Tuesday, April 30, 2019

खबरों का गठबंधन

1.कानपुर में 51.65% प्रतिशत मतदान: वोटिंग में कनपुरिये सेकेंड डिवीजन से पास।

2. इस बार नहीं दिख रही कोई लहर: सभी मछुआरों ने अपनी नावें उतारी।
3. बुजुर्ग और महिला मतदाता भी पीछे नहीं रहे: जमकर दिखाया वोटिंग का बचपना।
4. 28 प्रत्याशियों की किस्मत ईवीएम में कैद: 23 मई तक किसी की किस्मत को जमानत नहीं।
5. तापमान बढ़ने के साथ ही घटता गया मतदान: कम मतदान के लिए आरोप से सूरज भाई भन्नाए।
6. मतदान के बाद हर उम्मीदवार ने किया जीत का दावा: 23 मई तक सबकी गलतफहमी सुरक्षित।
7. अपशगुन को अपलोड कर दो: जो होगा देखा जाएगा।
8. नौकरी ढूंढने वालों को चेताया: खबरदार जो रोजगार की तलाश की।
9. चाची पहिले वोट डारि आओ: वहिके बाद सब्जी छौंकेव आय।
10. दिखाया पहले वोट का दम: कनपुरिये नहीं किसी से कम।
11. अस्पताल से सीधे पहुंचे मतदान केंद्र: अस्पताल की डर में मारे सिट्टी-पिट्टी गुम ।
खबरों के शीर्षक आज के हिंदुस्तान अखबार से।

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Saturday, April 27, 2019

पप्पू की दुकान और कनेर का फ़ूल


सबेरे-सबेरे पप्पू की चाय की दुकान गुलजार हो गयी है। लोग बैठे चाय -नाश्ता कर रहे हैं। एक बड़ी , सफ़ेद दाढी वाले बुजुर्ग खड़े-खड़े चाय पी रहे हैं। नमकीन दांत से कुतर रहे हैं। एकदम आहिस्ते से। शायद इस ख्याल से कि नमकीन को एकसाथ ज्यादा कटने का दर्द न हो। परदुखकातरता का भाव !

एक बुजुर्ग बेंच को टांगों के बीच फ़ंसाये अखबार बांच रहे हैं। बीच का पन्ना खुला है। अखबार किसी पक्षी के खुले डैनों सा उनके सामने पसरा है। पूरा फ़ैलाकर अखबार पढने का मजा ही और है। हर तरह की खबरें उड़ान भरती हैं।
ओला बुक कराये हैं। घरैतिन को स्कूल जाना है। पुल पर जाम लगता है। अक्सर गाड़ी जाम में फ़ंस जाती है। ओला एक दहकता हुआ शोला बन जाता है।
कई सालों से बन रहा है ओवरब्रिज। ओवरब्रिज मतलब उपरिसेतु। कई बार बनना शुरु होता है। हर बार लगता है कि अब बन ही जायेगा। लेकिन कुछ दिन बाद फ़िर से बनना शुरु हो जाता है।


ओला पर गूगल हमारे घर की लोकेशन ’जे एफ़ सेल स्ट्रीट’ बताता है। कई लोगों से पूछ चुके इसका क्या मतलब है? जेएफ़सेल कौन है, कोई महामानव हैं या कोई फ़ैक्ट्री, या कुछ और ? जितने लोगों से पूछा उनमें से किसी को पता नहीं ! लेकिन गूगल को पता है। गूगल सब जानता है। जानता क्या जो गूगल बताता है अब वही जानकारी है, बाकी सब गलत। गूगल सत्य है, बाकी सब मिथ्या।
फ़ोन देखते हैं तो कई मेसेज पासवर्ड के दिखे। किसी ने मेरे एटीएम से खरीद करने की कोशिश की है। शुरुआत १०० रुपये से। इसके बाद किसी पोओएस से खरीद की कोशिश। कार्ड ब्लॉक किया । सालों से साथ रहे एटीएम कार्ड का साथ छूटने का दर्द। कार्ड ब्लॉक करते हुये दो ही विकल्प बताता है बैंक - ’कार्ड खोया या चुराया गया।’ मतलब कार्ड फ़र्जी खरीद की कोशिश के चलते ब्लॉक कराया जा रहा इसका कोई विकल्प नहीं।
घर के बाहर कनेर के पेड़ में फ़ूल खिले हैं। अलग-अलग डालियों में अलग-अलग अंदाज में। सामने की डाली में एक फ़ूल पूरा खिला है। बाकी के सब कली हैं अभी। कल या परसों तक खिलेंगे। इस लिहाज से कम औसत आयु वाले फ़ूलों वाली टहनी है यह। युवा सबसे ज्यादा हैं इस टहनी पर। जैसे भारत है युवा राष्ट्र। बाकी की टहनियां अलग-अलग फ़ूलों वाली हैं। एक में तो सभी फ़ूल पूरे खिले हैं। पूरी टहनी वृद्धाश्रम लग रही। किसी वामपंथीे पार्टी के पोलितब्यूरो की तरह। किसी दक्षिणपंथी पार्टी के मार्गदर्शक मंडल सरीखी।
फ़ूल का नाम पहले हमने गुड़हल समझा। फ़िर कहा -’अबे गुड़हल नहीं कनेर है।’ मन को हड़काया भी कि अपने आसपास की दुनिया से इतने अनजान कैसे हो गये यार। ये लक्षण तो बड़े लोगों के हैं। खाली भुलक्कड़ और अनजान बनकर बनकर बड़े बनने की कोशिश शार्टकट है। दूसरी तमाम खुर्राट हरकते किये बिना बड़ा बनने का ख्वाब छोड़ दो।
सूरज भाई मुस्करा रहे हैं। पीली रोशनी फ़ैला रहे हैं। कनेर के फ़ूलों पर भी रोशनी की बारिश कर रहे हैं। उनको इस बात से कोई शिकायत नहीं कि कनेर ने उनकी किरणों का रंग धारण कर लिया है। बड़े लोगों का मन भी बड़ा होता है। मतलब असली बड़े वही होते हैं जिनके मन बड़े होते हैं। बाकी तो सब ’डालडा बड़े’ हैं।

