Wednesday, July 23, 2025

बारिशों में पतंगे उड़ाया करो


 कालोनी के गेट के बाहर ही एक आदमी सड़क पर ' देशी कमोड पर दिव्य निपटान' मुद्रा में बैठा अपने मोबाइल को शीशे की तरह देखता बैठा था। पास से देखने पर लगा किसी को हड़काते हुए कुछ कह रहा था। पता दूसरी तरफ़ कौन था लेकिन मुझे लगा क्या पता अमेरिका के राष्ट्रपति को हड़का रहा हो -"दो दिन हुए हमारे यहाँ उप राष्ट्रपति जी के इस्तीफ़े को, अभी तक तुम्हारा ट्वीट नहीं आया। क्यों नहीं किया अभी तक ट्वीट -'हमारे कहने पर हुआ इस्तीफ़ा।'"

इस पर शायद उधर से जबाब आया होगा -"भाई साहब, हमको हमारी हथियार लॉबी ने लड़ाई करवाने, रुकवाने के ट्वीट करने के लिए ही अधिकृत किया हैं। और कुछ करेंगे तो वे लोग नाराज हो जायेंगे।"
हम भाई साहब को वहीं बैठा छोड़कर आगे बढ़ गए। उपराष्ट्रपति जी के इस्तीफ़े पर इतने अधिक बयान आ चुके हैं सचाई पता करना मुश्किल है। लेकिन हर बयान महाभारत काल में धौम्य ऋषि द्वारा पाण्डवों को अज्ञातवास के पूर्व आशीर्वाद एवं उपदेश से जुड़ी है:
"राजसेवक कितना ही विश्वस्त क्यों न हो ,कितने ही अधिकार उसे क्यों न प्राप्त हों,उसको चाहिये कि सदा पदच्युत होने के लिये तैयार रहे और दरवाजे की ओर देखता रहे। राजाओं पर भरोसा करना नासमझी है।"
हर कालोनी में काम करने वाले जाते दिखे। कारखानों में जिस तरह कभी कामगार जाते दिखते थे उसी तरह आजकल कालोनियों में घरों में काम करने वाले जाते दिखते हैं। कारख़ाने भले न नए खुल रहे हों लेकिन कालोनियाँ तो आबाद हो रही हैं।
एक कालोनी का पार्क दिखा तो हम घुस गए उसमें टहलने के लिए। टहलने वाले कुछ लोगों ने जय श्री राम कहते हुए बाक़ी के साथियों से विदा ली। टहलते हुए एक बुजुर्ग ने, जिन्होंने घुटने पर बैंड पहन रखा था और थोड़ा तकलीफ़ के साथ टहल रहे थे, अपने साथ टहलने वाले से बताया -"आज हमने कुछ शेयर जो प्रॉफिट में थे, उनको बेच दिया। इसके बाद कुछ लाल निशान वाले शेयर खरीद लिए।" साथ वाले ने कुछ शेयर खरीदने के बारे में राय मांगी। बुजुर्ग ने कहा -"हम तुमको एक लिंक भेंजेंगे। उसको देखकर स्टडी करना, फिर ख़रीदना।"
पार्क का एक चक्कर लगाकर हम बाहर आ गए। दूसरे मोहल्ले के पार्क में पाँच सौ कदम टहल के आना मुझे 'सर्जिकल टहलाई' सरीखा लगा। किसी की हिम्मत नहीं हुई कि हमको रोक सके।
लौटते हुए तिराहे की फुटपाथ पर एक आदमी बासी रोटी रखता दिखा। एक-एक करके चार रोटी उसने फुटपाथ पर रखी। उसको खाने के लिए गाय, कुत्ते या कबूतर कोई नहीं था वहाँ। शायद बाद में आयें खाने।
बासी रोटी से हमको याद आया कि मीना कुमारी को बासी रोटी खाना पसंद था । मीना कुमारी के बारे में और कुछ सोचते तब तक सामने फुटपाथ पर भरतपुर से आया प्रवासी दिख गया। गर्मी से बचने के लिए वह पंखा झल रहा था। उसको पंखा डुलाते देखकर हमको महाकवि भूषण जी की पंक्ति याद आयीं :
"तीन बेर खाती थी वे, तीन बेर खाती हैं।
विजन डुलाती थी वे, विजन डुलाती हैं।"
(पहले जो रानियाँ बड़े महलों में रहती थीं और दिन में तीन बार भोजन करती थीं, वे अब जंगल में तीन बेर खाकर दिन काट रही हैं , जिन पर पंखे झले जाते थे, वे विजन (जन विहीन विजन मने जंगल) में डुलाती मतलब डोलती फिरती हैं ।)
