कल दिल्ली वाक में शामिल हुए। कल की वाक का विषय था -लाल क़िले पर भगवा रंगत। इतिहास की इस क्लास के मास्टर थे आलोक पुराणिक Alok Puranik, मनुकौशल Manu Kaushal और इरा पुराणिक Ira Puranik। तीनों ने दिल्ली की गर्मी में 45 लोगों की खुले में क्लास ली और विषय के बहाने बताया कि दिल्ली में औरंगज़ेब के बाद बादशाहत भले मुग़लों की बनी रही लेकिन उस पर काफ़ी दिनों तक मराठों का प्रभाव बना रहा। सन 1719 से लेकर 1803 दिल्ली पर मराठों का दख़ल बना रहा। मराठों का ध्वज भगवा रंग का था इसीलिए वाक् का विषय रखा गया था - लाल क़िले पर भगवा रंगत।
यह किला मुगल बादशाह शाहजहां द्वारा 1638 बनवाया गया। किले को "लाल किला", इसकी दीवारों के लाल-लाल रंग के कारण कहा जाता है।
वाक का समय था सबेरे 0730 बजे। बाद में इसे 0745 कर दिया गया। पंद्रह मिनट की देरी जब मास्टरों ने की तो पंद्रह मिनट हमने लेट कर दिए। आठ बजे पहुँचे लालक़िले पर। नोयडा से लालक़िले तक पहुँचे तो आटो वाले ने बिल बताया 420 रुपए। हमको लगा कि लालक़िले पर क़ब्ज़े को लेकर जो घपले हुए उससे लगता है आटो वाला भी परिचित है, भले ही कभी दिल्ली वाक् में न आया हो। राजनीति और चार सौ बीसी का चोली-दामन का साथ है।
हमारे आने तक वाक् में आए हुए लोगों का परिचय शुरू हो चुका था। हमने भी परिचय दिया।45 लोगों में 9 लोग मराठी थे। वैसे तो आलोक पुराणिक जी भी मूलतः मराठी हैं। लेकिन मराठी बोलने में उनका हाथ तंग होने की वजह से वे खुद को फ़र्ज़ी मराठी कहते हैं।
परिचय के बाद लालक़िले के अंदर की तरफ़ गए। वाक् में शामिल लोगों को क़िले की तरफ़ बढ़ते देखकर एकबारगी लगा कि क़िले पर क़ब्ज़े के लिए आलोक पुराणिक की सेना मार्च कर रही थी। क़िले की दीवार और सड़क के बीच की उगी लम्बी घास देखकर अंदाज़ा लगा कि लालक़िला का रखरखाव करने वालों के पास पैसे का अभाव हो गया है। उनके हाल भी बाद के दिनों में पेंशन पर जीते मुग़ल बादशाहों जैसे हो गए हैं।
क़िले के सामने विक्रमादित्य के नाटक के बोर्ड लगे थे। क़िले के मुख्य द्वार के पास वाली दीवार पर प्रधानमंत्री जी और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के मुस्कराते हुए बोर्ड लगे थे जिसमें बताया गया था कि कितने करोड़ रुपए उन्होंने किस योजना में खर्च कर दिए।
क़िले में हम लोग लाहौरी दरवाज़े से घुसे। बताया गया कि इसी सीध में जाने पर रास्ता लाहौर की तरफ़ जाता है। हम सीधे बढ़ते चले गए। रास्ते में छत्ता चौक पड़ा। छत्ता चौक मतलब छत वाला बाज़ार। इसे शाहजहाँ ने पेशावर शहर (पाकिस्तान) के "बाजार-ए-मुराव्वक" (मुराव्वक मतलब छत) की तर्ज़ पर बनवाया था। शाहजहाँ के समय में ऊपरी और नीचे के मंज़िल पर दुकाने थीं। इनमें शाही परिवार के लोगों की ज़रूरत की चीजें बिकतीं थी।
