फ़ुरसतिया
हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै
Thursday, October 23, 2014
झाडे रहो कलट्टरगंज
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सबेरे-सबेरे नींद खुली तो देखा सूरज भाई खिड़की के बाहर ट्रेन के साथ-साथ चल रहे थे। गोल बिंदी जैसे सजे थे आस...
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Wednesday, October 22, 2014
पुलिया के क्या हाल हैं?
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इतवार को प्लास्टर कटवा दिया। एक दिन गरम पट्टी(क्रैप बैंडेज) बांध के चले। फिर सीधे जूते में पाँव अन्दर करके खरामा-खरामा टहलते हुए फैक्ट्...
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