Wednesday, July 30, 2025

जिंदगी :रिवर्स गियर - कनक तिवारी

कनक तिवारी (Kanak Tiwari) जी फेसबुक के उन कुछ लोगों में हैं जिनकी हर पोस्ट मैं पढ़ता हूँ। अध्यापक, वकील, कांग्रेस के भूतपूर्व कार्यकर्ता (महासचिव), मध्यप्रदेश हाउसिंग बोर्ड के चेयरमैन, छत्तीसगढ़ के महाधिवक्ता जैसे तमाम सांसारिक पद उनसे छूट गए हैं लेकिन इन पदों पर कार्य करते हुए जो जीवन अनुभव उनको मिले हैं वे उनके लेखन में रच-बस गए हैं।
85 पार के कनक तिवारी जी अपने जीवन के विविध अनुभवों को साझा करते हैं तो उनके स्मृति समृद्ध जीवन का अंदाजा लगता है। उनके अनुभव संसार में देश के राष्ट्रीय नायक जवाहरलाल नेहरू , शास्त्री जी, राजीव गांधी , उनके विद्या भैया, अरविंद नेताम जैसे राजनीति से जुड़े लोग शामिल हैं तो कला, समाज, पत्रकार जीवन के ऐसे तमाम लोग भी आते हैं जिनका नाम ही उनकी पहचान हैं। इनमें मायाराम सुरजन जी हैं तो शंकर गुहा नियोगी भी हैं। पर्यावरण विद अनुपम मिश्र जी हैं तो कवि उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल जी भी हैं। जुबली स्टार राजेश खन्ना हैं तो अजात शत्रु रमन सिंह जी भी हैं (जिनको यह किताब समर्पित है) । न जाने कितने लोग हैं उनके यादों के ख़ज़ाने में जिनसे उनके जीवन का अनुभव संसार निरंतर जगर-मगर करता रहता है।
कनक जी अपने बचपन से लेकर आज 85 पार की उमर तक के लोगों, घटनाओं से जुड़े अनुभव जिस भाषा में लिखते हैं वह अद्भुत है। यह भाषा उनके पास उनके अध्ययन, अनुभव और अभ्यास की तपस्या से आयी होगी और आने के बाद उनके ही पास ठहर गई। उस भाषा का और कहीं जाने का मन नहीं करता होगा। भाषा को भी लगता होगा कि और कहीं उसको इतनी इज्जत, आदर और लाड़-प्यार और दुलार नहीं मिलेगा। कनक जी के मन-आँगन में खिलखिलाती हुई मजे करती है यह भाषा। जिस तरह की भाषा अपने लेखन, संस्मरण में कनक जी प्रयोग करते हैं वह अद्भुत है, दुर्लभ है। उसका बयान नहीं किया जा सकता, उसकी नक़ल नहीं की जा सकती। बस गूँगे के गुड़ की तरह उनका आनंद लिया जा सकता है। कहते हैं कि अमेरिकन पेय कोका कोला बनाने का फार्मूला दुनिया में सिर्फ दो लोगों को पता है। लेकिन कनक तिवारी जी के लेखन की भाषा का फार्मूला तो कनक जी को भी नहीं पता होगा। वह लिखते समय, बोलते समय अपने आप उनके पास आ जाती होगी।
संविधान, आदिवासी जीवन, गांधी जी, आत्मीय संस्मरण और जीवन के विविध पहलुओं पर जितना विपुल लेखन कनक तिवारी जी ने किया है उसको देखते हुए उनको लेखन पर देश-प्रदेश के तमाम साहित्यिक सम्मान मिलने चाहिये । लेकिन शायद तरफ़ उनकी उदासीनता और सम्मान देने वाली संस्थाओं की उदासीनता दोनों ने मिलकर काम किया और अपनी साजिश में सफल रहे।
कनक जी लेखक के साथ वक्ता भी भी अद्भुत हैं। संविधान जैसे ठस-ठोस, नीरस समझे जाने वाले विषय पर भी उनके व्याख्यान सुनकर उनकी वक्तृत्व क्षमता का अंदाज़ लगता है। उनका लेखन तो विपुल मात्रा में उपलब्ध है लेकिन उनके वक्तव्य और होने चाहिए। बोलते हुए जिस चुटीली भाषा और शरारती से लगने वाले अंदाज़ में ख़ुद से, समाज के बड़े लोगों से मजे लेते हुए वे अपनी बात कहते हैं वह अद्भुत है। बानगी के लिए उनका संविधान पर एक भाषण का लिंक टिप्पणी में दिया है। सुनिए , ज्ञान के साथ आंनद वर्धन होगा।