सुबह के समय छत्ता चौक की अधिकतर दुकानें बंद थीं । हम छत्ता चौक को पारकर दीवाने आम होते हुए दीवाने ख़ास तक पहुँच गए। लेकिन हमको वहाँ कहीं वाक के साथी नहीं दिखे। फ़ोन किया तो पता चला कि अभी वो लोग लाहौरी गेट पर ही हैं। हम लपकते हुए वापस लाहौरी गेट पहुँचे। वहाँ आलोक पुराणिक जी लालक़िले की शुरुआती कहानी बता रहे थे। वाक् के साथियों के अलावा तीन कुत्ते भी वहाँ तसल्ली से फ़र्श पर ऊँघ रहे थे। जिस तसल्ली से वे कुत्ते वहाँ ऊँघ रहे थे उससे लग रहा था कि उनके मन में दिल्ली सल्तनत का ख़ौफ़ बिल्कुल नहीं था।
लाहौरी द्वार से लालक़िले में दाखिल होकर हम लोग नौबतखाने के सामने इकट्ठा हुए। नौबतखाना या नक्कारखाना महल परिसर के प्रवेशद्वार के रूप में बना हुआ है। मुग़लबादशाहों के गौरवकाल में यहाँ वाद्ययंत्र बजाकर बादशाह या अन्य विशिष्ट पदाधिकारियों के दीवान-ए-आम में आने की सूचना दी जाती थी। चुनिंदा अवसरों पर भी यहाँ संगीत बजाया जाता था।
ऐसा माना जाता है कि परवर्ती मुग़लशासक जहाँदार शाह (1712-13) और फर्रुखसियर (1713-19) की हत्या इसी नौबत खाने में कर दी गयी थी।
राजमहलों में नौबतखानों के महत्व का अन्दाज़ द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी की कविता से होता है :
यदि होता किन्नर नरेश मैं
राज महल में रहता,
सोने का सिंहासन होता
सिर पर मुकुट चमकता।
बंदी जन गुण गाते रहते
दरवाजे पर मेरे,
प्रतिदिन नौबत बजती रहती
संध्या और सवेरे।
बाद के दिनों में जब मुग़ल सल्तनत का रुतबा घटा तो पेंशन पर गुज़ारा करने वाले मुग़ल बादशाह नौबत सुनकर ही बादशाहत का अहसास कर लेते थे। शाहआलम II इलाहाबाद क़िले में छह साल रहे । वे अपने लोगों को नौबत बजवाने के लिए कहते थे। अंग्रेज अधिकारी को यह पसंद नहीं था। उसने मना किया। लेकिन शाहआलम II ने बजाने वालों से कहा -"बजाओ।" नौबत बजने पर अबकी अंग्रेज ने कहा -"अब अगर नौबत बजाओगे तो क़िले से नीचे फेंक देंगे।" शाहआलम के कहने पर फिर बजाई गयी नौबत। अंग्रेज अधिकारी उनको क़िले से फेंकने के लिए आया तो नौबत बजाने वाले भाग गए। अंग्रेज ने नौबत ही क़िले के नीचे फेंक दी।
1707 में औरंगज़ेब की मौत के बाद मुग़ल वंशजों में आपस की मारकाट और सत्ता के संघर्ष के चलते मुग़लों की ताक़त कम होती चली गयी। वे निकम्मे बुत सरीखे हो गए जो सिर्फ़ साँस लेना जानते थे। हाल यह हो गए कि अपनी रक्षा के लिए वे उन मराठा ताक़त पर निर्भर हो गये जिनके ख़िलाफ़ लड़ने में औरंगज़ेब के जीवन के आख़िरी 26 साल बीते।
मुग़लों की मराठों से यह संधि 1719 में हुई । "मराठा साम्राज्य का मैग्नाकार्टा" नाम से मशहूर इस संधि के अनुसार :
-मुग़लों ने मराठों के क़िले वापस कर दिए।
-दक्खन के मुग़लों छह प्रांतों में चौथ और सरदेशमुखी एकत्र करने का अधिकार दिया।
-दिल्ली की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी मराठों के हाथ में रहेगी।
