इतवार का दिन छुट्टी का होता है। कामकाजी लोगों के लिए। रिटायर होने के बाद अपन का तो हर दिन छुट्टी का होता हो। लेकिन इतवार के दिन की बात ही कुछ और है।
छुट्टी के दिन घर में खाने का मीनू तय करते समय थोड़ी देर असमंजस में रहने के बाद कोई बोल देता है -खिचड़ी बना लेते हैं। बन जाती है। इतवार के खाने की समस्या हल हो जाती है।
लेकिन इस बार खिचड़ी घर में नहीं पकी। खिचड़ी पकी घर से बीस किलोमीटर दूर नई दिल्ली के पुराने क़िले में। खिचड़ी में भी दाल-चावल नहीं था बल्कि था महाभारत, मुग़लकालीन और विभाजन के इतिहास का मिलाजुला सामान। दो घंटे दिल्ली वॉक के बहाने आलोक पुराणिक जी और मनु कौशल जी ने इतिहास और साहित्य के गठबंधन के साथ अतीत के तीन कालखंडो की खिचड़ी पकाई जिसे आख़िर में अपनी भागेदारी की छौंक से इरा पुराणिक ने स्वादिष्ट बनाया।
पुराने क़िले की वॉक का समय तय था सुबह साढ़े सात बजे। रास्ते की जानकारी देते हुए बताया गया था कि इंद्रप्रस्थ मेट्रो स्टेशन से एक किलोमीटर की दूरी पर है पुराना क़िला। लेकिन मेट्रो स्टेशन से साढ़े तीन किलोमीटर की दूरी बताई गूगल मैप ने। मतलब ढाई किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी जुड़ गई। समय पर पहुँचने के लिए अस्सी रुपये खर्च करने पड़े ऑटो के। हमने आलोक पुराणिक जी से दूरी में घपले की शिकायत की तो उनकी निगाहों में जो भाव था उसका हिंदी अनुवाद यही था -
" दस्तख़त करके एफिडेविट जमा करके बताओ।" हमने कुछ किया नहीं। हमें पता है कि हम कुछ लिखा-पढ़ी करके कहेंगे तो आलोक पुराणिक कह देंगे -"हमने तो हवाई दूरी बताई थी। सड़क के रास्ते में दूरी तो बदलती रहती है।"
वॉक की शुरुआत में सभी के परिचय हुआ। टिकट दिखाकर अंदर जाते समय एक बंदर बिना टिकट बगल में बनी रेलिंग पर चलता हुआ शायद हमको बंदर होने का फ़ायदा बता रहा था। दुनिया में इंसानों के बीच बढ़ते बन्दरपने का कारण हमको समझ में आया। इंसान पैसे के कोई भी धतक़रम करने पर आमादा है।
क़िले में हमारे आगे एक बालक साइकिल पर जाते दिखा। शायद साइकिल पर जाने पर टिकट नहीं लगता होगा।
क़िले का बड़ा फाटक हमारे स्वागत में विदेशी पूंजी के स्वागत में भारतीय बाज़ार की तरह खुला था। सामने तिरंगा फहरा रहा था। गेट पर 'हर घर तिरंगा' का इश्तहार लगा था। मुझे अनायास 'तिरंगा पान मसाला' का इश्तहार याद आया। हालांकि दोनों में कोई साम्य नहीं है। 'हर घर तिरंगा' केवल राष्ट्रीय पर्वों पर सार्वजनिक उपक्रमों में चलता है जबकि 'तिरंगा पान मशाला' का जलवा हर जगह पूरे साल रहता है।
पुराने क़िले के बड़े दरवाज़े के बाहर खड़े होकर वॉक कमेंट्री की शुरुआत करते हुए आलोक पौराणिक जी ने जानकारी दी कि दिल्ली का पुराना क़िला लाल क़िले से सौ साल सीनियर होने बावजूद दिल्ली के सबसे अंडररेटेड स्मारकों में से है। महाभारत काल, मुग़लकाल और आजादी के समय के इतिहास को समेटे हुए दिल्ली का पुराना क़िला।