कनक तिवारी जी अपनी लिखी किताबें ख़ुद से लोगों भेजते रहे हैं। कुछ मुझे भी भेजी हैं। कुछ मैंने खरीदी भी हैं। इसके चलते मेरे पास उनकी एकाध किताबों की दो प्रतियां भी हैं।
पिछले दिनों कनक तिवारी जी ने अपने जीवन से जुड़े कुछ संस्मरण अपनी नई किताब "जिंदगी:रिवर्स गियर" में प्रकाशित किए हैं। कुल मिलाकर 75 लेख हैं इस किताब में। इनमें से अधिकतर उनकी फेसबुक पोस्ट में पढ़ चुके हैं हम। लेकिन उनको किताब के रूप में पढ़ना अलग ही अनुभव हैं। इन संस्मरणों में उनकी चुटीली, खिलंदड़ी भाषा उनके जीवन के अनुभवों का जो इंद्रधनुष रचती है उसको बयान करना मुश्किल है। सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है।
कनक जी के लेखन की ख़ासियत में से एक यह भी है कि वे अपने मजे ख़ुद लेते चलते हैं। इसके चलते किसी दूसरे से वह अपनी बुराई का मौक़ा छीन लेते हैं।यह उनके लेखन में वकालती कौशल की ख़ूबसूरत कीमियागिरी है।
किताब की भूमिका में वे लिखते हैं :
" कोई आत्मकथा लिखे तो गांधी की तरह लिख सकेगा या नेहरू की तरह तरह की की भी आत्मकथा लिखने के लिए उसके पास जीवनानुभव हींगे भी? हम कितना भी उछलें। बैठे तो इलायची और खड़े हुए तो लौंग। इससे ज्यादा की मेरी हद या सीमा नहीं।"
"बैठे तो इलायची और खड़े हुए तो लौंग" जैसे प्रयोग कनक जी के अपने हैं। उनके लेखन में जगह-जगह दिखते हैं।
किताब में राजनीति से जुड़े तमाम किस्से भी हैं। आज की राजनीति और गए जमाने की राजनीति का अनायास तुलनात्मक विवरण है।
कनक तिवारी जी उस पीढ़ी के नुमाइंदे भी हैं जो राजनीति में रहते हुए भी सिर्फ़ अपने फायदे के लिए नैतिक मूल्यों से समझौता करने की बजाय फ़ायदे को ठुकराने का चुनाव करती है। छत्तीसगढ़ सरकार के महाधिवक्ता पद पर रहते हुए भूतपूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के खिलाफ राय देने की कांग्रेसी सरकार की इच्छा पूरी करने के बजाय उन्होंने महाधिवक्ता पद छोड़ देने का चुनाव किया।
जिस भी पद पर रहे लेकिन आत्मसम्मान, लोकजीवन से जुड़ाव , अपने प्रति विश्वास के साथ एक ठेठ इंसान की खुद्दारी कनक जी के साथ हमेशा बनी रही। इसके चलते जीवन में कई उपलब्धियों के अवसर छूटे भी। माधव राव सिंधिया से जुड़े संस्मरण को पढ़कर इसका अंदाजा होता है जब वे मंच से सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता से जोड़कर सिंधिया परिवार के समझौतापरस्त आचरण की खिंचाई कर रहे थे और मंच पर सिंधिया जी चढ़ रहे थे। तालियाँ बज रहीं थीं। यह अभी तक साफ़ नहीं हुआ कि तालियाँ सिंधिया जी के लिए थीं कि कनक जी द्वारा सिंधिया परिवार की खिंचाई के लिए। लेकिन यह जरूर हुआ कि आने वाले समय में कनक तिवारी जी के राजनीति आगे बढ़ने के रास्ते संकरे हुए और बाद में शायद बंद भी।
