ज्ञानरंजन जी अद्भुत, समृद्ध भाषा के धनी थे। अपने लेखन के माध्यम से लगातार समाज की समस्यायों पर चिंता व्यक्त करते रहे। उनके लेखों के संग्रह 'कबाड़खाना' में संकलित एक लेख के अंश से उनकी चिंता का संकेत मिलता है:
" अब बिना मुखौटे के सच्चाई प्रदर्शित करना कठिन है। यह मुखौटा लगातार विकसित होता जा रहा है। अब किसके पास है दौड़ता , छलांग लगाता, तैरता, उड़ता और चढ़ता-गिरता बचपन। सभ्यतायें जब विशाल करवट लेती हैं तो इसी तरह से हम पिस जाते हैं। इस करवट को निराशाजनक न मानते हुये भी इतना जरूर कहूंगा कि आज हमारे बच्चों का भविष्य जनतांत्रिक घोड़ों के हाथों कैद है।"
ज्ञानरंजन जी का निधन हमारे समाज की बहुत बड़ी क्षति है। ज्ञानरंजन जी को विनम्र श्रद्धांजलि।
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