आलोक पुराणिक जी को शायद खिचड़ी से कुछ परहेज है इसलिए उन्होंने क़िले की दास्तान को इतिहास की खिचड़ी दास्तान की बजाय ' इतिहास की मिक्स्ड वेजिटेबल' बताया। उनको लगता है थोड़ा अंग्रेजी के जुमले इस्तेमाल करने से लोग उनकी बात आसानी से समझेंगे।
क़िले के बारे में माना जाता है कि पारंपरिक रूप से पांडवों के किले के नाम से मशहूर यह क़िला संभवतया उसी टीले पर स्थित है जहाँ कभी महाभारत कथानक से सम्बद्ध इंद्रप्रस्थ नगर था। मुग़ल बादशाह हुमायूँ ने 1533 ई. में यहाँ दीनपनाह नामक नगर बसाया जिसे ध्वस्त कराके शेरशाह सूरी (1538 से 45 ई.) ने क़िले की प्राचीर और अन्य इमारतें बनवाई। बाद में मुग़ल बादशाह हुमायूँ 1555 ई. में फारस से लौटने के पश्चात 1556 ई. तक मृत्यु पर्यन्त यहाँ रहे । ऐसा विश्वास किया जाता है कि हुमायूँ ने क़िले की मरम्मत कराई और कुछ भागों का निर्माण कराया।
क़िले में बड़ा दरवाजा, हुमायूँ दरवाज़ा, तलाक़ी दरवाज़ा प्रमुख दरवाज़े हैं। इसके अलावा शेरशाह की बनवाई क़िला-ए-कुहान मस्जिद, शेर मंडल आदि प्रमुख इमारते हैं। क़िले के चारों तरफ़ बनी खाई पूर्व में यमुना नदी से जुड़ी हुई थी।
पुराने क़िले की दास्तान से हुमायूँ और शेरशाह सूरी का नाम जुड़ा है। शेरशाह सूरी ने मुग़ल बादशाह हुमायूँ को इस कदर परेशान किया और दर-दर दौड़ाया कि मुग़ल इतिहासकारों (अबुल फ़ज़ल आदि ने) ने शेरशाह सूरी को डकैत कहा है।
बड़ा दरवाज़ा के आगे श्री कुंती देवी मंदिर की तरफ़ लाइन के जाते हुए साथियों को देखकर अंदाजा हुआ कि महाभारत काल में पांडव लोग वनवास जाते समय किस तरह आगे-पीछे चलते हुए गए होंगे।
आलोक पुराणिक जी ने महाभारत काल के समय का श्लोक सुनाकर आज के समय को जोड़ते हुए कहा :
"श्रेष्ठ पुरुष और शिल्पी यहाँ निवास करते थे। उपभोग की अनेकानेक सामग्रियाँ यहाँ मिलती थीं। मतवाले हाथी, ऊँट , गाय, बैल, गधे यहाँ मौजूद थे। अगर आप इस श्लोक में मतवाले हाथी की जगह मतवाली कार कर दें और श्रेष्ठ पुरुषों की जगह इलीट वर्ग कर दें तो देयर इस कंटीन्युटी इन द हिस्ट्री।"
आलोक पुराणिक जी ने वॉक में शामिल सभी साथियों को इलीट वर्ग से जुड़ने का झाँसा देकर मुफ्त में ख़ुश कर दिया । पाँच सौ रुपए में इलीट क्लास में शामिल होना कोई ज़्यादा मंहगा सौदा नहीं है।
श्री कुंती मंदिर के बाहर खड़े होकर मनुकौशल जी ने महाभारत के हौलनाक विवरण देते हुए बताया कि कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध में 166 करोड़ लोग मारे गए। जबकि पहले विश्वयुद्ध ( 2 करोड़ मौतें) और दूसरे विश्वयुद्ध (6 करोड़ मौतें) में कुल मिलाकर क़रीब आठ करोड़ लोग मारे गए। इस लिहाज से दोनों विश्वयुद्ध में मारे गए कुल आठ करोड़ लोगों से बीस गुना से अधिक लोग महाभारत में मारे गए। जितने लोग महाभारत की लड़ाई में मारे गए भारत की आबादी आज भी उससे कम है। संसार की नश्वरता का बयान करते हुए मनु कौशल जी ने इस्माइल मेरठी का शेर सुनाया :