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ओवरब्रिज और सड़क सुरंग

 


हमारे घर के पास बनते ओवरब्रिज के बगल से गुजरती सड़क। रोजी-रोटी और खरीददारी के लिए कानपुर आये लोग वापस शुक्लागंज, उन्नाव लौट रहे हैं। हरेक को वापस लौटने की जल्दी है।

ओवरब्रिज नहीं बना था तो सड़क चौड़ी थी। आगे क्रासिंग पर ट्रेनों के आने पर बन्द होती थी। भीड़ होती थी। जाम लगता था। जाम से निपटने के लिए ओवरब्रिज बनना शुरू हुआ। दो साल हमको हो गए देखते। इसके पहले से बन रहा है ब्रिज। कब पूरा होगा , पता नहीं।
कभी दिन में कई बार खुलने-बन्द होने वाली क्रासिंग अब स्थाई रूप से बंद है।
पुल बनने से पहले सड़क के दोनों तरफ बने शानदार बंगलों के हाल बेहाल हो गए है। संकरी सड़क से उनमें घुसना और निकलना कष्टकारी हो गया। जिन बंगलों को एलॉट करवाने के लिए अफसरों में मारामारी होती थी अब उनमें लोग जाना नहीं
चाहते।

सड़क के दोनों तरफ खड़े रहने वाले ठेले अब हट गए हैं। हेयर कटिंग सैलून की बिक्री कम हो गयी है। क्रासिंग पार से आने वाले ग्राहक कम हो गए हैं। पुल बनने के बाद भी अब वे ग्राहक लौटने वाले नहीं। पुल पार करते ही फरर्राटा मारते हुए निकल जाएंगे।
एक चौड़ी सड़क तीन हिस्से में बंट गयी है। बीच का हिस्सा पुल के लिए रखकर उसके अगल-बगल पतली , पगडंडी या कहें कुलिया टाइप सड़के निकल आयी हैं। पतली सड़क पर अक्सर सवारियां आमने-सामने से आकर जाम की सर्जना करती हैं। पर अमूमन जाम घण्टे-दो घण्टे में साफ हो जाता। इतने समय में तो चुनाव के समय कोई विवादास्पद बयान भी साफ हो जाता है।
शाम को लौटती हुई सवारियां किसी सुरंग में जाती दिखती हैं। 'सड़क सुरंग' के मोड़ पर मुड़कर पुराने पुल से होते हुए निकल जाएंगे शुक्लागंज से उन्नाव।

जब मैं इस इलाके में आया था तो सोचता था कि गंगा पुल पर रोज जाऊंगा। गंगा और पुल पर रोज पोस्ट लिखूंगा। 'पुलिया पर दुनिया' के बाद 'पुल से दुनिया' देखूंगा। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। वैसे भी पुलिया ठहरकर बैठने के लिए होती है। पुल इस पार से उस पार जाने के लिए होता है। ठहराव की गुंजाइश नहीं वहां। लेकिन जाने का मन तो होता है वहां। अभी भी मन किया चला जाये।
लेकिन अभी तो काम भर की रात हो गयी। इस समय जाने से क्या फायदा पुल पर। रास्ते में कुत्ते दौड़ा लेंगे। क्या पता कोई काट ही ले। चार ठो इंजेक्शन लगवाने पड़ें। आजकल कुत्ते काटने पर लगने वाले इंजेक्शन भी कम आ रहे हैं। पिछले दिनों हमारे बंगले में एक बच्चे को एक पिल्ले ने काट लिया तो इंजेक्शन मिलने में समस्या हो गयी। शहर खोजना पड़ा।
बहरहाल अब सोना ही सबसे बेहतर विकल्प हैं। सो जाय नहीं तो ग्यारह बज जाएंगे। इसके बाद बारह बजेंगे और फिर तारीख बदल जाएगी। तारीख बदले इसके पहले नींद के इलाके में घुसकर सुरक्षित हो जाया जाए।

