श्रीलंका घूमने के दौरान हम लोग वहाँ का गैले का क़िला (Galle Fort) देखने गए।
क़िला कोलम्बो से 119 किलोमीटर दूर है। सुबह लाया बीच होटल निकलकर क़िले तक पहुँचते-पहुँचते शाम के क़रीब हो गयी थी।
क़िले की शुरुआत में बने अर्धचंद्राकार परकोटे के चबूतरे पर बैठे हुए लोग क़िले को घेरे हुए समुद्र की लहरों को देखते हुए फ़ोटो खिंचा रहे थे। पास ही चाय पानी और दूसरे खाने-पीने के सामान बेचते ठेले वाले खड़े थे। सामने श्रीलंका के चाय मंत्रालय की दुकान का बोर्ड लगा था।
क़िला एक शहर की तरह है। शाम हो गयी थी। पैदल चलते हुए उसको देखना सम्भव नहीं था। वहाँ खड़े आटो जिसे वहाँ टुकटुक कहते हैं से मोलभाव करने के बाद हर आटो का भारतीय रूपयों के हिसाब से पाँच सौ रुपया तय हुआ। एक टुकटुक में तीन लोग बैठ सकते थे। हम लोग टुकटुक से घूमने निकले। क़िले की अधिकतर इमारतें मुख्य सड़क पर ही थीं। आटो वाला हम लोगों को इमारतों के पास ठहर-ठहर कर उनके बारे में बताता जा रहा था।
गैले का क़िला क़रीब 500 साल पुराना है। किसी इलाक़े के क़िले का इतिहास उस इलाक़े का इतिहास भी होता है। पुराने समय में किसी देश पर क़ब्ज़े का मतलब उस देश के किले पर क़ब्ज़ा करना होता है। इस लिहाज़ से गैले के क़िले का इतिहास श्रीलंका का हज़ार साल के इतिहास की कहानी है।
गैले का क़िला सबसे पहले पुर्तगालियों ने 1588 में बनवाया था। क़िला बनने के पहले गैले एक बंदरगाह था जहाँ पुर्तगाली लोग 1505 में आए और उस समय के राजा के सहयोग से इस इलाक़े के विकास में काफ़ी काम किया। पूर्तगालियों के आने के पहले मोरक्को का यात्री इब्नबबूता इस बंदरगाह पर आ चुका था। बाद में यह क़िला स्थानीय सिंहली विद्रोहियों के जेलखाने के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता रहा।
पुर्तगालियों के बाद डच लोगों ने 1640 में श्रीलंका के राजा राजसिंहे II के सहयोग से इस क़िले पर क़ब्ज़ा किया। पुर्तगालियों ने 18 वीं सदी तक इस क़िले में कई निर्माण किए। इनमें प्रशासनिक भवन, गोदाम, लोगों के रहने के घर और स्थानीय लोगों के लिए चर्च, शस्त्रागार, तोपख़ाना आदि बनवाए। व्यापार और फ़ौज की ज़रूरतों के लिए कई तरह के कारख़ाने भी बनवाए। क़िले में रहने वाले लोगों के मल के निकास के लिए व्यवस्थित सीवेज सिस्टम भी बनवाया।
1796 में जब अंग्रेजों ने क़िले पर क़ब्ज़ा किया। श्रीलंका की आज़ादी तक क़िले पर क़ब्ज़ा बना रहा। अंग्रेज लोगों के क़ब्ज़े में आने बाद इस क़िले में कई निर्माण हुए जिनमें लाइट हाउस, बास्टिंन गेट और क़िले की मरम्मत का काम होता रहा। हालाँकि बाद में अंग्रेज लोगों का पसंदीदा शहर कोलम्बो हो जाने के बाद गैले के क़िले का महत्व कम होता गया और स्थिति ख़राब होती गयी।
