डॉन बास्को म्यूजियम के पास महिलाओं से मिलने के बाद टैक्सी से बड़ा बाजार आए। बीस रुपए भाड़ा पड़ा। उतर लिए।
बड़ा बाजार में मुख्य दुकानें गणतंत्र दिवस होने के कारण बंद थी। सड़क पर फुटपाथ पर सामान रखकर बेचने वाले दिख रहे थे। चौराहे पर स्कूटी, मोटरसाइकिल लिए कई युवा चालक सवारियों के इंतजार में खड़े थे। ज्यादातर यहाँ स्कूटी ही चलती दिखी।
चौराहे पर एक महिला हाथ, पैर, बदन रगड़कर सफ़ाई करने वाला सामान बेच रही थी।सूखी तरोई से बनने वाले इस स्पंज से नहाते समय त्वचा साफ़ करने की जाती है। प्राकृतिक स्पंज प्लास्टिक की तरह दिख रहा था। घर में फ़ोटो दिखाकर, परमिशन ली। दो ठो ले लिए। स्पंज की फ़ोटो लेते समय सामान बेचने वाली महिला सामने से हट गई। उसको अपनी फ़ोटो खिचवाना पसंद नहीं।
चौराहे पर संतरा और उसके सामने खुले में मीट बिक रहा था। मीट हर तरह का था। यहँ चिकन, सुअर और गाय का भी मांस बिकता है। संतरा बिकते देखकर देखकर लगा नागपुर की याद आ गई। उत्तर भारत में ऐसा संभव नहीं। मीट की दुकानों में कोई गंदगी नहीं थी।
नुक्कड़ पर एक आदमी सिगरेट में भरकर पीने वाला तम्बाकू बेच रहा था। लच्छेदार तंबाकू देखकर मैनपुरी तंबाकू की याद आ गई। हमको दिखाकर दुकान वाले ने तंबाकू बेचने वाले ने मेरे सामने सिगरेट भरी और सुट्टा मारकर दिखाया। उसके साथ बैठा छुटका लड़का हमको देखकर हँसता रहा। उसको लग रहा होगा -कैसा नमूना है।
नुक्कड़ पर सड़क नीचे की तरफ़ जाते दिखी। ढलान बनी दुकानें बंद थीं। उनके सामने सड़क पर सामान लगाकर लोग बेच रहे थे।
वहीं आगे एक जगह लोग सड़क पर लॉटरी खेलते दिखे। तीन महिलायें बाल्टियों में टिकट लिए बैठीं थी। लोग उसमें से नम्बर लेकर दाँव लगा रहे थे। हमारे हाथ में मोबाइल देखकर किनारे बैठी महिला ने इशारे से मुझे आगे बढ़ने के लिए कहा। उसको मतलब था -फोटो मत खींचो।
हम थोड़ा आगे बढ़ गए। लेकिन लौटते समय हम फिर वहाँ खड़े होकर लॉटरी का खेल देखते रहे। मन किया हम भी कुछ पैसा लगाकर लॉटरी का टिकट ख़रीद लें। लेकिन फिर 'मन की बात' मानी नहीं। 'मन की बात' आजकल मजबूरी में लोग सुन भले लें लेकिन मानता कौन है? इस बार महिलाएं टिकट बेचने में मशगूल थीं। हमने चलते-चलते उनका फ़ोटो ले ही लिया।
वहीं चौराहे पर एक छुटकी दुकान पर खाने की दुकान दिखी। महिलायें दुकान चला रहीं थी। लोग दुकान पर बनीं बेचों में बैठकर खाना खा रहे थे। खाना देखकर हमें भी भूख लग आई लेकिन वहाँ केवल नॉन वेज खाना मिल रहा था। नहीं खाये।
चौराहे पर एक जगह दो महिलायें एक जगह 'नो इंट्री' का बोर्ड लगा था। उसके पास दो महिलायें कुछ सामान बेच रहीं थीं। हमें लगा चाय बेंच रहीं होंगी। लेकिन पास जाने पर देखा वहाँ अंडा, पानी की बोतल और चिप्स वगैरह बिक रहे थे। एक महिला कच्ची सुपारी के फल को चाकू से छील-छील कर सुपारी निकाल रही थी। सुपारी निकाल कर उसे काटकर एक बक्से में बिक्री के लिए रखती जा रही थी।