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Friday, April 26, 2019

सच और हसीन झूठ

झूठ की भीड़ में एक अकेला सच खड़ा था।
सच अकेला था लेकिन निडर था।
झूठ की भीड़ अकेले सच से डरी खड़ी थी। पता नहीं किस झूठ की पोल खोल दे।
एक अकेला सच अनेकों झूठ पर भारी था।
झूठ की भीड़ में खुसफुसाहट डर बढ़ रहा था। लोग फुसफुसाते हुए आपस में कह रहे थे -'यार इस सच के बच्चे ने जीना मुहाल कर रखा है। यह तो बहुत बड़ी समस्या है हमारे लिए। कब तक इसके डर के साये में जिएंगे हम। इसका कोई इलाज नहीं क्या?'
दुनिया में ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका कोई इलाज न हो। एक शातिर झूठ ने कहा। निकलेगा इसका भी इलाज निकलेगा। चिंता न करो। देखते रहो। थोड़ा इंतजार करो।
झुट्ठों की भीड़ इंतजार करने लगी।
कुछ देर बाद एक हसीन झूठ इठलाता हुआ सच की तरफ बढ़ा। सच जब तक कुछ समझ पाए तब तक झूठ ने उसको चूम लिया और गले लगकर कहा -' सच में तुम कितने बहादुर हो सच। मैं तुम्हारी बहादुरी पर फिदा हूँ। आई लव यू।'
सच कुछ देर को हक्का-बक्का रह गया। जब उसको समझ आया कि उसको चूमने वाला 'झूठ' है तब उसने उसको झिड़ककर दूर किया। हसीन झूठ मुस्कराते हुए झूठ की भीड़ में वापस लौट आया।
कुछ ही देर में सच को हसीन झूठ द्वारा चूमे जाने का वीडियो वायरल हो गया। उसमें से सच द्वारा झूठ को झिड़ककर दूर करने का सीन गायब था।
सच बेचारा डाक्टर्ड और वायरल वीडियो के अधूरे होने की बात कहते हुए अपनी सफाई पेश कर रहा था। लेकिन झूठ की भीड़ में कोई उसकी सुनने को तैयार नहीं था।
सच अभी भी अकेला खड़ा था। सामने झूठ की भीड़ थी। लेकिन अब झूठ की भीड़ से सच का डर खत्म हो गया था। सच के हसीन झूठ के साथ के वायरल वीडियो ने सच को झूठ का 'आदमी' साबित कर दिया था।
सच 'सत्य परेशान हो सकता है लेकिन पराजित नहीं' का स्टेटस लगाए अकेला परेशान खड़ा था।
हसीन झूठ और शातिर झूठ साथ मिलकर अठखेलियां मना रहे थे। हसीन झूठ को झूठ समाज के सर्वोच्च सम्मान से नवाजा गया था।
पूरा झूठ समाज उल्लास मनाते हुए भी डरा हुआ था कि अबकी बार फिर सच सामने आया तो उसका मुकाबला कैसे करेंगे।

