनों में देवाशीष ,अतुल तथा पंकज के चिट्ठे तथा आलोक के कमेंट काफी पढ़े। देबाशीष की <a href="http://nuktachini.blogspot.com/2004/05/blog-post_21.html#comments">ये पोस्ट</a> देखी जाये:-<br /><br /><blockquote>याज़ाद ने अनिल के एक चिट्ठे के हवाले से हिन्दी ब्लॉग गीत की बात छेड़ी। तो अपन कहां पीछे रहने वाले थे। हाजिर है कुछ ब्लॉग गीतः<br /><br />ये अपने बाप्पी दा इश्टाईल में:<br /><br />ब्लॉगिंग बिना चैन कहां रेSSS<br />कॉमेन्टिंग बिना चैन कहां रेSSS<br />सोना नहीं चांदी नहीं, ब्लॉग तो मिला<br />अरे ब्लॉगिंग कर लेSSS<br /><br />..ये कुछ अल्ताफ राजा की शैली:<br /><br />तुम तो ठहरे बलॉगवाले<br />साथ क्या निभाओगे।<br />सुबह पहले मौके पे<br />नेट पे बैठ जाओगे।<br />तुम तो ठहरे बलॉगवाले<br />साथ क्या निभाओगे।<br /><br />और ये जॉनी वॉकर का बयानः<br /><br />जब सर पे ख्याल मंडराएं,<br />और बिल्कुल रहा ना जाए।<br />आजा प्यारे ब्लॉग के द्वारे,<br />काहे घबराए? काहे घबराए?<br /><br />सुन सुन सुन, अरे बाबा सुन<br />इस ब्लॉगिंग के बड़े बड़े गुन<br />हर बलॉगर बन गया है पंडित<br />गूगल भी थर्राए।<br />काहे घबराए? काहे घबराए?</blockquote><br /><br />बहरहाल देखते-देखते कब हम इस ब्लाग मैदान में कूद गये पता ही चला। दस दिन बाद हमारे <a href="http://theluwa.blogspot.com/">ठेलुहा महाराज </a>भी आ गये मैदान में। कुछ इसी के आसपास ही <br /><a href="http://merapanna.blogspot.com/">जीतेन्द्र</a> ने भी अपनी दुकान खोली। हम लिखना तो शुरु कर दिये लेकिन समझ में नहीं आ रहा था कि लिखा क्या जाये(अभी भी हालात वैसे ही हैं)। उस समय तक स्वागत-सत्कार की ऐसी मिसाइलें नहीं दगती थीं दनादन। सो हम आपस में वाह-वाह करके मस्त थे।<br /><br />फिर हमें हमारे दोस्त ने बताया कि 'काउंटर' कैसे लगता है। लगाया तो देखा कि हमारा 'ब्लाग' तो देश-विदेश में पढ़ा जा रहा है। हम तो बौरा गये अपने 'ग्लोबलाइजेशन' से।हम खुशफहमी के नशे में थे कि हमें झटका मिला एक टिप्पणी से। अश्ररग्राम पर देबाशीष ने हमारा स्वागत-सत्कार करते हुये आशा की कि हम भाषा की शालीनता का ख्याल रखेंगे। हमने अवस्थी को लिखा-देखो ये बालक क्या कह रहा है! बताओ ,मार दिया जाये कि छोड़ दिया जाये।अवस्थी ने कहा -छोड़ना तो बालक के साथ अन्याय होगा। न्याय की रक्षा की जानी चाहिये। तो<a href=" http://fursatiya.blogspot.com/2004/09/blog-post_17.html#comments">हमने </a>तथा <a href="http://theluwa.blogspot.com/2004/09/blog-post_16.html">अवस्थी </a>ने अपने-अपने ब्लाग पर न्याय किया। लेख लिखा जिसमे मौज तथा खिंचाई थी। देबाशीष ने टिप्पणी लिखी तथा हम अफसोस के शिकार हुये।अगर किसी अपनी एक पोस्ट के लिखे जाने का अफसोस है मुझे तो वह यही पोस्ट है। <br /> <br />इसके बाद तो दनादन सारा जमा पड़ा माल बाहर आता गया।मूल रूप से मौज-मजे के अंदाज में लेखन चलता रहा। एक टिप्पणी में अतुल ने लिखा:-<br /><br /><blockquote>आपने और जीतेंद्र भाई ने हिंदी चिठ्ठा जगत के शांत तालाब में पत्थर मारकर जो हलचल मचायी तो मजा ही आ गया|</blockquote><br /><br /> इस बीच दनादन लोग लिख रहे थे तथा टिप्पणियां भी लिखीं जा रहीं थीं। उधर भारतीय ब्लाग मेला में हिंदी के पोस्ट के नामीनेशन शुरु हो गयेथे। किसी एक महीने में हिंदी की कुछ पोस्ट ज्यादा थीं तो अतुल कीउछलती मेल आयी-छा गई रे हिंदी छा गई। हालांकि यह खुशी कुछ दिन बाद ही गायब हो गई जब वहां लोगों ने हिंदी पोस्ट कोशामिल नहीं किया। अतुल ने अक्षरग्राम पर लेख लिखा-तुझे मिर्ची लगी तो मैं क्या करूं? हालांकि लिखा अतुल ने था 'तुझे' लेकिन मुझेलग रहा था कि मिर्ची तो अतुल को लगी हैं। बहरहाल इसपर लेख लिखागया -<a href="http://fursatiya.blogspot.com/2005/01/blog-post.html#comments">अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है! </a>तथा कालान्तर में <a href="http://chitthacharcha.blogspot.com">चिट्ठाचर्चा</a><br />की शुरुआत की गई।<br /><br />उधर अनुगूंज की शानदार शुरुआत हुई। कुछ बहुत बेहतरीन पोस्ट अनुगूंज के माध्यम से लिखींगईं। बाद में <a href="http://bunokahani.blogspot.com">बुनो कहानी</a> मेंभी तीन कहानियां भी लिखी गईं । कुछशिथिलता फिलहाल बुनो कहानी में चल रही है। शायद समय के साथ कुछ तेजी आये।<br /><br />इस बीच हिंदी ब्लाग मंडल का आभामंडल तेजी से फैल रहा था। <a href="http://vagarth.com/feb05/internet/index.htm">वागर्थ </a> में बहुत उत्साहित करने वाला लेख छपा। अन्य जगह भी जिक्र आया।<br /><br />रविरतलामी के बाद अतुल भी अभिव्यक्ति में अपने संस्मरण लिख कर मिठाई खिलाने लगे थे।कुछ दिन के सलाह-मशवरे के बाद हिंदी जगत की पहली ब्लागजीन <a href="nirantar.org">'निरंतर'</a> शुरु हुई। शानदार पत्रिका के बावजूद पाठक बहुत कम तथा काम ज्यादा । फिलहाल पत्रिका निकालना दिन पर दिन मुश्किल लगता जा रहा है।इस बीच ब्लागनाद भी चालू हुआ तथा काफी हल्ला भी हुआ। जीतेन्द्र,अतुल तथा स्वामीजी में। वह भी मजेदार कहानी है।कहानियां तमाम हैं। सिलसिलेवार लिखना काफी मजेदार हो सकता है-हिंदी ब्लागजगत के यादगार विवाद। <br /><br />जब हमने लिखना शुरु किया था तब ३० के लगभग ब्लाग थे ।अब आंकड़ा लगभग ९० तक आ गया है। जल्द ही मामला तीन अंकों तक पहुंचेगा। <br /><br />साथी ब्लागर कुछ तो बहुत अच्छा लिखते हैं। मैंने कुछ लेख संकलित करने शुरु किये थे-'हाल आफ फेम टाईप'के।कामआधा ही हो पाया लिहाजा उसे अभी प्रकाशित नहीं कर पा रहा।पहले कमेंट काफी अनौपचारिक तथा बिंदास किस्म के करते थे लोग।अब कुछ सभ्यता की बीमारी लग गई है। इधर कमेंट करने में कंजूसी भी काफी होने लगी है। मुझे लगता है कि यादगार टिप्पणियों का संग्रह भी किया जाना चाहिये।<br /><br />मैं १ अप्रैल से नियमित रूप से हिंदिनी पर लिखने लगा। यहां कभी-कभी लिखता हूं। हिंदिनी पर शुरुआत भी मजेदार रही। स्वामीजी ने मेरा दिसम्बर में <a href="http://fursatiya.blogspot.com/2004/12/blog-post_18.html#comments">लेख </a>पढ़ा था । फिर वे हिंदी मे ब्लाग लिखने लगे। सनसनीखेज भाषा के मालिक स्वामी शुरु में बराबर यह अवसर उपलब्ध कराते रहे कि लोग समझें कि ये हिंदी सीख रहा है। बाद में कुछ हमपर ज्यादा ही फिदा हो गये ये। एक दिन फोन पर करीब तीन घंटे बातचीत हुई । फिर हम इनके कहने पर हिंदिनी में लिखने लगे। पर मेरा लगाव यहां से बराबर बना हुआ है। जब निर्जीव तथा तकनीकी रूप से कमतर चीजों से लगाव इतना हैतो सजीव लोगों से लगाव का अंदाजा लगाया जा सकता है। हालांकि जब मैंने हिंदिनी में लिखना शुरु किया तब जीतेन्द्र-अतुल-स्वामी का प्रेमालाप चरम पर था। जीतेन्द्र ने कभी मुझसे कहा होगा अपनी साइट में लिखने को। मुझे नहीं याद रहा होगा। पर इनको याद था। तो काफी दिन मुंह फुलाये रहे जीतू। कहते थे -तुम तो अजातशत्रु हो। लेकिन तुम भीष्मपितामह की तरह जिस तरफ नहीं जाना चाहिये वहां चले गये। हम भी मौज लेते रहे।