Saturday, July 12, 2025

कांवड़ धारी बच्चे

 


गाजियाबाद रेलवे स्टेशन पर कुछ कांवड़ धारी बच्चे दिखे। शंकर जी की फ़ोटो लगी टी शर्ट, बरमूडा टाइप नेकर पहने कांवर टांगे बच्चे ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। हाथ में स्मार्टफोन लिए बतिया रहे थे।

पास गए तो देखा उन बच्चों के साथ एक बच्ची भी थी। पता चला हरिद्वार तक ट्रेन से जाएंगे। लौटेंगे पैदल ,जल लेकर। चार-पांच दिन लगेंगे वापस लौटने में। तय नहीं किया वापसी में कहां-कहां रुकेंगे।
बच्चों में उत्साह है। उनके साथ उनके परिवार के लोग भी हैं लेकिन उनके पास कांवर नहीं हैं। बातचीत से पता लगता है कि वे भी जाएंगे हरिद्वार ।
पढ़ाई के बारे में पूछने पर बच्ची ने बताया -"बाहरवीं करके छोड़ दी पढ़ाई। भैया लोग भी ऐसे ही हैं। पढ़ाई छोड़ चुके हैं।
"खाली हैं इसीलिए कांवर यात्रा पर जा रहे हैं।" -मैं ऐसी धारणा बनाता हूँ। हर साल कांवर यात्रा, तीर्थ यात्रा पर जाने वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। लोग इसे भक्ति भाव से जोड़कर देखते हैं। मुझे लगता है भक्तों की बढ़ती संख्या इस बात का प्रतीक है कि लोगों के पास काम नहीं है। पढ़ाई छूट गयी है, काम करते नहीं, खाली हैं तो तीर्थ यात्रा ही सही। सरकार भी कांवर यात्रा करने वालों के लिए खास इंतजाम करके उनको यात्रा के लिए उकसाती रहती है। इसी बहाने अपना एजेंडा भी सेट करती रहती है।
कांवर धारी युवाओं को देखकर लगा कि ये आधुनिक श्रवणकुमार हैं जो अपने कंधे पर सरकारें ढो रहे हैं। सरकारें इनकी कांवरो की बँहगियो पर बैठी आनंद कर रही है। ये युवा आंख मूंदकर , अपने भविष्य से निर्लिप्त, अपने बुजुर्गों को अपने कंधे पर लादे घूम रहे हैं ।
" वापसी ने चार-पांच दिन की यात्रा में कहाँ रुकना है, कहाँ खाना-पीना है इसका कोई प्लान बनाया है?" पूछने पर बच्ची ने बताया -"कोई प्लान नहीं बनाया। जहां रात हो जाएगी , जब थक जाएंगे, रुक जाएंगे।"
"पहले भी गए होंगे, पैदल चलने में पैर में छाले पड़ जाते होंगे" इस सवाल के जवाब में एक महिला ने कहा-"सच्चे भक्त छाले नहीं पड़ते।" उसके साथ की महिला ने उसकी बात को काटते हुए कहा -"शुरू में पड़ते हैं, फिर ठीक हो जाते हैं।" अपने साथ के बच्चे की तरफ इशारा करते हुये उस महिला ने कहा -" पिछली बार इसकी चप्पल चोरी हो गयी थीं। इसके छाले पड़ गए थे।"
बच्चों के साथ उनके घर वालों का उत्साह देखकर लगा कि कांवड़ यात्रा उनके लिए घर से बाहर निकलने का एक जरिया है। धार्मिक स्वरूप होने के कारण यात्रा पर जाने को सामाजिक स्वीकृति भी मिली हुई है।
कांवर यात्रियों से और कुछ बात करते तब तक ट्रेन आ गयी। आसपास के स्टेशनों से कानपुर आने वाली पैसेंजर गाड़ियों में दूधिया लोग दूध के डब्बे टांगे रहते हैं उसी तरह कई कांवर ट्रेन की खिड़कियों से टंगी थीं।कांवरियों की ड्रेस से दूर से पता चल रहा था कि वे हरिद्वार जा रहे हैं। टीटी शायद उनसे टिकट के बारे में पूछता भी नहीं होगा।
कांवर यात्रियों को लेकर ट्रेन हरिद्वार की तरफ चल दी। हमारी गाड़ी भी आ गयी। हम गाड़ी में बैठ गए। गाड़ी में कोई कांवर वाला दिखा नहीं।

https://www.facebook.com/share/p/1B32vssrN5/

No comments:

Post a Comment