फ़ुरसतिया

हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै

Sunday, November 13, 2016

न से नमक

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दो दिन पहले कई जगह नमक ’ब्लैक’ में बिका। नमक को लगा होगा कि जब धन काला हो सकता है तो नमक क्यों नहीं। लोकतंत्र में काला होने का सबको बराबर ...
Tuesday, November 08, 2016

हम लायें इन किरणों को धुंध से निकालकर

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आज सुबह निकले तो देखा सूरज भाई आसमान पर विराजमान थे। चेहरा अलबत्ता कुछ झटक गया सा लग रहा था। थोड़ा कुम्हलाया हुआ। देखते ही जिस त...
Monday, November 07, 2016

छठ पूजा का आयोजन

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आज सबेरे जरा टहलने निकले। बाहर देखा सूरज भाई अभी तक हाजिर नहीं हुये थे। मन किया अब्सेंट लगा दें लेकिन फ़िर नहीं लगाई। उजाला उनके पायलट के ...
Sunday, November 06, 2016

बुलेट ट्रेन के युग में लबढब व्यंग्य लेखन

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अजीब बवाल है यार है। यही दिन देखने को बचे थे। लिखने के पहले विषय तय करना पड़ेगा। ये तो ऐसा ही हुआ जैसे अपने घर में परिचय पत्र दिखा के घुसन...
Saturday, November 05, 2016

मैं जिन्दगी पर बहुत एतबार करता था

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आज सबेरे जल्दी ही ’हकाल’ दिये घर से। घरैतिन को लगता है दफ़्तर समय पर ही जाना चाहिये। लगता तो हमको भी है लेकिन अपन का आलस्य से गठबंधन ...

दफ़्तर समय पर ही जाना चाहिये

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आज सबेरे जल्दी ही ’हकाल’ दिये घर से। घरैतिन को लगता है दफ़्तर समय पर ही जाना चाहिये। लगता तो हमको भी है लेकिन अपन का आलस्य से गठबंधन कुछ ...
Friday, November 04, 2016

हर तरफ मंगतों का हुजूम है

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किरन और करन शाम को जब दफ़्तर से घर लौटने पर अक्सर ही टाटमिल चौराहे पर ट्रैफिक सिग्नल की मेहरबानी से कुछ रुकना होता है। गाड़ी रुकते ही लप...

मांगने वाले बढ़ रहे हैं देने वाले घट रहे हैं

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शाम को जब दफ़्तर से घर लौटने पर अक्सर ही टाटमिल चौराहे पर ट्रैफिक सिग्नल की मेहरबानी से कुछ रुकना होता है। गाड़ी रुकते ही लपककर क...
Sunday, October 30, 2016

दीपावली मतलब अंधेरे के खिलाफ़ उजाले की सर्जिकल स्ट्राइक

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दीपावली को रोशनी का त्योहार माना जाता है। त्योहार के आते ही अंधेरे को निपटाने की बातें शुरु हो जाती हैं। गोया अंधेरा न हुआ जानी दुश्मन हो...
Sunday, October 23, 2016

आस्तिक कि नास्तिक

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जो लोग ईश्वर को मानते हैं उनके हिसाब से दुनिया में जो हो रहा है उस सबका कर्ता-धर्ता भगवान ही है। वही लोगों को बनाता है। वही निपटाता है। ...
Thursday, October 20, 2016

बातें बनाना सीखें

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सुबह जब घर से निकलते हैं तो तमाम नजारे दिखते हैं। उनको देखते हुये लगता है कि अब्बी इसी पल इसे लिख दिया जाना चाहिये। लेकिन आगे न...
Sunday, October 16, 2016

मौसम है आशिकाना

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कल एक मित्र से बात हो रही थी। उन्होंने पूछा –’ तुम्हारे उधर का मौसम कैसा है?’ हमने कहा – आशिकाना। यह कल की ही बात नहीं। हमसे कोई भी ...
Friday, October 14, 2016

दिखते नहीं, मिलते नहीं

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कल सबेरे जरा बाहर निकले। सूरज भाई दिखे बहुत दिन बाद ! खिल गये। हंसते हुये हाल-चाल लिये दिये। उनके साथ की किरणें आसपास के पेड़,पौधों, फ़ूल, ...
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अनूप शुक्ल
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