कल नई दिल्ली में 'व्यंग्य यात्रा सम्मान समारोह' सम्पन्न हुआ। नोयडा में जहां आजकल अपन रह रहे हैं उस जगह से हिंदी भवन 20 किलोमीटर मतलब 40 मिनट की दूरी पर है। सम्मानित किए जाने वाले ज़्यादातर लोग परिचित ही हैं। सबको बधाई दे ही चुके थे। फिर भी मन किया कार्यक्रम लाइव देखा जाए सो 400 रुपए क़ुर्बान करके हिंदी भवन के लिए निकले।
रास्ते में कैब का ड्राइवर देश भर के नेताओं को गरियाते हुए हमको हिंदी भवन ले गया। अपने मन की बात कह रहा था। सूत्र रूप में उसने कहा -"जब तक चुनाव ईवीएम से होता रहेगा तब तक ऐसे ही लोग देश को बर्बाद करते रहेंगे।" शायद उसका कहने के मतलब यह रहा हो कि बिना ईवीएम के चुनाव होने पर दूसरे लोगों भी देश को बर्बाद करने का मौका मिले।
कार्यक्रम हिंदी भवन की दूसरी मंज़िल के हाल में था। बाहर ही सुभाष चंदर जी मौजूद थे। अंदर प्रेम जनमेजय जी इनाम, शाल, स्मृतिचिन्ह और प्रशस्ति पत्र आदि तल्लीनता से सजा रहे थे। हमने नोयडा से आने वाली बात कही फिर भी उन्होंने हमें कानपुर से ही आना स्वीकार किया।
कार्यक्रम शाम 5 बजे शुरू होना था। उस समय तक काफ़ी लोग आ चुके थे। कुछ का आना बाक़ी था। इस बीच चाय आ गई, साथ में नाश्ता भी। सबसे पहले उसी के साथ न्याय किया गया।
चाय पीते हुए Ankit Sharma से काफ़ी बातें हुईं । उनका इस वर्ष ही व्यंग्य संग्रह आया है -"छोटी छोटी मगर खोटी बातें।" हमने डाक्टर अंकित से वायदा किया कि उनके व्यंग्य संग्रह के पंच छाँटकर लिखेंगे।
वहीं ब्लागिंग के दिनों के साथी राजीव तनेजा जी भी मिले। उन्होंने अपना मोबाइल खोलकर दिखाया कि उन्होंने मेरी यात्रा संस्मरण 'बेवकूफ़ी का सफ़र' का ई बुक संस्करण ख़रीदा है और उसे पढ़ भी रहे हैं। राजीव तनेजा जी नियमित रूप से किताबें पढ़ते हुए उनके बारे में लिखते भी हैं। खुद भी नियमित लिखते हैं और कई किताबें आ चुकी हैं।
चाय पीने के दौरान सभी सम्मानित होने वाले लेखक पहुँच चुके थे। अर्चना चतुर्वेदी अपने परिवार सहित आईं थीं। उनके साथ आई बच्ची बता रही थी -"मेरी दादी को इनाम मिलेगा। वो बहुत बड़ी कलाकार हैं।" जो बच्ची की बात से असहमत हो रहा था उसको कस के हड़का रही थी। लगा कि सुभाष जी ने बताया भी था कि बच्ची अपनी दादी पर गयी है।
सभी अतिथियों के आ जाने के बाद कार्यक्रम शुरू हुआ। शुरुआत रेणुका अस्थाना जी द्वारा सरस्वती वंदना हुई। इसके बाद प्रेम जनमेजय जी ने स्व. कमल किशोर गोयनका जी का स्मरण करते हुए हिंदी साहित्य में उनके योगदान का ज़िक्र किया। उन्होंने कहा -"कमल किशोर गोयनका जी प्रेमचंद साहित्य के विशेषज्ञ थे। उन्होंने प्रेमचंद जी को सम्पूर्णता में और अलग तरह प्रस्तुत किया। वे साहित्य के सक्रिय रचनाधर्मी थे । गोयनका जी साहित्य श्रमिक की तरह निरंतर काम करते रहे। उन्होंने व्यंग्य यात्रा के प्रकाशन में निरंतर सहयोग किया। लगातार व्यंग्य यात्रा का चंदन घिसा।"
