फ़ुरसतिया

हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै

Thursday, September 15, 2016

स्वराज वृद्धाश्रम

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परसों हम फ़िर पूछते-पांछते पहुंचे स्वराज आश्रम। पनकी स्थित इस आश्रम के रास्ते में केडीए के तमाम फ़्लैट बनते दिखे। किसी खाली जमीन पर किसी पब...

दिलीप घोष

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सबेरे स्वराज वृद्धाश्रम के बारे में लिखा तो दिलीप घोष जी का जिक्र छोड़ दिया। सोचा तसल्ली से और तफ़सील से लिखेंगे। तो आइये आपको मिलवाया जाये ...
Wednesday, September 14, 2016

ये सब तो ऊपर वाला करता है

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कल छुट्टी थी। बकरीद की। वैसे बुढवा मंगल भी था आज ! सबेरे तैयार होकर निकल लिये शहर मुआयने के लिये। आज फ़ैक्ट्रियों की छुट्टी थी। उनके बाह...

हिन्दी दिवस के कुछ अनुभवों से

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१. सितम्बर का महीना देश में हिन्दी का महीना होता है। हिन्दी नहीं, राजभाषा का। देश भर में राजभाषा माह, पखवाड़ा, सप्ताह, दिवस मनाया जाता है। ...

कर्मवीर

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देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं। रह भरोसे भाग के दुख भोग पछताते नहीं काम कितना ही कठिन हो किन्तु उकताते नही भीड़ में चंचल बने जो ...
Monday, September 12, 2016

तलवार की जगह एटीएम कार्ड

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कल इतवार था। कई सारे कामों की लिस्ट लटकाये हम ऐसे निकले जैसे कभी राजा महाराजा लोग दिग्विजय के लिये निकलते थे। राजाओं को उनकी पत्नियां तलव...
Sunday, September 11, 2016

अरे भाई मेरे इतवार

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अरे भाई मेरे इतवार जरा हौले चलो यार। हफ्ते भर बाद मिले हो आते ही जाने को तैयार। आओ बैठो चाय पियो, थोड़ा बतियाते हैं यार। --कट्टा कान...
Saturday, September 10, 2016

संतोष की सांस

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कल घर से निकलते समय हमने अपनी गाड़ी का मुखड़ा देखा। दफ़्तर से लौटते समय एक आटो अनजान तरीके से मेरी गाड़ी को रगड़ता चला गया था कुछ ऐसे जैसे भीड़ ...
Wednesday, September 07, 2016

व्यंग्य के बहाने-2

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"अनूप शुक्ल कहते हैं कि कोई मठाधीशी नहीं है| हँसी आती है उनकी सीमित ज्ञान और अनुभव पर आधारित मान्यताओं पर| अरे, लिखने से पहले किसी भ...

मॉल मे दबा हमारा मुफ़्त का सामान

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इतवार को करने को खूब सारे काम जमा हो जाते हैं करने को। 6 दिन के कामकाजी दिन जो तमाम काम छोड़ देते हैं वो बेचारे इतवार को निपटाने होते हैं...
Monday, September 05, 2016

ये वाला पेड़ हमको फ़ैलने नहीं देता

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आज सबेरे निकले तो घर के बाहर ही एक कुत्ता पीठ के चारो टांग ऊपर किये सड़क से पीठ खुजा रहा था। पीठ के जिस हिस्से में खुजली हो रही ...
Saturday, September 03, 2016

'मॉर्निंग, मॉर्निंग', 'सूरज, सूरज'

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कल सुबह चार बजे उठे। हड़ताल थी न कल। इसलिए जल्ली जाना था। हड़ताल सुबह 6 बजे से शुरू थी। हमको उसके पहले जमा हो जाना था फैक्ट्री में। तैयार ...
Thursday, September 01, 2016

व्यंग्य के बहाने

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कल सुबह व्यंग्य पर कुछ लिखना शुरू किया था। पूरा नहीं हुआ तो सोचा बाद में लिखेंगे। सेव करके छोड़ दिया। दोपहर को लंच में जब समय मिला तो जित्त...
Wednesday, August 31, 2016

व्यंग्य के बहाने -१

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व्यंग्य लेखन के बारे में अक्सर छुटपुट चर्चायें होती रहती हैं। लोग अपने अनुभव के हिसाब से बयान जारी करते रहते हैं। शिकवा, शिकायतें, तारीफ़...
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अनूप शुक्ल
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