Monday, April 28, 2025

मेरी निगाह में कश्मीर

 कश्मीर पहली बार हम गए थे जुलाई, 2022 में। इसके बाद अगस्त, 2023 में। इसके पहले कश्मीर के बारे में सिर्फ़ सुना था। जो सुना था उससे कश्मीर के जो छवि बनी थी वह मिली, जुली थी। वहाँ की ख़ूबसूरती, डल झील, गुलमर्ग, पहलगाम, सोनमर्ग की ख़ूबसूरती के किस्से सुने थे। वहाँ घटी आतंकवादी घटनाओं की डरावनी कहानियाँ भी सुनी थी। कश्मीरी पंडितों के कश्मीर से पलायन के किस्से भी सुने थे।

पहली बार अकेले गए थे। ठहरने की जगह डल झील से थोड़ी ही दूर थी। उस समय वहाँ पर्यटकों की भीड़ थी। श्रीनगर के चप्पे-चप्पे पर सेना के जवान थे। मुख्य बाज़ार के लगभग हर चौराहे पर सेना के जवान दिखे। कहीं टैंक भी साथ थे। हमारी आयुध निर्माणियों के बने टैंक। उनमें देश के अलग-अलग हिस्से के रहने वाले सैनिक तैनात थे। बड़े चौराहों पर टैंक के साथ लगता कि कोई मिनी छावनी है।
सैनिक लोग मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी देते दिखे। वे स्थानीय लोगों से बातचीत नहीं करते थे। न ही स्थानीय लोग उनसे बात करते। आम स्थानीय लोगों ने बताया कि सेना के लोगों से उनको कोई तकलीफ़ नहीं है। सेना के लोग भले लोग हैं। अलबत्ता स्थानीय पुलिस से शिकायतें थीं उनको। हमारे ड्राइवर ने बताया कि पुलिस वालों ने आतंकवादी गतिविधियों के समय तमाम निर्दोष लोगों को बंद कर दिया। कुछ लोग बड़ी रक़म देकर छूट गए, बहुत लोग बंद रहे। बहुत से नौजवानों की ज़िंदगी तबाह हो गई। स्थानीय पुलिस/प्रशासन के प्रति उनमें ग़ुस्से को भुनाते हुए कट्टर लोगों को अपने साथ मिला लिए। बदले की आग में उनमें से कुछ आतंकवादी गतिविधियों में भी शामिल हो गये।
स्थानीय खानदानी नेताओं के प्रति लोगों के मन में यह धारणा थी कि उन्होंने अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए भारी सम्पत्ति बनाई है। कश्मीर की बेहतरी के लिए काम नहीं किया है। पूरे देश के नेताओं के बारे में आम जनता में यही आम धारणा है।
जब मैं पहली बार गया था उसके कुछ दिन पहले ही कोविड का हल्ला ख़त्म हुआ था। कोविड के दौरान पर्यटक आए नहीं थे कश्मीर। पर्यटन पर निर्भर लोगों की आमदनी ठप्प थी। हमारे ड्राइवर ने बताया कि उन्होंने अपनी खुद की कार ख़रीदी थी। कोविड के दौरान किस्त न चुका पाने के कारण और अपने पिता की बीमारी के चलते उनका इलाज करवाने के लिए उनको अपनी कार बेचनी पड़ी।
जितने भी लोगों से मैं मिला वे सब बहुत मिलनसार। अच्छे व्यवहार वाले। ख़ुशनुमा और सहायक लोग। भाई चारा और भलमनसाहत की मिशाल वाले। मैं कश्मीर के उन इलाक़ों में भी गया जहाँ कभी नियमित आतंकवादी घटनाओं के किस्से सुने जाते थे। लालचौक और पुराना श्रीनगर का इलाक़ा जहाँ जाना कभी ख़तरनाक समझा जाता था। लालचौक का इलाक़ा चहल-पहल भरा दिखा। एक जगह वहाँ सड़क पर कैरम खेलते लोग दिखे।