क्या यही है जिस पे हम देते हैं जाँ
या कोई दुनिया-ए-फ़ानी और है।
दुनिया की नश्वरता का बखान करने के बाद मनुकौशल जी ने यह भी बताया कि संसार कितना भी नश्वर हो लेकिन हममें से किसी को कहा जाये कि इसे छोड़कर ऊपर चला जाये तो कोई रुख़्सत होने को तैयार नहीं होगा।
श्री कुंती देवी मंदिर के अंदर भी गए हम दर्शन करने। अंदर एक शिवलिंग और कुछ मूर्तियां मौजूद हैं। मंदिर के विवरण में लिखा है :
" यह धार्मिक शिव व दुर्गा देवी मंदिर पांडवों की माता महारानी कुंती देवी के नाम से प्रसिद्ध है।इस मंदिर का जीर्णोद्धार यहाँ के निवासी श्री 108 श्री महंत स्वर्गीय पंडित ग्यासी राम भारद्वाज जी ने चैत्र सुदी अष्टमी विक्रम संवत् 1915 (1858 ई) में किया।"
श्री कुंती देवी मंदिर देखने का बाद हम लोग क़िले में स्थित क़िला-ए- कुहना मस्जिद( पुराने क़िले की मस्जिद) देखने गए। इस मस्जिद का उपयोग एक सामुदायिक मस्जिद के रूप में होता था। इसे शेरशाह सूरी द्वारा 1541 में बनवाया गया था। इस खूबसूरत मस्जिद में उस समय प्रचलित हर धर्मों के पवित्र माने जाने वाले प्रत्येक चिह्न और आयतें बनीं हैं। मस्जिद में फोटो खिचाने के बाद बाहर खड़े होकर शेरशाह सूरी और हुमायूँ के बारे में विस्तार से चर्चा हुई।
शेरशाह सूरी ने अपनी काबिलियत की बदौलत एक सामान्य सैनिक से भारत के बादशाह तक का सफ़र तय किया।
बाबर की सेना में सिपाही के रूप में काम करते हुए शेरशाह के तेवर देखकर बाबर ने
अपने ख़ासमख़ास ख़लीफ़ा से कहा-
" इसके तेवर देखो। मैं इसके माथे पर सुल्तान बनने की लकीरें देखता हूँ। इससे होशियार रहो और हो सके तो इसे हिरासत में ले लो। "
इस पर "ख़लीफ़ा ने बादशाह को सफ़ाई दी कि शेरशाह में वो सब करने की क्षमता नहीं है, जो आप उसके बारे में सोच रहे हैं।"
लेकिन ख़लीफ़ा की सफ़ाई के उलट शेरशाह सूरी ने बाबर के बाद हुमायूँ को हराकर हिंदुस्तान पर हुकूमत की। हुमायूँ को हिन्दुस्तान के बाहर खदेड़ दिया। हुमायूँ को इतना दौड़ाया शेरशाह सूरी ने कि मुग़ल इतिहासकार शेरशाह सूरी को डकैत कहते थे।
शेरशाह की जीवनी लिखने वाले कालिकारंजन क़ानूनगो लिखते हैं, "शेरशाह का शासन भले ही सिर्फ़ पाँच वर्षों का रहा हो लेकिन शासन करने की बारीकी और क्षमता, मेहनत, न्यायप्रियता, निजी चरित्र के खरेपन, हिंदुओं ओर मुसलमानों को साथ लेकर चलने की भावना, अनुशासनप्रियता और रणनीति बनाने में वो अकबर से कम नहीं थे।"
भारत की प्रसिद्ध ग्रैड ट्रंक रोड बनवाने के अलावा सराय, डाक व्यवस्था, शासन व्यवस्था में सुधार के लिए शेरशाह को एक क़ाबिल बादशाह के रूप में याद किया जाता है।
