Thursday, May 29, 2025

किताबों की खोज में


 आजकल उर्दू सीखने के चस्का लगा है । दिन में कई बार उर्दू इमला लिखने का अभ्यास करते हैं । आनलाइन वीडियो देखते हैं । पढ़ना कुछ कुछ सीख गए हैं । अब लिखना और अच्छी तरह से पढ़ना सीखना है।

उर्दू की कोई किताब कई दिन से खोज रहे थे। नहीं मिली। दो दिन पहले लखनऊ के यूनिवर्सल बुक स्टोर में देखी। वहाँ भी नहीं मिली। उसने बताया -'अमीनाबाद में रामा बुक स्टोर में मिल जायेगी।'
कल रामा बुक स्टोर गए। ऑटो से। आटो वाले का नाम सलाउद्दीन बता रहा था। हमने उसके नाम का मतलब पूछा तो उसने बताया -"मेरा सही नाम सलामुद्दीन है।" सलामुद्दीन से मतलब अपने आप लगा लिया -"सलाम करने वाला या जिसको लोग सलाम करते हों।" लेकिन मतलब देखा तो पता चला -सलामुद्दीन का मतलब होता है -शांतिप्रिय और दृढ़ धार्मिक आस्था वाला व्यक्ति।
इससे पता चला कि हम अपने अनुमान के आधार पर बहुत कुछ सोच लेते हैं जबकि सच उससे बहुत अलग होता है। कई बार हम अपने अनुमान की परख इस डर से भी नहीं करते कि कहीं अनुमान टूट गया तो बवाल होगा।
सलामुद्दीन ने बताया कि वे बिल्कुल पढ़े नहीं हैं। कक्षा एक में कुछ दिन ही गए स्कूल। फिर नहीं गए। हमने पूछा जब स्कूल नहीं गए तो पैसे-रुपए कैसे गिन लेते हो ?
इस पर मुस्कराते हुए बताया -"उतना सीख गए हैं।"
अमीनाबाद में एक के बाद कई किताबों की दुकानें हैं। एक शुक्ला बुक स्टोर भी दिखी , दूसरी न्यू शुक्ला बुक स्टोर। लाइन से किताबों के कई दुकानें देखकर कोलकाता के कालेज बुक स्ट्रीट की याद आयी। एक बार गए थे , फिर जाना है।
रामा बुक स्टोर सामने ही दिखी । गर्मी के वजह से दुकान में घुसते ही प्लास्टिक का पर्दा लगाया हुआ था।
दुकान के काउंटर पर बैठे सज्जन से उर्दू की क़िताब के बारे में पूछा तो उन्होंने वहाँ किताब दे रहे दूसरे को हिन्दी -उर्दू किताब देने के लिए बोल दिया। उसने ऊपर टांड के अंदर बैठे लड़के से किताब मांगी। लड़के ने किताब निकाल कर नीचे थ्रो कर दी। नीचे वाले ने लपक कर मुझे थमा दी।
हमने किताब उलट-पलट कर देखी। काम भर का मसाला दिखा किताब में । इस बीच एक और किताब का ध्यान आया- शिरीष खरे की 'नदी सिंदूरी' लाने के लिए दीदी ने कहा था । पूछने पर काउंटर वाले ने कहा -"लिखकर दीजिये नाम।" नाम लिखकर दिया तो उसने दूसरे को बोला -"देखकर बताओ है क्या किताब अपने यहाँ ?"
कुछ देर बाद लौटकर बताया उसने कि किताब दुकान पर नहीं है। इस बीच दुकान के बारे में काउंटर पर मौजूद आदमी ने बताया कि 60-70 साल पुरानी है दुकान। चालीस साल तो ख़ुद उनको यहाँ काम करते हो गए।
भुगतान काउंटर पर शायद दुकान के मालिक बैठे थे। उनसे पूछा तो उन्होंने एक और किताब के बारे में बताया। वह भी ले ले। दोनों किताबें 110 रुपए के पड़ीं। किताबों के बिक्री के बारे में बात चलने पर बताया कि आजकल लोग किताबें नहीं ख़रीदते। पास होने के लिए क्वेश्चन बैंक ख़रीदते हैं। इंजीनियरिंग के पढ़ाई वाले लड़के तक प्रश्न बैंक से काम चलाते हैं । पता नहीं इंजीनियर बनकर कैसे काम करेंगे ?
हमारे पास इस बात का कोई जवाब नहीं था। हम भुगतान करके बाहर आ गए। चौराहे पर खड़े होकर कुछ देर सोचते रहे कि वापस चला जाये या चौक चलें । चौक में अमृतलाल नागर जी का घर देखने का विचार बहुत दिन से था। चौक वहाँ से साढ़े तीन किलोमीटर दिखा रहा था। अलंकार रस्तोगी वहीं पास ही रहते हैं। उनका स्कूल नागर जी के घर के पिछवाड़े ही है। उन्होंने आने के लिए कहा। लेकिन हमने कहा -"फिर आयेंगे।"
कुछ देर अमीनाबाद चौराहे पर खड़े घर लौटने के बारे में सोचते रहे। सामने प्रकाश कुल्फी की दुकान थी। मन किया वहाँ बैठकर क़ुल्फ़ी खा लें लेकिन डायटीशन के हिदायत का ध्यान आ गया तो क़ुल्फ़ी के पैसे बचा लिए।
घर लौटने के लिए कैब बुक करते हुए लगा कि इतनी पास आकर नागर जी का घर देखे बिना लौटना ठीक नहीं। यह 'लगते' ही हम पलट कर चौक के तरफ़ चल दिए।

https://www.facebook.com/share/p/18Zrm7bMfo/

No comments:

Post a Comment