हमने सुपारी छीलती महिला का फोटो लिए और वीडियो बनाया तो उसने मुँह फेर लिया । अलबत्ता उसके साथ वाली महिला हमको वीडियो बनाते देखती रही। बाद में फ़ोटो दिखाने पर सुपारी छीलती महिला भी मुस्कराते हुए अगली सुपारी छीलने लगी।
हमने चाय की दुकान के बारे में पूछा तो मुस्कराते हुए वीडियो बनाते देखने वाली महिला ने नुक्कड़ की तरफ़ इशारा करते हुए बताया -'वहाँ मिल जायेगी चाय।'
हम नुक्कड़ की दुकान की तरफ़ बढ़े तो उसके सामने सड़क किनारे दो महिलायें सुपाड़ी छीलती दिखीं। 'सुपाड़ी छीलने की जुगलबंदी ' करती महिलायें हमो फ़ोटो लेते, वीडियो बनाते , मुस्कराते देखती रहीं। वे मुँह में रखा पान चबाती जा रहीं थीं। पान का रंग उनके होंठों पर लिपिस्टिक की रचा हुआ था।
जिस तरह उत्तर भारत में पानी के साथ मिठाई, पानी चाय पिलाते हैं उसी तरह मेघालय में घर आए मेहमान का स्वागत पान में रखी कच्ची सुपारी और लाल चाय (बिन दूध की चाय) के साथ करते हैं।
वहीं चाय की दुकान में बैठकर चाय पीने के लिए बैठे। भूख लगी थी। दुकान में कचौड़ी, जलेबी भी बिक रही थी। एक कचौड़ी, एक जलेबी और एक चाय आर्डर की। वहाँ बिकने वाले सामान की रेट लिस्ट लगी थी। जलेबी पाँच रुपए की एक, कचौरी दस रुपए की और दूध की सामान्य चाय दस रुपए की। कुल सत्ताईस रुपये खर्च किए दुकान पर।
दुकान पर बैठे बुजुर्ग से नाम पूछा तो बताया -मौजी लाल महतो। वैशाली , बिहार के रहने वाले हैं।यहाँ दुकान पर काम करते हैं। काम यहाँ करते हैं लेकिन बिहार आते -जाते रहते हैं।
मेघालय में ज्यादातर दुकानों पर उत्तर प्रदेश, बिहार, कोलकता के लोग काम करते हैं। दुकान चलाते हैं। लेकिन दुकानों पर मालिकाना हक मेघालय के लोगों का है। मेघालय के बाहर के लोग यहाँ किराए पर ही दुकान, मकान चला सकते हैं। किरायेदार की हैसियत से ही रह सकते हैं। मालिकाना हक नहीं होता उनका।
इस व्यवस्था में मेघालय से बाहर के लोगों की हैसियत दूसरे दर्जे के नागरिकों की सी ही रहती है। कभी भी कोई लफड़ा होने पर मकान मालिक घर, दुकान खाली करवा सकता है। मेघालय से बाहर के लोगों के लिए यहाँ किराए पर रहना अमेरिका में वीजा पर रहते प्रवासियों जैसा ही है। अमेरिका में तो कुछ सालों बाद लोग वहाँ के नागरिक बन सकते हैं लेकिन मेघालय में शायद ऐसा संभव नहीं।
मेघालय टूरिस्टों के लिए सुंदर, खूबसूरत और प्यारा प्रदेश है। मेघालय से बाहर के लोगों को यहाँ घूमने की आजादी है लेकिन बसने की नहीं।
चाय की दुकान से बाहर निकलकर हमने बाहर सुपाड़ी छीलती, कतरती महिलाओं को चाय का ऑफ़र दिया। लेकिन उन्होंने ताजा-ताजा पान खाया था। उन्होंने मना कर दिया। कुछ उसी तरह जैसे पान मसाला खाने वालों के लिए चुटकुला प्रसिद्ध है कि उनको भगवान ने अमृत ऑफ़र किया तो पान मसाला खाने वाले ने यह कह कर मना कर दिया -' अभी मसाला खाये हैं प्रभु।'
हमने मौजी लाल महतो जी को उन महिलाओं के लिए दो लाल चाय का भुगतान करके उनको बता दिया कि जब मन करे पी लेना। महिलाएं मुस्कराती हुई सुपारी छीलती रहीं।