बाद में कालिंजर के क़िले में बारूद फटने से शेरशाह की मौत हुई। शेरशाह सूरी के बाद उसके बेटे इस्लाम शाह ने 9 वर्ष हुकूमत की। इस्लाम शाह का बनवाया सलीम गढ़ का क़िला लाल क़िले से 100 साल पहले बनवाया गया था।
आदिल शाह सूरी खानदान का आख़िरी बादशाह था। 'अंधा अदली' के नाम से मशहूर आदिल शाह तीरंदाजी के शौकीन थे। तीर चलाने पर तीर खोजकर लाने वाले को उस समय 500 रुपए इनाम देते थे। इसी तरह के दौलत लुटाते हुए खानदान इतिहास की तारीखों में गुम हो गया।
आलोक पुराणिक जी ने शेरशाह के बारे में और विस्तार से चर्चा करते हुए बताया कि शेरशाह सूरी स्मार्ट बादशाह थे। स्ट्रीट स्मार्ट थे। उन्होंने पहले चुनार के क़िले की मलिका से और फिर ग़ाजीपुर की मलिका से शादी की और उनकी धन-दौलत-रुतबे के सहारे पर अमीर और ताक़तवर बने। शेरशाह ने छल और कौशल से लड़ाइयाँ जीतीं। उन दिनों युद्ध सूर्योदय से सूर्यास्त तक ही होते थे। रात में लड़ाई बंद हो जाती थी। सूर्योदय के बाद शुरू होती थी। चौसा के युद्ध में शेरशाह ने सूर्योदय के पहले हुमायूँ की सेना पर हमला कर दिया। हुमायूँ इस हमले से घबराकर हिंदुस्तान से भाग गए। शेरशाह ने बिना कोई सैनिक गंवाये चौसा का युद्ध जीत लिया।
शेरशाह ने ने हमेशा वादा खिलाफी की। शेरशाह के कारण हुमायूँ वर्षों तक हिन्दुस्तान के बाहर भटकने के लिए मजबूर रहा।
हुमायूँ के किस्से बयान करते हुए आलोक पुराणिक जी ने बताया कि चौसा के युद्ध में जान बचाकर भागते हुए एक विधवा ब्राह्मणी ने हुमायूँ को आश्रय दिया (जयशंकर प्रसाद की कहानी ममता में इसका जिक्र है) और एक भिश्ती ने उनकी जान बचाई। हुमायूँ ने भिश्ती को वचन दिया था कि जब कभी मैं बादशाह बनूँगा तो जो माँगोगे वो दूँगा। बाद में बादशाह बनने पर हुमायूँ ने उसको एक दिन का बादशाह बनाया।
शेरशाह सूरी की मौत के दस साल बाद हुमायूँ फ़ारस से लौटकर बादशाह बने। उनके दरबार में हर दिन के हिसाब से अलग कपड़े जाते थे। हुमायूँ के पिता बाबर ने शराब से तौबा की थी। हुमायूँ भी शराब नहीं पीते थे। लेकिन अफ़ीम का शौक था उनको। अफ़ीम के अलावा उनको ज्योतिष का शौक था। वे हर काम ज्योतिष के हिसाब से करते थे।
फ़्रांसीसी चिकित्सक और यात्री बर्नियर के अनुसार उन दिनों दिल्ली में ज्योतिषियों का बोलबाला था। अमीर की पत्नियाँ ज्योतिषों से सलाह लेती थीं। आलोक पुराणिक जी ने अपने पार्ट टाइम ज्योतिषीय अनुभव के आधार पर किसी को भी ज्योतिषी बनने का आसान नुस्खा बताया। इसके तहत किसी का भी हाथ देखकर उससे ये बातें कहनी होती हैं:
- आपका जितना हुनर और काबिलियत जितनी है उतना आपको फल नहीं मिलता है।
- आपके कुछ गुप्त शत्रु हैं जो आपका भला नहीं चाहते।
-आज से पाँच साल बाद आपका जीवन आज के जीवन से अलग होगा।
मैंने सोचा कहें कि इन ज्योतिषीय नुस्खे का उपयोग करने के लिए हाथ देखने की भी क्या जरूरत है। चेहरा देखकर ही ऐसा बताया जा सकता है। लेकिन माइक आलोक पुराणिक जी के हाथ में था इसलिए हम कहते-कहते रह गए।