चंदन घिसने से याद आया की व्यंग्य यात्रा का स्थाई स्तम्भ है -'चंदन घिसें' में पाठकों की प्रतिक्रियाएँ होती हैं। वैसे चंदन घिसें से मुझे तुलसीदास जी के दोहे का अंश 'तुलसीदास चंदन घिसें' और 'मुफ़्त का चंदन, घिस मेरे नंदन' दोनों याद आते हैं। प्रेम जी से अगली बार पूछना है कि व्यंग्य यात्रा के इस स्तम्भ के नामकरण के लिए उन्होंने इनमें से किससे प्रेरणा ली। इनमें से नहीं तो कोई और उद्धरण जिससे इस स्तम्भ की प्रेरणा ली हो उसके बारे में बताएँ।
कमल किशोर गोयनका जी का निधन 2 अप्रैल को हुआ था। उनकी स्मृति में दो मिनट का मौन रखकर उनको श्रद्धांजलि दी गयी।
कमल किशोर गोयनका जी को श्रद्धांजलि के बाद दीप प्रज्ज्वलन हुआ। उसके बाद मंचाशीन अतिथियों का तिलक लगाकर स्वागत किया गया। मंच पर कुर्सियों की सीमित संख्या के चलते मंच सम्मानित किए जाने वाले साहित्यकारों को मंच से थोड़ा दूर कुर्सियों पर स्थापित कर दिया गया।
बुक मार्क दिया गया। बुक मार्क मतलब पुस्तक चिन्ह।
पुस्तक चिन्ह से बचपन के पुस्तक चिन्ह की याद आई जिसमें लिखा होता था -"हम यहाँ तक पढ़ चुके हैं।" किताबों के पन्ने मोड़ने से बचाने की मंशा से बनाए गए होंगे बुकमार्क।
मुख्य अतिथि प्रसिद्ध कथाकार ममता कालिया जी को जो बुक मार्क दिया गया उसमें व्यंग्य यात्रा के बारे में ममता कालिया जी के विचार और उनकी इलाहाबाद के संस्मरणों पर लिखी किताब 'जीते जी इलाहाबाद' की कुछ पंक्तियाँ उद्धरत हैं ।
इसके बाद व्यंग्य यात्रा के 81 वें संयुक्त अंक का विमोचन हुआ। इस अंक में पिछले बीस वर्षों में प्रकाशित सभी अंकों के कवर पेज और बीते समय और आज के भी प्रमुख लेखकों के व्यंग्य यात्रा के बारे में विचार सार मौजूद हैं। बीस वर्षों तक किसी साहित्यिक पत्रिका को निकालते रहना अपने में जीवट का काम है। प्रेम जनमेजय जी इसे बखूबी करते रहे हैं। इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं।
व्यंग्य यात्रा के संयुक्तांक के विमोचन के बाद रवींद्र नाथ त्यागी जी बेटी श्रीमती इंदु त्यागी जी ने सम्मानित अतिथियों का स्वागत करते हुए रवींद्र नाथ त्यागी जी और धर्मवीर भारती जी से जुड़ी स्मृतियाँ साझा करते हुए अपने उद्गार व्यक्त किए -" भारती जी और त्यागी जी को एक साथ यहाँ देखकर बहुत ख़ुशी हुई। भारती जी त्यागी जी छह साल बड़े थे। भारती जी ही त्यागी जी को साहित्य के क्षेत्र में लाए। उनको परिमल का सदस्य बनवाया।"
इंदु त्यागी जी ने भारती जी के लेखन की चर्चा करते हुए कहा -" हम सब भारती जी के उपन्यास गुनाहों का देवता को पढ़कर बढ़े हुए हैं। उस समय का कौन युवा होगा जिसने सुधा और चंदर को महसूस नहीं किया होगा?"