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Monday, April 22, 2019

किताबों की दुनिया से

 22.04.2005

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"मैं एक बदतमीज, बदकलाम, बदजबान, बदनसीब , बदमिजाज बूढा बनता जा रहा हूं। लेकिन अब मैं अपना तौर तरीका बदल नहीं सकता, लाख कोशिश करूं तब भी नहीं। मुझे अपने गुस्से और गम को काम में ढालते रहना चाहिये, अपने किरदार और व्यवहार में नहीं। जैसा जीता-सोचता हूं, करीब-करीब वैसा ही लिखता हूं, जैसा लिखता हूं करीब-करीब वैसा ही जीता -सोचता हूं।
अब पढना कम कर देना चाहिये- एक तो इसलिये कि आंखें थक जाती हैं और एक इसलिये कि अब पढने से कोई फ़ायदा होता नजर आता है, न कोई खास लुत्फ़ मिलता। पढा हुआ पहले भी याद कम ही रहता था, अब और कम। अब हर क्षण खीझ को, हर अनुभव की आंच को हर ख्याल की खाक को , हर सांस की सुरसुराहट को, हर दर्द के धुयें को दर्ज करते रहना चाहिये। लेकिन क्यों?"
ये बातें प्रख्यात लेखक कृष्ण बलदेव वैद ने आज से 14 साल पहले अपनी डायरी ( किताब का शीर्षक अब्र क्या चीज है? हवा क्या है?) में लिखीं थीं। उस समय वे 67 साल की उमर के थे। आज वे 91 के होंगे। उनकी दो किताबें पढी हैं मैंने (1) एक नौकरानी की डायरी (2) नर-नारी। दोनों शुरु करने के बाद पूरी खत्म करके ही छोड़ी। ऐसा कम होता है आजकल। किताबें , एक से एक बेहतरीन , बेस्टसेलर किताबें या तो शुरु ही नहीं होतीं या फ़िर अधूरी छूट जाती हैं। पढने की क्षमता कम , बहुत कम हो गयी है। जैसे कम्प्यूटर की मेमोरी भरने के बाद कम्प्यूटर हैंग करने लगता है कुछ वैसा ही। किताबें पढते समय दिमाग हैंग कर जाता है। किताब उठाकर रख देते हैं।
लेकिन किताबें इकट्ठा करने का जुनून बरकरार है। तमाम अलाय-बलाय से बचाती हैं किताबें।
पिछले दिनों मनोहर श्याम जोशी पर लिखी प्रभात रंजन की किताब हमजाद बोहेमियन मंगवाई। उसके साथ और कई किताबें मंगवा लीं। कुछ मित्रों ने लिस्ट के बारे में पूछा था। हमने सोचा बतायें लेकिन फ़िर लगा कि फ़िर तो पहले जी तमाम किताबों के बारे में भी बताना चाहिये। लेकिन अब सोचते हैं कि अभी इस बार की किताबों के बारे में बतायें। क्या पता किसी का मन आ जाये किताब पढने का। जैसे हमजाद बोहेमियन का जिक्र पढकर निर्मल गुप्त जी ने उसे मंगवाया और पढकर ही छोड़ पाये उसे।
किताबों की लिस्ट ये रही:
1. हमजाद बोहेमियन - प्रभात रंजन
2.अब्र क्या चीज है? हवा क्या है?- कृष्ण बलदेव वैद
3.जांच जारी है- आरिफ़ा एविस
4.ढाक के तीन पात- मलय जैन
5.औघड़ -नीलोत्पल मृणाल
6.इनरलाइन पास - उमेश पंत
7.हमसफ़र एवरेस्ट - नीरज मुशाफ़िर
8.पैडल-पैडल - नीरज मुशाफ़िर
9.चिरकुट दास चिन्गारी- वसीम अकरम
10. भली लड़कियां बुरी लड़कियां- अनु सिंह चौधरी
11.मैं बोनसाई अपने समय का - रामशरण जोशी
12. पर्यावरण के पाठ साक्षात्कार -अनुपम मिश्र
13.एक किशोरी की डायरी अने फ़्रांक - अनुवादक प्रभात रंजन
14. पालतू बोहेमियन -प्रभात रंजन
15. सच प्यार और थोड़ी सी शरारत -खुशवन्त सिंह
16.उच्च शिक्षा का अंडरवर्ड- जवाहर चौधरी
17. बारिश, धुंआ और दोस्त- प्रियदर्शन
इसके पहले की मंगाई और अब तक अनपढी , अधपढी किताबों की सूची बनायेंगे तो शाम हो जायेगी। इन किताबों हमारे समय के बेहतरीन लेखकों में सुमार लेखकों की बेहतरीन मानी जानी वाली किताबें भी हैं। ज्ञान चतुर्वेदी जी की किताब पागलखाना और रसूल हमजातोव की मेरा दागिस्तान बहुत दिनों तक बैग में साथ लिये दफ़्तर आते-जाते रहे। यात्राओं में भी साथ रखे।
पागलखाना का सफ़र पेज 73 पहुंचा है। सबसे ताजी जगह जो अंडरलाइन की है वह यह है:
"बाजार में आजकल भ्रम डिस्काउंट रेट पर मिल जाता और नाक बड़े ऊंचे भाव पर बिक जाया करती है। लोग नाक बेच देते हैं और भ्रम लगाये घूमते हैं।"
पेज 73 से 270 तक का सफ़र देखिये कब तय होता है। होने को तो एक दिन में तय हो सकता है लेकिन देखिये। फ़िलहाल तो सामने हैं किताबें।