आलोक पुराणिक जी के ज्योतिषीय नुस्खे आम आदमी भले न माने लेकिन देश-प्रदेश की सरकारें बिना आलोक पुराणिक जी को कोई भुगतान किए उनके फार्मूले का उपयोग करते हुए अपनी जनता की आज की बदहाली को अनदेखा करके पचास साल बाद का रोड मैप बनाती रहती हैं।
हुमायूँ की मौत अपनी लाइब्रेरी की सीढ़ियों से गिरकर हुई। उनकी मौत की सूचना लोगों को 17 दिन बाद दी गई जब अकबर को बादशाह घोषित कर दिया गया। इतने दिनों तक हुमायूँ का हमशक्ल एक आदमी हुमायूँ के बदले अवाम को दर्शन देता रहा।
हुमायूँ ज्योतिष में बहुत विश्वास करता था। जिंदगी भर दौड़ते-भागते इंसान के लिए ऐसा करना लाजिमी हो जाता है। लेकिन अपनी मौत के बारे में जानकारी नहीं मिल सकी उनको। शायद उनके हाल बयान करते हुए ही अहमद हुसैन माइल ने लिखा है :
ग़ैर का हाल तो कहता हूँ नुजूमी बन कर
आप-बीती नहीं मालूम वो नादान हूँ मैं।
लेकिन कहते हैं कि उनके ज्योतिष ज्ञान के अनुसार जिस दिन उनके पास चार अफ़ीम की गोली बचेंगी उस दिन उनकी मौत होनी तय थी। बताते हैं कि जिस दिन मस्जिद की अजान सुनकर लाइब्रेरी मस्जिद की तरफ़ जाने के लिए वे बढ़े तो पैर फँस जाने के कारण सीढ़ियों से गिरकर जिस दिन उनकी मौत हुई उस दिन उनके पास चार अफ़ीम की गोलियाँ बचीं थीं।
हुमायूँ कई मायनों में एक बदनसीब बादशाह था जिसकी जिंदगी भागते-दौड़ते बीती। उनके हाल बयान करते हुए मनु कौशल जी ने शेर सुनाया :
मैं बदनसीब हूँ मुझको न दे ख़ुशी इतनी
कि मैं ख़ुशी को भी ले कर ख़राब कर दूँगा
~अब्दुल हमीद अदम
क़िला-ए- कुहना मस्जिद से शेर मंडल देखने गए। शेर मंडल शेरशाह सूरी की बनवाई इमारत है जिसमें हुमायूँ की लाइब्रेरी थी। जिसकी सीढ़ियों से गिरकर हुमायूँ की मौत हुई। इतनी छोटी इमारत में मुगल बादशाह की लाइब्रेरी देखकर लगा शायद बादशाह लाइब्रेरी के बहाने अफ़ीम पीते होंगे यहाँ आकर। बाद में हिंदुस्तान के युवाओं ने मुग़ल बादशाह के इस बहाने वाले हुनर का इस्तेमाल किया और प्रेमी-प्रेमिका धर्मस्थलों में जाने बहाने मिलने-जुलने का जुगाड़ शुरू किया। एक फ़िल्म में नायिका ने इक़बालिया गीत भी गाया है - "मैं तुझसे मिलने आई/मंदिर जाने के बहाने।"
शेर मंडल के पास ही मुग़ल कालीन हमाम (स्नानागार) था। बताते हैं कि स्नानागार के अंदर नालियों के द्वारा महल में पानी की सप्लाई होती रहती थी। मतलब मामला एकदम हवाला कारोबार के पैसे के तरह जहाँ पहुँचना था पहुँच जाता था और किसी को पता भी नहीं चलता था।
शाही हमाम के बाद हम लोग हुमायूँ दरवाज़े की तरफ़ गए। क़िले के दक्षिणी प्रवेश द्वार को हुमायूँ दरवाज़ा कहते हैं। इसका प्रवेश द्वार एक के ऊपर एक दो भागों से बना है। द्वार का निचला हिस्सा खाई में पानी के स्तर पर खुलता है जो द्वार के आधे हिस्से तक जाती है और ऊपरी हिस्से में संभवतः एक ड्रॉब्रिज या खाई के पार एक पुल के माध्यम से प्रवेश किया जाता था।
