Tuesday, January 27, 2026

शिलांग में पहला दिन


 यात्रा वृत्तांत लिखते हुए सिलसिलेवार लिखने का मन होता है। शुरुआत में इस पर अमल भी करते हैं। लेकिन बाद में यात्राओं के दौरान नए -नए किस्से इतनी तेजी से जुड़ते हैं कि लगता है पहले ताजा किस्सा लिख लें। बीत गया हिस्सा बाद में तफ़सील से लिखेंगे।

अब जैसे गुवाहाटी का किस्सा ही लें। गुवाहाटी में पहले और दूसरे दिन का किस्सा तो लिखा मैंने। लेकिन इसके बाद के गुवाहाटी और फिर काजीरंगा के किस्से रह गए। गुवाहाटी से शिलांग आ गए तो यहाँ के किससे शुरू हो गए। लफड़ा है। लेकिन जो है सो है। अभी शिलांग के किस्से चल रहे हैं तो यही जारी रखते हैं। ठीक है न?
गुवाहाटी से शिलांग आते हुए ड्राइवर और उनकी पत्नी की उमर के अंतर को लेकर सवाल उठे कि दस साल पहले शादी हुई। बच्चा सात साल का है। तो पत्नी की उमर बीस और पति की चालीस कैसे हो सकती है?
हमने अभी ड्राइवर को फ़ोन करके फिर कन्फ़र्म किया और कहा सही में बताओ कि पत्नी की उमर बीस साल है? इस पर उसने हँसते हुए कहा (कुछ कन्फ़र्म नहीं किया) -" पत्नी से मिलवा देते हैं। ख़ुद देख लेना।"
परसों गुवाहाटी वापस लौटना है। उसी ड्राइवर को गाड़ी लाने को बोला है। रास्ते में और बातचीत होगी इस बारे में। उसका अपडेट पोस्ट करूँगा।
शिलांग पहुँचने के बाद चाय पीकर टहलने निकले। शाम के पाँच बज गए थे। अंधेरा होने वाला था। पास ही सिविल बाजार टहलते हुए एक टैक्सी वाले से एलिफ़ेंट फ़ाल्स जाने का भाड़ा पूछा। करीब नौ किलोमीटर का भाड़ा बताया उसने एक हज़ार रुपये। हमने किराए को ज्यादा समझकर आगे बढ़ गए। यह भी सोचा कि शाम को क्या झरना देखना।
आगे एक मोपेड वाले ने मुझे रोककर पूछा -' स्पीडो राइड चाहिए?' हमने एलिफेंट फाल्स का किराया पूछा। उसने जो बताया उसको छह सौ बताया। आख़िर में बात चार सौ रुपए पर तय हुई। उसने हमको हेलमेट पकड़ाया और स्कूटी के पीछे बैठने को कहा।
मेघालय में दुपहिया वाहन पर पीछे बैठने वाली सवारी को भी हेलमेट पहनना अनिवार्य है। इससे बड़ी बात यह कि इसका यहाँ पालन भी होता है।
शहर के बाहर जाते ही सड़क का मूड खराब दिखने लगा। पूरी सड़क किसी अराजक लोकतंत्र की शासन व्यवस्था की ऊबड़-खाबड़ थी। सड़क बन रही थी। मिट्टी और बजरी के कारण बहुत धीरे-धीरे चलते हुए हम आगे बढ़े।
सर्दी काफ़ी थी। अच्छा हुआ हम फूल स्वेटर और जैकेट पहने थे। आहिस्ते-आहिस्ते चलते हुए हम को एलिफ़ेंट फ़ाल्स प्वाइंट पहुँचे। झरना देखने का टिकट एक सौ रुपया था। हमारी जानकारी में मेरी जेब में सौ का नोट पड़ा था। हमने बिना देखे उसे टिकट काउंटर पर दे दिया। काउंटर पर खड़ी महिला ने तुरंत टिकट और तीन सौ रुपये वापस किए। इससे मुझे अंदाजा हुआ कि नोट पाँच सौ का था।
यह आभास होते ही हमने उससे कहा -' मैं अकेले हूँ। साथ वाला तो रैपिडो ड्राइवर है। उसका टिकट क्यों बनाया?' उसने अच्छा, ओके कहते हुए टिकट वापस लिया। दो आदमी को काटकर एक किया और सौ रुपया और वापस कर दिया ।
अंदर पहुँचकर सीढ़ियाँ उतरते हुए झरने के पास तक पहुँचे। झरने से पानी नीचे गिर रहा था। हमने उसका फोटो लिया वीडियो बनाया। झरने के पानी सर्दी का एहसास करा रहा था।
हमने लोगों के देखादेखी हम झरने के नजदीक पत्थर पर खड़े होकर वीडियो बनाने के लिए आगे बढ़े। एकाध पत्थर पर तो पैर ठीक पड़ा। बाद में आगे बढ़ने पर पैर हल्का लड़खड़ाया। जूता पानी में भीग गया। जूते के साथ मोजा भी गीला हो गया। पैर से सेंध लगाकर सर्दी पूरे शरीर में घुसने लगी। वो तो कहो पानी से पैर फौरन खींच लिया वरना बड़ा लफड़ा होता।
थोड़ी देर की फ़ोटो बाजी, वीडियो बाजी करने के बाद हम वापस लौटे। वापस लौटते हुए ड्राइवर से अपनी भी फ़ोटो खिंचा लिए।
सीढ़ियों से उतरते और बाद में वापस जाते समय चढ़ते हुए कई बार पैर लड़खड़ाया। लेकिन संभल गए। हर बार लगता कि कहीं किसी हड्डी के डॉक्टर के दर्शन न करने पड़ें।
