Saturday, October 31, 2015

मछली पकड़ना नहीं तालाब खेलना

रॉबर्टसन लेक के किनारे एक झोपडी में कुछ लोग बैठे दिखे। बात की तो पता चला कि वे मछुआरे हैं। सबने अपने-अपने जाल झील में डाल रखे हैं। अभी आठ-दस लोग थे वहां पर। सुबह 7 बजे तक। और लोग आ जाएंगे तब उतरेंगे झील में मछलियाँ पकड़ने।

मछलियाँ पकड़ने तो मैंने कहा। झील में उतरकर मछलियाँ पकड़ने को मछली पकड़ने वाले 'तालाब खेलना' कहते हैं। हमने पहली बार सुना यह। कामकाज से सीधे जुड़े लोगों के शब्द अक्सर उनसे अलग होते हैं जो किताबों में होते हैं। ऐसे ही याद आया कि ट्रक के टायर और ट्यूब के बीच लगने वाले रबड़ के टुकड़े को 'फ्लैप' ख़ास जाता है पर कामगार लोग उसको 'लंगोट' कहते हैं। जनभाषा के शब्द जीवन के ज्यादा नजदीक और सीधे समझ में आने वाले होते हैं।

मछली पकड़ने को तालाब खेलना शायद इसलिए नाम दिया हो लोगों ने क्योंकि जाल डालने मात्र से मछली फंसने की गारंटी नहीं होती। कभी मिली, कभी न मिली। कभी कम, कभी ज्यादा। तालाब में उतरने के बाद खेल की ही तरह होता होगा सब।इसीलिये नाम दिया तालाब खेलना।

बात करते हुए पता चला कि सबने अपने-अपने जाल डाल रखे हैं। जाल कहां पड़ा है उसका निशान रहता है हरेक का। किसी ने कोई प्लास्टिक की बोतल बांध रखी है जाल के ऊपर किसी ने थर्मोकोल का टुकड़ा। कुछ ने कोई निशान नहीं रखा। पर उसको पता रहता है कि कहां है उसका जाल।


मछली पकड़ने का काम सहकारी समिति की देख-रेख में होता है। कुल 87 सदस्य (मछुआरे)हैं समिति के। जब सब आ जाते हैं तभी 'तालाब खेलने' उतरते हैं झील में लोग।सबका इन्तजार शायद इसलिए ताकि किसी के जाल में फंसी मछली कोई दूसरा न ले ले। पर दो-चार-दस कम भी हुए तो भी उतर जाते हैं।

तालाब में उतरने के लिए लोग ट्रक के ट्यूब में हवा भरकर उस पर बांस की खपच्चियां का बैठने के लिए जुगाड़ बनाकर इस्तेमाल करते हैं। इस 'ट्यूब नौका' को क्या कहते हैं ये लोग यह अगली बार पता करेंगे।

 कुछ लोगों के ट्यूब में हवा कम हो गयी थी। लोग उनमें मुंह से हवा भर रहे थे। कुछ लोग नाव से भी जाते हैं तालाब खेलने।

अगर किसी ट्यूब की हवा तालाब में निकल गयी तो क्या होता है? यह पूछने पर बताया गया कि हवा एकदम नहीं निकलती। निकलना शुरू होने पर वह किनारे आ जाता है। कुछ समस्या हुई तो नाव वाले तो होते ही हैं सहायता के लिए।

'तालाब खेलने' के बाद जितनी मछली मिलती है उसको तौला जाता है। 30 रूपये किलो मछली के मिलते हैं मछुआरों को। सोसाइटी इसे 70 किलो बेचती है। फायदे का पैसा सोसाइटी के पास ही रहता है। उससे वह आगे मछली पैदा करने के उपाय के लिए खर्च करती है। जितनी बार पलटी (बिक्री होती) जाती है मछली उतनी ही उसकी कीमत बढ़ती जाती है।

मछली पकड़ने का काम कभी बन्द भी रखते हैं क्या? हमें लगा जबाब मिलेगा -नहीं। पर उन्होंने बताया कि
हां, तालाब को भी रेस्ट दिया जाता है। मतलब कुछ दिन मछली नहीं पकड़ी जाती मतलब तालाब नहीं खेलते। कब रेस्ट देना है यह सोसाइटी के लोग तय करते हैं। सबको मोबाइल पर सूचना दे देते हैं। कल से एक हफ्ते तालाब को रेस्ट देना तय हुआ है।

'मछली पकड़ना भी जीव हत्या है। हम उनको मारते हैं तो इसकी सजा हमको भी मिलेगी। कहां मिलेगी यह तय नहीं होता।' एक मछुआरे ने दार्शनिक अंदाज में कहा।

क्या पता मछलियों को मारने पकड़ने और उनके मारने के अपराध बोध से मन को मुक्त रखने के लिए ही मछली पकड़ने को 'तालाब खेलना' और मछली के लिए 'जल तरोई' जैसे शब्द गढ़े गए हों।

इकट्ठा हुये लोग आपस में चुहल भी कर रहे थे। लोग आते-जाते जा रहे हैं। बैठकर बाकी लोगों का इंतजार कर रहे थे। आमतौर पर आठ बजे तक सब लोग आ जाते हैं। उसके बाद सभी 'तालाब खेलने' के लिए उतर जाते हैं। 12 बजे तक रहते है झील में। इसके बाद अपने-अपने हिस्से की मछलियाँ लेकर बाहर आ जा जाते हैं।

मछुआरों का झील में उतरने का समय हो रहा था और मेरा फैक्ट्री का। लौटते में मैदान में खिले फूल दिखे। इनको किसी ने पूजा के लिए तोड़ा नहीं था। जंगल में खिले खूबसूरत फूलों को देखकर अजय गुप्त जी की कविता पंक्तियाँ याद आ गयीं:

"जो सुमन बीहड़ों में वन में खिलते हैं
वो माली के मोहताज नहीं होते
जो डीप उम्र भर जलते हैं
वो दीवाली के मोहताज नहीँ होते।"


कमरे पर पहुंचकर पोस्ट लिखी।आधी लिख पाये थे कि फैक्ट्री जाने का समय हो गया। बाकी ब्रेक के बाद लिखने की बात कही थी। अब लिखकर पोस्ट कर रहे हैं।

बाकी बचे हुए दिन का आनन्द लीजिये। जो होगा देखा जायेगा।

जो फूल जहां खिला है वहीं समर्पित

ठण्ड पड़ने लगी है। सूरज भाई देर से आने लगे हैं। सुबह आज निकले तो सड़क पर बल्ब जल रहे थे। अंधेरे और उजाले की साझा सरकार टाइप चल रही थी। नीरज ने लिखा है न-'निशा जा न पाये,ऊषा आ न पाये' कुछ उसी तरह का -'अँधेरा जा न पाये, उजाला आ न पाये' लग रहा था।

यूको बैंक के पास के पेड़ के सब फूल पूजार्थियों ने नोचकर पेड़ को पुष्पविहीन कर दिया था। कुछेक जो बाकी बचे थे उनको भी लोग उचक-उचक कर तोड़ रहे थे।

आगे एक जगह एक आदमी एक घर की चाहरदिवारी पर चढ़ा एक पेड़ से फूल तोड़ रहा था। हमने टोंका तो नीचे उतरा और बोला-'पूजा के लिए तोड़ रहा हूँ।' हमने कहा-'भगवान को बता दो। यहीं ग्रहण कर लेंगे।' वह कुछ बोला नहीँ। चुपचाप तोड़े हुए फूल इकट्ठा करता रहा। मैं अज्ञेय की कविता 'सामाज्ञी का नैवेद्य दान' याद करता रहा जिसमें यह कहा गया है कि जो फूल जहां खिला है वहीं समर्पित है आपको देव।

मंदिर के बाहर एकमात्र महिला भिखारिन बैठी थी।बाकी लोग लपककर आते दिखाई दिए। और दिनों की तुलना में मंगल और शनीचर को ज्यादा भीख मिलने का दिन होता है। आज शनिवार है। लोग ज्यादा आएंगे।
सड़क पर चहल-पहल कम थी। कुछ लोग घर के बाहर शांत से बैठे दिखे। सड़क पर उखड़ी कोलतार की परत से लग रहा है उसके बदन की खाल उतर गयी है उस जगह।


एक जगह कूड़े के बिस्तर पर एक सूअर परिवार सो रहा था। मियां-बीबी और एक बच्चा थे शायद वो। चीन के 'एक बच्चे नीति' का अनुयायी परिवार लगा है।हमको फोटो लेते देख 'बच्चा सूअर' थोड़ा कुनमुनाकार उठा और फिर करवट लेकर सो गया। कुछ देर बाद आगे जाकर देखा कि बड़ा सूअर उठकर कहीं दूर की तरफ जाता दिखा। क्या पता दिशा मैदान के लिए गया हो।

एक कूड़े-कबाड़-टीन-टप्पर के कोलाज सी झोपडी के बाहर एक 'राणा सांगा' सा हो चुके तख्त पर एक आदमी सीधा लेटा था। सर उसने पीछे की हुई हथेलियों पर थाम रखा था। जागता हुआ सो रहा था वह।

रांझी में कई जगह हॉकर अख़बार इकट्ठे कर रहे थे। कुछ लोग आज के अखबारों में पहले छपे हुए अख़बारों के परिशिष्ट ठेल रहे थे। ताजे अखबार का मुंह चोंच सरीखा खोलते और खुली हुई जगह में पहले का छपा अख़बार घुसा देते। खबर और परिशिष्ट सामग्री पहले एक दूजे को अजनबी निगाहों से देखती होगी। क्या पता रेलवे के जनरल डिब्बे के यात्रियों की तरह थोड़ा एतराज भी करतीं हों एक-दूसरे के मिलने पर लेकिन कुछ देर बाद दोनों गलबहियां डालते हुए हॉकर की साइकिल पर लद के चल देती होंगी।


एक बस रुकी थी। दूध वाले ने एक पालीथीन में कुछ दूध के पैकेट बस में किसी को दिए। बस चलने के पहले एक बच्चा हाथ में खूब सारे ब्रेड के पैकेट लिए उतरा और अनबिके पैकेट वापस दूकान में रखे पैकटों में मिला दिए।
मिसरा जी ने हमको देखते ही चाय थमा दी। नमस्ते फ्री में हुआ। चाय कप में दी। हमारा मन ग्लास में पीने का था लेकिन मिश्रा जी ने अलग से कप में दी चाय तो फिर उसी में पीते हुए उनसे बतियाते रहे। शाल टाइप ओढ़े हुए मिश्रा जी ने बताया कि सुबह साढ़े चार बजे आ गये थे दुकान पर। मतलब हमारे आने से डेढ़ घंटे पहले।

चाय पीकर लौटे तो एक जगह नल पर पानी भरते एक सज्जन दिखे। नल के पानी से भाप जैसी निकल रही थी। हम खड़े होकर देखने लगे। नल हवा की फूंक जैसा मारता, थोड़ा पानी फेंकता, फिर हवा फेंकता। फिर पानी। ऐसा लगा कि नल का पानी बाहर निकलने के पहले फूंक-फूंक कर बाल्टी को अपने हिसाब से तैयार कर रहा हो।
पता लगा कि नल के पानी से पहले गैस निकलती है। गैस मतलब हवा। जब यह निकल जाती है तब कायदे से पानी आता है। जहां पानी गिर रहा था बाल्टी में वहां पानी का गढढा बन जा रहा था। भरते पानी के साथ गढढा ऊपर आता जा रहा था। बाल्टी भर गयीं तो सज्जन दोनों हाथों में बाल्टी लेकर चलने लगे तो हमने उनका भी फोटो ले लिया।


बातचीत में पता चला कि वो सज्जन इलाहाबाद के सिराथू के रहने वाले हैं। 1972 में आये थे इलाहाबाद। 22 साल की उम्र में। कुछ दिन एक टाकीज में काम किया। फिर अपना बर्तन बेंचने का काम करने लगे। ठेलिया में फेरी लगाते हैं। एक बच्चा और पत्नी गाँव में ही रहते हैं। यहां किराए के कमरे में रहते हैं।

आगे सड़क के दोनों तरफ पेड़ों में खिले फूल दिखे। पहले कभी देखा नहीं। सर झुकाये चले आते रहे। आज ऊपर देखा तो लगा कितने खूबसूरत फूल देखने से वंचित रहे हम इतने दिन। यह भी सोचा कि हमारे आसपास कितनी सारी खूबसूरत चीजें होती हैं लेकिन हम अपने रूटीन जिंदगी में ही मुंडी घुसाये उनको देख ही नहीं पाते। जिंदगी खल्लास करते रहते हैं।

सड़क किनारे एक झोपड़ी में एक महिला सर झुकाये बैठी सो रही थी। कुछ देर खड़े उसको देखते रहे। जयशंकर प्रसाद की कहानी 'ममता' की बुढ़िया याद आई। कितनी अलग या समान रही होगी वह इस बुढ़िया से यह सोचा।
आगे सोचा राबर्टसन् लेक देखी जाए। एक दुकान पर खड़े होकर पूंछा तो एक आदमी लपक कर आगे आया बताने। उसको शायद यह डर था कि कहीं दूसरा न बता दे उसके बताने से पहले। कुछ ऐसे जैसे देश सेवा के लिए हलकान पार्टियां देशसेवा के लिए 'कटाजुज्झ' करती रहती हैं। हर पार्टी को डर सताता रहता है कि कहीं दूसरा उनसे पहले देशसेवा न कर डाले।