आलोक पुराणिक जी ने जानकारी दी कि हुमायूँ दरवाज़े के पास बनी सीढ़ियों पर दर्शकों को बिठाकर (1972 में) गिरीश कर्नाड लिखित प्रसिद्ध नाटक तुगलक का मंचन अब्राहिम अल्का जी के निर्देशन में किया गया था। इसमें हिंदुस्तान की राजधानी दिल्ली से तुगलकाबाद के स्थानांतरण को दिल्ली से राजधानी तुग़लकाबाद जाने के मंचन को प्रतीक रूप में दर्शकों को दक्षिण स्थित हुमायूँ दरवाज़े से उठाकर उत्तर में स्थित तलाक़ी दरवाज़ा की सीढ़ियों तक ले गए जाकर आगे के नाटक का मंचन किया गया।
इस सूचना के बाद वॉक दिल्ली से दौलताबाद मतलब हुमायूँ दरवाज़े से तलाक़ी दरवाजा पहुँची । तलाकी दरवाज़े का नाम दिलचस्प है और इससे कई रोचक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। एक आख्यान के अनुसार, इस दरवाज़े का संबंध एक रानी से है, जिसने अपने पति के रणभूमि से विजयी होकर लौट आने तक इसे बंद रखने की शपथ ली थी। लेकिन राजा मारा गया और तब से लेकर आज तक यह दरवाज़ा बंद ही है। इस प्रवेशद्वार में दो द्वार हैं - ऊपरी और निचला। ऊपरी द्वार जो अधिक अलंकृत था, वह मुख्य द्वार था, और निचला द्वार किसी समय खंदक के स्तर पर खुलता था।
तलाक़ी दरवाज़े की सीढ़ियों के पास पुराने क़िले के आजादी से जुड़े आख्यानों के बारे में विस्तार से चर्चा हुई। पुराने क़िला और हुमायूँ का मक़बरा दो मुख्य जगहें थीं जहाँ हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बंटवारे के समय शरणार्थी कैम्प बने थे। पाकिस्तान से आए लोगों ने यहां पनाह ली। हिंदुस्तान से पाकिस्तान जाने वाले लोगों से यहाँ से रुख़सत हुए । इस क़िले ने आता हुआ हिंदुस्तान और जाता हुआ पाक़िस्तान देखा है। कई बच्चों के यहाँ जन्म हुए।
बँटवारे के समय की कई मशहूर हस्तियों के बारे में रोचक चर्चा हुई। चौधरी खलीकुज्जमां भारत की संविधान सभा के प्रमुख सदस्यों में एक थे। उन्होंने भारत में रहने की कसम खाई थी। लेकिन आजादी के फौरन बाद पाकिस्तान चले गए। बाद में पाक़िस्तान हुकूमत में प्रमुख पदों पर रहे। इसी तरह के और लोगों का जिक्र करते हुए वसीम बरेलवी का शेर पढ़ा गया :
"उसी को जीने का हक है जो इस ज़माने में
इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए"
बँटवारे के दौरान हिंदुस्तान की तमाम चीजों का बंटवारा हुआ। पाकिस्तान के तमाम लोगों का ख्याल और चाहना थी कि मुग़लिया हुकूमत से जुड़ी तमाम इमारतें पाकिस्तान को मिलनी चाहिए। लाल क़िला, ताजमहल के बिना पाकिस्तान बेरौनक है। लेकिन चाहने से क्या होता है। चाहने को तो कई लोग यह भी चाहते थे कि बँटवारा न हो। अपनी इस भावना को गीतकार रमानाथ अवस्थी ने लालकिले में हुए एक साझा कवि सम्मेलन और मुशायरे में व्यक्त किया :
धरती तो बंट जाएगी लेकिन
उस नील गगन का क्या होगा ?
