Tuesday, October 31, 2023

रागिनी टाइम्स से बातचीत

 यू ट्यूब चैनल रागिनी टाइम्स के माध्यम से Ragini शाहजहाँपुर और आसपास की खबरों की जानकारी देती रहती हैं।रागिनी शाहजहाँपुर की अकेली रजिस्टर्ड महिला पत्रकार हैं। पिछले दिनों मुलाक़ात हुई तो रागिनी ने पत्रकारिता जीवन के अनुभव और संघर्ष के बारे में जानकारी दी। एयरहोस्टेस बनने के सपने के साथ जीवन शुरू करने वाली रागिनी का सपना है कि वो कुछ ऐसा कर जाएँ की लोग उनको याद करें। “किसके जैसा बनना चाहती हैं?” के जबाब में रागिनी ने जो बताया उससे कानपुर के भगवती चरण दीक्षित ‘घोड़ेवाला’ की बात याद आ गई:

चलो न मिटते पदचिह्नो पर,
अपने रस्ते आप बनाओ।
बहरहाल आप सुने बातचीत और बताएँ कैसा लगा बिना किसी तैयारी के लिया गया रागिनी का इंटरव्यू? ठीक लगे तो रागिनी टाइम्स को सब्सक्राइब भी करें। रागिनी को शुभकामनाएँ।

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Monday, October 30, 2023

व्यवहार में निष्कपटता सौन्दर्य का लक्षण है- श्रीलाल शुक्ल

 