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Sunday, April 21, 2019

दवा और प्रेम वन लाइनर

 दवाओं की तरह प्रेम की भी एक्सपायरी डेट होती है। Nirmal Gupta

दवाओं की तरह प्रेम के भी साइड इफेक्ट होते होंगे। - अनूप शुक्ल
दवाओं के असर की तरह प्रेम के लिए भी आवश्यक है विश्वास - मनीष मोहन
दवाओं की ही तरह प्रेम जल्द असरदायक भी होता है बेहतरी के लिए 😉😊 ज्योति त्रिपाठी
"रम" जितना पुराना उतना अच्छा और प्रेम जितना पुराना उतना गहरा .....Akram Javed
दवाओं की तरह प्रेम के अलग अलग रंग भी होते हैं। अर्चना चतुर्वेदी
काश दवाइयों की तरह प्रेम भी जेनरिक होता। Alankar Rastogi
दवाओं की तरह प्रेम की अलग अलग खुराकें होती हैं किसी को कम किसी को ज्यादा.. Anup Srivastava
आजकल दवाओं की तरह नकली प्रेम भी मिलते हैं जो बाद (में) बुरा असर करते हैं । - अर्चना चतुर्वेदी
कई बार आराम नहीं आने पर दवा की मात्रा बढ़ानी पड़ती है। इसी तरह नतीजे ना मिलने पर प्रेम की डोज़ बढ़ा देना ही सही रहता है। Poonam Jain
पहले इंजेक्शन का दर्द और पहले प्रेम का दर्द जिसे बता न सके दोनों बहुत याद आते हैं .....Akram Javed.
प्रेम आयुर्वेदिक औषधियों की तरह कुछ खास प्रहरों में ही कारगर होता है। DrArvind Mishra
बीमार हूँ मैं तेरी असरदार नज़र का,
बेअसर दवा है दुआ का असर गया। Harshvardhan Verma
दवा की तरह प्रेम को भी taken for granted लेने से बचना चाहिए -Poonam Jain
एक उम्र के बाद दवा और प्रेम के भरोसे ही जीवन कट पाता है -Poonam Jain
प्रेम के इजहार से ज्यादा साहस का काम प्रेम निभाना है - Pallavi Trivedi
सच्चा प्रेम कोई दवा नहीं खुद एक लाइलाज मर्ज़ है उसकी क्या एक्सपायरी होगी। 😊 -Virendra Bhatnagar
प्रेम के फ्रेम में सेट होना आसान नहीं😊 Alok Nigam
वो प्रेम की दवा ढूंढ रहे हैं तो चलो प्रेम को बीमारी समझ लेते हैं ! -Shweta Sharma
प्रेम कुदरती होता है, बनावटी नही. इसलिए प्रेम के साइड-इफेक्ट दवाओं के साइड-इफेक्ट की तरह अवांछित नही होता.Prahlad Singh
प्रेम नामक बीमारी की कोई उम्र नही होती लेकिन डोज जरूर उम्र के लिहाज से लेनी चाहिए, वरना प्रेम के साइड एफफ़ेक्ट्स भी हो सकते हैं! ALok Khare
बुढ़ापे में दवाओं का डोज़ चिकित्सक को संभल कर देना चाहिए. अपने पुराने चिकित्सक से ही मिलते रहिये. नए चिकित्सक से परामर्श नुक्सान पहुंचा सकता है. Pradeep Kumar Shukla
दवा हो या प्रेम, ये हो नहीं सकता कि कड़वाहट कोई और गटक ले और आराम आपको हो जाए। -Poonam Jain

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Friday, April 19, 2019

अधभरे पेट की दास्तान



कल रात फुटपाथ पर दो बुजुर्ग बतियाते दिखे। हम भी शामिल हो गए गुफ्तगू में। एक गेरुआ कपड़ों में , दूसरे धवल वस्त्र धारण किये।
'गेरुआ बुजुर्ग' का ठिकाना है यह। फुटपाथ पर बिस्तर। साथ में कुछ सामान। बगल में काली मोमिया। शायद बरसात से बचाव का साधन।
'कहाँ के रहने वाले हैं ?' पूछने पर हमको प्रतापगढ़, गोरखपुर, बनारस, उन्नाव, जौनपुर तक टहला दिया। कुछ तो बुजुर्ग अस्पष्ट आवाज और बहुत कुछ ट्रैफिक का शोर, समझ में नहीं आया कि कह क्या रहे हैं। लब्बोलुबाब यही निकला कि इधर ही डेरा है आजकल।
नाम पूछने पूछने पर पूछा -'असली बताएं कि नकली?'
हम बोले-'दोनों बताओ।'
दोनों नाम बताने की चुनौती स्वीकारते हुए बांह आगे की कहा -'पढ़े लिखे लगते हो। लेव पढ़ लेव।'
बांह में नीली स्याही से नाम गुदा था -'धनपत।' हमको मुंशी प्रेमचंद याद आये जिनका नाम धनपतराय था।
हमने कहा अब दूसरा नाम भी बता दो। बोले -'भगत।'
मुंशी जी की ही कहानी याद आई 'मन्त्र'। कहानी के पात्र भगत जी झाड़-फूंक का काम करते हैं। डॉक्टर चड्ढा के बच्चे की जान बताते हैं।