<br /><br />फिलहाल लिखना जारी है। नेट पर, जहां कि लोग कुछ पोस्ट लिखकर ब्लाग बंदकर देते हैं तथा कुछ अंक निकाल कर पत्रिकायें वहां मुझे लगता है कि मैं लिखता रहा साल भर ,काफी है।हां ,भी कभी मन करता है कि मैं भी<a href="http://www.hindini.com/ravi/">रविरतलामीजी </a>तथा <a href="http://www.kalpana.it/hindi/blog/">सुनीलजी </a>की तरह नियमित लिख पाता!<br /><br />मेरे लेखों के बारे में लोग बतायेंगे। मैं लंबे लेख लिखने के लिये बदनाम रहा ।पर कुछ अपने कुछ लेख बार-बार पढ़ने का मन करता है। तमाम दूसरे लेख भी हैं जिन्हें देखकर कोफ्त भी होती है। कथाकार <a href="http://www.abhivyakti-hindi.org/lekhak/k/krishnabehari.htm">कृष्णबिहारीजी</a> अक्सर हौसला बढ़ाते हुयेकहते हैं-तुमको तो मुख्यधारा में आकर लिखना चाहिये। <a href="http://www.abhivyakti-hindi.org/lekhak/purnimavarman.htm">पूर्णमा वर्मनजी</a> कहती हैं कि मेरे एक लेख में दो-तीन लेखों की बात मिली होती है।थोड़ा मेहनत से और बेहतर लेख लिखा जा सकता हैं। <a href="http://www.anubhuti-hindi.org/kavi/k/kln/kln.htm">नंदनजी </a>कहते हैं -तुम लिखते रहो ।दिशा अपने आप तय होती जायेगी।<br /><br />मैं हर लेख लिखने के बाद यही सोचता हूं कि ये वाला पोस्ट कर दो आगे देखा जायेगा। <br /><br />आप क्या सोचते हैं?अनूप शुक्लhttp://www.blogger.com/profile/07001026538357885879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7993318.post-1121869689338302172005-07-20T19:13:00.000+05:302005-07-27T19:07:18.856+05:30एक ब्लागर मीट रेलवे प्लेटफार्म पर<div style="float: left; margin-left: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 1em; color:teal; margin-top: 0px; ">वेंकट-सारिका</span><br /><a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/27155632/" title="Photo Sharing"><img src="http://photos23.flickr.com/27155632_231246fec1_m.jpg" width="240" height="168" alt="वेंकट-सारिका" /></a><br /> </div> सबेरे जब हम आफिस पहुंचे तो मेज पर काम बहुत था। लिहाजा हम राउन्ड पर निकल गये। लौटा तो बताया गया कि जीतेन्द्र चौधरी का फोन आया था। हमने तमाम गैरजरूरी काम भी निपटा<br /></span> लिये तब फोन करने की हिम्मत जुटा पाये।जो हमेशा सिर्फ एक मेल की दूरी पर रहता है वह चन्द मील दूर था। घंटी गयी तो जीतेन्द्र बजे। हाल-चाल का दर्द बांटा गया।हमने कहा-देख लो भइये,तुम्हारा लिखा साइट तक नहीं झेल पायी। शटर गिरा है मेरा पन्ना का। और लिखो-ब्राम्हण कहता है सालअच्छा है। जब हिंदी न जानने वाले इतना त्रस्त हो गये कि साइट जब्त कर ली तब हिंदी भाषियों का क्या हाल होगा!इसीलिये कहा गया है-अतिसर्वत्र वर्जयेत।पर जीतेन्द्र अविचिलित थे। बोले -सालों को वापस जाकर देखूंगा। मैंने पूंछा भी कि सालों को वहां देखोगे तो यहां किसको देखोगे? क्या वहां और सालों का जुगाड़ करोगे? कार्यक्रम पूछने पर बताया गया कि तमाम जगह जाना है। गोविंदनगर, रतनलालनगर, रामबाग वगैरह। बताने के अन्दाज से लग रहा था कि जैसे कोई बस स्टैंड वाला बसों के आवागमन की घोषणा कर कर रहा हो ।<br/> <br /><br />बहरहाल जीतेन्द्र के तमाम बेतरतीब कार्यक्रमों ने हमें बचा लिया उनसे मुलाकात से। बोले शायद कल मिलेंगे। हमें लगा- चलो आज तो बचे। फिर भी एहतियातन हमने अपने पीए को बता दिया कि अगर हमारी अनुपस्थिति में जीतेन्द्र आयें तो जब तक हम आयें तबतक उनसे निरंतर का उनके हिस्से का अनुवाद का काम करा लें। जीतेन्द्र की तरफ से कम से एक दिन के लिये हम निश्चिन्त हो गये।<br /><br />शाम को चार बजे फोन की घंटी बजी। सुरीली आवाज बोली-अनूपजी,नमस्ते। हमने कहा-नमस्ते क्या हाल हैं? पूछा गया-आपने पहचान लिया। हम सोच में डूबते-उतराते हुये बोले-पहचानने के नजदीक पहुंच रहा था कि इस सवाल से क्रमभंग हो गया।<br /><br />क्षणिक सस्पेन्स का पटाक्षेप करते हुये बताया गया-मैं सारिका सक्सेना बोल रहीं हूं। नये सिरे से नमस्कार-खुशी का आदान -प्रदान हुआ। पता चला -रात की गाड़ी से वो कोलकता जा रहे हैं। तय हुआ शाम को स्टेशन में मिला जाये। घरों में तो लोग करते ही रहते हैं ब्लागर मीट। एक मुलाकात स्टेशन पर हो जाये।<br /><br />हमने जीतेन्द्र को फिर खोजा। अटके थे गोविंदनगर में। पूछा चलोगे ब्लागर मीट को ऐतिहासिक बनाने। उनकी आवाज का भूगोल बिगड़ा हुआ था। बोले -यार ,इतना थका हूं कुछ पूछो मत। हम भी बोले -तुम बताओ मत हम समझ गये।<br /><br />बहरहाल शाम को घर से जब मैं चला स्टेशन की ओर तो रात के आठ बज चुके थे। <a href="http://shabdanjali.com">शब्दांजलि</a> तथा <a href="http://ankahibaaten.blogspot.com/">अनकही बातें</a> की सारिका से मिलने की उत्सुकता थी। कुछ देर भी हो गयी थी निकलने में। आगे की सवारियां मुझे ब्लागर की तरह लग रहीं थी जो मुझसे पहले मुलाकात करके विवरण छापना चाहता हो।फिर मुझे लगा-हर कनपुरिया अतुल की तरह फुर्तीला नहीं हो सकता । <div id="pullquote">आगे की सवारियां मुझे ब्लागर की तरह लग रहीं थी जो मुझसे पहले मुलाकात करके विवरण छापना चाहता हो।फिर मुझे लगा-हर कनपुरिया अतुल की तरह फुर्तीला नहीं हो सकता । </div>स्टेशन पहुंचकर हमने प्लेटफार्म नंबर एक पर गोरे ,गोल-मटोल चेहरे की तलाश में अपनी गरदन तथा आंखों को लगा दिया। दस मिनट बाद दोनों सर्च इंजन मुंह लटकाके बोले-सारी ,जो बताया आपने वो हम नहीं खोज पाये। मैंनेसोचा -मौका अच्छा है। सारी खूबसूरत महिलाओं से पूछ लिया जाये-माफ कीजियेगा आप सारिका सक्सेना तो नहीं हैं जो अमेरिका से आयी हैं। फिर हमें लगा कि वे तो माफ कर देंगी पर हम कैसे माफ करेंगे अपने को? राजधानी एक्सप्रेस छूटने में मात्र एक घंटा बचा था। <br /><br />तो पीसीओ की शरण में जाना तय किया गया। पता चला कि आज गाड़ी प्लेटफार्म एक की जगह छह पर आनी थी । वहीं वे लोग मौजूद थे। हम पहुंचे । मुलाकात हुयी। सारिका अपने पति वेंकट,भाई सुधांशु तथा बिटिया कांति के साथ प्लेटफार्म नं छह पर मौजूद थी। बिटिया हमें देखते ही निद्रागति को प्राप्त हुयी। तमाम जरूरी-गैरजरूरी सूचनाओं के आदान-प्रदान से वार्ता-चक्र शुरु हुआ। <br /><br /><div style="float: right; margin-right: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 1em; color:teal; margin-top: 0px; ">सारिका,कान्ति,वेंकट तथा अनूप</span><br /> <a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/27155631/" title="Photo Sharing"><img src="http://photos23.flickr.com/27155631_89f21470dd_m.jpg" width="240" height="145" alt="सारिका,कान्ति,वेंकट तथा अनूप" /></a> </div>वेंकट आई.आई.टी.