{श्रीलाल शुक्ल जी से प्रख्यात एवं सााहित्यिक पत्रिका तद्भव के संपादक अखिलेश से हुई चीत। यह बातचीत तद्भव के प्रवेशांक के मौके पर हुई थी। तद्भव का पहला अंक श्रीलाल शुक्ल जी पर केन्द्रित था। इस इंटरव्यू में श्रीलाल जी ने अपने उपन्यास रागदरबारी, लेखन प्रक्रिया , निजी जिन्दगी और पसंद-नापसन्द से से जुड़े अनेक सवालों का जबाब दिया था}
सवाल-बचपन का गांव किस तरह याद करते हैं?
जबाब- जसके दो पक्ष हैं। जमींदारी वाले दिनों की व्यवस्था में जकड़ा हुआ गांव जिसमें अलग-अलग जातियों की अपनी-अपनी परम्परायें
,अपने तौर तरीके थे। किसी भी तरह की वर्ग चेतना नहीं थी। हर आदमी की अपनी हैसियत मुकर्रर थी। गंदी गलियां,बच्चे रास्ते आदि थे और एक भी पक्का मकान नहीं था। दूसरा पक्ष परिवेश और प्रकृति का था। गांव के तीन ओर खेत और विस्तीर्ण जंगल थे। चौथी ओर लखनऊ जाने वाली सड़क थी और घनी अमराइयों का सिलसिला था। आज जब उस गांव के बारे में सोचता हूं तो वह एक ओर कई अद्भुत व्यक्तित्वों और दूसरी तरफ अपनी प्राकृतिक मोहकता के कारण याद आता है।
सवाल-उस गांव में आप बड़े हो रहे थे। घर परिवार,साहित्यिक वातावरण कैसा था?
जबाब- गांव में मेरे वंश के कई परिवार थे जिनमें दो सम्पन्न थे,बाकी बहुत गरीब थे। मेरा परिवार गरीबों कापरिवार था पर पिछली दो-तीन पीढ़ियों से पढन-पाठन की परम्परा थी। बचपन से लेकर १९४८ तक जब मुझे विपन्नता के कारण एम.ए. और कानून की पढ़ाई छोड़नी पड़ी गरीबी तथा साहित्य के प्रति अदम्य आग्रह, इम तत्वों के द्वारा मेरे व्यक्तित्व का संस्कार
होता गया।
सवाल-आपने अपने परिवार में दो तीन पीढ़ियों से पठन पाठन की परम्पराकी बात कही है, उसके बारे में कुछ अधिक बतायें।
जबाब- मेरे बाबा अध्यापक थे और उर्दू फारसी की सामान्य जानकारी के साथ संस्कृत के बहुत अच्छे पंडित थे। उनके द्वारा रचित कुछ श्लोक भी उपलब्ध हैं। मेरे पिता बहुत छोटे किसान थे; उन्होंने स्कूली शिक्षा नहीं पायी थी पर हिंदी ,उर्दू ,संस्कृत का उन्हें सामान्य ज्ञान था। पिता के चचेरे भाई चंद्रमौलि शुकुल १९०७ के ग्रेजुएट थे और बी.ए. की परीक्षा में उन्होंने सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया था। अपने समय के वे अच्छे लेखक और शिक्षाशास्त्री थे। इस वातावरण के कारण मुझे १०-११ वर्ष की अवस्था से ही हिन्दी की तत्कालीन सभी पत्र-पत्रिकायें और पुस्तकें पढ़ने का अवसर मिलने लगा था;उसी के साथ साहित्यिक रचना का प्रोत्साहन भी।
सवाल-उक्त प्रोत्साहन से क्या-क्या लिखा?
जबाब- बहुत अच्छा है कि उन दिनों की लिखी हुई चीजें अब उपलब्ध नहीं हैं। पर ग्यारह वर्ष की अवस्था से लेकर उन्नीस वर्ष तक मैंने उन दिनों के फैशन के अनुकूल न जाने कितनी कवितायें लिखीं,कहानियां लिखीं और उपन्यास भी लिखे,कुछ आलोचनात्मक निबंध भी। इनमें से कुछ की प्रशंसा भी हुई और कुछ कवितायें छपीं भी। इनमें से दो-तीन कहानियां मेरे संग्रह 'यह घर मेरा नहीं है' में देखी जा सकती हैं जैसे 'अपनी पहचान',और 'सर का दर्द'। पर बी.ए. तक आते-आते मेरा रचनात्मक उफान खत्म हो गया था और मैं अपनी शिक्षा तथा जीवन यापन की समस्याओं में धंस गया था।
सवाल-लेखन में वापसी कब और कैसे संभव हुई?
जबाब- लिखने से विरत हो जाने के दिनों में भी मैं आधुनिक हिन्दी और अंग्रेजी साहित्य बराबर पढ़ता रहता था। उ.प्र. प्रशासनिक सेवा में मेरे आ जाने के बाद १९५३-५४ में हमीरपुर जिले के दूरस्थ क्षेत्रों में रहते हुये वहां के अपेक्षाकृत शांत जीवन में मुझे पुन: लिखने की प्रेरणा मिली। एक रेडियो नाटक की रूमानियत और अवास्तविकता से भरी हुई प्रवृत्ति के खिलाफ प्रतिक्रिया दिखाते हुये मैंने 'स्वर्णग्राम और वर्षा' नाम की एक घोर यथार्थपरक व्यंग्यपूर्ण रचना लिखी। इसे धर्मवीर भारती ने निकष-१ में स्थान दिया। मुझे सुखद विस्मय हुआ कि निकष-१ पर आने वाली पाठकों की चिट्ठियों में मेरी इस रचना का उत्साह से स्वागत हुआ और कई पत्र पत्रिकाओं के सम्पादकों ने भारती से मेरे बारे में पूछताछ की। उसके बाद भारती ,विजयदेवनारायण साही और केशव चंद्र वर्मा जैसे मित्रों के प्रोत्साहन से मैंने नियमित लेखन शुरु कर दिया। वास्तव में मेरा उपन्यास 'सूनी घाटी का सूरज' इन्हीं मित्रों को समर्पित है।
सवाल-आपके ये मित्र साहित्य की यथार्थवादी परम्परा के लेखन के घोर विरोधी संगठन 'परिमल' के आधार स्तम्भ थे। आपका परिमल से क्या नाता बना?
जबाब- लेखक के रूप में जब मैं उभरा तब तक इलाहाबाद में परिमल की धार खत्म हो चुकी थी और उसके सदस्य अलग-अलग ढंग से अलग-अलग स्थानों पर जाकर लिखने लगे थे।
सवाल-लेकिन परिमल के बारे में आपका अपना दृष्टिकोण क्या रहा?
जबाब- विजय देव नारायण साही,भारती,सर्वेश्वर,केशवचंद्र वर्मा से मेरी घनिष्ठ मैत्री थी। ये सब परिमल के सक्रिय सदस्य थे लेकिन परिमल ने मुझे कभी आकृष्ट नहीं किया।
सवाल -आपके रागदरबारी के पूर्व के दो उपन्यासों में ग्रामीण जीवन के दुखों,संघर्षों,मुसीबतों के प्रति आपका रवैया सहानुभूतिपूर्ण दिखता है। उसे मैं पक्षधरता भी कहना चाहूंगा लेकिन तमाम लोगों का कहना है कि राग दरबारी में गांव के प्रति आपका दृष्टिकोण उपहासपूर्ण है।