पुराने श्रीनगर के इलाके में सुबह के समय स्कूल जाते बच्चे, उनको बस में बैठाने के लिए आए घर के लोग दिखे। एक जगह स्कूल जाती बच्ची ने बातचीत के दौरान मेरा चश्मा छीनकर अपनी आँख में लगा लिया। मेरे पेट पर तबला सा बजाते हुए पूछा -'ये क्या है?' उसकी माँ ने बच्ची की हरकत को हंसते हुए देखा और मेरा चश्मा वापस दिलवाया।
उसी जगह स्कूल जाती बड़ी उमर की बच्चियाँ भी दिखीं। उनसे बातचीत के बाद उनके फ़ोटो खींचे। उनसे नाम पूछने पर उन्होंने बताया। हमने दुबारा पूछा तो उनमें से एक बच्ची ने मेरे हाथ से मोबाइल से झटककर अपना नाम लिखा और मोबाइल वापस कर दिया। स्कूल जाती लगभग सारी बच्चियाँ हिजाब में दिखीं। उनको डर था कि कोई हिजाब न पहनने पर कोई अनहोनी हो सकती है। पहलगाम की बेताब वैली में कई स्कूली लड़कियों ने हमारे परिवार के साथ फ़ोटो खिंचवाया। अपना इंस्टाग्राम खाता साझा किया।
लाल चौक के पास ही एक मंदिर दिखा। जिस परिवार का मंदिर था वे लोग कश्मीरी पंडित हैं। वे 1990 में कश्मीर छोड़कर चले गए। उनके मंदिर की देखभाल उनके एक मुस्लिम दोस्त करते हैं जिनकी दुकान मंदिर के पास ही है। हमारे कहने पर उन्होंने मंदिर खुलवाकर मुझे दिखाया भी।
जगह-जगह उत्तर प्रदेश, बिहार के लोग फल, चाय, आइसक्रीम, चाट, भेलपूरी बेचते मिले। ये लोग पूरे कश्मीर में हैं। हर महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल पर हैं। श्रीनगर में हैं, गुलमर्ग में हैं, पहलगाम में हैं। पहलगाम के आगे भी हैं। इनमें से कई लोगों से मैंने बातचीत भी की। ये वहाँ रोज़ी-रोटी की तलाश में आए लोग हैं। कुछ लोग तो सालों से हैं। घर जाते हैं लेकिन कमाई के लिए वापस लौट आते हैं।
पुराने कश्मीर में मधुबनी का एक आदमी मोटरसाइकिल पर चार-पाँच लोगों को बैठाकर सिगरेट फूंकता मस्ती करता दिखा। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि वहाँ कोई बंदिश है। कोई तनाव है।
पहली बार पहलगाम में दो दिन रहा। लिड्डर नदी के किनारे बसा पहलगाम बहुत ख़ूबसूरत है। पहले दिन सूरज ढलने की समय की इतना खूबसूरत नजारा कम ही देखने में आता है। ऐसा लगा सूरज विदा होते समय अपना सारा सोना पहाड़ों के पास जमा करके जा रहा है।
उन दिनों अमरनाथ यात्रा के कारण सुरक्षा व्यवस्था ज़बरदस्त थी। थोड़ी-थोड़ी दूर पर सेना के जवान। जगह-जगह अमरनाथ यात्रा के यात्रियों के कैम्प। सुबह-सुबह समूहों में लोग अपने कैम्प से निकलते। यात्रा के लिए बढ़ जाते। लौटते हुए भी लोग वहीं से होते हुए वापस आते। देश के हर हिस्से के लोग वहाँ दिखे। इस बारे में कई किस्से मैंने अपनी पोस्ट्स में लिखे थे।