मुम्बई से मेकेनिकल इंजीनियर स्नातक हैं । फिलहाल डेट्रायट,अमेरिका में है। बिना दान-दहेज के शादी किया यह जोड़ा हमें अनायास बहुत प्यारालगा। वेंकट हमें कोकाकोला पिलाने लगे। सारिका से भी ब्लागिंग के बारे में बाते होने लगीं। बताया कि पहले मैं बहुत बोर होती थी जब वेंकट अपने काम में जुटे रहते थे कम्प्यूटर पर। फिर इनके प्रोत्साहन से बेव डिजाइनिंग सीखना शुरु किया तथा ब्लागिंग और फिर <a href="http://shabdanjali.com">शब्दांजलि </a>पत्रिका शुरु की। अब तो हाल यह है कि समय कहाँ सरक जाता है ,पता ही नहीं लगता।<br /></span> <br /><br />मैंने वेंकट से पूछा -तुम तेलगू ब्लाग के बारे में हमें रिपोर्टिंग किया करो भाई। तो पता चला कि तेलगू बस काम भर की ही जानते हैं वे। उतने से काम बनेगा नहीं। सारिका के ब्लाग पढ़ते हैं कि नहीं के जवाब में बताया गया-पढ़ता हूं पर गति धीमी रहती है।<br /><br />सारिका ने फिर कुछ ब्लागर्स की तारीफ शुरु की। <a href="http://rojnamcha.blogspot.com">अतुल</a> की सबसे ज्यादा तारीफ कर रहीं थी कि वे बहुत अच्छा लिखते हैं। इसके अलावा <a href="href://praktyaksha.blogspot.com">प्रत्यक्षा </a>, <a href="http://hindini.com/ravi">रविरतलामी</a> तथा <a href="nirantar.org">निरंतर </a>की टीम से प्रभावित थीं। <a href="http://hindini.com/eswami">ईस्वामी</a> के बारे में पूछा-ये स्वामीजी कौन हैं। हमने बताया-यह तो शायद स्वामीजी भी नहीं जानते होंगे पर लिख-पढ़ - बोल लेते हैं उससे लगता है कि मानव योनि में अवतार लिया है।<br /><br />निरंतर की बात चली तो फिर मजबूरन <a href="http://nuktachini.blogspot.com">देवाशीष </a>,<a href="http://hindi.pnarula.com/haanbhai">पंकज</a>,<a href="http://www.kaulonline.com/chittha/">रमणकौल</a>,<a href="http://www.hindini.com/ravi">रविरतलामी</a> तथा <a href="http://jitu.info/merapanna">जीतेन्द्र</a>की नये सिरे से तारीफ करनी पड़ी। जल्दी-जल्दी सबका नाम जाप किया गया। पर मुझे यह बहुत खल रहा था कि बताओ बात हम कर रहे हैं तारीफ <a href="http://rojnamcha.blogspot.com">अतुल</a> की जा रही है जो कि आजकल ब्लागर कम <a href="http://rojnamcha.blogspot.com/2005/07/blog-post.html">पशुरोग विशेषज्ञ </a>ज्यादा हो गये हैं<div id="pullquote">मुझे यह बहुत खल रहा था कि बताओ बात हम कर रहे हैं तारीफ <a href="http://rojnamcha.blogspot.com">अतुल</a> की जा रही है जो कि आजकल ब्लागर कम <a href="http://rojnamcha.blogspot.com/2005/07/blog-post.html">पशुरोग विशेषज्ञ </a>ज्यादा हो गये हैं </div> तथा भैंस के दर्द पर शोधरत हैं।<br /><br /> पर हम कोकाकोला का घूंट पी कर रह गये। <a href="http://pratyaksha.blogspot.com">प्रत्यक्षा</a> की जब ज्यादा ही तारीफ की सारिका ने तो मैंने बहाने से बुराई करनी चाही कि प्रत्यक्षा की कहानियों का खास पैटर्न है कि लगभग हर कहानी में औरत दुखी है । वह अपना संक्षिप्त सुख का समय बिता करे लंबे दुख वियोग के पाले में आ जाती है । उसका चरित्र उदात्त भले ही दिखाया जाये पर मिलता दुख ही है। मेरी कोशिश सफल नहीं हुई क्योंकि सारिका कहने लगी कि पर उनकी कहानियों में पुरुष का पक्ष भी रखा गया है। फिर झेलना तो नारी को ही ज्यादा पड़ता है। हमने आगे कुछ नहीं कहा-चुपचाप दूसरों की सारी तारीफ झेल गये।<br /><br />एक दूसरे की रचना-प्रकियाओं पर भी बात हुयी। पहले मैं भी कागज में लिखता था लेकिन धीरे-धीरे मामला पेपरलेस होता<br />गया। शुरुआत दोनों लोगों ने ही <a href="http://www.abhivyakti-hindi.org/vigyan_varta/pradyogiki/2004/blogs.htm">अभिव्यक्ति </a>में रविरतलामी का लेख पढ़कर की। मतलब यह कि अगर किसी को हमारे ब्लाग से कोई तकलीफ हो तो रवि रतलामी को कोस सकता है। <br /><br />मैंने कहा कि तुम्हारी कुछ कविताओं की जिन लाईनों की मैं तारीफ करना चाहता था दूसरे लोग पहले ही उनकी तारीफ कर चुके हैं। थे । इसलिये नहीं की तारीफ। सारिका ने कहा तो कुछ नहीं इस पर लेकिन लगा कि कहना चाहती थीं कि ज़रा जल्दी विचार बनाकर तारीफ किया करें।मुझे बताया गया कि मेरा <a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=21">दीवारों का प्रेमालाप </a>बहुत पसंद किया लोगों ने । तो मैंने बताया - निहायत चलताऊ अन्दाज में शुरु किया गया वह लेख बस यूं ही लिख गया था। <a href="http://anoopbhargava.blogspot.com">अनूप भार्गव </a>की कविताओं से लंबाई मिल गयी। बहरहाल मेरा यह विचार भी बना कि ज्यादा सोच-विचार के लिखने से लेख अच्छा हो जायेगा यह भ्रम रखना फिजूल है। इस बात पर साथी लोग विचार करें खासकर <a href="http://theluwa.blogspot.com">इंद्र अवस्थी </a>जो अभी तक <a href="http://theluwa.blogspot.com/2005/03/blog-post.html#comments">बचपने</a> में ही अटके हैं।<div id="pullquote">अगर किसी को हमारे ब्लाग से कोई तकलीफ हो तो रवि रतलामी को कोस सकता है।</div><br /><br /><div style="float: left; margin-left: 10px; margin-bottom: 10px;"><span style="font-size: 1em; color:teal; margin-top: 0px; ">मां-बेटी</span><br /> <a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/27155630/" title="Photo Sharing"><img src="http://photos21.flickr.com/27155630_6767933a03_m.jpg" width="240" height="161" alt="मां-बेटी" /></a><br /> </div>बातें और तमाम सारी हुईं । सारिका -वेंकट परिणय के बारे में भी जानकारी मिली। दोनों के गुरुजी ने एक-दूसरे के अनुरुप देखकर इनकी शादी कराई। बिना किसी ताम-झाम दान-दहेज के। <br /></span>विभिन्न रुचि-स्वभाव रखने के बावजूद खुशहाल मियां-बीबी को देखकर लगा कि देश को ऐसे आदर्श गुरुओं की जरूरत हैं जो ताम-झाम,दान-दहेज के बिना शादी कराकर समाज को नयी गति दें।बातचीत में कबसमय सरक गया पता ही नहीं चला।राजधानी एक्सप्रेस प्लेटफार्म पर आ खड़ी हुई। सामान लेकर हम पास के ही केबिन में लपके। हालांकि कुली था फिर भी हमने सबसे हल्का झोलापकड़लिया।<br /><br />डिब्बे के पास सारिका के भाई ने कहा-लाइये मैं पकड़ लेता हूं। मैंने कहा अब क्या यार,गाड़ी तक ही पहुंचा देता हूं। सारिका बोली -आप लिखेंगे कि सारिका ने मुझसे झोला उठवाया। मैंने कहा -नहीं ऐसा कुछ नहीं । यह सब भी कोई लिखने की बातें हैं? इसीलिये इस बारे में कुछ नहीं लिखा गया।<br /><br />ट्रेन चल दी। हम कानपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नम्बर छह पर हुयी ब्लागर मीट की तमाम यादें सहेजे लौटे। जो याद रहीं वे यहां लिख दीं। रास्ते भर हमें अगले दिन जीतेन्द्र से संभावित मुलाकात का 'पिलान' बनाते रहे।अनूप शुक्लhttp://www.blogger.com/profile/07001026538357885879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7993318.post-1117386747940894902005-05-29T22:39:00.000+05:302005-06-19T14:30:23.180+05:30गिरिराज किशोरजी से बातचीत<a href="http://akshargram.com/nirantar/0505">निरंतर</a> में <a href="http://akshargram.com/nirantar/0505/samvaad">पूर्वप्रकाशित</a><br /><br /><a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/11360135/" title="Photo Sharing"><img src="http://photos8.flickr.com/11360135_80f8e0bed1.jpg" width="450" height="300" alt="Giriraj1" /></a><br /><br />दुनिया के जिस किसी भी मंच पर महात्मा गांधी की बात होती तो <a href="http://www.abhivyakti-hindi.org/aaj_sirhane/2005/pahla_girmitiya.htm">'पहलागिरमिटिया'</a>की बात जरूर होती है।