Sunday, January 04, 2026

साल की पहली टहलाई

 


कल आशियाना जाना हुआ। आशियाना लिखते हुए पहले शामियाना लिख गया। फिर सही किया। वैसे आशियाना और शामियाना दोनों में ही रहने/ठहरने के इंतजाम हैं। आशियाना स्थाई, शामियाना अस्थाई।

शब्द साम्य के चलते इस तरह की चूक अक्सर हो जाती है। 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' की जगह 'बेटी बचाओ, बेटी पटाओ' बोल जाते हैं माननीय । अपन ने आशियाना को शामियाना फ़ौरन कर लिया। माननीय 'पटाओ ' की जगह अभी तक 'पढ़ाओ' नहीं कह पाए। नतीजतन लोग माननीय के उद्बोधन का पालन करने में लगे हैं। जो बेटी पट नहीं रही है उसे निपटा दे रहें हैं। 'बेटी पटाओ, न पटे तो निपटाओ' पर अमल कर रहे हैं।
ऑटो वाला अपने को पूरा ढँके हुए था। हमने कहा -'जाड़ा बहुत है।' सुनते ही उसने अपने नवजात बच्चे को सर्दी लगने की कहानी बयान करना शुरू किया। घर वालों ने कहा एक महीने के बच्चे को घर लाने, दिखाने को कहा। पूर्वांचल में घर ले गया बच्चे तो वहाँ सर्दी लग गई। लौटकर लखनऊ अस्पताल में दिखाया। तीन दिन आई सी यू में रहा। अब जनरल वार्ड में है। दो-चार दिन में छुट्टी हो जायेगी। यह उसका तीसरा बच्चा है।
सहज भाव से हमने पूछा -' तीन बच्चे हो गए। ऑपरेशन करा लिया कि अभी गिनती आगे बढ़ेगी?'
उसने बताया कि आपरेशन नहीं कराया लेकिन अब बच्चा नहीं होगा।
हमने कहा -'ये मजेदार है। आपरेशन नहीं कराया लेकिन कान्फ़िडेंस इतना तगड़ा कि बच्चा अब नहीं होगा। तो क्या बच्चे पैदा होने में भी OTP सिस्टम लागू हो गया। OTP नहीं तो बच्चा नहीं।'
सुनकर वह हंसने लगा। फिर बताया कि घर और ससुराल में काफ़ी ज़मीन है। खाने-पीने की कभी नहीं। संयुक्त परिवार है। खानदान का एक लड़का कनाडा पढ़ाई के लिए जा रहा है। वीजा के लिए पूरे खानदान की संपत्ति उसकी बताई गई है।
ठीहे पर पहुँचकर CGHS डिस्पेंसरी कहीं दिखी नहीं जहाँ हमको जाना था। हमने फिर से गूगल किया। आगे बढ़ने को बोला। करीब दो किलोमीटर आगे जाकर गूगल के हिसाब जहाँ डिस्पेंसरी दिख रही थी वहाँ उतर गए।
गूगल पे से किराया देने की कोशिश की। बैंक का सर्वर डाउन मिला। पैसा गया नहीं। ड्राइवर के पास पाँच सौ रुपये के छुट्टे थे नहीं। 55 रुपए भुगतान के लिए ड्राइवर का स्कैनर का फोटो बेटे को भेजा। बेटे ने भुगतान किया तो डिस्पेंसरी का रूख किया।
पता चला डिस्पेंसरी अभी भी दूर ही थी। दूरी चंद्रमा की कलाओं की तरह बदलती रही। कभी डेढ़ किलोमीटर, कभी सवा किलोमीटर, कभी सवा दो किलोमीटर। नए साल में गूगल पूरे मौज के मूड में था। आख़िर में इधर-उधर होते हुए डिस्पेंसरी पहुंच ही गए।
डिस्पेंसरी से दवा लिखवाई। वापस लौटते हुए सड़क के नजारे देखते हुए लौटे। एक नर्सरी वाला अपने ग्राहक से कह रहा था -'कभी मोदी-सोदी आते हैं तो वहाँ भी जाते हैं फूल।' हमको लगा उसको टोंके कि थोड़ा इज्ज़त से नाम ले माननीय जी का। लेकिन फिर यह सोचकर कि कहीं टोंकने पर ठोंक न दिए जाएँ, हम कुछ बोले नहीं। आगे बढ़ गए।
एक होटल के सामने सड़क पर एक आदमी साइकिल के डंडे पर लगे ग्राइंडर से होटल वाले की चाकुओं पर धार लगा रहा था। साइकिल के आगे चाकू और ताले लगे थे। बिक्री के लिए। साइकिल पर बंधे भोंपू से चाकूओं पर धार लगाने का आह्वान वाला टेप चल चल रहा था। पहले लोग ग्राइंडर कंधे पर लादे -चक्कू, छुरियाँ तेज करा लो कहते हुए गली-गली घूमते थे। अब गली में चाकू और कैंची में धार लगाए कम दिखते हैं।
हमने कुछ देर चाकू पर धार लगती देखी। उसका वीडियो बनाया और आगे बढ़ गए।