ऊपर पहुँचकर वहाँ बने के कैफ़े में चाय पी। चाय और कुछ नाश्ते के एक सौ साथ रुपये हुए। ड्राइवर को चार सौ रुपए देने थे। उसके पास आनलाइन भुगतान की कोई व्यवस्था नहीं थी। लिहाजा ड्राइवर की सलाह पर हमने ड्राइवर के चार रुपए मिलाकर कुल पाँच सौ साथ रुपए भुगतान किए। कैफ़े वाले ने चार सौ रुपये मुझे नक़द थमा दिये।
लौटते हुए आहिस्ते-आहिस्ते आ रहे थे। सड़क पर भीड़ थी। साथ में गीली मिट्टी के कारण सड़क रपटीली भी थी। एक जगह शायद रपटन ज्यादा थी। रपटन में स्पीड कुछ ज़्यादा हो गई। जब तक हम आगे कुछ समझ पायें तब तक हमारा ड्राइवर, स्कूटी और हम भी सड़क पर लंबलेट हो गए। सड़क पर लेटने की मुद्रा ऐसी जैसी सड़क कोई बिस्तरा हो जौर जिसमे अपन तिरछे होकर लेट गए हैं। हमारे घुटने में हल्का दर्द महसूस हुआ। जींस का घुटना और जैकेट की कोहनी में गीली मिट्टी लग गई।
हम आहिस्ते से उठे। पास में आ गए युवक ने हाथ पकड़कर उठाने में मदद की। खड़े होकर हमने देखा कि कई दुपहिया वाहन वहां सरेंडर मुद्रा में लेटे हुए थे। अच्छी बात यह हुई कि गिरते ही लोगों ने रील बनाने के बजाय गिरे हुए लोगों को उठाने में सहायता दी। हमको तो घुटने में हल्का दर्द महसूस होने के अलावा कोई चोट नहीं लगी थी। अलबत्ता ड्राइवर का होंठ हल्का सा कट गया था। उससे ख़ून बहने लगा। उसको दबाकर रखने के बाद थोड़ी देर में ख़ून रूक गया।
सड़क से उठने के बाद हमने स्कूटी की कमान अपने हाथ में ले ली। आहिस्ते-आहिस्ते स्कूटी चलाते हुए अपनी रुकने की जगह तक आए। ड्राइवर को चार सौ रुपए भुगतान किए। वह चला गया। जाने से पहले उसने गिर जाने के लिए और हमारी जींस और जैकेट ख़राब होने के लिए माफ़ी माँगी। हमने उसके कन्धे पर हाथ रखकर उसको विदा किया।
स्कूटी का सफ़र शुरू होने से लेकर ख़त्म होने तक ड्राइवर ने अपनी दास्तान बताई। जैसे उसने बताया उसके अनुसार उसके माँ-पिता नेपाल के थे। दोनों ने भागकर शादी की। चार बच्चे होने के बाद माँ किसी और के साथ चली गई। तब ड्राइवर की उमर दस साल थी। कहाँ गई, किसके साथ गई , पता नहीं चला। उसके बाद पिता ने चारों बच्चों को पाला। अब ड्राइवर की उमर तीस पार है।
स्कूटी चालक ने अपने किस्से भी सुनाये। जैसा उसने बताया उसके अनुसार उसका पहले एक बंगाली लड़की से प्रेम संबंध और संसर्ग रहा। उसकी शादी हो जाने के बाद कई विवाहित महिलाओं से संसर्ग का सिलसला चला। फ़िलहाल मेघालय की जिस लड़की से प्रेम संबंध है वह अभी पढ़ रही है। लड़की के नर्स का कोर्स पूरा करने के बाद उससे शादी का प्लान है। लड़की लड़के से उमर में छोटी है लेकिन पढ़ाई में आगे है। हमने उससे कहा कि ज़्यादा पढ़ने के बाद लड़की किसी और से भी शादी कर सकती है।
इस पर उसने कहा -' हाँ , हो सकता है। मैंने उससे कह भी दिया है कि कोई बेटर पार्टनर मिल जाये तो उससे शादी बना लेना।'
करीब दो घंटे साथ रहने के दौरान उसने हर प्रेम संबंध और संसर्ग के किस्से तफ़सील से बताये। उसने यह भी बताया कि पास में ही बाजार में जरूरत के हिसाब से साथ देने वाली महिलायें उपलब्ध हो जाती हैं।
यह भी लगा कि इसी देश के कुछ हिस्सों में प्रेम संबंध का पता चलने पर पंचायतें और घर वाले प्रेम करने वालों की जान ले लेते हैं। वहीं कुछ जगहें ऐसी भी हैं जहाँ लोगों के लिए प्रेम करना और सबंध बनाना ब्लिंकिट से सामान मंगाने की तरह सहज और सुगम और आम बात है। यह अलग बात है कि देश की बड़ी आबादी को ब्लिंकिट से सामान मंगाना बनाना भी दुर्गम काम है। प्रेम संबध बनाना भी। उनके लिए प्रेम अभी भी आग का दरिया है जिसे डूबकर पार करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बना।
पहले का किस्सा यहाँ पढ़े : https://www.facebook.com/share/p/17jHBbLrN8/
अगले दिन की घुमाई का किस्सा इस पोस्ट पर पढ़ सकते हैं : https://www.facebook.com/share/p/1CAaexzgfv/

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