<div id="pullquote">गांधीजी के दक्षिण अफ्रीका के प्रवास के समय के आधार पर लिखी गयी यह जीवनी दुनिया के लिये वह खिड़की है जिससे गांधी के निर्माण की प्रक्रिया के बारे में जाना जा सकता है।'</div>'पहलागिरमिटिया'के लेखक गिरिराज किशोर जी के लिये गांधी के बारे में लिखना आत्मसाक्षात्कार का एक जरिया रहा।<br /><br />सन १९३७ में मुजफ्फरनगर में जन्में गिरिराज जी ने एम.एस.डब्ल्यू.(मास्टर्स इन सोसल वेलफेयर) की शिक्षा प्राप्त की। आई.आई.टी.कानपुर में रजिस्ट्रार (१९७५-८३)तथा रचनात्मक लेखन एवं प्रकाशन केन्द्र के अध्यक्ष (१९८३-९७)के पद पर रहे।<br /><br />प्रमुख रचनाओं में लोग,चिड़ियाघर,जुगलबंदी,तीसरी सत्ता,दावेदार,यथा-प्रस्तावित,इन्द्र सुनें,अन्तर्ध्वंस,परिशिष्ट,यात्रायें,ढाईघर (सभी उपन्यास)के अलावा दस कहानी संग्रह,सात नाटक,एक एकांकी संग्रह,चार निबंध संग्रह तथा महात्मा गांधी की जीवनी 'पहला गिरमिटिया'प्रकाशित।उत्तर प्रदेश के भारतेन्दु पुरस्कार(नाटक पर),'परिशिष्ट'उपन्यास पर मध्यप्रदेश साहित्य परिषद के वीरसिंह देव पुरस्कार,साहित्य अकादेमी पुरस्कार (१९९२)उत्तर प्रदेश हिंदी सम्मेलन के वासुदेव सिंह स्वर्ण पदक तथा' ढाई घर'उ.प्र.के लिये हिंदी संस्थान के साहित्य भूषण से सम्मानित।<br /><br />फिलहाल गिरिराज जी स्वतंत्र लेखन तथा कानपुर से निकलने वाली हिंदी त्रैमासिक पत्रिका 'अकार' त्रैमासिक के संपादन में संलग्न हैं।<br /><br />आमतौर पर देखा गया है कि लेखक की शुरुआती दौर में लिखी गयी किसी मशहूर कृति की छाया से बाद की रचनायें निकल नहीं पातीं।गिरिराज जी का लेखन इसका अपवाद है और इनकी हर नयी रचना का कद पिछली रचना से के कद से ऊंचा होता गया ।देश के इस प्रख्यात साहित्यकार को'कनपुरिये' अपना खास गौरव मानते हैं।अपनी विनम्रता,सौजन्यता के लिये जाने जाने वाले गिरिराज जी मानते हैं -<strong>सख्त से सख्त बात शिष्टाचार के आज घेरे में रहकर भी कही जा सकती है।हम लेखक हैं।शब्द ही हमारा जीवन है और हमारी शक्ति भी ।उसको बढ़ा सकें तो बढ़ायें,कम न करें।भाषा बड़ी से बड़ी गलाजत ढंक लेती है।</strong><br /><br />नामसाम्य के कारण अक्सर लोग गिरिराजजी को उनसे धुर उलट सोच वाले आचार्य गिरिराजकिशोर के नाम से संबोधित कर बैठते हैं। <br /><br />गिरिराज जी से 'निरंतर'के लिये जब बात करने पहुंचा तो पत्रिका के कलेवर,सोच और हिंदी चिट्ठाकारों की सहयोगी प्रवृत्ति को देखकर बहुत खुश हुये।उनसे हुयी बातचीत के प्रमुख अंश यहां प्रस्तुत हैं।<br /><br /><strong>आपकी रचनायात्रा में आई.आई.टी.कानपुर का खासा योगदान रहा।इस दौरान काफी कष्ट भी उठाने पड़े।क्या परिस्थितियां रहीं।</strong><br /><br />देखिये जब मैं आई.आई.टी.गया था तो दो बातें थीं।एक तो मैं हिंदी का आदमी था दूसरे मैं 'नान टेक्निकल'।तो वहां के लोगों ने शुरु में मुझे बिल्कुल 'वेलकम' नहीं किया ।बल्कि विरोध किया और उसके कारण मुझे मुझे तमाम कष्ट उठाने पड़े।एक और बात थी कि मेरा लगाव वहां के छात्रों तथा दूसरी-तीसरी श्रेणी के कर्मचारियों (मिडिल लेवेल मैनेजमेंट )से ज्यादा था जिसे वहां के 'टाप लीडर्स' या फैकल्टी नापसंद करती थी। मेरे सामने एक बड़ा सवाल था (जैसा फिजिक्स के प्रोफेसर डायरेक्टर वेंकटेश्वर लू कहते भी थे)कि ये प्रोफेसर जो विदेशों में रहते हुये अपना सारा काम खुद करते हैं वे यहां चपरासियों को लेकर लड़ाई करते थे।इसी सब को लेकर वहां फैकल्टी से कभी-कभी कहा-सुनी,तनाव हो जाता था। सस्पेन्ड भी हुआ मैं। मुकदमा लड़ना पड़ा।हाईकोर्ट से बाद में जीता मैं।बहाल हुआ।डायरेक्टर को तथा चेयरमैन थापर को इस्तीफा देना पड़ा।तमाम कष्ट के बावजूद मैंने प्रयास किया कि इंस्टीट्यूट को नुकसान न होने पाये।<br /><br /><strong>वहां हिंदी क्या स्थिति थी उन दिनों?आपके आने पर हालात कुछ बदले क्या?</strong><br /><br />मेरे आने से पहले वहां हिंदी में कोई बात नहीं करता था।सब जगह अंग्रेजी में बोर्ड लगे थे।मैंने द्विभाषी कराये। लोगों में बदलाव आये।लोग-बाग हिंदी में बात करने लगे। जब मैं जीतकर,बहाल होकर आया तो मैंने उनसे कहा-देखिये आपको भी मुझसे असुविधा है,मुझे भी आपसे।मैं एक रचनात्मक लेखन केन्द्र खोलना चाहता हूं।जिसे उन्होंने सहर्ष मान लिया।<br /><br /><strong>आपके किसी उपन्यास में फैकल्टी द्वारा सताये जाने पर किसी छात्र की आत्महत्या का जिक्र है!</strong><br /><br />हां,सरकार का एक आदेश आया की एस.सी,एस.टी. छात्रों की भर्ती कोटे से की जाये।तो उनका 'कट प्वाइंट'बहुत'लो' कर दिया गया।तब तक कम्टीशन नहीं लागू हुआ था।इसका वहां के अन्य छात्रों व फैकल्टी के लोगों ने बहुत विरोध किया।जिसके कारण इन छात्रों को बहुत 'सफर 'करना पड़ा।उनकी पढ़ाई में समस्या आयी।उनको 'लुक डाउन'किया गया।लोग उनको सपोर्ट'नहीं करना चाहते थे।पढ़ाना नहीं चाहते थे उनको।'ह्यूमिलियेट' करते थे ।क्लास में ताने मारते थे उन पर कि आप लोग कहां से आ गये।इससे तंग आकर एक छात्र ने आत्महत्या कर ली।मैंने 'परिशिष्ट' उपन्यास में इसका जिक्र किया है।<br /><br /><strong>मेरे एक <a href="http://ashishkachittha.blogspot.com">मित्र</a> जो कि स्वयं आई.आई.टी.में सहायक व्याख्याता हैं का मानना है कि करोड़ों अरबों के आई आई टी बनाने से, <a href="http://akshargram.com/nirantar/0405/kaccha-chittha">बेहतर होगा</a> कि हम अच्छे पांलीटेक्निक और आई टी आई बनायें, ऐसे लोग जो कि सचमुच में इंजीनियेरिंग करते हैं । आप वहां लंबे अर्से रहे ।आपकी क्या सोच है इस बारे में?</strong><br /><br />मैं आपके मित्र की बात से सहमत हूं।यह सही है कि आई.आई.टी.से देश को कोई फायदा नहीं है।असल में ये टेक्निकल लेबर के रिक्रूटिंग इंस्टीट्यूट हैं।सेन्टर हैं विकसित देशों के लिये।हम अपने कुशल तकनीकी लेबर उनको सप्लाई करते हैं। ज्यादातर लोग विदेश चले जाते हैं जहां इनको हाथों-हाथ लिया जाता है।जो रह जाते हैं यहां वे बहुराष्टीय कम्पनियोंमें चले जाते हैं।देश को इनसे बहुत कम फायदा है।<br /><br /><a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/11360136/" title="Photo Sharing"><img src="http://photos9.flickr.com/11360136_d7b8e59ead_m.jpg" width="240" height="195" alt="giriraj4" /></a><br /><br /><strong>क्या कारण है कि यहां के भर्ती होने के बाद ज्यादातर छात्रों का तन तो यहां रहता है पर मन अमेरिका में?</strong><br /><br />यहां ज्यादातर छात्र मध्यवर्ग से आते हैं।वहां की सुख-सुविधायें आकर्षित करती हैं।यहां भी जो 'फैकल्टी' होती है वह ऐसा<br />वातावरण तैयार करती है । पाठ्यक्रम(केस स्टडी) वहां के हिसाब से होता है।अमेरिका से डाटा लेकर उसे यहां फीड करके प्लानिंग की जाती है।