Wednesday, August 27, 2025

कोलंबो का डच हॉस्पिटल




 कहीं घूमने निकलते हैं तो लगता है जहाँ गए हैं वहाँ के सारे प्रसिद्ध स्थल देख लें। इसी मासूम भावना के वशीभूत होकर कोलंबो के पेट्टा बाजार (लिंक टिप्पणी में) घूमने के बाद पास ही स्थित डच अस्पताल देखने गए।

श्रीलंका पर पुर्तगालियों, डच और अंग्रेजों का अधिकार रहा। ये यूरोपियन लोग लगता है जहाँ मन आता चले जाते और जिस देश में मन आता अपना झंडा गाड़ देते। शुरुआत उन देशों के व्यापारी करते थे। कब्जा के बाद अपने अधिकार में आए देश को नजराने के रूप में अपने देश की सरकार को सौंप देते थे।
डच ईस्ट इंडिया अपने अफसरों और की देखभाल के लिए यह अस्पताल बनवाया। अस्पताल कब बना यह पता नहीं लेकिन एक अनुमान के अनुसार अस्पताल 1681 में मौजूद था। मतलब क़रीब साढ़े तीन सौ साल पुराना है यह अस्पताल।
कोलंबो क़िले के पास स्थित यह अस्पताल बंदरगाह के पास होने के कारण डच नाविकों की देखभाल के लिए भी इस्तेमाल होता था।
अस्पताल में आए मरीजों को चटाई और बीमारों के लिए गद्दे का इंतजाम था। चटाई और गद्दे इंडोनेशिया से आते थे। चटाई और गद्दे उस समय नहीं बनते होने सीलोन में। यहाँ काम करने वाले डाक्टर हरमन (Dr Paul Hermann) को श्रीलंका में बाटनी का पितामह कहा जाता है।
पुरानी फोटुओं से पता चलता है कि पहले यहाँ एक नहर भी थी। बाद में जब अंग्रेजों के क़ब्ज़े में आया सीलोन तो उन्होंने नहर पटवा दी। नहर नहीं रही लेकिन जहाँ नहर थी उस सड़क को नहर रो लेन कहते हैं।
अंग्रेजों द्वारा कोलंबो पर कब्जे के बाद नहर को बंद करा देना शासन का शाश्वत सूत्र रहा है। हर नया शासक आने पर पुराने शासन के तमाम रीति-रिवाज बदलता है। कई मामलों में यह सुधार के लिहाज से होता है, कई बार बिना किसी मतलब के। सुनते हैं जाट लोगों ने आगरे पर कब्जा किया तो उन्होंने ताजमहल का उपयोग अपने घोड़ों के लिए भूसा रखने के काम में किया।
बदलाव का रिवाज सरकारों में भी जारी रहता है। नई सरकारें पुरानी सरकारों के तमाम चलन बदल देती हैं। कुछ नहीं हुआ तो योजनाओं शहरों के नाम ही बदल देती हैं। इस बदलाव को ही अपनी उपलब्धि के रूप में बताने में करोड़ों रुपए फूँक देती हैं।
बदलाव का चलन हाकिमों-हुक्कामों में भी जारी रहता है। नया हाकिम आते ही सबसे पहले दफ़्तर के पर्दे, फर्नीचर बदलवाता है। कुछ नहीं तो बैठने वाली मेज़-कुर्सी का सेटअप बदलता है। महीने भर पहले पुते घर को फिर से पुतवाता है। पुराने हाकिम द्वारा बनवाये किचन, ड्राइंगरूम को 'ऑल्टर' करवाता है। जनता के पैसे का अहमक इस्तेमाल का नायाब नमूना होते हैं हाकिमों के बदलने पर उनके दफ्तरों-घरों में हुए मरम्मत के काम।
डच और अंग्रेजों के बाद इस अस्पताल बिल्डिंग के उपयोग बदलते गए। 1980 से 1990 तक यहाँ पुलिस स्टेशन था। इसके पहले मेडिकल सेवाओं से संबंधित काम होते थे। 1996 में लिट्टे के भीषण हमले में इस इमारत को काफ़ी नुक़सान हुआ।
2011 में इस इमारत को शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और खान-पान परिसर में बदल दिया गया। हर ऐतिहासिक इमारत के साथ ऐसा ही होता है। एक दिन वह किसी न किसी रूप में बाजार में तब्दील हो जाती है। उसका अस्तित्व बने रहने के लिए जरूरी होता है शायद। बाजार की शरण में आने पर ऐतिहासिक इमारतों के स्वरूप भले बदल जायें लेकिन उनकी साँसे चलती रहती हैं।
डच अस्पताल को दूर से और फिर पास से देखा। बाहर से एक बड़ी इमारत, बड़ा अहाता। उसके परिसर में अंदर तमाम दुकानें थीं। ज्यादातर खाने-पीने की। अंदर की तरफ़ जाने पर देखा तो इमारत के खुले आँगन जैसी जगह में तमाम बेंच पड़ी थीं। तमाम लोग उन पर बैठे हुए धूप सेंकते हुए खाने-पीने में जुटे हुए थे। पास के बरामदे में खाना सर्व करने वाले काउंटर थे।
इन लोगों में अधिकतर विदेशी थे। शायद यूरोप से आए यायावर। क्या पता उनमें से कुछ डच लोग हों जो देखने आए हों कि श्रीलंका रहते हुए उनके पूर्वज कहाँ इलाज करवाते थे। वहाँ खाने-पीने की दुकानों का स्तर देखकर लगा कि यहाँ खाना-पीना मंहगा ही होगा। ज्यादातर लोग अपनी ग्लासों में दारु लिए परिसर का आनंद उठा रहे थे। इनमें महिलाएँ भी थीं। स्थानीय लोग कम ही दिखे।
पहले तो मन किया कि हम भी वहाँ बैठकर चाय-कॉफ़ी कुछ पियें। लेकिन जहाँ बैठने का मन किया वहाँ चाय-कॉफ़ी के लिए दुकान वाले ने सॉरी बोल दिया। अंदर बैठने का मन नहीं था। लिहाजा कुछ देर वहाँ इधर-उधर टहलने के बाद चले आये।
आगे के मोर्चे हमको आवाज़ दे रहे थे।

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