इतवार को ऑक्सफोर्ड बुक सेंटर में प्रोग्राम था। जाने के लिए निकले तो पहले सोचा कैब या आटो से जाएँ। किराया देखा चार सौ पार। चार सौ पार देखकर हम सहम गए। जनता सवारी (मेट्रो ) में आ गए। मेट्रो स्टेशन से पास बनवाया। पाँच सौ रुपए में चार सौ पचास की यात्रा का पास। कितना भी बचने की कोशिश की खर्च चार सौ पार हो ही गया।
मेट्रो में भीड़ तो नहीं थीं लेकिन कोई सीट ख़ाली नहीं थी। दरवाज़े के पास की वरिष्ठ और दिव्यांग के लिए आरक्षित सीट पर एक युवा सा बुजुर्ग और एक बालिका बैठी थी। बालिका के पास खड़ा एक बालक उसपर छाते की तरह झुका इससे फुसफुसाते हुए बतिया रहा था। बालिका भी जैसे को तैसा कर रही थी। बालिका मुंडी मोबाइल में घुसाए बालक से भी बतियाती जा रही थी।
मन किया बालिका से पूंछे कि वो बुजुर्ग है या दिव्यांग जो उस सीट पर बैठी खिलखिला रही है। लेकिन फिर चुप मार गए। मोबाइल में आई जन्मदिन की बधाइयों का जवाब देते रहे। दफ़्तरी लिहाज से उस दिन 61 साल के हो गए थे लेकिन अपने लिए आरक्षित सीट पर बैठने से वंचित थे।
दुनिया के तमाम लोग इसी तरह अपने हक से चुपचाप शरीफों की तरह वंचित होते रहते हैं।
दो स्टेशन आगे युवा सा बुजुर्ग उतर गया। उतरने के पहले उसने मुझे इशारा करके सीट हमको हैंडओवर कर दी। हम लपक कर बैठ गए। हमारे बगल में बालिका और उस पर छाते की तरह तना बालक।
बात-बात में लड़के ने अपने मोबाइल से बालिका को कुछ दिखाया। बालिका ने बालक का मोबाइल लेकर देखा और फिर उसका व्हाटसएप देखने लगी। एक संदेश को देखकर बालक से पूछा -‘ये किसको फ़ोटो भेजी?’
बालक ने कहा -‘ऐसे ही है।’
बालिका ने भेजी हुई फ़ोटो देखते हुए पूछा -ऐसे ही इतनी फ़ोटो भेजी जाती हैं?’
बालक ने कुछ कहा। बालिका भेजी हुई फ़ोटो डिलीट करते हुए अगले किसी संदेश पर पहुँची। वहाँ भी फ़ोटो भेजी थीं। बालिका ने फिर वही पूछा , बालक ने फिर वही जवाब दिया।
लड़की ने इस बार फोटो डिलीट करते हुए कुछ हड़काया टाइप। बालक ने उसकी समझ पर सवाल उठाते हुए कहा -‘तुम समझती नहीं हो। अक्ल नहीं है। अक्ल होती तो समझती।’
बालिका ने कहा -‘इतना समझ है मुझको। सबको ऐसे ही भेजी जाती हैं फ़ोटो।’ कहते हुए बालक के मोबाइल से फ़ोटो डिलीट करती रही।
बालक ने उसके फ़ोटो डिलीट के काम को रोकने की कोशिश करने के लिहाज़ से कहा -‘अरे तू ब्लॉक मार दे इसको। क्यों इतना मेहनत कर रही है?’ लेकिन बालिका ने मेहनत से जी नहीं चुराया। फोटो डिलीट करती रही। कुछ-कुछ बोलती रही। बालक भी उसको कुछ-कुछ कहते हुए उसको कमसमझ, कमअक्ल बताता रहा। अलबत्ता बालक की आवाज धीमी होती गई।
आगे फिर कुछ देखा बालिका ने। कुछ कहा बालक से। बालक ने कुछ जवाब दिया। बालिका ने मोबाइल बालक के हाथ में पटक सा दिया और मुँह फेरकर बैठ गई।
बालिका के मुँह फेरकर बैठने से बालक की सिट्टी और पिटटी दोनों गुम हो गईं। उसने अपना मोबाइल बालिका के हाथों में प्रसाद की तरह अर्पित कर दिया। लेकिन बालिका ने मोबाइल हाथ से परे धकेल दिया।
बालक ने अब मिन्नतमोड में आकर अपना मोबाइल बालिका के सामने हथियार की तरह डाल दिया। बालिका फिर भी नहीं पसीजी। बालक के मोबाइल को देखने से इंकार कर दिया।
अब बालक ने मेट्रो के फर्श पर प्रपोज मुद्रा में बालिका को अंगूठी की तरह भेंट किया। बालिका ने उसे हाथ में ले तो लिया लेकिन खोलकर नहीं देखा। बालक ने चैन की साँस ली और कोई बेवकूफ़ी की बात कहीं। बालिका बहुत हल्का सा मुस्कुराई। किसी बड़ी डील के साइनिंग अमाउंट की तरह छुटकी मुस्कान। बालक चहकने लगा। मुझे फिर बेवक़ूफ़ी के जलवे का एहसास हुआ। देश-दुनिया के तमाम मसले आज बेवक़ूफ़ी से हल किए जा रहे हैं। बेवक़ूफ़ी की ताक़त बेमिसाल है।
बालिका शुरू में दुपट्टे से मुँह ढके थी। बाद में मुँह खोलकर बतियाने लगी। बालक कई माला-ताबीज टाइप धारण लिए था।
अचानक बालिका में खड़े होकर बगल वाले भाईसाहब से पूछा -‘इंडिया गेट के लिए कहाँ उतरना होगा?’
भाई साहब ने समझाया। बताया। बालिका ने समझने का इशारा किया। लेकिन भाई साहब को तसल्ली नहीं हुई। उन्होंने दुबारा तफ़सील से समझाया। बालिका इस बार समझ ही गई ऐसा उसके चेहरे के भाव से लगा।
हमारा स्टेशन आने वाला था। हमने सामने खड़ी एक महिला को आँखो के इशारे से सीट सौंपने का प्रस्ताव दिया। महिला ने आँखो ही आँखों में प्रस्ताव स्वीकार किया और लपक कर सीट के पास आ गई। हमने फ़ौरन उसके लिए सीट छोड़ दी। महिला फ़ौरन उस पर बैठ गई। हमने फौरन खड़े होकर उसकी तरफ़ इस आशा से देखा कि शायद आँखों ही आँखों में धन्यवाद टाइप कुछ देगी। लेकिन वह महिला अपनी आँखें मूँदे मोबाइल की लीड कानों में घुसाए कुछ सुनने ने तल्लीन हो गई थी ।
हम कुछ और सोचें तब तक हमारा स्टेशन आ गया था। हम चुपचाप उतर गए।
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