झील की तरफ गए तो रास्ते में बड़ा मैदान दिखा। कुछ लोग दुलकी चाल से टहल रहे थे। एक का पेट इतना ज्यादा आगे दिख रहा था कि लगा ज्यादा निकले पेट को भी स्टेपनी की तरह निकाल कर रखने की व्यवस्था होनी चाहिए।

आगे झील दिखी। झील का पानी हमको देखते ही मचलकर मिलने के लिए आगे आता सा लगा लेकिन तट ने उसे रोक लिया। लहरें तट के किनारे मचलती रहीं।।हम झील के पानी को देखते रहे।

बाकी का किस्सा अभी थोड़ी देर में। तब तक आप मजे से रहिये। आते अभी जरा सा नाश्ता ब्रेक के बाद।

Friday, October 30, 2015

करवाचौथ, करवा के गडुवे और सींके

सुबह निकले तो देखा सड़क पर लोग कम हैं आज। सर्दी का असर होगा शायद। लोग गरम कपड़े पहनने लगे हैं। एक आदमी पूरे शरीर को ढंके केवल मुंह खोले सड़क पर बहुत धीमे-धीमे चला जा रहा था। ठण्ड में चीजें सिकुड़ जाती हैं। लगता है उस व्यक्ति की चाल भी सर्दी में सिकुड़ गयी थी।

छट्ठू सिंह अपने साथियों सहित पुलिया पर बैठे थे। सब गरम कपड़ों में। बात करने लगे तो एक जन ने फटाफट दो किस्से सुना डाले। पहला एक बुजुर्ग के बारे में था जो पुलिस की नौकरी से रिटायर हुए। कल उनका 100 साल की उम्र में निधन हुआ। वे 6 साल से बिस्तर पर थे। उनके रिटायरमेंट के बाद पैदा हुए बेटे और उसकी बहू ने खूब सेवा की उनकी। दूसरा किस्सा एक गाँव के बुजुर्ग के बारे में था कि वह गाँव में सबको बहुत सताता था। मरते समय उसने अपने लड़के से कहा कि मरने के बाद उसके शरीर को बांस पर लटका दिया जाए। लड़के ने ऐसा ही किया। पुलिस को पता लगा तो वो पूरे गाँव को पकड़ ले गई।मतलब मरने के बाद भी उसने गाँव को परेशान किया।

किस्से सुनते हुए लगा कि जिस भी व्यक्ति के बाद कुछ भी होता है सुनाने को वह उसे दूसरे से साझा करना चाहता है। कुछ लोग ऐसा कर लेते हैं। कुछ नहीं कर पाते हैं। वे मौन रहते हैं। खुद से ही साझा करते हैं बातें। कुछ शायद इन्तजार करते हैं कि कोई सुनने वाला मिले उनको।

एक बुजुर्ग महिला हाथ में लोहे की सरिया लिए टहल रही थी। कोने में मुड़ी हुई सरिया उनकी वाकिंग स्टिक थी।
एक बच्चा साइकिल पर सरपट चला जा रहा था। सुबह-सुबह कोचिंग पढ़ने जा रहा था। गणित की। उसके बाद 11 बजे स्कूल जायेगा। हाईस्कूल में पढ़ता है बच्चा। उसने बताया कि दो दिन पहले 'क्षेत्रमिति' सिखाई गयी थी कोचिंग में। हम और कुछ पूछें तब तक बच्चा बिना हाथ दिए कोचिंग के लिए जाने वाले रस्ते की तरफ मुड़ गया था। पढाई में लगता है -'बिनु कोचिंग सब सून।'


पंकज टी स्टाल पर आज सब देवी गीत बज रहे थे। 'मैं तो आरती उतारूँ रे संतोषी माता की।' शायद आज करवा चौथ होने के कारण ऐसा हो।

जहाँ चाय पी रहे थे वहीँ सामने भट्टी सुलग रहीं थी। ग्राहकों के लिये नाश्ता तैयार हो रहा था। आसपास सुलगती भट्टियों को देखकर लगा कि दो अलग-अलग पार्टियों के जनप्रतिनिधि आसपास मंच पर चुनावी भाषण दे रहे हों। एक भट्टी से लपट उठती तो लगता एक नेता ने कोई भड़काऊ भाषण दिया। जबाब में फौरन दूसरी भट्टी से भी लपक उठती। यहां भट्टियों के सुलगने से नाश्ता पक रहा था। वहां भाषणों में लोगों की सरकार पक रही होगी।
चाय की दुकान पर ही फैक्ट्री के एक साथी मिल गए। बताने लगे कि उनका मोबाइल बच्ची ले गयी है इसलिए मेरी पोस्ट नहीं देख पा रहे हैं। बच्ची खो-खो कम्पटीशन में केरल गयी है स्कूल की टीम के साथ। बताया -'पढ़ने में बहुत अच्छी है बच्ची। पीएमटी की तैयारी करेगी।'दूसरी बच्ची अपनी माँ के साथ एक डांस कम्पटीशन में गयी है। 4 में पढ़ती बच्ची बाहर कम्पटीशन के लिए बाहर गयी है यह जानकर अच्छा लगा। मुकेश तिवारी की कविता की याद आई-'बच्चियां अपने आप में मुकम्मल जहां होती हैं।'

लौटते में देखा कुछ बुजुर्ग बस स्टैंड पर बैठे समय काट रहे थे। बस स्टैंड पेड़ सरीखा लगा जिसमें वे लोग पक्षियों की तरह दुबके बैठे थे। हमको देखकर एक बुजुर्ग ने उचककर हाथ उठाकर नमस्कार किया। हमने भी आगे बढ़ते हुए प्रति नमस्कार किया। किसी बुजुर्ग व्यक्ति को जितने ज्यादा लोग नमस्कार करने वाले होते हैं वह शायद उतना ही अधिक सुकून से रहता होगा।

एक आदमी मुंह में दातुन दबाये उसको चबाता हुआ मार्निंग वाल कर रहा था। दातुन उसके मुंह में ऐसे घुसी लग रही थी जैसे किसी नाव में पतवार अटकी हो। मुंह चलाते हुए दातुन चबाता हुआ आगे चला जा रहा था वह व्यक्ति।

एक महिला अपने सर पर करवा चौथ के लिए लगने वाले गडुवा लादे पुलिया के पास रुकी। वहां फैक्ट्री जाने के लिए समय होने का इन्तजार करती बैठी महिला ने उसकी टोकरी उतरवाई। टोकरी उतारकर पुलिया पर रखी।महिला के सर से टोकरी के नीचे रखा कपड़ा सड़क पर गिर गया। कपड़ा उठाकर उसने उसको फिर से गोलियाकर हाथ में रख लिया और सुस्ताते हुए बतियाने लगी।

महिला कंचनपुर में रहती है। तीन बच्चे हैं उसके। सास भी साथ रहती है। आदमी मिटटी का काम करता है। करवाचौथ के लिए गडुवा और सींके लेकर कंचनपुर जा रही है। 20 से 25 के हैं। दाम पूछने पर बोली-'लै लेव आपौ एक।' हम बोले-'हमारी घरैतिन कानपुर में ले चुकी होगी।

पत्नी जी शुक्रवार का व्रत बच्चे की सलामती के लिए रखती हैं और आज करवाचौथ का व्रत पति की लम्बी आयु के लिये पड़ गया। खुद की तबियत भले खराब हो जाए लेकिन घर के लोग ठीक रहें इसके लिए व्रत रहती हैं महिलाएं। व्रत से किसी की सलामती का कोई सम्बन्ध नहीं होता इस तर्क और रखते आये हैं तो रख लेना चाहिए इस आस्था में तर्क सही होते हुए भी पराजित होता है हमेशा।

वह महिला खुद व्रत नहीँ रखती। अभी तक रखा नहीं पर अब रखने की बात कह रही थी। उसको पुलिया पर सुस्ताने के लिए छोड़कर हम कमरे पर चले आये।

अब जा रहे हैं फैक्ट्री के लिए तैयार होने। आपका दिन शुभ हो। मंगलमय हो।

प्यार में बड़ी ताकत होती है

आज सुबह से ही पानी पटर-पटर गिर रहा है। पटर-पटर न अच्छा लग रहा हो तो रिम-झिम,रिम-झिम पढ़ लें। पर झमाझम मत पढ़ लीजियेगा।जबलपुर के लोग समझ जाएंगे कि झूठ लिखा है।

सुबह जग तो गए लेकिन उठे नहीं। लेटे रहे। सीधे मुंह किये छत ताकते रहे। जब से पता लगा है कि पेट के बल लेटने से दिल की धड़कन बढ़ जाती है तब से पेट के बल लेटना बन्द कर दिया। पहले सीधे, पेट के बल और दोनों करवट लेट लेते थे। अब पेट के बल लेटना बन्द कर देने से हमारे ही शरीर की स्वतन्त्रता 25% कम हो गयी। पेट शिकायत करता है कभी-कभी कि हमारा क्या दोष? हमको क्यों बिस्तर-स्पर्श नहीँ मिलता। हम उसको समझाते हैं -'तुम्हारा दोष यह कि तुमने उस खाने को अपने यहां पनाह दी जिसके चलते शरीर का वजन बढ़ा और पेट के बल लेटना खतरनाक।' यह कहते हुए हमने पेट को प्यार से सहलाते हुए बशीर बद्र का यह शेर सुनाया:

"मैं खुद भी एहतीयतन, उस गली से कम गुजरता हूँ
कोई मासूम क्यों मेरे लिए बदनाम हो जाये।"
पेट को शेर तो नहीं समझ में आया पर प्यार से सहलाने वह शांत सा हो गया। एक बार फिर एहसास हुआ कि प्यार में बड़ी ताकत होती है।

मोबाइल पर नेट आन किया तो कई स्टेटस भड़भड़ाकर मोबाइल के स्क्रीन पर आकर गिरे। हमें लगा कहीं स्क्रीन चटक न जाये। लेकिन फिर लगा कि स्क्रीन तो बहरी है। सुनाई नहीं देता इसको। यह सोचकर हमने दो ठो साँसे लीं और उनका नामकरण किया -'सन्तोष की सांस।'

जैसे ही दो सांसों का नामकरण किया तो बाद की साँसे भी हल्ला मचाने लगीं -'हमको भी नाम दो, हमारा भी नामकरण करो।'कुछ तो हल्ला मचाते हुए हाय-हाय तक करने लगीं। कोई बोली -'जल्दी नामकरण नहीं करोगे तो धरने पर बैठ जाऊंगी, हां नहीं तो।' हमने उनका नामकरण किया-'असन्तोष की सांस।' इसके बाद बार-बार नामकरण के झंझट से खुद को मुक्त करने के लिए हमने साँसों को खुद अपना नाम तय करने की छूट दे दी जैसे सरकार ने तेल कम्पनियों को अपना दाम खुद तय करने की छूट दी है।

बाद में देखा कि साँसों ने अपने नाम मनमाने तरीके से रख लिए हैं। जैसे कोई मंत्री सारे लाइसेंस मनमाने तरीके से अपनों को बांटता है वैसे ही साँसों ने नामकरण में मनमानी की है। एक 'हड़बड़ सांस' ने अपना नाम रख लिया -'चैन की सांस', एक 'उखड़ी सांस' को उसकी सहेलियाँ कह रहीं -'स्थिर सांस'। एकदम नवजात सांस के लिए बाकी की साँसें कह रहीं थीं -वो देख आ गयी 'आखिरी सांस'। कुल मिलाकर इस तरह का माहौल हो रखा था कि मुझे डर लगा अब छोटा राजन वाले मामले से मुक्त होते ही मिडिया कहीँ यह 'सांस घोटाला' न कवर करने लगे।
बरामदे में निकले तो देखा कि पानी बरस रहा था। हल्का-हल्का। सड़क पर बूंदे दिख नहीं रहीं थीं। पर छज्जे पर जहां पानी जमा था वहां गिरती हुई बूँदें दिख रहीं थीं। ऊपर से आती बूँद छज्जे पर इकट्ठा पानी पर गिरती। गिरते समय जहां बूँद गिरती वहां थोड़ा हलचल होती। इकट्ठा पानी थोड़ा सा कुनमुनाता सा हिलता। फिर गिरी हुई बूँद को अपने में मिलाकर, समेट कर फिर स्थिर हो जाता। कुछ देर पहले गिरी हुई बूँद अब पानीं में शामिल होकर अगली बूंदों की अगवानी के लिए तैयार करने लगती।

ऐसे में मौका है कि इस बात को आज के संस्थागत भ्रष्टाचार से जोड़कर कह दें कि जैसे कि संस्थागत भ्रष्टाचार नए अधिकारियों/कर्मचारियों को अपनी संगत में लेते ही भ्रष्ट बनाने लगता है वैसे ही ऊपर से गिरती गतिमान बूंदे भी ठहरे हुए पानी की संगत में आकर ठहर गयीं। शांत हो गयीं। लेकिन फिर लगा कि हर बात को भ्रष्टाचार से जोड़ना भी ठीक नहीं। वह भी एक तरह का 'अभिव्यक्ति का भ्रष्टाचार' है। कम से कम प्रकृति को तो इस राजनीति से मुक्त रखा जाए।है कि नहीं?