जिससे स्वाभाविक रूप से वहां जाने की ललक होती है। एक लड़का था जो विदेश नहीं जाना चाहता था बाद में वहां जाकर इतना रम गया कि वापस आने का नाम नहीं लिया।वह अपने सीनियर्स के लिये रोबोट की तरह हो गया।<br />मैंने अपने उपन्यास अन्तर्ध्वंस में इसका जिक्र किया है।इससे भी लोग यहां लोग मुझसे नाराज हुये।<br /><br /><strong>देखा गया है कि परदेश जाने के बाद लोगों के मन में देश के लिये प्यार बढ़ जाता है।काफी आर्थिक सहायता करने लगते है वे देश की।</strong><br /><br />जब विदेश जाते हैं लोग तो देश की यादें आना,लगाव होना स्वाभाविक होता है।अतीत दूर तक पीछा करता है।एक लड़का विदेश में परिचित प्रोफेसर से मिलने जाता है तो वह पूंछता है कि तुम अरहर की दाल लाये हो?उसके पास सहगल,रफी के पुराने गानों के कैसेट हैं।वह कहता है कि जब मैं यहां की जिंदगी से ऊबता हूं तो इन रिकार्ड को सुनने लगता हूं।<br /><br />जो आर्थिक सहायता वाली बात है वो कुछ हद तक सच है।होता यह है कि देश के लिये जो वो पैसा भेजते हैं उनका अधिकतर भाग 'फंडामेंटलिस्ट'के पास पहुंच जाता है।वे तो समझते कि वे देश की मदद कर रहे हैं लेकिन चक्र कुछ ऐसा बनता है कि उनका पैसा देश की मदद में न लगकर देश को बांटने में लग जाता है।<br /><br /><strong>पहला गिरमिटिया लिखने के पहले और गांधी के बारे में आठ साल शोध करके इसे लिखने के बाद आपने अपने में कितना अन्तर महसूस किया?</strong><br /><br />देखिये मैं आपको एक बात सच बताऊं कि अगर मैं आई.आई.टी.न गया होता तो शायद पहला गिरमिटिया न लिख पाता। वहां मैंने जिस ह्यूमिलियेशन व कठिनाइयों का सामना किया तो कहीं न कहीं मुझे गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में जो अनुभव किये होंगे(हालांकि न मेरी गांधी से कोई बराबरी है न मैं वैसी स्थिति में हूं)उनके बारे में सोचने की मानसिकता बनी।मुझे लगा कि हमें इस बात को समझना चाहिये कि ऐसी कौन सी शक्ति थी जिसने इस आदमी को महात्मा गांधी बनाया।<br />एक आम ,डरपोक किस्म का आदमी जो बहुत अच्छा बोलने वाला भी नहीं था।वकालत में भी असफल।इतना फैशनेबल आदमी । वह इतना त्यागी और देश के लिये काम करने वाला बना ।मुझे हमेशा लगता रहा कि जरूर उसने अपने तिरस्कार से ऊर्जा ग्रहण की जिसके कारण वह अपने को इतना काबिल बना पाया।इससे मुझे भी अपने को प्रेरित करने की जरूरत महसूस हुई।<br /><br /><strong>दक्षिण अफ्रीका में लोग गांधी को किस रूप में देखते हैं?</strong><br />मैंने पहले भारत के गांधी के बारे में लिखना शुरु किया था।जब मैं दक्षिण अफ्रीका गया तो वहां <strong>हासिम सीदात </strong>नाम के एक सज्जन ने मुझसे कहा-देखिये गांधी हमारे यहां तो जैसे खान से निकले अनगढ़ हीरे की तरह आया था जिसे हमने तराशकर आपको दिया।आपको तो हमारा शुक्रिया अदा करना चाहिये। अगर आपको लिखना है तो इस गांधी पर लिखिये।उनकी बात ने मुझे अपील किया तथा मैंने उस पर लिखा।<br /><br /><strong>जब यह प्रकाशित हुआ था तो कुछ लोगों मसलन राजेन्द्र यादव ने इसका भारी-भरकम होना ही एक विशेषता बतायी थी।</strong><br /><br />इसका एक कारण है कि हिंदुस्तान में एक वर्ग है जो गांधी को पसन्द नहीं करता।उनको लगता है कि गांधी के वर्चस्व से लेफ्टिस्ट मूवमेंट पर असर पड़ेगा।हालांकि वामपंथियों ने भी इसे बहुत सराहा।नामवर सिंह ने सराहना की।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े विष्णुकान्त शास्त्रीजी ने बहुत तारीफ की।हर एक की सोच अलग होती है।हर एक को अपनी धारणा बनाने का अधिकार है।<br /><br /><strong>लोग कहते हैं गांधीजी अपने लोगों के लिये डिक्टेटर की तरह थे।अपनी बात मनवा के रहते थे।आपने क्या पाया ?</strong>वो तो देखिये जब आदमी कुछ सिद्धान्त बना लेता है तो उनका पालन करना चाहता है।जैसे किसी ने त्याग को आदर्श बनाया तो उपभोग की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना चाहता है।गांधीजी तानाशाह नहीं थे।हां उनके तरीके अलग थे।एक घटना बताता हूं:-<br />गांधी एक बार इटली के तानाशाह मुसोलिनी से मिलने गये।साथ में उनके सचिव महादेवदेसाई तथा मीराबेन और मुसोलिनी का एक जनरल था जिससे मुसोलिनी नाराज था।गांधीजी उसी जनरल के घर रुके।थीं।मुसोलिनी ने गांधी का स्वागत किया और एक कमरे में गये सब लोग जहां केवल दो कुर्सियां थीं।मुसोलिनी ने गांधी को बैठने को कहा।गांधी ने तीनों को बैठने को कहा।तो ये कैसे बैठें ?मुसोलिनी ने फिर गांधी को बैठने को कहा।गांधी ने फिर तीनों से बैठने को कहा।तीन बार ऐसा हुआ।आखिरकार<br />तीन कुर्सियां और मंगानी पड़ीं।तब सब लोग बैठे।तो यह गांधी का विरोध का तरीका था।कुछ लोग इसे डिक्टेटरशिप कह सकते हैं।<br />इसी तरह दूसरे विश्वयुद्ध में उन्होनें हिटलर को लिखा था:-<strong>यू आर रेस्पान्सिबल फार द वार एन्ड यू हैव टु वाइन्ड इट अप</strong>।मैंने इस पर हिटलर का जवाब भी देखा।उसने लिखा था:-<strong>नो दीस प्यूपल आर ब्लेमिंग मी अननेसेसरली.एक्चुअली दे आर रेस्पान्सिबल फार द वार.एन्ड यू मस्ट टाक टु देम।</strong><br /><br /><strong>मीरा बेन के बारे में सुधीर कक्कड़ ने लिखा है कि वे गांधीजी को चाहती थीं।गांधीजी के मन में भी उनके लिये कोमल भाव थे।सचाई क्या थी?</strong><br /><br />इस तरह से अनर्गल बातें लिखने का कोई आधार नहीं है।मीरा बेन लंदन से गांधी के लिये तो ही आयीं थीं।गांधी को समर्पित होकर।वे उनके प्रति आसक्त भी थीं।ब्रिटेन की संस्कृति के हिसाब से इसमें कुछ अटपटा नहीं था।पर गांधी ने कई बार उनको अपने से दूर रखा।समझाते रहे।पत्र लिखते रहे कि मेरे पास आने के बजाय तुम काम करो।सेवा करो।इससे तुम्हें शान्ति मिलेगी।<br /><br /><strong>आपकी कौन सी कृति ऐसी है जिसे आप जैसा चाहते थे वैसा लिखपाये?</strong><br /><br />ऐसा कभी नहीं हुआ।रचनात्मकता में ऐसा होता है कि आदमी जो करना चाहता वह नहीं कर पाता ।और चीजें जुड़ती जाती हैं। मानव मस्तिष्क कुछ इस तरह है कि जब आप कुछ करना शुरु करते हैं तो काम शुरु करने पर नई-नई संभावनायें नजर आने लगती हैं।वह उस रास्ते चल देता है।पुरानी चीजें छूट जाती हैं।नयी दिशायें खुलती हैं।जब मैंने गांधी पर लिखना शुरु किया<br />तो भारत के गांधी मेरे सामने थे।जब दक्षिण अफ्रीका गया तो पाया कि असली गांधी तो यहां हैं-मैं उस तरफ चल पड़ा।यह रचनात्मकता की एक सीमा भी है और उसका विस्तार भी।<br /><br /><strong>कानपुर के वर्तमान साहित्यिक परिवेश के बारे में क्या विचार हैं आप के?</strong><br /><br />पहले यहां साहित्यिक नर्सरी थी।रमानाथ अवस्थी,नीरज,उपेन्द्र जैसे गीतकार यहां हुये ।प्रतापनारायण मिश्र , विशंभरनाथशर्मा 'कौशिक'सरीखे गद्य लेखक थे।प्रेमचंद भी थे।अब छुटपुट लोग हैं।वे भी कितना कर पाते हैं।उनकी भी<br />सीमायें हैं।<br /><strong>कानपुर कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाता था।आज मिलें बंद हो गयीं।कानपुर किसी उजड़े दयार सा लगता है।