दिल्ली में 15000 मराठा सैनिकों के साथ मराठा साम्राज्य के प्रतिनिधि रक्षा के तैनात हो गए। 1719 में मोहम्मद शाह रंगीला मुग़लों के बादशाह बने। वे शाह कम रंगीले ज़्यादा थे। शानशौक़त और रंग रेलियों में मस्त रहे।इन्हें नाच गाने का बड़ा शौक था। उनके समय में ही 1739 में ईरान से नादिरशाह दिल्ली आया। लूटपाट और क़त्लेआम किया और आराम से वापस भी चला गया। जबकि उस समय दिल्ली सल्तनत के पास एक लाख सिपाही थे। मोहम्मद शाह रंगीला का अंत बहुत बुरी तरीके से हुआ। निजाम उल मुल्क जिस पर उसका बहुत भरोसा था उसकी युद्ध मे मौत हो जाने के कारण वह अकेले कमरे में बैठकर चिल्लाया करता थे। और उसका दुख उसे सहन नहीं हुआ और अंत में 1748 में उसकी मौत हो गई।
बाद के दिनों में मुग़ल बादशाह इतने ग़ैरज़िम्मेदार और गफ़लतमंद हो गए थे कि राजकाज का होश-ओ-हवास ही नहीं रहा। एक बार मराठे दिल्ली में गोल मार्केट में पेशवा रोड तक आ गए लेकिन मुग़ल बादशाह को पता ही नहीं चला। पता चलने कुछ लोग भिखारी के वेश में मराठों के शिविरों में भेज गए। शाम को लौटने पर भिखारियों ने अपनी झोली पलटी तो उसमें से रागी (मराठी रोटी का नाम) के टुकड़े मिले। हालाँकि मराठा लोगों के दिल्ली पर क़ब्ज़ा नहीं किया। आगे निकल लिए।
मराठों को दिल्ली आना-जाना पसंद आता था। वे यहाँ कई बार आए, रुके लेकिन दिल्ली की सल्तनत पर क़ब्ज़ा नहीं किया। दिल्ली के बादशाह से उसकी सल्तनत की हिफ़ाज़त के नाम पर पैसे वसूलते रहे। मुग़लों को मराठों से निजात भी चाहिए थी लेकिन उनको मराठों की सुरक्षा भी चाहिए थी।
1750 के बाद मुग़लों की हालत ऐसी हो गयी थी क़ि उनके वज़ीर बादशाहों से ज़्यादा ताकतवर हो गए थे। ऐसी हालत में अपनी हिफ़ाज़त के लिए मुग़लों ने मराठों से अपनी हिफ़ाज़त के करार किए।
मुग़लों ने मराठों से अपनी हिफ़ाज़त के लिए 50 लाख रुपए सालाना करार किया था। इसमें 20 लाख रुपए सिखों और राजपूतों से रक्षा के लिए और 30 लाख रुपए अहमदशाह अब्दाली से बचाव के लिए थे। मुग़लों ने मराठों से यह संधि 23 अप्रैल, 1752 को की थी। इस संधि को 'अहदनामा' के नाम से जाना जाता है।
मुग़लों की मराठों के संधि के फ़ौरन बाद मुग़लों के अहमद शाह अब्दाली से भी संधि कर ली। पता चलने पर मराठों के बहुत बवाल काटा। इस मामले में मुग़ल बादशाह आजकल के राजनीतिज्ञों के रोल माडल थे। जिसको ताकतवर समझते उससे समझौता कर लेते। अपने जीने के लिए वे वसीम बरेलवी के इस शेर के लिखे जाने से पहले ही उस पर अमल करने लगे थे :
"उसी को जीने का हक़ है जो इस ज़माने में
इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए"
मुग़लबादशाहत का हाल दिनों-दिल इस कदर ख़राब होता गया कि शाह आलम के समय फ़ारसी में कहावत बन गयी थी :