आगे सड़क पर तरह-तरह के सामान बेचने की दुकानें लगीं थीं। एक महिला अपने बच्चों को पानी के बतासे खिला रही थी। बतासे वाला सड़क पर था। बच्चे सड़क पर लगे रेलिंग के पार फुटपाथ पर। हमको फ़ोटो खींचते देखकर गंभीर, जिम्मेदार मुद्रा में खड़े हो गए।
आगे सड़क पर एक लड़की जैकेट, जींस, ट्राउसर्स बेच रही थी। हर सामान सौ रुपए का। बात की बच्ची तो उसने बताया कि पढ़ती है। इतवार और छुट्टियों के दिन दुकान लगाती है। फिला रिभा नाम बताया बच्ची ने अपना। स्पेलिंग समझ में नहीं आई तो उसने मेरे मोबाइल में लिखकर बताया -Phila Ribha. मेघालय पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा की तैयारी कर रही है।
थोड़ा आगे चलकर एक गली में घुसे तो एक दुकान के अंदर से एक महिला ने सड़क से गुजरते केतली में चाय बेचने वाले को चाय का आर्डर दिया। दुकान में मौजूद लोगों की गिनती करते हुए महिला ने आर्डर दिया -वन, टू, थ्री, फॉर, फाइव टी। फाइव रेड टी। चाय वाले ने केतली से चाय निकालकर उनको दी।
वहीं आगे एक बंद दुकान के सामने प्लास्टिक के स्टूल पर बैठे दो लोग जैकेट पहने धूप सेंक रहे थे। बात करने पर पता चला कि वे लोग कोलकता और राजस्थान के हैं। सुकांत सेन (कोलकता) की म्यूज़िक की शॉप है। राज सिंहानिया (चूरू) की यूनिफ़ार्म की दुकान है। सामने ही दुकान है लेकिन गणतंत्र दिवस होने के कारण दुकान बंद करके धूप खा रहे हैं।
मेघालय के लोगों के बारे में बात चली तो हमने अपनी राय जाहिर की कि यहाँ के लोग बहुत सीधे हैं। इस पर मुस्कराते हुए उनमें से एक ने कहा -'हाँ, जलेबी की तरह सीधे हैं।' हमने पूछा ऐसा क्यों तो उन्होंने कहा -'ऐसे ही कहा, मजाक में।'
लेकिन बाद में लोगों से बात करने पर पता चला कि मेघालय के बाहर के लोगों को यहाँ व्यापार करने में तमाम अड़चने आती हैं। मेघालय के लोग तो सीधे हैं लेकिन प्रशासन के स्तर पर अक्सर मेघालय के बाहर लोगों को काफ़ी समस्याएँ होती हैं। नए काम के परमिट के पाने में तमाम झमेले हैं।
आगे एक पानी की गुमटी पर गाना सुनते पान लगाते दिनेश मिले। दिनेश बिहार के छपरा जिला के रहने वाले हैं। दुकान पिता चलाते हैं। अभी महीने भर के लिए पिता छपरा गए हैं तो दिनेश दुकान देख रहे हैं। पान लगा रहे हैं। हमने पान के लगाने के अंदाज़ की तारीफ़ की तो दिनेश बोले -'जैसा सिखाया है पिता जी ने वैसा बनाते हैं।'
दिनेश में मेघालय के बारे में अपनी राय बताते हुए कहा -'और सब ठीक लेकिन छठ में यहाँ मजा नहीं आता।'
थोड़ा आगे बढ़ने पर कांग्रेस पार्टी का बंद दफ्तर दिखा। कांग्रेस भवन लिखे दफ़्तर की छत पर राष्ट्रीय ध्वज लहरा रहा था। कोई इंसान नहीं दिखा वहाँ।
चलते-चलते पेट में दबाब महसूस हुआ। हम आसपास कोई सार्वजनिक शौचालय खोजने लगे। कोई दिखा नहीं। थोड़ा आगे रामकृष्ण मिशन विवेकानंद कल्चरल सेंटर दिखा। हम उसी में घुस गए। कोई दिखा नहीं वहाँ भी। दायें-बायें देखने पर एक जगह शौचालय दिखा। बाहर लिखा था -'केवल मिशन के सदस्यों के प्रयोग के लिए।' हमने सोचा मेंबरशिप बाद में ले लेंगे पहले इस सुविधा का उपयोग किया जाये।