पानी के चलते साइकिल चलाने नहीं गए। सूरज भाई को फोन मिलाया तो पता चला कि वे अपने पूरे कुनबे समेत निकल चुके हैं। लेकिन बादलों का जाम लगा हुआ है इसलिए धरती पर पहुंच नहीं पाये हैं। उजाले को तो उन्होंने बादलों के जाम के बीच से किसी तरह निकाल कर धरती पर भेज दिया है लेकिन किरणों को अपने साथ रोक लिया है। भीड़ में किसी का कोई भरोसा नहीं। कोई मनचला बादल किसी किरण को छेड़ दे तो बर्दास्त नहीं होगा फिर सूरज भाई को।

हमने उनकी चिंता से सहमति जताते हुए सोचा बादलों को हड़काएं कि जब बरसना था तब नहीं बरसे। अब क्यों आये हो बरसने के लिए। लेकिन फिर सोचा कि छोड़ो यार किस-किस को हड़काएं। अपन खुद अपना काम समय पर कर लें वही बहुत है। साथ में कह दें-'हम सुधरेंगे, जग सुधरेगा।'

पोस्ट पूरी करने के बाद सोचा एक ठो फोटो भी हो जाए। बरामदे में आकर देखा पानी हल्का हो गया है पर बरस रहा है। पेड़ एकदम सीधे खड़े हैं अच्छे बच्चों की तरह। बारिश की बूंदे उनको नहला रही हैं। हवा के साथ कभी पेड़ की फुनगियां हिलती हैं तो लगता है जैसे ठंडे पानी का पहला मग डालने पर जैसे शरीर सिहरता सा है वैसे ही पेड़ सिहर रहे हों। आसपास के फूल और कलियाँ बूंदो की संगत में पेड़ों और पत्तियों को तृप्त होते देख रहे हैं। शायद वे सोच भी रहे हों कि कब ससुरे बादल दफा हों और भौरें और तितलियाँ आएं और अपन भीं मजे करें।
पेड़ों के बाद लान की घास भी जल में आकण्ठ डूबी  मस्ती कर रही है। दीवार के पार सड़क पर लोग जितनी तेजी से आते दिख रहे हैं उतनी ही तेजी से जाते दिख रहे हैं।बारिश के चलते दुपहिया वाहनों की सवारियां सर झुकाये हुए जा रही हैं। ढाल से उतरती सवारियां तेज जा रही हैं। लग रहा है जैसे कोई 'सेंसेक्स सांड' सींग उठाये ढाल से नीचे की तरफ भागता चला जा रहा हो।

बहुत हुआ। अब आप भी मजे करिये। हम चलते दफ्तर की ओर। आपका दिन शुभ हो। मंगलमय हो। जय हो।

यह हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था है

अनूप शुक्ल की फ़ोटो.आज अख़बार जल्दी आ गया। तीन बल्कि चार अच्छी खबरें दिखीं:

1. बैतूल में एक युवक की दोनों किडनी फेल होने पर गाँववालों ने मदद का बीड़ा उठाया। दो दिन में हजारों रूपये जमा किये।

2. सिंगापुर निवासी (पहले जबलपुर निवासी ) स्टेनली सेम्युल ने 2 साल में सिलुआ गाँव को आदर्श गाँव बनाया।

3. एक दम्पति के 14 हजार चोरी हो गए तो एक पुलिस टी आई ने अपने पास से और चंदा करके उनको पैसे दिए और कहा -जाओ इलाज करवाओ।

चौथी खबर के लिए सोच रहे हैं क्या लिखें? एक में पाकिस्तान से आई गीता ने इंदौर निवासियों को फ़्लाइंग किस दिया है और दूसरी में हरभजन सिंह और गीता बसरा एक संगीत समारोह में थिरकते दिखे। कल उनकी शादी होगी। आप तय कर लो। जो बेहतर लगे उसको शामिल कर लो चौथे नम्बर पर।

अख़बार देखकर जब निकले तो मेस के बाहर एक आदमी छोटी पुलिया पर मुंह ऊपर करके बैठ गया। हमें लगा सेल्फी लेगा। लेकिन वो सिर्फ बैठा ही रहा। लगता है एन वक्त पर इरादा बदल दिया होगा उसने।

पुलिया पर एक आदमी बैठा सामने सड़क को देख रहा था।उसके चेहरे से लग रहा था कि वह देकग भले सड़क को रहा हो पर सोच कुछ और रहा था। शायद घर-परिवार की कोई समस्या। उसको सड़क देखते देख हम भी देख लिए।

एक महिला सर पर टोकरी में करवा चौथ वाले करवे लिए बाजार में बेंचने जा रही थी। कंचनपुर। आमतौर पर वे पुलिया पर सुस्ताने को रूकती हैं। पर आज नहीँ रुकी। शायद इसलिए कि वहां पुलिया पर लोग पहले से ही बैठे थे। शायद आगे बस स्टैंड पर सुस्ताये वह।

फैक्ट्री के बाहर फुटपाठ पर कुछ बच्चे बैठे हुए हैं। इनमें से कुछ वे हैं जो भर्ती के लिए इंटरव्यू देने आये हैं। आजकल इंटरव्यू के लिए यह अच्छा किया गया है कि उसमें नम्बर नहीं रखे गए। सिर्फ पास-फेल का हिसाब। मेरिट उनके लिखित इम्तहान के नम्बरों से बनेगी।

ऐसे ही एक इंटरव्यू बोर्ड में हम भी थे कभी। अलग-अलग पारवारिक परिस्थितियों के बच्चे आते। किसी के पिता बचपन में नहीं रहे। कोई पंचर बनाता है। किसी ने 2002 में अहर्ता परीक्षा पास की। तब से नौकरी नहीं मिली। सब भूल गया अब। कोई खुद बच्चों को पढ़ाता है । कई जगह से इंटरव्यू के लिए बुलावा आया पर किराया न होने के कारण नहीं जा पाया। यहां आने के लिए भी 300 रूपये किराए के लिए आया है किसी मित्र से।
ऐसे में आज ट्रेनों में प्रीमियम किराए के नाम पर रेलवे के टिकटों के दाम बढ़ाने की खबर सुनी तो लगा कि अभी तो यह बच्चा आ गया किसी मित्र से उधार लेकर। प्रीमियम व्यवस्था लागू होने पर शायद मित्र के पास भी देने के लिए पैसे न रहें।

इंटरव्यू लेने वालों के भी मजेदार नजारे देखे मैंने। लोग वही पूछते हैं जो उनको आता है। वह नहीं जो इंटरव्यू देने वाले को आता है। कुछ-कुछ इंटरव्यू लेने वाले तो तब तक सवाल पूछते रहते हैं जब तक बताने वाले बेचारा हारी न बोल दे। उसके चुप होने पर ही पूछने वाले के चेहरे पर मुस्कान आती है। वे फिर अपने साथियों की तरफ देखते हुए मौन रूप में बताते हैं-देखो हमको इतना आता है (मन करता है पूंछे- बस इत्ता ही आता है)। कंडीडेट के बजाय अपना खुद का इम्तहान देते हुए लगते हैं ऐसे लोग।

चाय की दूकान पर चाय पीने पहुंचे तो कुछ बच्चे वहां चाय-नाश्ता कर रहे थे। कुछ ने नमस्ते भी किया। पता चला कि वे हमारे यहाँ चार्जमैन की पोस्ट पर नए भर्ती हुए हैं। कोई इलाहाबाद का कोई जौंनपुर का कोई भोपाल कोई मुगलसराय का। सब प्राइवेट नौकरी करके कुछ दिन आये हैं। 7000/8000 रूपये देते थे वे। यहाँ 30000/- रूपये मिलते हैं।

अकसर यह बात होती है कि प्राइवेट कंपनियां सरकारी कपंनियों की तुलना में सस्ते में सामान बनाती हैं। उस समय यह नहीं देखा जाता कि प्राईवेट कंपनियां अपने कर्मचारियों को आर्थिक सुरक्षा कितना देती हैं। और भी इसी तरह की बातें।

ये कुकुरमुत्तों की तरह खुले प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेजों का ही प्रताप है कि उनके यहां पढ़ने वाले बच्चे दिन में कालेज में पढ़ते हैं और शाम को पास होने के लिए कोचिंग। अपने अध्यापकों को 15-20 हजार रूपये महीना देकर वो बच्चों के घर वालों से लाखों वसूलते हैं। फिर वहां के पास हुए बच्चे चपरासी और दरबान की नौकरी के लिए मारामारी करते हैं। पिछले दिनों देखा मैंने कि चार बच्चे ऐसे हैं जो इंजिनियरिंग की डिग्री धारी हैं और ऐसे काम कर रहे हैं जिसकी अहर्ता आठवीं/दसवीं पास है।

यह हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था है। उसकी गुणवत्ता है।

ओह कहां फंस गए हम भी आज बच्चों से बात करते हुए। देर हो गयी।

लौटते में देखा तो सूरज भाई आसमान पर ड्यूटी सम्भाल चुके थे। सुबह हो गयी थी। आप भी चलिए।मजे कीजिये। मस्त रहिये।

Tuesday, October 27, 2015

धूल का कोई आशियाना नहीं होता

आज बहुत दिन बाद साईकल छुई। गद्दी पर हाथ फटकारा तो धूल झटका खाकर नीचे गिर गई। बाकी की धूल को कपडे से झाड़कर पोंछा गया। साईकल की धूल झाड़ने वाले कपड़े से चपक गयी। धूल बेचारी भी क्या करे। उसका अपना कोई आशियाना तो होता नहीं। जो भी उसके पास आता है उससे चिपक जाती है।

सड़क पर एक आदमी धीरे-धीरे चला जा रहा था। पायजामा और कमीज ऐसे पहने हुए था वह कि अगर सर पर अंगौछा न बांधे होता तो लगता कि बेलनाकार कपड़े पहने कोई आदमी सड़क पर चला जा रहा है।

हनुमान मंदिर के पास एक आदमी लोहे की जाली के अंदर हाथ डाल कर कुछ बीनने की कोशिश कर रहा था। पता किया तो जाली के अंदर के आंवले के पेड़ से गिरे आवंले बटोर रहा था। एक आंवला उसके हाथ में था। मैंने दूर पड़ा एक आंवला उसको दिखाया। वह बोला-' वो तो हम भी देख चुके हैं। लेकिन वो दूर है। हाथ वहां तक नहीँ पहुंचता।' हम लकड़ी की सहायता से आंवला बटोरने की राय उछलकर आगे निकल लिए।

राय से याद आया हमारे E Swami ने अपने एक लेख में कुछ यों लिखा था-" जन्नतनशीं दादाजी कहते थे - "दुनिया में दो किस्म के लोग होते हैं - रायचंद और करमचंद - करमचंद बनना और करमचंदो से मित्रता रखना! " (http://eswami.blogspot.in/2005/03/blog-post.html ) रायचन्द माने सिर्फ राय देने वाले, करमचन्द माने कर्मवीर। दुनिया में बहुतायत राय देने वालों की है पर जलवा करमचंदों का ही होता है।

हनुमान मन्दिर में घण्टा बज रहा था। आरती हो रही थी। आज मंगलवार होने के चलते भिखारियों की संख्या आम दिनों से बढ़ी हुई थी।जो लोग आ गए थे वे मन्दिर की तरफ सर झुकाये हुए हनुमान जी की तरफ हाथ जोड़े बैठे थे। बाद में देखा वे सभी जुड़े हाथ महिलाओं के थे। एक पुरुष भिखारी सड़क की तरफ मुंह किये आते-जाते लोगों को देख रहा था। कुछ और मांगने वाले लपकते हुए आते दिखे। उनको देखकर लगा जैसे ड्यूटी जाने में देर होने पर कोई कर्मचारी गेट बन्द होने के पहले लपककर फैक्ट्री के अंदर हो जाना चाहता है।


एक महिला सर पर करवाचौथ की पूजा के लिए करवा और सींके सर पर लादे हुए कंचनपुर की तरफ जाते हुए दिखी। आगे वह पुलिया पर बैठकर आराम करेगी। फिर कंचनपुर जायेगी।

गेट नंबर एक के सामने की दो चाय की दुकानों में से एक खुली नहीं थी। वही ज्यादा चलती थी। पूछने पर एक ने बताया कि उसके कारीगर भाग गए हैं क्योंकि वह पैसा कम देता है। फिर दूसरी दूकान वाले बच्चे से पूछा तो उसने बताया कि कारीगर कुछ दिन के लिए छुट्टी पर गए है। एक ही घटना पर दो बयान। किसको सही माना जाए।

चाय की दूकान वाला बच्चा हमको देखकर चाय बनाने लगा। इस बीच Devanshu ने अमेरिका से फेसबुक पर नमस्ते की और बताया कि वो शाम की चाय पी रहे हैं। हमने वहीँ से खड़े-खड़े होटल सोनम का फोटो पठा दिया यह बताने के लिए कि हम भी सुबह की चाय पीने के लिए दूकान पर खड़े हैं। अमेरिका में कद्दूकेंद्रित त्यौहार हैलोवीन की तैयारी चल रही है। उसके बारे में बताया देवांशु ने कि कैसे मनाने की सोच रहे हैं वो हैलोवीन।