जबाब- उपहासपूर्ण दृष्टि मैंने नहीं डाली है। ग्रामीण जीवन में जो प्रवत्तियां थीं मैंने उन्हें लिखा । गांव में आदमी भांग घोटता है,नंगे बदन रहता है,विपन्न है तब भी वह ठिठोली करता है,हंसता है,बातें करता है,एक जीवंत वातावरण सृजित करता है...
सवाल -राग दरबारी में ग्रामीण समाज की संकट में भी हंसते रहने की दुर्घर्ष क्षमता का चित्रण है कि या समाज में व्याप्त पतनशीलता का चित्रण है?
जबाब- दोनों है।
सवाल-लेकिन कभी-कभी ऐसा हुआ कि जिसे सहानुभूति मिलनी चाहिये वह आपके निशाने पर है,जैसे लंगड़।
जबाब- राग दरबारी में अनेक छोटे-छोटे चरित्र हैं जिनकी उपहास्पदता को लेकर मैंने सम्पूर्ण वातावरण का निर्माण किया है,मगर अंतत: वे तंत्र के ऊपर किये गये मेरे आघात को अधिक तीव्र बनाते हैं। लंगड़ को ही लें, उसका चरित्र उपहास्पदता ज्यादा प्रकट करता है या सत्ता तंत्र के अन्याय को?
सवाल-क्या ऐसा नहीं सम्भव हो सकता था कि लंगड़ को बख्स देते और सिर्फ सत्ता तंत्र को ही निशाने पर रखते?
जबाब- लंगड़ को बख्शने न बख्शने का क्या सवाल है? वह जैसा है मैंने वैसा ही चित्रित किया है। उस पर मैंने कोई वैल्यू जजमेण्ट नहीं दिया है।
सवाल-रागदरबारी व्यंग्य का महाविस्तार है लेकिन कुछ आलोचकों का कहना है कि रागदरबारी का जो व्यंग्य है वह कथा के बाहर की टिप्पणियों में है न कि स्थितियों में।
जबाब- वे मानकर चलते हैं कि व्यंग्य को स्थितियों में ही अंतर्निहित होना चाहिये। अपनी उसी मान्यता पर वे राग दरबारी को कसते हैं। जबकि मैं दूसरी तरह की लेखन शैली अपने लिये चुनता हूं। और यह तो मानना पड़ेगा कि कोई लेखक अपनी विषयवस्तु के अनुरूप शैली चुनने के लिये स्वतंत्र है। अगर यथार्थ के उद्‌धाटन में मेरी शैली आलोचकों के ढांचे से अलग चली जाती है तो यह मेरा दोष नहीं है, उनके बनाये पूर्व निर्धारित ढांचे की अपर्याप्तता है।
सवाल- राग दरबारी में जो भाषा है ,वह आपके यहां पहले नहीं थी,बल्कि समूचे हिंदी लेखन में वह सम्भव न थी। वह भाषा एक विस्फोट थी। कैसे वह भाषा आविष्कृत हुई?
जबाब- एक तरफ अवधी है और दूसरी तरफ आपने गौर किया होगा ,अंग्रेजी के मुहावरे आते हैं। अंग्रेजी का मुहावरा जहां मैंने इस्तेमाल किया है ,वह अनुवाद कर के नहीं ,उसकी प्रकृति को हिंदी में आत्मसात करने की कोशिश की है। हां ज्यादा मूलभूत रूप से अवधी है जिसको इस्तेमाल किया है खड़ी बोली के क्रियापदों और व्याकरण के अंतर्गत।
सवाल- राग दरबारी में बेला को छोड़ कर स्त्री पात्र नहीं हैं। और बेला की भी कोई खास अहमियत नहीं है।
जबाब- दरअसल भारतीय ग्राम पुरुष प्रधान है। वहां स्त्री आनुषांगिक अस्तित्व मात्र है। मगर राग दरबारी में स्त्री चरित्रों के न होने के पीछे अनिवार्यत: यह कारण नहीं है। राग दरबारी का जो तंत्र है, कथा का सूत्र है, उसमें स्त्री चरित्रों की गुंजाइस नहीं बनती।
सवाल- राग दरबारी छपने से पूर्व आपको यह उम्मीद थी कि यह इतनी महत्व पूर्ण कृति सिद्ध होगी?
जबाब- मेरे दिमाग में यह बात स्पष्ट थी कि कुछ हो न हो ,भौतिक तथ्य तो यह था ही कि परिहास की मुद्रा में ४५० पृष्ठों का हिन्दी का तो क्या, मैं समझता हूं कि समस्त भारतीय भाषाओं का यह पहला उपन्यास है। जब एक नितांत भिन्न प्रकार का प्रयोग किया जायेगा तो तो कहीं न कहीं खामियां भी होंगी;यही हुआ। तब भी और आज भी मेरे भीतर स्पष्ट है कि अच्छी रचना दोषरहित हो यह आवश्यक नहीं। बहरहाल... राग दरबारी लिख लेने के बाद यह तो मुझे मालूम था कि इसमें खामियां भी हैं लेकिन इसकी अन्य विशेषताओं के कारण मैं अवश्य आशा करता था कि इसका कोई विशेष प्रभाव होना चाहिये।
सवाल- उपन्यास को आप कितनी बार लिखते हैं?
जबाब- कम से कमतीन बार तो लिखना ही पढ़ता है।
सवाल- सबसे अधिक ड्राफ्ट किस उपन्यास के हुए?
जबाब- मैं समझता हूं कि राग दरबारी भी तीन चार बार लिखा गया था।विस्रामपुर का संत बहुत बार लिखना पड़ा।
सवाल- कौन सी चीजें आपको एक ही कृति को पुन: लिखने को विवश करती हैं?
जबाब- दो चीजें । एक तो उपन्यास लिखने में जो उपकथायें होती हैं उन्हें मैं पहले से पूरी तरह सोचता नहीं हूं, उनका आविष्कार लिखते समय ही होता है। बाद में पहले की घटनाओं का भी रूप बदलना पड़ता है और कभी- कभी वे घटनायें खारिज कर दी जाती हैं। दूसरी चीज ,जहां मुझको भाषागत कृत्रिमता नजर आती है या पता चला कि भावना का आवेग उसमें ज्यादा है या अनावश्यक विशेषणों की भरमार हो रही है तो उनको काटता छांटता हूं। कोशिश करता हूं कि वह देखने में, पढ़ने में बहुत ही साधारण मालूम दे,हां ध्वनि उसकी असाधारण मालूम हो।
सवाल- जैसा आपने कहा है कि कहानी को आप दोयम दर्जे की विधा मानते हैं उपन्यास की तुलना में ,फिर भी आपने कहानियां लिखीं?
जबाब- मेरे कहने का अर्थ यह नहीं कि मुझे कहानियों से परहेज है या उसके प्रति मेरे मन में कोई आकर्षण नहीं । दूसरे यह भी था कि हिन्दी में पांचवे या छठे दशक में कहानियों के बहुत से आंदोलन चले,उनको लेकर जो घालमेल था उससे मुझे लगता था कि इस समय कहानियां लिखना केवल कहानियां लिखना नहीं है। उसे लिखने का अर्थ है किसी आंदोलन में शामिल होना, जो स्वभाववश मेरे लिये बहुत पसंदीदा स्थिति नहीं थी।