क्या ट्रेड यूनियनों के <a href="http://fursatiya.blogspot.com/2004/11/blog-post.html">ईंट से ईंट </a>बजा देने के जज्बे की भी इस हालत तक पहुंचने के लिये जिम्मेदारी है?</strong><br /><br />मेरी व्यक्तिगत राय यह है कि विदेशों में जो मार्क्सवादी गतिविधियां हुयीं उसमें उन्होंने उत्पादन नहीं प्रभावित होने दिया।विरोध किया पर उत्पादन चलता रहा।हमारे यहां उत्पादन सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ।आप अधिकार मांगिये,सब बातें करिये पर जो मांगों का मूल आधार है(उत्पादन)उसे ठप्प कर देंगे ,फैक्ट्री बंद कर देंगे तो बचेगा क्या?लड़ेंगे किसके लिये?सन् ६७ में जब मैं यहां आया था तो ये सब फैक्ट्रियां चलतीं थीं।शाम को यहां सड़क पर घण्टे भर लोगों के सर ही सर नजर आते थे।दुकानें थीं।बहुत से लोग बैठते थे।सामान बेचते थे।लोग उधार ले जाते ।तन्ख्वाह मिलने पर पैसा चुका देते।लेकिन मिलों के बंद होने से सब बेरोजगार हो गये।पहले जब कोई मरता था तो उसके बच्चे को रोजगार मिल जाता था।अब खुद की नौकरी गयी,बच्चे का भी आधार गया।जो दुकानदार अपनी बिक्री के लिये इन पर निर्भर थे वे भी उजड़ गये।इस बदहाली के मूल में कहीं न कहीं आधार की अनदेखी करना कारण रहा।<br /><br /><strong>आज दुनिया में अमेरिकी वर्चस्व बढ़ता जा रहा है।अपनी पिछली चीन यात्रा में आपने वहां क्या बदलाव देखे?</strong><br /><br />मैं पिछले साल अक्टूबर में चीन गया था।वहां देखा कि चीन एकदम अमेरिका हो गया है।चीनी महिलायें अपनी पारम्परिक पोशाक छोड़कर अमेरिकन शार्टस ,स्कर्ट में दिखीं।मेरे ख्याल में महिलायें ज्यादा आजाद हुयीं हैं वहां आदमियों के मुकाबले।<br /><br /><strong>जब आपने अमेरिकन टावरों पर हमला होते देखा टीवी पर तो आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?</strong><br /><br />हालांकि मैं हिंसा का हिमायती नहीं हूं पर मैंने इस बारे में 'अकार' के संपादकीय में लिखा था -<strong>ऐसा लगा जैसे किसी साम्राज्ञी को भरी सभा में निर्वस्त्र कर दिया गया हो।सारे देशों के महानायक उसे शर्मसार होने से बचाने के लिये समर्थनों<br />की वस्त्रांजलियां लेकर दौड़ पड़े हों। </strong>उसके बाद हमें यह भी दिखा कि कितने डरपोंक हैं अमेरिकन।मरने से कितना डरते हैं वे। मुझे लगता है कि अगर एकाध बम वहां गिर जाते तो आधे लोग तो डर से मर जाते।वे।पाउडर के डर से हफ्तों कारोबार ठप्प रहा वहां।<br /><br /><a href="http://www.flickr.com/photos/94063381@N00/11360138/" title="Photo Sharing"><img src="http://photos8.flickr.com/11360138_3cff615d2b.jpg" width="450" height="300" alt="HPIM0123" /></a><br /><br /><strong>हंस में जो मेरे विश्वासघात के नाम से लोगों में अपने यौन विचलनों को खुल के लिखने की शुरुआत हुयी इसको आप किस तरह देखते हैं?</strong> <br /><br />यह तो उकसावे का लेखन है।पानी पर चढ़ाकर लिखवाना।राजेन्द्रयादव ने देह वर्जनाओं से मुक्ति के नाम पर लिखने को उकसाया। बाद में रामशरण जोशी ने कहा भी कि इसे मत छापो पर राजेन्द्र यादव ने छाप दिया।इसी के कारण उसकी नौकरी भी चली गयी।दरअसल एक संपादक का यह भी दायित्व होता है कि वह देखे कि जो वह छापने जा रहा है उससे लेखक का कोई नुकसान तो नहीं हो रहा।राजेन्द्र यादव ने यह नहीं देखा।भुगतना पड़ा लेखक को।<br /><br /><strong>आज देश की हालत को आप किस रूप में पाते हैं?भविष्य कैसा सोचते हैं आप इसका?</strong><br />आज देश की राजनैतिक हालत बहुत खराब है।नेताओं में कोई ऐसा नहीं है जो आदर्श प्रस्तुत कर सके।अटलजी जैसे नेता तक रोज अपने बयान बदलते हैं।ऐसे में निकट भविष्य में किसी बड़े बदलाव के आसार तो मैं नहीं देखता।आगे यह हो सकता है कि युवा पीढ़ी अपने आदर्श खुद तय करे।ग्लोबलाइजेशन का यह फायदा हो सकता है कि लोगों में आगे बढ़ने की प्रवृत्ति बढ़े तथा वह आर्थिक समानता के लिये प्रयास करे और विकास की गति तय हो।<br /><br /><strong>आपकी पसंदीदा पुस्तकें कौन सी हैं?</strong><br />मुझे नरेश मेहता की -यह पथ बंधु था,यशपाल का -झूठा सच,अज्ञेय की -शेखर एक जीवनी काफी पसंद हैं।अभी मैं पाकिस्तान गया था तो वहां झूठा सच बहुत याद आया।<br /><br /><strong>पसंदीदा व्यंग्य लेखक कौन हैं आपके?</strong><br /><br />शरद जोशी मुझे बहुत अच्छे लगते रहे।आजकल ज्ञानचतुर्वेदी बढ़िया लिख रहा है।<br /><br /><strong>निरंतर पाठकों के लिये कोई संदेश !<br /></strong><br /><br />मुझे तो आप लोगों का यह प्रयास बहुत अच्छा लगा।जिस तरह अलग-अलग देशों रहने वाले आप भारतीय लोग हिंदी के प्रसार के लिये प्रयत्नशील हैं वह सराहनीय है।मेरे ख्याल में इसकी इस समय जबरदस्त जरूरत है।इससे विज्ञान की भाषा बनने में भी बहुत मदद मिलेगी।आगे चलकर यह बहुत काम आयेगा।जिस तरह आज अखबार रीजनल,लोकल होते जा रहे हैं ,उनका दायरा सिमटता जा रहा है।ऐसे समय में नेट के माध्यम से दुनिया तक पहुंचने के प्रयास बहुत जरूरी हैं।आप सभी को मैं इस सार्थक काम में लगने के लिये बधाई देता हूं तथा सफलता की मंगलकामना करता हूं।अनूप शुक्लhttp://www.blogger.com/profile/07001026538357885879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7993318.post-1117035720256491532005-05-25T18:26:00.000+05:302005-05-25T21:14:12.313+05:30चिट्ठी चिट्ठाकारों को बमार्फत रवि रतलामी<img src="http://pnarula.com/images/akshargram/anugunj.jpg" alt="Akshargram Anugunj" align="right" hspace="5" vspace="5" /><br /><br />प्रिय रतलामीजी,<br />मैं चिट्ठी बहुत पहले लिखना चाह रहा था।पर लिखना टलता गया। हुआ कुछ ऐसा कि मैंने पहले तय किया कि लिखूँगा पूरी दुनिया की हालत पर और संबोधन होगा भगवान को ।बताऊँगा उनको:-<br /><br /><strong>देख तेरे सँसार की हालत ,क्या हो गयी भगवान...</strong><br /><br />इसमें पहले दुनिया का रोना-गाना बताकर फिर भगवान को धिक्कारने की बात थी कि हे भगवान,आप तो भारतीय नौकरशाही की तरह कान में तेल डाले बैठे हो-कब चेतेगो? अनुरोध भी करने का प्लान था कि अपना चिट्ठा-विट्ठा शुरु करो देवभाषा में। चूँकि मसाला तय हो गया और रूपरेखा तय हो गयी तो शुरु भी कर दिया ।दो लाइन लिख दिये ।अब चूँकि आधा शुरुआत हो गयी तो समझो आधा काम हो गया। अब मैं इसी चक्कर में था कि आधा हो गया तो पूरा होने में क्या समय लगेगा!इसी चक्कर में समय सरकता रहा हथेली में जकड़ी बालू की तरह।<br /><br />फिर कुछ दिन बाद भगवान का आकर्षण कम होता गया। मेरे साथ कुछ लफड़ा है कि जो मैं समझता हूँ कि ये तो हो ही जायेगा वो मैं कभी नहीं कर पाता हूँ। फिर कुछ दिन वे गैरमुकम्मल मादा तस्वीरें सामने टहलती रहीं जिनसे कभी जिंदगी में साबिका पड़ा है। सोचा यह था कि सारे नारी पात्रों को एक साथ लेकर उनके बारे में लेख लिखा जाये। नाम सोचा था -भानुमती को चिट्ठी। भानुमती के कुनबे की तरह सारे लोगों के बारे में लिखने का विचार था-जोड़-तोड़ करके। उसमें सुन्दरता के पक्ष पर भी हाथ आजमाने का विचार था। पर कुछ ऐसा होता गया कि यह विचार भी परवान नहीं चढ़ पाया। कुछ हिचक रही कुछ यादों का बेतरतीब होना।