कल आपातकाल की पचासवीं वर्षगांठ थी। इस मौके पर तमाम लोगों ने लेख लिखे। जिन लोगों ने इस मौके पर संघर्ष किया था , जेल गए थे, यातनाएँ भोगी थीं उनके बारे में लिखा। कई लेखों में उस समय की परिस्थितियों का जिक्र करते हुए बताया गया कि जयप्रकाश नारायण जी द्वारा फ़ौज और पुलिस को विद्रोह करने का आह्वान के बाद स्थिति अराजक हो जाने के डर से इंदिरा जी आपातकाल लगाया था।
कुछ पोस्टों में इस बात का भी उल्लेख पढ़ा मैंने कि जयप्रकाश नारायण जी ने बाद में माना कि उनका फौज और पुलिस को विद्रोह करने के लिए उकसाने का आह्वान ग़लत था।
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी जी ने अपनी किताब ‘ How Primemisters Decide’ (प्रधान मंत्री कैसे निर्णय लेते हैं) में विस्तार से उन प्रधानमंत्रियों के निर्णय लेने की प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन किया है जिनके साथ उन्होंने काम किया है। इसमें इंदिरा गांधी जी से लेकर मनमोहन सिंह जी तक के प्रधान मंत्रियों के कार्यकाल का विवरण है।
इंदिरा जी के कार्यकाल के बारे में चर्चा की शुरुआत आपातकाल प्रकरण से होती है। जब इलाहाबाद हाईकोर्ट में इंदिरा जी मुक़दमा हार गईं तो उनको अलग-अलग लोगों ने अलग-अलग सलाह दी। कुछ लोगों ने यह सलाह भी दी कि इंदिरा जी रायबरेली सीट से त्यागपत्र देकर किसी और को कुछ दिनों के लिए प्रधान मंत्री बना दें। फिर चुनाव जीतकर फिर से प्रधानमंत्री बन जायें। कुछ लोगों का मत था कि सुप्रीम कोर्ट में अपील की जाये, त्याग पत्र देने की कोई जरूरत नहीं है।
इंदिरा जी को शायद किसी पर भरोसा नहीं था जिसको कुछ दिन प्रधानमंत्री बनाकर वो बाद में दुबारा चुनाव जीतकर फिर प्रधानमंत्री बन जायेंगी। आज की राजनीति में तो यह और भी पक्का हो गया कि जो भी कुर्सी पर बैठा वह फिर छोड़ता नहीं है।
बाद में बदलते घटनाक्रम को देखते हुए राष्ट्रपति के अनुमोदन से संविधान की प्रक्रिया के तहत आपातकाल लगाया गया।
आपातकाल में सभी विपक्षी नेता जेल में बंद हो गए। उस समय के राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघ संचालक द्वारा इंदिरा जी को लिखे कई पत्रों का उल्लेख नीरजा जी किया है जिसमे सर संघ संचालक जी ने आपातकाल के ख़िलाफ़ न लिखते हुए इंदिरा जी को बधाई दी थी कि वे सुप्रीम कोर्ट में जीत गईं। तमाम पत्राचारों के माध्यम से उन्होंने इंदिरा जी की मिजाजपुर्सी जैसी ही की थी।
आपातकाल लगने के कुछ महीनों बाद चन्द्रशेखर जी ने इस मसले पर सलाह देते हुए कहा था -“गोरों से (आपातकाल के ख़िलाफ़) लिखवाओ।” गोरों से मतलब पश्चिमी प्रेस से। इंदिरा जी को अपनी लोकतांत्रिक छवि की चिंता थी और वे पश्चिमी देशों के अखबारों की प्रतिक्रियाओं से प्रभावित होती थीं।नीरजा जी ने इंदिरा जी के आपातकाल हटाने के निर्णय के पीछे उनके लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से कहीं न कहीं जुड़ाव के भाव का भी उल्लेख किया है।
आपातकाल हटने के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार आपसी लड़ाई में गिर गई। राजनारायण जी ने पहले मोरार जी की सरकार गिरवाने में अहम भूमिका निभाकर चरणसिंह जी को प्रधानमंत्री बनवाया। बाद में उनको हटवाने के लिए जुट गए। सारी कहानी बड़ी रोचक है।
चरणसिंह जी, जो जनता पार्टी की सरकार में रहते इंदिरा जी को जेल भेजने पर आमादा थे , कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बने। उनके प्रधानमंत्री बनने पर उनका इंदिरा जी से मिलना उनके बंगले पर जाना तय था। लेकिन उनके किसी चेले ने उनको समझा दिया कि आप तो प्रधानमंत्री हैं , आप उनके यहाँ क्यों जाएँगे। वे नहीं गए। इंदिरा जी अपने बंगले में गुलदस्ता लिए इंतज़ार करती रहीं। उसी समय तय हो गया था कि चरणसिंह जी ज़्यादा दिन प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे।
इंदिरा जी की सबसे ज़्यादा डर इस बात का था कि कहीं जगजीवन राम जी प्रधानमंत्री बन गए तो किसी के लिए कोई मौक़ा नहीं रहेगा। उनको हटा पाना मुश्किल होगा। उनकी प्रशासनिक क्षमता से इंदिरा जी भी भली-भाँति परिचित थी। अगर जगजीवन राम प्रधानमंत्री बनते तो शायद अपने देश की कहानी कुछ और होती। लेकिन पहली बार वो इस कारण प्रधानमंत्री नहीं बन पाये क्योंकि उन्होंने आपातकाल का समर्थन किया था। दूसरी बार अपने बेटे सुरेश राम के आपतिजनक स्थिति में मिले चित्रों के छप जाने के कारण।
बाद में चरणसिंह की सरकार भी गिरी। चुनाव हुए। इंदिरा जी फिर प्रधानमंत्री बनी।
आपातकाल के पचास साल बीतने को संविधान हत्या वर्षगाँठ के नाम पर मनाया जाना भी मजेदार है। जो आपातकाल संविधान में मौजूद एक धारा के अनुसार लगाया गया था उसकी हत्या कैसे हुई थी? आपातकाल खराब था लेकिन वो लगाया तो संविधान के तहत ही गया था। दूसरी बात कि जो संगठन आपातकाल लगाने के विरोध में कुछ नहीं लिखकर उसकी तारीफ़ कर रहा था तो अगर संविधान की हत्या हुई तो इस हत्या साज़िश में वह संगठन भी शामिल था। उसकी भी भर्त्सना होनी चाहिए।
आपातकाल का ज़िक्र करते हुए तमाम आजकल के समय को अघोषित आपातकाल बताते हुए अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं। आने वाले समय पता नहीं इस समय को किस तरह याद किया जाएगा। यह आने वाला समय ही बताएगा।
फ़िलहाल तो वो लोग जो लोग पचास साल पहले आपातकाल में जेल गए और कष्ट भोगे वे आज की स्थितियों की तुलना करते हुए बता सकते हैं कि क्या वाक़ई आजकल का समय 'अघोषित आपातकाल' का है?
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