इंदु जी ने भारती की अन्य कृतियों का ज़िक्र करते हुए अंधा युग के अंश का प्रभाव शाली पाठ भी किया। भारती जी धर्मयुग के 27 साल के सम्पादन को याद किया। उन्होंने भारती जी और त्यागी जी के इलाहाबाद के साझा जुड़ाव का ज़िक्र करते हुए व्यंग्य यात्रा का एक कार्यक्रम इलाहाबाद में करने का अनुरोध किया।
इसके बाद इंदु त्यागी जी ने रवींद्र नाथ त्यागी जी के लेखन के कुछ पंच सुनाए:
*अफ़सर अलादीन का वह चिराग़ होता है जिसे मंत्री रगड़ता है और अपने लिए ख़ज़ाना पाता है।
* अगर आज़ादी के बाद अफ़सर ठीक से काम करते तो परसाई जी व्यंग्यकार न होकर मलेरिया के इंस्पेक्टर होते और ख़ाकसार किसी गौशाला का मैनेजर होता।
इंदु जी ने हरीश नवल जी से जुड़ी यादें भी साझा कीं।
इंदु जी के प्रभावशाली वक्तव्य के बाद प्रेम जनमेजय जी ने आरम्भिक की शुरुआत करते हुए कहा -"आरम्भिक तो हो ही चुका अब कुछ ज़्यादा ही बोलना होगा।"
मज़े की बात कि प्रेम जनमेजय जी ने अपनी कही इस बात पर पूरे कार्यक्रम के दौरान अमल भी किया। मंच और माइक के पास होने का पर्याप्त फ़ायदा उठाया।
भारती जी सम्मान की शुरुआत के किस्से का ज़िक्र करते हुए प्रेम जी ने बताया यह वर्ष भारती जी का जन्मशती वर्ष भी है। भारती सम्मान के बारे में उनसे पुष्पा भारती जी ने कहा -"भइए भारती जी के बारे में वैसा ही कार्यक्रम करो जैसा त्यागी जी के लिए करते हो।"
व्यंग्य यात्रा से जुड़ी यादों को साझा करते हुए प्रेम जी ने बताया कि जब उन्होंने व्यंग्य यात्रा की शुरुआत की थी तब उनके किसी लेखक मित्र ने उनसे मज़े लेते हुए कहा था -" तुम्हारी तो लेखन के नाव रेत में फँस गयी।"
यह कहकर प्रेम जी व्यंग्य यात्रा के प्रकाशन के चक्कर में अपने लेखन की क़ुर्बानी का अपरोक्ष ज़िक्र करते हैं। व्यंग्य यात्रा पत्रिका अगर बोल पाती तो शायद कहती -" हमको निकालने में जितना क़ुर्बानी की है उससे ज़्यादा हमारे साथ रहने के कारण मिला है।"
प्रेम जी ने व्यंग्य यात्रा के यूट्यूब संस्करण निकालने और बंद करने की कहानी भी बतायी। उन्होंने यह भी कहा कि व्यंग्य यात्रा के प्रकाशन में उनको सबसे सहयोग मिला। किसी ने उनको सहयोग के लिए मना नहीं किया। इसके लिए वे अपने मित्रों सहयोगियों के आभारी हैं।
प्रेम जी के आरम्भिक वक्तव्य के बाद सम्मान का सिलसिला शुरू हुआ। हरीश नवल जी को रवींद्र नाथ त्यागी शीर्ष सम्मान (31000/-) , पंकज सुबीर जी को रवींद्र नाथ त्यागी सोपान सम्मान (15000/-) , बलराम जी को धर्मवीर त्यागी कथा सम्मान (15000/-) , सुभाष चंदर जी को व्यंग्य यात्रा चिंतक सम्मान (15000/-) और अर्चना चतुर्वेदी जी को शारदा त्यागी स्मृति व्यंग्य यात्रा सम्मान (15000/- ) प्रदान किए गये। सम्मान प्रक्रिया में रोली टीका, शाल और पट्ट, प्रशस्ति पत्र और स्मृति चिन्ह प्रदान किए गए। साथ में हरेक लेखक के लिए अलग से डिज़ाइन किए पुस्तक चिन्ह भी थे। कुल मिलाकर 91000/- रुपए के इनाम दिए गए कल।
हरीश नवल जी को पट्ट पहनाने का ज़िम्मा मुझे दिया गया सो उनके साथ फ़ोटो खिंचाने का मौक़ा मिला। उसी दौरान मैंने उनको मिले बुकमार्क में से एक अपने लिए झटक लिया। बुक मार्क में हरीश जी की फ़ोटो के साथ उनका त्यागी जी के बारे में विचार लिखा था :
"रवीन्द्रनाथ त्यागी जी न केवल एक उत्कृष्ट व्यंग्यकार थे अपितु एक सिद्ध कवि भी थे।"
बुक मार्क के पीछे सिद्ध कवि त्यागी जी के चित्र के साथ उनकी कविता उद्धरत थी :
"कहकहों की तरह चटक पत्ते पेड़ ने पहने
पीले फूलों के खेत में खड़ा हो गया
दिन का हरिण