हमको दुकान का फोटो लेते देख चाय की दूकान पर काम करता बच्चा बोला-'हमको भी व्हाट्सऐप पर भेजना।' फिर उसने बताया कि सुबह 4 बजे आ जाता है दूकान। अपनी टिफिन सर्विस के बारे में बताया कि कोयलारी( शराब के ठेके पर काम करने वालों) वाले 22 लोगों का ठेका मिला है टिफिन सर्विस का। जिसको शराब का ठेका मिला है उसने बुलाये हैं बाहर से काम करने वाले। घर से बाहर आये वे लोग खाने के लिए टिफिन सेवा पर ही निर्भर हैं।

चाय बनने के समय का उपयोग करने के लिए एक पेड़ के नीचे इकट्ठा बुजुर्गों की बातचीत सुनने लगे खड़े होकर। वे सब हाल में सम्पन्न रामलीला की बातें कर रहे थे और बता रहे थे कि जीएम वगैरह रामलीला में सपरिवार आये।


एक आदमी मेलों के झूलों के बारे में बता रहा था। बोला--'एक वो झूला चलता है न जिसमें पहले एक तरफ जाता है झूला और फिर झटके से दूसरी तरफ तरफ। 'झटकौवा झूला'। उसको झूलते समय लगता था कि बांह न उखड़ जाए।' किसी ने बोला उसने रेलवाला झूला झुलाया बच्चों को तो किसी ने अजगर वाले झूले की बात की। एक ने पेड़ों पर पड़े झूलों के झूलने के दिन भी याद किये।

बाद में उनमें से एक से बात हुयी। रामनामी दुपट्टा ओढ़े हुए। खमरिया से रिटायर छूटे 2013 में। शारदा नगर में खुद का मकान बनवाया है दुमंजिला। कम से कम 30 लाख कीमत होगी आज के समय। फिलिंग सेक्शन में काम करते थे। दो साल उमर ज्यादा लिखी थी इसलिए पहले रिटायर हो गए। ठीक लिखी होती तो 2 साल और नौकरी करते। लेकिन हमें कोई दुःख नहीं। आराम से रहते हैं। मजे हैं।

हमें लगा बताओ इनके दो साल कम हो गए नौकरी के फिर भी ये कहते हैं इनको कोई दुःख नहीं। वहीं अपने पूर्व सेनाध्यक्ष के एक साल कम होने पर ही दुनिया भर में हल्ला मचा दिया था। फिर लगा - 'नौकरी पेशा आदमी के साल की कीमत पद के हिसाब से होती है।'

इस बीच चाय बन गयी थी। पता नहीँ क्यों उसने चाय बिना दूध की नीबू वाली बना दी। हमने कहा -' ई कौन बोला बनाने को? दूध वाली पिलाओ।' उसने फ़ौरन दूसरी चाय चढ़ा दी। बिना दूध वाली एक ग्राहक ने लपक ली।
एक आदमी चुपचाप वहां खड़ा चाय पी रहा था। खूब सफेद दाढ़ी। पता चला कि रांझी से आते हैं मंदिर तक पैदल। इलेक्ट्रॉनिक्स के सामान की दुकान है। 'कौशल इलेक्ट्रॉनिक्स'। फरीदकोट से आये थे जबलपुर। फिर यहीँ बस गए।

हमने अपने 1989 के पुराने टेपरिकार्डर की रिपेयरिंग के बारे में पूछा। मेरे पास कई कैसेट हैं कविताओं के जो कि टेपरिकार्डर खराब होने के चलते नहीं सुन पाते। उन्होंने कहा-'दिखायेगा। कोशिश करेंगे ठीक करने की।'
बदलती तकनीक के साइड इफेक्ट हैं यह। बहुत कुछ जो पुरानी तकनीक के सहारे संरक्षित रखते हैं आप वह तकनीक बदलने के साथ खो जाता है। ब्लॉग और सोशल मीडिया पर पुराने अनगिनत बेहतरीन ऑडियो अब सुन नहीं सकते क्योंकि जिन जुगाड़ों का उपयोग करके वे अपलोड किये गए थे वे अब हवा हो गए। कबाड़खाना ब्लॉग पर कई ऑडियो हैं ऐसे। Pramod जी के कई अद्भुत ऑडियो हैं ऐसे जो बदलती तकनीक के साथ उड़ गए। पता नहीं दोबारा उनको सुन पाएंगे कि नहीं। मेरे कई फोटो भी ब्लागपोस्टस से गायब हैं इसी तरह।

हवा कम थी साइकिल में बहुत दिन खड़ी रहने के चलते। हवा भरवाने की सोचकर ही इधर की तरफ आये थे। पर वह दिखा नहीं। उसके बगल में दूध बेचने वाले ने बताया कि उसका कुछ तय नहीं कब आये। दूध वाला तीन कनस्तर में दूध लिए खड़ा था। एक का दूध यहां बेचने के बाद बाकी दो कनस्तर क्वार्टरों में बेचेगा।
चाय पीकर हम लौट लिए। रास्ते में और महिलाएं मिलीं जो सर पर टोकरी में करवा रखे बेचने जा रही थीं। मन्दिर के बाहर भिखारी और भक्त बढ़ गए थे। भिखारियों के मुंह अब सड़क की तरफ थे। हनुमान जी की तरफ पीठ किये भीख मांगने में तल्लीन थे वे लोग। उन्हीं के बगल में दो महिलाएं अपनी टोकरी जमीन पर रखे आपस में बतियाती हुई सुस्ता रहीं थीं। सूरज भाई उनके चेहरों का अपनी किरणों से अलंकरण करते हुए अपनी सुबह की शुरुआत कर रहे थे।

सुबह हो गयी है। आपका दिन मंगलमय हो। शुभ हो।

Monday, October 26, 2015

आत्म-अविश्वास के समय से गुजर रहे हैं हम लोग

कल ट्रेन में बैठ गए। ट्रेन चल दी। स्टेशन पर उद्घोषणा हो रही थी -'लखनऊ से चलकर जबलपुर जाने वाली गाड़ी.......' हम इतना ही सुने और फट से सोचे कहीं गलत गाड़ी में तो नहीं बैठ गए। बगल वाले से कन्फर्म किया तब चैन की सांस टाइप लिए।

हमारी प्रतिक्रिया आज के आपाधापी वाले समय की हमारी मन:स्थिति की परिचायक है। ट्रेन में बैठने के पहले हम पता कर लिए कि 'चित्रकूट एक्सप्रेस' ही है। कोच भी देखकर ही बैठे। लेकिन बाहर कोई घोषणा सुनकर सबसे पहले यही सोचे कि कहीं गलत गाड़ी में तो नहीँ बैठ गए। भयंकर आत्म-अविश्वास के समय से गुजर रहे हैं हम लोग।

टीटी आया। टिकट पूछकर चला गया। बगल के एक बच्चे को सीट के लिए दूसरे डब्बे में आने को बोला। बच्चे ने हमसे पूछा - 'मैं यहाँ नीचे चादर बिछाकर सो जाऊँ तो आपको कोई एतराज न हो तो।' हमने सोचा और कहा-'हमको क्या एतराज होगा। सो जाना।'

बात होने लगी बच्चे से तो पता चला विलासपुर से लखनऊ इम्तहान देने आया था। स्टॉफ सेलेक्शन बोर्ड का। इंजीनियरिंग किया है 2014 में घासीदास विश्वविद्यालय में। कुछ दिन नौकरी भी की पूना की एक फर्म में। 15000/- महीना मिलते थे। छोड़कर चला आया। अभी 11-12 वीं के बच्चों को गणित और फिजिक्स की कोचिंग पढ़ाते हैं। 8000/- प्रति बच्चा प्रति वर्ष की डर से। दूसरी कोचिंग का रेट 12000/- है। नई खोली तो कम रेट पर।

हमने पूछा-' इंजीनियरिंग करने के बाद स्टॉफ की नौकरी का इम्तहान देने गए थे। एमटेक करते। इंजीनियरिंग सर्विस का इम्तहान देते।' बोला-' एम करने के लिए इम्तहान दिए थे। गेट में 20000 से ऊपर रैंक आया। इंजीनियरिंग सर्विस के लिए कोचिंग करेंगे तब देंगे इम्तहान।

कोचिंग लगता है अपने देश में स्कूल/कालेज से ज्यादा जरूरी हो गया है। लगता है स्कूल में कुछ पढ़ाया ही नहीं जा रहा। बड़ी बात नहीं कि कल को कोई कहे सब स्कूल बन्द कर दो। सिर्फ कोचिंग से काम चलाओ।

वैसे एक तरह से यह हो भी रहा है। 'फिटजी' जैसे कोचिंग संस्थान अब स्कूलों में पढ़ाने लगे हैं। कम्पटीशन के विषय पढ़ाते हैं वे। स्कूल की फ़ीस से अलग उसके लिए फ़ीस लेते हैं। स्कूल भी उन बच्चों को सौंप देते है कोचिंग के हाथों- 'लो तुम भी कमाओ इनसे। हम अपनी फ़ीस तो वसूल चुके इनसे।'

बालक जिस विश्वविद्यालय ( घासीदास विश्वविद्यालय) में पढ़ा वहां याद आया कि बीएचयू के हमारे गुरु जी जे पी द्विवेदी के गुरु जी पी सी उपाध्याय रिटायरमेंट के बाद गए थे। बीएचयू में बहुत अच्छे अध्यापकों में उनका नाम था। हमारा एम टेक का काम उन्होंने ही कराया था। स्प्रिंगबैक एक्शन और फाइनाइट एलिमेंट मेथड।

बालक से पूछा तो उसने बताया–'वो एम टेक के बच्चों को पढ़ाते थे। सुना है सख्त बहुत थे। अब चले गए। उनका टर्म पूरा हो गया।'

बच्चे से और बात हुई तो पता चला कि मुजफ्फरपुर, बिहार का रहने वाला है। पिता जब वह एक साल का था तब नहीं रहे। उनकी जगह बहन को नौकरी मिली। माँ को पेंशन। आर्थक संघर्ष तो नहीं झेलने पड़े पर पिता की कमी तो महसूस होती ही रही।

इंटर के बाद बच्चे ने आकाश कोचिंग की। AIEEE के स्कोर के आधार पर यहां सरकारी कालेज में एडमिशन लिया। पढ़ने के दौरान भी 11-12 वीं के बच्चों को कोचिंग पढ़ाते रहे। 10000/- महीना कमाते थे। इससे अभ्यास भी बना रहा 11-12 के बच्चों को पढ़ाने का। उसी अभ्यास के चलते आज कोचिंग पढ़ा रहे हैं 11-12 के बच्चों को।
हम खाना खाने बैठे। उसको पूछा तो उसने कहा कि उसने स्टेशन पर खा लिया था। खाने के बाद टिफिन में मिठाई दिखी। खुद खाई, उसको भी दी। उसने ले ली। खाने लगा। हमने कहा-' इतना इश्तहार पढ़ते हो जगह, जगह कि अनजान लोगों का दिया न खाएं फिर भी तुम हमारी दी हुई मिठाई खाने लगे।' पहले तो वह थोड़ा सहमा पर जब हमने कहा ऐसे ही मजे ले रहे तो सहज होकर बोला-' बातचीत से अंदाज तो हो जाता है कि कौन कैसा है।' हमने फिर एक और पीस था मिठाई का वो आधा खुद खाया, आधा उसको खिलाया।

बिहार चुनाव के बारे में बात हुई तो बताया -'नितीश कुमार काम बहुत किया था। पर ढाई साल ने फिर पीछे चला गया बिहार। पहले दौर में तो लगता था आगे रहेगा नितीश कुमार। रिजर्वेशन वाला बयान से लगता है नुकसान हुआ होगा बीजेपी को। देखिये क्या होता है आगे। पर जो भी जिताएगा वो क्लीन स्वीप होगा।'

सुबह जब आँख खुली तो बच्चा उतर गया था। कटनी उतरना था उसको। वहां से विलासपुर जाना था।
हम भी आगे जबलपुर उतरे। गाडी समय पर ही थी।

कमरे पर आकर चाय पीते हुए पोस्ट लिख रहे। बाहर धूप निकली है। सूरज भाई का जलवा शानदार पसरा है। दूर सड़क पर गाड़ियां फर्राटे से आ–जा रहीं हैं। टिक-टिक करती घड़ी बता रही है दफ्तर भी जाना है बाबू।
हम जाते तैयार होने। आपका दिन शुभ हो। मंगलमय हो।

हमारे कमरे का दरवाजा, बरामदा, बगीचा और सड़क उस जगह से ऐसे दिखे जहां बैठकर हम पोस्ट लिख रहे।

Sunday, October 25, 2015

अरे बड़ी बदनामी हो रही है

आज घर से थोड़ा जल्दी चल दिए स्टेशन को। कल कुछ बवाल हुआ था। कुछ सड़कों पर आवा-जाही रोक दी गयी थी। सोचा पता नहीँ कौन सड़क पर कोई रोक दे और कहे इधर से नहीँ उधर से जाओ।