आगे एक जगह बदनाम वेज बिरियानी का ठेला दिखा। हमने उससे पूछा कि -'बदनाम वेज बिरियानी लिखने से क्या ज्यादा बिकती है बिरियानी?' वह हँसने लगा। हमें लगा शायद कहेगा -'घंटा बिकती है।' लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं कहा। हमें लगा इंदौरी और लखनवी का अन्तर है यह। लेकिन उसने बताया कि वह बहराइच का रहने वाला है। डेढ़ साल पहले ही दुकान खुली थी।
'बदनाम वेज बिरियानी' देखकर लगा कि लोगों को लगता है कि बदनामी में ज़्यादा बरक़्कत है। इसीलिए ऐसी हरकतें करते हैं जिससे जितनी जल्दी हो सकें वे बदनाम हो जायें। कोई गाली-गलौज करता है। कोई ऊटपटाँग हरकतें करता है।
बदनाम 'घर जैसन' ठेले पर राजमा चावल, छोला चावल, कढ़ी चावल बिक रहा था। बालक ने अंगड़ाई लेते हुए बताया कि वह गोंडा का रहना वाला है। उसने हमने पूछा -'लगायें प्लेट आपके लिए?' हम बोले -'अब घर जैसन खाना घर जाकर ही खाएँगे।'
वहीं बगल में चटखारा जलपान चाट कार्नर पर चाट का हिसाब-किताब लगा था। लेकिन कोई चाट खाता नहीं दिखा।
गंगा टी स्टॉल पर लटकी नमकीन के पैकेटों ने और उसके आगे खड़ी लड़की ने मिलकर दुकान का नाम छिपा सा दिया था। जैसे गंगा का प्रदूषण उसपर पसरा रहता है।
सड़क पर लाइन से लगे खाने-पीने के ठेलों के सामने लोगों की भीड़ निकलती दिखी। कारण खोजने पर पता चला कि सामने अस्पताल है। अस्पताल का नाम लोकबंधु राजनारायण जी के नाम है। राजनारायण जी के खाते में कम से कम तीन प्रधानमंत्री बदलवाने का रिकार्ड है। पहले इंदिरा गांधी जी के ख़िलाफ़ मुक़दमा करके आपातकाल की भूमिका लिखी। आपातकाल के बाद इंदिरा जी अपदस्त हुईं। इसके बाद मोरार जी को प्रधानमंत्री पद से हटाकर चरणसिंह जी को प्रधानमंत्री बनवाया। राजनारायण जी को लोग चरणसिंह जी का हनुमान कहते थे। उनसे भी नाराज हो गए। परिणामत: चरणसिंह जी की कुर्सी भी गई।
राजनारायण जी जब इंदिरा जी को हराकर रायबरेली से सांसद हुए तो उनके नाम कई भदेस भाषा वाले डायलॉग जुड़े। सुना है एक बार रायबरेली के लोगों के बारे में बयान देते हुए कहा था -'जो लोग इंदिरा जी के नहीं हुए जिन्होंने रायबरेली के लिए इतना कुछ किया वो हमारे क्या होंगे?'
अस्पताल के आगे ही ज्योतिबा फुले पार्क दिखा। बाहर चाय-पानी की दुकान। हमारे टहलने के लिए मुफीद जगह। पता चला वरिष्ठ नागरिकों के लिए टहलना मुफ्त है। हमने पूछा -' वरिष्ठता के लिए आधार चल जाएगा ? ( मन में सोचा -' SIR तो नहीं करवायेगा अगला)।' उसने कहा -'शक्ल से अंदाज़ लग जाएगा। शक होगा तो प्रमाण मांगेंगे।'
घर से दो किलोमीटर है पार्क। टहलने जाने पर आने-जाने में ही चार किलोमीटर हो जाएगा। बाक़ी वहाँ टहले लेंगे।
रास्ते में एक लाइब्रेरी भी दिखी थी। बुद्धा लाइब्रेरी। तीसरी मंजिल पर थी लाइब्रेरी। ऊपर गए तो पता चला कि यहाँ किताबें नहीं हैं केवल पढ़ने की जगह की व्यवस्था है। लोग मुंडी झुकाये पढ़ रहे थे। यह व्यवस्था उन कंप्टीशन में बैठने वाले लोगों के पढ़ने की जगह के इंतजाम के लिए है।
मुझे याद आया कि शाहजहांपुर में हम लोगों ने भी बच्चों के पढ़ने के इंतजाम के लिए लाइब्रेरी की व्यवस्था की थी। कई बच्चे आते थे। पढ़ते थे। कंप्टीशन की तैयारी करती थे। लेकिन वह बाद में दूसरी अव्यवस्था का शिकार होकर बंद हो गई।
आगे ही तरण ताल भी दिखा। सोचा यहाँ तैरना भी सीख लेंगे। लक्षद्वीप गए तो स्कूबा डाइविंग के बाद तय किया था कि तैरना सीखना है। जाड़ा थोड़ा कम हो तब तैरना सीखा जाये। कितने दिन में काम भर का सीख जाएँगे तैरना?
घर आकर सोचा कि इस इलाक़े से रोज़ गुजरते थे। लेकिन इतने नज़ारे नहीं दिखते थे जितने पैदल चलते हुए दिखे। यह हमारी साल की पहली टहलाई थी।

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