Friday, June 26, 2026

संस्कारी युवा पीढ़ी


 चारबाग रेलवे स्टेशन पर चाय पीते हुए अगल-बगल के नजारे भी देखते रहे। लोग आ-जा रहे थे। स्टेशन से गाड़ियों के आने-जाने की सूचनाएँ प्रसारित हो रहीं थीं। कोने के जीने से स्टेशन से बाहर की तरफ़ आने वाले यात्रियों की भीड़ देखकर लगा कि किसी ने आदमियों से भरा बोरा सीढ़ियों पर उलट दिया हो।

चाय जी दुकान के बगल में एक लड़का-लड़की अलग-अलग पोज में फ़ोटो खींच-खिंचा रहे थे। लड़के ने लड़की की कई पोज में फ़ोटो खींची। लड़की ने लड़के की। ढेर सारे अंदाज़ में साथ खड़े होकर सेल्फी भी ली दोनों ने। सेल्फी भी कभी लड़का लेता, कभी लड़की। कैमरे के सामने मुस्कराते हुए फ़ोटो ले रहे थे। लगातार मुस्कराने के चक्कर में जबड़े दर्द कर रहे होंगे। देर तक फ़ोटो यज्ञ चलता रहा।
लड़के के बाल खासे बड़े थे। गले में हेयर बैंड लटकाये था। लड़की के बाल सामान्य। दोनों ख़ुश मुद्रा ने थे। चहक़ योग कर रहे थे।
बात करने के लिहाज़ से मैंने मुफ़्त ऑफ़र दिया -‘ लाओ तुम्हारी साथ में फ़ोटो खींच दें।’ बालिका उत्साहित दिखी। लेकिन बालक ने सर झटक कर मना कर दिया। बालक ने बालिका को जिस अंदाज़ में देखा उसका कोई अनुवाद करता तो लगता वह कह रहा था -‘ अपन लखनऊ में किसी दूसरे से फ़ोटो नहीं खिंचवायेंगे।’
बालिका से बातचीत की। पता चला भोपाल से आए हैं लखनऊ। घूमने। बालिका ने अपना नाम बताया पल्लवी, बालक का राहुल। दोस्त हैं दोनों।सहज मिडिलची मानसिकता के प्रभाव में सोच लिया कि घर से बिना बताये आए हैं दोनों घूमने।
इसके बाद हाल की तमाम घटनाओं को बिना सिलसिले के याद किया। अपने-आप। पहले के दिनों के हिसाब से सोचते तो यही लगता कि बालक , बालिका को बहाने से लाया है साथ। लेकिन हाल की कुछ घटनाओं ने इस सोच को ख़ारिज किया। आख़िर ने तय किया कि कोई किसी को बरगलाकर नहीं लाया है। उम्र साथ लाई है दोनों को।
लड़का चंचल लग रहा था। समझदार होने का पूरा दिखावा कर रहा था। हमने लड़की से और बातचीत करने का प्रयास किया। लेकिन बालक अपनी मित्र को समेट के दूर कोने में ले गया। नए अंदाज़ में सेल्फी लेने के लिए। हमने बालक को दुष्ट मान लिया। दूसरों के बारे में राय बनाने में हम सहज सिद्ध होते हैं।
कुछ देर बाद बालक ने जेब से सिगरेट निकाली। सुलगाई। कश लेकर धुंआ हवा में छोड़ दिया। हमें लगा उसको टोंके-‘ भोपाली बालक, तुम भोपाल से लखनऊ की हवा ख़राब करने आए हो?’ लेकिन बोले नहीं।
दो-चार सुट्टे लगाने के बाद बालक ने सिगरेट बालिका को पकड़ा दी। बालिका ने भी सहज अंदाज़ में सुट्टे लगाए। देखकर लगा सिगरेट सुट्टा अभ्यासी है बालिका।
सिगरेट के कश खाते हुए बालिका ने इधर-उधर भी देखा। हम भी उसकी निगाह में आए होंगे। उसने हमको अपनी तरफ़ देखते देखा शायद। देख तो रहे ही थे हम उन दोनों को। दोनों घूम गए। पीठ हमारी तरफ़ करके सुट्टा लगाने लगे। हमको लगा-‘ बालिका कितनी संस्कारी है। बुजुर्गों का कितना लिहाज करती है। उनकी निगाह बेचकर सिगरेट पीती है। लोग ‘ बे-फ़ालतू’ में युवा पीढ़ी पर संस्कारहीन होने का आरोप लगाते हैं।’
सोचते तो हम और भी बहुत कुछ। लेकिन तब तक हमारे बेटे की ट्रेन आ गई। बेटा बाहर आ गया। हम उन बालक-बालिका के बारे में सोचने का काम वहाँ मौजूद जनता की सौंप कर बेटे के साथ घर की तरफ़ चल दिए।

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