ऑटो गोविंदपुरी चौराहे पहुंचा तो एक पुलिस ने सिपाही हाथ देकर ऑटो रोका। बोला- 'हमको सब्जी मंडी छोड़ देना।' ऑटो वाले ने कहा-'हम सब्जी मंडी नहीं, गोविन्दपुरी स्टेशन जा रहे हैं।' इसके बाद वह बिना कुछ और पूछे ऑटो की अगली सीट पर बैठ गया -विनम्रतापूर्वक। उसके हाथ में बिस्तर जैसा कुछ सामान था। लगा शायद रात और दिन की लगातार ड्यूटी करके आ रहा है। इसके पहले भी शायद लिफ्ट लेकर ही आया हो।
जहाँ से स्टेशन के लिए मुड़ना था वहां ऑटो वालो ने ऑटो रोका। सिपाही उतर गया। आगे बढ़ गया। ऑटो आगे बढ़ाते हुए ऑटो वाले ने सिपाही को माँ की गाली दी। सिपाही उसकी आवाज 'सुनने की रेंज से बाहर' जा चुका था। ऑटो वाले की माँ शायद घर पर हो लेकिन उसकी गाली मुझे सुननी पड़ी।

स्टेशन पर पहुंचकर ऑटो वाला हमको छोड़कर और किराया लेकर वापस चला गया। रिक्शेवाले हमसे पूछने लगे-'किधर जाना है?' हमने कहा-' जबलपुर। चलोगे?' वो हंसने लगे। हम भी लग लिये और काम भर का हंस लिए। वे झाँसी पैसजर और चित्रकूट एक्सप्रेस से आने वाली सवारियों का इन्तजार करने लगे। हम प्लेटफार्म आ गए।

प्लेटफ़ार्म आने के पहले हमने इन्क्वायरी पर पूछना चाहा कि हमारा कोच किस जगह आएगा। दो महिलाएं थीं वहां। दोनों खाली थीं। हमने सोचा किससे पूंछे। फिर एक से पूछा तो उन्होंने बताया -'हम बता नहीं सकते।' यह तो हमें भी पता था कि वे बता नहीं सकती पर चूंकि हम थोड़ा जल्दी आ गए थे सो रेलवे की पूछताछ सुविधा का इम्तहान लेने लगे। एक महिला स्टॉफ ने जब 'हारी' बोल दी तो हमने दूसरी से भी पूछा ताकि उनको कोई शिकायत का मौका न रहे कि उनसे क्यों नहीं पूछा। मुझे पूरा भरोसा था कि उनको भी पता नहीं होगा। उन्होंने मेरे विश्वास की रक्षा की। (यह विश्वास की रक्षा वाला प्रयोग श्रीलाल शुक्ल जी ने एक लेख में किया था जिसमें उनकी पत्नी की चप्पलें मन्दिर में चोरी चली जाती हैं और वो लिखते हैं - चोरों ने विश्वास की रक्षा की)

प्लेटफार्म पर आये तो पता किया कोच प्लेटफार्म के अंत में आता है। हम वहीँ खड़े होकर गाडी का इन्तजार करने लगे। पता चला कि गाड़ी मात्र 6 मिनट लेट है और आने वाली है। ट्रेन का इन्तजार करते हुए गोविन्दपुरी का पुल देखते रहे। ढलान से उतरती हुई सवारियां ऐसे जा रहीं थीं मानो किसी फिसलपट्टी पर सरकती जा रहीं हों। कुछ गाड़ियां ऊपर की तरफ भी जा थीं।

इस बीच एक यात्री ने पास में आकर पूछा-'अंकल जी चित्रकूट एक्सप्रेस इसी प्लेटफार्म पर आ रही है?' हमने बताया -'हाँ आने वाली तो है। कहां जाना है?' वह बोला-' जाना है मैहर तक।' गाड़ी में आने में देरी से वह थोड़ा असहज सा हो रहा था। हमने कहा-' टाइम हो गया है। गाड़ी तीन किलोमीटर दूर सेंट्रल स्टेशन पर खड़ी है। जोर से आवाज देकर बुला लो।' इस पर वह हमसे सहज होकर बात करने लगा।

बात करते हुए वह बार-बार थूकता जा रहा था। हमने पूछा तो उसने बताया कि पान मसाला के दो दाने डाल लिए मुंह में उसी के चलते ऐसा हो रहा। यह भी बोला कि वह मसाला खाता नहीँ है। बस आज ही दो दाने खा लिए। हमने कहा-'ऐसे ही तो आदत पड़ती है।' इस पर उसने कहा-'हमारे साथ ऐसा नहीं होता। जो सोच लेते फिर वही करते हैं।'

पता लगा उसकी कानपुर में ससुराल है। लड़का 10 माह का है। उसका मंडन कराना है लेकिन परेशानी के चलते करा नहीं पा रहा। परेशानी के बारे में पूछने पर वह बोला -'ऐसे ही कुछ है। घरेलू।'

कुछ देर इधर-उधर की बात करते हुए उसने खुद ही बताया कि वह एक महीने से कानपुर में परेशान घूम रहा है। उसका छोटा भाई जो यहां डिग्री कालेज में पढ़ता है वह किसी लड़की को लेकर भाग गया था। उसी में कोर्ट कचहरी के चक्कर लग रहे हैं।

आगे बताया उसने कि लड़की के पिता ने लड़की के नाबालिग होने की बात कहकर रिपोर्ट लिखाई थी। पर मेडिकल में वह बालिग निकली और उसने मजिस्ट्रेट के सामने बयान दिया था कि वह अपनी मर्जी से गयी थी लड़के के साथ।

हमने कहा-'फिर अब क्या समस्या? जो थी वो निपट गयी।' इस पर वह बोला-' अरे बड़ी बदनामी हो रही है सब जगह।' पता चला कि लड़का बनिया है और लड़की अनुसूचित जाति की। शायद यही कारण रहा हो बदनामी का। पिता फ़ौज में हैं। शिलांग में पोस्ट हैं।'

और कुछ बात हो तब तक ट्रेन आ गयी। हम उसको छोड़कर ट्रेन की तरफ लपक लिये। अभी खाना खाकर लेटे हुए सोचा पोस्ट लिख दें।

ठीक किया न ? :)

जीना सीख रहे हैं, अब उनके बगैर हम

जीना सीख रहे हैं, अब उनके बगैर हम ,
जैसे आलू बिना बनाये, कोई सब्जी आलू दम।

पचासवीं बार साल में, जब वे मिलकर जुदा हुए,
उनने उनको 'बेवफा' कहा, उनने हंसकर कहा 'सनम'।
...
कमरे से उनने हांक लगाई, आओ जरा लड़ाई करें
हड़काया,कहा-आते हैं सबर करो,खाओ जरा सा गम।

कनपुरियों ने जरा त्यौहार में, भौकाल सा दिखा दिया,
हल्ला मचा टीवी में, कि चल गए कट्टे औ देशी बम।

-‪#‎कट्टाकानपुरी

Wednesday, October 21, 2015

मौज लेने का मौका कोई छोड़ता नहीं

फर्रुखाबाद कानपुर से 135 किलोमीटर दूर गंगा किनारे बसा शहर है। आलू की सबसे बड़ी मण्डी होगी शायद यह भारत की। फतेहगढ की छावनी भी प्रसिद्ध रही है।

शहर में घुसे तो बस स्टैंड के पास एक जगह ठेले पर भुने आलू बिकते देखे। आलू की सबसे बड़ी मण्डी है यहां और यहीं आलू को बालू में भूनकर और फिर सरेआम उसके कपड़े (छिलका) उतार कर उसको चटनी और नमक के पॅकेज के साथ बेंचा जा रहा था।

  जो आलू शहर को इतना राजस्व दिलाता है उसी की बीच शहर में ऐसी बेइज्जती खराब होती देखी।
...
वहीं जगह भूल गए। एक फोटो कॉपी की दूकान पर एक बुजुर्गवार एकदम खाली बैठे थे। उनसे रास्ता पूंछा तो लपककर आये। उनको डर सा भी कि उनसे पहले कोई दूसरा न रास्ता बता दे। खाली बैठे आदमी से रास्ता पूंछना किसी बेरोजगार को रोजगार देने सरीखा पुण्य का काम होता है।


डूबते सूरज की रौशनी में कुछ बच्चे छत पर पतंग उड़ा रहे। कुछ बच्चियां छत की दीवार पर झुकी हुई उन बच्चों को पतंग उड़ाते देख रहीं थीं। उनके पीछे उन बच्चियों की माताएं/मौसियां/चाचियाँ देख रहीं थीं कि उनकी बच्चियां क्या देख रहीं हैं। सूरज भाई इस सब कारोबार को अरबों मील ऊपर से सुलगते हुए देख रहे थे।
गंगापुल का रास्ता पूँछकर पुल पर आये। अभी तक हम इसको घटियाघाट के नाम से ही जानते आये हैं। सबसे पूंछा भी इसी नाम से। लोगों ने बताया भी। लेकिन घाट पर जो सूचना पट्ट लगा था उसमें oघटिया घाट का नाम × निशान से काटकर उसके आगे पांचाल घाट कर दिया गया था। पांचाल माने दौपद्री के डैडी के राज्य के नाम पर घाट का नाम रख दिया गया है। यह मेरे लिए बस एक सुचना की तरह रजिस्टर हुआ बकिया नाम मेरे जेहन में 'घटिया घाट' ही जमा हुआ है।

 गंगा पुल के ऊपर से ही गंगा जी की अतल जलराशि निहारते रहे कुछ देर। नदी में कुछ लोग नाव चला रहे थे। कुछ नहा रहे थे।पुल के पास का पानी हरा/नीला सा दिख रहा था। दूर का ललछौंहा सा होने लगा था। दूर के पानी का लाल होना यह बता रहा था कि सूरज भाई नदी में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। लगता है इस बात की भनक नदी के पानी को लग गयी थी क्योंकि नदी का पानी अपने को सूरज के रंग में रंगकर उसके स्वागत के लिए अपने को तैयार करने लगा था जैसे नई सरकार के आने की भनक मिलते ही नौकरशाही आने वाली सरकार के रुख के मुताबिक़ खुद को ढालने लगती है।

 घाट की तरफ देखा सूरज भाई पेड़ों के पीछे से मुस्करा रहे थे। पेड़ों के पीछे सूरज भाई को देखकर ऐसा लग रहा था मानों कोई फुलझड़ी जला दी हो किसी ने दिन में। पेड़ों पर किसी ने आग लगा दी हो और पेड़ हल्के-हल्के मुस्कराते हुए सुलग से रहे हों।

दीवार पर बबासीर के इलाज का विज्ञापन लगा हुआ था। एक ही इंजेक्शन से बबासीर के जड़ से इलाज की बात लिखी थी। 5 और 22 तारीख को डाक्टर के मिलने का दिन लिखा था। अब मुझे सूरज भाई के मुस्कराने की वजह समझ में आई। वे मुझे विज्ञापन देखते देख मुस्करा रहे थे और शायद कह भी रहे हों मजे लेते हुए--'अरे कहाँ जा रहे। कल जाना जड़ से इलाज करवाकर।' एक बार फिर मुझे लगा कि मौज लेने का मौका कोई छोड़ता नहीं।

वहां से चले और भतीजी के यहाँ पहुंचे। उसकी शादी के बाद पहली बार आज उसके घर आएं। इतने दिनों तक न आने का आत्मीय उलाहना सत्र दो मिनट में ही निपट गया।इसके बाद सबसे मिल-मिलाकर, खा-पीकर, नियमित आते रहने का और फोन करते रहने का वायदा करके अब वापस लौट रहे हैं। कानपुर अभी 160 किमी दूर है। :)

काली नदी



फर्रुखाबाद से 27 किलोमीटर पहले एक नदी मिली। भाईसाहब ने गाडी रुकवाई और घर से लाया हुआ गीला आटा लेकर पुल के बीच की तरफ चल दिए। बीच में खड़े होकर आटे की गोलियां बनाकर नदी के पानी में फेकते हुए बताने लगे-'यह काली नदी है। इसका पानी हमेशा काला रहता है इसी से नाम पड़ा काली नदी।'

पुल पर गुजरते ट्रक से पुल थरथरा रहा था। रेलिंग पर एक कौवा बैठा था। नदी के पानी में एक आदमी शायद मछली पकड़ रहा था।

मैं यह सोच रहा था कि अपने गाँव से 50 किलोमीटर दूर एक जल सम्रद्ध नदी को मैं पहली बार देख रहा था। उसका नाम भी पहली बार सुन रहा था।

कानपुर से फ़र्रुखाबाद वाया बिल्हौर

आज दोपहर कानपुर से निकले फरुखाबाद के गाँव निबऊ नगला के लिए। छोटी भतीजी सुधा के बेटे का मुंडन है। कानपुर से 42 किमी दूर बिल्हौर में चाय पीने को रुके। दुकान पर आलू बण्डा टाइप कुछ रखे थे स्टील की छेद वाली थाली में। नाम बताया गोला।

बेसन,आलू, प्याज, तेल और भट्टी की आंच का स्वादिष्ठ गठबंधन जो कि संसद के आकार की कढ़ाई में फलीभूत होता है। कीमत 5 रूपये का एक।

हम गोला खाते हुए चाय का इंतजार करने लगे। एक बच्ची वहां आई और प्लास्टिक के ग्लास में केतली ऊपर करके चाय डालने लगी सबके लिए। दस-बारह साल की रही होगी बच्ची। नाम बताया जूली। मेरे भाई साहब जो काफी दिन कानपुर से कन्नौज आते-जाते रहे ने बताया कि ट्रेन जब रूकती है स्टेशन पर तो सबसे ज्यादा चाय इसकी ही बिकती है। 

