Thursday, September 18, 2025

जन्मदिन के बहाने




 हिंदी में हल्का साहित्य बहुत कम है। हल्के-फ़ुल्के ,मजाकिया साहित्य, को लोग हल्के में लेते हैं। सब लोग पाण्डित्य झाड़ना चाहते हैं।

-श्रीलाल शुक्ल
श्रीलाल शुक्ल जी ने अपनी इस बात के समर्थन में गाँवों के कुछ किस्से भी सुनाये थे। उन क़िस्सों में गांव के सहज हास्य बोध की चर्चा थी। गांव-गिराव में गाली-गलौज के चलन की चर्चा करते हुए बताया था कि कैसे वहाँ बुजुर्ग लोग अपने बच्चों के साथ गालियाँ देते हुए बात करते हैं। लोग उनकी गालियों को प्रसाद की तरह ग्रहण करते हैं।
मुस्ताक अहमद यूसुफ़ी साहब तो यह तक कहते हैं -" गुफ्तगू की बुनियाद गाली पर है।" मतलब अगर गाली नहीं तो गुफ्तगू नहीं। पिछले दिनों गाली वाली बात पर बहुत बवाला हुआ। यूसुफ़ी साहब के हिसाब से जो लोग गाली पर हल्ला मचा रहे हैं वे मूलत: गुफ्तगू के ख़िलाफ़ हैं। चाहते ही नहीं की बातचीत हो। एकालाप होता रहे। अब सबको थोड़ी पसंद आती है मन की बात।
बहरहाल बात हल्के साहित्य की। वो मैंने इसलिए लिखी ताकि कल को 'कट्टा कानपुरी' के कलाम को कोई हल्का बतायेगा तो हम श्रीलाल शुक्ल जी की इस बात को अपने समर्थन में लिख देंगे।
जन्मदिन की शुभकामनाएँ देते हुए कुछ मित्रों ने देर से शुभकामनाएँ भेजने की बात कही तो हमारा कहना है शुभकामनाओं का कोई 'हाजिरी रजिस्टर' नहीं होता। वे कितनी भी देर से आयें उनका शुमार समय पर आईं शुभकामनाओं में ही शुमार होता है। आर्डनेंस फैक्ट्री के दिनों में अगस्त, सितंबर में मिला सामान भी 31 मार्च को ही मिला दिखाया जाता था। इसलिए जिन दोस्तों ने देर से शुभकामनाएँ भेजी उनको भी समय से आयी मानकर ग्रहण किया जा रहा है।
कल पार्क में टहलते हुए कई क़रीब 22000 कदम (15 किलोमीटर करीब) चल लिए। दोस्तों से बात करते हुए समय का पता ही नहीं चलता। पार्क में कई बार बारिश आयी तो शेड के नीचे बैठ गए। दोस्तों से बतियाते रहे। पानी रुका फिर टहल लिए।
पार्क में काम करने वाली महिलाएं सुस्ता रहीं थीं। एक बच्चा भी था उनके बीच। हमने उनसे बातचीत की तो खड़े-खड़े उनके काम की निगरानी करने वाला आदमी बोला -"खाली तीन घंटे काम करती हैं।" हमने कहा -"तुम तो कुछ भी नहीं करते। खाली खड़े-खड़े घंटे गिनते रहते हो।" महिलायें खुश हो गई। आदमी मुस्कराते हुए दाँत खोदता रहा।
आदमी के दाँत पान मसाले से रंगे हुए थे। किसी लोकतांत्रिक सरकार की लोकतंत्र विरोधी हरकतों की तरह जो वह लोकतंत्र के नाम पर करती है। उसका पेट किसी सरकार समर्थक पूंजीपति की बेशर्म पूंजी की तरह प्रदर्शित हो रहा था। मन किया उसको कहें -"मसाला मत खाया करो। थोड़ा पेट कम करो।"
लेकिन फिर लगा कि ऐसा करना उसके प्रति 'जजमेंटल' होना होगा। देश में तमाम लोग धतकरम करते हुए अपना जलवा बनाए हुए हैं। झूठ पर झूठ बोलकर निजाम चला रहे हैं। घड़ियाली आंसू दिखाकर सूखे की समस्या का हल पेश कर रहे हैं। समुद्र की बलखाती लहरों की तरह अपने बयान बदल रहे हैं। ऐसे लोगों के प्रति भी जब हम 'जजमेंटल' होने में संकोच करते हैं तो इस बेचार आठ सौ रुपए दिहाड़ी वाले ने कौन हमारी भैंस खोली है? हम कुछ नहीं बोले।
पार्क में एक महिला हाँफती हुई 'रनिंग' कर रही थी। धूप और दौड़ के गठबंधन के चलते पसीना-पसीना। शायद वजन कम करने की कसरत कर रही थी। क्या पता Satish Saxena जी के दौड़ वाले वीडियो देखकर प्रभावित हुई हो। मन किया टोंक दें कि दौड़िए नहीं टहलिए। लेकिन फिर लगा कहीं वो और सतीश सक्सेना जी बुरा न मान जायें। नहीं बोले ।
