Friday, March 27, 2026

शहीदों की प्रतिमाओं का पुनर्स्थापन

 

शहीदों की प्रतिमाओं का पुनर्स्थापन 

शहीदों की नगरी शाहजहांपुर में शहीद दिवस के दिन शाहजहांपुर के  शहीदों की प्रतिमाएं ढहा दी गईं थीं। प्रतिमाओं को बुलडोजर से ढहा देने के बाद डम्पिंग ग्राउंड में फेंक दिया गया था।  घटना की जिम्मेदारी लेने वाला कोई मिला नहीं। महापौर , नगर निगम आयुक्त किसी को पता नहीं चला। बुलडोजर चल गया। लगता है बुलडोजर बाबा के जमाने में बुलडोजर भी मनचले हो गए हैं। अपने आप चलने लगे हैं। 


इस घटना का शहर में व्यापक विरोध हुआ। शहर के विकास पुरुष का कोई बयान नहीं आया। बुलडोजर बाबा के आदेश पर नगर निगम के दो अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया। ठेकेदार ब्लैक लिस्ट हो गया। परसाई जी की बात याद आ गई :


"शासन का घूँसा किसी बड़ी और पुष्ट पीठ पर उठता तो है, पर न जाने किस चमत्कार से बड़ी पीठ खिसक जाती है और किसी दुर्बल पीठ पर घूँसा पड़ जाता है।"


शहर के लोगों के व्यापक विरोध के बाद आनन-फानन में मूर्तियां जोड़-जाड़ कर फिर से स्थापित की गईं। जिन लोगों ने मूर्तियां गिराये जाने पर कुछ नहीं कहा था वे भी लपकते हुए मूर्तियों को माला पहनाते दिखे। सीमेंट के खंभों पर बिना उद्घाटन नामपट्ट के शहीदों की प्रतिमाएं फिर से स्थापित हो गईं। 


मूर्तियों पर उद्घाटन कर्ताओं के नाम दर्ज करवाना जनप्रतिनिधियों का बड़ा लालच होता है। जिसके नाम जितने ज़्यादा नामपट्ट लगते हैं वह अपने को उतना अमर समझता है। एक बोरी सीमेंट और सौ ईंटों से बने निर्माण पर भी नाम पट्ट लगाने के लिए लालायित रहते हैं लोग। कई बार निर्माण से ज़्यादा खर्च नामपट्ट में होता है। 


किसी इमारत के उद्घाटन में लोकार्पण की परम्परा फौरन बंद होनी चाहिए। नाम लिखे जाना बंद हो जाना चाहिए। अधिक से अधिक इमारत के बनने का समय लिखा जाना चाहिए। लेकिन  ऐसा होने लगे तो फिर जनप्रतिनिधि बेचारे किस मुँह देश सेवा का कर सकेंगे। उनका उत्साह मारा जाएगा।


सैफ का बनाया रेखाचित्र 

इस पूरे घटनाक्रम पर  Sudhir Vidyarthi जी की पोस्ट यहाँ पेश है। सुधीर विद्यार्थी जी ने देश के क्रांतिकारियों पर अनेक पुस्तकें लिखी हैं। शहीदों के सम्मान में उनके जन्मस्थल, कारावास जहाँ क्रांतिकारी बंदी रहे और विभिन्न स्थलों पर प्रतिमाएं स्थापित करवाने में भी सक्रिय भूमिका अदा की। शाहजहांपुर में भी शहीदों की प्रतिमाएं गिराये जाने पर लोगों को इस घटना की सूचना देने के बाद उनका सक्रिय,तीखा विरोध किया। शहीदों की मूर्तियां फिर से लगाए जाने में उनके तीखे विरोध की भी बड़ी भूमिका रही। सुधीर विद्यार्थी जी की पोस्ट : 


काकोरी शहीदों के बुत फिर आ खड़े हुए! ************************************

             कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

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सत्ता की बेशर्म राजनीति और सरकार के चालू कल-पुर्जों का ’करिश्मा’ देखिए कि शाहजहांपुर की सरजमीं पर बुत बने खड़े काकोरी के अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाकउल्ला खां और रोशन सिंह, जिन्हें 19 दिसम्बर, 1927 को फांसी पर चढ़ाकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने चैन की नींद सोने का सपना देखा था जो अंततः 15 अगस्त, 1947 को आज़ादी के सवेरे के साथ ध्वस्त हो गया। हम आज़ाद हो गए।

 

            और फिर स्वतंत्रता के रजत जयंती वर्ष 1972 में इस शहर की ज़मीन पर खड़ी की गई उनकी बेजान मूर्तियों को 23 मार्च, 2026 की रात्रि में चोरी-चुपके प्रशासन की बेरहम, अंधी और असंवेदनशील बुलडोजरी ताकत ने अपने नुकीले पंजों से फिर ज़मींदोज़ करने जो षड्यंत्र रचा, उसका नाकामयाब ’ड्रामा’ सिर्फ चंद (चार) दिनों में ही नेस्तनाबूद हो गया और उन्हें शहीदों को अपनी धरती पर पुनर्स्थापित करने पर मजबूर कर दिया। 


