लूटने में कोई उज्र नहीं आज लूट ले,
लेकिन उसूल कुछ तो होंगे लूटमार के।
नन्दन जी ग़ज़ल यह शेर याद आया जब कैब ड्राइवर में बताया कि मेदांता में उनकी माँ के इलाज में नौ दिन में आठ लाख रुपये लग गए।
कैब ड्राइवर ने बताया कि उनकी माँ को ब्रेन हैम्रेज हुआ है। उसी के इलाज के लिए मेदांता में भर्ती कराया था। नौ दिन बाद मेदांता वालों ने कहा -इनको ले जाओ। अब और इलाज संभव नहीं।’
हमने कहा -‘ अस्पताल लूट के अड्डे बन गए हैं।’
इस पर कैब ड्राइवर ने कहा -‘ हम तो अभी और लुटने को तैयार थे। माता जी का अठारह लाख का हेल्थ इंश्योरेंस है। नौ लाख खर्च हुआ। अभी नौ लाख की गुंजाइश और थी। लेकिन मेदांता वालों ने कहा ले जाओ। दूसरे छोटे अस्पताल में रखा है माँ को। अभी होश नहीं आया है।’
अस्पताल में माँ की देखभाल के लिए रात को रुके थे। सुबह नींद खुली तो कैब लेकर निकल पड़े।
‘मेदांता में डिस्चार्ज के पेपर बनाने में देरी। इस बीच अस्पताल में रहने का ग्यारह हज़ार का खर्चा भी बिल में जोड़ दिया।’-कैब ड्राइवर ने बताया। इसके बाद ही मुझे नंदन जी का शेर याद आया।
घर में खड़ी मेरी गाड़ी का नंबर देखकर बोले -‘आपकी गाड़ी कानपुर की है। मेरी पढ़ाई लिखाई भी कानपुर में हुई है। एस डी कॉलेज से ग्रेजुएशन किया है। कानपुर में घनकुट्टी में मकान है। लखनऊ बच्चों की पढ़ाई के सिलसिले में आ गए।’
नाम के आगे बिश्नोई लगा देखकर मैंने पूछा कि आप लोगों के पूर्वज तो राजस्थान से आए होंगे। कहाँ के रहने वाले थे आपके पूर्वज ?
इस पर बिश्नोई जी ने बताया -‘ हमारे परबाबा आए थे राजस्थान से। कहाँ से आए थे पता नहीं। लेकिन सुना है पहले वो लोग औरैया आए। वहाँ से उरई गए। वहाँ जमीन जायदाद बनाई। फिर कानपुर आए। अब हम लखनऊ बस गए। कानपुर में धनकुट्टी वाला मकान किराए पर उठाया है। यहाँ मिर्जापुर में रहते हैं।’
चार पीढ़ियो में कोई इंसान चार जगह बस जाता है। कोई-कोई एक ही जगह बसा रहता है। कोई गणित नहीं है इसका।
बिश्नोई बिरादरी के बारे में और कुछ बात होती तब तक एयरपोर्ट आ गया। और समय होता तो सलमान ख़ान के बारे में पूछते। लारेंस बिश्नोई के बारे में बात करते।
रास्ते में बातचीत के दौरान अपने बेटे की तारीफ़ करते रहे। बताया -‘ पढ़ने में बहुत अच्छा है। हाई स्कूल में टॉप किया। अभी भी अव्वल रहता है। बाहर की कोई चीज नहीं खाता।’
एयरपोर्ट पर डिजीयात्रा पर ख़ुद से लगेज बुक किया। डिजीयात्रा में सूटकेस का वजन 14.90 किलो निकला। हम सोच रहे थे कि पंद्रह किलो से सौ ग्राम ज़्यादा होता तो क्या होता ? क्या डिजीयात्रा बुक करता ? काउंटर पर तो चल जाता है। यहाँ क्या होता ?
सुरक्षा जाँच में आगे वाले से हाथ ऊपर करके आने को बोला। सरेंडर मुद्रा में। हमने बिना कहे ही हाथ ऊपर कर लिए। जाँच करने वाले से पूछा -‘ ये कोई नया प्रोटोकॉल है क्या ?’
सुरक्षा जाँच वाले ने हँसते हुए कहा -‘ सबके लिए नहीं है। जो लोग हाथ में कड़ा या कुछ ऐसा पहनते हैं उनके लिए है।’
मन किया कि वापस जाकर बिना सरेंडरी मुद्रा में आकर चेकिंग करायें। लेकिन मन की बात पर अमल करने का कोई जुगाड़ नहीं था यहाँ।
सुरक्षा जाँच के बाद बोर्डिंग में घंटा भर बाक़ी था। सामने ही लाउंज दिखा। घुस गए। वहाँ नाश्ता किया। क्रेडिट कार्ड का सबसे उत्तम उपयोग एयरपोर्ट लाउंज में ही लगता है। दो रुपये में नाश्ता , खाना और आराम से बैठना।
एक बंगाली परिवार नाश्ता करता दिखा। कोलकाता जाना था उनको। बोर्डिंग चालू हो गई थी। वो नाश्ता करते रहे। फ़ाइनल काल पर बोले -‘ चलो, चलो फ़ाइनल बोर्डिंग काल हो गई।’ लपकते हुए पूरा परिवार बोर्डिंग के लिए भागा। अपन आराम से चाय पीते रहे। हमारी बोर्डिंग शुरू होने में समय था।
गुवाहाटी की बोर्डिंग शुरू होने पर अपन तसल्ली से उठे। खरामा ख़रामा चलते हुए अपने गेट की तरफ़ बढ़े। एक महिला शायद घुमक्कड़ी के लिए निकली थी। एक बैग आगे एक पीठ पर लादे। उसको देखकर लगा कि घुमक्कड़ी के बैग बुलेटप्रूफ जैकेट का काम भी कर सकते हैं।
रास्ते में हर तरफ़ लोग सुकून से बैठे , खाते , पीछे , चलते, फिरते दिखे। ऐसा लगा एयरपोर्ट पर राम राज्य है -‘ नहिं दरिद्र कोई दुखी न दीना।’ बड़ा खुशनुमा एहसास सा देती जगह। फिर मुझे लगा कि दो रुपए में सुबह सुबह भरपेट नाश्ते से उपजा भाव है यह। पाँच किलो राशन के घराने का भाव। इस एयरपोर्ट की दुनिया बहुत छोटी है। सबके लिए यहाँ आना संभव भी नहीं।
एयरपोर्ट पर अखबार दिखा। लपक लिया। पीछे खबर पढ़ी -‘ खाली बैठना आलस नहीं , सेहत के लिए जरूरी।’
अपन इस बात के तो हमेशा से हिमायती रहे हैं। खबर पढ़कर ‘ यूँ ही पहलू में बैठे रहो, आज जाने की जिद न करो।’ गाने की ख़ूबसूरती का फिर एहसास हुआ।
आप भी तसल्ली से रहिए। हड़बड़ाने की कोई जरूरत नहीं। आपकी सेहत के लिए आराम जरूरी है। ‘आराम बड़ी चीज़ है , मुँह ढँक के सोइए।’
वैसे भी ट्रम्प ने अभी फ़्रांस की वाइन और शैम्पेन पर टैरिफ़ लगाया है। नींद अभी भी टेरिफ़ फ्री है। टैक्स फ्री भी है। सो लीजिए हचक के। जो होगा देखा जाएगा।
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