सवाल- व्यंग्य आपकी रचना का मूल स्वर रहा है पर कहानियों में व्यंग्य की आजमाइश कम है?
जबाब- बहुत सी कहानियां आपको ऐसी मिलेंगी जिसमें व्यंग्य का स्वर परिस्थिति में अंतर्निहित हुआ है।मेरी आरम्भिक कहानियां'अपनी
पहचान' और बाद की 'दंगा','सुरक्षा','शिष्टाचार' आदि ऐसी कहानियां हैं।
सवाल- व्यंग्य को लेकर आपकी स्थापना है कि व्यंग्य विधा नहीं,एक शैली है ,इसे थोड़ा स्पष्ट करेंगे?
जबाब- भारतीय साहित्य की परम्परा में व्यंग्य अभिव्यक्ति की एक भंगिमा है। अमिधा,लक्षणा,व्यंजना में व्यंजना का प्रयोग करते समय आपका जो आधार रहता है वह व्यंग्य है। इस रूप में भारतीय साहित्य में व्यंग्य को कभी वैसी विधा नहीं माना गया जिस रूप में नाटक या कविता आदि थे। पाश्चात्य साहित्य में जरूर यह एक विधा के रूप में रहा मगर बीसवीं सदी तक आते-आते वहां भी यह एक विधा के रूप में समाप्तप्राय हो गया। हुआ यह कि व्यंग्य के सभी महत्वपूर्ण तत्व सामान्य लेखन में घुलमिल गये। कहानी में,कविता में ,उपन्यास में उन सभी विशेषताओं का समावेश सम्भव हो गया जो प्राचीन समय में व्यंग्य के उपासन माने जाते थे। लेकिन जब मैं यह कहता हूं तो इसका मंतव्य यह नहीं कि व्यंग्य नाम की चीज ही समाप्त हो गयी। आज भी व्यंगात्मक शैली में लिखी गयी कहानी या उपन्यास का रस दूसरा होगा,दूसरी शैली में लिखी गयी रचना का दूसरा।
सवाल- व्यंग्य के दो रूप माने जाते हैं,त्रासदीपूर्ण व्यंग्य और हास्य व्यंग्य,आपकी दृष्टि में कौन अधिक महत्वपूर्ण है?
जबाब- मैंने जिसे हाई कामेडी कहते हैं,उसी में ज्यादातर कृतियां लिखी हैं,कम से कम राग दरबारी का वही मूड है।
सवाल- एक बड़े लेखक के रूप में आप भारतीय समाज की मुख्य चुनौतियां क्या पाते हैं?
सवाल- बड़े लेखक की बात जाने दें ,व्यक्तिगत रूप से मेरी दृष्टि में सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक दिशाहीनता की है जिससे लगभग सभी पार्टियां ग्रस्त हैं। वे अपने चुनाव घोषणा पत्र भले ही अलग-अलग निकालें लेकिन किसी के घोषणापत्र में यह स्पष्ट नहीं होता कि उस पार्टी के विचार से समग्र रूप से समाज का क्या स्वरूप होना चाहिये। सभी पार्टियों के तात्कालिक लक्ष्य हैं । इसी का परिणाम है कि समाज के सर्वांगीण विकास की कोई दिशा नहीं दिखाई दे रही है।
सवाल- भारतीय लोकतंत्र का भविष्य?
जबाब- भारतवर्ष में अराजकता और अस्तव्यस्तता को शताब्दियों तक झेलने की असाधारण क्षमता रही है। इसी आधार पर आप कह सकते हैं कि भारतीय लोकतंत्र का भविष्य वही है जो उसका वर्तमान है।
सवाल- आपके लिये सुख का क्या अर्थ है?
जबाब- मेरा एक लेख है 'जीवन का एक सुखी दिन'। उसमें मैंने सब निषेधात्मक पक्षों को लिया है कि आज यह नहीं हुआ आज वह नहीं हुआ। आधुनिक जीवन के जितने भी खिझाने वाले पक्ष हैं , उनकी सूची दे दी है कि यह नहीं तो दिन अच्छा बीता । लेकिन सुख का पाजिटिव पक्ष होता है वह बहुत आध्यात्मिक विषय है। सच्चाई यह है कि इस प्रश्न के मेरे दिमाग में कई उत्तर हैं जिनका एक बातचीत में विश्लेषण करना मेरे लिये मुश्किल होगा। अब एक पहलू तो यही है कि नितांत अभाव ,कमियों के होते हुये भी एक दार्शनिक स्तर पर सुख की कल्पना की जा सकती है। जैसे जिस समय महात्मा गांधी लम्बे-लम्बे अनशन कर रहे थे ,भूखे प्यासे थे तो क्या कहा जाये कि वे बहुत दुखी थे? या सुखी ? हां,सहज ढंग से कहा जा सकता है कि कि सुख यह है कि कोई आकांक्षा न हो जो आपको कचोटती हो, ऐसा कोई तात्कालिक अभाव न हो जिससे आपके ऊपर दबाव पड़ रहा हो,मनुष्य या प्रकृति द्वारा सृजित ऐसा कोई कारण न हो जो आपको शारीरिक अथवा मानसिक कष्ट दे रहा है।
यहां भी आप देख रहे हैं कि कोई पाजिटिव बात नहीं ,निषेधात्मक चीजें ही हैं। इसी रूप में मैं भौतिक सुख की कल्पना करता हूं।
सवाल- पाजिटिव चीजें मसलन संगीत,अच्छा संग,प्रकृति आदि...
जबाब- एक समय था जब ये सब चीजें मुझे उत्साहित करती थीं,मगर धीरे-धीरे शायद इस समय मेरी प्रवृति बदल रही है। मुझे लगता है कि शायद इन सबके बिना भी एक ऐसे मनोलोक की सृष्टि की जा सकती है जिसमें संतोष ,आत्मिक शांति यानी सुख का अनुभव हो सकता है। हो सकता है कि यह अवस्था के कारण हो...
सवाल- जिस तरह की दृष्टि की बात आप कर रहे हैं उसकी रचना में बाह्य जगत के उपादान हैं या वह पूरी तरह आत्यंतिक और निरपेक्ष सृष्टि है?
चारो ओर जो हताशा का वातावरण बन रहा है
जबाब- राजनीतिक,सामाजिक,आर्थिक परिदृश्य पर ,उसके भीतर रहते हुये आपको कुछ न कुछ ऐसी युक्तियां खोजनी पड़ेंगी जिनसे आप संतोष और सार्थकता का अनुभव कर सकें, अन्यथा आप खीझ की स्थिति में रहेंगे। इनसे बचने के लिये संगीत,विविध कलायें,अच्छे मित्रों का साथ, ये स्थूल आधार मदद करते हैं। मगर कुछ समय बाद ये अपना जादू खोने लगते हैं। तब आपको अपने भीतर ,कह लीजिये कि आध्यात्मिक स्तर पर कोई खोज करनी पड़ेगी। में आध्यात्मिक शब्द का प्रयोग कर रहा हूं,किसी धार्मिक अनुष्ठान की बात नहीं कर रहा हूं।
सवाल- एक समय तो ऐसा था ही जब आपको संगीत से गहरा लगाव था। मेरे ख्याल से वैसा उत्साह भले न हो लेकिन लगाव अभी भी है,आपको किस तरह का संगीत पसंद है?
जबाब- संगीत अगर अच्छा हो तो सब तरह का पसंद है मगर मुख्यत: शाष्त्रीय संगीत ,ख्याल की गायकी ज्यादा आकर्षित करती है।
