Saturday, May 24, 2025

बांगड़ू लोगों को कोई टोकने वाला दोस्त


 पिछले दिनों कालेज के एक मित्र से बात हो रही थी। बहुत दिन बाद। उसको पता है कि मेरी कुछ किताबें प्रकाशित हुई हैं। उसने कहा -'कोई ऐसी किताब बताओ जिसको आसानी से पढ़ सकें। आसानी से मतलब छोटी-छोटी पोस्ट हों। ज़्यादा लंबा पढ़ना अब हो नहीं पाता।'

दोस्त की बात सुनकर हमने सोचा कि अच्छा हुआ कि अगले ने ईमानदारी से बता दिया । हमने सोचा कि उसे पुलिया सीरीज के किताबें (पुलिया पर दुनिया और पुलिया पर जिंदगी) का लिंक दे देंगे। सोचकर छोड़ दिया। दोस्ती के नाम पर अत्याचार ही होगा कि उसको पढ़ने में होने के परेशानी के बावजूद अपनी किताबें ठेल दें। बता भी देते तो अगली बार पक्का कहता -'यार , तुम्हारी किताबें अभी ले नहीं पाये। लेंगे जल्दी ही। एक बार फिर से लिंक भेज दो।'
आजकल यह सामान्य स्थिति है। लोग छोटे-छोटे लेख पढ़ना पसंद करते हैं। छोटी फ़िल्म देखना पसंद करते हैं। इसी लिए रील्स का चलन बढ़ा है । रील प्रधान विश्व करि राखा। इस चक्कर में फ़िल्में देखने का चलन भी कम हुआ है। जो लोग देख लेते हैं वो बताते हैं। अपन भी कई फ़िल्में 'देखी जाने वाली लिस्ट' में सजाये बैठे हैं । सोचते हैं लेकिन देख नहीं पाते । बाकी चीजें चलते-फ़िरते देखते-पढ़ते रहते हैं ।
पढ़ना भी ऐसा ही चलता रहता है । आजकल दो किताबें पढ़ रहे हैं । दोस्तोवस्की की 'अपराध और दण्ड ' और जोसेफ़ हेलर के 'कैच -22'। ‘अपराध और दंड’ करीब साढ़े आठ सौ पेज की किताब है । इतनी मोटी किताबें आजकल कम लिखी जाती हैं । इसमें दूनिया की माँ ने अपनी बेटी के के बारे में अपने बेटे को जितना लंबा लंबा पत्र लिखा है उतने में एक लंबी कहानी हो जाती है । इस तरह के क्लासिक के पढ़ने में कई अवरोध हैं उनमें से एक अवरोध ये रील्स और छुटपुट वीडियो हैं जिनकी आज भरमार है ।
फेसबुक के पोस्ट भी पढ़ना होता है। कुछ में टिप्पणी भी करते हैं । सबमे टाइम लगता है। इस चक्कर में लिखना भी छूट जाता है ।
आजकल उर्दू लिखना-पढ़ना भी सीख रहे हैं। पहले भी कई बार शुरू किया था। लेकिन बीच में या किनारे ही रुक गए। अबकी बार सारी इमला सीख गए। अक्षर पहचानना आ गया। आशा है साल के अंत तक काम चलाऊ उर्दू पढ़ना-लिखना सीख लेंगे। मेरी दिली ख्वाहिश है कि उर्दू के क्लासिक मूल रूप में पढ़ सकूँ । उर्दू सीखने के बाद कोई एक दक्षिण भारतीय भाषा सीखेंगे।
सोशल मीडिया में ज्यादातर पोस्ट्स इतनी आक्रामक दिखती हैं कि उनको पढ़कर डर लगता है। लोगों का लेखन इतना आक्रामक हो गया है कि बुश की याद आती है जो कहते थे -‘जो हमारे साथ नहीं वह हमारा दुश्मन है।’
बुश को सामने भले लोग कुछ न कहते हों लेकिन पीछे तो उनके बारे में लोग लिखते-कहते ही थे। कृष्ण बलदेव वैद जी ने अपनी डायरी में लिखा था -‘ बुश बांगड़ू है।’
हमारा भी ऐसी डायरी लिखने का करता है। खुली डायरी। लेकिन दोस्त लोग टोंकते है -क्या जरूरत तुम्हें यह सब लिखने की बे?’
हम फ़िलहाल दोस्त की बात मान लेते हैं। अपनी बात याद करके -‘वह व्यक्ति बड़ा अभागा होता है जिसे कोई टोकने वाला नहीं होता।’
क्या बांगड़ू लोगों को कोई टोकने वाला दोस्त नहीं होता ?
(फ़ोटो मेरे बेटे Anany की । अपने उत्पाद कोटेड धागा का प्रचार करते हुए। पूरा विज्ञापन इंस्टाग्राम की रील में देख सकते हैं)

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