चाय देकर वह चली गयी तो दुकान वाले ने बताया सुबह कि इसके पिता ने सब बच्चों को चाय के धंधे में लगाकर भविष्य बर्बाद कर दिया। बड़ी बहन और एक भाई है वे चाय बेंचते हैं। जबकि पैसे की कमी नहीं उसके पास। एक और बेटा था। सुबह दुकान खोलने आ रहा था। एक्सीडेंट हो गया। नहीं रहा।

यहां बने बिल्हौर-हरदोई हाइवे के लिये जमीन ली गयी उसका पैसा खूब भी मिला। 20 लाख बीघे के हिसाब से। जमीन में लोग बने भी खूब और बिगड़े भी बेहिसाब। जिनकी जमीन बंजर थी वे तो फायदे में रहे। उपजाऊ जमीन वाले लुट गए।

दुकान पर एक बच्चा बैठा था। नाम बताया अंशु। कक्षा 9 में पढ़ता है। आजकल दशहरा की छुट्टी चल रही है। पता चला कि पिता रहे नहीँ उसके। माँ बीमार रहती हैं। एक भाई और एक बहन और हैं। स्कूल के बाद दुकान पर आकर बैठता है। दुकान वाले ने बताया -'जब इनकी छुट्टी होती है तब आकर बैठते हैं ये। कोई पाबन्दी नहीँ समय की।


कानपुर से 42 किलोमीटर दूर बिल्हौर आलू की और अनाज की बड़ी मण्डी है। शेरशाह सूरी के बनवाये ग्रैंड ट्रंक रोड पर स्थित है। शेरशाह सूरी का राज बहुत कम समय के लिए रहा भारत में। इतने कम समय में उसने इतने काम करवाये इससे पता चलता है कि कितना कुशल प्रशासक रहा होगा। यह खोज का विषय कि जब कलकत्ता से पेशावर सड़क बनवाई होगी शेरशाह ने तो उस समय कितने इंजीनियर हलाक हुए होंगे सत्येंद्र दुबे की तरह (स्वर्ण चतुर्भुज योजना में गड़बड़ी का विरोध करने पर हत्या हुई इनकी)।

पिछले दिनों बिहार की रिपोर्टिंग कर रहे रवीश कुमार ने सासाराम में शेरशाह के मकबरे के पास खड़े होकर लोगों से शेरशाह के बारे में सवाल किये थे। लोगों ने उसे कुशल प्रशासक और सच्चा धर्मनिरपेक्ष बताया था। बाबू जगजीवन राम सासाराम से ही चुनाव लड़ते और जीतते थे। परसाई जी ने एक लेख में जगजीवन राम जी तारीफ की थी। रक्षा मंत्री के पद पर उनका कार्यकाल बहुत अच्छा रहा।

हम जब साइकिल से भारत यात्रा के समय सासाराम पहुंचे तो लोगों ने मजे लेते हुए कहा-'सासाराम यहां के मच्छर, मक्खी और नाले के लिए प्रसिद्ध है।'

ओह कहां से चले थे। कहां पहुंच गए। पर फर्रुखाबाद अभी भी 40 किमी दूर है।

हिन्दी बोलने वाले समाज में लिखने-पढ़ने का चलन


बाकी भाषाओं का मुझे अंदाज नहीं पर हिंदी में कई लेखकों को लगता है कि जितना ज्यादा और अच्छा उन्होंने लिखा उसके मुकाबले उनको इज्जत कम मिली। तारीफ़ नहीं हुई। इसके बाद वो तारीफ़ के मामले में 'आत्मनिर्भर' हो जाते हैं।

बड़ी त्रासद स्थिति है यह। कभी बहुत लोकप्रिय माना जाने वाला लेखक अपने बारे में बताये कि वह बहुत लोकप्रिय रहा है।

हिंदी में पढ़ने-लिखने और उसको बढ़ावा देने की शायद बहुत अच्छी परंपरा न होना भी एक कारण रहा हो।
हिंदी में किताबें बहुत कम पढ़ी जाती हैं। खरीदकर तो और भी कम। किताबों का मंहगा होना, साक्षरता का कम होना, लेखकों का समसामयिक विषयों पर रुचिकर तरीके न लिखना बड़ा कारण रहा हो शायद।

या इसके अलावा और कोई कारण है किताबों के कई कम पढ़े जाने के।

ऐसा सुना है कि यूरोप व अन्य पश्चिम समाज में लोग खूब पढ़ते लिखते हैं। लेखक अपने लेखन की कमाई से जीविका चला लेते हैं। इसी तरह की अन्य बातें जिससे लगता है कि वहां लेखन की स्थिति बेहतर है।
इसके उलट अपने यहां खासकर हिंदी में मात्र लेखन से जीविका चलाना और आर्थिक रूप से सम्मानपूर्वक जीवन जीना बहुत दुष्कर कार्य है। बिरले ही लोग ऐसा कर पाते हैं।

लेखक द्वारा लेखन को पवित्र कर्म मानना और साहित्य को स्वान्ताय सुखाय मानने की भावना भी इसके पीछे कारण रही होगी।

इससे अलग मुझे लगता है अपने समाज का तानाबाना भी इसके पीछे एक कारक रहा। उत्सव धर्मी समाज जहां संयुक्त परिवार की परम्परा रही। चौपाल और बतकही के अड्डेबाजी का चलन रहा। लोग जब मौका मिला आपस में बतियाते रहे। जनसंख्या घनत्व अच्छा रहा। लोग कभी अकेले नहीं रहे। दुःख-सुख कहने सुनने और सुनाने के लिए कोई न कोई हमेशा उपलब्ध रहा। वीरों की जय जयकार की परम्परा रही। जिसने कुछ भी वीरोचितकार्य किया उसको खट से किसी देव के समकक्ष बता दिया। खराब कर्म किया यदि किसी ने और अगर वह कमजोर भी है तो फौरन उसकी निंदा कर दी।

जो भी था मन में बोल-बतियाकर फारिग कर दिया।लिख-पढ़कर अपने मन के भाव व्यक्त करने की जरूरत समाज में व्यापक रूप से लोगों को रही नहीं।

इसके उलट यूरोप और पश्चिम में लोग एकल समाज में बहुत जल्दी/पहले बदल गए। कम जनसंख्या घनत्व के चलते ऐसी व्यवस्थाएं कम रहीं होंगी कि लोग एक-दूसरे से कह-सुन सकें। लिखने-पढ़ने के चलन के चलते लोगों ने लिखना-पढ़ना शुरू किया और जारी रखा। लेखन को पवित्र काम और स्वान्ताय सुखाय न मानकर अभिव्यक्ति का माध्यम माना। कोई विषय वर्जित न माना और जमकर अभिव्यक्त किया अपने। यह भी एक कारण रहा होगा कि वहां लेखक अगर सफल है तो अपनी जीविका लेखन के बल पर चला सकता है।

पता नहीं ठीक से कह पाया कि नहीं पर कहना यह चाहता था कि अपने यहां अपने में सन्तुष्ट और आपसी घुलन मिलन से खुश रहने की समाज की भावना भी एक बड़ा कारण रही जिसके चलते लिखने-पढ़ने का चलन कम है अपने यहां-खासकर हिन्दी बोलने वाले समाज में। जो पीड़ित और सुविधा वंचित समाज रहा उसके लोग भी अकेलेपन के सन्त्रास से ग्रस्त नहीं रहे।

यह मेरा सोचना है। जरूरी नहीं कि यह सही ही हो और आप इससे सहमत ही हों।

Tuesday, October 20, 2015

चलते साथ मिलकर,चलेंगे साथ मिलकर

चलते साथ मिलकर,चलेंगे साथ मिलकर
तुम्हें रुकना होगा हमारी आवाज सुनकर।

ढोलक पर यह गीत हमने सुना दो दिन पहले इलाहाबाद से लखनऊ वापस लौटते हुए। बस से बारात वापस लौट रही थी। रास्ते में एक जगह एक ढाबे पर बस रुकी। ढाबे का नाम बटोही। वहां खाने-पीने और निपटने का इंतजाम था।

ढाबे के बाहर देखा एक आदमी एक बिजली के खम्भे के पास बैठा यह गीत गा रहा था। गाते हुए वह ढोलक बजाता काम पीटता ज्यादा जा रहा था। आते जाते लोग उसको पैसा देते जा रहे थे। कोई जेब में डाल दे रहा था कोई उसके साथ के बच्चे को पकड़ाता जा रहा था। गाने वाला इस सब से निर्लिप्त सा ढोलक बजाते हुये गाना निकालता जा रहा था।

इस बीच एक महिला ने एक दोने में मिठाई उसको पकड़ाई। गाने वाला रूक गया। मिठाई उसने हाथ से टटोली। फिर खम्भे के ऊपर बने सीमेंट के गोले में रख दी। उसके साथ का बच्चा पानी लेकर आया। लोगों ने अगले गीत की फरमाइश कर दी। एक ने कहा-'ओ दुनिया के रखवाले' सूना दो। ढोलक वाला ढोलक पीटते हुए गाने लगा।
बात हुई तो पता चला कि अनवर नाम है गायक का। छह साल का था जब आँख की रौशनी चली गयी। अभी 25 साल है उम्र। शादी हो गयी। पांच बच्चे हैं। गाने-बजाने का काम दो साल पहले से शुरू किया। साथ में जो बच्चा पैसे सहेज रहा था। वह शायद उसका बेटा था।

हमने उससे पूछा कि पांच बच्चे कर लिए। कैसे पालोगे उनको। बोला- 'अब नहीँ होंगे बच्चे। दवाई लिए हैं।'
और कुछ बात हो तब तक वह लोगों की फरमाईश पर ढोलक पीटते हुये गाना गाने लगा। जैसे वह ढोलक पीट रहा था उससे लग रहा था वह अपने कर्मपत्र और जनमपत्र के लेखक को पीट रहा हो।

 https://youtu.be/VvIWcFp3J9c

Sunday, October 18, 2015

इलाहाबाद -कुछ यादें



कल इलाहाबाद आये। साढ़ू के लड़के की शादी में।सिविल लाइन्स में रुकना हुआ। आज बारात विदा होने के पहले तक कमरे में आराम करते थे। विदा होने के ऐन पहले सिविल लाइन्स की यादों ने हल्ला बोल दिया। मन उन सड़कों को देखने का मचलने लगा जिनको हमने शायद उन दिनों भी कायदे से न देखा होगा जब हम यहां पढ़ते थे।

घूमने निकले तो एलचिको रेस्तरां दिखा। वैसे ही लगा जैसे पहले रहा होगा। लेकिन इस बीच कइयो खानाघर देख चुके तो उतना शानदार नही लगा जितना उन दिनों लगता रहा होगा। हम जैसी माली हालत वालों के लिए यहां खाना खाना विलासिता ही थी उन दिनों। 4 साल में बमुश्किल एक या दो बार आये थे वह भी सीनियर्स को फेयरवेल पार्टी देने वह भी चन्दा करके।

उन दिनों शनिवार को मेस शाम को बन्द रहती थी। ज्यादातर लड़के हॉस्टल के पिछवाड़े मिलने वाली किराये की साइकिलें लेकर सिविल लाइन्स आते। घूमते। पिक्चर देखते। फुटपथिया खाने की दुकानों पर बैठकर छोला भटूरा या कुछ और खाते और रात तक लौट जाते।

हम और भी घूमना चाहते थे पर बुला लिया गया। बस चलना चाहती थी।

कल और आज जितना देखा उससे लगा बहुत नहीँ बदला है इलाहाबाद खासकर सिविल लाइन्स। सड़क उतनी ही चौड़ी। सड़क के बाद दुकानों तक उतनी ही कच्ची जमीन। चाय की दुकानें वैसी ही। ब्रेड पकौड़े और साथ की चटनी का वही स्वाद। लकड़ी के बने रिक्शे वैसे ही सिंहासन नुमा और बैठने में होने वाली तकलीफ के चलते कुछ-कुछ स्त्री विरोधी सरीखे।

कल संयोग से शादी में ही Vimal Verma से मुलाक़ात हुई। दुल्हन विमल जी की के जीजा की भतीजी है। यह हमारी दूसरी मुलाकात थी। इससे पहले हमारी मुलाकात बम्बई में हुई थी जब हम Ashish के साथ बम्बई गए थे। एक रेस्त्रां में अभय तिवारी, Bodhi Sattva Shashi Singh Anil Singh और अन्य मित्रों के साथ मुलाकात हुई थी। काफी बातें हुईं थीं ब्लागिंग से जुडी। जन्मदिन था उस दिन मेरा। केक भी कटा। वे हिंदी ब्लागिंग के सबसे ज्यादा सक्रियता के दिन थे। ओह हाँ विमल जी ठुमरी ब्लॉग भी लिखते हैं। इस तरह कल दो ब्लॉगर निकट पारिवारिक सूत्रीकरण भी हुआ। विमल जी से Pramod Singh और ऊपर जिनके नाम लिखे उनके हाल चाल भी लिए गए।