हम तुम ऐसे बिछुड़ेंगे तो
महामिलन का क्या होगा?
लेकिन बँटवारा हुआ। धरती भी बँटी । आसमान भी लग हुआ। महामिलन की जगह युद्ध और महायुद्ध हुए। बँटवारे के बाद भी पुरानी पीढ़ी हिन्दुस्तान-पाक़िस्तान एकता की बात करती रही। उस पीढ़ी के विदा होने के साथ मिलने-जुलने की चाह भी कम होती गई।
कुछ रोचक बंटवारे भी हुए। सभी चल संपत्तियों को 80-20 के अनुपात में विभाजित किया गया था। दोनों देशों के विभाजन के दौरान जमीन, धन और सेना के अलावा जानवरों का भी बंटवारा तक किया गया था।'जॉयमोनी' हाथी को लेकर भी विवाद हुआ था। इसके बाद पश्चिम बंगाल को कार मिली और पूर्वी बंगाल (तब का पाकिस्तान) के हिस्से में 'जॉयमोनी' हाथी आई थी। ठीक इसी तरह सोने की परत से चढ़ी घोड़े से खींची जाने वाली बग्गी पर भी दोनों आजाद मुल्क भारत और पाकिस्तान अपना दावा ठोक रहे थे।
'जॉयमोनी' हाथी को पाकिस्तान भेजने में समस्या आई। हाथी के महावत ने जॉयमोनी हाथी के साथ पाकिस्तान जाने से इंकार कर दिया। हाथी को ले जाने के लिए पाकिस्तान से महावत बुलाए गए। वहाँ से महावत आए तो यहाँ की नौकरशाही ने अपना पेंच फँसाया। कहा -"इतने दिन हाथी के खाने पीने का खर्चा दिया जाये तब हाथी ले जाने दिया जाएगा।" पाक़िस्तान की नौकरशाही में भी यहीं से गए लोग थे। उन्होंने कहा -" हाथी को प्रदर्शित करके जो कमाई हुई है उसमें से खाने का खर्चा का काटकर बाकी पैसे के साथ हाथी भेज दिया जाये।"
बँटवारे से विस्थापित हुए लोग अपने मूल देश की यादों में ही जीते रहे। जोश मलीहाबादी 1954 में पाकिस्तान गए। दुखी रहे। एक वकील पाकिस्तान जाने के बाद भारत वापस लौटे तो कागज की कमी के कारण जिंदगी भर घुसपैठिया वकील कहलाये जाते रहे। दोनों देशों के विस्थापित लोगों की मनःस्थिति अहमद फ़राज़ के हवाले से बयान करते हुए मनु कौशल जी ने सुनाया :
गुज़र गए कई मौसम कई रुतें बदलीं
उदास तुम भी हो यारो उदास हम भी हैं
बँटवारे के बाद हुए दंगे फ़साद का बयान करते हुए मंटो का ज़िक्र भी हुआ। मंटो की कहानी जूता सुनाई मनु कौशल जी ने :
"हजूम ने रुख़ बदला और सर गंगाराम के बुत पर पिल पड़ा। लाठियां बरसाई गईं। ईंटें और पत्थर फेंके गए। एक ने मुंह पर तारकोल मल दिया। दूसरे ने बहुत-से पुराने जूते जमा किए और उनका हार बनाकर बुत के गले में डालने के लिए आगे बढ़ा, मगर पुलिस आ गई और गोलियां चलना शुरू हुईं। जूतों का हार पहनाने वाला ज़ख़्मी हो गया। चुनांचे मरहम-पट्टी के लिए उसे सर गंगाराम अस्पताल भेज दिया गया।"