सवाल- कोई ऐसी ध्वनि ,संगीत से इतर कोई ध्वनि जो आपको आकर्षित करती है?
जबाब- कुछ ध्वनियां तो मुझे बहुत आकर्षित करती हैं। जैसे रात को और अलस्सुबह खिड़की के बाहर बारिश की आवाज। इसी प्रकार खास तौर पर जाड़े में,हल्की हवा की आवाज मेरे लिये अत्यंत उत्तेजक है।
सवाल- पसंदीदा रंग कौन सा है?
जबाब- फूलों को छोड़कर चटक रंग मुझे पसन्द नहीं । मेरे पास शायद ही कोई कमीज ,कुर्ता या ऐसी शर्ट होगी जो गाढ़े रंग की हो। हल्का भूरा,हल्का नीला,स्लेटी,सफेद कुछ इस प्रकार के रंग मुझे ज्यादा आकर्षित करते हैं।
सवाल- आपके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी शक्ति क्या है और सबसे बड़ा दुर्गुण क्या है?
जबाब- दुर्गुण मैं बड़ी आसानी से बता सकता हूं। वह यह है कि मैं किसी भी विषय के ऊपर एकाग्र होकर लम्बे समय तक काम नहीं कर पाता हूं। शक्ति अगर है तो वह है कि मैकेनिकल और तकनीकी चीजों को छोड़कर नयी चीजों ,नये व्यक्तियों,नये विचारों के प्रति मुझमें तीव्र जिज्ञासा रहती है। इन सबको जानने ,समझने या कहूं किसी मानवीय अनुभव के लिये मेरा दिमाग ज्यादा खोजपूर्ण है।
सवाल- ऐसी कोई चीज जिससे आप मुक्त होना चाहें?
जबाब- पान तम्बाकू की लत थी लगभग तेरह वर्ष पहले छोड़ दी। रहा सुरापान ,मैं चाहता हूं उससे भी पूरी तौर पर मुक्त हो जाऊं। लम्बे-लम्बे समय तक उससे मुक्त भी रहा। मैं सुरापान को अपने व्यक्तित्व की समग्रता में असंगत पाता रहा हूं । इसी से आगे के लिये आशान्वित हूं।
सवाल- खाने में क्या पसंद है?
जबाब- खाने में कोई विशेष रुचियां नहीं हैं।मैं शाकाहारी हूं । दूसरी संस्कृतियों के भोजन एग्जाटिक फूड में मेरी विशेष दिलचस्पी नहीं है। शाकाहारी भोजन जो भी ठीक ढंग से बना हुआ हो , वही अच्छा लगता है। मिर्च मशाले ज्यादा पसंद नहीं ,पर 'ब्लैंड' चीजें भी उतनी ही कम पसंद हैं।
सवाल- दोस्त कैसे अच्छे लगते हैं?
जबाब- पारस्परिक निष्ठा और निश्छलता तो होनी ही चाहिये। इसके अलावा जिन विषयों में मेरी रुचियां हैं ,साहित्य,संगीत,इतिहास,नाटक,सिनेमा आदि में जिनसे इन विषयों पर संवाद बन सके। इसके अतिरिक्त लेखक कलाकार
तो आते ही हैं मुकाबले दूसरे व्यवसाय के लोगों के । साथ ही वंश के लोगों से, रिश्तेदारों से भी मेरे बराबर मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बने रहे हैं।उनके साथ बैठकर अवधी में गांव घर की बातें करने का अटूट आकर्षण है। इसके अवसर भी बराबर मुझे मिलते रहते हैं।
सवाल- कैसी स्त्रियां आपको सुंदर लगती हैं?
जबाब- आपका यह प्रश्न सुनकर मेरे दिमाग में कई चेहरे कौंधे और लगता है कि चेहरे का कोई ऐसा माडल नहीं है जो सभी में समान रूप से मौजूद हो। फिर भी जो रूप की सुंदरता है वह कुछ हद तक तो होनी ही चाहिये। घरेलूपन की कद्र करता हूं पर मात्र घरेलूपन उबाऊ चीज है। जीवन की विराट सम्भावनाओं से से कुछ खींचने की जिसमें रुचि हो,चाहे वह साहित्य संगीत कला का क्षेत्र हो या किसी व्यवसायिक विशिष्टता का वही मुझे ज्यादा आकर्षित कर सकती है। अत्यंत बहिर्मुखी प्रवृत्ति न तो मुझे पुरुष मित्रों में अच्छी लगती है , न नारी मित्रों में ही। और कहने की शायद जरूरत नहीं कि व्यवहार में निष्कपटता भी सौन्दर्य का लक्षण है।
सवाल- इन गुणों की कसौटी पर किसे खरा पाया आपने?
जबाब- इसे दिखावा न समझें तो मैं अपनी दिवंगता पत्नी का जिक्र कर सकता हूं। इसके अलावा ,मेरा सौभाग्य रहा कि पुरुष मित्रों की तरह इस कोटि की नारी मित्रों को लेकर भी मैं सर्वथा विपन्न नहीं हूं। पर उनका नाम न लेना ही बेहतर होगा क्योंकि उसके बाद हो सकता है आपके प्रश्न साक्षात्कार को छोड़कर जिरह के दायरे में पहुंच जायें।
सवाल- लेखक का विचारधारा से क्या रिश्ता होता है?
जबाब- लेखक अपने सामान्य जीवन व्यापारों में किसी भी विचारधारा से प्रतिबद्ध रहे,यह उसका हक है। पर रचनाकार की हैसियत से लेखक की प्रतिबद्धता उसको राह खोजने की ,चुनौतियों से जूझने की ,भटकने की कठिनाइयों से बचा लेती है। यदि लेखक वास्तव में अत्यधिक संवेदनशील और प्रतिभाशाली न हुआ तो वह इसके रूढ़िग्रस्त इकहरेपन में फंसने का खतरा भी पैदा कर सकती है।
सवाल- आपकी विचारधारा क्या है?
जबाब- जिसे आप दक्षिणपंथ कहते हैं ,उससे मैं बहुत दूर हूं। मैं भारतीय परिस्थितियों में रचनाकर्म की पहली शर्त उसकी समाज धर्मिता को मानता हूं और इस सिद्धांत को कि रचनाकार की मूल प्रतिबद्धता केवल अपनी रचना के प्रति होती है एक अस्पष्ट और वायवीय वक्तव्य मानता हूं। लेकिन पिछले कई दशको में राजनीतिक उठापटक के दौरान साहित्य में प्रगतिशील विचारधारा की जो गति बनी है और उसे अपने बचाव के लिये जितने मैकेनिज्म खोजने पड़ रहे हैं,उससे मैं बहुत ज्यादा आश्वस्त नहीं हो पा रहा हूं। संक्षेप में ,भले राजनीति की भाषा में इस रुख को संदिग्ध माना जाये,मैं सड़क के बीच कुछ कदम पर बायीं ओर खड़ा हूं।
सवाल- आज आप मुड़कर अपने अब तक के लेखन को देखते हैं तो कैसा लगता है?
जबाब- शायद प्रत्येक लेखक का यह अनुभव हो ,मुझे य ही लगता है कि अब तक जितना हुआ तटवर्ती लेखन भर है, अभी धारा के बीच जा कर लहरों से मुकाबला करना बाकी है।