बस चली तो इलाहाबाद की उन्ही जानी पहचानी सडक़ों को देखते हुए निकले जिनपर कभी साइकिल से टहलते थे। फाफामऊ पुल पर गंगा दर्शन हुए। Gyan Dutt जी शिवकुटी का इलाका भी दूर से देखा। उनको अपने गंगा तट वाली ई बुक दिसम्बर के पहले पूरी करनी है।

अब लंच पैकेट बंट गया है। सो पेट पूजा करते हैं। आप भी खा पी लीजिये। खा पी चुके हों तो थोड़ा आराम कर लीजिये।

साझा चादर के दो खिचवैये होते हैं

सबेरे का समय। सिविल लाइन्स की सड़कें अभी भी उतनी ही चौड़ी हैं जितनी आज से 30 साल पहले थी। सड़क किनारे यह परिवार झूंसी से आया है खिलौने बेंचने। बुजुर्ग महिला ने बताया-"अंकल जी हम लोग रात को आये थे।" महिला को शायद यह पता रहा हो कि शहर ने आदमियों को अंकलजी ही कहा जाता है।

बच्चा जमीन पर बिछी चादर पर लेटे हुए खिलखिलाते हुए खेल रहा था। उसकी माँ आधी चादर ओढ़े बैठी अपने बच्चे को खेलते देखती खुश सी हो रही थी। बाकी की आधी चादर उसका पति ओढ़े सो रहा था। बीच-बीच में करवट बदलता तो चादर थोड़ा उसकी तरफ खिंच जाती जिसको कि उसकी पत्नी फिर ठीक करती।

 कहते हैं पति-पत्नी गृहस्थी की गाड़ी के दो पहिये होते हैं। उसी तर्ज पर लगा मियां-बीबी के बीच साझा चादर के दो खिचवैये होते हैं।

संगम -नौका विहार

कल जब संगम गए तो विचार बना नौका विहार भी किया जाये। घाट पर सैंकड़ो नावें। किनारें खडी नावों और उनके बगल में ढेर गन्दगी। एक जगह एक जन नदी के एकदम किनारे पानी में बैठे लुटिया से नदी से पानी लेकर नहा रहे थे। एक पट्टी बंधे पैर को अपने बाकी 'शरीर बदर' सा किये थे जिससे कि उस पैर की पट्टी न भीगे। उनके साथ के यात्री नदी की गन्दगी को कोसते हुए उनके नहाने का इंतजार करते हुए समय बिता रहे थे।

हमको नाव के पास आते देखकर कई लोग हमारी तरफ लपके। उन लपके लोगों में से एक ने हमसे पूछा- "आप कैसे आये हो? कार से, ऑटो से, रिक्शा से, साइकिल से या पैदल?" हम सोचे भला हुआ यह नहीं पूछा कि एक तांग से आये या डेढ़ टांग से। उसने बताता कि आने वाले साधन के हिसाब से नावों के नम्बर लगते हैं वहां।


हमने किस सवारी से आये हैं यह बताने के पहले उससे पूछा-"सबेरे से कित्ती पुड़िया मसाला खा चुके हो?" वह बोला- पांच। उसका पूरा मुंह मसाला लाल हो चुका था। दांत पूरे घिसकर मसूड़ों से मिलने को बेताब। दिन में 20-25 पुड़िया खा जाता हमने टोंका तो बोला- "आपने कहा बस आज से बन्द।" ऐसे न जाने कितनी बार बन्द कर चुका होगा वह मसाला।

हमको जो नाव वाला बच्चा मिला उसका नाम था इंद्रजीत निषाद। झूंसी में रहता है। आठ साल से नाव चला रहा है। नाव खुद की है। जब बनवाई थी तब 45 हजार की पड़ी थी। आज 65 से 70 हजार रूपये की पड़ेगी नयी नाव।

नदी किनारे का नाव का हिसाब बताते हुए बताया इंद्रजीत ने कि हर साल 11 महीने ठेका होता है घाट का। इस बार ठेका बाबू सिंह को मिला है। अस्सी लाख का। संगम तक नाव ले जाने के लिए चाहे जितने का रेट तय हो पर नाव वाले को केवल अस्सी ही रूपये मिलते हैं (पिछले साल तक 60 रूपये मिलते थे)। सवारी और कुछ इनाम दे दे उसकी बात अलग।


इस बीच देखा सूरज भाई अपनी किरणों के गट्ठर को नदी के पानी में डालकर धो रहे थे। जैसे लोग नदी के पानी में अपने कपड़े पूरी लंबाई में फैलाकर धोते हैं वैसे ही सूरज भाई सारी किरणों को नदीं में फैलाये हुए थे। गंगा की लहरें नदी में पड़ी किरणों को हिला-डुलाकर और उजला बना रहीं थीं। सूरज भाई उन उजली किरणों को हवा के झोंको से सुखाकर पूरी दुनिया में भेजकर रौशनी फैला रहे थे।


गंगा और यमुना के संगम के पास उड़ते पक्षियों के बारे में इंद्रजीत ने बताया -"ये साइबेरियन पक्षी हैं। अक्टूबर के करीब हर साल आते हैं। जनवरी के बाद होली मनाकर चले जाएंगे।" उनके लिए खाने के बीज बेंचने वाले लोग नाव में वहां पूछते घूम रहे थे।

"यमुना का पानी नीला गंगा का मटमैला है। यमुना गहरी है। दिल्ली आगरा से आती है। गंगा का प्रवाह तेज है। गहराई कम है। उत्तराखण्ड, हरिद्वार, कानपुर होते हुए आती हैं। यहां संगम होता है दोनों का जहां सरस्वती हैं पर दिखती नहीं। जहां अभी हम हैं संगम के पास वहां गहराई 30 फ़ीट है। "---इंद्रजीत ने गाइड की तरह बताया।

कमाई का गणित बताते हुये इंद्रजीत ने बताया -" कुम्भ मेले के समय लोगों ने एक चक्कर के 32 हजार तक रूपये लिए। मैनेजर, ड्राइवर, नाव के ठेकेदार और नाव वाला सबमें बंटता है पैसा। सबसे कम मिलता है नाव वाले को। हमको उसमें 800 रूपये देकर अलग कर दिया। बाकी सब पैसा उनमें बंट गया।"

दक्षिण भारत से आने वालों से खूब पैसा वसूलते हैं ठेकेदार। एक-एक यात्री से 100-120 वसूलते हैं। 20-20 लोग बैठाते हैं पर नाव वाले को वही 80 रुपया फेरा देता हैं।हजारों नावें चलती हैं घाट पर।समझ लीजिये ठेकेदार की कमाई।


पिता राजगीर का काम करते हैं। एक मकान की खरीद में धोखा हो गया। कई लाख का नुकसान हो गया इसलिए इंद्रजीत नाव चलाने लगे। सबसे बड़े हैं घर में। इसके अलावा दो भाई और तीन बहनें हैं। एक बार पिता के साथ काम सीखा एक महीने। कन्नी पकड़ना सीख गए थे। पर फिर नाव चलाने लगे।

लेकिन सोचते हैं कि पिता का काम सीख लें और राजगीर का काम करें।

संगम पहुंचे । गंगा और युमना की लहरें एक दूसरे से गले मिल रहीं थीं। एक दूसरे को गर्मजोशी से हिला डुलाकर आगे पीछे कर रहीं थीं। दोनों का पानी अपने-अपने रंग को थोड़ा-थोड़ा छोड़ता हुआ एक नया मिलन का रंग बना रहा था। दो जीवनदायिनी नदियों का संगम हो रहा था।

संगम पर नावों पर पुजारी पूजा करा रहे थे। एक नाव पर कुछ महिलाएं संगम के पानी से स्नान करके गीले कपड़े उतारकर नए सूखे कपड़े पहन रहीं थीं। उनके साथ आये हुए लोगों से शायद उनके पर्दे के सम्बन्ध रहे होंगे। वे उन लोगों की तरफ घूँघट किये गीले ब्लाउज के ऊपर सूखे ब्लॉउज पहनते हुयी धोती की आड़ लेती हुई नाव पर सबके सामने कपड़े बदल रही थीं। इस तरह कपड़े बदलने का काम केवल महिलाएं ही कर सकती हैं।
हमसे बोला-"आचमन कर लीजिये। ।हम नदी का पानी अंजुरी में लेकर नदी को अर्पित करके बोले- 'हो गया हमारा आचमन।'

माघ महीने में जब ठेका खत्म हो जाता है तब नाव वालों को ठेकेदार को कमीशन नहीं देता होता। साल के एक महीने होता है ऐसा। सब कमाई नाव वाले की।अपने खुद के ग्राहक भी बनाये हैं इंद्रजीत ने। वे जब आते हैं तो उसको ही खोजते हैं। "आप परिवार सहित आइयेगा जनवरी में माघ मेले के समय। हम आपको घुमाएंगे।"- इंद्रजीत ने हमको न्योता दिया।

हम बोले-"तुम मसाला खाना छोड़ दो तब आएंगे।" बोला-"ऐसे ही आदत पड़ गयी। चार साल पहले एक जन के साथ रहते थे। वो एकाध दाना खिलाते थे। फिर हम भी खाने लगे।"

खुद की उम्र करीब 25 साल है इंद्रजीत की। बहन 17 साल की। उसकी शादी एकाध साल में करने के बाद तब खुद की शादी की योजना बताई इंद्रजीत ने। और भी न जाने कितनी बातें नदी, नाव,पानी और जिंदगी से जुडी हुईं।
लौटकर हम वापस आये। इंद्रजीत को पैसे देकर रिक्शे वाले संजय को खोजने लगे। बहुत देर तक वो मिले नहीं। हमें यह लग रहा था कि कहीं ऐसा न हो कि हम कोई दूसरी सवारी लेकर चलें जाएँ और संजय यहां हमारा इंतजार करते रहें।

खैर मिले संजय। रिक्शे पर बैठे हमारा इंतजार कर रहे थे वे। बोले-"हम तौ कहि दीन रहे साढ़े सात तलक इंतजार करब। वहै हम रह द्याखत रहन। स्वाचत रहन कहां द्यार हुई गए।"

हम दोनों ने संगम तट पर ब्रेड पकौड़ा खाये। चाय पी। पहले दो पकौड़े एक ही कागज में दिए दुकान वाले ने। हमने कहा-"अलग अलग दे देव यार। उसने वही कागज फाड़कर आधा-आधा करके थमा दिया एक एक पकौड़ा। हमने चटनी मांगी तो उसने एक अलग दोने में दी। हमने सोचा पहले ही चटनी मांग लेते तो एक कागज बच जाता फटने से।

संगम पर तरह-तरह की दुकानों पर अलग-अलग सामान बिक रहा था। एक जगह एक आदमी माइक पर अपने दर्द से राहत देने वाले तेल की खूबी बताते हुए उसे बेच रहा था। उसका वीडियो भी बनाया हमने। अलग से दिखाएंगे उसे।

इसके बाद हम संजय के साथ लौटकर वापस आये।उनके किराये से अलग दस रूपये उनकी बिटिया के लिए दिए यह कहते हुए कि उसको हमारी तरफ से दे देना।

Saturday, October 17, 2015

देखें माँ हमार दुल्हिन ज्यादा खूबसूरत है

इलाहाबाद आये आज। पहुंचते ही सोचा संगम चला जाये देखने। सिविल चौराहे पर रिक्शे लिए मिले संजय। पूछा तो बोले-100 रूपये किराया होई। हम बोले-चलो।

रिक्शा चला और संजय की कहानी भी। रात को रिक्शा लेकर निकले थे। कमाई सुबह तक कुल 60 रुपया। रिक्शे का किराया है 40 रुपया। मतलब कुल कमाई 20 रुपया। उसमें भी बोले-'भूख लगी रहे तौ दुइ दर्जन केला लिया। 30 रूपया के।खूब खायन। पेट ऐंठ गवा। फिर एक गैया बुलायेन। बाकी बचे छह केला वहिका खवा दीन।"

आठवीं पास संजय के एक लड़का (बड़ा)और दो लडकिया हैं। तीसरा बच्चा लड़की के बाद आपरेशन करा दिया पत्नी का। इसके पहले इसलिए नहीं कराया था कि उनकी इच्छा थी कि एक लरिका और हो जाए ताकि कुल दो लड़के हो जाएँ। नहीं हुआ तो आपरेशन करा दिया पत्नी का।

शादी का किस्सा रोचक बताया संजय ने। बड़े भाई की शादी तय हुई थी। लेकिन बारात के पहले भैया -"हम लड़की द्याखब। बिना देखे शादी न करब।देखि के करि दिहिन लड़की भैया। बोले-लड़की करिया है हम शादी न करब।"

जब फेल कर दिया बड़े भाई ने लड़की को और शादी से मना कर दिया तो लड़की के पिता लड़के माँ के पास आये और बोले-' हमारे घर तौ सब रिश्तेदार आ गए हैं। अब शादी मना कर दिहिस लड़का तौ एक लरिका तौ देंय का परी हमरी बिटिया ते बियाह के खातिर।'

अम्मा बोलीं-' ठीक बात। हमहूँ तौ देखि लेई कि हमार पतोहू कैसि उजरि साँवरि है। हम लरिका देब तुमका। फिर अपनी माँ के कहने पर संजय ने शादी की। बड़े भाई की शादी फिर छह साल बाद हुई।