मोतीलाल वोरा जी को याद करते हुए उनके संस्मरण का एक अंश उनके सहज और शरारती , हास्य बोध की बानगी के रूप में :
"वोरा एक प्राइवेट कंपनी दुर्ग रोडवेज के बाद में मैनेजिंग डायरेक्टर हो गए थे। वह उनका व्यवसायिक संदर्भ है। बाद में मोतीलाल वोरा केंद्र में नागरिक उड्डयन मंत्रालय के मंत्री हुए। एक बार दुर्ग से कई प्रभावशाली लोग एक साथ रायपुर से दिल्ली हवाई जहाज़ में जा रहे थे। हम लोग आपस में हँसी मजाक करते चल रहे थे। उस दिन पता नहीं क्यों संयोग से हवाई जहाज़ से बहुत आवाज़े आ रही थीं और हवा के दबाव या अन्य कारणों से प्लेन झटके खा रहा था। कुछ ज़्यादा ही झटके खा रहा था। तब भिलाई के सबसे बड़े उद्योगपति बी आर जैन ने मुझसे ज़ोर से पूछा (क्योंकि मैं उनसे कुछ दूर बैठा था)। कहा भाई तुम तो वोरा के दोस्त हो। ये क्या हो रहा है। तब मैंने भी ऊँची आवाज़ में कहा -भाई इट इस टेक ओवर ऑफ़ इंडियन एयरलाइंस बाई दुर्ग रोडवेज। पूरे प्लेन में इतनी ज़ोर का ठहाका हुआ कि बेचारा प्लेन भी घबरा गया और उसके झटके ठहाकों से 19 हो गए।"
यह राजनीति के पुराने लोगों का किस्सा है। आज राजनीति में इस तरह के सहज हँसी-मजाक होते हैं इसके बारे में पता नहीं।
"जिंदगी: रिवर्स गियर" पढ़ते हुए कनक जी -पुष्पा जी से मिलने की इच्छा ने एक बार फिर ज़ोर मारा है। पुष्पा तिवारी जी (Pushpa Tiwari) को हम कनक जी से पहले से पढ़ते आए हैं। उन्होंने भी जबलपुर रहते हुए हमें अपनी किताबें भेजी थीं। किताबों के दाम भेजने के प्रस्ताव पर उन्होंने मुझे इतनी ज़ोर से हड़काया था कि आज तक सिट्टी और पिट्टी दोनों गुम हैं। देखिए कब मिलना होता है दोनों से। मिलने में एक बाधा कनक जी की लगाई मिलने की शर्त भी है -"अकेले मत आना।"
कनक जी को उनके घर -परिवार, प्रसंशकों, मित्रों, चाहने वालों का आदर,प्रेम, सम्मान मिलता रहता है। अबाध प्यार को पाकर भी उनका मन -'ये दिल मांगे मोर' वाले मोड में रहता है। उनके मन की मुराद पूरी होती रहे। उनकी बहू की सहेलियाँ उनके साथ शैतानी करती रहें और उनको 'सहेली ज्वैलर्स' के गिफ्ट पैक मिलते रहें (और उनको उनकी सहेलियों की याद दिलाते रहें)।
कनक जी के बारे में यह बेतरतीब बातें मेरे मन में उनके लेखन से उपजे त्वरित भाव हैं जो बिना किसी रुकावट के जैसे मन में आते गए वैसे मैं टाइप करता गया। 'मन की बात' करना अभी तक किसी विशेषाधिकार की श्रेणी में नहीं आया। कानून की इस चूक का फ़ायदा उठाते हुए यह लिख डाला।
कनक तिवारी जी का अपने लेखन, भाषण और अपनी उपस्थिति से अपने परिवेश को रोशन करते रहें। उनके और पुष्पा जी के अच्छे स्वास्थ्य के लिए शुभकामनाएं।
पुस्तक का नाम : जिंदगी :रिवर्स गियर
लेखक :कनक तिवारी
प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मंदिर,बीकानेर
पृष्ठ : 405
कीमत : 600 रुपये

(अमेजन से किताब खरीदने का लिंक )

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