जामा मस्जिद के किस्से बहुत सुने थे। दुनिया की बड़ी मस्जिदों में शुमार इस मस्जिद के बारे में तमाम किस्से सुन रखे थे। कुछ छवियाँ भी गढ़ रखीं थीं। उनमें से एक यह कि मस्जिद के सामने बहुत चौड़ी सड़क है। बड़े मैदान जितनी सड़क है मस्जिद के सामने। खुला इलाका है मस्जिद के सामने। लेकिन जब देखने गए तो असल में बात अलग थी।
ग़ालिब की हवेली से निकलकर देखा जामा मस्जिद पास ही है। करीब एक किलोमीटर। टहल लिए मस्जिद की तरफ़। भीड़ भरी सड़क पर रिक्शा, स्कूटर, साइकिल और पैदल लोग चल रहे थे। दोनों तरफ़ तरह-तरह की दुकानें। दोपहर की गर्मी सड़क पर चलते लोगों के चेहरे पर चमक रही थी।
ग़ालिब की हवेली से जामा मस्जिद के रास्ते में 'गली दिलखुश राय खजांची' में छोटे बच्चों का स्कूल के बोर्ड के साथ लटके तारों का जंजाल दिखा । दिलखुश राय खजांची कौन थे अभी पता नहीं लेकिन जरूर काम भर के बड़े आदमी रहे होंगे तभी उनके नाम की बनी है। Alok Puranik जी और Manu Kaushal जी टहलाते हैं यह इलाक़ा। वो कुछ बतायेंगे दिलखुश राय खजांची के बारे में।
मस्जिद की तरफ़ जाने वाली सड़क किसी तेज गेंदबाज के फेंकी गेंद की तरह स्विंग करते हुए घूमती हुई चल रही थी। कई मोड़ पर मुड़ने के बाद जामा मस्जिद के गेट नंबर 3 के सामने पहुँच गए। भीड़ भरी सड़क के सामने कोई मैदान नहीं था, कोई बहुत चौड़ी सड़क भी नहीं थी। मतलब जामा मस्जिद के पहले दीदार में ही हमारी एक छवि का क़त्ल हो गया जिसकी रिपोर्ट किसी थाने में नहीं लिखाई जा सकती थी।
एक बार फिर से लगा कि दुनिया के तमाम लोगों, जगहों और चीजों के बारे में हमने अपने सोच के हिसाब से हम लोग तमाम छवियाँ मन में बना लेते हैं। असलियत इसके एकदम अलग होती है।
जामा मस्जिद मुग़ल बादशाह शाहजहां ने बनवाई थी। 1650 से 1656 के बीच। यह शाहजहां द्वारा बनवाई आख़िरी बड़ी इमारत थी। इसको बनवाने में उस समय दस लाख रुपये खर्च हुए थे। इस मस्जिद के उद्घाटन के लिए उस समय बुखारा, उज़्बेकिस्तान से सैयद अब्दुल ग़फ़ूर शाह बुख़ारी को बुलवाया गया था। उनको शाही इमाम बनाया गया और उन्होंने 23 जुलाई 1656 को मस्जिद का उद्घाटन किया। तबसे बुख़ारी ख़ानदान के लोग ही जामा मस्जिद के इमाम बनते आए हैं।
गेट नंबर तीन की सीढ़ियों से चढ़कर ऊपर पहुँचे। कुछ देर सीढ़ियों पर बैठे रहे। तमाम लोग सीढ़ियों पर बैठे फोटोबाजी में मशगूल थे। कुछ देर हमने उनको देखा और फिर सामने की सड़क का फोटो लिया। फिर अंदर की तरफ़ जाने के लिए आगे बढ़े।
मस्जिद के अंदर जाने पर जूते बाहर ही उतारने पड़ते हैं। जूते जमा करवाने का इंतजाम करने वाले को दस रुपए भुगतान करने थे। हमने उससे पूछा -"हमको गेट नम्बर एक की तरफ़ से बाहर जाना है, जूते यहाँ जमा करके उधर जा सकते हैं?" उसने सलाह दी -"जूते हाथ में लेकर चले जाइए। पहनिएगा नहीं मस्जिद में।"
हमने जूते अपने पास के झोले में डाल लिए। दस रुपये बच जाने का सुकून ने चेहरे पर अपने-आप कब्जा कर लिया। उधर झोले में पहले से मौजूद मोबाइल, पावर बैंक, पानी की बोतल और किताब जूते को देखकर थोड़ा चौंके, शायद नाक-भौं भी सिकोड़ी हो लेकिन हमने किसी के नखरे देखा बिना बैग की चैन बंद कर दी। हो सकता उनमें आपस में कुछ कहा-सुनी हुई हो लेकिन वो पक्का रेल में जनरल डिब्बे के यात्रियों की तरह एडजस्ट हो गए।
