कल सपने में मनोहरश्याम जोशी जी दिखे। ऐसा पहली बार हुआ। दिखा कि एक कमरे के घर में जोशी जी हमारे पड़ोसी हैं। हम जोशी जी को अपनी किताबों के बारे में बताते हैं। कहते हैं-'चलिए हमारी लाइब्रेरी देखिए।'
जोशी जी कहते हैं -'चलो।' चलकर हमारे एक कमरे वाले घर में आते हैं। एक अलमारी में रखी किताबें देखते हैं। किताबों के बीच किसी ने कई तरह के डब्बे भी ठूँस दिए हैं। जोशी जी किताबों को उलट-पुलटकर देखते हैं। कहते हैं -'बढ़िया है। पढ़ो इनको।'
इसके बाद जोशी जी एक कपड़ा माँगते हैं। फिर अपने आप पास टँगी हमारी क़मीज़ से मुँह पोंछते हैं और कमरे से बाहर निकल जाते हैं। इसके बाद सपना भी टूट जाता है।
पता नहीं इस सपने का क्या मतलब है। लेकिन जोशी जी या कोई भी लेखक मेरे सपने में पहली बार आए। हमको आजतक लेखकों के सपने नहीं आए।
जोशी जी के बारे में लिखते हुए अमेरिका के बारे में लिखे उनके संस्मरणों की याद आई। क्या लिखा था उन्होंने यह भूल गए। लेकिन यह याद है कि उन्होंने अमेरिकी समाज किसी पत्रिका में कुछ लेख लिखे थे। पता नहीं वे संकलित हुए या नहीं। Prabhat Ranjan जी शायद जानकारी दे सकें।
अमेरिका के बारे में लिखे संस्मरणों से याद आया कि पिछली सदी में मैक्सिम गोर्की ने भी एक किताब लिखी थी-'पीले दैत्य का नगर।' किताब का हिंदी अनुवाद Ashok Pande जी ने बहुत पहले किया था। किताब का परिचय विवरण इस प्रकार है:
"लालच और पैसे की चकाचौंध से भरे नगर न्यूयॉर्क को गोर्की ‘पीले दैत्य का नगर’ कहते हैं। पीला दैत्य यानी सोना और सोना माने लालच और और अधिक लालच। इस पुस्तक में संग्रहीत लेखों को पढ़ना गहरे कहीं डराता भी है। तक़रीबन सवा-सौ साल पहले के न्यूयॉर्क के दृश्य आज तक़रीबन उसी वीभत्स रूप में उन तमाम विकासशील देशों में देखे जा सकते हैं जिन पर काला अमेरिकी साया पड़ा हुआ है। कहना न होगा हमारा अपना देश भी इन्हीं में एक है।"
हमने यह किताब पहले भी नेट पर देखी थी। कुछ अंश पढ़े भी थे। लेकिन अभी किताब अमेजन में खोजकर आर्डर की। 150 रुपए की है किताब। 13 जनवरी तक आयेगी। इसके बाद अगर फिर आए जोशी जी तो उनसे कहेंगे एक किताब और आई है। देखेंगे?
अमेरिका की चर्चा से मुझे प्रसिद्ध समाजवादी चिंतक किशन पटनायक जी का लिखा लेख याद आता है -' विकल्पहीन नहीं है दुनिया।' बीस साल पहले पढ़ा था यह लेख। इस लेख में उन्होंने विस्तार से बताया था कि अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदार देश होते हुए भी सब पर धौंस जमाता है। अटलांटिक महासागर के कारण सुरक्षित होने की वजह से दूसरे देशों के लिए अमेरिका पर सीधा हमला मुश्किल है। इसी सामरिक स्थिति के कारण वह अपने को अजेय जैसा समझता है।
किशन पटनायक जी ने आगे लिखा था -' लेकिन ऐसा नहीं है कि अमेरिका का इलाज नामुमकिन है। अमेरिका की समृद्धि दूसरे देशों पर निर्भर है। ये देश या तो अमेरिका के सहारे हैं या मजबूरी में अमेरिका का साथ देते हैं। अमेरिका अपनी सामरिक ताकत के बल पर अपनी धौंस जमाये रहता है। लेकिन ऐसा नहीं है कि अमेरिका का कोई इलाज नहीं है। अगर आज दुनिया के बाकी देश अमेरिका का बहिष्कार कर दे तो अमेरिका तबाह हो जाएगा। झल्लाकर अपना बहिष्कार करने वाले देशों पर हमला कर देगा।'
किशन पटनायक जी का यह लेख 'विकल्पहीन नहीं है दुनिया' के पुराने संस्करण में पढ़ा था मैंने। नए संस्करण में पता नहीं यह लेख क्यों नहीं शामिल है जबकि किताब इसी शीर्षक से है। किसी मित्र के पास किशन पटनायक जी का लेख ' विकल्पहीन नहीं है दुनिया' हो तो मुझे भेज दे। उसके लिए अग्रिम धन्यवाद रहेगा।
जोशी से शुरू हुए थे किशन पटनायक जी तक पहुँचे। बीच में अमेरिका भी आ गया। ये अमेरिका हर जगह घुस आता है आजकल लिखने-पढ़ने में। इसका कुछ करना पड़ेगा।
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