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Saturday, October 28, 2023

परसाई के पंच-88

 

1. व्यवस्था बदलना इस देश में पाप माना जाता है। इसी पाप का यह पुण्य फ़ल है कि हम दोरंगी जिन्दगी जीते हैं। चुम्बन को गन्दा मानते हैं और खुजुराहो की काम कला की मूर्तियों को ज्यादा से ज्यादा लोगों को दिखाने के लिये पर्यटन विभाग विज्ञापन करता है।
2. हम भी तो हरिजन को जिन्दा जला देते हैं। मुर्गे को तो मारकर भूनते हैं, मगर हरिजन को जिन्दा भूनते हैं।
3. जब शर्म की बात गर्व की बात बन जाय तब समझो कि जनतन्त्र बढ़िया चल रहा है।
4. राजनीति में शर्म केवल मूर्खों को आती है।
5. जब कोई मनुष्य से मन्त्री बन जाता है तो उससे अटपटी बातें होने लगती हैं।
6. मन्त्री होने पर एक तरफ़ तो आदमी यह भूल जाता है कि वह पहले क्या और कैसा था ! फ़िर वह परम ज्ञानी भी हो जाता है। इसके साथ ही वह समझता है कि उसका स्तर एकदम बढ़ गया है।
7. अगर जाति इतनी बुनियादी चीज है तो अलग-अलग जाति की अलग-अलग गन्ध होती। ब्राह्मण की गुलाब की गन्ध , वैश्य की चम्पा की गन्ध।
8. प्रेम स्त्री-पुरुष में नहीं होता, जाति-जाति में होता है।
9. इस देश का मजा यह है कि हिन्दू मुसलमान तो हो सकता है, पर ब्राह्मण कायस्थ नहीं हो सकता। कोई ब्राह्मण कहे कि मैं जाति बदलकर कायस्थ होना चाहता हूं तो उसे नहीं होने देंगे। पर वह मुसलमान होना चाहे तो हो जाने देंगे।
10. थूक चाटने से जाति नहीं जाती, रोटी खाने से जाती है।
11. आजकल हाल यह है कि सफ़र करने वाला आदमी चार बार बिस्तर खोलता और बांधता है। बड़ी हिम्मत करके वह स्टेशन जाने को रिक्शा में बैठता है, तो इस तरह जैसे अर्थी पर चढ़ रहा है।

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Wednesday, October 25, 2023

परसाई के पंच-85

 

1. जो बाहर भ्रष्टाचार है, वही पवित्र स्थान में सदाचार है। बाहर सोना चुराकर गलाना दुराचार है, मगर साधु की अंगीठी में गलाना सदाचार है। बाहर स्त्री-संसर्ग व्यभिचार है, मगर मन्दिर में सदाचार है। बाहर जिसे ग्रहण करना अनैतिक माना जाता है, उसे मन्दिर में देवदासी बनाकर रख लेना, पूरी तरह नैतिक है।
2. बाहर नशा करना बुराई, पर मन्दिर में साधु चरस पीते हैं, तब वह पवित्र कर्म होता है। दुनिया के हर धर्म के धर्मस्थल में बुरा काम अच्छा बनाकर किया जाता है। जीव-हत्या तो वैसे पाप माना जाता है, मगर देवता के लिये मन्दिर में बकरे का बलिदान पवित्र अनुष्ठान होता है।
3. ईमानदार आदमी को सुख देना किसी के वश की बात नहीं है। ईश्वर तक के नहीं।
4. दलगत राननीति में जब तक कोई अपने साथ है, हीरा है। अलग हुआ तो कंकड़ है।
5. धर्म का रहस्य है कि पैगम्बरों और धर्मगुरुओं की बड़ी फ़जीहत उनके अनुयायी करते हैं।
6. तेल-शेख दो बार बम्बई आता है- एक बार रण्डीबाजी करने और फ़िर उससे पैदा हुई बीमारी का इलाज कराने।
7. बांटकर खानेवाला कभी भी नहीं पकड़ा जाता।
8. दस लाख सालों में आदमी विकास करते-करते कुत्ता बन जायेगा, तब भ्रष्टाचार मिटेगा। याने नस्ल बनाये बिना भ्रष्टाचार नहीं मिटेगा। जब तक आदमी की नस्ल है, भ्रष्टाचार रहेगा।
9. ऐसे लोकतंत्र से क्या फ़ायदा जिसमें अपनी पार्टी न जीते। सच्चा लोकतंत्र वह है जिसमें अपनी पार्टी जीते। जिसमें विरोधी जीत जायें वह भी कोई लोकतंत्र है?
10. मुहल्ले की नयी बहू के बदचलनी के किस्से जब चलते हैं तो लोग यह भूल जाते हैं कि इसकी सास अपने जमाने में बहुत बदचलन थी।
11. मन्त्री या मुख्यमन्त्री जब काण्ड करता है तब उसका उत्तरकाण्ड नहीं होता। उसका तब किष्किन्धा काण्ड ही चलता है। जब मामला दब जाता है, नये मामले संसद का समय और अखबार का कागज बरबाद करने लगते हैं तब उससे चुपचाप कहा जाता है कि अब तुम खिसक जाओ, अब तुम्हारी जगह दूसरे को काण्ड करने का मौका दिया जायेगा।