मस्जिद के बहुत बड़े अहाते में तमाम लोग घूमते, टहलते, बतियाते, हँसते, खिलखिलाते दिखे। जो भी आया था वहाँ फ़ोटो खिंचाते दिखा। कई लड़कियां सेल्फी लेते, कई जोड़े अपने जोड़ीदार का फ़ोटो लेते, कई घरवाले अपने परिवार के लोगों के साथ तरह-तरह से फ़ोटो खिंचाते दिखे।
मस्जिद के अहाते के बीच में बने पानी के तालाब के चारों तरफ़ बैठे लोग पानी से मुँह धोते, उसके साथ फ़ोटो खिंचाते, अपने बच्चों को पानी छुआते दिखे। शायद यह तालाब मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए आने वालों के वजू करने के लिए था।
मस्जिद के अहाते, तालाब और आसपास के नज़ारे देखने के बाद मस्जिद देखने के लिए आगे गए। मस्जिद प्रवेश पर एक जगह लिखा था -"यहाँ वीडियो बनाते समय गाने न चलायें।" हमने एहतियातन वीडियो बनाया ही नहीं।
आगे की जगह पर रस्सी लगी थी और बोर्ड पर लिखा था -"प्रवेश केवल नमाजियों के लिए।" हम वहीं रुक गए। वहीं खड़े-खड़े उर्दू में लिखा हुआ पढ़ा -"सिर्फ़ नमाजियों के लिए।" यह भी जाना कि सिर्फ़ के लिए 'स' सुवाद से लिखा जाता है 'सीन' या 'से' से नहीं। इतनी उर्दू पढ़ लेने का सुकून भी बिना टिकट मिला।
रस्सी से बनी सीमा रेखा के दूसरी तरफ़ तमाम लोग बैठे, लेटे आराम कर रहे थे। नमाज में अभी समय था। तब शायद वे नमाज पढ़ें या यह भी हो सकता हो नमाज के समय वे वहाँ से उठकर रस्सी की सीमा रेखा से बाहर आ जायें। जो हो अपन से पलट लिए। अहाते के और सामने वाले मीनार के कुछ और फ़ोटो लिए, वीडियो बनाए। लौटने लगे।
लौटते हुए देखा कि एक जगह मीनार देखने के लिए टिकट का नोटिस लगा था। हमने सोचा देखें इसे भी। सत्तर रुपए का टिकट लिया और मीनार देखने के लिए चल दिए। संकरी सीढ़ियों से चलते हुए पहली मंजिल पर पहुंचे। मीनार की तरफ़ जाने के पहले मौजूद लोगों ने झोला वहीं जमा करा लिए। दस रुपए फीस थे सामान जमा कराने की । वो लोग पानी की बोतल भी रखे थे। हमने झोला जमाकर टोकन लिया और मीनार की तरफ़ चल दिए।
मीनार की गोल घेरे में बनी , संकरी सीढ़ियों पर चढ़ते हुए सोचते रहे अब कितनी ऊँचाई और बची है। सीढ़ियों में जगह-जगह रोशनदान बने हुए थे। कहीं-कहीं बल्ब भी लगे थे।
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए थक गए तो एक जगह बैठ भी गए। थोड़ा सुस्ताने के बाद फिर ऊपर बढ़े। एक जगह रोशनदान के पास एक सफेद दुपट्टा भी रखा था। हमें लगा कोई भूल गया होगा। हमने उसको अनदेखा किया और ऊपर बढ़ते रहे।
ऊपर पहुँचकर जीने से सटी जगह पर बैठे-बैठे हमने कई साँसे एक साथ लीं। सुकून की, तसल्ली की, इत्मिनान की, संतोष और भी न जाने किस-किस घराने की। सब साँसे अपने साथ ले गई आक्सीजन को हमारे दिल को सौंपती गयीं। दिल भी तसल्ली से धड़कते हुए पूरे शरीर को ख़ून भेजता रहा।
ऊपर दो लड़कियाँ और एक लड़का पहले से मौजूद थे। लड़का शांत था, लड़कियां चहकती हुईं फोटो, वीडियो, सेल्फी बनाती हुई मोबाइल कैमरे की कीमत वसूल कर रही थी। उनमें से एक ने कहा -"मेरा दुपट्टा पता नहीं कहाँ गिर गया?" हमने उसको बताया -"रास्ते में एक जगह दिखा था मुझे।" उसने थोड़ा ख़ुशी जाहिर की फिर अपनी मम्मी को वीडियो काल करके मीनार से आसपास का नज़ारा दिखाने लगी। मम्मी ने नीचे आने को कहा तो बोली -"आधे घंटे बाद आऊँगी नीचे।"
बच्ची बहुत खुश थी। पानीपत से आई थी जामामस्जिद देखने। बोली-"पहली बार आए हैं देखने। दिल्ली में होते तो अब तक सैकड़ों बार देखने आ चुके होते।"