पहलगाम में आप अपनी गाड़ी/टैक्सी से जा तो सकते हैं। लेकिन वहाँ के पर्यटन स्थलों पर जाने के लिए स्थानीय ट्रांसपोर्ट पर ही जा सकते हैं। सबके रेट तय हैं। टैक्सी स्टैंड से गाड़ी लेकर आना-जाना कर सकते हैं। अपनी गाड़ी से आप पहलगाम का बाज़ार और स्थानीय जगहों पर जा सकते हैं लेकिन पर्यटक स्थल पर जाने के लिए पहलगाम से ही टैक्सी लेनी होती थी। श्रीनगर से आया मेरा ड्राइवर दो दिन तक पहलगाम में आराम ही करता रहा।
बैसरन घाटी, जहाँ आतंकवादी घटना हुई पहलगाम से कुछ दूर ऊँचाई पर स्थित है। वहाँ पैदल या खच्चर पर ही ज़ाया जा सकता है। बैसरन घाटी की ख़ूबसूरती के चलते इसे भारत का स्विटज़रलैंड भी कहते हैं। घाटी लगभग साल भर खुली रहती है। जिन ड्राइवर के साथ मैं गया था बैसरन घाटी उन्होंने फिर इस बात की पुष्टि की कि बैसरन घाटी साल भर खुली रहती है। उन्होंने यह भी बताया कि आतंकवादी घटना वाले दिन वे भी पहलगाम में थे।
बरसात या जाड़े में रास्ता दुर्गम हो जाने के कारण वहाँ जाना मुश्किल हो जाने पर लोगों का जाना बंद हो जाए वह बात अलग। पहलगाम के मुख्य बाजार से कुछ दूर से ही बैसरन घाटी की चढ़ाई शुरू होती है। पहलगाम का अस्पताल घाटी की चढ़ाई शुरू होने वाली जगह से थोड़ी ही दूर है। घाटी जाने के रास्ते की शुरुआत तक तो सुरक्षा के लिए सैनिक तैनात रहते हैं। लेकिन चढ़ाई शुरू होने के बाद और बैसरन घाटी तक कोई सुरक्षा नहीं रहती।
आतंकवादी घटना वाले दिन सेना/पुलिस के लोगों के वहाँ पहुँचने में देरी का कारण यह भी रहा होगा क्योंकि कोई सड़क या आसान रास्ता बैसरन घाटी तक पहुंचने का। बैसरन घाटी पर सुरक्षा सैनिक नहीं थे। शायद इसका कारण यह भी रहा हो क्योंकि रास्तों में इतनी सघन सुरक्षा जाँच है कि लोगों ने कल्पना नहीं की होगी कि वहाँ भी कोई आतंकवादी घटना हो सकती है। पहलगाम आने-जाने में सुरक्षा इतनी कड़ी है कि शाम को निश्चित समय के बाद पर्यटकों को श्रीनगर से पहलगाम आने -जाने की अनुमति नहीं होती।
आतंकवादियों ने वहाँ आए पर्यटकों की क्रूरता पूर्ण हत्या की। धर्म पूछ-पूछकर पर्यटकों को मारा। मारे जाने वाले लोगों में अधिकतर हिंदू थे। मारे जाने वाले लोगों में से कुछ नवविवाहित थे। ज़्यादातर नई उमर के लोग। एक घोड़े वाले ने आतंकवादी की राइफ़ल छीनने की कोशिश की तो उसे भी मार दिया।
आतंकवादियों के चले जाने के बाद या उस दरम्यान भी स्थानीय लोगों ने पर्यटकों को सुरक्षित नीचे पहुँचाया। कई लोगों ने इसकी भी कहानियाँ साझा की हैं। नज़ाकत भाई के बारे में छत्तीसगढ़ के एक परिवार ने लिखा किस तरह उन्होंने उनके बच्चों की हिफ़ाज़त की। परिवार के लोगों नज़ाकत भाई का शुक्रिया अदा करते हुए लिखा -"नज़ाकत भाई, हम आपका यह एहसान कभी नहीं भूलेंगे।"
जिन लोगों के परिवार के लोग मारे गए उनमें से कुछ लोगों ने स्थानीय मुस्लिम समाज लोगों के सहयोग की जानकारी दी। कुछ लोगों ने यह भी बताया कि उनके परिवार के लोगों को ग़ैर मुस्लिम बताकर मार दिया। कलमा पढ़कर बच जाने का क़िस्सा भी एक प्रोफ़ेसर ने बताया।