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Thursday, October 19, 2023

तुम बदल गये हो



आज सुबह की चाय धूप में पी। सामने सूरज भाई दिखे। पेड़ पीछे छिपे। लगता है सुंदर कांड पढ़े हैं हाल में। ‘तरु पल्लव माँ रहा लुकाई’ पढ़कर पेड़ के पीछे छिप गये। सोचे होंगे हनुमान जी बन जाएँगे। लेकिन ऐसा कहीं होता है दुनिया में। कौन समझाए। आजकल कैसी को समझाना भी बवाल है।
बहुत बाद मिले थे सूरज भाई। सोचा शिकायत करेंगे। कहेंगे -‘तुम बदल गये हो।You have changed.’
दोस्तों का प्यार जताने का अपना-अपना अन्दाज़ होता है। कोई पूछता है -‘कैसे हो?’कोई कहता है -‘क्या हाल?’ कोई कहता है -‘दिखते नहीं आजकल।’ ये सब आम अन्दाज़ होते हैं। बहुत अपनापे वाले मित्र के अपने ख़ास अन्दाज़ होते हैं। सिग्नेचर स्टाइल। ‘तुम बदल गये हो’ की शिकायत से बात शुरू होने पर लगता है कि कुछ भी नहीं बदला।
कुछ बोले नहीं सूरज भाई। चमकाते रहे धरती को। हमें भी कुछ सूझा नहीं तो बोल दिया -‘स्मार्ट लग रहे हो।’
कुछ न सूझे तो सामने वाले की किसी भी बात की तारीफ़ करके बात शुरू करना सबसे सुरक्षित होता है। तारीफ़ सुनकर पत्थर भी मुलायम हो जाता है। पानी बन जाता है। तारीफ़ ऐसा ब्रहमाष्त्र होता जिसकी मार से बचना असंभव होता है।
सूरज भाई कुछ बोले नहीं। लेकिन देखकर लगा लाज-लाल हो गये हैं। तारीफ़ सुनकर कुछ न बोलना भी एक अदा है। बड़े लोगों की हर हरकत एक अदा होती है। उनकी हर अदा पर उनके अनुयाई मरते हैं। ज़रूरी नहीं कि अदा अच्छी ही हो। लोग तो अपने नायकों की बुरी अदा पर भी मरते हैं। नायक की चिरकुटई पर मरते हैं। झूठ बोलने की अदा पर मरते हैं। उनकी कमीनगी पर मरते हैं।
ऐसा शायद इसलिए होता है कि लोग अपने नायक के माध्यम से अपनी उन इच्छाओं को पूरा होते देखते हैं जो उनकी ख़ुद की होती हैं लेकिन वो ख़ुद कर नहीं पाते। उनका नायक उसको करता है। अपनी इच्छा को नायक के माध्यम से पूरी होते देख वे तड़ से नायक के अनुयायी बन जाते हैं। उसकी अदा पर मर जाते हैं।
सूरज भाई कुछ बोले नहीं। काम से लगे रहे । हमने सोचा कितना ज़िम्मेदारी से काम करते हैं सूरज भाई। ये न हों तो दिन न निकले। नंदन जी कहते भी हैं:
‘जिसे दिन बताये दुनिया , वो तो आग का सफ़र है,
चलता तो सिर्फ़ सूरज है , कोई दूसरा नहीं है ।’
देखते -देखते सूरज भाई ऊपर होते गये। पूरी दुनिया में रोशनी और गरमाहट सप्लाई करने लगे। हमने भी इधर-उधर देखना शुरू किया।
जिस जगह बैठे थे वहाँ से घर के बाहर लॉन में खड़ा पेड़ दिखा। ऐसा लगा कि पेड़ घर के सामने हाथ जोड़कर खड़ा है। सुबह की नमस्ते कर रहा हो। किसी बड़े नेता के चिल्लर चमचे की मुद्रा में उसका पत्ता -पत्ता कह रहा था -‘तुमको जो पसंद हो वही बात करेंगे/तुम दिन को कहो रात तो रात कहेंगे।’
यह गाना जब सुना था तो लगा था कितना लगाव वाला भाव है। लेकिन आज लगा कि लगाव नहीं यह ख़ुद का बचाव है। जैसे राजनीति में पार्टियां व्हिप जारी करती हैं। सब लोग पार्टी लाइन के हिसाब से चलते हैं। अलग हुए तो पार्टी बदर। इसी भाव के घराने का गीत है यह -‘तुमको जो पसंद है वही बात करेंगे।’
घर के सामने झुके खड़े पेड़ को देखकर यह भी लगा मानो आलाकमान के सामने कोई टिकटयाचक विनयवत चुपचाप मौन खड़ा हो। उसके मौन के रोम-रोम से चीत्कार निकल रही हो -‘ तू दयालु दीन हौ, तू दास हौ भिखारी।’
जनसेवा का काम आसान नहीं होता है। ‘एक आग का दरिया है और डूब के जाना है’ घराने का काम होता है।
कुछ देर बाद पेड़ को फिर देखा तो उसकी शक्ल डायनाशोर सरीखी लगी। डायनाशोर तो निपट गये न जाने कितने पहले। अब पेड़ बेचारा खड़ा मकान के सामने विनय पूर्वक अपनी जान की अमान माँग रहा है। उसको लगता होगा कि यह चाहेगा तो वह बचा रहेगा। उसको क्या पता कि मकान तो बना ही बेजान चीजों से है। जबकि वह ख़ुद ज़िंदा है। लेकिन पेड़ को कौन समझाए। डरा हुआ है बेचारा। डरा हुआ जीव तो जो भी सामने दिखता है उसके सामने झुक जाता है। जान की भीख माँगने लगता है। उसको क्या पता कि सामने वाला भी उतना ही निरीह है। कैसी के मोहरे हैं। उसके कातिल तो कहीं और बैठे तमाशा कर रहे हैं।
पेड़ की बात सोचकर हमको दुनिया भर में अपनी ज़िंदगी की जंग लड़ते अनगिनत लोग याद आते हैं। वो न जाने किसके सामने झुककर अपनी ज़िंदगी बचाने की कोशिश में जुटे होंगे। उनके कातिल न जाने कहाँ बैठे उनके क़तल का इंतज़ाम पुख़्ता करते हुये उनके बचाव की योजनाएँ बनाने का दिखावा कर रहे होंगे। शातिर क़ातिलों की यही अदा है।
सुबह सुबह कहाँ क़त्ल और क़ातिलों का ज़िक्र आ गया बातचीत में। सूरज भाई आसमान से मुस्कराते हुए कह रहे हैं -‘ तुमने बेवक़ूफ़ी का दामन मज़बूती से थाम रखा है। अभी तक बदले नहीं ।’