"सल्तनत-ए-शाह आलम, अज़ दिल्ली ता पालम , जिसका अर्थ है, 'शाह आलम का साम्राज्य दिल्ली से पालम तक है'"
दिल्ली में क़ब्ज़े के सिलसिले में 7 मार्च 1760 को , अब्दाली ग़ुलाम याकूब को सदाशिवराव भाऊ के नेतृत्व में मराठों ने खदेड़ दिया। जिन्होंने इमाद-उल-मुल्क के कठपुतली मुगल सम्राट शाहजहाँ तृतीय को पदच्युत कर दिया और शाह आलम द्वितीय को सही सम्राट (1760 - 1772) के रूप में स्थापित किया।
इस क़ब्ज़े में मराठों का बहुत खर्च हो गया था। जब मराठे लाल क़िले पहुँचे तो देखा ख़ज़ाना ख़ाली था। उन्होंने दीवाने ख़ास की दीवारों में लगी चाँदी को खरोंचकर उतारवाया और उसको गलाकर अपनी सेना के खर्चे की कुछ भरपायी की। दीवाने ख़ास का सोना और हीरे जवाहरात मय तख़्त-ए-ताऊस और कोहिनूर नादिरशाह पहले ही लूट कर के जा चुका था।
अगले साल ही पानीपत की तीसरी लड़ाई (1761) में मराठों की अहमदशाह अब्दाली से बुरी तरह से हार हुई। दोनों तरफ़ के एक लाख से अधिक सिपाही और ग़ैर सिपाही लोग एक दिन में मारे गए। कहते हैं कि एक दिन की लड़ाई में दोनों तरफ़ के इतने लोग कभी नहीं मारे गए। पानीपत की लड़ाई में मराठों के हार के प्रमुख कारणों में कुछ देशी राजाओं द्वारा मराठों को सहयोग न देना, मराठों के सहयोगी राजाओं द्वारा अनमने मन से लड़ना और मराठों को रसद की आपूर्ति न हो पाना रहा।
पानीपत की लड़ाई के बाद मराठों का झंडा उतर गया। मराठा इतिहास में पानीपत की तीसरी लड़ाई एक दुखद अध्याय के रूप में याद की जाती है।
बाद में एक बार फिर से मराठों का वर्चस्व हुआ। संपूर्ण भारत पर एक बार फिर मराठा परचम फैल गया और उन्होंने दिल्ली में फिर से मुगल सम्राट शाह आलम को राजगद्दी पर बैठाया और पूरे भारत पर शासन करना फिर से प्रारंभ कर दिया ।
मुग़लों की रक्षा भले मराठे कर रहे थे लेकिन उनकी खुद की ताक़त दिन पर दिन कम होती जा रही थी। दरबारी और कर्मचारी बादशाहों की हुकुमअदूली करने लगे थे। हाल यहाँ तक बिगड़ गए कि एक दिन सरदार रोहिल्ला गुलाम कादिर, अपने लाव लश्कर के साथ शाह आलम के शाही दरबार पहुंचा। उसने शाह आलम से उसके माल-खजाने का पता ठिकाना पूछा। तो शाह आलम ने उसे कहा था- 'जैसे तैसे गुजर बसर चल रही है। इफरात पैसा नहीं है। जो कुछ यहां से मिल जाता है बस उतना मेरे पास है।'
ये सुनकर आग बबूला हुए गुलाम कादिर ने शाह आलम को जमकर बेइज्जत किया। यहां तक की उसे जान से मारने की धमकी भी दी गई। भड़के गुलाम ने बादशाह को धक्का देकर गिरा दिया और सिंहासन पर बैठ गया। उसने दरबार में रखे हुक्के का धुआं बादशाह सलामत के मुंह पर छोड़ा तो वह इस तरह रुसवा होने की वजह से ग्लानि से भर उठा।
गुलाम ने हैवानियत की सारी हदें पार कर दीं। उसने एक राजा के साथ राजाओं जैसा सलूक नहीं किया। उसने शहंशाह शाह आलम की आंखों में सुई घोंपकर उसकी आंखों की रोशनी छीनकर अंधा बना दिया। इसके बाद गुलाम उसके सीने पर बैठा और अपने औजार से उसकी आंखें निकाल लीं।