अकेले पंखा डुलाते देखकर हमने परिवार के बारे में पूछा। बताया बनवारी ने -"वो लोग सेक्टर 24 में चले गए। वहाँ हमारे गाँव के और लोग हैं। उनके साथ है परिवार।" काम के बारे में बताया -"बरसात में कोई काम मिल नहीं रहा। गाड़ियाँ एकाध बिक जाती हैं बस।"
बगल के लोगों से लड़ाई होती थी बनवारी के परिवार के लोगों की। उनमें कोई नहीं दिखा। हमने पूछा तो बताया बनवारी ने -"हमने उनको भगा दिया।"
हमने बनवारी का फोटो लिया तो बदले में उसने पूछा -"रक्षाबंधन कब है?" हमने बताया -"9 अगस्त को है।" बातचीत से लगा कि राखी बेचने का प्लान है बनवारी का।
बारिश में बाजार में किसी शेड के नीचे जाकर बैठ जाते हैं, सामान यहीं पालीथीन से ढँका रहता है। इतनी असुरक्षित जिंदगी जीने के बावजूद उसके चेहरे पर कोई चिंता का भाव नहीं दिख रहा था। या शायद हमको ही ऐसा लगता हो। तमाम बातें हम अपने पूर्वाग्रह के हिसाब से समझते हैं।
मोड़ के बाद फिर एक पार्क दिखा। हम उसमें भी टहल लिए। एक जगह चाँदनी के पेड़ से सफेद फूल ज़मीन पर पड़े हुए थे। टहलने वाले लोग उनको रौंदते हुए टहले होने। सफेद फूलों की चटनी सी बनी हुई थी टहलने के रास्ते में। रौंदे हुए फूलों को देखकर मुझे गाजा, सीरिया में मारे जाते लोगों की याद आयी। वे भी ऐसे ही रौंदे जा रहे होंगे।
चाँदनी के फूलों से Gyandutt जी की याद आयी। पिछले तीन दिनों से वे जो भी पेड़ देखते हैं उनमें से एक बारे में लिखते हैं। मैंने उनको फ़ोन करके बात की। आज के पेड़ के बारे में पूछा। और बातें हुईं। ज्ञान जी ने अपने घर के पास से गुजरने वाली रेलगाड़ियां देखने के लिए मचान भी बनाया था। पता चला बारिश में तहा के रख दिया। डुओलिंगों से फ्रेंच सीख रहे थे वह भी स्थगित है आजकल। अब फिर शुरू करेंगे। ज्ञान जी ने ब्लागिंग के दिनों से जितने काम करने के बारे में सोचे हैं उतने शायद फलाने जी ने भी नहीं सोचे होंगे। लेकिन अच्छी बात यह कि ज्ञान जी ने अपने किसी इरादे पर अमल नहीं किया सिवाय मचान पर चढ़ने के। उस पर से भी उतर आए। कई किताबों भर की लिखाई करने के बावजूद अभी तक ज्ञान जी ने किताब छापने का इरादा तक नहीं किया।
ज्ञान जी बात करते-करते पानी बरसने लगा। हम आगे की टहलाई स्थगित करके कालोनी के पीछे के गेट से कालोनी में घुस गए। मन किया बारिश में भीगते हुए टहला जाये। लेकिन मोबाइल, घड़ी भीगने की बात सोचकर शेड के नीचे आ गए। कुछ देर बारिश होते देखते रहे। टहलते रहे। राहत इंदौरी का शेर याद आया :
"जिंदगी क्या है ख़ुद ही समझ जाओगे,
बारिशों में पतंगे उड़ाया करो।"
शेर को याद करके हमने सोचा कि जो इंसान मोबाइल, घड़ी के भीगने की बता सोचकर बारिश में भीगने से परहेज करे वो बारिश में पतंग क्या उड़ाएगा?
कुछ देर और टहलने के बाद हम टहलाई स्थगित करके लिफ्ट से ऊपर आ गए। घर की बालकनी से बारिश के नजारे देखते हुए सोचते रहे कि बनवारी अब पंखा डुलाना छोड़कर मार्केट के किसी शेड के नीचे चला गया होगा।

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