हमने मीनार से आसपास के और नीचे सड़क पर चलते लोगों के नज़ारे देखे और फ़ोटो खींचे। कुछ देर में वहाँ आने वाले बढ़ते गए। जगह संकरी होती गई। हम नीचे की तरफ़ चल दिए। लौटते समय सीढ़ियाँ गिनी। कुल 120 सीढ़ियाँ हैं मीनार के ऊपर तक जाने की। जाते समय ऐसा लग रहा था कि हज़ारों सीढ़ियाँ चढ़े हैं। गिनती सौ के कुछ नज़दीक ही देखकर थोड़ा ताज्जुब हुआ।
लौटते हुए दस रुपए भुगतान करके झोला उठाया और चल दिए। झोला उठाए चल देने वाली बात पर 'फ़क़ीर की तरह झोला उठाकर चल देने' वाला बयान याद आया। यह सोचा कि अभी फ़क़ीर का झोला जमा किसके पास है। जहाँ रखा है उसका किराया कितना पड़ेगा? लेकिन फिर लगा यह सोच ख़ुराफ़ाती है इसलिए उस सोंच को वहीं छोड़कर बाहर आ गए।
शाम की नमाज़ को अभी घंटा भर बाकी था। पहले सोचा कि रुकें देखें लोगों को नमाज पढ़ते हुए लेकिन फिर निकल आए।
लौटते समय गेट नंबर एक से बाहर आए। सीढ़ियों पर माँगने वाले बैठे थे। नीचे गेट के दरवाजे पर एक मांगने वाले का पूरा चेहरा माँस से ढँका हुआ था। बगल से देखने पर लगा कि वह मुखौटा लगाए हुए है। हमने यही 'लगने' वाली बात मन में जमा कर ली। उसी समय सामने की दुकान से एक लड़का उसको चाय देने आया। वह चाय पीने लगा।
बगल से गुजरते हुए हमने देखा कि उसके चेहरे पर कोई मुखौटा नहीं था। वाक़ई उसके चेहरे मांस जमा हुआ था। आँखे नहीं दिख रहीं थी। हमने मुखौटे वाली बात मन से मिटाकर चेहरे पर माँस लटकने वाली बात जमा की। यह भी सोचा कि हम किसी के बारे में कोई धारणा बनाते हैं तो यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि हम किस कोण से उसे देख रहे हैं।
मस्जिद के बाहर सड़क के दोनों तरफ़ तमाम ठेले वाले, दुकान वाले पूरी सड़क को चहल-पहल भरा बना रहे थे। गर्मी भयंकर थी। मन किया कहीं बैठकर कुछ खाया-पिया जाये लेकिन गर्मी इतनी ज्यादा थी कि चलते रहे।
आगे कुछ उर्दू की किताबों की दुकानें दिखीं। अंजुमन पब्लिकेशन से मुस्ताक अहमद यूसुफ़ी का उपन्यास 'आब-ए-गुम' और जरगुजस्त (ZAR GUZASHT) उर्दू में खरीदी। इन किताबों के हिन्दी अनुवाद 'खोया पानी' और 'पापबीती' हम पढ़ चुके हैं। इनको मूल उर्दू में पढ़ने की इच्छा के के चलते ख़रीदीं ये किताबें। अभी तो अटक-अटक के पढ़ना सीखा रहे हैं। पता नहीं कब बिना अटके पढ़ पायेंगे लेकिन ख़रीद लीं किताबें । भले ही पढ़ी न जायें लेकिन साथ में किताबें हाथ में बंधे ताबीज की तरह होती हैं।
किताब वाले से पतरस के मजनून भी माँगी। 'पतरस के मजनून' का जिक्र हमसे मथुरा के वाले वकील साहब Surendra Mohan Sharma जी करते थे। तबसे हमारी 'पढ़नी है' वाली लिस्ट में शामिल है किताब। लेकिन उसके पास मिली नहीं पतरस की किताब । उसने शौकत थानवी की 'खुदा न खास्ता' थमा दी। हमने ले ली। 1200/- खर्च हो गए तीन किताबों में।
अंजुमन प्रकाशन से निकल कर आगे जामा मस्जिद मेट्रो के रास्ते में एक दुकान पर लिखा मजेदार जुमला दिखा। उधार देने से मना करने वाले तमाम जुमले पढ़े थे हमने पहले लेकिन यह नया जुमला था - "उधार एक जादू है, हम देंगे तो आप ग़ायब हो जाओगे।"
हमको न उधार लेना था न ग़ायब होना था लिहाज़ हम आगे बढ़ गए। मेट्रो पकड़ी और घर वापस आ गए।
https://www.facebook.com/share/v/1CjXARQEfx/

No comments:
Post a Comment