मंटो के कुछ और किस्से सुनाने के बाद माइक सौंप दिया गया इरा पुराणिक को। इरा ने हिंदुस्तान और पाकिस्तान के अवाम के बारे में पाकिस्तान शायर ख़ालिद इरफ़ान की मजेदार नज़्म सुनायी :
"मियाँ ये हिन्द ओ पाकिस्तान एक सरहद का झगड़ा है
वगरना इस इमारत के मनारे एक जैसे हैं।
कराची का किचन हो या दक्कन की रसोई हो
नमक का फ़र्क़ है बैगन बघारे एक जैसे हैं।
पजामों के डिजाइन को बदल डालो तो क्या ग़म है
हमारी बीबियों के तो गरारे एक जैसे हैं।
परेशान हाल है पब्लिक मगर दोनों मामालिक के
मीरासी क्रिकेटर फ़िल्मी सितारे एक जैसे हैं।
कुंवारे लोग तो हर मुल्क में आजाद फिरते हैं
मगर शादी शुदा किस्मत के मारे एक जैसे हैं।
बराए-अक्द- ख्वानी काजियों में फ़र्क़ है लेकिन
कराची और दिल्ली के छुवारे एक जैसे हैं।
कुंवारा आदमी हो या कोई आजाद लीडर हो ,
जो बे- पेंदी के लोटे हैं वो सारे एक जैसे हैं।
निकम्मे रहनुमा और अक्ल से पैदल सियासत-दाँ,
हमारे एक जैसे हैं तुम्हारे एक जैसे हैं।
यहाँ का ख़ालिद-ए-इरफान वहाँ का राहत इंदौरी,
निरे शायर हैं दोनों के सितारे एक जैसे हैं।"
वॉक के क्लाइमेक्स में मनु कौशल जी मंटो के लिबास और लहजे में आए। टोबा टेकसिंह के अंदाज में उन्होंने कुछ ऐसे डायलॉग सुनाये जिनका मतलब आजादी के बाद से अब तक कोई समझ नहीं पाया है।
इसी के साथ लगभग दो घंटे चली वॉक पूरी हुई। वॉक के दौरान जो लोग बरसात से बचने के लिए छतरी लाए थे वो धूप से बचने के लिए उसे खोलकर बैठ गए। बारिश होती तो हम कट्टा कानपुरी का शेर ठेल देते :
"तेरा साथ रहा बारिशों में छाते की तरह
कि भीग तो पूरा गए पर हौसला बना रहा।"
लेकिन हमारे पास न छाता था, न बारिश न कोई 'तेरा साथ' लिहाजा चुपचाप झोला समेटे वापस लौट आए।
लौटते समय पुराने क़िले के बड़े दरवाज़े के सामने खड़े होकर फोटो खिंचवाया तो देखा कि दरवाज़े का एक बुर्ज ग़ायब था। मतलब दरवाजा बुर्ज दिव्यांग था।
कभी ताक़त और संपन्नता के प्रतीक रहे क़िले का यह हाल देखकर लगा कि कोई भी हुकूमत कितनी भी बुलंद क्यों न हो, एक दिन खंडहर बनाना उसकी नियति होती है।
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