बात बात में पता चला कि यहीं सोते हैं। यह भी कि शाम को 'पेटपूजा' नहीं हुई। साथ वाले धवल बुजुर्ग पास में झाड़ी बाबा के पास कहीं खा कर आये हैं। कोई खिला देता है। हमने पूछा-'जहाँ से खाकर आये वहीं से इनको भी खिला लाओ।
इस पर सफेद कपड़ों वाले बुजुर्ग बोले। डर लगता हैं। कम दिखता है। अंधेरे में कोई गाड़ी कुचल न जाये इस डर से अब नहीं जाएंगे। हमने कहा -'बगल के होटल से खा लो। पैसे हम दे देंगे।' इस पर कुछ बोले नहीं भगत जी।
हमने पूछा कब से नहीं खाये? तो बोले-'कल से नहीं खाये।' कहकर चुप हो गए।
हम और साथ के बुजुर्ग चल दिये। हम पैदल चल रहे थे। हमारे साथ में सफेद कपड़े वाले बुजुर्ग बैठे-बैठे सड़क पर हथेलियों के बल आगे बढ़ रहे थे। बताया कि किसी गाड़ी ने ठोंक दिया था। सीधे खड़े होने और चलने से मोहताज हो गए हैं। नाम बताया -नंदकिशोर।
पता चला कि नंदकिशोर की पत्नी रहीं नहीं। बच्चे हैं नहीं। उम्र करीब 50-60 । घिसटते हुए आगे बढ़ते हुए होटल के सामने याद दिलाकर बोले -'यहां से भेज देव खाना भगत के लिए।'
हमने होटल वाले से कहा -'भगत के लिए दो रोटी दाल भेज दे।'
होटल वाले बोले -'वो दो रोटी नहीं खाता। पांच रोटी खाता है। दाल नहीं अंडा होगा। '
हमने कहा -'ठीक है पांच भेज दो। अंडा भी। कित्ते पैसे हुए हम दे देंगे।'
उसने 15 रुपये लिए। पाँच रोटी और अंडा के लिए इतने कम रुपये मुझे ताज्जुब लगा। लेकिन अच्छा भी लगा कि 15 रुपये में भलाई का पुण्य खाते में जुड़ गया।
आगे नन्द किशोर अपनी गली में मुड़ कर रुके थे। नुक्कड़ वाले से कुछ ले रहे थे। हमने कहते सुना -'छोटा वाला देना।' हमें लगा कि शायद 'पौवा-पाउच' खरीद रहे हों। दिमाग दूसरे के बारे में खराब आसानी से सोच लेता है। लेकिन फिर पता चला कि मसाले की पुड़िया खरीद रहे हैं।
हम दोनों अपने-अपने रस्ते आगे बढ़ गए। हमको बाजार जाना था।

रास्ते मे हम सोचते रहे कि चुनाव लड़ने वाली पार्टियों ने किसी न किसी तरह हर एक को अगले कुछ सालों में घर देने का वादा किया है। क्या भगत और नन्दकिशोर जैसे लोग भी इस लिस्ट में हैं जिनको घर देने की बात कहती हैं पार्टियां? क्या इनको भी कुछ हजार मिलेंगे घोषणाओं के हिसाब से ?
इसका जबाब शायद 'नहीं' में ही है। आने वाले वर्षों में भी इनके हाल ऐसे ही रहने हैं।
लौटते हुए मन किया कि भगत जी के हाल देखते हुए चलें। खाना मिला कि नहीं भगत को। इससे ज्यादा यह चिंता थी कि देखें 15 रुपये के पुण्य खाते में चढ़ा कि नहीं।
भगत जी सर तक चादर लपेटे सो रहे थे। 'खाना मिला कि नहीं' पूछने पर बोले-'रोटी ठंडी थी। अंडा बहुत कम था। पेट नहीं भरा।'
हमारे पुण्य को ग्रहण सा लग गया। हमने कहा -'और कुछ खा लेव जिससे पेट भर जाए (और पुण्य की एंट्री हमारे खाते में हो जाये)। इस पर भगत जी -'अब कल ही भरेगा पेट' कहते हुए करवट बदलकर लेट गए।
हम भी घर लौट आये। भूख तेज हो गयी थी।
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कचरा अपने मगज का

 कचरा अपने मगज का, मन में ही धरो लुकाय,

देखि अठिलैंहैं लोग सब, औरौ देहैं छितराय।


भला जो देखन मैं चला, भला मिला न कोय,

फ़िर जो देखा ध्यान से, मुझसे भला न कोय।


मंहगाई की मार को, मानो सब हैं गये भुलाय,

अब चुनाव हाल ये, कछु और न देखा जाय।

-कट्टा कानपुरी

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Thursday, April 18, 2019

जरूरतें कम तो जिन्दगी आसान

हमारे घर के बाहर लगे पेड़ की छाया में अक्सर रिक्शेवाले, टेम्पोवाले आराम करते हैं। इनमें से एक हीरालाल भी हैं।

