Monday, May 12, 2025

कुलच्छनी बुड्ढे

 रागदरबारी उपन्यास में अपने पहलवान पिता कुसहर परसाद का चरित्र चित्रण करते हुए उनके काबिल बेटे छोटे पहलवान कहते हैं :

“यह बुढ्ढा बड़ा कुलच्छनी है। इसके मारे कहारिन ने घर में पानी भरना बन्द कर दिया है। और भी बताऊं? अब क्या बताऊं, कहते जीभ गंधाती है।“
1968 में प्रकाशित इस उपन्यास के बुड्ढे आज अलग अंदाज़ में मौजूद हैं। आप अपने हिसाब से देख सकते हैं उनकी हरकतें लेकिन उनके ख़िलाफ़ कुछ कह कहने की कोशिश न करें। आज बुड्ढे भूतपूर्व पहलवान की तरह अकेले नहीं हैं। उनके पास उनकी सेनायें हैं। उनके एक इशारे पर टूट पड़ने वाली सेनायें। जब उनकी सेनायें आप पर हमलावर होंगीं उसी समय वे कुलच्छनी बुड्ढे विश्व शांति और वसुधैव कुटुम्बकम की बात कर रहे होंगे।

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