शौचालय से बाहर आने पर भी कोई दिखा नहीं। हम बिना रामकृष्ण मिशन विवेकानंद कल्चरल सेंटर की सदस्यता लिए आगे बढ़ गए।
आगे एक जगह मटका टी स्टॉल दिखा। दरभंगा के मोहम्मद जाफ़िर मटका सेंवई, खीर और चाय बेच रहे थे। मटका बोल रहे थे लेकिन लिखा Mdaka था। कुल्हड़ की चाय बीस रुपये में थी। पहले हमने सोचा कि कुल्हड़ में बिकने वाली को ही यहाँ मटका चाय कहते हैं। लेकिन बाद में देखा कि मोहम्मद जाफ़िर वहाँ सुलगती अँगीठी में रखे मिट्टी के घड़े (मटके) से चाय निकाल कर दे रहे हैं। तब समझ में आया कि घड़े में रखे होने के कारण इसे मटका चाय कहते हैं।
वहीं एक युवा जोड़ा भी चाय पी रहा था। वे गुवाहाटी से आए थे शिलांग घूमने। 24 जनवरी को उनकी शादी की पहली वर्षगांठ थी। शादी की वर्षगाँठ मनाने के लिए ही वे लोग यहाँ आये थे। मोटर साइकिल से। मोटर साइकिल में कोई समस्या न हो इसलिए किसी मैकेनिक को दिखाकर नट-बोल्ट कसवाने के लिए पूछताछ कर रहे थे।
लड़के (नाम बप्पा) ने बताया कि उसके घर में लोग चाय बहुत पीते हैं। चार लोगों में एक किलो दूध की कम से कम खपत हो जाती है। लड़की (सुषमा) ने चाय पीते हुए कहा -'चाय थोड़ा ठंडी थी।'
इस पर मोहम्मद जाफ़िर ने उनको एक-एक चाय और दी। कहा-' मैडम यह हमारी तरफ़ से मुफ़्त चाय। यह गर्म है।'
हमने शिकायत दर्ज की -' मैडम को मुफ्त चाय दे रहे। हम अकेले आए इसलिए हमारे साथ भेदभाव कर रहे?'
इस पर मोहम्मद जाफ़िर ने हमें भी एक और चाय मुफ्त पिलाई कहते हुए -'लीजिये आप भी पी लीजिए ( 'आप भी क्या याद रखेंगे' नहीं कहा)। सुषमा ने बताया कि उसने एमबीए किया है। फ़िलहाल बप्पा को उनके काम में सहयोग कर रही हैं।
अपनी शादी का किस्सा बताते हुए बप्पा ने बताया कि कई साल की दोस्ती और जान पहचान के बाद शादी बनाया।
कई सालों की दोस्ती के बाद शादी का एक साल कैसा रहा पूछने पर बप्पा ने कहा -' चलता है नरम-गरम। लेकिन अच्छा है। मैनेजमेंट मैडम के ही हाथ में रहता है। मानना पड़ता है मैडम का बात उनको ख़ुश रखने के लिए।'
हमने कहा -'मैडम ने एमबीए किया तो मैनेजमेंट तो उनके हाथ में रहना ही है। अच्छी बात है।'
चलते समय हमने चाय की दुकान और उनका भी फ़ोटो लिया। इस पर सुषमा ने -'आपके साथ भी एक फ़ोटो ले लेते' कहते हुए अपने और हमारे मोबाइल में भी तीनों की सेल्फी ली।
हमने उनको शादी की सालगिरह की बधाई दी और आगे बढ़ गए। हमारी अगली मंजिल पुलिस बाजार थी जिसे लोग संक्षेप में यहाँ पीवी (PV) कहते हैं (दिल्ली के कनाट प्लेस को सीपी कहने की तर्ज पर) ।
सुपाड़ी छीलती महिलाओं का वीडियो देखने के लिए इधर आयें : https://www.facebook.com/share/r/1Ac2WhSuVy/
पहले का किस्सा पढ़ने के लिए इधर आयें :https://www.facebook.com/share/p/1G28tQZQJV/
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