हीरालाल कालपी के रहने वाले हैं। कानपुर में रहकर रिक्शा चलाते हैं। कालपी में पत्नी हैं, पांच लड़कियां, एक लड़का है। सबकी शादी हो गयी। सब अपने-अपने ठिकाने अलग-अलग। ये सबसे अलग कानपुर रहते हैं।
हाथ में कुष्ठ रोग है हीरालाल को। उंगलियों के पहले पोर गले हैं। एक शीशी में कोई तेल लिये मलते रहते हैं हाथ-पैर में। कहते हैं इससे आगे नहीं बढ़ता।
चुपचाप पेड़ की छांह में आराम करते रहते हैं हीरालाल। कभी आते-जाते बात हो जाती है।
रिक्शा खुद का है हीरालाल का। रोज किराया नहीं देना पड़ता। खाना होटल में खाते हैं। रेल की पटरी के किनारे एक कोठरी में किराये पर रहते हैं।
एक दिन दोपहर बाद मिले तो बताया सुबह से ६५ रुपये की कमाई हुई। खा-पीकर सब बराबर हो गये। नाश्ते में पूड़ी सब्जी खाई। दोपहर में ब्रेड-पकौड़ा। शाम की चिंता नहीं। दोपहर बाद फ़िर निकलेंगे सवारी की खोज में। कुछ न कुछ मिलेगा। उसी से शाम का खाना होगा।
हमने कहा - ’कभी न मिले सवारी तो आ जाया करो। खाना, पैसा कुछ ले लिया करो। कभी चाय,पानी कर लिया करो।’
बोले-’ सब हो जाता है। कोई कमी नहीं। उपर वाला सब इंतजाम देखता है।’
कोई नशा पत्ती करते नहीं। कोई और खर्चा है नहीं। जो कमाते हैं उसी से खर्च चल जाता है। कोई जरूरत नहीं और पैसे की।
खोपड़ी घुटी है। सफ़ाचट। कारण बताया कि खोपड़ी में बाल रहने पर साबुन तेल का खर्च होता है। घुटवा ली। वो खर्च बचा। २५ रुपये लगे खोपड़ी घुटवाने में।
हमने पूछा -’घर क्यों नहीं जाते? पत्नी को साथ क्यों नहीं रखते?’
बोले-’ दीवाली में घर गये थे। महीना भर रहे। फ़िर चले आये।’
हमने फ़िर कहा-’ पत्नी को साथ ले आओ। वो वहां अकेली रहती है। तुम यहां अकेले।’
बोले-’ डुकरिया (पत्नी) वहां खुश। हम यहां आराम से। कोई जवानी के दिन तो हैं नहीं। अब उमर के हिसाब से ठीक है।’
पत्नी काम-काज में पूड़ी बेलने का काम करती है। कमाई हो जाती है गुजर-बसर भर की।
बातचीत से अंदाजा लगा कि हाथ-पैर में कुष्ठ रोग की वजह से अलग रहते हैं परिवार से।
एक जिन्दगी यह भी। किसी से कोई शिकायत नहीं। न कोई दैन्य, न किसी से कोई शिकायत। पैसे के लिये कोई किचकिच नहीं। कोई बयानबाजी नहीं। कोई फतवा नहीं। न कोई भविष्यवाणी की किसको कितनी सीट मिलेंगी।
हीरालाल से मिलकर फिर लगा कि जरूरतें कम हों तो जायें तो जिन्दगी आसान लगती है। सोचना आसान अमल में लाना मुश्किल। आज तो हर इंसान, 'ये दिल मांगे मोर' का रास्ता पकड़े हुए है।।

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Monday, April 15, 2019

 अख़बार वाले तो कुछ भी छाप देते हैं

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'रिक्शे से पांव नीचे नहीं उतरता था। मुंह माँगी कीमत देते थे। रिक्शे वाले इंतजार करते थे इनके ऊपर से नीचे उतरने का।'
-पंकज बाजपेयी के बारे में बताते हुए रिक्शे ठेके के मालिक सलीम ने बताया।
कल अर्से बाद मिलना हुआ पंकज बाजपेयी से।Sharma जी की भी शिकायत दूर हुई।
सुबह निकले तो सामने से एक नाबालिग उम्र का बालक रिक्शे में सवारी बैठाए चला आ रहा था। उचक-उचक कर रिक्शा चलाता।एक बार बाएं और अगली बार दाएं पैडल पर जोर लगाकर रिक्शा चलाता। ऐसा करते हुए लगा कि मानो रिक्शा कोई राज्य हो जिसे एक बार वामपंथी चला रहे हैं, अगली बार दक्षिणपंथी। बच्चा कम उम्र का था सो यह भी लगा कि राज्य की सरकारें नाबालिग मतलब कम उमर के लोग चला रहे हैं।
ऐसा ख्याल कल आया था। आज सोचा तो लगा कि बेवकूफी की बात है। लेकिन बेवकूफी की बात की भी अपनी अहमियत तो होती ही है।
पंकज बाजपई के ठीहे पर पहुंचे तो वे वापस का चुके थे। पास की दुकान के नीरज ने बताया कि अभी गए हैं। पूछ रहे थे कि बहुत दिन से भैया आये नहीं।
हम उनके रहने के ठिकाने की तरफ बढ़े। मोड़ से देखा तो अपना जिरह-बख्तर लादे ऊपर जीने की तरफ बढ़ रहे थे। हमने फुर्ती से उनके पीछे जाने की सोची। लेकिन सामने गुज़रते ट्रक ने फुर्ती की हवा निकाल दी। हम थम गए। जब तक पहुंचे तब तक पंकज जी जीना चढ़कर अपनी जगह पहुंच चुके थे।