सारी वारदात का जो मक़सद समझ में आया वह कश्मीर में आतंकी हिंसा के ज़रिए कश्मीर को हिंदुस्तान से अलग-थलग करना और हिंदू-मुस्लिम नैरेटिव बनाकर समाज में विभाजन करना था। लोगों की सहज प्रतिक्रियाओं से पता चलता है कि आतंकवादी शायद अपने उद्धेश्य में सफल रहे।
आतंकवादियों द्वारा बहुतायत में हिंदू पर्यटकों की हत्या होने पर देश की बहुसंख्यक आबादी में आक्रोश है। आतंकवादियों द्वारा की गयी हत्याओं को हिंदू-मुस्लिम रंग देने के लिए तमाम लोग लग गए हैं। इस तरह के नैरेटिव चलाए जा रहे हैं कि स्थानीय लोगों की आतंकवादी लोगों से मिली भगत थी। बिना स्थानीय लोगों के सहयोग के आतंकवादी घटना हो ही नहीं सकती।
मेरी समझ में कुछ स्थानीय लोगों का सहयोग ज़रूर रहा होगा लेकिन कश्मीर के सभी लोग आतंकवादी लोगों से मिले हुए हैं यह मानना सही नहीं है। देश के लोगों में इतना ग़ुस्सा है कि जिन लोगों ने अपनी जान जोखिम में डालकर पर्यटकों को बचाया, अपने घर में रखा, हिफ़ाज़त की, खाना खिलाया, एयरपोर्ट छोड़ा उसकी अनदेखी करते हुए कह रहे हैं कि यह सब दिखावा है।
इंसानियत का कोई पहलू हिंदू-मुस्लिम नैरेटिव वाले लोगों को स्वीकार नहीं है। किसी ने कोई साम्प्रदायिक सद्भाव से जुड़ी घटना या जानकारी साझा की लोग उस पर हमलावर हो रहे हैं कि इनसानियत की बात करते हुए शर्म नहीं आती।
पढ़े-लिखे समझदार समझे जाने वाले लोग इतनी क्रूर, डरावनी, भद्दी, आक्रामक भाषा में हमलावर हैं मानों भाषा की मिसाइल से ही इंसानियत की बात करने वालों का संहार देंगे।
ज्ञानी लोग अपने ख़ज़ाने से इस्लाम के कट्टर उद्धरण निकालकर पेश कर रहे हैं कि यह तो इस धर्म के लोगों की बुनियादी फ़ितरत है। काफिरों के ख़िलाफ़ उद्धरण पेश करके जनता को जागरूक कर रहे हैं कि इस्लाम मूलतः आतंककारी धर्म है। आतंकवादी घटना जो देश में अस्थिरता फैलाने के मूल उद्धेश्य अंजाम दी गयी, उसको विशुद्द हिंदू-मुस्लिम रंग देकर साबित करने में लगे हैं कि आतंकवादी केवल मुस्लिम ही होते हैं। ऐसे लोग देश के बाकी हिस्सों की आतंकवादी गतिविधियों में शामिल हिंदू और दूसरे समुदायों के योगदान को बिसरा देते हैं। भूल जाते हैं कि देश में जब सिख विरोधी दंगे हुए, पंजाब में आतंकवाद का हमला हुआ, गुजरात में दंगे हुए तो हत्याओं में शामिल अधिकतर लोग ग़ैर मुस्लिम थे। ज्ञानी लोगों का एक आतंकवादी घटना को सिर्फ़ हिंदू-मुस्लिम रंग देना साम्प्रदायिक कट्टरता के यज्ञ में आहुति देना है।
'धर्म पूछकर मारा', 'प्लान A, प्लान B' जैसे संदेश कट-पेस्ट होकर पूरे सोशल मीडिया में पसरे हैं। जिस खच्चर वाले को आतंकवादियों ने मार दिया उसको भी उनके साथ शामिल बताकर उसको मौत को भी साज़िश बता रहे हैं। 'प्लान A, प्लान B' जैसे संदेश एक आम इंसान के दिमाग़ की उपज नहीं है। इस तरह के संदेश ख़ास लोग अपने नैरेटिव के हिसाब से गढ़कर आम लोगों को सौंप देते हैं। ऐसे लोग संदेश कुली की तरह उनको आगे फैलाते रहते हैं। कुछ लोगों को पैसे भी मिलते होंगे इस मेहनत के।
