"चच्चा ग़ालिब का खत आया है. लिखा है– "कभी फुरसत में हो तो चले आओ बल्लीमारान मिल–बैठकर आमों का लुत्फ लेंगे. आओ तो केपी (सक्सेना) को भी साथ लेते आना. अरसा हुआ मिर्जा से मिले."
कल Anshumali Rastogiजी ने अपनी वाल पर यह संदेश लिखा।
हमने जवाब में लिखा -“जितनी जल्दी हो मिल आइए। बाजार हटाये जा रहे हैं चाँदनी चौक के। बल्लीमारान का हुलिया बदल जाएगा।"
असल में पिछले दिनों एक खबर छपी थी अख़बार में कि चाँदनी चौक की दुकानें संकरी गलियों में हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री ने एक कार्यक्रम में कहा -"चांदनी चौक बहुत सघन बसा हुआ है। व्यापारिक गतिविधियों के कारण यहां इतनी अधिक भीड़ भाड़ रहती है कि लोगों को खुली हवा में सांस लेने के लिए भी शाम होने का इंतजार करना पड़ता है।" इस बाद चांदनी चौक बाजार के दूसरी जगह स्थापित होने की चर्चा होने लगी।
हमने भी सोचा कि इसके पहले कि चाँदनी चौक का हुलिया बदले, घूम लिया जाये चाँदनी चौक। देख ली जाए ग़ालिब की हवेली। क्या पता ग़ालिब की हवेली को भी कहीं खुले में स्थानांतरित कर दिया जाये।
दोपहर निकले घर से। मेट्रो में भीड़ कम थी लेकिन बैठने के लिए तीन स्टेशन बाद जगह मिली। तब तक मेट्रो की सवारियां और उतरते-चढ़ते लोगों को निहारते रहे। नोयडा सिटी सेंटर मेट्रो से राजीव चौक तक आए, फिर वहाँ से चाँदनी चौक मेट्रो स्टेशन।
चाँदनी चौक से बल्लीमारान का रास्ता एक किमोमीटर से कम दूरी का है। स्टेशन के बाहर ही पूछकर चांदनी चौक की गलियों से टहलते, दुकानों को देखते बल्लीमारान की तरफ़ बढ़े।
चाँदनी चौक को मुग़लबादशाह शाहजहाँ द्वारा 17 वीं शताब्दी में बनवाया गया था, और इसका डिजाइन उनकी बेटी जहांआरा द्वारा तैयार किया गया था।
चाँदनी चौक की संकरीं गलियों में, जहाँ से इंसान का बमुश्किल गुजरता है, इतनी बड़ी-बड़ी दुकानें दिखीं जिनमें कई-कई हाथी आराम से तफ़रीह कर सकें। तरह-तरह के सामानों की दुकानें। एक दुकान पर महिलाओं के कपड़ों के ढेर लगे हुए थे। सैंकड़ों ब्लाउज एक के ऊपर रखे हुए। फोटो लेने की सोची लेकिन फिर लगा कहीं कपड़े बुरा न मान जायें। आगे बढ़ गए।
गलियों से होते हुए में सड़क पर आए। आने-जाने की सड़क अलग-अलग। दोनों सड़क के दोनों तरफ़ पत्थर के बैठने के मूढ़े टाइप रखें हुए थे। यह बात अलग कि उन पर कोई बैठा नहीं था। अलबत्ता दोनों सड़क के बीच की 'नो रोड लैंड' पर तमाम लोग बैठे, सोते, गपियाते, बतियाते दिखे। एक जगह एक परिवार के जैसे लोग ढेर सारी रेजगारी गिन रहा रहा। आदमी गिन रहा था, औरत और बच्चे उसको गिनते देख रहे थे। शायद वो भीख मांगने वाला परिवार रहा होगा।
कुछ रिक्शे वाले सड़क किनारे रिक्शा टिकाए रिक्शों पर टिके सो रहे थे। कुछ लोग बीच की जगह पर खाना पकाते भी दिखे। चाँदनी चौक पर गाड़ियों को सुबह 9 बजे के पहले और रात को 9 बजे आने की मनाही के बोर्ड लगे हैं। पकड़े जाने पर बड़े जुर्माने की सूचना भी लगी है। पता नहीं इस पर कितना अमल होता है।
एक जगह चौराहे पर खड़े होकर हमने वीडियो बनाया और आसपास के इलाक़े को काफ़ी देर तक देखा। कहते हैं यहाँ पर नहर थी जिसका पानी चाँद की रोशनी में चमकता था इसीलिए इस बाजार का नाम चांदनी चौक पड़ा। काश उस समय के वीडियो आज दिखते तो अंदाज़ लगता कैसा दिखता था उस समय चाँदनी चौक।
वहीं एक जगह स्वामी श्रद्धानंद जी की मूर्ति लगी थी। स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती (मुंशीराम विज ; 22 फरवरी, 1856 - 23 दिसम्बर, 1926) भारत के शिक्षाविद, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तथा आर्यसमाज के संन्यासी थे जिन्होंने स्वामी दयानन्द सरस्वती की शिक्षाओं का प्रसार किया।