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Wednesday, October 11, 2023

मेरा दिल ये पुकारे आ जा



शाहजहांपुर से वापस लौटने के पहले पंकज से मिलने गए। एक दिन पहले बातचीत के दौरान रागिनी Ragini ने बताया कि पंकज हमको याद करता है। उसी समय सोचा था कि जाने से पहले मिलेंगे पंकज से।
पंकज से मुलाकात कोरोना काल के दौरान हुई थी। गाने के शौकीन पंकज का अपना बैंड था -'शंकर बैंड।' उधार लेकर बैंड बनाया था। कोरोना काल में शादी-ब्याह में बैंड-बाजे बजे नहीं। काम बंद हो गया। कर्जा चुकाने के लिए बैंड के सब आइटम बेचने पड़े। रोजी-रोटी के लिए चाय की दुकान पर आ गए। गाने का शौक बरकरार रहा। जब भी जाते थे चाय पीने, पंकज का गाना जरूर सुनते थे।
कोरोना काल में तमाम लोगों के रोजगार तबाह हुए। होटल वाले, टूरिस्ट, ट्रांसपोर्ट और तमाम काम ठप्प हो गए। लोगों को लोन की किस्तें चुकाने के लिए गाड़ियां बेंचनी पड़ी। तमाम लोगों को लिए कोरोना एक भयावह याद की तरह है। लोग अभी भी उसके सदमे से उबर नहीं पाए हैं।
पंकज से सुबह मिलने के लिए गए। शाहिद रजा Shahid Raza जी को भी साथ ले लिया कहते हुए चलो बाहर चाय पीते हैं। गए जब तो पंकज का चाय का ठेला कहीं दिखा नहीं। हमे लगा शायद उसकी दुकान बंद हो गयी। लौट आये बिना चाय लिए।
शाहजहांपुर से चलते हुए हालांकि देर हो गयी थी लेकिन सोचा कि एक बार देखते हुए जाएं शायद पंकज की दुकान खुल गयी हो।
गए तो देखा दुकान खुली थी। पंकज के पापा थे दुकान पर। अब दुकान ठेले पर नहीं पक्की जगह थी। यह दुकान पहले किराए पर दी थी। किरायेदार का उधार था। वह चुकाकर उससे दुकान खाली करवाई और दुकान शुरू की। दुकान में बैठने की जगह भी थी। कुछ लोग अंदर बैठे चाय पी रहे थे। पीछे दुकान का नाम भी लिखा था -Yes tea.
पंकज ने बताया कि उनकी दुकान अब अच्छी चल रही है। बड़े भगौने में रखे दूध की तरफ इशारा करते हुए बताया -'सब दूध खत्म हो जाता है। शाम को फिर आता है। देर रात , ग्यारह-बारह बजे तक चलती है दुकान।
देर रात दुकान चलने के कारण ही सुबह देर से खुलती है दुकान।
पंकज ने बताया कि अब मम्मी की तबियत ठीक रहती है। बैंड वाले दोस्त जिससे थोड़ा मन-मुटाव था उससे भी फिर से दोस्ती हो गयी है। शादी के लिए मम्मी लड़की देख रही हैं। लड़की कैसी चाहिए पूछनी पर बताया -'जो घर में सबके साथ एडजस्ट करके चल सके।'
दांत कुछ साफ दिखे बालक के। पूछने पर बताया -'अब मसाला खाना बंद कर दिया। ' मुंह खोलकर दिखाया भी। मुंह में अधचुसा कम्पट जीभ की पिच पर पड़ा दिख रहा था।
मसाला खाना बंद कैसे किया ?पूछने पर बताया -'लगता था कि खराब आदत है। आप भी समझाते थे। फिर एक दिन सोचा नहीं खाना है। छोड़ दिया। अब तो महीनों हो गए खाये हुए।'
चलने के पहले गाना सुनाने को कहा। पंकज ने एक क्षण ठहरकर गाना सुनाया -'मेरा दिल ये पुकारे आ जा।' गाना सुनकर लगा कि गाना -गुनगुनाना कम हो गया है पंकज का। रोजी-रोटी की जंग में इंसान अपनी सबसे मनचाही आदत भी भुला देता है। हमने कहा -'गाते रहा करो।'
चलते समय सामने कहीं से आवाज आती सुनाई दी। लगा कोई बुला रहा है। इधर-उधर कोई दिखा नहीं। फिर देखा सड़क पार अपने घर के टेरेस से शुक्ला जी आवाज देकर इशारे कर रहे थे। बुला रहे थे।
शुक्ला जी फैक्ट्री से रिटायर हैं। बोलने-सुनने के मामले में दिव्यांग। लोग बताते हैं कि शाही तबियत के शुक्ला जी खुद सिगरेट नहीं पीते थे लेकिन दोस्तों को बुलाकर सिगरेट पिलाते थे। अनोखी आदत। पंकज की दुकान पर ही उनसे मुलाकात हुई थी। फिर अकसर होती रही। हमको देखकर सलाम किया। हमने भी नमस्कार किया। थोड़ी देर इशारे-इशारे में बात हुई। सब ठीक-ठाक का आदान-प्रदान हुआ और हम चल दिये कानपुर की तरफ।

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