'धर्म पूछकर मारा' के जबाब में कुछ लोगों ने 'जो जाति पूछकर लोगों को मारते रहे हैं वे धर्म पूछकर मारने की बात कर रहे हैं' ' आतंकवादियो ने धर्म पूछकर मारा लेकिन कश्मीरियों ने बिना धर्म पूछे बचाया ' जैसे संदेश बनाए। 'हवाई कंपनियो ने किराया बढ़ा दिया, कश्मीर के लोगों में मुफ़्त सहायता की' इस पर भी संदेश चल रहे हैं।
कुछ लोगों ने कश्मीर की समस्या पर विस्तार से चर्चा की। यह भी बताया कि कश्मीरी लोग आतंकवादी घटनाओं की निंदा में मजबूरी में सामने आए हैं। इसका कारण उनकी रोज़ी-रोटी पर असर पड़ना है। ऐसे लोगों ने कश्मीर के लोगों के पुराने पाप भी गिनाए हैं उस समय विरोध क्यों नहीं किया? कुछ लोगों ने कश्मीर बायकाट का नारा बुलंद किया है।
कश्मीर बायकाट का नारा लगाने वालों को शायद अन्दाज़ नहीं होगा कि कश्मीर में उत्तर प्रदेश, बिहार और दीगर जगहों के अनगिनत लोग भी रोज़गार के लिए आये हैं। वे यहाँ आए ही इसीलिए हैं क्योंकि उनके प्रदेश में उनके लिए काम नहीं था। इसके अलावा कश्मीर के पर्यटन से जुड़े काम-धंधो से देश के तमाम दूसरे इलाक़ों के लोग जुड़े हुए हैं। उनका काम-धंधे पर भी असर होगा। इसके अलावा और भी नुक़सान होंगे जिनका मुझे अन्दाज़ नहीं है।
कश्मीर बायकाट का नारा लगाने कश्मीरी लोगों के सुधर जाने की इच्छा रखने वाले कश्मीर के लोगों को देश के बाक़ी हिस्सों से काट देना चाहते हैं। यही तो आतंकवादी चाहते हैं। कश्मीर बायकाट के ज़रिए आतंकवादियों की मंशा ही पूरी होगी।
धरती का स्वर्ग कहलाने वाला कश्मीर बाक़ी देश से क्यों कटा रहा। कश्मीर के लोग देश के बाक़ी हिस्सों से आने वाले लोगों के बारे में 'इंडिया से आए हैं' क्यों कहते रहे और बाक़ी देश के लोग कश्मीर को अलग क्यों समझते रहे इस बारे में कोई जानकार ही बेहतर बता सकता है।
दो बार के दौरान मैं कुल मिलाकार क़रीब 15 दिन रहा कश्मीर में। जितने भी लोगों से में मिला उनमें से अधिकतर युवा लोगों का सवाल था -"कश्मीर आपको कैसा लगा?" हमारे "बहुत अच्छा लगा। यहाँ के लोग बहुत अच्छे हैं" कहने पर उन लोगों का अगला सवाल रहता था -"फिर कश्मीर को लोग बुरा क्यों कहते हैं?" यह सवाल पूछने वाले में मेडिकल की तैयारी करती बच्ची थी जिसकी अम्मी को शिकायत थी कि वो ठीक से खाना नहीं खाती, एक आटो चलता युवा था जिसकी शादी होने वाली थी, झरने के पास मिला एक नौजवान था जिसने घर चलकर खाने का न्योता दिया और भी तमाम लोग थे। कश्मीर से बहुत दूर पांडीचेरी में भी एक युवा ने भी सवाल किया था -"कश्मीर को लोग बुरा क्यों कहते हैं?"