चाँदनी चौक की सड़क पर जगह-जगह सूचनाएँ उर्दू में भी लिखी दिखीं। हमने ठहरकर सब सूचनाएं अटक-अटक कर उर्दू में पढ़कर अपने हालिया अर्जित उर्दू की जानकारी का इम्तहान लिया। हर बार कामचलाऊ नंबरों से पास होते रहे।
आगे उर्दू के मशहूर शायद उस्ताद दाग़ के नाम का होलसेल मार्केट का बोर्ड लगा दिखा। बाजारों में अपनी सहज दिलचस्पी के चलते Alok Puranikजी ने अपनी वाक के क़िस्सों में इस मार्केट का जिक्र कई बार किया है। कुछ लोगों हजरत दाग़ को अपने समय के सर्वश्रेष्ठ रोमांटिक कवियों में से एक माना है। दाग साहब का एक शेर मुझे हमेशा याद आता है :
हज़रत-ए-दाग़ जहाँ बैठ गए बैठ गए
और होंगे तिरी महफ़िल से उभरने वाले
दाग साहब माँ को केंद्र में रखकर उर्दू के मशहूर लेखक शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी साहब का उपन्यास '‘कई चाँद थे सरे-आसमाँ’' हाल के समय के सबसे पसंदीदा और पढ़ी जाने वाली किताबों में से एक माना जाता है।
कूँचा हजरत दाग़ के आगे बल्लीमारान की वह गली है जहाँ उर्दू के नामचीन शायर उस्ताद ग़ालिब की हवेली है। गली की शुरुआत में तमाम जूते-चप्पलों की दुकानें हैं। इसके बाद चश्में की दुकानें। पूछते हुए गली में घुसे तो किसी को ग़ालिब की हवेली के बारे में पता था , किसी को नहीं पता था। इस पूछताछ में हवेली से आगे निकल गए। आगे जाकर पूछा तो किसी ने बताया -'पीछे है। तमन्ना गेस्ट हाउस के पास।' हम पलट लिए।
लौटते हुए रास्ते में एक स्कूल के गेट पर चिपकी चेतावनी देखी -"यहाँ गाड़ी खड़ी करना मना है। अगर खड़ी की तो हवा निकाल दी जायेगी। यह स्कूल है रोजाना खुलता है।"
हमारे पार कोई गाड़ी थी नहीं लिहाजा यह चेतावनी हमारे लिए नहीं थी। टहलते हुए हम तमन्ना गेस्ट हाउस तक आए। वहीं पास में ग़ालिब की हवेली थी। हवेली के बाहर लाल पत्थर पर लिखा था -"हवेली मिर्जा ग़ालिब। इस हवेली में वर्ष 1860 से 1869 तक मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपने जीवन का अंतिम समय व्यतीत किया।"
हवेली के अंदर जाने पर कुछ और बोर्ड लगे थे। एक में उस्ताद ग़ालिब का परिचय था। इसके बाद और कुछ नहीं था। हवेली शुरू होते ही ख़त्म हो गई। ऊपर एक गेस्ट हाउस था। वहाँ जाते हुए एक जन से पूछा तो उन्होंने बताया -"हवेली मेंटिनेंस के लिए बंद है।" थोड़ी देर बाद वहीं से गुजरते दूसरे आदमी ने बताया -"बीजेपी गवर्नमेंट ने बंद करवा दी हवेली।" हमने पूछा -"क्यों।" इस पर वह -"हमको नहीं पता,क्यों?" कहते हुए हवेली के एक हिस्से में चलता चला गया।
हवेली के फाटक के पास ही दो दरवाजे थे , जो कि बंद थे, उनके अंदर ही मिर्ज़ा ग़ालिब अपने आख़िरी दिनों में रहते थे। हम कुछ देर इधर-उधर ताक कर बाहर आ गए।
बाहर आकर भी कुछ लोगों से ग़ालिब स्मारक बंद होने के बारे में पूछा। अधिकतर लोगों ने -"हमको पता नहीं" बताया। अलबत्ता बगल की एक दुकान पर मौजूद लोगों ने बताया कि मरम्मत के लिए बंद है ग़ालिब की हवेली। 22 जून के बाद खुलेगी। हमको लगा कि ग़ालिब स्मारक से जुड़े लोगों/संस्था को इसकी मरम्मत की सूचना वहाँ लगानी चाहिए। लेकिन किससे, क्या कहते। कोई वहाँ था भी तो नहीं। अपन ग़ालिब का शेर :
"बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे"
(पूरा विश्व बच्चों के छोटे खेल के मैदान की तरह है! हर दिन और रात मेरे सामने एक भ्रम, एक तमाशा घटित होता रहता है!!) दोहराते हुए वापस लौट आए। तसल्ली यही रही कि उस्ताद ग़ालिब की हवेली का मुख्य द्वार देख लिया। जल्द ही पूरी हवेली भी देखेंगे।
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