आवाज दी सामने आए। मोटा जिरह बख्तर उतारकर अंगौछा धारण कर चुके थे। हमको देखकर फुल पैंट पहना। साबुन से हाथ धोया। इसके बाद चरण स्पर्श करने वाली मुद्रा में हाथ आगे बढ़ाया। बोले -'कहाँ थे इतने दिन? हमको चिंता हो रही थी ।'
हमने व्यस्तता का बहाना बताया। बोले -'तुम चिंता न करना। हम तुम्हारी सुरक्षा का इंतजाम किए हैं।'
तबियत- सबियत की बात पूछी। बोले ठीक है। पता चला जितनी बार नीचे से ऊपर आते हैं उतनी बार नहाते हैं। नहान मतलब पानी पोंछन। गन्दगी पसंद नहीं।
जलेबी, दही, समोसा लेते हुए बोले-'माल आइटम है इसमें। दोपहर तक खाएंगे।'
चलते समय कोल्डड्रिंक के पैसे मांगे। 30 रुपये में ही खुश हो गए। और कि जिद नहीं की। नीचे होते तो शायद करते। 'जिरह-बख्तर'उतर जाने पर शायद जिद की ताकत कम हो गयी हो।
नीचे आये तो सामने ही सलीम से बतियाने लगे। सलीम के 50 रिक्शे चलते हैं। खुद रिपेयर करते हैं रिक्शे। बोले -'शुरू में रिक्शा चलाया। फिर दुकान में काम किया। इसके बाद खुद के रिक्शे खरीदे। अब रिक्शा चलवाते हैं। 40 साल हो गए यह सब करते।'
जिस दुकान में काम करते थे उसका नाम 'रज्जाक रिक्शा स्टोर' था। अब वहां 'ओशो डिपार्टमेंटल स्टोर' खुल गया है। पसीने से परफ्यूम का सफर किया है दुकान ने। पहले भीड़ रहती होगी अब दुकान में सन्नाटा था। कहने का मतलब दुनिया में पसीने के कारोबार से जुड़े लोग ज्यादा हैं लेकिन दुकाने परफ्यूम वाली चल रही हैं।
अपने रिक्शों की रिपेयरिंग खुद करते हैं सलीम। एक रिक्शे को सड़क पर लिटाये उसके पेंच कसते हुए बताया कि आज एक नया रिक्शा 12000/- का आता है। 50 में से 20-30 रिक्शे ही चलते हैं। बैटरी रिक्शों ने सायकिल रिक्शों का कारोबार चौपट कर दिया है।
'लेकिन अखबार में तो खबर छपी है कि अब बैटरी रिक्शे केवल गलियों में चलेंगे।'-हमने बताया।
अरे अखबार वाले तो ऐसे ही कुछ भी छाप देते हैं। खाली जगह भरने के लिए। कुछ होता थोड़ी है अखबार में छपने से। यहां गलियों में घुसेंगे तो निकल पाएंगे बैटरी रिक्शा? सब फालतू बातें छापते हैं अखबार वाले।
बात फिर पंकज बाजपेयी की होने लगी। सलीम ने बताया :

'बहुत शान से रहते थे। रिक्शे से पांव नीचे नहीं उतरता था। रिक्शे वाले इंतजार करते थे कि कब उतरें और उनको लेकर चलें। मुंह मांगी रकम देते थे।प्रेम से बात करते थे। देखने में खूबसूरत। आप उस उमर में रहे होंगे उससे भी कहीं खूबसूरत। फिर पता नहीं कैसे दिमाग गड़बड़ा गया। सालों से ऐसे ही देख रहे हैं इनको।'
50 रिक्शों का मालिक मेहनत से अपने रिक्शे बना रहा था। बगल में खड़े रिक्शे वाले उनकी कहानी सुन रहे थे। एक जन बहराइच से आये हुए हैं रिक्शा चलाने। आगे के दांत टूटे हैं। दांत खोदते हुए बगल के दांतों में फंसी हुई चीजें निकालते हुए अपना भी योगदान दे रहे थे।
सलीम के बच्चे इस धंधे में आये नहीं। कोई रेफ्रेजरेशन के धंधे में लगा। कोई आईटीआई कर रहा है। हमने पूछा नहीं कि वोट किसको दोगे। उनको भी चुनाव से कोई मतलब नहीं लगा। आम आदमी और मीडिया में यही फर्क होता है।
लौटते हुए चन्द्रिका देवी चौराहे पर एक ग्लास गन्ने का रस पिया। याद आया कि कुलदीप नैयर ने अपनी आत्मकथा में लिखा था कि एक बार शास्त्री जी मंत्री पद पर रहते हुये कहीं जा रहे थे। क्रासिंग बन्द थी। जब तक क्रासिंग खुले तब तक उन्होंने वहीं एक ठेलिया से गन्ने का रस पिया। पैसे दिए और आगे बढ़े। आज कोई हारा हुआ विधायक भी इतनी तसल्ली से नहीं जी पाता।
लौटते हुए चमनगंज होते हुए आये। उसका किस्सा फिर कभी। फिलहाल इतना ही।

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