बुजुर्गों के मन में इस बात की टीस है कि उनको अलग-थलग कर दिया गया। वह उदासीन सा है। लेकिन युवा लोगों की कसक है कि लोग कश्मीर को बुरा क्यों समझते हैं? कश्मीर के युवा की सोच पुराने जमाने के लोगों जैसी नहीं है। वे देख रहे हैं कि देश के बाक़ी हिस्सों के युवाओं को क्या अवसर मिल रहे हैं। वह देश से जुड़ना चाहता है। पाकिस्तान के युवाओं की बातचीत में भी यह कसक ज़ाहिर होती है कि उनका देश हिंदुस्तान जैसा क्यों नहीं है?
आतंकवादी घटना के देश के पर्यटकों से कश्मीर के लोगों अपने रहने, खाने और निश्चिंत रहने की बात कही। उनको सुरक्षित वापस पहुँचा। लेकिन देश के कुछ हिस्सों में कश्मीरी लोगों से उनकी सुरक्षा के लिहाज़ से कश्मीर वापस जाने की सलाह दी गयी। पश्चिम बंगाल में एक डाक्टर ने एक कश्मीरी गर्भवती महिला का इलाज करने से मना कर दिया। डाक्टर के व्यवहार की कई लोगों ने निंदा की लेकिन तमाम ऐसे लोग भी थे जिन्होंने डाक्टर के व्यवहार को 'जैसे को तैसा' बताते हुए सही बताया।
आज के कश्मीर की हालत के कारण कई होंगे। मुख्य कारण राजनीति ही रही होगी। जितनी मेरी समझ है उसके हिसाब से कश्मीर के हुक्मरान और देश के नेताओं की कश्मीर का अपने-अपने हिसाब से फ़ायदा उठाया। स्थानीय हुक्मरान शायद कश्मीर के ज़रिए अपना अलग फ़ायदा उठाते रहे। केंद्र के नेताओं के लिए कश्मीर एक दूर की समस्या की तरह रहा। अपने-अपने हिसाब से इसे हल करने की कोशिश और क़वायद करते रहे केंद्र के नेता लोग। कश्मीर के दौरे होते रहे, पैकेज जारी होते रहे। सबकी यह मंशा बनी रही कि कैसे भी कश्मीर पर क़ब्ज़ा बना रहे। हमारे क़ब्ज़े वाली सरकार बनी रहे। वहाँ से जुड़कर, वहाँ ठहरकर, वहाँ के लोगों का विश्वास जीतकर कश्मीर समस्या हल करने जैसी समझ, माद्दा और हिम्मत नहीं रही। शायद इतनी बड़ी समस्या को हल करने के लिए बड़े दिल, दिमाग़ और समझ वाले नेताओं की ज़रूरत होती होगी उतने अपने यहाँ हो नहीं पाए। औसत समझ के प्रचार मीडिया के सहारे बड़े बने नायकों के हल भी प्रचार वाले ही होंगे।
कश्मीर के बारे ये बातें मैंने अपने अनुभव और समझ से लिखीं। जो मैंने देखा कश्मीर में, वहाँ के लोगों से मिला उससे जो निष्कर्ष निकाले वो मेरी अपनी सोच के अनुसार है जो अभी तक की पढ़ाई-लिखाई और दुनियावी अनुभव से बनी। ज़रूरी नहीं कि आप इससे सहमत हों। आपकी भी समझ अपने अनुभव और सोच से बनी होगी। वह मेरी समझ के अलग हो सकती है। हो सकता है वही सच के ज़्यादा क़रीब हो।
हालाँकि सच भी तो आजकल बहुरूपिया हो गया है। अलग-अलग जगह अलग-अलग रंग के कपड़े पहनकर जाता है। कहीं-कहीं तो सच परेशान होकर झूठ को ही अपने कपड़े पहनाकर भेज देता है। लोग उसको ही असली सच समझकर खुश हो जाते हैं। बाद में जब कभी सच उनके बीच जाता है तो लोग उसको दौड़ा लेते हैं। सच की सही में बड़ी आफ़त है आजकल।
(कश्मीर से जुड़ी कुछ पोस्ट्स टिप्पणी में)

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/pfbid0H4KNJSbtdPTxWiMLcNRoCZB51YTsn9m2b5bVSVDaBJJWuGVkeDdL4C5kgBj4yZVrl

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