इस बात को तुम्हारी पत्नी कभी कहती होंगीं कि तुम्हारे भाई ने उनको रिजेक्ट कर दिया। इस पर बोले संजय-"मन माँ भले होय मुला कहिन नहीं आज तक।"

भाभी के बारे में बोले-"रंग भले उनका साफ होय मुला देखें माँ हमार दुल्हिन ज्यादा खूबसूरत है।"

सास-बहू सम्बन्ध पर बोले-"खटर-पटर भले होय दूनो जनन माँ मुला कौन अपशब्द नाय कहि सकत केहू का।"
रिक्शा चलाने के अलावा संजय ग्लास फैक्ट्री में भी काम करते हैं। आंध्र प्रदेश के ओंगल में जाते हैं। पहले इलाहाबाद की त्रिवेनी ग्लास फैक्ट्री में काम करते थे। वह अब बन्द हो गयी। वहां कभी चोट लगती है तो ठेकेदार इलाज नहीं करवाता। फिर ऐसे में चले आते हैं इलाहाबाद। 9000/- बंधी तनख्वाह मिलती है।वो अच्छा काम है।
लड़का पढ़ने में मन नहीं लगाता। लौंडहई में पढ़ाई छोड़ दी। ट्रैक्टर चलाने लगा। पान मसाला खाने लगा। हाथ से बेहाथ हो गया। विकास नाम बताया लड़के का।

हमारा कहने का मन हुआ-"सब नाम का चक्कर है। जित्ते भी विकास नाम के हैं सब हाथ से निकल रहे हैं आजकल।"

बेटे का एक किस्सा बताते हुए बताया -" एक दिन लड़का ट्रैक्टर चला रहा था। सामने मोटरसाईकल आ गयी। उसको बचाने के चक्कर में ब्रेक मार दिया। पलट गया। नीचे गिरा ट्रैक्टर सहित।" इसके बाद बोले-" उ हमका फोन किहिस। घर माँ नाय बताइस।हम सुना तौ जिउ धकक् ते हुईगा। हम रिसिया गयेन। आंसू आयगे। हम बोले -बेटा घरै जाव।हम फौरन आयति हन। " वो घर गवा। तीन दिन बाद हम पहुंचेन तौ द्याखा इलाज जौन वो करवाइस रहे वहिते कौनौ फायदा नाय भवा। लै गयेन दूसर डाक्टर के पास। 35000 लाग के इलाज मा तब ठीक भवा।"

बाद में अपने साथ ले गए संजय अपने बेटे को। वहां मसाला मिलता नहीं था। आदत छूट गयी।

संजय बोले-"अपनी बेटियों को भी बहुत प्यार करते हैं। छोटी वाली को रोज एक रुपया देते हैं। वो गुल्लक में जमा करती है। जो चीज खुद खाते हैं। घर वालों के लिए भी ले जाते हैं। "

माँ-बाप का बहुत आदर करते हैं संजय। बोले-"उनके ही नाम ते चारि आदमी दुआरे आवत हैं। आजौ जौ उई हमका मारि देंय तौ हम चुप्पे मार खा लेब। पलट के जबाब नाय देब।"

संजय के पिता ट्रक चलाते थे। लेकिन लड़कों से बोले ट्रक मत चलाना। बहुत कठिन काम है। जब संजय की शादी हुई तब वे बारात के अगले दिन पहुंचे। बोले -'शादी तुम लोग तय करो।खर्च हम करब जो होई।'

लौटने तक एक घण्टे हमारा इंतजार करते रहे संजय। एक जगह रेड लाइट पर रुके। कोई सिपाही नहीं था। बगल का रिक्शा वाला बोला- 'निकल जाव कौन देखि रहा है।' इस पर संजय बोले-'देखि तौ कौनो नाई रहा। मुला कहे के खातिर क़ानून तोरा जाए।'

होटल पर विदा होते समय हमने किसी बात पर कहा-अरे तुम्हारी उम्र 32 साल है। अभी तो सौ साल की उमर तक पहुंचना है। बोले-'अरे बाबू जी आजकल आदमी 35-40 माँ लुढ़क जात है। 100 साल तौ बहुत बड़ी बात।'
हमने कहा अरे ऐसा न कहो। खूब जीना है अभी तुमको।

इसके बाद चले गए संजय । रिक्शे पर पैडल मारते हुए। हम चले आये होटल।

Thursday, October 15, 2015

क्या करें आदत पड़ गयी है


'अंशिका अपने पापा की मम्मी की मम्मी (परनानी) के साथ।'आज सुबह जरा जल्दी ही निकल लिए। गाड़ी कंचनपुर की तरफ मुड़ी आज। पटेल अपनी चाय की दुकान पर लकड़ियाँ चीर रहे थे। आगे दो महिलाएं बहुत आहिस्ते आहिस्ते टहल रहीं थीं। मृदु मन्द-मन्द मन्थर मन्थर टाइप।

रामफल यादव की पत्नी घर के बाहर कुर्सी डाले बैठी थी। तबियत बोली ठीक है। चार बजे उठ जाती हैं। बैठी रहती हैं। समय और वो दोनों एक दूसरे को काटते हैं। बता रहीं थीं कि उनका बेटा गुड्डू फल लाया है बेचने के लिए कल।

आगे पूजा पंडाल में देवी का वाहन अकेले बैठा था। रात को खूब भीड़ रही होगी। सुबह सन्नाटा।

आज भी अंशिका अपनी परनानी के साथ दिखी।बुजुर्गा ने बताया कि उनकी बिटिया के बेटे की बिटिया है अंशिका। हमने दुबारा कन्फर्म किया यह बात। बोली जल्दी शादी हो गयी सबकी इसलिए ऐसा। खुद की उम्र बताई पचासेक करीब। गड्ड-मड्ड हिसाब। मायका है मैहर में। लड़का जो था खत्म हो गया। बहू है उसके तीन बच्चे हैं। हमने पूछा -लड़का खत्म हुआ जल्दी तो बहू की शादी कर देती। बोली- 'उसकी बेटियां हैं। एक इत्ती बड़ी। दूसरी इत्ती बड़ी।'

अंशिका से नमस्ते करवाया। फिर बोली -'चलो जल्दी खाना बनाना है।'


चौराहे पर चाय की दुकान पर दो पुलिस वाले रात की ड्यूटी करके वापस लौटते हुए चाय पी रहे थे। शुक्लजी थे उनमें एक। सीहोरा के रहने वाले। पूर्वज मगहर से आये थे। रात ड्यूटी लगी थी नाके पर। नो इंट्री पर। शहर में देवी जागरण आदि के चलते बड़ी गाड़ियां 2 बजे तक छोड़ी जाती हैं। वैसे 12 के बाद छोड़ देते हैं।

शुकुल जी ने चाय के बाद मसाला मुखस्थ किया। मुंह के जबड़े वाले हिस्से पर लगता है उनका नियंत्रण कम हो गया है। अपने आप हिलने लगता है। ज्यादा हिलने पर मेहनत करके जबड़े पर नियंत्रण कर ले रहे थे।कुछ ऐसे ही जैसे विभिन्न पार्टियों के छुटभैये अपनी मर्जी से बयान जारी करते रहते हैं। हल्ला मचने पर बड़ा नेता उसका खण्डन करता है।

पान मसाला के लिए टोंका तो बोले -अब आदत पड़ गयी है। कल को कोई अपने समाज से पूछे अगर कि तुम्हारे यहां भ्रष्टाचार, हरामखोरी और चिरकुटई क्यों है तो क्या पता अपना समाज दांत चियारते हुए कह दे -क्या करें आदत पड़ गयी है।

चौराहे पर एक आदमी सर झुकाये अख़बार पढ़ रहा था। दूसरी तरफ एक आदमी टेलीफोन जंक्शन बॉक्स के आसन पर बैठा चाय पीते हुए दो बालकों को कुछ सिखा रहा था।

चाय वाले को चाय के लिए 10 रूपये दिए तो उसने 5 रूपये लौटाए नहीं। जमा कर लिए। फुटकर नहीं थे उसके पास।
 

आगे सड़क पर जोशी जी मिले। हमारे यहां से ही रिटायर्ड अधिकारी। आधारताल में रहते हैं। कृषि विश्वविद्यालय टहलने आते हैं। हमको साईकिल पर देखकर ताज्जुब किया। हमने उनके ताज्जुब को खत्म करने के बाद उनको भी साइकिल खरीदने का सुझाव दे दिया। घुटने के लिहाज से फायदेमंद बताया। बड़ी बात नहीं कुछ दिन में जोशी जी साईकिल सवारी करते मिलें।

जोशी जी बात करते हुए देखता एक बुजुर्ग हाथ में डंडा पकड़े बहुत आहिस्ते से चलते हुए आ रहे थे। बायां पैर आगे करते। धरते। फिर वह शायद दांये पैर से कहता होगा -आ जा भाई आ। जब दांया पैर आगे आ जाता तो बांया पैर उसको छोड़कर आगे बढ़ता और फिर कहता होगा -आ जा भाई आ।

बुजुर्ग अचानक रुक गए। सड़क किनारे धोती टटोलते हुए खड़े हो गए। छोटी वाली शंका का समाधान किया।

फिर आगे बढ़े। उनके चेहरे पर शंका समाधान के बाद का आनन्द भी जुड़ गया था। उन बुजुर्गवार को देखकर मुझे कथाकार हृदयेश जी के उपन्यास 'चार दरवेश' की याद आई जिसमें चार बुजुर्गों की कहानी है। उनमें से एक बुजुर्ग की शिकायत थी कि उनको पेशाब करने में दिक्कत होती थी।

एक जगह लिखा था -'यह आम रास्ता नहीं हैं।' लोग धड़ल्ले से उस रास्ते पर आ जा रहे थे।

सूरज भाई एकदम लाल गोले सरीखे दिख रहे थे। जैसे किसी ने कम्पास से गोला खींचा हो आसमान के माथे पर और फिर उसमें लाल रंग भर दिया हो। आसमान में माथे पर टिकुली से सजे हुए थे सूरज भाई। चिड़ियाँ ऊपर उड़ती हुई उनको ऊपर से देखते हुए चहचहा रहीं थीं।

कृषि विश्वविद्यालय के आगे दोनों तरफ खेत थे। खेतों पर खड़ी फसलें कोहरे की चादर ओढ़े सो रहीं थी। सूरज की किरणें चादर घसीटकर फसलों को जगाने की कोशिश सी कर रहीं थीं। खेत की फसलें फिर से कोहरे की चादर लपेट ले रहीं थीं।

फसल वही होती है लेकिन कोहरा रोज नया आता होगा। किसी बाली को कोहरे के किसी टुकड़े से लगाव हो जाता होगा। उससे बिछुड़ने पर वह दिन भर गुमसुम रहती होगी। कोई कहता होगा उसको पाला मार गया। लेकिन क्या पता वह कोहरे के टुकड़े के वियोग में उदास हुई हो। क्या पता बालियां कोहरे के विदा होने पर गाती हों:
अभी न जाओ छोड़ कर
कि दिल अभी भरा नहीं।
होने को तो यह भी हो सकता है कि कोहरे के टुकड़े फसल से विदा होते हुए गाना गाते हुए फूटते हों:
हमें तो लूट लिया मिलके हुस्न वालों
गोरे-गोरे गालों ने,काले-काले बालों ने।
आगे रास्ते पर एक मन्दिर ( अवैध ही होगा ) सड़क पर नया बना था। एक दूध वाला वहां रूककर मन्दिर की मूरत को वाई-फाई प्रणाम कर रहा था। पूजारी उसके और उसकी मोटर साइकिल के टीका लगा था। दूध वाला उसको कुछ दक्षिणा दे रहा था। एक अवैध निर्माण का बजरिये धार्मिक श्रद्धा वैधानिकरण हो रहा था। आगे एक मजार भी बनी थी। उसका भी ऐसा ही हुआ होगा।

एक आदमी सड़क किनारे खड़े हुए सूरज की तरफ देखते हुए कसरत कर था । वह अपने हाथ इतनी तेजी से हिला रहा था मानो अपने कन्धे से हाथ उखाड़कर सूरज की तरफ फेंकते हुए कहने ही वाला है-कैच इट।

लौटते में बच्चे स्कूल जाते हुए मिले। दो बच्चे कल के मैच के बारे में बात कर रहे। मेस के पास दो बच्चियां साइकिल पर जा रहीं थी। उनके बीच में एक लड़का मोटर सायकिल पर उनसे बात करता हुआ जा रहा था। बच्ची उससे कह रही थी--'अच्छा वो तो मेरे चाचू हैं। उन्होंने मुझे कुछ बताया नहीं इस बारे में।'

अब बताओ भला चाचू अपनी भतीजियों को इस बारे में बताने लगे तब तो हो गया। बच्ची और बच्चे आगे चले गए। हम मेस की तरफ मुड़ गए। कमरे पर आये। अपनी एक कविता अपनी आवाज में पोस्ट की जिसे मैंने कल रिकार्ड किया था। फिर पोस्ट लिखने बैठे।

अब आप मजे कीजिये। अच्छे से रहिये। कितना भी व्यस्त रहें मौका निकाल कर मुस्कराइए जरूर। थोड़ा मेरे हिस्से का भी मुस्करा लीजियेगा। ठीक न! चलिए दिन आपका चकाचक बीते। मस्त । बिंदास|