इसकी शिकायत शाहआलम ने मराठों से की और माँग की ग़ुलाम क़ादिर की आँखे निकालकर उसके पास भेजी जाएँ। मराठों के लिए यह चुनौती की बात थी कि जिसकी रक्षा का उन्होंने किया था उसकी आँखे कोई निकाल कर ले जाए। मराठों ने 17 दिसम्बर, 1788 को ग़ुलाम क़ादिर की आँखे निकालकर शाहआलम II को भेजीं और ग़ुलाम क़ादिर को मार दिया।
बाद में अंग्रेजों के आगमन के बाद मराठों और अंग्रेजो की लड़ाई हुई। यह एक तरह की ग्लोबल लड़ाई थी। इसमें क़िला मुग़लों का था, ओनरशिप मराठी थी, मराठों की तरफ़ से लड़ाके फ़्रेंच भी थे और लड़ाई अंग्रेजो के ख़िलाफ़ थी। अंतत: मराठे अंग्रेजो से पड़पटगंज के पास हुई लड़ाई में हार गए। दिल्ली पर मराठों का वर्चस्व ख़त्म हुआ। पुणे से शुरू हुआ मराठों के वर्चस्व का सिलसिला पानीपत होते हुए पड़पटगंज पर ख़त्म हुआ।
शाहआलम II ने मराठों की हार के बाद अंग्रेजों का स्वागत किया। जनरल लेक का स्वागत करते हुए शाहआलम II को देखकर एक अंग्रेज इतिहासकार ने लिखा है :
"अकबर महान और बादशाह शाहजहाँ के वंशज इंसानी गरिमा का मज़ाक़ बनकर रह गए"
शाहआलम-II की पेंशन तय हुई 12 लाख रुपए सालाना। शाहआलम -II ने अपनी गद्दी बचाने के लिए किसी के भी साथ जाने से गुरेज़ नहीं किया। इस बात को बताते हुए मनु कौशल जी ने शकील जमाली का शेर सुनाया :
"तबाह कर दिया अहबाब (दोस्त) को सियासत ने
मगर मकान से झंडा नहीं उतरता है।
जुआरियों का मुक़द्दर ख़राब है शायद
जो चाहिए वही पत्ता नहीं उतरता है।"
मुग़ल बादशाहों की हैसियत भले ही कम होती गयी हो लेकिन मुल्क के आम लोगों में उनकी इज्जत दहशत काफ़ी दिन तक बनी रही। एक अंग्रेज लेखक ने अपने संस्मरण लिखते हुए बताया कि उनको 200 डाकुओं ने घेर लिया। जब उन्होंने डाकुओं को बताया कि उनके साथ पालकी में मुग़ल बादशाहों की बेगमें हैं तो डाकुओं ने उनको छोड़ दिया।
आम जनता में मुग़ल बादशाहों के इसी प्रभाव के कारण ही 1857 में जब सिपाहियों ने विद्रोह किया तो बहादुरशाह ज़फ़र को अपना बादशाह माना जिनकी हुकूमत तब दिल्ली में भी नहीं चलती थी। शायद इसीलिए अंग्रेज बहादुरशाह ज़फ़र को रंगून ले गए क्योंकि उनको अंदेशा रहा होगा कि हिंदुस्तान में अगर उनके ख़िलाफ़ कुछ किया तो लोग उनके समर्थन में बग़ावत कर सकते हैं।
लालक़िले पर अंग्रेजों का क़ब्ज़ा होने के बाद उन्होंने लालक़िले में काफ़ी निर्माण कराया। क़रीब 40 % इमारतें अंग्रेजों की बनाई है। दिल्ली गेट वाली इमारत पर बने हाथी इस मुग़लों के घुड़सवारों की जगह अंग्रेज़ी (सफ़ेद) हाथियों आने की कहानी है।
अंग्रेजों के दिल्ली में क़ाबिज़ होने के बाद वे अपने तौर तरीक़े से काम करने लगे। लेकिन उनमें से कुछ मुग़लों वाले अन्दाज़ में ही जीते थे। दिल्ली में अंग्रेज अधिकारी डेविड की 13 बेगमें थीं। मुग़लई अन्दाज़ में रहते थे वे।