जब काकोरी शहीदों के भग्नावशेष बोल उठे

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           दरअसल, जब काकोरी के इन शहीदों की प्रतिमाएं बुलडोजर से गिराकर मिट्टी में मिला कर उनके भग्नावशेष (प्रशासन की भाषा में मलवा) शहर से बाहर डंपिंग ग्राउंड में डलवा दिया गया, तब लोगों को सवेरे उनके इस ’क्रांतिकारी कारनामे' का पता चला। गनीमत यह कि हमारी भी नींद समय से खुल गई। 


           लोग शहरों-शहरों बोल उठे। शाहजहांपुर ही नहीं, इलाहाबाद, लखीमपुर खीरी, लखनऊ, संगरूर, जालंधर, बरेली, रुद्रपुर, मेरठ, मुरादाबाद, उदयपुर और देश के अनेक  दूरस्थ इलाकों से एक साथ आवाजें उठीं---’काकोरी शहीद ज़िंदाबाद’, ’उत्तर प्रदेश सरकार मुर्दाबाद’, ’ज़िला प्रशासन और नगर निगम अधिकारी हाय-हाय’। 

           ये आवाजें सत्ता के पिछलगुओं के अलावा हर कंठ से उठीं। विदेशों में कनाडा, कैलिफोर्निया, जर्मनी, लाहौर तक यह स्वर गुंजायमान हुआ।


बे-लगाम व्यवस्था की छाती पर शहीद प्रहार करते रहेंगे

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         प्रशासन की मुंदी आँखें जैसे भौचक्की रह गईं। स्वनामधन्य जिलाधिकारी बौखलाहट में ज़िले के काकोरी शहीदों की गिनती तीन से बढ़ाकर चार बता रहे थे, मेयर महोदया कह रही थीं कि उन्हें कोई जानकारी नहीं बल्कि वे नवरात्रि के व्रत में डूबी थीं, नगर आयुक्त भी हड़बड़ी में खुद की जिम्मेदारी से पूरी तरह पल्ला झाड़ रहे थे, और सूबाई सरकार में इस शहर के प्रतिनिधि और कैबिनेट मंत्री के मुंह पर तो जैसे मजबूत वाला टेप चिपका दिया हो। 


          गौरतलब यह कि अधिकारीगण ठेकेदार पर दोषारोपण कर रहे थे और ठेकेदार मजदूरों को मुजरिम मान रहे थे। मैंने कहा कि शायद इस प्रकरण में अपराधी कोई और नहीं, सिर्फ बुलडोजर है जो रात्रि के अंधेरे में खुद चलकर गया और उसने शहीद प्रतिमाओं को ध्वस्त कर दिया।


शहीदों का विस्थापन ना-मुमकिन है

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           25 मार्च को दोपहर शहर में हमारी प्रेस कांफ्रेंस से पहले नगर आयुक्त महोदय ने फोन कर मुझसे कहा कि वे मिलकर कुछ बात करना चाहते हैं। मैंने दो घंटे बाद का समय निर्धारित किया। वे होटल में मिलने आए, लेकिन यह भी सही है कि बढ़ते जनाक्रोश के बीच प्रशासन ने तीन दिन के भीतर गुपचुप ढंग से फैसला ले चुके थे कि शहीद प्रतिमाओं के खंडित अवशेषों को जोड़-गांठ कर और रंग-रोगन पोत कर उन्हें पुनर्स्थापित कर दिया जाए। वही उन्होंने मुझे बताया। यह भी कहा कि वे शर्मिंदा है कि अपने कार्यकाल में उन पर यह कलंक लगा। उन्होंने यह भी बताया कि दोषियों के विरुद्ध FIR करा दी गई है, कुछ सस्पेंशन हुए हैं, और किसी को छोड़ा नहीं जाएगा। रात भर में मूर्तियों के नए ’बेस’ तैयार करा लिए गए और 26 मार्च को बहुत सबेरे शहीदों के ज़ख्मों और टूटे बुतों के टुकड़ों पर पॉलिश पोत कर फिर बेहयाई के साथ उन्हें खड़ा कर दिया गया।


          इसके बाद नगर आयुक्त महोदय ने पुनः स्थापित किए गए बुतों की तस्वीरें मुझे व्हाट्सएप पर भेजीं। शहीद अशफ़ाकउल्ला के पौत्र को मैंने अब वहां होने वाले उस ’जश्न’ में जाने से रोक दिया जिसे थोड़ी देर में वह बेशर्म सत्ता आयोजित करने वाली थी जिसमें फिर महापौर महोदया को न जाने किस मुंह से काकोरी शहीदों और भारतमाता की जय का नकली उदघोष करना पड़ा। अद्भुत नज़ारा और अनोखी निर्लज्जता! इस अवसर पर वहां न जाने ऐसे कितने लोग अपनी हाजिरी देकर अपनी फोटोएं उतरवा रहे थे जो चार दिन पहले शहीदों के लिए गए इस ’वध’ में शामिल थे।


 शहीद फिर सीना तान कर खड़े हो गए

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          देश और मनुष्यता के लिए शहीद होने वाले क्रांतिकारी रक्त-बीज हैं। उन्हें ज़मीन में दफ़नाओगे तो वे फिर अपने छाती फुलाकर उठ खड़े होंगे। 

                    साम्राज्यवादी सरकारें मुर्दाबाद! 

                        अमर शहीद ज़िंदाबाद!!


सुधीर विद्यार्थी जी की पोस्ट का लिंक : https://www.facebook.com/share/p/1CnYGdAnuK/?mibextid=wwXIfr

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