हड़बड़ी में समेटने में बिखरने का खतरा था।हालाँकि जब से मैंने इस पर लिखने का विचार किया तब से लगभग हर मादा पात्र नजरों के सामने से गुजरी गोया याद दिला रही हो -हमें याद करते हो या भूल गये।अच्छा मजेदार बात यह है कि अब समय के साथ कोई पूरी याद बची ही नहीं। जो बहुत खूबसूरत लगती थी उसका नाम याद है पर वह नत्थी हो जाता है किसी कम खूबसूरत अच्छी आवाज वाली वाली लड़की के साथ। पढ़ने में बहुत अच्छी लड़की मिलती है उस खाने में जिनमें पढ़ाई की दुश्मन लड़कियां इकट्ठा हैं।स्मृतियां भी किसी गठबंधन सरकार की निर्दलीय विधायक हो गयी -जिधर मन आता है उधर चल देती हैं।इस पर किसी कवि ने बहुत पहले लिखा था:-<br /><br /><strong>धोबी के साथ गदहे भी चल दिये मटककर,<br />धोबिन बिचारी रोती,पत्थर पे सर पटककर।</strong><br /><br />कुल मिलाकर हुआ यह कि दोनों इरादे अमल में लाये नहीं जा सके।अमल में न ला पाने का कारण यह भी रहा शायद कि यह पत्र उन लोगों को लिखने की सोची जा रही थी जिनके संपर्क में मैं नहीं हूँ आजकल।फिर अब जब तारीख निकल चुकी है अनुगूँज की तो फिर यह सोचा जा रहा है कि क्या करूँ ? लिखूँ कि मटिया दूँ! बीच में यह विचार किया था <a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=15">अखिलेशजी </a>की कहानी पूरी कर लूँगा और उसी में <a href="http://rojnamcha.blogspot.com/2005/05/10.html">अतुल </a>की तरह अनुगूँज का लोगो लगा के जै सियाराम कर लूँगा।<br /><br />बहरहाल अब जब पानी सर से ऊपर गुजर चुका है तो यह सोचा जब किसी को लिखना ही है तो आप ही क्या बुरे हो!आप ही को चिट्ठी क्यों न लिखी जाये? आप के माध्यम से सबको लिख रहा हूँ। आपको संबोधित इसलिये कर रहा हूँ कि अगर किसी को कुछ बुरा लगे तो मैं कह सकता हूँ कि भाई हम लोगों का आपस का मामला है।यह विश्वास है कि आप बुरा मानोगे नहीं । हम लोग हर हाल में बुरा न मानने के लिये अभिशप्त हैं।<br /><br />हां तो मैं यह कह रहा था कि लगभग ९ महीने हो गये हमें लिखना शुरु किये। हमने जितना इतने दिनों में लिखा उतना जिंदगी भर में नहीं लिखा। लिखा होता तो किताबें छप चुकी होतीं और हर पांचवे सातवें दिन <a href="http://hashymahesh.blogspot.com/2005/05/blog-post.html">पूँछ की तरह </a>हिल रही होतीं <a href="http://www.myjavaserver.com/~hindi">चिट्ठा विश्व</a> में। <a href="http://www.akshargram.com/2005/05/17/429/#comments">चोरी-चोरी</a>,<a href="http://www.akshargram.com/2005/05/03/419">चुपके-चुपके</a> भी काम में अपने का यकीन कभी नहीं रहा जिसके अप्रूवल जैसी प्रकिया से गुजरना पड़े। शुरु में लिखने के समय सारा कच्चा माल खप गया। अब हर पोस्ट पर दिमाग में जोर लगाना पड़ता है।अच्छा,बीच -बीच में यह अहसास भी अपना नामुराद सर उठाता है कि हम कुछ खास लिखते हैं। <strong>'समथिंग डिफरेंट' </strong>टाइप का।हम यथासंभव इस अहसास को कुचल देते हैं पर कभी-कभी ये दिल है कि मानता नहीं।तब अंतिम हथियार के रूप में मैं किसी अंग्रेजीलेखक की लिखी हुई पंक्तियां दोहराता हूँ:-<br /><br /><strong>"दुनिया में आधा नुकसान उन लोगों के कारण होता है जो यह समझते हैं कि वे बहुत खास लोग हैं।" </strong> <br />यह डायलाग आपात चिकित्सा के लिये बहुत मुफीद दवा है। आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि इसने असर न किया हो।<br />कारण शायद यह हो कि हम लोग घोटाले भले करोंड़ो-अरबों के पचा लें पर 'लास टु द स्टेट' पचाने में हवा सरकती है।पचास हजार रुपये तनख्वाह पाने वाला भी पाँच रुपये का नुकसान करने के लिये अधिकृत नहीं हैं- नुकसान को निपटा भले दे(सेटल कर दे)<br /><br />बहरहाल इधर कुछ दिन से जब से <a href="http://www.akshargram.com/nirantar">निरंतर</a> निकलना शुरु हुयी तबसे हम और व्यस्त हो गये। खाली<a href="http://akshargram.com/nirantar/0505/fursatiya">पूछिये फुरसतिया</a> से लिखना रहता है पर लगता है कि सारी गाड़ी हमीं खींच रहे हों।उसमें भी बड़ा लफड़ा है।एक तो सवाल बहुत कम पूछते हैंलोग। जो पूछते हैं उनके जवाब नहीं सूझते। जो सूझते हैं भी उसके लिये सम्पादक से फोन पर पूछो तो कहेंगे <a href="http://nuktachini.blogspot.com">महाराज </a>-अनूप भाई,सच बात तो यह है कि कुछ गम्भीर हो गये जवाब।अब पता नहीं कब झूठी तारीफ करना सीखेगा यह हमारा प्रधान सम्पादक।इस पर एक मजेदार किस्सा सुना जाये:-<br /><br />एक बार हमारे और <a href="http://theluwa.blogspot.com">ठेलुहा नरेश</a> के संयुक्त चेलाधिराज अमरनाथ उपाध्याय हमारे घर पधारे । हाल ही में लंदन से छुट्टियों घर आये थे इसलिये शरीर आ गया था ,आत्मा हवा में थी। जबान से बीच-बीच में टेढ़ी होकर कुछ निकाल रही थी जिसे वो बता रहे थे कि यह ब्रिटेनिया अंग्रेजी है।बहरहाल वे पुराने गवैया हैं।आये तो गाना शुरु ही नहीं किया बहुत देर तक।तब हमारी श्रीमतीजी ने स्वागतगीत जैसा गीत गाया जिसके बोल कुछ --<strong>स्वागतम्,अथ स्वागतम </strong>टाइप के थे। फिर तो न पूछो।पट्ठा स्वागत से भाव विभोर हो गया।गाने ,ज्यादातर पुराने, गले से ज्वालामुखी के लावे की तरह बहने लगे।लगातार लरजती आवाज जब थमी घड़ी चार घंटे आगे सरक गयी थी।मेज पर चाय के कई खाली कप इकट्ठा हो गये थे।शाम को नेट लगाया तो दूसरी तरफ ठेलुहा नरेश हाजिर थे।जो बातचीत हुई दोनों में वो नीचे दी जा रही है:-<br /><br /><strong>उपाध्याय</strong>:-प्रणाम सरजी!<br /><br /><strong>ठेलुहा</strong>:- मस्त रहो बच्चा।<br /><br /><strong>उपाध्याय</strong>:- आपके चरण छूने का मन कर रहा है।<br /><br /><strong>ठेलुहा</strong>:-चिन्ता न करो । हम ई-मेल में अटैच करके भेज रहे हैं।छू लेना ।भक्तिभाव के अनुसार फल मिल जायेगा।और क्या हो रहा है?<br /><br /><strong>उपाध्याय</strong>:-आप ही को याद कर रहे थे।<br /><br /><strong>ठेलुहा</strong>:-जरूर हमारा गुणगान कर रहे होगे।<br /><br /><strong>उपाध्याय</strong>:- अब आपका जिक्र आता है तो इतना झूठ तो बोलना ही पड़ता है-आपकी इज्जत रखने के लिये।<br /><br /><strong>ठेलुहा</strong>:-लेकिन यह झूठ कितना सच लग रहा होगा।ऐसे सच लगने वाले झूठ बोलने में कभी कंजूसी नहीं करनी चाहिये।किसी से डरना नहीं चाहिये।भगवान भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता ऐसे आभासी सच बोलने वाले का।तुम जम के तारीफ करो मेरी ।जो होगा हम देख लेंगें।और हां,शुकुल से मेरा संदेश कह देना। (संदेश था:-उपाध्याय के गाने की हूटिंग जरूर कर देना ।हूटिंग न होने से ये नाराज हो जाते हैं।)<br /><br /><br />लब्बोलुआब यह कि अक्सर आप सच बोलके जितना अपना परलोक सुधार रहे होते हैं ।उससे ज्यादा अपना लोक बिगाड़ रहे होते हैं। बात, चल रही रही थी <strong>फुरसतिया से पूछिये</strong> की।तो कोई कहता है कि मामला गंभीर हो गया।कोई कहता है चिकाई कम करो।क्या करें कुछ समझ में नहीं आता।