बाद में दिल्ली गेट वाली इमारत के पास मनु कौशल जी कवि भूषण के स्वरूप में प्रकट हुए। उन्होंने भूषण की कविताओं का ओजपूर्ण तरीक़े से पाठ किया। उनका अर्थ भी बताया। आलोक पुराणिक जी ने मराठी में जो पढ़ा उसका मतलब हिंदी में बताया।
वाक के दौरान वाक् में शामिल कुछ लोग बीत चुके इतिहास के बारे में अपनी राय ज़ाहिर कर रहे थे। आपस की बातचीत में किसी ने कहा -"मराठों को दिल्ली पर क़ब्ज़ा करके इसे हिंदू राष्ट्र घोषित कर देना चाहिए था। सब बवाल निपट जाता।"
मराठों द्वारा दिल्ली पर वर्चस्व के बावजूद क़ब्ज़ा न करने के कई कारण बताए गए हैं। उनमें से एक यह कि पुणे से इतनी दूर आकर सारा ताम-झाम लाने में तमाम बवाल थे। फिर दिल्ली की हालत दिन पर दिन ख़राब हो रहे थे। क़ब्ज़ा करने की हालत में तमाम लोगों की तरफ़ से लगातार चुनौतियाँ मिलतीं रहतीं। पीछे मराठा में भी शासन की समस्याएँ थीं। वैसे भी बीत चुकी घटनाओं पर यह कहना कि ऐसा होता तो वैसा होता कुछ ऐसा है जैसे रघुवीर सहाय की यह कविता :
"अगर कहीं मैं तोता होता
तोता होता तो क्या होता?
तोता होता।
होता तो फिर?
होता, ‘फिर’ क्या?
होता क्या? मैं तोता होता।
तोता तोता तोता तोता
तो तो तो तो ता ता ता ता
बोल पट्ठे सीता राम"
वाक् के बाद सबके सम्मिलित फ़ोटो ग्राफ़ हुए। दूर-दूर से आए हुए वाक् से तमाम जानकारी और सबक़ लेकर विदा हुए। सबसे बड़ा सबक़ यह कि इतिहास की तारीख में धर्म और राजनीति कभी अलग नहीं रही।
वाक में हमारे कालेज के दिनों के साथ संजय चांदवानी Sanjay Chandwani भी थे। उनसे काफ़ी दिन बाद मुलाकात हुई। शशि शर्मा Shashi Sharma जी से पहली बार मुलाकात हुई। वे अपनी समधन जी के साथ आईं थीं। उन्होंने मुझे लालक़िले में मौजूद जंगल जलेबी और दो मीठी चिक्की भेंट की। दोनों ही मैं अपने साथ लेकर घर आ गया।
सब लोगों के चले जाने के बाद आलोक पुराणिक और मनुकौशल जी की साथ हम लोगों ने ठेलिया पर चाय पी। इसके बाद हम और आलोक पुराणिक कड़कड़डूमा मेट्रो स्टेशन तक साथ आए। एक कैफ़े में बैठकर फिर चाय पी। फ़ोटो देखकर मनु कौशल जी ने शिकायत की -"नाश्ता तो हम भी नहीं किए थे। हमें चाय पिला दिया सड़क पर और खुद कैफ़े में घुस गए। यह कानपुरी और आगरा की साज़िश हमें मंज़ूर नहीं।"
इस पर आलोक पुराणिक जी ने अर्ज़ किया -"ग़ालिब खाता कहाँ है। वह तो पीता है।"
इस पर ग़ालिब जी (मनु कौशल जी) ने कहा -"पहले खाता है फिर पीता है फिर पीता ही पीता है।"
लाल क़िले की दिल्ली वाक से तमाम जानकारी मिली। जितनी जान रहे हैं उतना लग रहा है कि कितनी कम जानकारी है अपन की। लेकिन इसी बहाने जान तो रहे हैं कुछ।
दिल्ली वाक् के बारे में फ़िलहाल इतना ही। बाक़ी अगली वाक् में।
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