इस क़िले की मज़बूती का अन्दाज़ इस बात से लगाया जा सकता है कि 2004 में सुनामी से आसपास का इलाके को काफ़ी नुक़सान होने के बावजूद क़िले को कोई ख़ास नुक़सान नहीं हुआ।
टुकटुक से चलने पर सबसे पहली इमारत लाइटहाउस दिखा। पास ही मैगज़ीन हाउस था जहाँ कभी गोला-बारूद रखे जाते होंगे। आगे पुलिस स्टेशन और पुलिस बैरक बने थे। गैले के मजिस्ट्रेट का कोर्ट, पोस्ट आफिस और लाइब्रेरी की इमारतें दिखीं। लाइब्रेरी 1832 में स्थापित हुई थी। सभी इमारतें बंद थीं। बस उनको बाहर से ही देखकर संतोष करना पड़ा।
क़िले में कुल 14 परकोटे हैं। उनमें प्रमुख चांद परकोटा (moon bastin), सूर्य परकोटा (sun bastin) ,ट्राइटन परकोटा (Triton Bastion) और समुद्र की तरफ़ का झंडे की चट्टान वाला परकोटा (Sea side wall with Flagrock Bastion)
इनमें मून बास्टिन और सन बास्टिन चांद और सूरज के दिखाने से सम्बंधित थे। ट्राइटन बास्टिन पर बनी पनचक्की से समुद्री पानी खींचकर सड़कों की धूल धोई जाती थी। समुद्र की तरफ़ वाले फ़्लैगराक बास्टिन से समुद्री जहाज़ों को संकेत दिए जाते थे। मून बास्टिन के पास ही एक क़ैदखाना भी बना था जिसमें कभी क़ैदी रखे जाते थे।
बास्टिन के पास रखी तोप के साथ लोग फ़ोटो भी खिंचा रहे थे। कुछ लोगों ने तोप के आगे खड़े होकर भी इस तरह फ़ोटो खिंचाए मानों उनको तोप से उड़ाने की सजा मिली हो। बास्टिन और दूसरी इमारतों के पास लगे इमारतों के विवरण वाले बोर्ड पर लिखाई इतनी धुंधली थी कि पढ़ना सम्भव नहीं था।
वहीं पीछे बने स्टेडियम के कुछ लोग क्रिकेट खेल रहे थे। लोगों ने बताया कि यहाँ श्रीलंका की क्रिकेट टीम मैच खेलती है।
लौटते हुए एक फ़ौजी मुख्यालय के सामने खड़े होकर फ़ोटो खिंचाने पर वहाँ से निकलते फ़ौजी ने टोंक दिया। लेकिन तब तक हम फ़ोटो ले चुके थे। इसलिए हम भी मान गए। असल में क़िला, फ़ौजी छावनी, आबादी, बाज़ार आपस में इतना गड्ड-मड्ड हैं कि पता नहीं चलता कौन कब ख़त्म हुआ, कौन कब शुरू हुआ।
वहीं पर एक बुद्ध जी का बड़ा मंदिर भी दिखा जहां शाम की पूजा हो रही थी। एक जगह होटल पर बड़ी भीड़ लगाए लोग खा-पी रहे थे। चलते-घूमते एक जगह लघुशंका के लिए जगह पूछने पर आटो वाला एक जगह ले गया। हमने सोचा उसके जान-पहचान वाले का होगा लेकिन निकलने पर वहाँ मौजूद चौकीदार ने दो लोगों के इस्तेमाल के लिए श्रीलंका का सौ नोट धरा लिया।
इस बीच शाम पार करके रात हो गयी थी। हम लोग वापस हो लिए। टुकटुक वाले को शाम की नमाज़ पढ़ने जाना था। उसने हमको जहाँ से लिया था वहीं छोड़कर , अपने पैसे लेकर, नमाज़ पढ़ने चला गया।
थोड़ी देर में हम लोग अपने होटल की तरफ़ चल दिए।
#श्रीलंका, #shrilanka-29
https://www.facebook.com/share/v/1E88Yn66ef/

No comments:
Post a Comment