छींट का रूमाल जेब में रखे
किसी रईसजादे की तरह
बसंत निकल पड़ा
रात कोई जंगलों में हंसा।"
अन्य लोगों को भी इसी तरह उनके लेखन से जुड़े अंश के साथ वाले बुक मार्क प्रदान किए गए।
सम्मान समारोह के बाद सभी सम्मानित लेखकों ने अपने उद्गार व्यक्त किए।
अर्चना चतुर्वदी जी ने कहा -"प्रेम जनमेजय सर ने मुझसे शूरुआत में कहा था कि लेखन में कभी शार्टकैट मत लेना आज मैं यही कहना चाहती हूँ कि मैंने कभी शार्टकट नहीं लिया। मैं लगातार मेहनत कर रही हूँ।" अर्चना चतुर्वेदी ने इस बात पर भी संतोष व्यक्त किया कार्यक्रम में हाल भरा हुआ था और लोग अंत तक बैठे हुए हैं।
यह अलग बात है कि अर्चना चतुर्वेदी जी लोगों के अंत तक बैठे रहने की बात पर संतोष व्यक्त करने के बाद अपने परिवार सहित पधार गयीं। आख़िर में जब सभी सम्मानित लोगों का फ़ोटो सेशन हुआ तो उसमें उनकी फ़ोटो नहीं हो पायी।
पंकज सुबीर जी कहा :" हाल ही में पिता के न रहने पर उनका इस कार्यक्रम में आना मुश्किल लग रहा था लेकिन लोगों ने प्रेरणा दी कि इस इनाम से तुम्हारे पिता जी खुश होते इसलिए तुम्हें जाना चाहिए। उन्होंने यह सोचकर भी कार्यक्रम में आना तय किया कि यह सम्मान रवीन्द्रनाथ त्यागी जी के परिवार से जुड़े लोगों ने अपने पिता की स्मृति में दिया है इसलिए मुझे जाना चाहिए।इसलिए मैं यह सम्मान स्वीकार करता हूँ।"
पंकज जी ने वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी जी का इस बात के लिए आभार व्यक्त किया कि उन्होंने उनको रवीन्द्रनाथ त्यागी रचनावली भेंट की। उन्होंने अन्य प्रकाशकों से भी अपेक्षा की कि वे भी ऐसा ही करेंगे। आशा है कि पंकज सुबीर जी के शिवना प्रकाशन से ऐसा कुछ जल्द ही होता दिखेगा।
सुभाष चंदर जी ने अपनी बात रखते हुए कहा :" मुझे व्यंग्य लेखन के लिए अनेक सम्मान मिले लेकिन आलोचना के लिए पहला सम्मान मिला है। इसके लिए मैं व्यंग्य यात्रा की टीम को बधाई देता हूँ, धन्यवाद देता हूँ।"
रवींद्रनाथ त्यागी जी से अपने संबंधो और उनसे जुड़ी यादों को साझा करते हुए सुभाष जी ने बताया कि वे अपने लेखन के बारे में कहते थे :" सुभाष बाबू मेरा 33% लेखन तो अच्छा है, 33 % लेखन ठीक-ठीक है, बाक़ी 34% लेखन घटिया है।आज के आत्ममुग्ध लेखकों के जमाने में अपने बारे में ऐसा कौन कहता है?"
वरिष्ठ कथाकार बलराम जी ने धर्मवीर भारती जी से जुड़ी यादों को साझा करते हुए बताया कि किस तरह भारती जी ने उनको शुरुआती दौर में लिखने के लिए उत्साहित किया था और उनकी तारीफ़ की थी। एम ए की पढ़ाई के दौरान भारती जी ने सारिका में छपी कहानी को पढ़कर उनको पत्र लिखकर उनसे धर्मयुग के लिए ग्रामीण जीवन पर आधारित कहानी माँगी और बाद में छापा। उनकी धर्मयुग में छपी कहानी पढ़कर डेक आज के फ़ीचर सम्पादक उनको खोजते हुए आए। यह भारती जी का उनके जीवन में योगदान है।
हरीश नवल जी ने त्यागी जी से जुड़ी तमाम यादों को साझा करते हुए बताया जिसके लेखन से हम प्रभावित होते हैं उनको देखकर हम उनके जैसा लिखना चाहते हैं। त्यागी जी लेखन को देखकर लगता है कि हमको हर विधा की जानकारी होनी चाहिए। जितनी अधिक जानकारी होगी उतना अच्छा लेखन होगा। आप जितना अधिक पढ़ते हैं उतना आपको जानकारी होती है कि आपको कितना कम पता है। त्यागी जी का भाषाओं पर अधिकार ज़बर्दस्त था।