<br /><br />निरंतर के तीन अंक निकल चुके हैं।वाह-वाह तो काफी हुआ।पर निकालने वाले आह-आह करने लगे। कोई कह रहा है कि भाई लोग अब आप लोग देखो,हम तो चले। देवाशीष कहते हैं रमन कौल चलायेंगे पत्रिका।हमारी शुभकामनायें आपके साथ हैं। <a href="http://www.jitu.info/merapanna">जीतेन्दर </a>बताते हैं देवाशीष के बिना निरंतर विधवा की मांग हो जायेगी।अतुल कुछ कहते हैं।पंकज कहते हैं आखिर यह सब हम कर किस लिये रहे हैं?आखिर क्या लक्ष्य हैं हमारे। फिर वह कहते हैं अनूपजी आप कुछ बोलते क्यों नहीं!तो भैया हमारे भी नामाराशि आ गये हैं।बताओ<a href="http://anoopbhargava.blogspot.com">अनूपजी </a>,बोलते क्यों नहीं।बोलो तो कम से कम अमेरिका में पंकज तो सुन ही लेंगे।<br /><br />इधर की कुछ बात करूँ इसके पहले कुछ पुरानी बातें।मैं जितने दिन से जुड़ा यहां तब से देख रहा हूँ कि दो तरह के लफड़े आते रहे बीच-बीच में।कुछ तकनीकी कुछ गैर तकनीकी।गैर तकनीकी मुद्दे तो मैं समझता रहा। तकनीकी मुद्दे बहुत कम आये मेरी समझ में-अच्छा ही रहा।तकनीकी मुद्दों के पीछे भी कभी-कभी बचकानापन ज्यादा हावी रहा।ब्लागनाद ,हिंदी में टिप्पणी की सुविधा के लिये स्वामी के प्रयास के प्रकरण ने काफी आहत किया मुझे तथा सोचने के लिये मजबूर किया कि हमारे योद्धा आपस में यदुवंशियों की तरह लड़-मर रहे हैं।खैर ,जल्दी ही ऊब गये लोग तथा चुप हो गये।फिर अभी नारद प्रकरण।<br />मुझे इसकी महत्ता नहीं पता लेकिन यह जरूर लगा कि चिट्ठाविश्व कितना समय ज्यादा लगाता है! मैंने किसी अंग्रजी चिट्ठा में भी यह नारद देखा पता नहीं क्या लफड़ा है!स्वामीजी भी कह रहे थे कि 'इट सक्स टाईम'। कितना 'सक्स'?दो सेकेन्ड चार सेकेन्ड।क्या कर लेते हो इतनी देर में।खूबसूरती गजगामिनी होती है,हड़बड़ी में नहीं देखी जाती। फिर इससे देवाशीष को भी कोई परेशानी नहीं होनी चाहिये। अरे जो बढ़िया दिखेगा वहीं लोग जायेंगे। मुझे तो चिट्ठाविश्व की खूबसूरती पसन्द है मैं उसी को देखूँगा। काहे को परेशान होता है यार! पर कुछ बात है जरूर।<br /><br />इस तेज दुनिया में आयडिया बहुत तेजी से उछालते हैं लोग।अक्सर यह भी जाने बिना कि उसका मतलब क्या है?अगर अतुल के यह कहने पर कि चिट्ठाविश्व को निरंतर में समाहित कर दिया जाये ,देवाशीष उखड़ते हैं तो कतई गलत नहीं करते।ये कोई ब्लाग तो है नहीं भाई कि दो मिनट में बन गया दूसरा। फिर स्वाभाविक तौर पर जिसमें आदमी मेहनत करता है उससे लगाव तो होगा ही। हां, यह मेरे साथ होता तो मैं इस पर एक लम्बी पोस्ट लिखता और मजा लेता।<a href="http://fursatiya.blogspot.com/2004/09/blog-post_17.html">लिया </a>ही है पहले भी। देवाशीष चूक गये इस आनंद से।इसीलिये कहते हैं कि लिखते रहा करो देवाशीष।<br /><br />तमाम बातें हैं वो फिर कभी।फिलहाल हिंदी ब्लाग तथा निरंतर के बारे में। एक तो पहले मैं बता दूँ कि यहां जो करना पड़ेगा वह खुद हमें करना पड़ेगा।नामचीन लोगों चाहें वे <a href="http://www.jitu.info/uttara">पूर्णिमावर्मनजी</a> हों,<a href="http://ratina.blogspot.com">रति सक्सेना </a>हों या <a href="http://hindishitya.blogspot.com">व्योमजी </a>इनसे कुछ आशायें रखने के पहले हमें यह भी ध्यान में रखना पड़ेगा कि इनके पहले से ही कमिटमेंट हैं।इनका सहयोग किसी साझे काम में स्वयंसेवक की तरह नहीं मिलेगा।रचनायें मिल सकतीं हैं प्रसाद के रूप में।हम कृतार्थ होते रहेंगे -बस।<br /><br />निरंतर का स्वरूप क्या रहेगा यह तो समय बतायेगा।पर यह सच है कि मैं किसी भी रूप में इसे बंद करने का पक्षधर नहीं हूँ। न बंद करने का न आवृत्ति कम करने का।मैं आखिरी व्यक्ति हूँगा इसे बँद करने ले लिये कोई निर्णय लेने के लिये हाथ उठाने वाला।हमसे जो चाहा जायेगा मैं कर दूँगा पर तकनीकी तौर पर मेरा हाथ जरा तंग है।सो उधर हाथ नहीं डालना चाहता ।पर यह तय है कि पत्रिका निकलेगी चाहे कुछ कमतर होकर निकले।<br /><br />यह भ्रम भी किसी को नहीं होना चाहिये कि वह हिंदी पर कोई उपकार कर रहा है। भाषायें किसी की मोहताज नहीं होतीं।न किसी के आने-जाने कोई फर्क पड़ता है।वास्तव में यह तो हम अपने परिष्कार के लिये करते हैं।हम अगर एक दिन कोई बढ़िया लेख लिख लेते हैं तो पूरा हफ्ता निकल जाता है उसके नशे से छूटने में।निरंतर बंद हो जायेगी तो ऐतिहासिक हो जायेगी। और आजकल ऐतिहासिक चीजोंकी बहुत पूछ हैं। लोग यहाँ नहीं लिखेंगे तो कहीं और लिखेंगे।यहां नहीं पढ़ेंगे कहीं<br />और पढ़ेंगे।पर यह कसक सबके मन में होगी कि यार,हम भी निकालते थे पत्रिका।<br /><br />मैं कल्पना करता हूं कि मान लो कल को देवाशीष और रमन कौल समय देने में असमर्थ होने के कारण अलग हो जाते हैं।मैं या मेरे जैसा को तकनीकी रूप से सिफर आदमी कहता है भावुक होकर कि लाओ मैं निकलता हूँ पत्रिका।तो हमारे ये दो साथी क्या करेंगे? मेरे सामने खटाक से भारत-पाकिस्तान के उस मैच की तस्वीर सामने आ जाती है जिसमें आखिरी ओवरों में पाकिस्तान को कुछ रन बनाने थे।रन रेट दरकार ज्यादा था।ड्रेसिंगरूम से जावेद मियांदाद बराबर खिलाड़ियों को हर गेंद पर एक्टिंग करके बता रहे थे कि शाट ऐसे खेलो-वैसे खेलो।कुछ ऐसे ही ये दोनों दिग्गज बतायेंगे कि अनूप भाई अइसा करो-वइसा करो।पर करेंगे तो अपन तब जब उतना अकल होगी।अपने दिल के टुकड़े की हालत देखकर भावुक हृदय के स्वामी देवाशीष जी की <a href="http://nuktachini.blogspot.com/2005/05/blog-post.html#comments">नैनकटोंरो </a>से आँसू निकलेंगे -एक इधर से एक उधर से।कितने रूमाल मिलेंगे श्रीमतीजी से महाराज!<br /><br />देवाशीष की तकलीफें जायज हैं।यह पत्रिका सबको मिलकर चलानी होगी।सबको अपने हिस्से की मेहनत करनी होगी।यह नहीं कि जैसे देवता पुष्पवर्षा करते हैं वैसे 'लिंक' छितरा के चल दो।यह भी मेरा मानना कि अगर कोई काम नहीं हो पा रहा है तो उसके लिये हाय-तोबा मचाने के बजाय उसे अगले अंक के लिये छोड़ दिया जाये।अति उत्साहित होकर दूसरे के अधिकार क्षेत्र में दखल देने से बचा जाये।<br /><br />यह तो हुयी निरंतर की बात।मेरा विचार है कि इसकी निरंतरता बनी रहे।आशा है बनी भी रहेगी।पर यह तय है किजिम्मेदारियां को फिर से देखा जाये कि किससे क्या सहयोग मिल सकता है।निठल्लों को भी कुछ काम सौंपे जायें।जुलाई तक तो तय ही है निकलना इसका आगे भी निकलेगी-यह मेरा विश्वास है।जब आप अपनी आसन्न<a href="http://hindini.com/ravi/?p=15#comments">मौत को बुत्ता </a>देकर यहां हाजिर हो तो<br />इस पत्रिका की सांसे कैसे बंद हो सकती हैं!-हम सबके साथ रहते।कैसे जायेंगे दूर <a href="http://nuktachini.blogspot.com/2005/02/blog-post.html#comments">सर्टिफाइड नास्तिक वीर </a>तथा<a href="http://www.kalusa.org/idharudharki/index.php?cat=7">लाइलाज आशावादी</a> ।<br /><br /><br />इसके बाद कुछ लिखने को बचा नहीं पर समेटने के पहले लगता है कुछ और लिख लिया जाये।पता नहीं कब मौका मिले फिर लिखने का पत्र। चूँकि बात हो रही है साथियों की जिनके बीच कुछ समझ का फेर स्वाभ