टहलते हुए तमाम तरह के लोग दिखते हैं। बुजुर्ग, युवा, बच्चे। आदमी, औरत। सामने से किसी इंसान के घुटने, जाँघे देखकर उसके चेहरे के अंदाज़ लगाते हैं तो अक्सर अंदाज़ ग़लत लगता है। किसी के गोरे, सुडौल पैर से उसके ख़ूबसूरत चेहरे का अंदाज़ लगाते हुए जब निगाहें चेहरे पर पहुंचती हैं तो दिखता है कि चेहरा तनाव, चिंता की गिरफ्त में है। लगता है, टाँगे किसी और की और चेहरा किसी और का है। लगता है हमारा अंदाज़ लगाने वाले सिस्टम ही कुछ गड़बड़ाया हुआ है।
जन्मदिन के मौके पर हमारी छोटी बहन सुमन Suman ने अपने स्टेट्स में मेरी कुछ फ़ोटो लगाईं। उनमें एक फ़ोटो हमारे इंटरमीडियेट में उत्तर प्रदेश बोर्ड की परीक्षा में मेरिट लिस्ट में नाम आने पर मिली शील्ड थी। फोटो देखकर लगा ये किसी और लड़के की फ़ोटो है। 1981 में जब यह शील्ड मिली थी तो हमारे एक कमरे के घर में इसे रखने की जगह नहीं थी। कुछ दिन कमरे की एकमात्र खिड़की में रखी रही। इसके चलते खिड़की बंद हो गई। 'रनिंग शील्ड' टाइप थी वह शील्ड। कुछ दिन रखने के बाद हमने वह शील्ड वापस कर दी। क्या पता रखें रहते तो अभी भी होती हमारे पास। लेकिन तब शायद आज भी सोच रहे होते कि इसे रखें कहाँ ? शील्ड वापस करने के बाद कमरे, खिड़की और हमको सुकून मिला।
जिस साल हमने इंटर किया उस साल लाखों लोग इम्तहान में बैठे थे। उनमें से जो पास हुए उनमें से हमारा नम्बर पहले दस लोगों में था। आज सोचते हैं कि हमारा मेरिट में नंबर आया तो इसके पीछे हमारी मेहनत का जितना योगदान रहा उससे कहीं अधिक योगदान उन परिस्थितियों का रहा होगा जिनमें हमारा मूल्यांकन हुआ।
हमसे कई गुना अधिक मेधावी लोगों ने इम्तहान दिया होगा। यह संयोग ही रहा कि हमारी कॉपी जिन लोगों ने जांची वे लोग कॉपी जांचते समय उदार रहे होंगे या हो सकता है नम्बर ग़लत चढ़ गए होंगे। कॉपी जांचने वाले दिन कॉपी जांचने वाले का मूड ठीक रहा होगा। उसका जीवनसाथी से झगड़ा नहीं हुआ होगा। अच्छी चाय मिल गई होगी। उसके 'प्यार पार्टनर' ने कस के झप्पी दी होगी या कुछ अलग तरह की मुस्कान। कुछ भी हो सकता है।
हो तो यह भी सकता था कि अगर हम ट्यूशन पढ़ते होते तो गुरुजी हमको फिजिक्स प्रैक्टिकल में भी पूरे नम्बर दिलाते। मेरिट में हमारा नाम और ऊपर होता। लेकिन यह सब अगर कहीं मैं तोता होता तो क्या होता वाली बातें हैं। उसी तरह की जैसे लोग आज सदियों बाद क़यास लगाते हैं कि अगर दारा शिकोह औरंगजेब को हराकर बादशाह बनता, 1857 में आजादी की लड़ाई में अंग्रेज़ हार जाते, गांधी जी चौरी-चौरा घटना के बाद अपना आंदोलन वापस नहीं लेते या देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू जी की जगह पटेल जी बनते।
क्या पता पटेल जी , नेहरू जी की बहस चलाने वाले कभी आपस में बात करते होंगे कि मोदी जी के बजाय आडवाणी जी प्रधानमंत्री बनते तो कैसा होता? हो सकता है लोग यह बहस इसलिए न चलाते हों कि ऐसा करने पर कहीं वे भी आडवाणी गति को प्राप्त न हो जायें।
बहरहाल, कवि कहना यह चाहता है कि दुनिया में तमाम बातें के पीछे संयोग का भी हाथ होता होगा। यह पोस्ट भी संयोग ही है कि बिजली आ रही, नेट चालू है, फोटो मिल गई है, मसाला जमा है, समय है। सबके गठबंधन के कारण यह पोस्ट हो जारी है। अब कितने लोग इसे देखते हैं, कितने पढ़ते हैं, कितने टिपियाते हैं यह भी संयोग ही होगा।
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