आज सबेरे टहलने निकले तो सड़क किनारे की एक दुकान से आवाज सुनाई दी -“पेटीएम से 12 रुपए प्राप्त हुए।”
मतलब 12 रुपये का डिजिटल भुगतान हुआ।
डिजिटल पेमेंट आजकल शहरों में आम है। छोटे-छोटे दुकानदार , ठेले वाले, मोची, चाय वाले सब जगह लोगों के पास स्मार्ट फ़ोन है और वे डिजिटल भुगतान स्वीकार करते हैं। होटल में बेयरे तक टिप के लिए अपना मोबाइल नंबर बताते हैं। आजकल भारत तेजी से डिजिटल इंडिया बन रहा है।
डिजिटल इंडिया से लगता है भारत तेजी से उन्नति कर रहा है। लेकिन कभी भाजपा के थिंक टैंक माने जाने वाले गोविंदाचार्य जी ने भारत के डिजिटल इंडिया माडल की आलोचना करते हुए लिखा है नीतिगत रूप से डिजिटल इंडिया देश के विकास के लिए ठीक नहीं है। उनका कहना है -डिजिटल इंडिया का प्रारूप ‘ट्रिकल डाउन थ्योरी’ पर आधारित है। मतलब देश में संपन्नता ऊपर से नीचे आयेगी। उनका कहना है कि यह व्यवस्था ग़लत है। उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि जब देश के आम लोगों के चलने के लिए ट्रेंने नहीं मुहैया करा पा रहे हैं तो कुछ लोगों के लिए बुलेट ट्रेन पर पैसा फूंकना ठीक नहीं है।
एक बातचीत में प्रधानमंत्री जी को बुलेट ट्रेन के बारे में जो कहा उसका मतलब था -"बुलेट ट्रेन विकास के लिए जरूरी है। "
बहरहाल यह तो बड़े लोगों के विचार। अपन तो सड़क की बात कर रहे थे।
आगे एक जगह एक जगह एक कुत्ता सड़क पर एक प्लास्टिक की कटोरी में दूध पीता दिखा। पास में दूसरा भी था , वह भी दूसरा पी रहा था। वहीं पास में एक आदमी थर्मस से दूध निकालकर और भी कुत्तों को दूध पिला रहा था।
बातचीत करते हुए उसने बताया कि वह वहीं पास में ही प्रेस का काम करता है। दुकान के पास जो कुत्ते बैठते हैं उनको सुबह दूध पिलाता है, शाम को खाना खिलाता है।
कुत्तों के नाम भी रखे हैं उसने -शेरू, टाइगर, कालू। दो मादा कुत्ते भी हैं -काली, भूरी। खुद का नाम बताया -राजकुमार।
सबकी देखभाल करता है, खाना खिलाता है। रोज़ एक लीटर दूध पिलाता है। खाना का हिसाब भी कुछ होगा।
और बात करने पर पता चला कि राजकुमार उन्नाव के रहने वाले हैं। उन्नाव में कहाँ के पूछने पर बताया -सफीपुर। सफीपुर में हमारे मित्र गौड़ साहब रहते हैं। हमने उनके बारे में राजकुमार से पूछा तो उनको पता नहीं था। हमने सोचा -“बताओ भारत सरकार के वरिष्ठ प्रशासनिक ग्रेड (SAG) से रिटायर हुए अधिकारी को वहाँ रहने वाला एक आम आदमी नहीं जानता तो काहे का प्रशासन का भौकाल।
बहरहाल आगे बढ़ने पर नुक्कड़ पर फुटपाथ पर रहने वाले लोग दिखे। छोटे-छोटे बच्चे एक बाल्टी पानी से चुल्लू-चुल्लू लेकर नहा रहे थे। नहा क्या शरीर भिगा रहे थे। उनकी माएँ आपस में लड़ते हुए तेज-तेज बतिया रही थीं। आदमी लोग बगल में सो रहे थे। बाक़ी लोग शायद काम-धंधे पर निकल गए थे।
उनके बगल से गुजरते हुए सोचा कि ये लोग और इनके वंशज फुटपाथ से हटकर कब किसी घर में जा सकेंगे? ट्रिकल डाउन थ्योरी से विकास टपकते हुए कब इन तक पहुँचेगा? कभी पहुँचेगा भी क्या ?
हमको पता है कि इस तरह के सवालों के कोई जवाब नहीं होते। लेकिन सोचने में कोई फीस नहीं इसलिए सोच लिया।
https://www.facebook.com/share/v/17T9mz1mVd/

No comments:
Post a Comment