त्यागी जी से अपनी पहली मुलाकात का ज़िक्र करते हुए हरीश जी ने बताया कि जब वे उनको अपना पहला व्यंग्य संकलन 'बागपत के ख़रबूज़े' त्यागी जी को भेंट करने गए तो उन्होंने हरीश जी को सहज करने के मंशा से कहा -"हरीश मैंने तुम्हारे अगले व्यंग्य संग्रह का शीर्षक सोच लिया है। तुम्हारे अगले व्यंग्य संग्रह का शीर्षक होगा -"मथुरा के पेड़े।" उसके अगले व्यंग्य संग्रह का शीर्षक होगा -"हापुड़ के पापड़।"
मिलने वाले की छुद्रता को उदारता में बदलने का औदार्य उनमें था। अपने और प्रेम जनमेजय जी के संग-साथ की यादें साझा करते हुए उन्होंने बताया कि उनकी जोड़ी की लोग लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल की जोड़ी कहते थे।
मुख्य वक्ता ममता कालिया जी ने त्यागी जी और भारती जी दोनों से जुड़ी यादों को जीवंत करने के लिए इंदु त्यागी जी की तारीफ़ की। उन्होंने त्यागी जी से जुड़ी याद साझा करते हुए बताया कि उन्होंने एक बार किसी लेख के सिलसिले में डाँटा भी था। ममता जी ने व्यंग्य यात्रा सम्मान को इस अर्थ में ख़ास बताया कि इसमें एक लेखक दूसरे लेखक को सम्मानित कर रहा है। प्रेम जी की तारीफ़ करते हुए कहा कि आज ऐसे समय में वे पूरे दम ख़म से पत्रिका निकाल रहे हैं जब समय और समाज की स्थितियां ऐसी हो गयीं हैं जब एक किताब तो क्या एक ग्रीटिंग कार्ड तक छापना मुश्किल हो गया है। आज लगातार शिक्षा विरोधी नीतियाँ सामने आ रही हैं। पत्रिकाओं का डिस्पैच का खर्चा इतना बढ़ गया है कि छपी हुई पत्रिका भी भेजना मुश्किल होता जा रहा है। भेजने पर भी यह निश्चित करना मुश्किल हो गया है कि पत्रिका पहुँचेगी भी या नहीं क्योंकि सभी सेवाएँ अविश्वनीय हो गयीं हैं। आज जीवन से हास्य कम होता जा रहा है। स्थिति ऐसी हो गयी है कि अंधेर और अंधेरा दोनों आपके सामने हैं। पूरा समाज इस समय अंधेर और अंधेरे की बीच में हैं।
ममता जी ने भारतेंदु जी की अंधेर नगरी से लेकर आजतक लिखी कई किताबों के शीर्षक का ज़िक्र करते हुए कि आज हमको लगातार अंधेरे की तरफ़ धकेला जा रहा है। व्यंग्य हमें अपनी उन बातों को कहने के अवसर प्रदान करता है जिनको खुलकर कहने में हमें परेशानी हो सकती है। व्यंग्य सरकार को और समाज को सबक़ सिखाने के लिए कन्फ़्रनटेशन प्वाइंट है।
ममता जी ने आज के समय में बड़े संस्थानों से जुड़े सम्मानों के झमेलों का ज़िक्र करते हुए कहा कि उनके मिलने के बाद बुराई और तमाम लफड़े और हेट कंपेन होती है। ऐसे समय में छोटे सम्मान प्रतिष्ठित हो रहे हैं।
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में बाल स्वरूप राही जी ने धर्मवीर भारती जी से जुड़ी यादों को साझा करते हुए बताया कि किस तरह भारती जी ने उनकी कविता की तारीफ़ की और उनको कवि के रूप में स्थापित होने में सहयोग दिया।
कार्यक्रम सुंदर संचालन रणविजय राव जी ने किया और धन्यवाद ज्ञापन डा संजीव कुमार जी ने किया।
कार्यक्रम के अंत तक आधे से अधिक लोग वापस जा चुके थे। जो बचे थे उनके साथ सभी के फ़ोटो हुए। अलग-अलग समूहों में लोगों ने फ़ोटो खिंचाए। क़रीब चार घंटे चले इस कार्यक्रम में क़रीब पचास-साथ लोगों की भागेदारी रही। पाँच इसमें पाँच साहित्यकारों को सम्मानित किया गया।
वक्ताओं के ड़ायस के पीछे पंडित गोपाल प्रसाद व्यास जी की फ़ोटो लगी थी। हर वक्त की तरफ़ देखते हुए लग रहा था कि पीछे से गोपाल जी वक्ता को ध्यान से देख रहे हैं कि अगला क्या बोल रहा है। सभी सम्मानित साहित्यकारों के वक्तव्य के वीडियो पोस्ट में संलग्न हैं।
हिंदी भवन से निकलकर सुभाष चंदर जी ने हमको बाहर नुक्कड़ की दुकान की चाय पिलाकर सम्मान को सेलिब्रेट किया। बाक़ी लोगों की चाय अभी बकाया है।
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